बस बीत गया साल......

पूरा एक साल बीत गया....क्या नया पाया यह तो नहीं बता सकता लेकिन हाँ इतना ज़रूर है कि खोया बहुत कुछ...भले खोने वाली चीज़ों कि संख्या कम हो लेकिन दर्द बहुत है...और जो चीजें पाई उनकी तुलना में यह अधिक मायने रखती है.....यही ज़िन्दगी है इसे देखना हो तो नज़रिया सड़क पर चलते लोगों को गिनने के नजरिये से अलग रखना पड़ता है.....खैर छोडिये ....देश के सबसे पहले भोजपुरी न्यूज़ चैनल हमार टीवी में काम करते हुए एक साल से अधिक हो गएँ हैं....जिस भाषा को रोज बोलता था.... सुनता था उसे खबर के नजरिये से देख रहा हूँ....रोज़ कुछ नया सिखा...लेकिन ना जाने क्यों साल के अंत में लगता है कि साल बस यू ही गुज़र गया......डे प्लान, फ़ील्ड रिपोर्ट, लाइव, एंकर यही रहा.....अपने लिए सोचने क मानो वक़्त ही नहीं मिला....सुबह सात बजे से लेकर रात कि दस बजे तक बस बाईट और पैकज में समय गुज़र गया और इस सब के बाद भी यही दर मन में रहा कि कहीं मंदी के दौर में मिली नौकरी चली ना जाये......इस बात क भी गिला कम ही रहा कि आप जिन लोगों से काम और योग्यता में कम नहीं हैं लेकिन सेलेरी में कम हैं.....यही एक नौकरी पेशा आदमी कि आदर्श ज़िन्दगी है.....लेकिन अब क्या किया जा सकता है..नया साल दस्तक दे रहा है...नए सपने खुद बखुद ना जाने कहाँ से आँखों में आ गए....ना चाहते हुए भी एक बार फिर उसी डे प्लान और पॅकेज कि चिंता होने लगी है....पता नहीं इन सपनो क भविष्य क्या होगा लेकिन सपने तो सपने हैं एक मासूम सी हंसी कि मानिंद यह तो आँखों में आ जाते हैं इन्हें नहीं पता कि इनके आने के बाद आँखों में अश्क आयेंगे या नहीं...शायद यही है नया साल....चलिए आइये मनाया जाये......
एक ख्वाब
बस यूं ही
आँखों में उतर आता है
कुछ नमी कुछ हंसी ले आता है
पल भर में बदल जाती है
तस्वीर इस दिल कि
लेकिन टूटे तो
हर शख्स
वहीँ बेगाना सा नज़र आता है.....

“थ्री ईडियट्स” में आमिर खान है कहाँ?

जीनियस जीनियस होता है... उसके जरिये या उसमें अदाकारी का पुट खोजना बेवकूफी होती है। शायद इसीलिये थ्री ईडियट्स आमिर खान के होते हुये भी आमिर खान की फिल्म नहीं है। थ्री ईडियट्स पूरी तरह राजू हिराणी की फिल्म है। वही राजू जिन्होने मुन्नाभाई एमबीबीएम के जरीये पारंपरिक मेडिकल शिक्षा के अमानवीयपन पर बेहद सरलता से अंगुली उठायी। यही सरलता वह थ्री ईडियट्स में इंजीनियरिंग की शिक्षा के मशीनीकरण को लेकर बताते हुये प्रयोग-दर-प्रयोग समझाते जाते हैं। राजू हिराणी नागपुर के हैं और नागपुर शहर में नागपुर के दर्शको के बीच बैठ कर फिल्म देखते वक्त इसका एहसास भी होता है कि थ्री ईडियट्स में चाहे रेंचो की भूमिका में आमिर खान जिनियस हैं, लेकिन सिल्वर स्क्रिन के पर्दे के पीछे किसी कैनवस पर अपने ब्रश से पेंटिंग की तरह हर चरित्र को उकेरते राजू हिराणी ही असल जिनियस हैं। यह नजरिया दिल्ली या मुबंई में नहीं आ सकता। नागपुर के वर्डी क्षेत्र में सिनेमा हाल सिनेमैक्स में फिल्म रिलिज के दूसरे दिन रात के आखरी शो में पहली कतार में बैठकर थ्री इडियट्स देखने के दौरान पहली बार महसूस किया कि आमिर खान का जादू या उनका प्रचार चाहे दर्शकों को थ्री इडियट्स देखने के लिये सिनेमाघरो में ले आया और पहले ही दिन फिल्म ने 29 करोड़ का बिजनेस कर लिया, लेकिन पर्दे के पीछे जिस जादूगरी को राजू हिराणी अंजाम दे रहे थे उसे कहीं ज्यादा शिद्दत से नागपुर के दर्शक महसूस कर रहे थे।

जुमलों में शिक्षा के बाजारीकरण और रैगिंग के दौरान कोमल मन की क्रिएटिविटी ही कैसे समूची शिक्षा पर भारी पड़ जाती है, इसका एहसास कलाकार से नहीं फिल्मकार से जोड़ना चाहिये और यह सिनेमैक्स के अंधेरे में गूंजते हंगामे में समझ में जाता है, जब एक दर्शक आमिर खान की रैगिंग के दौरान किये गये प्रयोग पर चिल्ला कर कहता है... वाह भाऊ राजू! हिसलप कालेज का फंडा चुरा लिया। तो किसी प्रयोग पर हाल में आवाज गूंजती है... भाउ... यह तो अपना राजू ही कर सकता है। कमाल है फिल्म परत-दर-परत आगे बढ़ती है तो राजू हिरानी की तराशी पेंटिंग के रंगो में दर्शक भी अपना रंग खोजता चलता है और इंटरवल के दौरान लू में एक दर्शक मुझे इसका एहसास करा देता है कि राजू के सभी प्रयोग मशीनी नहीं होंगे, वह मानवीय पक्षों को भी टटोलेंगे। बात कुछ यूँ निकली... लू करते वक्त...

“आपको कैसी लग रही है फिल्म?”
“अच्छी है... मजा आ रहा है।”
“भाउ राजू की फिल्म में मजा तो होना ही है। राजू कौन? अपना राजू हिराणी।”
“अरे! लेकिन मुझे तो आमिर खान की फिल्म लग रही है।”
“का बोलता... आमिर खान। भाऊ, आमिर खान तो एक्टिंग कर रहा है।”
“तो क्या हुआ... एक्टिंग ना करें तो फिल्म कैसे चलेगी?”
“भाऊ, एक बात बताओ... रेंचो जीनियस है न?”
“हाँ है... तो?”
“तो क्या, जीनियस तो जीनियस है... वह कुछ भी करेगा तो वह हटकर ही होगा ना।”
“अरे, लेकिन इसके लिये एक्टिंग तो करनी ही पड़ेगी।”
“लेकिन भाऊ... इंटरवल तक आपको एक बार भी लगा कि एक्टिंग से रैंचो यानी आमिर खान जीनियस है? फिल्म में हर प्रयोग को टेक्नालाजी से प्रूफ किया जा रहा है ना... तो फिर आमिर रहे या शाहरुख... क्या अंतर पड़ता है!”
“लेकिन गुरू, राजू हिरानी का हर प्रयोग भी टेक्नोलॉजी से जुड़ा है और टेक्नोलॉजी की पढ़ाई के तरीके को लेकर ही वह सवाल भी खड़ा कर रहा है।”
“सही कहा भाऊ आपने... लेकिन इंतजार करो, राजू कुछ तो ऐसा करेगा जिससे जिन्दगी जुड़ जाये। जैसे मुन्नाभाई में 12 साल से बीमार लाइलाज मरीज के शरीर में भी हरकत आ जाती है, तो सारी मेडिकल पढ़ाई धरी-की-धरी रह जाती है... कुछ ऐसा तो राजू भाई करेंगे।”

हम लू के बाहर आ चुके थे और बात-बात में उसने बताया कि राजू हिरानी के ताल्लुक नागपुर के हिसलप कॉलेज से भी रहे हैं। कैसे कब... यह पूछने से पहले ही इंटरवल के बाद फिल्म शुरु होने की आवाज सुनायी दी। हम हाल के अंदर दौड़े। लेकिन मेरे दिमाग में वह आवाज फिर कौंधी... वाह राजू भाई! यह तो हिसलप का फंडा चुरा लिया। खैर, फिल्म के आखिर में जिस तरह गर्भ से बच्चे को निकालने को लेकर देसी तकनीक का सहारा लिया गया, उसे देखते वक्त मैंने भी महसूस किया कि आमिर खान अचानक महत्वहीन हो गया है और देसी प्रयोग हावी होते जा रहे हैं, जिनके आसरे दुनिया की सबसे खूबसूरत इनामत - बच्चे का जन्म - जुड़ गयी। यानी आमिर सिर्फ एक चेहरा भर है। फिल्म खत्म हुई तो कालेज का जीनियस रैंचो साइन्टिस्ट बन चुका था। लेकिन यह साइंटिस्ट रैंचो को देखते वक्त एक बार भी महसूस नहीं हुआ कि इसमें आमिर की अदाकारी का कोई अंश है, बल्कि बार-बार यही लगा कि इस भूमिका को निभाते हुये कोई भी कलाकार जीनियस से साइंटिस्ट बन सकता है। और दिमाग में आमिर खान की जगह रैंचो का करेक्टर ही घुमड़ रहा था। यह वाकई राजू हिरानी की फिल्म है, लेकिन अदाकारी को लेकर कोई कलाकार इसमें पहचान बनाता है तो वह वही बोमेन ईरानी हैं जिसने मुन्नाभाई में मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल की तानाशाही को जिया और थ्री ईटियट्स में इंजिनियरिंग कालेज के डायरेक्टर रहते हुये खुद को किसी मशीन में तब्दील कर लिया। लेकिन दोनों ही चरित्र जब मानवीय पक्ष से टकराते हैं, तो राजू हिरानी द्वारा रचा गया बोमन का चरित्र कुछ इस तरह चकनाचूर होता है जिससे झटके में उबरना भी मुश्किल होता है और डूबना भी बर्दाश्त नहीं हो पाता। यानी बोमन ईरानी की अदाकारी से दर्शकों को प्रेम हो ही जाता है और उसी की खुमारी में फिल्म खत्म होती है।

ऐसे में दिमाग में सवाल उठता ही है कि आखिर आमिर खान इस फिल्म में हैं कहाँ? अगर फिल्म में होते तो वह अपने प्रचार के दौरान देश भ्रमण में शिक्षा संस्थाओं से जुड़े मुद्दे उठाते। क्योंकि चंदेरी या बनारस की गलियों में आज भी प्राथमिक स्कूल तक नहीं हैं और जिनकी लागत मारुति 800 से ज्यादा की नहीं है। और देश में आर्थिक सुधार के बाद से मारुति 800 जितनी बिकी है उसका दस फीसदी भी प्राथमिक स्कूल नहीं खुल पाये हैं। लेकिन आमिर खान फिल्म के धंधे से जुड़े हैं, इसलिये वह सरल भाषा में समझते हैं कि मुनाफा ना हो तो फिल्म फिल्म नहीं होती। इसलिये आमिर खान फिल्म में काम करने के पैसे नहीं लेते, बल्कि रेवेन्यू शेयरिंग में उनकी हिस्सेदारी होती है और उनका टारगेट थ्री ईडियट्स को लेकर सौ करोड़ रुपये बनाना है। यह मिस्टर परफैक्शनिस्ट है। मुझे लगा यही जादू मनमोहन सिंह का है... तभी तो वह राजनीति के मिस्टर परफैक्शनिस्ट हो चले हैं। नागपुर में थ्री ईडियट्स देखते वक्त सोचा... काश राजू हिरानी... मिस्टर परफैक्शनिस्ट पर फिल्म बनाये और सरलता से धंधे के गणित को सरोकार से समझा दे। फिर देखेंगे प्रचार के तरीके क्या होंगे और कितने शहरों के सिनेमैक्स में कोई दर्शक अंधेरे में चिल्ला कर कैसे कहता है... भाउ, यह तो अपने दिल्ली-मुबंई के फंडे हैं।

from punya prasoon bajpayi

आडवाणी युग के बाद की भाजपा

नागपुर में पहली बार सीमेंट की सड़क 1995 में बनी तो रिक्शे वालों ने आंदोलन छेड़ दिया । रिक्शे वालों का कहना था कि नागपुर में जितनी गर्मी पड़ती है उससे सीमेंट की सड़क में टायर चलते नहीं हैं। लेकिन कार वाले खुश हो गये कि अब गड्ढ़े में हिचकोले नहीं खाने होंगे। बरसात में अंदाज रहेगा कि सड़क अपनी है, परायी हुई नहीं है। आखिरकार रिक्शे वाले आंदोलन कर थक गये तो फिर पुराने नागपुर में संघ मुख्यालय के बाहर सीमेंट की सड़क बनाने की तैयारी शुरु हो गयी, जहां ज्यादा रिक्शे ही चलते हैं। इस बार आंदोलन हुआ नहीं। और फिर सीमेंट की सड़क बनाने का सिलसिला समूचे महाराष्ट्र में शुरु हुआ। सीमेंट की यह सड़क और कोई नहीं बल्कि भाजपा के अध्यक्ष पद को संभालने जा रहे नीतिन गडकरी ही बनवा रहे थे, जो उस वक्त महाराष्ट्र के पीडब्ल्‍यूडी मंत्री थे। कुछ इसी तरह की सड़क भाजपा के भीतर संघ बनवाना चाहता है और उसका विरोध दिल्ली की आडवाणी चौकड़ी करेगी, लेकिन भविष्य में कहा जायेगा कि नागपुर के गडकरी तब भाजपा अध्यक्ष थे। और उनके पीछे नागपुर के ही सरसंघचालक भागवत का हाथ था। असल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गडकरी के जरिये जो राजनीतिक प्रयोग भाजपा में करना चाह रहा है, उसे गडकरी पूरा कर सकते हैं, इसका भरोसा आडवाणी को चाहे ना हो लेकिन सरसंघचालक मोहनराव भागवत को पूरा है।




नागपुर में दीपावली के दिन संघ मुख्यालय में भागवत, भैयाजी जोशी और गडकरी की मुलाकात में ना सिर्फ गडकरी के नाम पर संघ ने मुहर लगायी बल्कि गडकरी के कान में जो मंत्र फूंका, उसमें सत्ता केन्द्रित राजनीति की जगह संघ केन्द्रित भाजपा जो अनुशासन के दायरे में रहे, इसी की फुसफुसाहट थी। नीतिन गडकरी संघ में जिनसे सबसे ज्यादा प्रभावित रहे हैं, वह हैं भाउराव देवरस, जिन्होंने आम आदमी का सवाल संघ के भीतर ना सिर्फ खड़ा किया बल्कि 1974 में जेपी के साथ राजनीतिक प्रयोग करने का सुझाव बालासाहेब देवरस को दिया। जाहिर है दिल्ली में पद संभालते ही गडकरी के तीन मंत्र होंगे- विकास के नये प्रयोग, आम आदमी की बात और संघ के अनुशासन का डंडा। तीनों मंत्र भाजपा की आडवाणी युग से टकरायेंगे और कटुता पार्टी में बढ सकती है इसका अंदाजा गडकरी को भी है और भागवत को भी। इसलिये गडकरी के जरिये भागवत कथा की जो तैयारी संघ कर रहा है, वह संघ को दुबारा 1951 की स्थिति में ले जाकर संवारने वाली है।




राजनीतिक तौर पर कभी जनसंघ और फिर भाजपा का कद अगर बढा तो उसके पीछे लोहिया और जेपी का हाथ रहा है इसे मोहनराव भागवत समझते नहीं होंगे ऐसा है नहीं। लेकिन भागवत संघ को हेडगेवार की सोच के अनुरुप मथना चाहते हैं, इसलिये लोहिया या जेपी के साथ मिलकर किये गये प्रयोग को संघ के भीतर बिखराव की वजह भी मानते है। यानी इसी प्रयोग से संघ के भीतर टूटन पैदा हुई जो संघ को कमजोर करती गयी। जनता पार्टी की सरकार में आरएसएस के स्वयंसेवक मंत्री जरुर बन गये लेकिन यहीं से भाजपा का जन्म भी हुआ और राजनीतिक तौर पर भाजपा ने अलग राग भी पकडा और रिमोट से चलने वाले संघ के तमाम संगठन अपनी मनमर्जी करने लगे। संघ के भीतर माना जाता है कि देवरस ने इसीलिये अयोध्या आंदोलन को हवा दी जिससे राम मंदिर को लेकर आरएसएस के तमाम संगठन एक छतरी तले आ जायें। देवरस को इसमें सफलता भी मिली। लेकिन भागवत के सामने कहीं बड़ा संकट है कि उनके दौर में सत्ता तो दूर, सांगठनिक तौर पर भाजपा या विहिप या स्वदेशी जागरण मंच ही नहीं खुद आरएसएस भी अपने घेरे में सिमटती दिख रही है। और सरसंघचालक की मौजूदगी ही एक नयी लीक किसी भी संगठन के लिये बना देती थी। उसी सरसंघचालक की मौजूदगी को ही हाशिये पर ढकेलने की कोशिश भाजपा के नंबरदार करने से नहीं चूक रहे।




जनता पार्टी की सरकार बनने के दौरान चन्द्रशेखर के कहने पर देवरस ने 'हिन्दू' शब्द दबा दिया और एनडीए की सरकार बनने पर वाजपेयी के कहने पर सुदर्शन ने हिन्दुत्व को हवा नहीं दी। लेकिन इससे आरएसएस का बंटाधार हो गया और अब हिन्दुत्व को लेकर संघ समझौता नहीं करेगा। भागवत यह मान कर चल रहे हैं कि सत्ता के लिये जोड़तोड़ की राजनीति का कोई लाभ नहीं है, इसलिये नीतिन गडकरी को भी इसकी चिंता नहीं करनी है कि जोड़तोड़ से भाजपा की राजनीतिक दखल कितनी बरकरार रहती है। इतना ही नहीं दिल्ली से लेकर राज्यो में सत्ता बरकरार रहे या ना रहे लेकिन संघ की सोच के अनुरुप हर संगठन को चलना होगा और हर क्षेत्र में जबतक यह दिखायी ना देने लगे कि संघ का स्वयंसेवक सफल हो रहा है तबतक काम अधूरा है। यानी गुरु गोलवलकर ने जिस संघ को विस्तार दिया और एकजुटता बनायी, फिर उसे रिमोट से चलाया, भागवत इसे ही सहेजना चाहते हैं। यानी गुरु गोलवलकर के दौर को हेडगेवार के तौर तरीकों के जरिये आरएसएस को जीवित करना चाहते हैं। विकास, आम आदमी और अनुशासन को गडकरी चलायें और हिन्दुत्व कहने या बोलने की जरुरत गडकरी को ना पड़े, इसकी व्यवस्था भागवत हिन्दुत्व में संघ के सभी संगठनो को मथकर करना चाहते हैं।



इस लीक को बनाने में भागवत के तौर तरीके बिलकुल हेडगेवार की तरह हैं। काशी की भरी सभा में हेडगेवार ने कभी कहा था, " मैं डा. केशव बलिराम हेडगेवार कहता हूं, यह सदा सर्वदा से हिन्दू राष्ट्र था, आज भी है और जन्म जन्मान्तर तक हिन्दू राष्ट्र रहेगा। " इसपर एक वक्ता ने व्यंग्यपूर्वक पूछा-"कौन मूर्ख कहता है कि यह हिन्दू राष्ट्र है?" तो सीना ठोंक कर उच्च स्वर में उत्तर आया--डा हेडगेवार ने। असल में भागवत को यह वाकया ना सिर्फ पूरी तरह याद है बल्कि हेडगेवार की वह तमाम परिस्थितयां भी याद हैं, जिसमें विपरीत परिस्थितयों के बीच आरएसएस को हेडगेवार खड़ा कर रहे थे। हेडगेवार सार्वजनिक राजनीति में दखल देते हुये संघ की नींव सामाजिक तौर पर डालना चाहते थे और डाल भी रहे थे। भागवत का अंदाज भी कमोबेश इसी तर्ज पर है। दिल्ली में बैठे भाजपा नेता हों या राजनीति की जोडतोड में गठबंधन के जरिये सत्ता पाने की होड़ में जुटे भाजपा नेता या फिर खुद लालकृष्ण आडवाणी, असल में हिन्दुत्व और संघ के अनुशासन की बात उनके गले 21 वीं सदी में उतर नहीं रही है और राजनीति के लिये संघ का भाजपा में दखल उन्हें हो सकता है बार-बार दकियानूसी लगे, लेकिन भागवत का मानना है कि हेडगेवार की नींव और गोलवलकर के विस्तार से आगे राजनीति गयी नहीं है। इसलिये भागवत ना सिर्फ संघ की, बल्कि हर सार्वजनिक सभा में यह उद्धघोष करने से नहीं चूकते कि भारत हिन्दू राष्ट्र है। और अगर कोई व्यंग्य करता है तो हेडगेवार की तर्ज पर सीधे हांकते हैं, ...यह संघ का मानना है, और हम अपने हर कर्म का आधार भी इसे ही मानते हैं।




संभव है भागवत का यह बयान भाजपा की राजनीति की गले की हड्डी बन जाए और उसे लगने लगे कि ऐसे में एनडीए का खात्मा हो जायेगा। बिहार में नीतिश कुमार बिदक जायेंगे। लेकिन भागवत जिस कथा को कहना चाह रहे हैं, उसमें नीतिश कुमार से गांठ बांधे रखने के लिये भाजपा को वह संघ से इतर जाने देने के पक्ष में नहीं हैं। भागवत किस तरह का कायाकल्प संघ में देख रहे है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संघ की बौद्धिक सभाओ में विभाजन के बाद लुटे-पिटे पाकिस्तान से आने वाले हिन्दू बंधुओं की सुरक्षा और पुनर्वास का कार्य किस तरह जानपर खेलकर स्वयंसेवकों ने किया, उसे याद किया जाने लगा है। चीन के साथ युद्ध हो या 1965 और 1971 में पाकिस्तान से युद्ध, स्वयंसेवक किस तरह मोर्चे पर घायलों की मदद और रक्त तक की व्यवस्था किया करता था, इसे संघ की सभाओ में यह कह कर जिक्र होता है कि भाजपा ने सबकुछ सेमिनारों में सिमटा दिया है और महंगाई जैसे मुद्दे पर भी जनता से खुद कटी हुई है। ऐसे में भाजपा की जोड़तोड़ की राजनीति का क्या अर्थ।




असल में गडकरी के जरिये भागवत एकसाथ कई संकेत देना चाहते हैं। पहली बार संघ के सरसंघचालक भागवत, सरकार्यवाह भैयाजी जोशी और भाजपा अध्यक्ष नीतिन गडकरी तीनों नागपुर के हैं और ब्राम्‍हण हैं यानी कोई आधुनिक सोशल इंजीनियरिंग नहीं चलेगी। और यह सब नीतिन गडकरी कैसे करेंगे इसका उदाहरण भी गडकरी के पीडब्ल्‍यूडी मंत्री रहते हुये नागपुर में किये गये प्रयोग से समझा जा सकता है। क्योंकि मंत्री बनते ही गडकरी ने फ्लाईओवर बनाने का सिलसिला शुरु किया। नागपुर के वर्धा रोड पर फ्लाईओवर बनाने में सबसे बड़ी दिक्कत सड़क के बीच लगी झांसी और गांधी की प्रतिमायें थीं। लेकिन नीतिन गडकरी ने पुल भी बनवाना शुरु किया और झांसी-गांधी के बुत को जड़ से उखड़वाकर सड़क के किनारे हुबहू वैसे ही लगवा भी दिया। यह अपनी तरह का पहला प्रयोग था। सवाल यही है भाजपा अध्यक्ष पद संभालने के बाद संघ का फ्लाईओवर बनाने में गडकरी कितनों को जड़ से उखाड़ेंगे या सभी इस फ्लाईओवर को बनाने में जुट जायेंगे।


from punya prasoon bajpayi

"20 साल पहले राजीव गांधी का अपहरण करना चाहते थे नक्सली और 20 साल बाद मनमोहन सिंह के अपहरण की जरुरत नहीं समझते माओवादी

ठीक बीस साल पहले 1989 नक्सली संगठन पीपुल्स वार ग्रुप के महासचिव सीतारमैय्या से जब यह सवाल किया गया था कि अगर आपको मौका लगेगा तो क्या आप तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का भी आपहरण कर लेंगे । जवाब मिला था कि जरुरत पड़ी और परिस्थितियां अनुकूल हुईं तो जरुर करना चाहेंगे। यह सवाल 1987 में आंध्रप्रदेश के सात विधायकों के अपहरण के बाद पूछा गया था । और बीस साल बाद जब बंगाल के एक पुलिसकर्मी का अपहरण कर उसपर पीओडब्ल्यू यानी प्रिजनर ऑफ वार लिखकर रिहा किया गया...तो अपहरण करने वाले सीपीआई माओवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य किशनजी उर्फ कोटेश्वर राव से मैंने यही सवाल पूछा कि अगर आपको मौका लगेगा तो क्या आप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अपहरण कर लेंगे। जवाब मिला बिलकुल नहीं। इसकी जरुरत है नहीं और परिस्थितियां ऐसी हैं कि प्रधानमंत्री की नीतियों से ही हमारा सीधा टकराव देखा जाने लगा है तो जनता खुद तय करेगी, हमें पहल करने की जरुरत नही है।


बीस साल के दौर में राजनीतिक तौर पर नक्सलियों में कितना बड़ा परिवर्तन आया है, यह जवाब उसका बिंब भर है। लेकिन इन बीस वर्षो में राजनीतिक तौर पर नक्सली कितना बदले है और उनकी राजनीति किस तरह अब सीधे संसदीय राजनीति को चेता रही है, यह गौरतलब है। बीस साल पहले मार्क्सवाद और माओवाद की धारा बंटी हुई थी। उस दौर में मजदूर-किसान के बीच भागेदारी को बढाने का सवाल ही सबसे बड़ा था। इसलिये इन दोनो धाराओं से जुड़ा अतिवाम आंध्रप्रदेश से लेकर बिहार तक में जो पहल कर रहा था, उसमें ग्रामीण क्षेत्रों से इतर का सवाल खासा गौण था। और जो सवाल नक्सली संगठन उठा रहे तो उससे राज्य सत्ता को कोई परेशानी नहीं थी। इसलिये बीस साल पहले नक्सल प्रभावित क्षेत्रो में विकास ना होना ही नक्सलियों के लिये भी मुद्दा था तो राज्य भी नक्सलियों पर विकास न करने देने का आरोप लगा कर समूचे इलाके को देश से अलग थलग दिखाने में कामयाब रहते। लेकिन बदलाव का दौर आर्थिक सुधार के साथ ही हुआ और राजनीतिक तौर पर एक नये तरीके से माओवादी और सरकार एक ही मुद्दे पर अपने अपने नजरिए से आमने सामने खड़े होते चले गये। इसलिये पहली बार सवाल सरकार की उन नीतियों को लेकर उठा, जिसपर बीस साल पहले राजनीतिक दल चुनाव लड़ सकते थे लेकिन अब वही सवाल संसदीय घेरे से होते हुये माओवादियों के दायरे में जा कर समाधान की बात कहने लगे और चुनावी राजनीति के भी आड़े अचानक माओवादी थ्योरी आ गयी।


असल में 1991 से लेकर 2001 के दौर में नक्सली माओवादी और मार्क्सवादियो ने शहरों की तरफ ठीक उसी तरह कदम बढाना शुरु किया जिस तरह आर्थिक सुधार के नजरिये ने गांवों को शहरों में बदलना शुरु किया। इस दौर में राज्य ने बाजारवाद ने मुनाफे के आगे जब घुटने टेकने शुरु किये तो नक्सलियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही आयी कि शहरों में वह अपनी स्थिति दर्ज कैसे करायें। खासकर वो शहर, जो पूरी तरह राज्य की नीतियों या धनवानों से जुड़े रोजगार पर ही टिके थे । यानी गांव में खेती से जो स्वालंबन पैदा होता और ग्रामीण अपनी जमीन पर खड़े होकर नक्सली संघर्ष में साथ खड़ा होता, उस तरह के स्वाबलंबन का स्थिति शहरों में थी नहीं। इसलिये अखिल भारतीय कामगार संगठन बनाकर औधोगिक मजदूरो को जोड़ने का काम नक्सलियों ने महाराष्ट्र से शुरु किया जो कई ट्रेड-यूनियन सरीखे संगठनो के मार्फत उन सवालों को उठाना शुरु किया जो बाजारवाद के सामानांतर समाजवाद की थ्योरी को रखते। इस दायरे में न्यूनतम मजदूरी के मुद्दे को क्षेत्र की जरुरत के हिसाब से नक्सलियों ने उठाना शुरु किया। यानी अपने संघर्ष को राजनीतिक दलों से हटकर बताने और दिखाने की राजनीति शहरो में कदम रखने के साथ ही की जिससे यह भ्रम ना रहे कि नक्सली संगठनों की जरुरत क्या है या फिर आज नहीं तो कल यह संगठन भी सत्ता के लिये चुनाव लड़ने लगेंगे। अपने इस प्रयोग में नक्सलियो का प्रभाव बहुत ज्यादा या पिर ज्यादा भी रहा ऐसा सोचना बचपना होगा। क्योंकि नक्सलियो की शहरों में पहले से कोई राजनीतिक चुनौती पैदा होती ऐसी स्थिति उस पूरे रेड कारीडोर में नहीं उभरी जो आज सरकार के लिये चुनौती बन रही है । लेकिन उस दौर में बाजारवाद ने जिस तरह पंख फैलाये और डंक मारना शुरु किया उसका असर यह जरुर हुआ कि विकल्प का सवाल कामगारों की जरुरत बनने लगा। यानी शहरो में कामगारो से जुड़े मुद्दों को लेकर नक्सलियो का नजरिया अचानक कामगारों को प्रभावित करने लगा। खासकर खनन और पावर प्रोजेक्ट के इलाको में टेक्नालाजी और विदेशी कंपनियो ने पैर रखे तो अचानक मजदूरों का रोजगार हायर-फायर वाली स्थिति में आया। तब सवाल न्यूनतम मजदूरी से भी आगे निकलने लगा । क्योंकि कामगारो के समुद्र के आगे राज्य द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी मिलने का सवाल ही नहीं था। ऐसे में अलग अलग क्षेत्रों में नक्सली संगठनो ने परिस्तितियो को समझते हुये मजदूरी का सवाल उठाया। मसलन महाराष्ट्र में 85 रुपये न्यूनतम मजदूरी हो लेकिन मजदूरों को 20-22 से ज्यादा मिलती नहीं थी। तो अपनी मौजूदगी जताने ले लिये नक्सलियों ने इस मजदूरी को 25 रुपये कराने का निर्णय लिया। लंबी लड़ाई के बाद सफलता मिली तो अगली लडाई 28 रुपये को लेकर सफल हुई। और आज की तारिख में यह लड़ाई 50 रुपये को लेकर हो रही है। वही बंगाल में अभी भी यह लड़ाई 22 से 25 रुपये कराने को लेकर हो रही है और बीते तीन सालो में माओवादी बुद्ददेव सरकार से 25 रुपये मजदूरी नहीं करा पाये है जबकि राज्य द्रारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी 85 रुपये है। इसी तरह तैंदू पत्ता के सवाल पर पहली लडाई 25 पैसे को लेकर लड़ी गयी । जो अब पचास पैसे बढाने को लेकर हो रही है। एक हजार तेदूपत्ता पर फिलहाल एक रुपये 75 पैसे मिलते है, जिसे सवा दो रुपये कराने की लडाई तेदूपत्ता ठेकेदारे से की जा रही है। बीस साल पहले एक हजार तेदूपत्ता पर 35 पैसे मिलते थे ।


जाहिर है यहां दो सवाल खड़े होते हैं कि एक तरफ बीस साल में लड़ाई एक रुपये को लेकर ही हुई और दूसरा सवाल की देश में विकास का ऐसा कौन सा अर्थशास्त्र अपनाया गया, जिससे शहरों में जो सिक्के मिलने बंद हो गये.....गांवों में उसी सिक्के की लड़ाई में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गांव अब भी जी रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन यहीं से नक्सलियों की उस राजनीति को भी समझना होगा जो तेंदूपत्ता की कीमत बढ़वाने के लिये ठेकेदारों की हत्या कर सकती है। या उन्हे चेता कर झटके में एक हजार तैंदूपत्ता की नयी कीमत पांच रुपये तय करवा सकता है। लेकिन राजनीति का मतलब लोगों की गोलबंदी और हक के साथ साथ संघर्ष करते हुये आगे बढाने की पूरी प्रक्रिया कैसे होती है असल में इसी का नायाब प्रयोग लगातार नक्सली राजनीति कर रही हैं। क्योंकि 2001 के बाद नक्सलियों के सामने बड़ी चुनौती उस राजनीति शून्यता के वक्त अपनी मौजूदगी का एहसास कराना था, जिसे माओवादी और मार्क्सवादी लगातार उठा रहे थे।


2001 में अतिवामपंथियो के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह सवाल खुल कर उठा था बाजारवाद को जिस तरह संसदीय राजनीति हवा दे रही है, उससे समाज के भीतर विकल्प का सवाल राजनीतिक तौर पर जरुर उठेगा । साथ ही संसदीय राजनीति को लेकर निराशा भी आयेगी। इन्हीं परिस्थितियों के बीच माओवादियों और मार्क्सवादियों यानी एमसीसी और पीपुल्स वार ग्रुप के बीच गठबंधन की प्रक्रिया शुरु हुई और 2004 में यानी तीन साल की लंबी प्रक्रिया के बाद दोनो एकसाथ आये और सीपीआई माओवादी का गठन हुआ। राजनीतिक तौर पर माओवादियो ने अगर पहला प्रयोग बंगाल में 2005 में यह सोच कर शुरु किया कि वामपंथी सरकार से जनता का मोहभंग एक धक्के के साथ हो जायेगा तो यह गलत नहीं होगा। क्योंकि पीपुल्स वार ने इससे पहले कभी बंगाल का रुख नहीं किया था लेकिन बंगाल में माओवादियों की कमान को पीपुल्स वार ग्रुप के कोटेश्वर राव यानी किशनजी ने संभाला । 2004 में एनडीए के शाइनिग इंडिया के नारे तले एनडीए की हार और यूपीए की जीत के बाद वामपंथियो के समर्थन ने माओवादियो की सेन्ट्रल कमेटी में यह सवाल उठा था कि वामपंथी सरकार पर लगाम लगा पायेगे या जनता से उनकी लगाम भी ढीली पड़ जायेगी। इसीलिये सिंगूर और नंदीग्राम से लालगढ़ का रास्ता वामपंथी सरकार के लिये अगर भारी पड़ रहा है तो इसका संसदीय घेरे में लाभ चाहे ममता बनर्जी को मिले लेकिन जिस पूरे इलाके में जो गोलबंदी ग्रामीण-आदिवासियों को लेकर की गयी, उसे माओवादी कितनी बडी सफलता मान रहे है उसका अंदाज इसी से लग सकता है कि झारखंड,उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में इसी तरह से एसईजेड और खनन समेत एक दर्जन से ज्यादा लगने वाली कंपनियो को दी जाने वाली जमीन पर जिन्दगी चलाने वाले गांव के गांव में उन्हीं मुद्दों पर बहस की शुरुआत की गयी है, जो अगले तीन-चार साल में नंदीग्राम-लालगढ में तब्दील होंगे। हो सकता है इन क्षेत्रो में भी कोई ना कोई क्षेत्रीय राजनितिक शक्ति कांग्रेस या भाजपा को इसी दौर में चुनावी चैलेंज देने लगे और उन मुद्दों की वकालत करने लगे, जिसे माओवादी आज उठा रहे हैं।


लेकिन पहली बार यही माओवादी राजनीतिक तौर पर एक नया सवाल खड़ा कर रहे है, कि संसदीय राजनीति सत्ता के लिये आर्थिक सुधार की हिमायती नहीं है बल्कि आर्थिक सुधार को बरकरार रखने के लिये संसदीय राजनीति चलनी चाहिये। और इसके अंतर्विरोध को माओवादी प्रक्रिया में संसदीय दल ही चुनावी संघर्ष में सामने उसी तरह लाये जैसे ममता उभार रही हैं। जो कांग्रेस को केन्द्र में समर्थन देते हुये मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में अहम पोर्टफोलियो भी ले ले और माओवादियो को देश का सबसे बड़ा खतरा बताने वाले मनमोहन सिंह की नीतियो का विरोध माओवादियों के हक की लड़ाई से जोडेते हुये अपनी राजनीति भी साधे। जाहिर है बीस साल पहले और अब के दौर में इतना फर्क वाकई आ गया है कि प्रधानमंत्री के अपहऱण की जरुरत माओवादियों को नहीं लगती ।

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विकल्प देते देते प्रधानमंत्री विकल्प क्यों तालाश रहे हैं

विकल्प देते देते प्रधानमंत्री विकल्प क्यों तालाश रहे हैं
Posted: 10 Nov 2009 10:45 PM PST
नक्सलियों के हिमायतियों ने भी ग्रामीण-आदिवासियों के विकास का कोई वैकल्पिक समाधान नहीं दिया है। यह बात और किसी ने नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कही है। दिल्ली में आदिवासियों के मसले पर जुटे राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को विकास और कल्याण का पाठ पढ़ाते हुये पहली बार प्रधानमंत्री फिसले और माओवादियों के खिलाफ आखिरी लड़ाई का फरमान सुनाने वाले वित्त मंत्री की बनायी लीक छोड़ते हुये उन्होंने आदिवासियों के सवाल पर सरकार को घेरने वाले और माओवादियो के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का विरोध करने वालों पर निशाना साधते हुये कहा कि आदिवासियों के लिये वैकल्पिक अर्थव्यवस्था या सामाजिक लीक किस तरह की होनी चाहिये इसे भी तो कोई सुझाये। जाहिर है, इस वक्तव्य को आसानी से पचाना मुश्किल है क्योंकि आदिवासियो के लेकर बीते साठ वर्षों में हर सरकार दावा करती रही है कि उसकी समझ आदिवासियो को लेकर ना सिर्फ संवेदनशील है बल्कि जो नीतियां वह बना रही है, उससे आदिवासी मुख्यधारा से जुड़ जायेंगे । नेहरु का पहला प्रयास और मनमोहन का अभी का प्रयास आदिवासियों को आधुनिक ड्राईंग रुम में टेबल पर रखकर चिंतन वाला ही रहा है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। 1991 से पहले तक आदिवासियों को लेकर बनायी जाने वाली हर योजना में आदिवासियों को जंगल से जोड़कर ऱखा गया । जंगल गांव की परिभाषा भी तभी तक जीवित रही। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री के दौर में जब आर्थिक सुधार की बयार बही तो पहली बार 1991 में ही जंगल गांव की मौजूदगी पर सवाल उठे। टाइगर परियोजना से लेकर एसईजेड तक के दो दशक के सफर में जमीन से आदिवासियो को बेदखल करने की योजना और कहीं नहीं बनी बल्कि उसी नार्थ-साउथ ब्लॉक में पेपर तैयार हुआ, जहां आदिवासियों के कल्याण के लिये प्रधानमंत्री के भाषण का पर्चा 4 नवबंर 2009 के लिये तैयार किया गया। यानी बीते 18 सालों में करीब पांच करोड़ आदिवासियों के पलायन या कहे अपनी जमीन छोड़ बेदखल होने के दर्द को प्रधानमंत्री कार्यालय ने कितना समझा, इस पर सवाल उठाना वाजिब नही होगा बनिस्पत प्रधानमंत्री की पीठ थपथपाना कि 4 नवबंर 2009 को उन्हें पहली बार लगा कि विकल्प भी कोई सोच होती है। यह अलग मसला है कि इस दौर में परियोजनाओं पर सत्तर हजार करोड़ खर्च हो गये और आदिवासी कल्याण के लिये महज सत्तर करोड़ ही सरकार को पोटली से निकले। जिस रौ में मनमोहन सरकार आर्थिक सुधार की हवा बहाने को लेकर लगातार बैचेन रही है उसमें विकल्प शब्द भी बेमानी सा लगने लगा। क्योंकि विकास की जो लकीर आर्थिक सुधार तले खिंची गयी उसी का परिणाम है कि गरीब और दलित के घर रात बिताकर राहुल गांधी बार बार देश के सच से कांग्रेस को जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। राहुल गांधी का कोई भी बयान जो ग्रामीण-आदिवासियों से लेकर गरीब-दलितों को लेकर दिया गया हो, अगर उसके आईने में आर्थिक सुधार की नीतियों को रख लें तो समझा जा सकता है कि अचानक प्रधानमंत्री के जेहन में विकल्प शब्द क्यों आ गया। अभी तक चिदंबरम-मोटेक सिंह अहलूवालिया और मनमोहन सिंह की तिकड़ी ने उन्हीं आर्थिक नीतियों को विकल्प माना, जिसके विकल्प देने का चैलेंज वह नक्सलियों के हिमायतियो से कर रहे हैं। इसका एक मतलब तो साफ है कि जो नीतियां परोसी जा रही हैं, वह बहुसंख्यक समाज के लिये विकल्प नहीं है बल्कि त्रासदी ज्यादा हैं। और इसका दूसरा मतलब यही है कि सरकार के पास विकल्प की अर्थव्यस्था का कोई खाका नहीं है। जो अचानक नक्सली समस्या के साथ जरुरत बनती जा रही है। लेकिन आर्थिक सुधार के दौर में योजना आयोग से लेकर पीएमओ तक में बैठे अर्थशास्त्री कैसे आंखों पर सेंसेक्स और औघोगिक विकास की पट्टी बांध कर काम करते रहे, यह उस किसी से नहीं छुपा है जो बजट से पहले या फिर गाहे-बगाहे सुझावो के साथ नार्थ-साउथ ब्लाक में आमंत्रित किये जाते रहे हैं। "जो सुझाव आप दे रहे है वह तो ठीक है लेकिन इसे लागू कैसे किया जाये यह तो आप बताईये। " हर वैकल्पिक सुझाव के बाद पीएमओ में बैठे अर्थशास्त्रियों या नौकरशाहों की यही आवाज गूंजती है । किसानों की त्रासदी से लेकर बुंदेलखंड की बदहाली और औघोगिक विकास को जन भागीदारी के साथ जोड़ने से लेकर पंचायत स्तर पर स्वरोजगार का सवाल कमोवेश हर बजट से पहले और बाद में लाल पत्थरों के नार्थ-साउथ ब्लाक में हर साल अलग अलग खेमो और अलग अलग विचारधारा के तहत काम करने वाले लोगो ने उठाये। लेकिन इस दौर में हर सवाल का स्वागत कर जब बड़ा सवाल सामने रखा गया कि आपके विचार तो जायज है और सुझाव का भी स्वागत लेकिन इसे लागू कैसे किया जाये तब हर विकल्प छोड़ा पड जाता है कि सरकार का संकट जब लागू तक ना करा पाने का है तो विकल्प शब्द का मतलब क्या है। वाकई बाजार और मुनाफे की थ्योरी में विकल्प शब्द ना सिर्फ गौण हुआ बल्कि धीरे धीरे विकल्प का सुझाव देने वालो की तादाद भी सरकार के दरबार में घटती चली गयी। इसलिये जो सवाल राहुल गांधी उठाने लगे अचानक देश को वही विकल्प भी लगने लगे। दो देश में बंटता देश। ग्रामीण आदिवासियों और गरीब दलितों को मौका ना मिलना। यह बयान राहुल गांधी के हैं, जो इंगित करते हैं कि आर्थिक सुधार की नीतियों से देश का बंटाधार हुआ है।लेकिन इसका विकल्प क्या है यह सवाल प्रधानमंत्री को राहुल गांधी से भी पूछना चाहिये कि आपने भी तो कोई विकल्प बताया नहीं फिर देश के बदतर हालात पर अंगुली उठा कर प्रधाननमंत्री पद की गरिमा को क्यों मिटा रहे हैं। पीएमओ की दीवारों में इतनी ताकत है नहीं कि राहुल से विकल्प का सवाल उठा लें ऐसे में खुद लोग कैसे कैसे विकल्प पैदा कर रहे हैं, जिसपर नजर पीएमओ की भी नहीं होगी वह गौरतलब है । संयोग से जिस वक्त प्रधानमंत्री ग्रामीण-आदिवासियों के समाधान के लिये विकल्प का सवाल उठाकर नक्सलियो के हिमायितियों पर उंगली उटा रहे थे, उसी वक्त विदर्भ में छह किसान आत्महत्या की तैयारी कर रहे थे। और किसानों की खुदकुशी के बाद अब किसानों की विधवाओ ने मदद के लिये अपना विकल्प खुद तैयार किया है कि वह 11 नवबंर से अनिश्चितकालिन भूख-हडताल करेंगी जिससे कोई राहत उनतक पहुंच सके। यानी जिस भूख ने उन्हें विधवा बना दिया उसी भूख को वे जीने का विकल्प बना रही हैं। क्योकि सरकार को यही परिभाषा समझ में आती है । तो विकल्प का मतलब ही जिस व्यवस्था में जान जाना या जान बचाना भर हो, वहां पहले विकल्प की बात होगी या जान बचाने की इसे प्रधानमंत्री समझेंगे यह आस तो लगायी ही जा सकती है।

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punya prasoon bajpaeyi

राखी सावंत और भारतीय महिला

अभी हाल ही में भारतीय टीवी जगत के एक अजीबो गरीब शो ख़त्म हुआ है....इस शो का क्या कांसेप्ट क्या था, क्यों था मुझे कुछ समझ नहीं आया.मैन यह नहीं कहता की आपको भी नहीं आया होगा.... दरअसल मै बात कर रहा हूँ राखी के स्वयंवर की.अब यह स्वयंवर हो चुका है राखी सावंत ने अपना दूल्हा चुन लिया है......लेकिन अभी शादी नहीं करेंगी...बाद में करेंगी या नहीं पता नहीं...लेकिन इस तरह से एक मीडिया पुत्री की शादी का ड्रामा देखकर हैरानी हुयी....मुझे लगता है की यह ड्रामा पूरी तरह से खुद को औरों की नज़रों में लाने के लिए किया गया...चाहें वोह चैनल रहा हो या फिर राखी सावंत...हैरानी है की राखी को जिस दिन अपना दूल्हा चुनना था उस दिन चैनल की टी आर पी सबसे अधिक रही..चैनल का तो काम हियो गया...पूरे प्रोग्राम के दौरान भी राखी ऐसी उलजुलूल हरकतें करती रहीं जिसके चलते राखी और चैनल दोनों जनता की नज़रों में बने रहे....कुछ लोग इस तरह के प्रोग्राम्स को नारी सशक्तिकरण से जोड़ कर भी देख रहें हैं....उनका मानना है की राखी एक खुले विचारों वाली लड़की हैं...और वोह अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जीने में यकीन रखती हैं....और उन्होंने अगर अपना स्वयंवर आयोजित किया तो वोह कहीं से गलत नहीं था....यह बिलकुल सही है...और ऐसे कार्यक्रम भारतीय महिला की लगातार मजबूत होती स्थिति को दर्शातें हैं....हालाँकि वोह मेरे इस बात का जवाब नहीं दे पाए की राखी ने तुंरत शादी क्यों नहीं की? वहीँ इस मुद्दे पर कुछ लोग बिलकुल जुदा राय रखतें हैं...वैदिक रीती रिवाजों से नारियों को शिक्षित करने वाले एक कन्या महाविद्यालय की प्राचार्य आचार्य मेधा इस तरह के आयोजन को एक भोंडा प्रदर्शन बताती हैं....जब मैंने उनसे इस बारे में उनकी राय जाननी चाही तो वोह पहले थोड़ा मुस्कुरायीं...दरअसल वोह टी वी बहुत ही कम देखती हैं..लेकिन उन्होंने राखी के स्वयंवर के कुछ एपिसोड गलती से देख लिए थे..वोह मानो फट पड़ी...आचार्य मेधा इस तरह के टीवी प्रोग्राम्स को कहीं से भी भारतीय नारी के लिए उचित नहीं मानती हैं...वोह यह ज़रूर मानती हैं की हमारे समाज में औरतें स्वयंवर कर अपना दुख चुनती रहीं हैं.....लेकिन तब के स्वयंवर ना सिर्फ बेहद गंभीरता से हुआ करते थे वहीँ इनमे दुल्हे के चारत्रिक विशेशतावों पर अधिक ध्यान दिया जाता था....यह बात राखी के स्वयंवर में कहीं नहीं दिखी...राखी फिनल राउंड के दुल्हों के घर घर घूमती रहीं....उनकी शिकायतें करती रहीं...क्या यही है एक भारतीय नारी....
यकीनन यह यह एक चिंतनीय विषय है...गार्गी, लोपा के देश में आज भी कई ऐसी महिलाएं हैं जो औरों को राह दिखा सकती हैं...हाँ यह ज़रूर है की वोह शायद राखी सावंत की तरह स्वयंवर ने रचा सकें....वैसे चलते चलते आप से एक और बात कहना चाहता हूँ....क्या स्वयंवर का नाम सुनते ही आप के मन में राम और सीता का प्रतिबिम्ब नहीं उभरता है? क्या करेंगे? टीआरपी बटोरने के चक्कर में कुछ अच्छी बातों को भूलना पड़ता है.........

कर्नाटक में पूजा, मुंबई में बारिश


आजकल पूरे देश में बारिश के लिए यज्ञ और हवन का दौर चल रहा है......पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक और आन्ध्र में बहुत बड़े स्टार पर पूजा पाठ हो रहें हैं....ताकि भगवान खुश हो और बारिश हो...लेकिन बारिश हो कहाँ रही है मुंबई में...वोह भी इतनी की लोगों का जीना मुहाल हो जा रहा है.....अब इसे आप क्या कहेंगे? भगवान से मांग कोई रहा है भगवान दे किसी को रहा है.....वोह भी इतना की रखने की जगह ही नहीं मिल रही है यानि छप्पर फाड़ के.....अब डेल्ही हाई कोर्ट के फैसले को ही ले लीजिये...मैं कोर्ट का पूरा सम्मान कर रहा हूँ उसके निर्णय को सिर चूका कर मान रहा हूँ...लेकिन फिर भी देखिये न अधिकार चाहिए किसे और मिला किसे......अब भला समलैंगिक, वैधानिक मान्यता पाकर क्या नया करेंगे....बलात्कार कानून में बदलाव की गुंजाईश है..पर मामला ठंडे बस्ते में है....माँगा किसने मिला किसे...बलात्कार के मुकदमों की सुनवाई में लगने वाली देरी और तमाम परेशानियाँ कब ख़तम होंगी कौन जाने? यहाँ तो पूरा इंडिया को समलैंगिकों को कानूनी मान्यता मिलने पर यूं खुश दिखाया जा रहा है मनो हर नागरिक वही है.....बालीवुड की ख़ुशी तो बेहद अजीब है....नाचो इंडिया नाचो, कर्नाटक की बारिश जब मुंबई में हो रही तो इसके बाद आंध्र में सूखा पड़ेगा...तब क्या करोगे?

उम्र का क्या दोष

क्यों हवाला देते हो उम्र का
उम्र का क्या दोष
आखिर इसे भी तो बचपन पसंद है
यह मजबूरी इसकी भी तो है
यह खुद को बढ़ने से रोक नहीं सकती
हर वक़्त हर पल यह बढ़ रही है
इसमें क्या गलती है इसकी
हाँ तुम चाहो तो खुद को
अपनी उम्र से अलग कर लो
फिर तुम्हे बूढे होने का डर नहीं होगा
लेकिन रुको
जरा यह भी तो सोचो
इसी उम्र ने ही तो
तुम्हे सुख दिया है बचपन का
फिर कैसे अलग करोगे
रहने दो
इस उम्र को अपने साथ
शायद फिर बचपन लौट आये.......
आशीष तिवारी

ज्ञानमती का हौसला

यूँ तो ज़िन्दगी हर कदम एक नई ज़ंग होती है...लेकिन इस ज़ंग को जीत पाने का हौसला कम ही लोगों में होता है..वोह भी तब जब ज़िन्दगी कि ज़ंग को लड़ने वाला कोई महिला हो....उससे उसके ही समाज ने बहिष्कृत कर दिया हो और वोह एच आई वी पोजिटिव भी हो...हाँ ठीक पढ़ा आपने वोह एच आई वी पोजिटिव भी हो....यह दांस्ता है बनारस के ज्ञानमती की....ज्ञानमति युवा हैं...उच्च शिक्षा प्राप्त है...ज्ञानमती ने एमएस सी किया उसके बाद एम बीभी कर चुकी हैं....देखने में ज्ञानमती कहीं से भी किसी आम लड़की से अलग नही लगती हैं...लेकिन हमारा सभ्य समाज इन्हे अलग मानता है...जानते हैं क्यों क्योंकि ज्ञानमती को एड्स है ....

ज्ञानमती को एड्स कैसे हुआ यह एक दर्दभरी कहानी है..दरअसल ज्ञानमती को सिजोफेर्निया कि बीमारी हो गई थी......इसी बीमारी में ज्ञानमती के साथ हुयी एक दुर्घटना ने ज्ञानमती को एच आई वी पोजिटिव बना दिया...(पत्रकारिता के धर्मं को मानते हुए में ज्ञानमती के साथ हुए अपने समस्त वार्तालाप को यहाँ नही लिख सकता हूँ) जब बिमारी के इलाज के दौरान ज्ञानमती को यह पता चला कि वोह एच आई वी पोजिटिव हो गई हैं तो उनके ऊपर मानो पहाड़ टूट पड़ा...एक अच्छी खासी पढ़ी लिखी लड़की जो अपने भविष्य को लेकर न जाने कितने सपने सजा कर बैठी थी सब लगा मानो चूर चूर हो गए..ज्ञानमती के दर्द की कल्पना भर भी आप नही कर सकतें हैं...ज्ञानमती को हुयी सिजोफेर्निया की बिमारी अब धीरे धीरे ठीक होने लगी थी लेकिन इस बीमारी ने एक ऐसा ज़ख्म दे दिया था जो पूरी ज़िन्दगी नही भर सकता है....ज्ञानमती कब एच आई वी पोजिटिव हो गयी उससे पता भी नहीं पता चला...यहीं से ज्ञानमती की ज़िन्दगी ने करवट लेनी शुरू कर दी...इलाज के दौरान कुछ चेकअप्स में डॉक्टर को पता चला की ज्ञानमती एच आई वी पोजिटिव है यह बात उसने ज्ञानमती को तो बताई लेकिन उसके पैरेंट्स को नहीं बताई....बात पैरेंट्स की हो रही है तो लगे हाथों उनके बारें में भी आपको कुछ बता दूं....दरअसल ज्ञानमती एक बहुत अच्छे घर की लड़की है...इसके पिता एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे...माँ घरेलु महिला हैं...अच्छा कुलीन परिवार है एक भाई भी है....खैर, आगे बताता हूँ ज्ञानमती के सीने में डॉक्टर ने दो-दो दर्द एक साथ दे दिए थे..पहला तो यह की वोह एच आई वी पोजिटिव है दूसरा यह की इसके बारे मैं घर वालों को मत बताना....ज्ञानमती काफी दिनों तक इस राज को अपने घरवालों से छुपाये रही लेकिन आखिरकार उससे रहा नहीं गया और उसने अपनी बीमारी के बारे में घरवालों को बता दिया...इसके बाद ज्ञानमती के प्रति घरवालों के रवैया बदलने लगा....बात बात में कभी कभी उसे इस बात का एहसास दिलाया जाने लगा की वोह एक एच आई वी पोजिटिव लड़की है...अब ज्ञानमती का दम घर में घुटने लगा...कुछ समझ में नहीं आ रहा था की क्या करें...लेकिन उसने हार नहीं मानी...उसने एच आई वी पोजिटिव लोगों के नेटवर्क 'नेटवर्क पोजिटिव' से संपर्क किया....उन लोगों के साथ आकर ज्ञानमती को मनो एक नयी ज़िन्दगी मिली....इस नेटवर्क में ऐसे लोग ही आतें हैं जो एच आई वी पोजिटिव हैं...ये नेटवर्क एच आई वी पोजिटिव लोगों के लिए कई सहायतायें उपलब्ध करता है.( इस नेटवर्क के बारे में कभी और विस्तार से बतायूंगा..अभी बात ज्ञानमती की ही करूंगा, क्षमा करें)...इस नेटवर्क के लोगों के सहयोग से ज्ञानमती का मानसिक रोग बहुत हद तक ठीक कर दिया गया है...अब तो ज्ञानमती एच आई वी पोजिटिव लोगों की काउंसिलिंग करती है...उन्हें ज़िन्दगी से लड़ना सिखाती है....ज्ञानमती अब अपने घर नहीं जाती वोह अपनी संस्था में ही रहती है....ज्ञानमती अब ज़िन्दगी से लड़ सकती है...हाँ एक और बात बताता हूँ...ज्ञानमती अब शादी करने वाली है...उसके लिए एक इंजिनियर लड़के का रिश्ता आया है....लड़का अच्छी नौकरी करता है...हाँ यह ज़रूर है की वोह भी एक एच आई वी पोजिटिव है...लेकिन एक नयी ज़िन्दगी की शुरात के ज़ज्बा उसमे भी है....शादी की बात लगभग हो चुकी है...सबकुछ ठीक ठाक रहा तो जल्द ही शादी हो जायेगी....
तो यह थी वोह दास्ताँ जो बहुत कुछ कह रही है हमसे...जब मैं ज्ञानमती से बात कर रहा था उसकी आँखों में आंसू आ गए थे मुझे लगा कहीं वोह रो न दे...मैं कैमरामैन से कैमरा बंद करने के लिए कहने ही वाला था की ज्ञान मति ने अपने आप को संभाल लिया...हमारा कैमरा बंद नहीं हुआ...यहाँ ज्ञानमती ने अपनी उस मजबूती का परिचय दिया था जो आम एच आई वी पोजिटिव लोगों में नहीं होता है....लेकिन ज्ञानमती तो मजबूत हो गयी लेकिन क्या आप और हम हो पायें? क्या हमारी सोच ऐसे लोगों के प्रति बदली.....क्या सिर्फ एड्स से बचाव के उपायों पर चर्चा कर हमारी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है....सोचिये...क्या आप को ज्ञानमती अपनी शादी में बुलाएगी तो आप जाना पसंद करेंगे? वोह एक एच आई वी पोजिटिव है....! मुझे भी बताईयेगा.....

इंसानियत की इबादतगाह

आज आपको एक ऐसी इबादतगाह के बारे मैं बताता हूँ जहाँ दरअसल इंसानियत की पूजा होती है....यह इबादतगाह है हमेशा से अपनी गंगा जमुनी तहजीब के लिए जाने जाये वाले शहर बनारस में है....बनारस के चौक इलाके की एक तंग गली...इसी गली में है यह इबादतगाह....मैं बात कर रहा हूँ अनार वाली मस्जिद का.....इसको अनार वाली वाली मस्जिद कहने के पीछे कारण है इस मस्जिद में लगा अनार का पेड़....इसी पेड़ के चलते इस मस्जिद का नाम अनार वाली मस्जिद पड़ गया......यह एक छोटी सी मस्जिद है.....एक तरफ नमाज़ अदा करने के लिए एक छूता सा कमरा बना है तो वहीँ दूसरी ओर चार दरवेश को जगह मिली हुई है.......एक छोटा सा ही आँगन जहाँ किनारे में लगा अनार का पेड़ पूरी मस्जिद को अपने साये तले लिए हुए है.....इस मस्जिद के साथ जुडी हुई एक ख़ास बात यह है की इस पूरी मस्जिद की देखभाल एक हिन्दू के हाथ में है....लम्बी दाढी और लम्बे लम्बे बाल वाले बेचन बाबा....यही नाम है उस शख्स का जो इस मस्जिद की देखरेख करता है....बेचन बाबा यहाँ झाडू लगाने से लेकर नमाज़ अदा करने तक की हर जिम्मेदारी को उठातें हैं.......बेचन बाबा इस काम को पिछली चार पीढियों से कर रहें हैं.......बाबा पूरी अकीदत के साथ इस मस्जिद की देखरेख करतें हैं........इस बात की परवाह न करते हुए की एक मस्जिद की हिफाज़त एक हिन्दू के हाथ में है यहाँ के मुस्लिम भी बेचन बाबा को पूरा सम्मान देते हैं........एक बात और बताता हूँ....बाबा के घर में हिन्दू देवी देवतावों की पूजा होती है.....पत्नी माता शीतला की पूजा करती है तो बेटा भगवान् शिव का भक्त है...लेकिन बाबा मस्जिद की चाहरदीवारी पर मत्था टेकते हैं....इस मस्जिद में उर्स मनाया जाता है, १५ अगस्त और २६ जनवरी भी....यह मस्जिद जिस गली में है वोह बनारस की आम तंग गलियों की ही तरह है...यहाँ हर तरफ कई दुकाने हैं......इन दुकानों के मालिक और वहां काम करने वाले कई लोग ऐसें हैं जिनकी दिनचर्या इस मस्जिद में आये बगैर शुरू ही नहीं होती...इनमे से अधिकतर हिन्दू ही हैं क्यों की आसपास मुस्लिम आबादी नहीं है...इसी मस्जिद के ठीक बगल में गोपाल मंदिर है...कई हिन्दू ऐसे हैं जो मंदिर और मस्जिद में एक साथ दर्शन करते हैं.......दुआ मांगते हैं....
कई सौ सालों से इस गली में कड़ी यह मस्जिद वाकई में अपने आप में अनोखी है...यहाँ जात पात की तो मानो कोई लकीर ही नहीं है.....शुक्र है ऊपर वाले का इस मस्जिद पर देश की किसी नेता की नज़र नहीं पड़ी.........

बाल संसद

आज आपको एक ऐसी संसद के बारे में बता हूँ जिसके बारे में आपने कभी नही सुना होगा....बात कर रहा हूँ दुनिया की पहली और एकलौती बाल संसद के बारे में....यह बाल संसद वाराणसी में है...इसके निर्माण में एक एन. जी.ओ. विशाल भारत संस्थान की मुख्य भूमिका है ...साथ ही वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार गिरीश दुबे और अजय सिंह ने भी इस बाल संसद की अवधारणा को ज़मीन पर उतारने में प्रमुख रोल अदा किया है....

वाराणसी की यह बाल संसद पूरी तरह से लोकतान्त्रिक व्यवस्था को पर आधारित है...इस बाल संसद में ६ से १३ साल का कोई भी बच्चा सम्मिलित हो सकता है...इस संसद की सभा में वाराणसी क्षेत्र से तीन विधयक और एक सांसद चुना जाता है....बाल संसद का प्रतिनिधत्व करने वालों को एक आचार संहिता को मानना पड़ता है..जैसे उसकी उम्र ६ से १३ साल के बीच हो..वोह अपने घर और क्षेत्र में ब्लैक लिस्टेड नही होना चाहिए...इसी तरह के कुछ और नियम है जिन्हें मनने वाला ही इस बाल संसद में सांसद या विधायक के लिए अपनी दावेदारी कर सकता है...जब इस संसद का चुनाव होता है तो लोकतान्त्रिक प्रणाली का पूरा ध्यान रखा जाता है....बच्चे अपने वोट से अपने विधायक और सांसद को चुनते हैं....फिलहाल इस बाल संसद का सांसद ताजिम अली हैं...समय समय पर इस बाल संसद की बैठक भी होती है...

इन बैठकों में बच्चों से जुड़े राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय मुद्दे पर चर्चा होती है...बच्चो के प्रतिनिधियों को बच्चों के सवालों के जवाब देना पड़ता है...अभी हाल ही में इसके ग्रीष्म कालीन सत्र में श्रीलंका में कैंप से बच्चों के गायब होने और पकिस्तान में बच्चो को आतंकवाद की ट्रेनिंग देने के मुद्दे पर जबरदस्त बहस हुयी..बाल सांसद ताजिम अली को इस बात का आश्वाशन देना पड़ा की वोह इन मुद्दों पर देश के प्रधानमंत्री से बात करेंगे.... उन्हें पत्र लिखेंगे...तब कहीं जाकर संसद शांत हुयी...इस संसद की एक खासियत यह भी है इसके ज्यादातर सदस्य और प्रतिनिधि समाज के उस वर्ग के है जो सड़कों पर कूड़ा बीनता है या कहीं मजदूरी करता है....

इस बाल संसद की ख्याति लगातार बढ़ रही है..अभी हाल ही में इस संसद के बारे में दुनिया के एक बड़े समाचार पत्र वॉशिंगटन पोस्ट ने प्रकाशित किया..उसकी संवाददाता एमेली फॉक्स ने ख़ुद बनारस की इस बाल संसद को देखा....अब दुनिया में एक साइबर पार्लियामेन्ट बनने की कोशिश की जा रही है...यह कोशिश यूनेस्को कर रहा है....

इस संसद को देखकर बड़ा सुकून होता है..लोग भले ही कहतें हो की बच्चो का भविष्य बड़ों के हाथ में होता है लेकिन यहाँ बच्चे देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के भविष्य को संभाले नज़र आ रहा है.....

सवाल है जवाब नही



आज मन बहुत परेशान है.....बार बार पुण्य प्रसून बाजपाई का एक इंटरव्यू जेहन में आ रहा है...यह इंटरव्यू उन्होंने हालाँकि लगभग एक साल पहले एक वेब मैगजीन को दिया था.....लेकिन उसकी याद आज भी मुझे एकदम ताज़ा है...दरअसल उन्होंने अपने इंटरव्यू में कहा था की आज के पत्रकारों को शीशे के ऑफिस में बैठकर दुनिया देखने की आदत है....उन्हें अच्छी सैलरी चाहिए लेकिन पत्रकारिता नही करनी है.....मैं अभी नेशनल मीडिया में नया हूँ..हालाँकि जिस मीडिया में मैं हूँ वोह भी अभी इस देश के लिए पुराणी नही कही जा सकती है....जाहिर है बात इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की हो रही है....मैंने एस पी सिंह को बहुत नही जाना लेकिन पुण्य प्रसून बाजपाई को थोड़ा बहुत देख रहा होऊँ...भी एस पी सिंह के सहयोगी रहें हैं....सो इन्ही से कुछ पुरानी होती इस नई इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को देखने के प्रयास कर रहा हूँ.....खैर बात दूसरी ओरे ले चलता हूँ....मुझे नेशनल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जितना भी अनुभव हुआ उसमे मुझे अच्छे कम बुरे अनुभव अधिक मिले...इससे मेरा सौभाग्य कहिये या दुर्भाग्य मैं उत्तर प्रदेश के एक शहर वाराणसी में अपना पहला एक्सपेरिएंस लिया...जिस चैनल में था उससे रिलौंच किया गया था...मैं ख़बरों के लिए परेशान रहता था....फील्ड में और भी कई लोग थे...कुछ ख़ुद काम करते और कुछ काम करवाते थे....कह सकते हैं की वोह ठेके पर पत्रकारिता करवाते थे....मैंने पत्रकार बनने के लिए ज्यादा नही लेकिन थोड़ा तो प्रयास ज़रूर किया था...पर जब इस फील्ड में आया और अपने साथ और लोगों को देखा तो बहुत दुःख हुआ...यह दुःख आज भी जिंदा है...बल्कि और गहरा होता जा रहा है....दरअसल मैं जिन लोगों के देख रहा हूँ जो कहीं से पत्रकार बनने के कहीं भी लायक नही है..मैं यह नही कहता की मैं बहुत जानकार हूँ लेकिन पत्रकारिता की आत्मा के प्रति ज़रूर इमानदारी बरतने की कोशिश करता हूँ...पिछले कुछ दिनों में एकायक आई पत्रकारों की बाढ़ ने इसका बंटाधार कर दिया....मैं आपको एक वाकया बताता हूँ..बात मुहर्रम की है....ताजिया बहाने के दौरान कुछ तनाव हो गया था...हम सब मौके पर पहुंचे थे...तभी एक ताजिया गंगा में बहाए जाने के लिए लाया गया...हम सभी ने आपने कैमरा निकाल लिए...कैमरा देख कर भीड़ एकायक भड़क गई जोरदार नारेबाजी होने लगी.....हम लोगों में से कुछ ने अपना कैमरा बंद कर दिया...पर एक उत्साही ने अपना कैमरा बंद करना उचित नही समझा उसे कुछ एक्शन शॉट्स चाहिए थे ....हमने काफी मना किया पर वोह थोडी देर तक नही माना आख़िर वोह सबसे तेज़ चैनल के लिए ठेके पर पत्रकारिता कर रहा था..यह हमारी जर्नलिज्म का कैसा रूप है यह आपको बताने की ज़रूरत नही है...यह हमारी गैरजिम्मेदाराना पत्रकारिता का गन्दा चेहरा है..जहाँ विजुअल्स ज़रूरी है आदर्ष नही.....मन एक बात और बात से दुखी है वोह है एस क्षेत्र में आ रहे लोगों को लेकर...इनमे से ज्यादातर पत्रकारिता के मूलभावना से परिचित नही है..वोह महज अपना पेट पलने के लिए इस काम को करतें हैं....इसी के चलते वोह कई ऐसे काम करतें हैं जो इस क्षेत्र की आत्मा को तार तार करता है
सवाल उठता है की क्या ऐसे लोगों को इस क्षेत्र में आने से रोकना चाहिए....क्या इस क्षेत्र में आने के लिए एक सिस्टम होना चाहिए ....?

गंगा में रेत के टीले

देव नदी गंगा को लेकर मेरी चिंता बढती जा रही है.कम से कम बनारस की जो स्तिथि मैं देख रहा हूँ वोह इस गंगा की दुर्दशा को साफ़ बयां करता है-लेकिन अफ़सोस की बात है की इस तरफ़ जितना ध्यान होना चाहिए उतना है नही.....गंगा में रेत के टीले निकल आयें हैं...गंगा की छाती पर निकले यह बड़े बड़े टीले गंगा को मिले घाव की तरह हैं......दरअसल गंगा के प्रवाह से हुए छेड़छाड़ और अत्यधिक पानी निकाले जाने से गंगा की यह दुर्दशा हो है....बात बनारस की ही ले ली जाए तो गंगा की हालत समझ में आ जायेगी....गंगा बनारस में जैसे ही प्रवेश कर रही है वहां पर गंगा मुडती है....यहाँ गंगा का प्रवाह बिना किसी बाधा के होना चाहिए था लेकिन यहाँ बना दिए गएँ पुल हैं...एक पुल तो बन चुका है और दूसरा अभी निर्माणाधीन है..इन दो पुलों के कारन गंगा का प्रवाह बाधित हो रहा है..नतीजा गंगा में आने वाला बालू यहाँ पर आकर इकट्ठा होता जा रहा है...बालू यह टीले अब बेहद बड़ा आकर ले चुके हैं..इन टीलों ने गंगा की धारा को दो भागों में बाँट दिया है.....अपने पुराने घाटों से गंगा लगातार दूर होती जा रही है....अब बनारस के बेहद महत्वपूर्ण और प्रशिध घाट को ही ले लीजिये....यहाँ गंगा अपने घाट से एक लगभग पचास मीटर दूर हो चुकी है साथ ही यहाँ गंगा कम गहरी हो गई है....यह महज एक घाट की कहानी नही है यह कहानी बनारस के लगभग सभी घाटों की है....बालू के टीले लगातार निकल रहें और गंगा का प्रवाह हर रोज़ रुक रहा है..लेकिन इस देश में ऐसा कोई भी नज़र नही आता जो गंगा के लिए आगे आकर कुछ कर सके...

स्वर्ग से धरती पर उतरी देव नदी गंगा अब अपनी दयनीय स्थिती पर रो रही है...धर्मं और समाज के ठेकेदार इस देव नदी की सुध लेने की कौन कहे उसके नाम पर लूट खसोट में लिप्त हैं....आप को बनारस की बात बताता हूँ....बनारस यानि काशी॥यानि वाराणसी....यानि आनंदवन....इस बनारस में गंगा उलटी बहती है.....जी हाँ बनारस में गंगा उलटी बहती है..यहाँ गंगा उत्तर की ओ़र बहती है यहाँ गंगा का आकर भी बहुत खूबसूरत है..बनारस में गंगा अर्धचन्द्राकार रूप में है.....यानि एक छोर से खड़े होके अगर देखा जाए तो दूर तक गंगा और उसके किनारे बने लगभग ८० घाट एक पंक्ति में दिखाई देते हैं.....यही खूबसूरत नज़ारा देखने पूरी दुनिया से लोग आते हैं.....देशी विदेशी पर्यटक इन पक्के घाटों का मनोरम नज़ारा देख आशर्यचकित हो जाते हैं....वास्तु की दृष्टि से भी यह घाट बेहद महत्वपूर्ण हैं...लेकिन अब इन घाटों पर अब एक बड़ा खतरा आन पड़ा है....नदी वैज्ञानिक मान रहें हैं की यह घाट अब धीरे धीरे धंसते चले जायेंगे....यानि आनेवाला समय इन घाटों के लिये भयावह साबित हो सकता है .....गौर करने वाली बात यह है की इन घाटों की दुश्मन बनी है गंगा...वही गंगा जो कभी इन घाटों की खूबसूरती को बढ़ा देती थी अब वही गंगा इन घाटों के लिये काल साबित होने वाली है.....काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और गंगा पर पिछले लगभग २५ वर्षो से काम कर रहे यू.के.चौधरी के मुताबिक गंगा अब बनारस के लिये खतरा बनती जा रही है.....इसके लिये गंगा दोषी नही है..दरअसल गंगा के प्रवाह को लेकर हो रही छेड़छाड़ के कारन इस नदी की स्थिती लगातार बिगड़ती जा रही....गंगा से हर की पौडी के पास अत्यधिक पानी पम्प कर लिया जा रहा है..एक तो टिहरी में बाँध बन जाने के बाद गंगा में वाटर discharge ऐसे ही कम हो गया है इसके बाद मनमाने तरीके से पानी को निकले जाने से गंगा के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा आई है....इसी के चलते गंगा पूर्वांचल के कई जिलों में बेहद धीमी गति से बह रही है या फिर अपने पारंपरिक प्रवाह से भटक रही है...गंगा में पानी का भरपूर प्रवाह न होने से जगह जगह रेत के टीले निकल आयें हैं....यह गंगा के प्राकृतिक प्रवाह को बदल रहें हैं....बनारस में बीच गंगा में कई बड़े बड़े रेत के टीले निकल आयें हैं....कई जगहों पर यह टीले बेहद बड़े हैं.....इन टीलों की वजह से गंगा का बनारस में प्रवाह बदल रहा है...यही नही बनारस में गंगा में बालू खनन पर भी रोक है..यहाँ वन विभाग ने कछुआ सेंचुरी बना रखी है लिहाजा यहाँ गंगा में लगातार हर साल हजारों टन बालू इकट्ठा हो रहा है...इन्ही सब कारन के चलते गंगा का पानी लगातार बनारस के घाटों पर दबाव दाल रहा है...कई घाटों की नींव गंगा का पानी हिला चुका है....यहाँ के घाटों की नींव में पड़े पत्थर उखड चुके हैं....अपने चैनल के लिये न्यूज़ करते हुए मैंने ख़ुद कई ऐसे घाटों को देखा जो बेहद खतरनाक स्थिती में हैं...यह कभी भी गिर सकतें हैं..इन घाटों के किनारे पत्थरों से ही बने कई बड़े बड़े मकान हैं....हवेलियाँ हैं...इनमे लोग रहते भी हैं....अगर यह घाट टूटे तो यह मकान भी धराशायी हो सकतें हैं...यही नही इनके आस पास बसने वाली एक बहुत बड़ी आबादी भी इन घाटों के टूटने से परेशान हो सकती है....गंगा के साथ हो रही छेड़छाड़ अब बेहद खतरनाक मोड़ पर आ पहुँची है...ये छेड़छाड़ अब एक शहर के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर रही है...न सिर्फ़ एक शहर पर बल्कि एक पूरी संस्कृति के समाप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है.....गंगा को लेकर हो रहा खेल अगर अब भी नही रुका तो गंगा एक ऐसा खेल खेलने पर मजबूर होगी जो हर बाजी पलट कर रख देगा......

हमें ग़ुस्सा क्यों आता है ?

कुछ लोगों को औरों की अपेक्षा जल्दी ग़ुस्सा आता है और कई लोगों को तो इतना तेज़ ग़ुस्सा आता है कि वो सभ्यता की सभी सीमाएं लांघ जाते हैं.एक नए शोधकार्य का निष्कर्ष है कि कुछ लोगों को ऐसा ग़ुस्सा उनके मस्तिष्क में कुछ ख़राबी की वजह से आता है.अमरीकी मनोवैज्ञानिकों की राय में ग़ुस्से में नियंत्रण खो बैठने वाले लोग, या वो पुरुष जो अपनी पत्नी के साथ हिंसक व्यव्हार करते हैं, अपने मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन की वजह से ऐसा करते हैं.एक लंबे अरसे से डॉक्टर ये भी कहते रहे हैं कि सिर पर लगी चोटें भी इस प्रकार के ग़ुस्से का एक कारण हो सकती हैं.लेकिन पहली बार अनियंत्रित ग़ुस्से को मस्तिष्क के काम करने के तरीक़े से जोड़ कर देखा जा रहा है.अमरीका में चिलड्रेन्स हॉस्पिटल ऑफ़ फ़िलेडेल्फ़िया के वैज्ञानिकों ने इस बारे में एक महत्वपूर्ण खोज की है.इन वैज्ञानिकों ने ऐसे मनोरोगियों के मस्तिष्क का अध्ययन किया जो इंटरमिटंट एक्सप्लोज़िव डिसऑर्डर (आईईडी) से पीड़ित हैं.इस बीमारी से ग्रस्त लोगों को अनजाने में अनियंत्रित ग़ुस्सा आ जाता है. कई बार हम देखते हैं कि भीड़ भरी गाड़ी में या लंबी क़तार में लगे कुछ लोग आसानी से अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और हाथापाई पर भी उतर आते हैं.कहा जा सकता है कि ऐसे लोग इसी प्रकार की बीमारी से पीड़ित होते हैं.चिलड्रेन्स हॉस्पिटल ऑफ़ फ़िलेडेल्फ़िया के वैज्ञानिकों के इस दल के प्रमुख डॉक्टर मेरी बेस्ट का मानना है कि यह समस्या मस्तिष्क के एक सर्किट के ग़लत ढंग से काम करने के कारण होती है.वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि यह ख़राबी मस्तिष्क के एक न्यूरोट्रांस्मीटर में असंतुलन की वजह से पैदा होती है.इस समस्या की पहचान से अब इसके इलाज की संभावनाएं भी खुलती नज़र आ रही हैं।
विवादास्पद शोध
यहशोध प्रोसीडिंग्स ऑफ़ दी नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंसेस नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई है.इस शोध के निष्कर्ष आईईडी से प्रभावित 22 मरीज़ों के परीक्षण के आधार पर निकाले गए हैं.मगर ब्रिटेन के क्लीनिकल न्यूरोसाइंस रिसर्च सेंटर, डैटफ़र्ड के डॉक्टर तन्मय शर्मा का कहना है कि इस शोध के नतीजे उत्साहवर्धक हैं लेकिन इस के लिए अन्य परीक्षणों की भी आवश्यकता है.उनका कहना है कि चिलड्रेन्स हॉस्पिटल ऑफ़ फ़िलेडेल्फ़िया के वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के काम करने के तरीकों की जांच के लिए अप्रत्यक्ष मापदंड अपनाए हैं. उनकी राय में इस शोध की पुष्टि के लिए मस्तिष्क इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल करने की आवश्यकता है.डॉक्टर शर्मा इस बात पर भी बल देते हैं कि अमरीकी शोधकार्य में शामिल मनोरोगियों के मस्तिष्क में सेरोटॉनिन जैसे रासायन का असंतुलन था या नहीं यह तय करने के लिए जैव-रासायनिक परीक्षणों की भी आवश्यकता है.

कौन ज्यादा अस्वस्थ है - जॉर्ज फर्नांडिस या संसदीय राजनीति?

नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान का साथ छोड़कर आये गुलाम रसूल बलियावी का हाथ आपने हाथ में लेकर जैसे ही उन्हें जनतादल यूनाईटेड में शामिल करने का ऐलान किया वैसे ही दीवार पर टंगे तीन बोर्ड में से एक नीचे आ गिरा। गिरे बोर्ड में तीर के निशान के साथ जनतादल यूनाइटेड लिखा था। बाकी दो बोर्ड दीवार पर ही टंगे थे, जिसमें बांयी तरफ के बोर्ड में शरद यादव की तस्वीर थी तो दांयी तरफ वाले में नीतीश कुमार की तस्वीर थी। जैसे ही एक कार्यकर्ता ने गिरे हुये बोर्ड को उठाकर शरद यादव और नीतीश कुमार के बीच दुबारा टांगा, वैसे ही कैमरापर्सन के हुजूम की हरकत से वह बोर्ड एकबार फिर गिर गया। इस बार उस बोर्ड को टांगने की जल्दबाजी किसी कार्यकर्ता ने नहीं दिखायी। पता चला इस बोर्ड को 2 अप्रैल की सुबह ही टांगा गया था। इससे पहले वर्षों से दीवार पर शरद यादव और नीतीश कुमार की तस्वीर के बीच जॉर्ज फर्नांडिस की तस्वीर लगी हुई थी। और तीन दिन पहले ही शरद यादव की प्रेस कॉन्फ्रेन्स के दौरान पत्रकारों ने जब शरद यादव से पूछा था कि जॉर्ज की तस्वीर लगी रहेगी या हट जायेगी तो शरद यादव खामोश रह गये थे।लेकिन 30 मार्च को शरद यादव के बाद 2 अप्रैल को नीतीश की मौजूदगी में जॉर्ज की जगह लगाया गया यह बोर्ड तीसरी बार तब गिरा, जब प्रेस कॉन्फ्रेन्स के बाद नीतीश कुमार जदयू मुख्यालय छोड़ कर निकल रहे थे । मुख्यालय में यह तीनों तस्वीरें नीतीश के पहली बार मुख्यमंत्री बनने के दौरान लगायी गयी थीं। उस दिन गुलाल और फूलों से नीतीश के साथ साथ जॉर्ज और शरद यादव भी सराबोर थे। उस वक्त तीनों नेताओ को देखकर ना तो कोई सोच सकता था कि कोई अलग कर दिया जायेगा या तीनों तस्वीरों को देख कर कभी किसी ने सोचा नहीं था की जॉर्ज की तस्वीर ही दीवार से गायब हो जायेगी। और इसके पीछे वही तस्वीर होगी, जिन्हें राजनीति के फ्रेम में मढ़ने का काम जॉर्ज फर्नांडिस ने किया।जार्ज फर्नांडिस कितने भी अस्वस्थ क्यों ना हों, लेकिन जो राजनीति देश में चल रही है उससे ज्यादा स्वस्थ्य जॉर्ज हैं, यह कोई भी ताल ठोंक कर कह सकता है। शरद यादव को जबलपुर के कॉलेज से राजनीति की मुख्यधारा में लाने से लेकर लालू यादव की राजनीति को काटने के लिये नीतीश कुमार में पैनापन लाने के पीछे जॉर्ज ही हैं। लेकिन जॉर्ज फर्नांडिस की जगह नीतीश कुमार को वह जय नारायण निषाद मंजूर हैं, जो लालू यादव का साथ छोड़ टिकट के लिये नीतीश के साथ आ खड़े हुये हैं।सवाल जॉर्ज की सिर्फ एक सीट का नहीं है, सवाल उस राजनीतिक सोच का है जिसमें खुद का कद बढ़ाने के लिये हर बड़ी लकीर को नेस्तानाबूद करना शुरु हुआ है। और यह खेल संयोग से उन नेताओं में शुरु हुआ है, जो इमरजेन्सी के खिलाफ जेपी आंदोलन से निकले हैं। हांलाकि सत्ता की राजनीतिक लकीर में जॉर्ज ज्यादा बदनाम हो गये क्योंकि अयोध्या से लेकर गुजरात दंगो के दौरान जॉर्ज बीजेपी को अपनी राजनीति विश्वनियता के ढाल से बचाने की कोशिश करते रहे। लेकिन गुजरात दंगो के दौरान नीतीश और शरद यादव में भी हिम्मत नहीं थी कि वह जॉर्ज से झगडा कर एनडीए गठबंधन से अलग होने के लिये कहते। दोनो ही सत्ता में मंत्रीपद की मलाई खाते रहे।असल में जार्ज अगर ढाल बने तो उसके पीछे उनकी वह राजनीतिक यात्रा भी है, जो बेंगलूर के कैथोलिक सेमीनरी को छोड़ कर मुंबई के फुटपाथ से राजनीति का आगाज करती है। मजदूरों के हक के लिये होटल-ढाबा के मालिकों से लेकर मिल मालिकों के खिलाफ आवाज उठाकर मुंबई में हड़ताल-बंद और अपने आंदोलन से शहर को ठहरा देने की हिम्मत जॉर्ज ने ही इस शहर को दी। 1949 में मुंबई पहुंचे जॉर्ज ने दस साल में ही मजदूरों की गोलबंदी कर अगर 1959 में अपनी ताकत का एहसास हडताल और बंद के जरीये महाराष्ट्र की राजनीति को कराया तो 1967 में कांग्रेस के कद्दावर एस के पाटिल को चुनाव में हराकर संसदीय राजनीति में नेहरु काल के बाद पहली लकीर खिंची, जहां आंदोलन राजनीति की जान होती है, इसे भी देश समझे। जॉर्ज उस दौर के युवाओं के हीरो थे । क्योंकि वह रेल यूनियन के जरीये दुनिया की सबसे बड़ी हडताल करते हैं। सरकार उनसे डरकर उनपर सरकारी प्रतिष्ठानों को डायनामाइट से उड़ाने का आरोप लगाती है। इसीलिये इमरजेन्सी के बाद 1977 के चुनाव में जब हाथों में हथकडी लगाये जॉर्ज की तस्वीर पोस्टर के रुप में आती है, तो मुज्जफरपुर के लोगों के घरों के पूजाघर में यह पोस्टर दीवार पर चस्पा होती है। जिस पर छपा था, यह हथकड़ी हाथों में नही लोकतंत्र पर है। और नीचे छपा था- जेल का ताला टूटेगा जॉर्ज फर्नाडिस छूटेगा।जाहिर है बाईस साल पहले के चुनाव और अब के चुनाव में एक नयी पीढ़ी आ चुकी है, जिसे न तो जेपी आंदोलन से मतलब है, न इमरजेन्सी उसने देखी है। और जॉर्ज सरीखा व्यक्ति उसके लिये हीरो से ज्यादा उस गंदी राजनीति का प्रतीक है, जिस राजनीति को जनता से नही सत्ता से सरोकार होते है। इस पीढी ने बिहार में लालू का शासन देखा है और नीतीश को अब देख रहा है। नीतीश उसके लिये नये हीरो हो सकते हैं क्योकि लालू तंत्र ने बिहार को ही पटरी से उतार दिया था। लेकिन लालू के खिलाफ नीतीश को हिम्मत जॉर्ज फर्नाडिस से ही मिली चाहे वह समता पार्टी से हो या जनतादल यूनाईटेड से। लेकिन केन्द्र में एनडीए की सत्ता जाने के बाद बिहार में लालू सत्ता के आक्रोष को भुनाने के लिये जो रणनीति नीतीश ने बनायी, उसमें अपने कद को बढाने के लिये जॉर्ज को ही दरकिनार करने की पहली ताकत उन्होने 12 अप्रैल 2006 में दिखा दी। जब पार्टी अध्यक्ष चुनाव में शरद यादव और जॉर्ज आमने सामने खड़े थे । बिलकुल गुरु और चेले की भिंडत । मगर बिसात नीतिश की थी । जार्ज को 25 वोट मिले और शरद यादव को 413 । लेकिन चुनाव के तरीके ने यह संकेत तो दे दिये की नीतीश की बिसात पर जॉर्ज का कोई पांसा नहीं चलेगा और जॉर्ज को खारिज करने के लिये नीतीश अपने हर पांसे को जार्ज की राजनीतिक लकीर मिटाकर अपनी लकीर को बड़ा दिखाने के लिये ही करेंगे ।लेकिन, इसका अंदाजा किसी को नहीं था कि इस तिगडी की काट वही राजनीति होगी, जिस राजनीति के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने की बात तीनों ने ही अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत में की थी । इसीलिये जॉर्ज को अस्वस्थ बताकर मुज्जफरपुर से टिकट काटने के बाद नीतीश ठहाका लगा रहे हैं कि बिना उनके समर्थन के जॉर्ज चुनाव मैदान में कूदकर अपनी भद ही करायेंगे । वहीं, जॉर्ज अपना राजनीतिक निर्वाण लोकसभा चुनाव लड़कर ही चाहते हैं। इसीलिये जॉर्ज ने पर्चा भरने के बाद अपने मतदाताओं से जिताने की तीन पन्नो की जो अपील की है, उसका सार यही है कि जिस तरह गौतम बुद्द के दो शिष्यों में एक देवदत्त था, जो बुद्ध को मुश्किलों में ही डालता रहा, वहीं उनके दोनों शिष्य ही देवदत्त निकले । आनंद जैसा कोई शिष्य नहीं है इसलिये इंतजार मुज्जफरपुर की जनता का करना होगा, जो बताये जॉर्ज अस्वस्थ है या राजनीति।

ममता की गली में वामपंथ के विकल्प की खोज

कालीघाट की मुख्य सड़क छोड़कर गाड़ी जैसे ही हरीश चटर्जी लेन की पतली सी सड़क में घुसी.....मुहाने पर दस बाय दस के एक छोटे से कमरे में ममता बनर्जी का एक बड़े पोस्टर को कैनवास पर रंगता पेंटर दिखा। बेहद मगन होकर इस्माइल तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिन्ह 'तीन पत्तियों' में उस वक्त जामुनी-गुलाबी रंग को उकेर रहा था। ड्राइवर इशाक ने बताया, यह ममता की गली है। संकरी गली । इतनी संकरी की सामने से कोई भी गाड़ी आ जाये तो एक साथ दो गाड़ियों का निकलना मुश्किल है।ममता की गली के किनारे पर पेंटर की दुकान है तो हाजरा चौक पर निकलती इस गली के दूसरे छोर पर परचून की दुकान है। जहां दोपहरी में अतनू दुकान चलाता है। बीरभूम में बाप की पुश्तैनी जमीन थी, जिसे कभी सरकार ने कब्जे में ले लिया तो कभी कैडर ने भूमिहीनों के पक्ष में आवाज उठाकर कब्जा किया। स्थिति बिगड़ी तो इस परिवार को कलकत्ता का रुख करना पड़ा। ये परिवार कालीघाट में दो दशक पहले आकर बस गया । हरीश चन्द्र लेन यानी ममता गली में ऐसा कोई घर नहीं है, जिसके पीछे दर्द या त्रासदी ना जुड़ी हो। बेहद गरीब और पिछड़े इलाके में इस मोहल्ले का नाम शुमार है। सवाल है कि इसके बावजूद ममता बनर्जी केन्द्र में मंत्री भी बनी लेकिन उन्होने न अपना घर बदला न मोहल्ला छोड़ा। ममता का घर हरीश चटर्जी लेन में मुड़ते ही सौ मीटर बाद आ जाता है। गली के कमोवेश हर घर की तरह ही ये भी खपरैल का दरकता हुआ वैसा ही घर है, जैसा उस गली के दोनों तरफ मकानों की फेरहिस्त है। अंतर सिर्फ इतना है कि ममता के घर के ठीक सामने सड़क पर तृणमूल कांग्रेस का झंडा लहराता है और घर के सामने का प्लॉट खाली है, जिसमें गिरी ईंटे बताती हैं कि यहां कंस्ट्रक्शन का काम रोका गया है, जो चुनाव के बाद शुरु होगा। यानी थोड़ी सी खुली जगह, जिसमें प्लास्टिक की कुर्सिया बिखरी हुईं और कुरते-पैजामे में कार्यकर्ताओ की आवाजाही ही एहसास कराती है कि किसी पार्टी का दफ्तर है। लेकिन, यह माहौल इसका एहसास कतई नहीं कराता कि ममता बनर्जी तीन दशक की वाम राजनीति के लिये चेतावनी बन चुकी हैं। लेकिन, यह पांच सौ मीटर की गली ममता की राजनीति की अनूठी दास्तान है। इसमें कभी प्रधानमंत्री रहते हुये अटल बिहारी वाजपेयी को आना पड़ा था। तो आंतकवाद और आर्थिक नीतियों से जद्दोजहद करते कांग्रेस के ट्रबल शूटर प्रणव मुखर्जी को तमाम मुश्किल दौर में कई-कई बार यहां आकर ममता को कांग्रेस के साथ लाने की मशक्कत करनी पड़ी। आखिर में ममता की गली से ऐलान हुआ कि ममता और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ेंगे। ऐलान के बाद से गली में कांग्रेस के झंडे भी छिटपुट दिखायी पड़ने लगे। काम तो इस बार बढ़ गया होगा, मैंने जैसे ही यह सवाल तीन पत्तियों को रगंते इस्माइल पेंटर से पूछा तो बेहद तल्खी और तीखे अंदाज में बोला...काम बढ़ा भी है और काम करने वाले जुटने भी लगा है। जुटने लगे हैं, मतलब...जुटने का मतलब है अब लाल झंडे का काम छोड़ ममता के बैनर को खुल्लम खुल्ला हर कोई बना रहा है। तो क्या पहले खुल्लम खुल्ला ममता का बैनर कोई नहीं बनाता था। बिलकुल नहीं ...बहुत मुश्किल होती थी। मैं तो बना लेता था क्योंकि ममता दीदी की गली में ही मेरी दुकान है, लेकिन दूसरे पेंटर अगर बनाते तो उनकी खैर नहीं होती। वैसे भी जब सत्ता लाल झंडे के पास हो तो हर चीज उनकी ही होगी। लेकिन पहली बार लाल झंडे का बैनर बनाने वाले लड़के भी ममता दीदी का काम कर रहे हैं। कुछ इलाके तो ऐसे हैं, जहा पहली बार छुप कर कुछ पेंटरों को लाल झंडे का बैनर बनाना पड़ रहा है। पहले ठीक इसका उल्टा था । दीदी की पार्टी का झंडा कोई बनाना नहीं चाहता था। पुरुलिया-बांकुरा तो ऐसे इलाके हैं, जहां लाल झंडे के खिलाफ कुछ काम भी किया तो समझो घर को ही फूंकवाया। पहली बार गांवों में ममता दीदी का जोर बढ़ा है। इसीलिये बांकुरा,बीरभूम,दक्षिण दिनाजपुर, उत्तर दिनाजपुर, पुरुलिया, मेदनीपुर, कूच बिहार से लेकर जलपाइगुडी तक में ममता का प्रभाव नजर आ रहा है। पोस्टर पर इस्माइल की कूची लगातार चल रही थी। चुनाव चिन्ह 'तीन पत्तियों' को रंगने के बाद वह ममता की सफेद साड़ी के किनारे की तीन लकीरों को गाढ़ा करने में लग गया। उसके रंग वहां भी जामुनी और गुलाबी ही थे। मैंने कहा, जो रंग चुनाव चिन्ह का किया, वही साड़ी के किनारे का भी क्यों कर रहे हो। इस्माइल झटके से उठा और ममता बनर्जी की कई तस्वीरों को निकाल कर सामने रख कर बोला, आप ही देख लो जो रंग तीन पत्तियों का है, वही दीदी की साड़ी के किनारे की लकीर का है। जामुनी-गुलाबी-हरा रंग। मेरे मुंह से निकल पड़ा, अरे ममता ही तीन पत्ती और तीन पत्ती ही ममता हैं क्या ? मेरे इस सवाल पर इस्माइल हंसते हुये बोला, लगता है आप बाहर के हो। मैंने कहा, सही पहचाना। मै दिल्ली से आया हूं। वो बोला, बाहर का आदमी ममता को इसीलिये ठीक से समझता नहीं है। ममता को तृणमूल से हटा दीजिये तो क्या बचेगा। ममता बगैर तो पार्टी दो कदम भी नहीं चल सकती है। पार्टी में कोई दूसरे का नाम तक नहीं जानता है। जो कोई कुछ कहता है, वह भी पहले ममता दीदी का नाम लेता है फिर कुछ कह पाता है। तभी दुकान में एक बुजुर्ग घुसे। इस्माइल बिना लाग-लपेट के बोला, चाचा यह दिल्ली से आये हैं...ममता के बारे में पूछ रहे हैं। अरे पांच दुकान के बाद को उनका घर है। वहां क्यों नहीं चले गये। मेरे मुंह से निकल पड़ा, गली में घुसते ही ममता का बैनर बनते हुये देखा तो रुक गया। आप सही कह रहे हैं, यह बैनर यहां के लिये नहीं, लाल झंडा के गढ़ सॉल्टलेक में लगाने के लिये है। यहां तो बिना झंडा-बैनर भी हर कोई दीदी को जानता है। लेकिन लाल झंडा के गढ़ में दीदी का बैनर लगने का मतलब है, अब कोई इलाका किसी के डर से नहीं झुकेगा। लाल झंडे को तो पानी पिला दिया है ममता ने। ममता ने क्या बदला है कोलकत्ता में, इस सवाल पर चाचा फखरुद्दीन ने कहा, कोलकत्ता में तो ममता ने कुछ नहीं बदला है लेकिन ममता की वजह से डर जरुर यहां खत्म हुआ है। इसकी वजह गांव के लोगों का भरोसा लाल झंडे से उठना है। गांव में हमारे परिवार के लोग भी कहते हैं। मैंने पूछा, आप हैं कहां के । हम पुरुलिया के हैं। जहां हर बंगाली मुस्लिम को लगता है कि वामपंथी जमीन से बेदखल कर देंगे और ममता दीदी ही जमीन बचा सकती हैं। लेकिन वामपंथियो ने ही तो भूमिहीनों को जमीन दी। जिनके पास बहुत जमीन थी, उनकी जमीन पर कब्जा कर के बिना जमीन वालो के बीच जमीन बांटी। यह काम तो ममता ने कभी नहीं किया। मेरे इस सवाल ने फखरुद्दीन चाचा के जख्मों को हरा कर दिया। बोले, मैं 1974 में कलकत्ते आया था। तब कलकत्ते का मतलब सबका पेट भरना था। रोजी रोटी का जुगाड़ देश में चाहे कहीं ना हो लेकिन कलकत्ते में कोई भूखा नहीं रहता, यह सोचकर मै आया भी था और मैंने यह देखा भी। कीमत दो पैसे बढ़ जाती तो लोग सड़क पर आ जाते। ट्राम के भाड़े में एक आना ही तो बढ़ाया था ज्याति बाबू ने, लेकिन तीन दिन तक सड़कों पर हंगामा होता रहा और बढ़ा किराया वापस लेना पड़ा। लेकिन बुद्धदेव बाबू ने पता नही कौन सी किताब पढ़ी है कि जनता से जमीन सरकार पानी के भाव लेती है लेकिन उसे सोने के भाव बेचती है। आप तो हवाई जहाज से आये होंगे। राजहाट का पूरा इलाका देखा होगा आपने। वहां पहले खेती होती थी या पानी भरा रहता था, जिसमें जल कुभडी लगी रहती। लेकिन उस पूरे इलाके की जमीन से सरकार ने अरबों रुपये बनाये होंगे। वहां बीस-पच्चीस मंजिल की इमारतें बन कर खड़ी हो गयीं । बड़ी बड़ी कंपनियों के ऑफिस खुल गये। लेकिन अब सब काम रुक गया है। लगता है सरकार को भी सिर्फ पैसा चाहिये। लेकिन पैसा ना होगा तो सरकार विकास कैसे करेगी....और मैं कुछ और कहता इससे पहले ही फखरुद्दीन कह पड़े....सही फरमाया आपने। पैसा ही भगवान हो गया है। सरकार दलाली करेगी तो दलालों को कौन रोकेगा । हर जगह कॉन्ट्रेक्टरों का कब्जा है। तीन हजार पगार की कोई नौकरी किसी को मिले तो एक हजार कान्ट्रेक्टर खा जाता है। हालत यह है कि दो हजार लेकर किसी ने मुंह खोला तो डेढ हजार में भी कोई दूसरा नौकरी करने को तैयार हो जायेगा। और अगर यह सभी बातें लाल झंडे का कैडर खुद को कहेगा तो क्या होगा । सिंगूर-नंदीग्राम में यही तो हुआ । वहां बुद्दू बाबू की सरकार कोई विकास तो कर नहीं रही थी । वह तो अपने उसी धंधे वाले कैडर की कमाई करवा रही थी । जबकि, ज्योति बाबू के दौर में कैडर को पैसा सरकार की तरफ से आता था। वही बैनर बनाने में मशगूल इस्माइल बीच में ही बोल पड़ा...चाचा लेकिन अब सरकार अपने कैडर को सुरक्षा देती है कि जहां चाहो वहीं लूट लो...इसीलिये तो नंदीग्राम में पुलिस को भी बुद्दु बाबू अपना कैडर ही कह रहे थे। यह कितने दिन चलेगा। लेकिन सरकार सुधर भी तो सकती है। बुद्दुबाबू को हटाकर किसी दूसरे को मुख्यमंत्री बना देगी सीपीएम। ऐसे में ममता बनर्जी ने क्या किया...वह तो सरकार की गलती का फायदा उठाकर लोगों को अपने साथ जोड़ रही हैं। मेरे इस सवाल ने चाचा भतीजे को बांट दिया। भतीजा इस्माइल बीच में बोल पड़ा, आप यह तो माने हैं कि जब लाल झंडे के आंतक के आगे हर कोई झुक गया तो ममता ने ही हिमम्त दी। वह लड़ीं और इस बार एक दर्जन सीट पर चुनाव जीतेंगी। वहीं चाचा बोले, लाल झंडा का विकल्प ममता नहीं हो सकती हैं, यह सही है । लेकिन ममता ने पहली बार वामपंथियो को डरा दिया है और डर से ही अगर वामपंथी अच्छा काम करने लगे तो ममता की जरुरत तो हर वक्त चाहिये, जिससे लाल झंडा पटरी से ना उतरे...जो अब उतर चुका है।

भागलपुरी या अंगिका...एक विवेचना


Posted by poemsnpuja
थोड़ा सा इतिहास में चलते हैं और मिथकों में तलाशते हैं...अंगिका अंग देश की भाषा है।अंगिका के बारे में बात करने से पहले अंग प्रदेश की बात करते हैं। अंग का पहला जिक्र गांधारी, मगध और मुजवत के साथ अथर्व वेद में आता है। गरुड़ पुराण, विष्णु धर्मोत्तर और मार्कंडेय पुराण प्राचीन जनपद को नौ भागों में बांटते हैं...इसमें पूर्व दक्षिण भाग के अंतर्गत अंग, कलिंग, वांग, पुंडर, विदर्भ और विन्ध्य वासी आते हैं।बुद्ध ग्रन्थ जैसे अंगुत्तर निकाय में अंग १६ mahajanpadon में एक था (चित्र देखें) अंग से जुड़ी हुयी सबसे prasiddh kahani महाभारत काल की है। पांडव और कौरव जब द्रोणाचार्य के आश्रम से अपनी शिक्षा पूर्ण करने लौटते हैं तो अर्जुन के धनुर्विद्या कौशल का प्रदर्शन देखने के लिए प्रजा आती है...यहाँ वे अर्जुन का प्रदर्शन देख कर दंग रह जाते हैं. पर तभी भीड़ में से एक युवा निकलता है और अर्जुन के दिखाए सारे करतब ख़ुद दिखाता है और अर्जुन से प्रतियोगिता करना चाहता है. द्रोणाचार्य ये देख चुके थे कि वह युवक बहुत प्रतिभाशाली है और अर्जुन को निश्चय ही हरा देगा...इसलिए वह उससे उसका कुल एवं गोत्र पूछते हैं यह कहते हुए कि राजपुत्र किसी से भी नहीं लड़ते...दुर्योधन ये देख कर अपनी जगह से उठता है और उसी वक्त कर्ण को अंग देश का राजा घोषित करता है...यह कहते हुए कि अब तो प्रतियोगिता हो सकती है। द्रोणाचार्य तब भी उसके कुल के कारण उसे एक राजपुत्र का प्रतियोगी नहीं बनने देते हैं. कर्ण को सूतपुत्र कहा जाता है जबकि वास्तव में वह कुंती का पुत्र होता है जिसका कुंती ने परित्याग कर दिया था क्योंकि वह उस समय पैदा हुआ था जब कुंती कुंवारी थी. यहाँ से दुर्योधन और कर्ण की मैत्री शुरू होती है जिसे कर्ण अपनी मृत्यु तक निभाता है...क्योंकि दुर्योधन ने उसका उस वक्त साथ दिया था जब सारे लोग उसपर ऊँगली उठा रहे थे.महाभारत और मसत्य पुराण में लिखा है की अंग प्रदेश का नाम उसके राजकुमार (कर्ण नहीं) के कारण पड़ा...जिसके पिता दानवों के सेनापति थे। प्राचीन काल में अंग प्रदेश की राजधानी चंपा थी...भागलपुर के पास दो गाँव चम्पापुर और चम्पानगर आज उस चंपा की जगह हैं। रामायण और महाभारत काल में अंग देश की राजधानी भागदत्त पुरम का जिक्र आता है...यही वर्तमान भागलपुर है। अंग प्रदेश वर्तमान बिहार झारखण्ड और बंगाल के लगभग ५८,००० किमी स्क्वायर एरिया के अंतर्गत आता है। तो ये हुयी अंग प्रदेश की बात...यहाँ की भाषा को अंगिका कहते हैं। अंगिका भाषी भारत में लगभग ७ लाख लोग हैं. इस भाषा का नाम भागलपुरी इसकी स्थानीय राजधानी के कारण पड़ा इसके अलावा अंगिका को अंगी, अंगीकार, चिक्का चिकि और अपभ्रन्षा भी बोलते हैं. अंगिका की उपभाषाएं देशी, दखनाहा, मुंगेरिया, देवघरिया, गिध्होरिया, धरमपुरिया हैं. अक्सर भाषा का नामकरण उसके बोले जाने के स्थान से होता है...यही हम यहाँ भी देखते हैं. इसमें देवघरिया भाषा तो मैंने काफ़ी करीब से देखी और सुनी है क्योंकि देवघर में ही मेरा पूरा बचपन बीता है...यह उपभाषा यहाँ के पण्डे बोलते हैं. ये देवघर मन्दिर के पुजारी होते हैं. देवघरिया के सबसे मुख्य संबोधनों में से है " की बाबा!" जो मेरे ख्याल से मन्दिर का स्पष्ट प्रभाव है. शंकर भगवान के इस मन्दिर को बाबा मन्दिर भी बोलते हैं. वैद्यनाथ धाम बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है.
अंगिका कुछ उन चुनी हुयी भाषाओँ में से है जिसका गूगल में अपना सर्च इंजन है २००४ से, गूगल अंगिका श्री कुंदन अमिताभ के सहयोग से बना है
इस लेख में हो सकता है कुछ गलतियाँ हो क्योंकि ये मैंने अपनी जानकारी और यथासंभव रिसर्च करके लिखी है. किसी को अगर कोई बात ग़लत लगे तो मुझे बता सकते हैं.

भारत को अंग्रेज़ी में इंडिया क्यों कहते हैं

भारत को इंडिया इसलिए कहते हैं क्योंकि स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं ने इस शब्द को अंग्रेज़ों की विरासत के रूप में देश का दूसरा नाम स्वीकार किया। अंग्रेज़ों के भारत पर शासन काल में इंडिया नाम प्रचलित और रूढ़ हो चुका था. जहाँ तक इंडिया शब्द के अंग्रेज़ी में आने की बात है इसके लिए ज़रा पीछे जाना होगा.भारत का जिन विदेशी व्यापारियों, आक्रमणकारियों, विजेताओं और यात्रियों आदि से संपर्क हुआ, उनके ज़रिए भारत के पुराने नाम सिंधु का उनके देशों में अपने ढंग से प्रचार हुआ. इसके लिए मुख्य रूप से दो स्रोतों का नाम लिया जा सकता है, ईरानी और यूनानी. ईरानी या पुरानी फ़ारसी में सिंधु शब्द का परिवर्तन हिंदू के रूप में हुआ और उससे बना हिंदुस्तान, जबकि यूनानी में ए बना इंडो या इंडोस. बस ए शब्द किसी तरह लेटिन भाषा में जा पहुँचा और इसी से बना इंडिया.
युवा जोश से साभार

वादे और दावे

लोकतंत्र का उत्सव आने वाला है...चुनाव होने वाले हैं...एक बड़ी भीड़ खड़ी हो रही आप से वोट मांगने के लिए....कभी कभी सोचता हूँ की यह चुनाव आख़िर होते ही क्यों हैं...हम जिन्हें जिस शर्त पर चुन कर भेजते हैं इस बात की कोई गारेंटी नही है की वोह जीत जाने के बाद भी उन बातों को ही अमल में ही लायेंगे जो उन्होंने चुनाव लड़ते समय कहीं थी ....आप को नही लगता है की कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमे हमारे राजनीतिज्ञ जो कहे वोह कर दिखाने के लिए वोह बाध्य हो....अगर सभी वादे पूरे नही हो सकते हैं तो कम से कम कुछ वादे तो ज़रूर पूरे किए जायें....हो सकता है इस व्यवस्था से राजनीतिज्ञ पार्टियाँ लुभावने वादे करना छोड़ दे....जनता के हित के लिए किए जाने वाले वादे तो बहुत होते हैं लेकिन बात जब हकीकत की कसौटी पर परखी जाती है तो सरे दावे फ़ेलहो जाते हैं.....इस बारे में आप की क्या राय है....ज़रूर लिखिए .......

Pepsi and Coca Cola Contains PORK (PIG) extracts - PROVEN!!

Shocking / Bad News :
Pepsi and Coca Cola contains extract from Pork (Pig)
Most of the people avoid Pepsi and Coca-Cola for various reasons:-
because of harmful chemical contents such as excessive carbonates , etc.

Now there is yet another reason which is more dangerous. The scientific and medical research says that drinking Pepsi & Cola leads to cancer because the key element is taken from Pigs sausage.
The pig is the only animal that eats dirt , dung and urine , which makes lethal and deadly fabric polluted germs and microbes.

According to a report published in Jordanian magazine , the Head of Delhi University Science and Technology , Dr. Mangoshada scientifically proved that the key element in Pepsi and Cola contains extract from the intestines of Pig which causes cancer and other deadly diseases.

The Indian university conducted tests on the impact of drinking Pepsi and Coca Cola which proved that drinking them lead to more rapid heart rate and low pressure.
Also drinking 6 bottles of Pepsi or Cola at a time causes instant death. It also contains chemicals such as carbonic and phosphoric acids , citric acid which harms teeth and causes bone fragility. Bones kept in the Cup of Pepsi melts during the week knowing that the bones of the dead remain in the grave for thirty years.
Research itself confirmed that the calcium dissolved in Pepsi and it weakens the bladder , kidneys , kills the pancreatic , leads to diabetes and infectious diseases.

Pepsi or Coca-Cola lovers , you have nothing to worry as it is not the only drinks available on this earth , as we have other healthy alternatives such as natural fruit juices , canned coconut water , flavoured milks , buttermilk etc. , all of them are conveniently available even in the small stores.

PLEASE PASS THIS MESSAGE TO ALL UR FRIENDS & CONTACTS....

Source: Inetrnet




वोट डालिए...देश बचाए.....

आज बहुत दिनों के बाद लिख रहा हूँ....लिखने का मन तो बहुत करता है लेकिन लिख नही पाता हूँ...खैर छोडिए लोकसभा चुनाव होने वालें हैं ..एक पत्रकार होने के नाते मुघे काफी तैयारी करनी है....बहुत सारे हिसाब लगाने हैं.... इस चुनावमें हो सकता है बड़ी जिम्मेदारी उठानी पड़े..आप लोगों से एक बात कहना चाहता हूँ....मैंने कई बार और कई तरह के चुनाव देखे हैं...इन्हे काफी करीब तो नही लेकिन कुछ करीब से ज़रूर देखा है...एक बात जो मैंने महसूस की है वो है अब के चुनावों में लोगों क जोश न रहना...लगता है लोगों को महज शिकायत करने की आदत होती जा रही है....लेकिन इस शिकायत को दूर करने की कोशिश कोई नही करना चाह रहा है...मतदाता वोट देने के लिए नही जन चाहता है उसे लगता है की घर में रहा जाए तो अच्छा होगा.... बाहर निकल के वोट देने की जहमत नही उठाना चाहता है कोई ....वोट के साथ स्टेटस जुड़ गया है....अपने को संभ्रांत मानने वाला वर्ग वोटिंग करने के लिए नही जाता है जानते हैं क्यों ? पता नही मालूम नही ..आप को मालूम हो तो बताना...... लेकिन यह एक ग़लत प्रथा है....आज देश को कुछ ही लोग चला रहें हैं...हमारी यही स्थिति रही तो आख़िर हम फ़िर कैसे शिकायत करेंगे...दोस्तों बाहर निकालिए और वोट डालिए...देश बचाए.....

सत्ता सिर्फ बंदूक की नली से नहीं निकलती

संसदीय राजनीति युवा तबके के जरिए अपनी पस्त पड़ती राजनीति को ढाल बनाना चाहती है। वहीं एक दौर में युवाओं के सपनों को हवा देने वाली वामपंथी समझ थम चुकी है। और इन सबके बीच अपनी जमीन को लगातार फैलाने का दावा करने वाली नक्सली राजनीति के पास वैकल्पिक व्यवस्था का कोई खाका नही है। कुछ ऐसी ही वैचारिक समझ लगातार उभर रही है, जिसमें पहली बार माओवादियों की चिंता अपने घेरे में उभर रही है कि उनकी समूची राजनीति व्यवस्था का बुरा असर उन पर भी पड़ा है। और इसकी सबसे बड़ी वजह विकल्प की स्थितियों को सामने लाने के लिये सकारात्मक प्रयोग की जगह राज्य से दो-दो हाथ करने में ही ऊर्जा समाप्त हो रही है। खासकर पिछड़े और ग्रामीण इलाकों के लोगों को जिन वजहों से सत्तर-अस्सी-नब्बे के दशक तक साथ में जोड़ा जाता था, अब वह सकारात्मक प्रयोग संगठन में समाप्त हो गये है।वह दौर भी खत्म हो गया जब क्रांतिकारी कवि चेराबंडु राजू से लेकर गदर तक का साहित्य भी आम लोगों की जुबान में आम लोगों की परेशानियों को व्यक्त करता था। जिससे ग्रामीण आदिवासी खुद को अभिव्यक्त करने के लिये आगे आते थे। लेकिन गदर के गीत क्रांतिकारी गीतों की शृंखला में आखिरी साहित्य साबित हुये हैं। फिर जीने की परिस्थितियों में भी लगातार बदलाव हुआ है, इसलिये माओवादियों के सामने सबसे बड़ा संकट यही हुआ है कि वह किस तरह जमीन के सवालों को उठाये जिससे जमीन के लोग उनसे जुड़ते जाएँ।चूँकि बैठक में एमसीसी और पीपुल्स वार के माओवादियों की मौजूदगी थी, जिनका पाँच साल पहले विलय हो चुका है। लेकिन दोनों ने अपनी जमीन बिहार-झारखंड और आंध्रप्रदेश-महाराष्ट्र की अगुवाई नहीं छोड़ी है, इस वजह से इन्हीं प्रदेशों में आम लोगों को साथ लाने के लिये साहित्य-गीत-कविता की स्थानीय महक को क्रांतिकारी मुलम्मे में चढ़ा कर कैसे रखा जाये, जिससे लोग जिन्दगी के साथ जुड़ते चले जाये - समूची बहस इसी पर आ टिकी। माओवादियों ने चेराबंडु राजू की उन कविताओं का जिक्र भी किया जो चंद लाइनों में व्यवस्था पर सवाल उठाता था। 1965 में लिखी उनकी कविता... मेरा मुकदमा ऐसा नहीं है कि उसका फैसला / काले कोट वालों को नीली करेंसी नोट देकर / किसी एक देस की किसी अदालत में हो जाये / मुझे गवाह के कटघरे में आने दो। या फिर 1968 में लिखी कविता जिसका पाठ उन्होंने तिरुपति के छात्रों के बीच किया था- ऐसी करुणा तेरी, / जो सूखी छाती से चिपकी रहे,/ बच्चों को न दे सके सांत्वना,/ भूखों मरने तक की हालत में, / यह उधार गहनों की चकाचौंध,/ क्या कहना! माँ भारती बोलो तो, / क्या तेरा लक्ष्य है? कैसा आदर्श है? बन्देमातरम्! बन्देमातरम्! नक्सलियों में सवाल यह भी उठ रहा है साहित्य और क्रांति को एक साथ लेकर चलने में स्थितियाँ कब-कैसे बदलती चली गयी, इस तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया।हाल में साहित्योत्तर स्थितियों को दुबारा जगाने के लिये माओवादियों ने एक संगठन भी बनाया। लेकिन आंध्र प्रदेश के अलावा किसी राज्य में इस संगठन को चलने नहीं दिया गया और साहित्य से ज्यादा उसस जुड़े लोगों को नक्सली मान कर जेल में ठूँसा गया। जिससे हर आगे बढ़ा कदम पीछे हुआ।माओवादियो की यह बहस उन परिस्थितियों को भी टटोल रही थी कि आखिर जो सरकार एक दशक पहले तक नक्सलवाद को सामाजिक-आर्थिक समस्या के आईने में देखती थी, वही अब आंतकवाद के सामानांतर क्यों देख-समझ रही है। खासकर संसदीय राजनीति को लेकर आम वोटर जब सवाल कर रहा और राजनेताओं को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, तब माओवादियों की पहल किस तरह होनी चाहिये। क्योंकि बढ़ती आंतकवादी हिंसा के दौरान हर तरह की हिंसा को जब एक ही दायरे में रखा जा रहा है, तब कौन से तरीके होने चाहिये जो विकल्प का सवाल भी उठाये और विचारधारा के साथ राजनीति को भी जोड़े। माओवादियो के सामने वैचारिक तौर पर आर्थिक नीतियों को भी लेकर संकट उभरा है।पिछले डेढ़ दशक के दौरान आर्थिक सुधार को लेकर सरकार पर हमला करने की रणनीति लगातार माओवादियो ने अपनायी। वामपंथी जब यूपीए सरकार में शामिल हुये तो बंगाल में ही माओवादियों ने अपनी जमीन मजबूत की। निशाना आर्थिक नीतियों को लेकर ही रहा। लेकिन आर्थिक नीतियों को लेकर जो फुग्गा या कहें जो सपना दिखाया गया बाजार व्यवस्था के ढहने से वह तो फूटा लेकिन माओवादियों के सामने बड़ा सवाल यही है कि आर्थिक नीतियों ने उन्हें आम जनता के बीच पहुँचने के लिये एक हथियार तो दिया था लेकिन अब विकल्प की नीतियों को सामने लाना सबसे बड़ी चुनौती है। इसका कोई मजमून माओवादियों के पास नहीं है। खासकर जिन इलाकों में माओवादियो ने अपना प्रभाव बनाया भी है, वहाँ किसी तरह का कोई आर्थिक प्रयोग ऐसा नहीं उभरा है, जिससे बाजार अर्थव्यवस्था के सामानांतर देसी अर्थव्यवस्था अपनाने का सवाल उठा हो। यानी खुद पर निर्भर होकर किसी एक क्षेत्र को कैसे चलाया जा सकता है, इसका कोई प्रयोग सामने नहीं आया है। नया संकट यह भी है कि अंतर्राष्ट्रीय तौर पर माओवादी आंदोलनों की कोई रुपरेखा ऐसी बची नही है जो कोई नया कौरिडोर बनाये। नेपाल में माओवादियों के राजनीतिक प्रयोग को लेकर असहमति की एक बड़ी रेखा भी इस बैठक के दौरान उभरी। लेकिन सामाजिक तौर पर माओवादियों के सामने बडा संकट उन परिस्थितियों में अपनी पैठ बरकरार है जहाँ राजनीतिक तौर पर उन्हें खारिज किया जा रहा है। संसदीय राजनीति से इतर किस तरह की व्यवस्था बहुसंख्यक तबके के लिये अनुकूल होगी, माओवादियों के सामने यह भी अनसुलझा सवाल ही बना हुआ है। इसीलिये जो चुनौती सामने है उसमें बड़ा सवाल यह भी उभर रहा है कि दो दशक पहले जिन इलाकों में माओवादियों ने अपना प्रभाव लोगो में जमाया अब उनके सवालों का जबाब देने से ज्यादा सवाल माओवादियों के सामने खुद को टिकाये रखने के हो गये है। इसलिये पहली बार इस असफलता को भी माना गाया कि राजनीतिक क्षेत्र में ट्रेड यूनियन का खात्मा होने से बाजार व्यवस्था के ढहने के बाद शून्यता पैदा हो गयी है। मजदूरों को लेकर एक समूची व्यवस्था जो वामपंथी मिजाज के साथ बरकरार रहती और राज्य व्यवस्था को चुनौती देकर बहुसंख्य्क जनता को साथ जोड़ती, इस बार उसी की अभाव है। पहली बार ग्रामीण और शहरी दोनों स्तर पर राज्य को लेकर आक्रोष है।पहली बार अशिक्षित समाज और उच्च शिक्षित वर्ग भी विकल्प खोज रहा है। खासकर अपनी परिस्थितियों में उसके अनुकूल नौकरी से लेकर आर्थिक सहूलियत का कोई माहौल नहीं बच पा रहा, तो भी वामपंथी और माओवादियों दोनों इसका लाभ उठाने में चूक रहे हैं। माओवादियों के भीतर पहली बार इस बात को लेकर कसमसाहट कहीं ज्यादा है कि देश का बहुसंख्यक तबका विकल्प तलाश रहा है और दशकों से विकल्प का सवाल उठाने वालों के पास ही मौका पड़ने पर कोई विकल्प देने के लिये नहीं है।

punya prasoon bajpayi se sabhaar

'जो अपराधी नहीं होंगे मारे जाएंगे'

कौन है महारथी। प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक। अखबार या न्यूज़ चैनल। बहस करने वाले और कोई नहीं खुद मीडियाकर्मी हैं। हर जेहन में यही है कि खबरें जब अखबार के पन्ने से लेकर टीवी स्क्रीन तक से नदारद है तो ऐसी बहस के जरिये ही अपने होने का एहसास कर लिया जाये। लेकिन पत्रकार के लिये एहसास होता क्या है, संयोग से इसी दौर में खुलकर उभरा है। ताज-नरीमन हमला, आम लोगों का आक्रोष, पाकिस्तान से लेकर तालिबान और ओबामा।इन सब के बीच लिट्टे के आखिरी गढ़ का खत्म होना। 27 जनवरी को जैसे ही श्रीलंकाई सेना के लिट्टे के हर गढ़ को ध्वस्त करने की खबर आयी दिमाग में कोलंबो से निकलने वाले 'द संडे' लीडर के संपादक का लेख दिमाग में रेंगने लगा। हर खबर से ज्यादा घाव किसी खबर ने दिया तो पत्रकार की ही खबर बनने की। पन्द्रह दिन पहले की ही तो बात है। लासांथा विक्रमातुंगा का आर्टिकल छपा । कोलंबो से निकलने वाले द संडे लीडर का संपादक लासांथा विक्रमातुंगा। जिसने अपनी हत्या से पहले आर्टिकल लिखा था। और हत्या के बाद छापने की दरखास्त करके मारा गया। बतौर पत्रकार तथ्यों को न छिपाना और श्रीलंका को पारदर्शी-धर्मनिरपेक्ष-उदार लोकतांत्रिक देश के तौर पर देखने की हिम्मत संपादक लासांथा ने दिखायी। जिसने अपने आर्टिकल के अंत में श्रीलंका को ठीक उसी तरह हर जाति-समुदाय-कौम के लिये देखा जैसे ओबामा ने अमेरिका को इसाई-यहुदी-मुस्लिम-हिन्दु...सभी के लिये कहा। लासांथा ने भी लिखा सिंहली-तमिल-मुस्लिम-नीची जाति-होमोसैक्सुअल-अंपग सबके लिये श्रीलंका है । लासांथा अपनी रिपोर्ट के जरीये दुनिया को बता रहे थे कि लिट्टे एक क्रूर आतंकवादी संगठन है लेकिन राज्य का आतंक उसके सामानांतर अपने ही नागरिकों की हत्या को लेकर कैसे चल रहा है।दरअसल, लासांथा का विश्वास था कि सरकार के इशारे पर उसकी हत्या कर दी जायेगी । और हत्या के पीछे राष्ट्रपति महिन्द्रा का ही इशारा होगा । खुद संपादक लासांथा के मुताबिक 2005 में महिन्द्रा जब राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे थे, तब उसके साथ श्रीलंका के बेहतरी को लेकर चर्चा करते और राष्ट्पति बनने के बाद दर्जनों ऑफर राष्ट्रपति महिन्द्रा ने संपादक लासांथा को दिये। लेकिन लासांथा पत्रकार थे। सरकार का ऑफर ठुकराने के बाद जब मौत का ऑफर आने लगा तो भी अपने छोटे-छोटे बच्चों के मासूम चेहरों की खुशी से ज्यादा संपादक लासंथा को सरकार के आंतकित करते तरीको ने अंदर से हिलाया।लासांथा यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे कि तमिल-सिंहली के नाम पर देश के नागरिकों को ही बम में बदलने का काम सरकार कर रही है। 8 जनवरी को लासांथा की हत्या कर दी गयी और ठीक वैसे ही जांच का आदेश राष्ट्रपति महिन्द्रा ने दिया जैसा मारे जाने से पहले संपादक लासांथा आर्टिकल में लिख गये थे। कमोवेश हालात तो भारत में भी वैसे ही हैं।सवाल बटाला या ताज-नरीमन पर हमलों के बाद सरकार की लाचारी का नहीं है। सवाल समाज के भीतर पैदा होती लकीर का है । जिसमें सड़क पर खड़ा होकर कोई मुसलमान चिल्ला कर कह नहीं सकता कि वह मियां महमूद है और हिन्दुस्तानी है । दूसरी तरफ कोई बजरंगी-रामसेना का भगवा चोला ओढ़कर चिल्ला सकता है कि देश को बचाना है।लगातार अखबारों में लिखा गया। न्यूज चैनलों में बहस में गूंजा...वे कितने टफ थे॥बादाम, काजू खाकर मरने मारने के बीच का जीवन...खिलौने की तरह बंदूकों को हाथ में संभाले...समूची कमांडो फोर्स लगी तब.... सवाल है आतंकवादियों को महिमामंडित करने की जरुरत क्या है। आतंकवादियों के इरादे ने तो भारतीय समाज में कोई लकीर नहीं खिंची...मुंबई में जब गोलियां चलीं तो मुस्लिम भी मारे गये और हिन्दू भी । सिख और इसाई भी मारे गये । हमला तो भारत पर था और इसी इरादे से आतंकवादी आये थे लेकिन हमले के बाद किसने लकीर खींचनी शुरु की । अगर मियां महमूद को चिल्ला कर अपने हिन्दुस्तानी कहने की तरुरत नहीं है तो किसी को भगवा चोला ओढकर या गले में पट्टा लटकाकर देश बचाने का नारा लगाकर आतंकित करने की जरुरत क्या है। दोनों तनाव पैदा कर रहे है तो क्या प्रिंट और क्या इलेक्ट्रॉनिक....दोनो के लिये यही तथ्य हो चला है जैसे ही यह लिखा जायेगा या दिखाया जायेगा पढने या देखने वाला चौकेगा जरुर।यकीन जानिये ताज-नरीमन के हमले ने देश को चौंकाया और 60 घंटे तक जो अखबारों के पन्नों पर लिखा जा रहा था और न्यूज चैनलों के स्क्रीन पर दिखाया जा रहा था, उसे कवर करने गये मीडिया के शब्दो को अगर मिटा दें तो आपको अंदाज होगा आतंकवादी घटना थी क्या। घटना को समूचा देश कैमरों के जरिये देख रहा था । लेकिन कैमरापर्सन का नाम न्यूज चैनलों की चिल्लाती आवाज में कहीं नही उभरा । अखबार के जरिये भी पहली बार फोटोग्राफर को ही काम करने का मौका मिला लेकिन रिपोर्टरों और संपादकों की कलम ने तस्वीरों में ऐसा हरा और भगवा रंगा भरा जो तिरंगे को चुनौती देता ही लगा। जिन्हे नाज है कि 60 घंटे तक अखबार या न्यूज चैनलों ने मीडिया का मतलब देश को समझा दिया, अगर वही पत्रकार इमानदारी के साथ अखबार में बिना तस्वीरों के रिपोर्ट पढ़े और न्यूज चैनल के पत्रकार विजुअल की जगह अंधेरा कर एक बार सुन ले कि क्या रिपोर्टिंग की जा रही थी। और उसके बाद सिर्फ तस्वीरों को देखें तो काफी हकीकत सामने आ जायेगी।शायद इसीलिये कसाब की तस्वीर खिचने वाले डिसूबा और वसंतु प्रफु का पत्रकारीय सम्मान कहीं नही हुआ । और 26 जनवरी को ऐलान हुये सरकार के सम्मान को ठुकराने की ताकत किसी पत्रकार ने नहीं दिखायी। यही वजह है कि अखबार की रिपोर्टिंग राहुल गांधी-आडवाणी से होते हुये संजय दत्त में देशभक्ति का सिरा ढूढ रही है और चैनल तालिबानी गीत में मशगूल है।इसलिये मामला महारथियो का नहीं...अपराधियों का है...और 'जो अपराधी नहीं होंगे मारे जायेंगे।'
पुण्य प्रसून बाजपाई से साभार

संजय दत्त और सवालात


संजय दत्त और सवालात
संजय दत्त अब लखनऊ से समाज वादी पार्टी के तिक्जेत पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं.....कदम बढ़ते हुए उन्होंने अपना रोड शो भी शुरू कर दिया है....उनका साथ दे रहीं हैं उनके पत्नी मान्यता......एक सवाल बार बार मन में आता है की आख़िर कार संजू बाबा को चुनाव लड़ने की क्या आवशकता पड़ गई ...कुछ लोग हालाँकि यह भी कहतें हैं की चुनाव तो कोई भी लड़ सकता है...ठीक बात ...लेकिन फ़िर भी कोई कारन तो होगा ही ...शायद मुन्ना भाई अब लोगों की सेवा करना चाहते हैइसीलिए चुनाव लड़ रहें हैं...लेकिन सवाल फ़िर उठा की क्या जनसेवा के लिए जन प्रतिनिधि होना ज़रूरी है....क्या इसके बिना सेवा नही हो सकती ? चलिए आप सवाल का जवाब सोचिये तब तक एक और सवाल हाज़िर है ....

संजू बाबा को राजनितिक पार्टी के टिकेट की क्यों ज़रूरत पड़ी ....वोह तो इस देश में ख़ुद बहुत पापुलर हैं... आम भारतीय तो आप को जानता ही है ....फ़िर राजनितिक दलों का सहारा क्यों? यह एक और सवाल....अब सवाल एक और उठता है कि समाज वादी पार्टी ही क्यों....कोई औ र दल क्यों नही....जबकि उनका परिवार( पता नही अब उनका रहा कि नही ) तो पुराना कांग्रेसी है ....फ़िर ये सपाई क्यों....चलिए इसी लगे एक और सवाल खड़ा होता है कि चुनाव के लिए लखनऊ ही क्यों....मुंबई या महाराष्ट्र में कोई जगह क्यों नही....क्या वहां रह कर देश कि कथित सेवा नही कि जा सकती है....क्या सारे सेवाथियों कि लिए उतेर प्रदेश ही बचा है...जबकि सब जानते हैं कि लखनऊ से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपाई चुनाव लड़तें हैं....यह एक और सवाल था ...लगे हाथों एक सवाल और हो जाए....जब चुनाव लड़ना ही है तो लाडो ...यह कहने कि क्या ज़रूरत कि अगर अटल बिहारी लडेंगे तो मैं नही लडूंगा.....लड़िये लड़िये....बहुत सवाल हो गए अब एक बात याद दिला रहा हूँ एक बार अमिताभ बच्चन ने भी राजनीती मे आने कि कोशिश कि थी उनका क्या हाल हुआ यह सब जानते है.......

जय भारत

आह भारत से वाह भारत

आह भारत से वाह भारत

बहुत कुछ लिखने की ज़रूरत नही है ...भारत वाकई में एक ऐसा देश बनता जा रहा है जिसे पीछे मुड़कर शोक मनाने की आदत नही है...पुरी दुनिया तो आथिक मंदी से परेशान है और भारत अलमस्त है...एक सर्वे बताता है की भारत के लोग बहुत तेजी से आशावादी होते जा रहें....इस आशावादिता की दौड़ में भारत ने बड़ा मुकाम हासिक कर किया है....भारत के लोगों को उम्मीद है की अपना देश आर्थिक मंदी की चपेट से अगले एक साल में पूरी तरह बाहर हो जाएगा...अच्छा लगता है....ऐसे समाचार पढ़कर...पिछले साल का अंत बेहद दर्दनाक था...इस साल की शरुआत भी कम कष्टकारी नही थी ...लेकिन अब लगता है सब ठीक हो जाएगा...जय हो भारत

कुछ बताएं

आज एक ही बात मन में आती है की आख़िर हम और आप कब तक औरों का वार सह सकते हैं पाकिस्तान को हम एक नही सौ सबूत दे चुके हैं लेकिन पाकिस्तान है की हमारे दिए हर सबूत को सिरे से नकारता चला गया है लाख कोशिशों के बाद उसने ये माना है की कसाब उसका ही नागरिक है ....अब सवाल यह उठता है की पाकिस्तान के यह मान लेने से आख़िर क्या होगा.....क्या भारत के ऊपर होने वाले आतंकवादी हमले आगे नही होंगे इसकी गारेंटी मिल जायेगी....क्या बेगुनाहों का खून आगे नही बहाया जायेगा......मुंबई में हुए हमलों में मारे गए भारतीय हो या आसाम में कश्मीर हो या बंगलोर आख़िर मर तो रहे भारतीय ही हैं....क्या यह सिलसिला रुकेगा...कोई जवाब नही है हमारे हुक्मरानों के पास.....वोह खोखले वादे और कोशिशों के जरिये इस विशाल देश को आतंकवाद से मुक्ति दिलाने में जुटे हैं....लगता नही है की कुछ हो पायेगा....जब तक हम आप आगे नही आयेंगे तस्वीर बदलेगी यह नही कहा जा सकता है.....अब सोचना यह होगा की आख़िर हम कर क्या सकते हैं.... कुछ बताएं

India's first computer-literate village

By Anand Parthasarathy

Malappuram . Ten days from today, Chamravattom village, in Triprangode panchayat of Kerala's Malappuram district, will stake a unique claim to fame: the scenic hamlet on the banks of the Bharathapuzha, is slated to become the nation's first 100 per cent computer-literate village. On that day, at least one member of every family in the village — there are 850 families — will have completed basic computer literacy training. He or she can now handle a personal computer, create and edit pictures, compose text using a specially-designed Malayalam language tool, surf the Internet, send email and make Internet telephony voice calls.

They have been learning these skills at the local ``Akshaya'' centre, a one-room facility equipped with five PCs, a server and a printer with a dial-up Internet connection. The exact day when Chamravattom completes its self-appointed task can be predicted with accuracy because for two months now, villagers have been keeping the centre busy with nine or ten 90-minute teaching shifts everyday, Sunday included. Every slot is booked in advance. Housewives take the afternoon slots. The men come late in the evening. And every one of them will complete 10 lessons each, using a specially-developed interactive CD-based tutor, attractively packaged with a Malayalam commentary, animated games to help illustrate the concept of tools such as mouse, keyboard and a microphone-headphone combo. After they have completed the 15 hours of instruction, the learners take an online test. And when they answer all questions correctly, the screen flashes the message they have waited to read: ``Congratulations: you have attained computer-saksharatha!''

Chamravattom is only the first success story in one of the most innovative literacy campaigns carried out in this country. Four other clusters of villages are already vying for the honour of being declared the country's first computer-literate panchayat. Will it be Marakara, or Chelembra, Kootilangadi or Mampad? Competition is intense and sometimes Akshaya centres stay open after midnight to enable day-time workers to complete their lessons. The Padinjattumuri centre in Kootilangadi panchayat, has started a special late-night session exclusively for autorickshaw drivers who ply their vehicles all day — and learn computers at night.

All this activity is at present restricted to one district — Malappuram — where the State's computer-literacy campaign is being tried out. Indeed this was one literacy campaign inspired by the very people it is set up to serve. Exactly a year ago, the Malappuram District Panchayat approached the State Government for release of funds under the People's Planning initiative: "We want to lease 7000 computers so that every panchayat in the district will have access to computer technology," they said. After bouncing the proposal between departments for some weeks, the Government asked the State Information Technology Mission to help. The result was the Akshaya programme.

The chronically cash-strapped State could ill afford grandiose schemes — no matter how worthy. The Malappuram District Panchayat decided to involve budding entrepreneurs and created an attractive proposition: set up an Akshaya centre — one for every 1000 of the district's approximately 6.5 lakh families. No centre would be more than a kilometre or two away from anyone's home. Every centre would have a minimum of 5 PCs and would impart the 10-lesson, 15-hour training package charging the individual just Rs. 2 per lesson, that's Rs. 20 for the course.

But for every citizen trained, the panchayat would release Rs. 120 to the Akshaya Centre. To enable young entrepreneurs to come forward, the IT Mission persuaded some leading banks in the district — the State Bank of Travancore, Canara Bank, the South Malabar Grameen Bank and the Malabar District Cooperative Bank — to advance loans of Rs. 1.5 lakhs to Rs. 2 lakhs. Since a minimum of Rs 1.2 lakhs would be payable to every centre by way of panchayat subsidy, the banks were not taking too much of a risk.

The IT Mission also organised a special Computer Show in the district, where prospective Akshaya Centre operators could see the hardware and obtain good deals. They represented such a big customer base that hundreds of PC makers turned up. Interestingly, over 80 per cent of the orders were won by Kerala-based assemblers from the small sector — indirectly boosting the local PC industry.

Today, across the breadth of this hilly district, long dubbed `backward', you cannot drive more than a few kilometres without finding a brand new blue board which says ``Akshaya e-service centre''. Incredibly, the core team behind Akshaya is just 20-strong. They include the coordinator, M.S. Vinod, who has moved from the State capital to Malappuram town a year ago — and has been too busy to return. The District Programming Officer, Anvar Sadath, himself the author of two popular computer texts in Malayalam, is now coordinating the release of Phase Two software tools — so that the centre can offer new courses after the basic literacy target is met. "By November we are confident that Malappuram's target of 6.5 lakh computer literate families will be met," says the Mission Coordinator, Geeta Pious. Work is going apace to extend the Malappuram experiment State-wide: From January, it will be replicated in all other districts over a two-year time frame. The task is exactly 10 times the size of the prototype — since the State has about 65 lakh households.

Till date the State has spent just Rs. 150 lakhs on the programme — mainly to support the small core team and partner agencies such as the Centre for Development of Information Technology (CDIT) and Keltron which have assisted in creating software tools.

The real money has come from the decentralised panchayat funding. When all the costs are totted up, it may emerge as one of the most cost-effective learning experiments anywhere — with a State's people empowering themselves at the cost of about Rs. 100 for every family, paid out of their own tax payments.

By Anand Parthasarathy

Very Interesting facts!

Christianity…. One Christ, One Bible Religion…

You know the Latin Catholic will not enter Syrian Catholic Church.

These two will not enter Marthoma Church.

These three will not enter Pentecost Church.

These four will not enter Salvation Army Church.

These five will not enter Seventh Day Adventist Church.

These six will not enter Orthodox Church.

These seven will not enter Jacobite church.

Like this there are 146 castes in Kerala alone for Christianity,

each will never share their churches for fellow Christians..!

Wonderful..! One Christ, One Bible, One Jehova.....
What a unity!

Now Muslims..! One Allah, One Quran, One Nebi....! Great unity!
Among Muslims, Shia and Sunni kill each other in all the Muslim countries.

The religious riot in most Muslim countries is always between these two sects.

The Shia will not go to Sunni Mosque.

These two will not go to Ahamadiya Mosque.

These three will not go to Sufi Mosque.

These four will not go to Mujahiddin mosque.

Like this it appears there are 13 castes in Muslims.
Killing / bombing/conquering/ massacring/. .. each other !

The American attack to the Muslim land of Iraq is fully supported by all the Muslim countries surrounding Iraq!

One Allah, One Quran, One Nebi....! Great unity !
All Muslims are not Terrorists, but all Terrorists are Muslims. 60% of all victims of Muslim terrorism are Muslims.
Hindus - 1,280 Religious Books, 10,000 Commentaries,
more than one lakh sub-commentaries for these foundation books, 330 million gods, variety of Aacharas, thousands of Rishies, hundreds of languages...

still everyone goes to the SAME TEMPLE ...

whether unity is for Hindus or in others…?
Hindus never quarreled each other for the last ten thousand years in the name of religion. Only Politicians had tried to divide and rule… Keep Religion out of Politics and India will be the most peaceful place on earth.
Proud to be a HINDU? Thank God! I am a Hindu!