वादे और दावे

लोकतंत्र का उत्सव आने वाला है...चुनाव होने वाले हैं...एक बड़ी भीड़ खड़ी हो रही आप से वोट मांगने के लिए....कभी कभी सोचता हूँ की यह चुनाव आख़िर होते ही क्यों हैं...हम जिन्हें जिस शर्त पर चुन कर भेजते हैं इस बात की कोई गारेंटी नही है की वोह जीत जाने के बाद भी उन बातों को ही अमल में ही लायेंगे जो उन्होंने चुनाव लड़ते समय कहीं थी ....आप को नही लगता है की कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमे हमारे राजनीतिज्ञ जो कहे वोह कर दिखाने के लिए वोह बाध्य हो....अगर सभी वादे पूरे नही हो सकते हैं तो कम से कम कुछ वादे तो ज़रूर पूरे किए जायें....हो सकता है इस व्यवस्था से राजनीतिज्ञ पार्टियाँ लुभावने वादे करना छोड़ दे....जनता के हित के लिए किए जाने वाले वादे तो बहुत होते हैं लेकिन बात जब हकीकत की कसौटी पर परखी जाती है तो सरे दावे फ़ेलहो जाते हैं.....इस बारे में आप की क्या राय है....ज़रूर लिखिए .......

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