बस बीत गया साल......

पूरा एक साल बीत गया....क्या नया पाया यह तो नहीं बता सकता लेकिन हाँ इतना ज़रूर है कि खोया बहुत कुछ...भले खोने वाली चीज़ों कि संख्या कम हो लेकिन दर्द बहुत है...और जो चीजें पाई उनकी तुलना में यह अधिक मायने रखती है.....यही ज़िन्दगी है इसे देखना हो तो नज़रिया सड़क पर चलते लोगों को गिनने के नजरिये से अलग रखना पड़ता है.....खैर छोडिये ....देश के सबसे पहले भोजपुरी न्यूज़ चैनल हमार टीवी में काम करते हुए एक साल से अधिक हो गएँ हैं....जिस भाषा को रोज बोलता था.... सुनता था उसे खबर के नजरिये से देख रहा हूँ....रोज़ कुछ नया सिखा...लेकिन ना जाने क्यों साल के अंत में लगता है कि साल बस यू ही गुज़र गया......डे प्लान, फ़ील्ड रिपोर्ट, लाइव, एंकर यही रहा.....अपने लिए सोचने क मानो वक़्त ही नहीं मिला....सुबह सात बजे से लेकर रात कि दस बजे तक बस बाईट और पैकज में समय गुज़र गया और इस सब के बाद भी यही दर मन में रहा कि कहीं मंदी के दौर में मिली नौकरी चली ना जाये......इस बात क भी गिला कम ही रहा कि आप जिन लोगों से काम और योग्यता में कम नहीं हैं लेकिन सेलेरी में कम हैं.....यही एक नौकरी पेशा आदमी कि आदर्श ज़िन्दगी है.....लेकिन अब क्या किया जा सकता है..नया साल दस्तक दे रहा है...नए सपने खुद बखुद ना जाने कहाँ से आँखों में आ गए....ना चाहते हुए भी एक बार फिर उसी डे प्लान और पॅकेज कि चिंता होने लगी है....पता नहीं इन सपनो क भविष्य क्या होगा लेकिन सपने तो सपने हैं एक मासूम सी हंसी कि मानिंद यह तो आँखों में आ जाते हैं इन्हें नहीं पता कि इनके आने के बाद आँखों में अश्क आयेंगे या नहीं...शायद यही है नया साल....चलिए आइये मनाया जाये......
एक ख्वाब
बस यूं ही
आँखों में उतर आता है
कुछ नमी कुछ हंसी ले आता है
पल भर में बदल जाती है
तस्वीर इस दिल कि
लेकिन टूटे तो
हर शख्स
वहीँ बेगाना सा नज़र आता है.....

“थ्री ईडियट्स” में आमिर खान है कहाँ?

जीनियस जीनियस होता है... उसके जरिये या उसमें अदाकारी का पुट खोजना बेवकूफी होती है। शायद इसीलिये थ्री ईडियट्स आमिर खान के होते हुये भी आमिर खान की फिल्म नहीं है। थ्री ईडियट्स पूरी तरह राजू हिराणी की फिल्म है। वही राजू जिन्होने मुन्नाभाई एमबीबीएम के जरीये पारंपरिक मेडिकल शिक्षा के अमानवीयपन पर बेहद सरलता से अंगुली उठायी। यही सरलता वह थ्री ईडियट्स में इंजीनियरिंग की शिक्षा के मशीनीकरण को लेकर बताते हुये प्रयोग-दर-प्रयोग समझाते जाते हैं। राजू हिराणी नागपुर के हैं और नागपुर शहर में नागपुर के दर्शको के बीच बैठ कर फिल्म देखते वक्त इसका एहसास भी होता है कि थ्री ईडियट्स में चाहे रेंचो की भूमिका में आमिर खान जिनियस हैं, लेकिन सिल्वर स्क्रिन के पर्दे के पीछे किसी कैनवस पर अपने ब्रश से पेंटिंग की तरह हर चरित्र को उकेरते राजू हिराणी ही असल जिनियस हैं। यह नजरिया दिल्ली या मुबंई में नहीं आ सकता। नागपुर के वर्डी क्षेत्र में सिनेमा हाल सिनेमैक्स में फिल्म रिलिज के दूसरे दिन रात के आखरी शो में पहली कतार में बैठकर थ्री इडियट्स देखने के दौरान पहली बार महसूस किया कि आमिर खान का जादू या उनका प्रचार चाहे दर्शकों को थ्री इडियट्स देखने के लिये सिनेमाघरो में ले आया और पहले ही दिन फिल्म ने 29 करोड़ का बिजनेस कर लिया, लेकिन पर्दे के पीछे जिस जादूगरी को राजू हिराणी अंजाम दे रहे थे उसे कहीं ज्यादा शिद्दत से नागपुर के दर्शक महसूस कर रहे थे।

जुमलों में शिक्षा के बाजारीकरण और रैगिंग के दौरान कोमल मन की क्रिएटिविटी ही कैसे समूची शिक्षा पर भारी पड़ जाती है, इसका एहसास कलाकार से नहीं फिल्मकार से जोड़ना चाहिये और यह सिनेमैक्स के अंधेरे में गूंजते हंगामे में समझ में जाता है, जब एक दर्शक आमिर खान की रैगिंग के दौरान किये गये प्रयोग पर चिल्ला कर कहता है... वाह भाऊ राजू! हिसलप कालेज का फंडा चुरा लिया। तो किसी प्रयोग पर हाल में आवाज गूंजती है... भाउ... यह तो अपना राजू ही कर सकता है। कमाल है फिल्म परत-दर-परत आगे बढ़ती है तो राजू हिरानी की तराशी पेंटिंग के रंगो में दर्शक भी अपना रंग खोजता चलता है और इंटरवल के दौरान लू में एक दर्शक मुझे इसका एहसास करा देता है कि राजू के सभी प्रयोग मशीनी नहीं होंगे, वह मानवीय पक्षों को भी टटोलेंगे। बात कुछ यूँ निकली... लू करते वक्त...

“आपको कैसी लग रही है फिल्म?”
“अच्छी है... मजा आ रहा है।”
“भाउ राजू की फिल्म में मजा तो होना ही है। राजू कौन? अपना राजू हिराणी।”
“अरे! लेकिन मुझे तो आमिर खान की फिल्म लग रही है।”
“का बोलता... आमिर खान। भाऊ, आमिर खान तो एक्टिंग कर रहा है।”
“तो क्या हुआ... एक्टिंग ना करें तो फिल्म कैसे चलेगी?”
“भाऊ, एक बात बताओ... रेंचो जीनियस है न?”
“हाँ है... तो?”
“तो क्या, जीनियस तो जीनियस है... वह कुछ भी करेगा तो वह हटकर ही होगा ना।”
“अरे, लेकिन इसके लिये एक्टिंग तो करनी ही पड़ेगी।”
“लेकिन भाऊ... इंटरवल तक आपको एक बार भी लगा कि एक्टिंग से रैंचो यानी आमिर खान जीनियस है? फिल्म में हर प्रयोग को टेक्नालाजी से प्रूफ किया जा रहा है ना... तो फिर आमिर रहे या शाहरुख... क्या अंतर पड़ता है!”
“लेकिन गुरू, राजू हिरानी का हर प्रयोग भी टेक्नोलॉजी से जुड़ा है और टेक्नोलॉजी की पढ़ाई के तरीके को लेकर ही वह सवाल भी खड़ा कर रहा है।”
“सही कहा भाऊ आपने... लेकिन इंतजार करो, राजू कुछ तो ऐसा करेगा जिससे जिन्दगी जुड़ जाये। जैसे मुन्नाभाई में 12 साल से बीमार लाइलाज मरीज के शरीर में भी हरकत आ जाती है, तो सारी मेडिकल पढ़ाई धरी-की-धरी रह जाती है... कुछ ऐसा तो राजू भाई करेंगे।”

हम लू के बाहर आ चुके थे और बात-बात में उसने बताया कि राजू हिरानी के ताल्लुक नागपुर के हिसलप कॉलेज से भी रहे हैं। कैसे कब... यह पूछने से पहले ही इंटरवल के बाद फिल्म शुरु होने की आवाज सुनायी दी। हम हाल के अंदर दौड़े। लेकिन मेरे दिमाग में वह आवाज फिर कौंधी... वाह राजू भाई! यह तो हिसलप का फंडा चुरा लिया। खैर, फिल्म के आखिर में जिस तरह गर्भ से बच्चे को निकालने को लेकर देसी तकनीक का सहारा लिया गया, उसे देखते वक्त मैंने भी महसूस किया कि आमिर खान अचानक महत्वहीन हो गया है और देसी प्रयोग हावी होते जा रहे हैं, जिनके आसरे दुनिया की सबसे खूबसूरत इनामत - बच्चे का जन्म - जुड़ गयी। यानी आमिर सिर्फ एक चेहरा भर है। फिल्म खत्म हुई तो कालेज का जीनियस रैंचो साइन्टिस्ट बन चुका था। लेकिन यह साइंटिस्ट रैंचो को देखते वक्त एक बार भी महसूस नहीं हुआ कि इसमें आमिर की अदाकारी का कोई अंश है, बल्कि बार-बार यही लगा कि इस भूमिका को निभाते हुये कोई भी कलाकार जीनियस से साइंटिस्ट बन सकता है। और दिमाग में आमिर खान की जगह रैंचो का करेक्टर ही घुमड़ रहा था। यह वाकई राजू हिरानी की फिल्म है, लेकिन अदाकारी को लेकर कोई कलाकार इसमें पहचान बनाता है तो वह वही बोमेन ईरानी हैं जिसने मुन्नाभाई में मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल की तानाशाही को जिया और थ्री ईटियट्स में इंजिनियरिंग कालेज के डायरेक्टर रहते हुये खुद को किसी मशीन में तब्दील कर लिया। लेकिन दोनों ही चरित्र जब मानवीय पक्ष से टकराते हैं, तो राजू हिरानी द्वारा रचा गया बोमन का चरित्र कुछ इस तरह चकनाचूर होता है जिससे झटके में उबरना भी मुश्किल होता है और डूबना भी बर्दाश्त नहीं हो पाता। यानी बोमन ईरानी की अदाकारी से दर्शकों को प्रेम हो ही जाता है और उसी की खुमारी में फिल्म खत्म होती है।

ऐसे में दिमाग में सवाल उठता ही है कि आखिर आमिर खान इस फिल्म में हैं कहाँ? अगर फिल्म में होते तो वह अपने प्रचार के दौरान देश भ्रमण में शिक्षा संस्थाओं से जुड़े मुद्दे उठाते। क्योंकि चंदेरी या बनारस की गलियों में आज भी प्राथमिक स्कूल तक नहीं हैं और जिनकी लागत मारुति 800 से ज्यादा की नहीं है। और देश में आर्थिक सुधार के बाद से मारुति 800 जितनी बिकी है उसका दस फीसदी भी प्राथमिक स्कूल नहीं खुल पाये हैं। लेकिन आमिर खान फिल्म के धंधे से जुड़े हैं, इसलिये वह सरल भाषा में समझते हैं कि मुनाफा ना हो तो फिल्म फिल्म नहीं होती। इसलिये आमिर खान फिल्म में काम करने के पैसे नहीं लेते, बल्कि रेवेन्यू शेयरिंग में उनकी हिस्सेदारी होती है और उनका टारगेट थ्री ईडियट्स को लेकर सौ करोड़ रुपये बनाना है। यह मिस्टर परफैक्शनिस्ट है। मुझे लगा यही जादू मनमोहन सिंह का है... तभी तो वह राजनीति के मिस्टर परफैक्शनिस्ट हो चले हैं। नागपुर में थ्री ईडियट्स देखते वक्त सोचा... काश राजू हिरानी... मिस्टर परफैक्शनिस्ट पर फिल्म बनाये और सरलता से धंधे के गणित को सरोकार से समझा दे। फिर देखेंगे प्रचार के तरीके क्या होंगे और कितने शहरों के सिनेमैक्स में कोई दर्शक अंधेरे में चिल्ला कर कैसे कहता है... भाउ, यह तो अपने दिल्ली-मुबंई के फंडे हैं।

from punya prasoon bajpayi

आडवाणी युग के बाद की भाजपा

नागपुर में पहली बार सीमेंट की सड़क 1995 में बनी तो रिक्शे वालों ने आंदोलन छेड़ दिया । रिक्शे वालों का कहना था कि नागपुर में जितनी गर्मी पड़ती है उससे सीमेंट की सड़क में टायर चलते नहीं हैं। लेकिन कार वाले खुश हो गये कि अब गड्ढ़े में हिचकोले नहीं खाने होंगे। बरसात में अंदाज रहेगा कि सड़क अपनी है, परायी हुई नहीं है। आखिरकार रिक्शे वाले आंदोलन कर थक गये तो फिर पुराने नागपुर में संघ मुख्यालय के बाहर सीमेंट की सड़क बनाने की तैयारी शुरु हो गयी, जहां ज्यादा रिक्शे ही चलते हैं। इस बार आंदोलन हुआ नहीं। और फिर सीमेंट की सड़क बनाने का सिलसिला समूचे महाराष्ट्र में शुरु हुआ। सीमेंट की यह सड़क और कोई नहीं बल्कि भाजपा के अध्यक्ष पद को संभालने जा रहे नीतिन गडकरी ही बनवा रहे थे, जो उस वक्त महाराष्ट्र के पीडब्ल्‍यूडी मंत्री थे। कुछ इसी तरह की सड़क भाजपा के भीतर संघ बनवाना चाहता है और उसका विरोध दिल्ली की आडवाणी चौकड़ी करेगी, लेकिन भविष्य में कहा जायेगा कि नागपुर के गडकरी तब भाजपा अध्यक्ष थे। और उनके पीछे नागपुर के ही सरसंघचालक भागवत का हाथ था। असल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गडकरी के जरिये जो राजनीतिक प्रयोग भाजपा में करना चाह रहा है, उसे गडकरी पूरा कर सकते हैं, इसका भरोसा आडवाणी को चाहे ना हो लेकिन सरसंघचालक मोहनराव भागवत को पूरा है।




नागपुर में दीपावली के दिन संघ मुख्यालय में भागवत, भैयाजी जोशी और गडकरी की मुलाकात में ना सिर्फ गडकरी के नाम पर संघ ने मुहर लगायी बल्कि गडकरी के कान में जो मंत्र फूंका, उसमें सत्ता केन्द्रित राजनीति की जगह संघ केन्द्रित भाजपा जो अनुशासन के दायरे में रहे, इसी की फुसफुसाहट थी। नीतिन गडकरी संघ में जिनसे सबसे ज्यादा प्रभावित रहे हैं, वह हैं भाउराव देवरस, जिन्होंने आम आदमी का सवाल संघ के भीतर ना सिर्फ खड़ा किया बल्कि 1974 में जेपी के साथ राजनीतिक प्रयोग करने का सुझाव बालासाहेब देवरस को दिया। जाहिर है दिल्ली में पद संभालते ही गडकरी के तीन मंत्र होंगे- विकास के नये प्रयोग, आम आदमी की बात और संघ के अनुशासन का डंडा। तीनों मंत्र भाजपा की आडवाणी युग से टकरायेंगे और कटुता पार्टी में बढ सकती है इसका अंदाजा गडकरी को भी है और भागवत को भी। इसलिये गडकरी के जरिये भागवत कथा की जो तैयारी संघ कर रहा है, वह संघ को दुबारा 1951 की स्थिति में ले जाकर संवारने वाली है।




राजनीतिक तौर पर कभी जनसंघ और फिर भाजपा का कद अगर बढा तो उसके पीछे लोहिया और जेपी का हाथ रहा है इसे मोहनराव भागवत समझते नहीं होंगे ऐसा है नहीं। लेकिन भागवत संघ को हेडगेवार की सोच के अनुरुप मथना चाहते हैं, इसलिये लोहिया या जेपी के साथ मिलकर किये गये प्रयोग को संघ के भीतर बिखराव की वजह भी मानते है। यानी इसी प्रयोग से संघ के भीतर टूटन पैदा हुई जो संघ को कमजोर करती गयी। जनता पार्टी की सरकार में आरएसएस के स्वयंसेवक मंत्री जरुर बन गये लेकिन यहीं से भाजपा का जन्म भी हुआ और राजनीतिक तौर पर भाजपा ने अलग राग भी पकडा और रिमोट से चलने वाले संघ के तमाम संगठन अपनी मनमर्जी करने लगे। संघ के भीतर माना जाता है कि देवरस ने इसीलिये अयोध्या आंदोलन को हवा दी जिससे राम मंदिर को लेकर आरएसएस के तमाम संगठन एक छतरी तले आ जायें। देवरस को इसमें सफलता भी मिली। लेकिन भागवत के सामने कहीं बड़ा संकट है कि उनके दौर में सत्ता तो दूर, सांगठनिक तौर पर भाजपा या विहिप या स्वदेशी जागरण मंच ही नहीं खुद आरएसएस भी अपने घेरे में सिमटती दिख रही है। और सरसंघचालक की मौजूदगी ही एक नयी लीक किसी भी संगठन के लिये बना देती थी। उसी सरसंघचालक की मौजूदगी को ही हाशिये पर ढकेलने की कोशिश भाजपा के नंबरदार करने से नहीं चूक रहे।




जनता पार्टी की सरकार बनने के दौरान चन्द्रशेखर के कहने पर देवरस ने 'हिन्दू' शब्द दबा दिया और एनडीए की सरकार बनने पर वाजपेयी के कहने पर सुदर्शन ने हिन्दुत्व को हवा नहीं दी। लेकिन इससे आरएसएस का बंटाधार हो गया और अब हिन्दुत्व को लेकर संघ समझौता नहीं करेगा। भागवत यह मान कर चल रहे हैं कि सत्ता के लिये जोड़तोड़ की राजनीति का कोई लाभ नहीं है, इसलिये नीतिन गडकरी को भी इसकी चिंता नहीं करनी है कि जोड़तोड़ से भाजपा की राजनीतिक दखल कितनी बरकरार रहती है। इतना ही नहीं दिल्ली से लेकर राज्यो में सत्ता बरकरार रहे या ना रहे लेकिन संघ की सोच के अनुरुप हर संगठन को चलना होगा और हर क्षेत्र में जबतक यह दिखायी ना देने लगे कि संघ का स्वयंसेवक सफल हो रहा है तबतक काम अधूरा है। यानी गुरु गोलवलकर ने जिस संघ को विस्तार दिया और एकजुटता बनायी, फिर उसे रिमोट से चलाया, भागवत इसे ही सहेजना चाहते हैं। यानी गुरु गोलवलकर के दौर को हेडगेवार के तौर तरीकों के जरिये आरएसएस को जीवित करना चाहते हैं। विकास, आम आदमी और अनुशासन को गडकरी चलायें और हिन्दुत्व कहने या बोलने की जरुरत गडकरी को ना पड़े, इसकी व्यवस्था भागवत हिन्दुत्व में संघ के सभी संगठनो को मथकर करना चाहते हैं।



इस लीक को बनाने में भागवत के तौर तरीके बिलकुल हेडगेवार की तरह हैं। काशी की भरी सभा में हेडगेवार ने कभी कहा था, " मैं डा. केशव बलिराम हेडगेवार कहता हूं, यह सदा सर्वदा से हिन्दू राष्ट्र था, आज भी है और जन्म जन्मान्तर तक हिन्दू राष्ट्र रहेगा। " इसपर एक वक्ता ने व्यंग्यपूर्वक पूछा-"कौन मूर्ख कहता है कि यह हिन्दू राष्ट्र है?" तो सीना ठोंक कर उच्च स्वर में उत्तर आया--डा हेडगेवार ने। असल में भागवत को यह वाकया ना सिर्फ पूरी तरह याद है बल्कि हेडगेवार की वह तमाम परिस्थितयां भी याद हैं, जिसमें विपरीत परिस्थितयों के बीच आरएसएस को हेडगेवार खड़ा कर रहे थे। हेडगेवार सार्वजनिक राजनीति में दखल देते हुये संघ की नींव सामाजिक तौर पर डालना चाहते थे और डाल भी रहे थे। भागवत का अंदाज भी कमोबेश इसी तर्ज पर है। दिल्ली में बैठे भाजपा नेता हों या राजनीति की जोडतोड में गठबंधन के जरिये सत्ता पाने की होड़ में जुटे भाजपा नेता या फिर खुद लालकृष्ण आडवाणी, असल में हिन्दुत्व और संघ के अनुशासन की बात उनके गले 21 वीं सदी में उतर नहीं रही है और राजनीति के लिये संघ का भाजपा में दखल उन्हें हो सकता है बार-बार दकियानूसी लगे, लेकिन भागवत का मानना है कि हेडगेवार की नींव और गोलवलकर के विस्तार से आगे राजनीति गयी नहीं है। इसलिये भागवत ना सिर्फ संघ की, बल्कि हर सार्वजनिक सभा में यह उद्धघोष करने से नहीं चूकते कि भारत हिन्दू राष्ट्र है। और अगर कोई व्यंग्य करता है तो हेडगेवार की तर्ज पर सीधे हांकते हैं, ...यह संघ का मानना है, और हम अपने हर कर्म का आधार भी इसे ही मानते हैं।




संभव है भागवत का यह बयान भाजपा की राजनीति की गले की हड्डी बन जाए और उसे लगने लगे कि ऐसे में एनडीए का खात्मा हो जायेगा। बिहार में नीतिश कुमार बिदक जायेंगे। लेकिन भागवत जिस कथा को कहना चाह रहे हैं, उसमें नीतिश कुमार से गांठ बांधे रखने के लिये भाजपा को वह संघ से इतर जाने देने के पक्ष में नहीं हैं। भागवत किस तरह का कायाकल्प संघ में देख रहे है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संघ की बौद्धिक सभाओ में विभाजन के बाद लुटे-पिटे पाकिस्तान से आने वाले हिन्दू बंधुओं की सुरक्षा और पुनर्वास का कार्य किस तरह जानपर खेलकर स्वयंसेवकों ने किया, उसे याद किया जाने लगा है। चीन के साथ युद्ध हो या 1965 और 1971 में पाकिस्तान से युद्ध, स्वयंसेवक किस तरह मोर्चे पर घायलों की मदद और रक्त तक की व्यवस्था किया करता था, इसे संघ की सभाओ में यह कह कर जिक्र होता है कि भाजपा ने सबकुछ सेमिनारों में सिमटा दिया है और महंगाई जैसे मुद्दे पर भी जनता से खुद कटी हुई है। ऐसे में भाजपा की जोड़तोड़ की राजनीति का क्या अर्थ।




असल में गडकरी के जरिये भागवत एकसाथ कई संकेत देना चाहते हैं। पहली बार संघ के सरसंघचालक भागवत, सरकार्यवाह भैयाजी जोशी और भाजपा अध्यक्ष नीतिन गडकरी तीनों नागपुर के हैं और ब्राम्‍हण हैं यानी कोई आधुनिक सोशल इंजीनियरिंग नहीं चलेगी। और यह सब नीतिन गडकरी कैसे करेंगे इसका उदाहरण भी गडकरी के पीडब्ल्‍यूडी मंत्री रहते हुये नागपुर में किये गये प्रयोग से समझा जा सकता है। क्योंकि मंत्री बनते ही गडकरी ने फ्लाईओवर बनाने का सिलसिला शुरु किया। नागपुर के वर्धा रोड पर फ्लाईओवर बनाने में सबसे बड़ी दिक्कत सड़क के बीच लगी झांसी और गांधी की प्रतिमायें थीं। लेकिन नीतिन गडकरी ने पुल भी बनवाना शुरु किया और झांसी-गांधी के बुत को जड़ से उखड़वाकर सड़क के किनारे हुबहू वैसे ही लगवा भी दिया। यह अपनी तरह का पहला प्रयोग था। सवाल यही है भाजपा अध्यक्ष पद संभालने के बाद संघ का फ्लाईओवर बनाने में गडकरी कितनों को जड़ से उखाड़ेंगे या सभी इस फ्लाईओवर को बनाने में जुट जायेंगे।


from punya prasoon bajpayi

"20 साल पहले राजीव गांधी का अपहरण करना चाहते थे नक्सली और 20 साल बाद मनमोहन सिंह के अपहरण की जरुरत नहीं समझते माओवादी

ठीक बीस साल पहले 1989 नक्सली संगठन पीपुल्स वार ग्रुप के महासचिव सीतारमैय्या से जब यह सवाल किया गया था कि अगर आपको मौका लगेगा तो क्या आप तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का भी आपहरण कर लेंगे । जवाब मिला था कि जरुरत पड़ी और परिस्थितियां अनुकूल हुईं तो जरुर करना चाहेंगे। यह सवाल 1987 में आंध्रप्रदेश के सात विधायकों के अपहरण के बाद पूछा गया था । और बीस साल बाद जब बंगाल के एक पुलिसकर्मी का अपहरण कर उसपर पीओडब्ल्यू यानी प्रिजनर ऑफ वार लिखकर रिहा किया गया...तो अपहरण करने वाले सीपीआई माओवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य किशनजी उर्फ कोटेश्वर राव से मैंने यही सवाल पूछा कि अगर आपको मौका लगेगा तो क्या आप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अपहरण कर लेंगे। जवाब मिला बिलकुल नहीं। इसकी जरुरत है नहीं और परिस्थितियां ऐसी हैं कि प्रधानमंत्री की नीतियों से ही हमारा सीधा टकराव देखा जाने लगा है तो जनता खुद तय करेगी, हमें पहल करने की जरुरत नही है।


बीस साल के दौर में राजनीतिक तौर पर नक्सलियों में कितना बड़ा परिवर्तन आया है, यह जवाब उसका बिंब भर है। लेकिन इन बीस वर्षो में राजनीतिक तौर पर नक्सली कितना बदले है और उनकी राजनीति किस तरह अब सीधे संसदीय राजनीति को चेता रही है, यह गौरतलब है। बीस साल पहले मार्क्सवाद और माओवाद की धारा बंटी हुई थी। उस दौर में मजदूर-किसान के बीच भागेदारी को बढाने का सवाल ही सबसे बड़ा था। इसलिये इन दोनो धाराओं से जुड़ा अतिवाम आंध्रप्रदेश से लेकर बिहार तक में जो पहल कर रहा था, उसमें ग्रामीण क्षेत्रों से इतर का सवाल खासा गौण था। और जो सवाल नक्सली संगठन उठा रहे तो उससे राज्य सत्ता को कोई परेशानी नहीं थी। इसलिये बीस साल पहले नक्सल प्रभावित क्षेत्रो में विकास ना होना ही नक्सलियों के लिये भी मुद्दा था तो राज्य भी नक्सलियों पर विकास न करने देने का आरोप लगा कर समूचे इलाके को देश से अलग थलग दिखाने में कामयाब रहते। लेकिन बदलाव का दौर आर्थिक सुधार के साथ ही हुआ और राजनीतिक तौर पर एक नये तरीके से माओवादी और सरकार एक ही मुद्दे पर अपने अपने नजरिए से आमने सामने खड़े होते चले गये। इसलिये पहली बार सवाल सरकार की उन नीतियों को लेकर उठा, जिसपर बीस साल पहले राजनीतिक दल चुनाव लड़ सकते थे लेकिन अब वही सवाल संसदीय घेरे से होते हुये माओवादियों के दायरे में जा कर समाधान की बात कहने लगे और चुनावी राजनीति के भी आड़े अचानक माओवादी थ्योरी आ गयी।


असल में 1991 से लेकर 2001 के दौर में नक्सली माओवादी और मार्क्सवादियो ने शहरों की तरफ ठीक उसी तरह कदम बढाना शुरु किया जिस तरह आर्थिक सुधार के नजरिये ने गांवों को शहरों में बदलना शुरु किया। इस दौर में राज्य ने बाजारवाद ने मुनाफे के आगे जब घुटने टेकने शुरु किये तो नक्सलियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही आयी कि शहरों में वह अपनी स्थिति दर्ज कैसे करायें। खासकर वो शहर, जो पूरी तरह राज्य की नीतियों या धनवानों से जुड़े रोजगार पर ही टिके थे । यानी गांव में खेती से जो स्वालंबन पैदा होता और ग्रामीण अपनी जमीन पर खड़े होकर नक्सली संघर्ष में साथ खड़ा होता, उस तरह के स्वाबलंबन का स्थिति शहरों में थी नहीं। इसलिये अखिल भारतीय कामगार संगठन बनाकर औधोगिक मजदूरो को जोड़ने का काम नक्सलियों ने महाराष्ट्र से शुरु किया जो कई ट्रेड-यूनियन सरीखे संगठनो के मार्फत उन सवालों को उठाना शुरु किया जो बाजारवाद के सामानांतर समाजवाद की थ्योरी को रखते। इस दायरे में न्यूनतम मजदूरी के मुद्दे को क्षेत्र की जरुरत के हिसाब से नक्सलियों ने उठाना शुरु किया। यानी अपने संघर्ष को राजनीतिक दलों से हटकर बताने और दिखाने की राजनीति शहरो में कदम रखने के साथ ही की जिससे यह भ्रम ना रहे कि नक्सली संगठनों की जरुरत क्या है या फिर आज नहीं तो कल यह संगठन भी सत्ता के लिये चुनाव लड़ने लगेंगे। अपने इस प्रयोग में नक्सलियो का प्रभाव बहुत ज्यादा या पिर ज्यादा भी रहा ऐसा सोचना बचपना होगा। क्योंकि नक्सलियो की शहरों में पहले से कोई राजनीतिक चुनौती पैदा होती ऐसी स्थिति उस पूरे रेड कारीडोर में नहीं उभरी जो आज सरकार के लिये चुनौती बन रही है । लेकिन उस दौर में बाजारवाद ने जिस तरह पंख फैलाये और डंक मारना शुरु किया उसका असर यह जरुर हुआ कि विकल्प का सवाल कामगारों की जरुरत बनने लगा। यानी शहरो में कामगारो से जुड़े मुद्दों को लेकर नक्सलियो का नजरिया अचानक कामगारों को प्रभावित करने लगा। खासकर खनन और पावर प्रोजेक्ट के इलाको में टेक्नालाजी और विदेशी कंपनियो ने पैर रखे तो अचानक मजदूरों का रोजगार हायर-फायर वाली स्थिति में आया। तब सवाल न्यूनतम मजदूरी से भी आगे निकलने लगा । क्योंकि कामगारो के समुद्र के आगे राज्य द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी मिलने का सवाल ही नहीं था। ऐसे में अलग अलग क्षेत्रों में नक्सली संगठनो ने परिस्तितियो को समझते हुये मजदूरी का सवाल उठाया। मसलन महाराष्ट्र में 85 रुपये न्यूनतम मजदूरी हो लेकिन मजदूरों को 20-22 से ज्यादा मिलती नहीं थी। तो अपनी मौजूदगी जताने ले लिये नक्सलियों ने इस मजदूरी को 25 रुपये कराने का निर्णय लिया। लंबी लड़ाई के बाद सफलता मिली तो अगली लडाई 28 रुपये को लेकर सफल हुई। और आज की तारिख में यह लड़ाई 50 रुपये को लेकर हो रही है। वही बंगाल में अभी भी यह लड़ाई 22 से 25 रुपये कराने को लेकर हो रही है और बीते तीन सालो में माओवादी बुद्ददेव सरकार से 25 रुपये मजदूरी नहीं करा पाये है जबकि राज्य द्रारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी 85 रुपये है। इसी तरह तैंदू पत्ता के सवाल पर पहली लडाई 25 पैसे को लेकर लड़ी गयी । जो अब पचास पैसे बढाने को लेकर हो रही है। एक हजार तेदूपत्ता पर फिलहाल एक रुपये 75 पैसे मिलते है, जिसे सवा दो रुपये कराने की लडाई तेदूपत्ता ठेकेदारे से की जा रही है। बीस साल पहले एक हजार तेदूपत्ता पर 35 पैसे मिलते थे ।


जाहिर है यहां दो सवाल खड़े होते हैं कि एक तरफ बीस साल में लड़ाई एक रुपये को लेकर ही हुई और दूसरा सवाल की देश में विकास का ऐसा कौन सा अर्थशास्त्र अपनाया गया, जिससे शहरों में जो सिक्के मिलने बंद हो गये.....गांवों में उसी सिक्के की लड़ाई में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गांव अब भी जी रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन यहीं से नक्सलियों की उस राजनीति को भी समझना होगा जो तेंदूपत्ता की कीमत बढ़वाने के लिये ठेकेदारों की हत्या कर सकती है। या उन्हे चेता कर झटके में एक हजार तैंदूपत्ता की नयी कीमत पांच रुपये तय करवा सकता है। लेकिन राजनीति का मतलब लोगों की गोलबंदी और हक के साथ साथ संघर्ष करते हुये आगे बढाने की पूरी प्रक्रिया कैसे होती है असल में इसी का नायाब प्रयोग लगातार नक्सली राजनीति कर रही हैं। क्योंकि 2001 के बाद नक्सलियों के सामने बड़ी चुनौती उस राजनीति शून्यता के वक्त अपनी मौजूदगी का एहसास कराना था, जिसे माओवादी और मार्क्सवादी लगातार उठा रहे थे।


2001 में अतिवामपंथियो के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह सवाल खुल कर उठा था बाजारवाद को जिस तरह संसदीय राजनीति हवा दे रही है, उससे समाज के भीतर विकल्प का सवाल राजनीतिक तौर पर जरुर उठेगा । साथ ही संसदीय राजनीति को लेकर निराशा भी आयेगी। इन्हीं परिस्थितियों के बीच माओवादियों और मार्क्सवादियों यानी एमसीसी और पीपुल्स वार ग्रुप के बीच गठबंधन की प्रक्रिया शुरु हुई और 2004 में यानी तीन साल की लंबी प्रक्रिया के बाद दोनो एकसाथ आये और सीपीआई माओवादी का गठन हुआ। राजनीतिक तौर पर माओवादियो ने अगर पहला प्रयोग बंगाल में 2005 में यह सोच कर शुरु किया कि वामपंथी सरकार से जनता का मोहभंग एक धक्के के साथ हो जायेगा तो यह गलत नहीं होगा। क्योंकि पीपुल्स वार ने इससे पहले कभी बंगाल का रुख नहीं किया था लेकिन बंगाल में माओवादियों की कमान को पीपुल्स वार ग्रुप के कोटेश्वर राव यानी किशनजी ने संभाला । 2004 में एनडीए के शाइनिग इंडिया के नारे तले एनडीए की हार और यूपीए की जीत के बाद वामपंथियो के समर्थन ने माओवादियो की सेन्ट्रल कमेटी में यह सवाल उठा था कि वामपंथी सरकार पर लगाम लगा पायेगे या जनता से उनकी लगाम भी ढीली पड़ जायेगी। इसीलिये सिंगूर और नंदीग्राम से लालगढ़ का रास्ता वामपंथी सरकार के लिये अगर भारी पड़ रहा है तो इसका संसदीय घेरे में लाभ चाहे ममता बनर्जी को मिले लेकिन जिस पूरे इलाके में जो गोलबंदी ग्रामीण-आदिवासियों को लेकर की गयी, उसे माओवादी कितनी बडी सफलता मान रहे है उसका अंदाज इसी से लग सकता है कि झारखंड,उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में इसी तरह से एसईजेड और खनन समेत एक दर्जन से ज्यादा लगने वाली कंपनियो को दी जाने वाली जमीन पर जिन्दगी चलाने वाले गांव के गांव में उन्हीं मुद्दों पर बहस की शुरुआत की गयी है, जो अगले तीन-चार साल में नंदीग्राम-लालगढ में तब्दील होंगे। हो सकता है इन क्षेत्रो में भी कोई ना कोई क्षेत्रीय राजनितिक शक्ति कांग्रेस या भाजपा को इसी दौर में चुनावी चैलेंज देने लगे और उन मुद्दों की वकालत करने लगे, जिसे माओवादी आज उठा रहे हैं।


लेकिन पहली बार यही माओवादी राजनीतिक तौर पर एक नया सवाल खड़ा कर रहे है, कि संसदीय राजनीति सत्ता के लिये आर्थिक सुधार की हिमायती नहीं है बल्कि आर्थिक सुधार को बरकरार रखने के लिये संसदीय राजनीति चलनी चाहिये। और इसके अंतर्विरोध को माओवादी प्रक्रिया में संसदीय दल ही चुनावी संघर्ष में सामने उसी तरह लाये जैसे ममता उभार रही हैं। जो कांग्रेस को केन्द्र में समर्थन देते हुये मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में अहम पोर्टफोलियो भी ले ले और माओवादियो को देश का सबसे बड़ा खतरा बताने वाले मनमोहन सिंह की नीतियो का विरोध माओवादियों के हक की लड़ाई से जोडेते हुये अपनी राजनीति भी साधे। जाहिर है बीस साल पहले और अब के दौर में इतना फर्क वाकई आ गया है कि प्रधानमंत्री के अपहऱण की जरुरत माओवादियों को नहीं लगती ।

from punya prasoon bajpai