ये तो दर्द में भी मुस्कुराता है


एक शहर जिसकी पहचान
महज घंटे और घड़ियालों से नहीं
मंदिर के शिखर और
उनपर बैठे परिंदों से नहीं
यहाँ ज़िन्दगी
ज़ज्बातों से चलती है
अविरल, अविनाशी माँ की
लहरों पर मचलती है
शहर अल्लहड़ कहलाता है
ये तो दर्द में भी
मुस्कुराता है
यकीनन इसके सीने पर
एक ज़ख़्म मिला है
कपूर की गंध में
बारूद घुला है
एक सुबह सूरज सकपकाया सा है
गंगा पर खौफ का साया भी है
किनारों पर लगी छतरियो के नीचे
एक अजीब सी तपिश है
सीढ़ियों पर लगे पत्थर
कुछ सख्त से हैं
डरे- सहमे तो दरख्त भी हैं
तभी अचानक
एक गली से एक आवाज़ आती है
महादेव
देखो, दहशत कहीं दूर सिमट जाती है
घरों से अब लोग निकल आयें हैं
उजाले वो अपने साथ लायें हैं
चाय की दुकानों पर अब भट्ठियां सुलग रहीं हैं
पान की दुकानों पर चूने का कटोरा भी
खनक रहा है
देखो, ये शहर अपनी रवानगी में
चल रहा है
सुनो, उसने पुछा था
इस शहर की मिट्टी
मिट्टी है या पारस
लेकिन उससे पहले
दुआ है यही की
बना रहे बनारस
बना रहे बनारस .

कैसी रही चाय साहब?

>> धमाके के वक़्त पुलिस के बड़े अफसर के घर चल रहा था जश्न.

यह सवाल आपको कुछ अटपटा सा ज़रूर लग सकता है लेकिन सवाल जायज है. दरअसल ये सवाल इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मंगलवार 6 दिसम्बर को जिस वक़्त वाराणसी के शीतला घाट पर बम धमाका हुआ ठीक उसी समय जिले के आला अफसर चाय पार्टी में व्यस्त थे. आप को हैरानी होगी ये जानकार कि ये चाय पार्टी दी किस ख़ुशी में गयी थी. दरअसल 6 दिसम्बर की बरसी शहर में शांतिपूर्वक बीत गयी इसका जश्न मनाया जा रहा था. शहर पुलिस महकमे के सबसे बड़े अफसर के बंगले पर इस पार्टी का आयजन किया गया था. बाकायदा पत्रकारों को फ़ोन करके इस पार्टी में बुलाया गया था. खुद एसपी सिटी ने मेरे एक पत्रकार मित्र को फ़ोन किया और चाय पार्टी का निमंत्रण दिया. कारण बताया कि 6 दिसम्बर की बरसी शांति पूर्वक बीत गयी इसलिए जश्न मानेगे. कोशिश थी कि अपनी पीठ खुद ठोक ली जाये. यानी साफ़ है कि 6 दिसम्बर बीत जाने के बाद सभी अधिकारिओं ने मान लिया था कि अब कुछ नहीं होने वाला है. इसी लापरवाही का फायदा उठा लिया इंडियन मुजाहिदीन ने.
सूत्रों की हवाले से ख़बर है कि लास्ट के एक दिन पहले तीन संदिग्ध लोग इस इलाके में देखे गए थे. इसके बावजूद पुलिस और खुफिया विभाग ने कोई विशेष सतर्कता नहीं बरती. तुर्रा यह कि पुलिस ने कहा कि हम लोगों ने इलाके की सघन तलाशी ली थी अब आप ही सोच ले कि पुलिस की ये सघन तलाशी कितनी विरल थी. ऐसा नहीं है कि इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने हाथ घुमाया होगा और बम शीतला घाट पर रखे कूड़ेदान में पहुँच गया होगा. इसके लिए बाकायदा रेकी हुयी होगी. कहीं स्थानीय ठिकाना बनाया होगा. कुछ दिनों तक हर चीज़ पर नज़र रखी होगी. तब जाकर पूरी घटना को अंजाम दिया होगा. यही नहीं 6 दिसम्बर को अगर पुलिस इतनी सतर्क थी तो भला आतंकवादी शहर में कैसे टिके रह गए? साफ़ है कि खुफिया तंत्र यहाँ नाकाम साबित हुआ.



अद्भुत और अलौकिक





वो दृश्य अद्भुत और अलौकिक होता है उसकी कल्पना मात्र भी आप को रोमांचित कर देती है. वाराणसी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाना वाला उत्सव देव दीपावली देश के भयातम आयोजनों में से एक है. जाह्नवी के तट पर बसे काशी में घाटो पर असंख्य दीये एक साथ जल उठते हैं. देवताओं के लिए मनाई जा रही ये देव्पावाली देश का एकमात्र ऐसा धार्मिक आयोजन है जिसमे देश प्रेम की भावना दिखती है. इस दिन कार्यक्रम की शुरुआत अमर शहीदों को नमन करने के बाद होती है. इसी आयोजन की कुछ तस्वीरें आपके लिए...

how long will it survive?



its a story that i covered in varanasi. it tell us the dangerous results of throwing soil that has been collected in flood at riverbank of ganga ghats, again in ganga. river scientists telling this continue process will change the flow of ganga in varanasi. this change of flow in ganga will dangerous for many ghats like panchganga, scindhiya and some others. these ghats may be in ganga in few years. the one of most important thing is that all this cleaning process is done by local andimistration.

अब तो गरियाने से भी नहीं फरियाता

मीडिया के बढ़ते कदमो ने कई बदलाव लायें हैं. लेकिन कुछ बदलाव तो ऐसे हैं जिनके बारे में आमतौर पर सोचा नहीं जा सकता है. अब गालियों को ही ले लीजिये. गालियों में कितना कुछ बदल गया है. नयी नयी तरह की गालियाँ आ गयी हैं. जिन्हें सुनकर आप अपने को आनंदित महसूस करते हैं. गालियों के साथ सबसे बड़ी खासियत ये है कि किसको कौन सी गाली कब लग जाएगी, यह आप पहले से नहीं तय कर सकते. कोई साले से ही बिदक जाता है और कोई माँ बहन करने पर भी नहीं संभलता. ये गाली की माया है. देश के जाने- माने सहित्यकार काशीनाथ सिंह ने इन गालियों को अपनी किताब में भी बेधड़क प्रयोग किया है. किताब के पन्नों पर आने के बाद इन गालियों ने ऐसा चोला बदला कि सामाजिक परिवेश इनके बिना अधूरा लगेगा. ये है गालियों की विशेषता. लेकिन आजकल यही गालियाँ अपने मौलिक स्वरुप को बचाने के लिए गुहार लगा रहीं हैं. वह चाह रहीं हैं कि लोग इन गालियों का सही उच्चारण शुरू करे ताकि इनका आस्तित्व बना रहे.
गालियों के स्वरुप में परिवर्तन का एहसास तब से हुआ जब से छोटे पर्दे पर लाफ्टर शो शरू हुए. गंभीर अर्थो वाली गालियों के साथ प्रयोग शुरू हुए और गालियाँ बिगड़ गयीं. अब तेरी माँ की ...... कि जगह ले ली तेरी माँ का साकी नाका ने. अब भला यह कौन सी गाली हुयी. ना कोई पंच ना कोई कोई ह्यूमर. इस गाली को सुनने के बाद सुनने वाले के मन में कोई भाव आ ही नहीं सकता. इसी गाली को कुछ लोग कहते हैं तेरी माँ की आंख. अब भला आप ही बताइए कि इस तरह की गाली देने का क्या मतलब हुआ. भईया जो गाली, गाली की तरह लगे वो दो ना. छोटा पर्दा एक बड़ी चीज़ संभालता है जिसका नाम है राखी सावंत. ये देवी इन्साफ करती हैं. इन्साफ कम हल्ला ज्यादा करती हैं. इनके शो पर जो लोग आतें हैं उनके बीच गाली- गलौज सौ फ़ीसदी तय होता है. कुछ कमी होती है तो स्वयं राखी सावंत उसे पूरा करती हैं. लेकिन राखी भी जो गालियां देती हैं वो दमदार नहीं होती. उनमे हल्का पन होता है. इस बात का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि राखी को आज तक किसी ने भी मारा नहीं है. अब ऐसी गाली का क्या हासिल जिसको देने के बाद मारपीट ना हो. कौन समझाए इन टी वी वालों को.
बड़े पर्दे वाले भी कम नहीं हैं. इनकी भी फट जाती है गाली को सही तरीके से उसके मूल रूप में दिखाने सुनाने में. ठीक से गाली भी नहीं दे पाते. अगर दिया भी तो वहां बीप- बीप करने लगते हैं. अब भला इसका क्या मतलब हुआ. जनता ने पैसा दिया है गाली सुनने का, सुनाओ. लगते हैं बीप बीप सुनाने.
गालियाँ किसी वाक्य को बेहद आत्मीय बनाती हैं. दो लोग जो हमेशा गाली से अपनी बातों की शुरुआत करते हैं उनमे अपनापन होता है. लेकिन आजकल जिस तरीके से गाली का बंटाधार हुआ है उस ने तो गालियों की पूरी परिभाषा ही बदल दी. उनका मन्तव ही बदल गया. गंभीरता नाम की तो चीज़ ही इन गालियों में नहीं रह गयी.
दुनिया का सबसे पुराना जीवंत शहर बनारस तक गालियों की क्राइसिस से जूझ रहा है. कभी गालियों का पूरा कवि सम्मेलन कराने वाला बनारस नयी गालियाँ तलाश रहा है. क्योंकि पुरानी गालियों का रूप बदल गया है और उनकी मारक क्षमता भी कम हो गयी है. पहले जिस गाली को देने की लिए मुंह बनाने भर से अगला पिनक जाता था अब चार बार पूरी गाली बक दीजिये कोई असर नहीं पड़ने वाला. क्या करेंगे अब जब राखी सावंत ही गाली देने लगेंगी तो किसी के ऊपर क्या ख़ाक असर पड़ेगा. गालियाँ बदल गयीं हैं और इनको बोलने वाले लोग भी बदल गएँ हैं. लेकिन इसके कारण सबसे बड़ा नुकसान जो हुआ है वो उन लोगों का हुआ है जो इन गालियों को शिद्दत से जीते थे. उन लोगों का हुआ है जिनके कई काम इन्ही गालियों ने करवा दिए थे. या तो उन्होंने गाली खा कर यह काम किये या फिर गाली देकर लेकिन अफ़सोस कि अब गरियाते हैं तो भी फरियाता नहीं है.

हे आज तक ये 'धर्म' है 'वारदात' नहीं...

धनतेरस के दिन दोपहर में आज तक ने ' धर्मं ' कार्यक्रम में वाराणसी में माँ अन्नपूर्णा मंदिर से जुड़ी एक ख़बर दिखाई. बिल्कुल इण्डिया टीवी वाले तरीके से. ख़बर में दिखाया जा रहा था कि वाराणसी में स्थित माँ अन्नपूर्णा का मंदिर एक ऐसा मंदिर है जो वर्ष में सिर्फ एक दिन धनतेरस के दिन खुलता है. ये तथ्य पूरी तरह गलत है. माँ अन्नपुर्णा का मंदिर तो हर रोज़ खुलता है. ख़ास बात ये है कि धनतेरस वाले दिन माँ अन्नपूर्णा की स्वर्णमयी प्रतिमा के दर्शन होते हैं. यह वर्ष में सिर्फ एक दिन धनतेरस के दिन ही होता है. माँ अन्नपुर्णा की स्वर्ण प्रतिमा बेहद भव्य और आकर्षक है. इसीलिए इस दिन माँ के दरबार में भक्तों का सैलाब उमड़ता है. यही नहीं इस दिन माँ का खजाना भी भक्तों के बीच बांटा जाता है. इसके तहत माँ को दान में मिले धन को भक्तों के बीच में वितरित किया जाता है. इस धन को लेने के लिए माँ के दरबार में जबरदस्त भीड़ उमड़ती है. ऐसा नहीं है कि धन कोई बहुत अधिक होता है. फुटकर पैसे होते हैं जिन्हें भक्तों के बीच उछाला जाता है. मान्यता है कि जिसके पास माँ का ये खजाना होता है वो हमेशा धन धान्य से परिपूर्ण होता है. माँ के मंदिर के प्रथम तल पर जो मूर्ति होती है वो अद्भुत आभा वाली होती है. इस मूर्ति के दर्शन धनतेरस के दिन ही होते हैं. इसी मूर्ति के दर्शन को लोग बड़ी संख्या में आते हैं.
लगे हाथ आपको ये भी बता देता हूँ कि माँ अन्नपुर्णा का दर्शन इतना महत्वपूर्ण क्यों है. दरअसल माँ अन्नपुर्णा स्वयं आदि शक्ति माँ पार्वती हैं. विवाह के बाद जब बाबा भोले नाथ पार्वती को लेकर कैलाश पर लेकर लौटे तो माँ ने शिव से कहा कि स्वामी आप तो मुझे मेरे मायके में ही वापस लेते आये. गौरतलब है कि माँ पार्वती हिमालय के पुत्री थी. इस तरह से हिमालय पर स्थित कैलाश पर्वत उनका मायका हुआ. माँ पार्वती की ये बात सुनने के बाद भगवान शिव ने अपने त्रिशूल पर काशी का निर्माण किया और माँ के साथ वहां स्वयं निवास किया. काशी पहुँचने के बाद माँ ने भोले नाथ से पूछा कि आप यहाँ क्या करेंगे? इसपर भगवान् शिव ने कहा कि मै यहाँ प्राणियों को मोक्ष प्रदान करूंगा. इसपर माँ पार्वती ने कहा कि यदि आप मोक्ष देंगे तो मैं सबको अन्न दूँगी. तभी से माँ का नाम अन्नपुर्णा भी हो गया. इसके बाद चूँकि काशी में शिव के सभी गण भी विराजते हैं, उनके भोजन का पूरा प्रबंध माँ अन्नपूर्णा के जिम्मे है. स्वयं भगवान शिव माँ के सामने याचक के रूप में खड़े रहते हैं. माँ का आशीर्वाद है कि काशी में कोई भी भूखा नहीं सोयेगा.
माँ अन्नपुर्णा के मंदिर भगवान् श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के लगभग सामने ही स्थित है. भगवान् श्री काशी विश्वनाथ के दर्शन करने को आने वाले श्रद्धालु माँ के दर्शन भी ज़रूर करते हैं. अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि आजतक जैसे चैनल ने इस तरह कि भ्रामक ख़बर क्यों दिखाई. वैसे इस सवाल का जवाब तो आजतक चैनल में जिम्मेदार पद पर बैठे लोग ही अच्छे से दे सकते हैं लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है कि इसमें वाराणसी के स्ट्रिंगर ने अपना पैसा बनाने के ख़बर को गलत तरीके से बताया. लेकिन फिर भी दिल्ली में बैठे लोगों को ख़बरों की सत्यता को अपने स्तर से जांच लेना चाहिए था. स्ट्रिंगर तो अपनी दिहाड़ी बना ही लेगा. लेकिन नाम तो चैनल का खराब होगा. इसके अल्वावा आम जनता में एक जिम्मेदार चैनल कि तरह पहचान बना चुका आजतक अपनी प्रतिष्ठा खो देगा. आजतक ने वाराणसी से ये कोई पहली फर्जी ख़बर नहीं चलायी है. इसके पहले भी आजतक वाराणसी में एयर इण्डिया की एक उड़ान कि फर्जी आपात लैंडिंग करा चुका है जिसमे उसने गूगल से एक विडियो निकाल कर उसे एयर इण्डिया का हवाई जहाज बता कर चला दिया था. आजतक जैसे चैनल से इस तरह की उम्मीद नहीं कि जा सकती है. टीआरपी की दौड़ में इण्डिया टीवी ने एक बार दो नंबर पर क्या किया लगे ऊलजलूल चलाने.
आजतक चैनल में जिम्मेदार पद संभाल रहें लोगों को समझना चाहिए कि उन्होंने एक संचार माध्यम के ज़रिये एक बड़े वर्ग को गलत जानकारी दी है. स्ट्रिंगर की दिहाड़ी सत्यता से बढ़कर होने लगे तो ऐसे चैनलों को बंद होते देर नहीं लगती. माँ अन्नपुर्णा आजतक में काम करने वाले लोगों को सुखी रखे.

देश का भविष्य बोस कि कुर्बानी तय करेगी, गिलानी नहीं

विरोध प्रदर्शन की यह तस्वीर है बनारस की. यहाँ बच्चों ने अरुंधती रॉय के उस बयान की खिलाफत की है जिसमे उन्होंने कहा था कि कश्मीर कभी भारत का हिस्सा रहा ही नहीं. देश में अलगाववाद का समर्थन करने वाली अरुंधती के इस बयान का विरोध करते वक़्त विशाल भारत संस्थान के इन बच्चों ने सुभाष चन्द्र बोस की पोशाक पहन रखी थी. इन बच्चों की कोशिश है कि अरुंधती बौद्धिकता के नाम पर वर्तमान के प्रति जो नजरिया रख रहीं हैं उसमे भारत के इतिहास को भी शामिल करें. क्योंकि इस देश के लिए सुभाष चन्द्र बोस. आज़ाद और बिस्मिल ने कुर्बानी दी है. किसी गिलानी ने नहीं. लिहाजा देश का भविष्य यह कुर्बानियां तय करेंगी, बंटवारे की राजनीती करने वाला गिलानी नहीं.

जूते भी ईमानदार हो गए...

दिल्ली में गिलानी की सभा में किसी ने उनपर जूता फेंक दिया. ये जूता उनको लगा नहीं. अब इसे क्या कहेगे आप? इससे पहले भी कई लोगों को निशाना बना कर जूते फेंके जा चुके हैं. कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी नीरिह जूते का निशाना बनाने की कोशिश की गयी थी पर ना जाने क्या हुआ. जूता बिकुल करीब जाकर भी नहीं लगा. यह भी नहीं कह सकते कि जूते के जरिये अपनी भावना को व्यक्त करने वाला नया खिलाडी था. भैया वो तो कश्मीर पुलिस का निलंबित अधिकारी था. और इस देश में पुलिस अधिकारियों को जूते मारने की तो बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है. यकीन ना हो तो देश के किसी भी पुलिस स्टेशन में जाइये और देख लीजिये. किस तरह एक आम आदमी जूते खाता है. वैसे ये काम आप अपने रिस्क पर कीजियेगा हुज़ूर. वहां कहीं एक-आध जूते आपको भी लग गए तो मुझे दोष ना दीजियेगा. लेकिन कलयुगी यक्ष का प्रश्न का आज भी जस का तस है कि जूता अपने मुख्य मार्ग से भटका क्यों? जूता नीतीश कुमार की सभा में भी चला था लेकिन हैरानी की बात यह कि ये भी नीतीश को लगा नहीं. मोदी को भी निशाना बनाने की कोशिश की गयी लेकिन सफलता नहीं मिली. क्या हो रहा है इस देश में? इस देश का आम नागरिक इस कदर अपने लक्ष्य से भटक चुका है. एक जूता तक वो निशाने पर नहीं मार सकता. कुछ तो गड़बड़ है. ये राष्ट्रीय चिंतन का विषय है. वैसे जूते तो बुश और ओबामा की सभाओं में भी चले हैं लेकिन वो भी भारतीय जूतों की ही तरह निशाने से चूक गए. ज़रूर कहीं कुछ तो है. अब भला अमेरिकन्स पर भी जूते नहीं पड़ रहें हैं तो कुछ गलत है. वरना भारतीयों का निशाना चूक जाना तो समझ में आता है. अमेरिकन्स कैसे निशाना चूक सकते हैं. यानी अब ये मुद्दा राष्ट्रीय ना रहकर अंतर्राष्ट्रीय भी हो गया है.
इस पूरा मसले को अलग नज़रिए से देखा जाये तो पूरी साजिश जूतों की लगती है. इंसानों वो भी खासकर राजनेताओं पर जब- जब इन्हें फेंका गया इन जूतों ने उनतक पहुँचने से पहले ही अपना रास्ता बदल दिया. साफ़ है कि इस ग्लोबल विचारधारा वाले समाज में सभी जूते भी एक जैसी सोच रखने लगे हैं. सफ़ेद पोशों ने इन जूतों को अपना बना लिया है. कुछ खिला- पिला कर अपने गोल में शामिल कर लिया है. ऐसे भी हमने ना जाने कितने नेताओं को जूतों की माला पहनाई है. लगता है, जूतों को इतने करीब से महसूस करने का फ़ायदा इन नेताओं ने खूब उठाया है. गले में लटके जूते से वार्ता की और उन्हें पटा लिया.
ये नेता खुद तो ईमानदार नहीं हो पाए लेकिन इन जूतों को ईमानदार बना दिया. जूतों को उनकी गरिमा के बारे में बता दिया. उनके कान में बता दिया है कि अगर यूं ही हम लोगों पर पड़ते रहे तो तुम्हारी इज्ज़त का फालूदा बन जायेगा. सच भी है भैया अब पुरानी कहावत है कि कीचड में पत्थर फेंकोगे तो छींटे तुम्हारे ऊपर ही आयेंगे. जूतों को भी लगा की नेताओं से दोस्ती में ही भलाई है. और इस तरह से ईमानदारी का तमगा भी लग जायेगा. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जूतों ने ये निर्णय लिया और सभी प्रकार के जूतों के लिए इसे मान्य किया गया. कंपनी चाहें जो भी हो नियम तो नियम होता है. सभी को मानना ही पड़ेगा. चूँकि भारत में इधर बीच इन जूतों को फेंकने की घटनाएँ कुछ ज्यादा ही हो रहीं हैं इसलिए यहाँ नियम कुछ सख्त हैं. जूते इन नियमो को पूरी तरह से मानते है.
लेकिन इसके साथ ही राज़ की एक बात और बताता हूँ. जूतों ने सिर पर न पड़ने का निर्णय सिर्फ नेताओं और माननीयों के लिए लिया है. आम आदमी इसमें शामिल नहीं है. इसलिए इस मुगालते में न रहें की अब आपका सिर सुरक्षित है. अगर आपने अपने को निरीह प्राणी ना समझ कर अपने दायरों से बाहर निकलने की कोशिश की तो ये जूते आपको आपकी औकात याद दिला देंगे. फिर इसमें इस बात का डर भी नहीं है कि कीचड़ के छींटे उन पर जायेंगे. आम आदमी के ऊपर पड़ने में जूतों को एक प्रकार की आत्मिक शांति भी मिलती है और इस बात का संतोष भी होता है कि एक पुरानी परंपरा का निर्वहन हो रहा है. जूते और नेताओं का साथ अब जन्म जन्म का हो गया है. इसलिए उनपर जूते फेंकने का कोई फायेदा नहीं होने वाला है. और हाँ आपके लिए एक सलाह है, बिल्कुल मुफ्त. वह ये कि यदि आप एक आम नागरिक हैं तो चुप- चाप अपने पैरों को जूतों में रखिये. अगर इनसे बाहर निकालने की कोशिश की तो ये जूते कब आपके सिर तक पहुँच जायेंगे आप को पता भी नहीं चलेगा.

एक स्पर्श रचता है मुझे

गूंथ गयी है वह जमीन मेरी आत्मा में
सालती है मेरे उतप्त प्राण
रचती है मेरी मेधा के त्रसरेणु
जगाती है विस्मृत हो चुके कूपों में
एक त्वरा , एक त्विषा

कोंचती है अपने इतिहास का बल्लम
मेरे शरीर में, पीड़ा की शिराओं के अंत तक
तोड़ देती है अपने हठ की कटार
अस्थियों की गहराई में
धीमे से दबा देती है अपने बीज
मेरे उदर की की तहों में

सींचती है वह नदी मेरे स्वप्न
बुनती है मुझे धीमे से
मद्धम स्वरों में पिरो कर
वो वीथियाँ,
जोतती है मेरी बंजर चेतना
घुस कर मेरे स्वप्न तंतुओं में
छेड़ती है एक राग
बहुत महीन, बहुत गाढ़

धंस गयी है वह सुबह मेरी नींदों में
धोती है जो मुझे मंदिरों के द्वार तक
झांकती है मेरे अंधेरों में
कुरेद कर जगाती है मेरे सोये हुए प्रश्नों को
पवित्र करती है मुझे मेरे आखिरी बिंदु तक

एक स्पर्श रचता है मुझे
गढ़ता है अपने चाक पर, अपनी परिभाषा में,
पकाता है अलाव में धीमी आंच पर
गलाता है मुझे अपने अवसादों तक

टेरती हैं मीनारों से लटकी आजानें
मेरे दोष बोध को
सीढ़ियों पर बैठा जो खोजता है
अपने उद्धार के मंत्र, अपनी मुक्ति का तंत्र

कन्धों पर लाद कर लाया हूँ उत्कंठा के स्तूप
समा गयी है सारी दिशाएं मेरे संकल्प में
पच गयी है सारी धारणाएं उसी जमीन में
जहाँ से उगता हूँ मैं

-
दीपांकर

शुक्र मनाओ तुम भारत में हो..

भारतीय समाज में बुद्धजीवी का दर्जा पा चुकी अरुंधती रॉय ने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है. गिलानी दिल्ली में सेमिनार में कह रहें है कि उन्हें आज़ादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए. गिलानी अगर ऐसी बात कहें तो कोई हैरानी नहीं होती लेकिन अरुंधती ऐसा कहें तो आश्चर्य होता है. हालांकि इसके पहले भी अरुंधती रॉय एक ऐसा ही बयान दे चुकी हैं. तब उन्होंने मावोवाद का समर्थन किया था. कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा ना मानने सम्बन्धी बयान वहां पर अपनी जान कि बाज़ी लगा रहे जवानों के लिए एक तमाचा है. साथ ही शेष देश के लोगों के लिए क्षोभ और शर्मिंदगी की वजह है.
चौंदहवी सदी में कश्मीर में इस्लाम के प्रवेश के बाद से लेकर आज तक कश्मीर हमेशा ही अपनी शांति के लिए जलता रहा है. सन १८४६ में कश्मीर में सिखों और अंग्रेजो के बीच संघर्ष हुआ. मुद्दा कश्मीर पर अंग्रेजों के अधिकार से जुड़ा था. बाद में अंग्रेजों ने ७५ लाख रुपये में राजा गुलाब सिंह को कश्मीर दे दिया. समय बीतता गया और सन १९२५ में गुलाब सिंह की ही पीढ़ी हरी सिंह को राजा बनाया गया. इसी समय एक बार फिर से घाटी में मुस्लिम सियासत शुरू हुयी. १९४७ में राजा हरी सिंह और भारत सरकार के बीच कश्मीर के विलय को लेकर बातचीत चल ही रही थी कि पाकिस्तान के पख्तून काबिले के लोगों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया. हरी सिंह कश्मीर की रक्षा कर पाने में असहाय थे. भारत की सेना ने कश्मीर का वजूद बचाया. इसके साथ ही कश्मीर और भारत एक हो गए. १९७५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और शेख अब्दुला के बीच हुए समझौते के बाद कश्मीर और भारत पूरी तरह से एक हो गए. लेकिन फिर भी ये कहना कि भारत और कश्मीर अलग अलग हैं, अजीब लगता है. तर्क दिया जा सकता है कि ये राजनीतिक दृष्टिकोण है.
१८ महीने पहले कश्मीर की आवाम ने भारतीय लोकतंत्र में अपना विश्वास जताया और बैलेट के जरिये अपना नेता चुना. हो सकता है कि उनका अपना नेता उनकी आशयों पर खरा ना उतरा हो लेकिन इसके बाद भी रास्ता बंद नहीं होता. बैलेट से फैसला लेने वाली जनता के हाथों में अचानक पत्थर कहाँ से आ गए. क्या डल झील से निकले? कौन नहीं जानता कि ये पत्थर पड़ोसी के नाम पर कलंक हो चुके पाकिस्तान से आये हैं. पत्थरों के कारोबार करने वाले कश्मीर की तरक्की से जल रहें हैं. कश्मीर में मंजिलों तक पहुँचने वाली सड़के बन रहीं हैं. रेल चल रही है. उम्मीदों के आसमान में गोते लगाने वाले हवाई जहाज उड़ रहें हैं. ईर्ष्या से जलता पड़ोसी हर कोशिश कर रहा है कि कश्मीर को तरक्की के रास्ते से हटा कर एक बार फिर से आतंकवाद की आग में झोंका जाये. लें वह कामयाब नहीं हो पा रहा. कश्मीर की जनता कभी नहीं चाहती कि वहां इन आताताईयों का राज हो. लेकिन कमजोर राजनीतिक नेतृत्व का फ़ायदा उठा कर अलगाववादी अपनी रोटी सेंक रहें हैं और जनता को उकसा रहें हैं.
आज देश में जितना अनुदान कश्मीर को जाता है उतना किसी और प्रदेश को नहीं मिलता. वर्ष २००९- १० में कश्मीर को विकास योजनाओं के लिए १३, २५२ करोड़ रूपये दिए गए. जबकि आठ पूर्वोत्तर राज्यों को कुल मिलाकर २९, ०८४ करोड़ रूपये दिए गए. साफ़ है कि कश्मीर के लिए केंद्र सरकार की ओर से भरपूर धनराशि दी जाती है. लेकिन फिर भी लोगों में असंतोष क्यों फैलता है? ये एक सहज प्रश्न किया जा सकता है.
दरअसल कश्मीर की समस्या पूर्णतया भारतीय राजनीति में आई गिरावट का नतीजा है. कश्मीर भ्रष्टाचार के मामले में काफी आगे है. यहाँ पैसे की बन्दर बाँट हो जाती है. ये सिलसिला पुराना है. यही कारण है कि कश्मीर को आज जिस स्तिथी में होना चाहिए था वो वहां नहीं है. लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि कश्मीर को अलग मुल्क बना दिया जाये.
वैसे इस बात कि गारेंटी देने वाला भी कोई नहीं है कि आज़ाद कश्मीर अफगानिस्तान नहीं बनेगा. चाहे महबूबा मुफ्ती हो या फिर गिलानी साहब. और हाँ अरुंधती जी जैसे लोगों को समझना चाहिए कि ये उनका सौभाग्य है क वो भारत में रहती है. इसलिए जो मन में बोल सकते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई तिरंगे में से केसरिया रंग चुरा लेगा और मुल्क चुप रहेगा....

भागती छिपकली और दो अक्टूबर



आज गाँधी जयंती है. लाबहादुर शास्त्री का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था. ये इस देश का सौभाग्य है की यहाँ ऐसे महान सपूत पैदा हुए. इन्होने अपने कार्यों से न सिर्फ भारत में बल्कि संपूर्ण विश्व को राह दिखाई. लेकिन अफ़सोस इस बात का है की भारत देश ने इन सपूतों के आदर्शों को व्यवहार में लाना बंद कर दिया है. स्वतंत्रता के साथ वर्ष बीत चुके हैं. गाँधी और शास्त्री अब महज किताबों में सिमट कर रह गए हैं. क्लास वन से लेकर क्लास टेन तक हम गाँधी और शास्त्री के बारे में पढ़ते हैं. इसके बाद धीरे-धीरे कोर्स में इनका हिस्सा कम होने लगता है. जब बात इन दोनों के आदर्शों को जीवन में उतारने की आती है तब तक हम लोग इन्हें भूलने की कगार पर आने लगते हैं. इसके बाद तो सत्य का सिपाही हो या कर्म का पुजारी दोनों ही बस दो अक्तूबर को याद आते हैं.
जो लोग अखबार मंगाते हैं उन्हें सुबह का अखबार देख कर पता चलता है. तमाम सरकारी विभागों को अचानक इस दिन गाँधी और शास्त्री याद आ जाते हैं. लिहाजा देश के लगभग सभी(जो छपते हो या जो न भी छपते हो) अख़बारों में यथा संभव जितने बड़े हो सके उतने बड़े विज्ञापन दिए हैं. भला इससे बेहतर क्या तरीका हो सकता है इस दो महापुरुषों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने का. इस दिन इस कई लोगों को ऑफिस की छुट्टी बता देती है की गाँधी जयंती है. आम लोग बंद बाजारों को देखकर जान पाते हैं की देश में सार्वजनिक अवकाश है. कुछ लोग इसके बाद भी निश्चत करते हैं औरों से पूछ कर. भैया क्या बात है आज दुकाने बंद हैं. कुछ है क्या? तब जाकर पता चलता है कि आज दो अक्टूबर है. ऐसे में कैसे उम्मीद की जाये कि इस देश के लोग गाँधी और शास्त्री को हमेशा याद रखेंगे और उनके आदर्शों पर चलेंगे. हमने पूरे देश में गली चौराहों पर न जाने कितनी मूर्तियाँ लगवा दी हैं इन दोनों की ही. न जाने कितनी कालोनीज के नाम इन दोनों के नाम पर होंगे. लेकिन कोई एक ऐसा मिल जाये जो वाकई में गाँधी या शस्त्री के दिखाए रस्ते पर चल रहा हो. सरकारी प्रतिष्ठानों में भ्रष्टाचार चरम पर है. आम नागरिकों और सरकार के बीच असंतोष ने जगह बना ली है. नागरिक हितों की अनदेखी आम हो चली है. नीतियां बनाने वाले इसे लक्ष्य समूह के लिए प्रतिपादित नहीं करा पा रहें हैं. आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी लगातार बज रह है. मावोवाद और नक्सल समस्या ने परेशान कर रखा है. देश के अन्दर जंग छिड़ी हुयी है. कश्मीर का मसला हल नहीं हो पा राह क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल अपने फायदे को कम नहीं करना चाहता. कभी अंग्रोजों के खिलाफ एकजुट खड़े होकर दुनिया की सबसे बड़ी ताकत ब्रितानी हुकूमत को हारने वाला देश आज मंदिर और मस्जिद के मुद्दे पर सहम जाता है. युवा न तो गाँधी और शास्त्री को पढना चाहतें हैं और न तो उनके बारे में सोचना या समझना कहते हैं. खादी और चरखा आज न जाने किस स्टोर रूम में बंद पड़ा है. अब खुद ही सोच लीजिये की दो अक्टूबर का हमारे लिए क्या महत्व है. वैसे एक बात बताना तो भूल ही गया. कुछ लोगों को दो अक्टूबर का पता तब चलता है जब दीवार पर टंगी गाँधी या शास्त्री की तस्वीर को साफ़ करने के लिए उतार लिया जाता है और उसके पीछे साल भर से आशियाना बना कर बैठी छिपकली बेघर हो जाती है. काफी देर तक ये छिपकली दीवार पर इधर से उधर भागती रहती है. लगता है दो अक्टूबर आ गया. हे राम.

शुक्रिया शशि जी, आपने याद दिलाया हम युवा हैं

एक सुबह जीमेल और ऑरकुट पर लोगिन करते ही फ्रेंड लिस्ट में जुड़े उदय गुप्ता जी ने मुझसे मेरा फ़ोन नंबर पूछा, मैंने दे दिया. इसके थोड़ी देर बाद मुझे लखनऊ से एक फ़ोन आया. इस फ़ोन पर मुझसे कहा गया कि आपके पास थोड़ी देर में देहरादून से फ़ोन आएगा. इतनी देर में मेरे मन में कौतूहल आ चुका था. दो लगभग अनजान फ़ोन और तीसरे का इंतज़ार. हालाँकि ये इंतज़ार लम्बा नहीं चल सका और जल्द ही एक फ़ोन और आया. फ़ोन पर शशि भूषण मैथानी जी थे देहरादून से. कुछ देर कि बातचीत के बाद मुझे पता चल गया कि शशि कि मुझसे उम्र में बड़े और अनुभव में सम्पन्न हैं. शशि जी के हाथ मेरा एक लेख लगा था. शशि जी उसे अपनी पत्रिका' यूथ आईकॉन' में प्रकाशित करना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने कई माध्यमों से होते हुए मेरा फ़ोन नंबर प्राप्त किया था. शशि जी युवाओं को ध्यान में रखकर एक पत्रिका का प्रकाशन करते हैं लिहाजा सोच भी युवा थी. मन में कुछ करने की ख्वाहिश और अन्याय के प्रति बागी तेवर. शशि जी के साथ मेरी बातचीत बहुत लम्बी नहीं थी लेकिन इस अल्प अवधि की बातचीत के दौरान मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैं आज भी युवा हूँ. किसी मुद्दे पर मेरे विचारों को कोई तो अपना मानेगा. यकीन मानिये इस देश में ऐसे लोगों कि संख्या बहुत है जिनकी उम्र १५ से लेकर ३५ के बीच होगी. लिखा पढ़त में इस उम्र के लोगों को युवा कहते हैं लेकिन विचारों में ये युवा हो ज़रूरी नहीं है. देश और समाज के प्रति कुछ कर गुजरने का जज्बा इनमे मिल पाना मुश्किल है. अच्छी पढ़ाई, अच्छा सेलरी पॅकेज, बढ़िया लाइफ स्टाईल यही सब इस उम्र के लोगों का शौक होता है. यकीनन हमारा देश तरक्की कर रहा है. देश में नए एअरपोर्ट बन रहे हैं, नयी और चौड़ी सड़कें बन रही हैं. कंक्रीट के नए पहाड़ बन रहे हैं. लेकिन कोई मुझे बताये कि क्या देश कि तरक्की इन्ही सब चीजों से होती है. देश में सड़ता अनाज और भूख से बिलबिलाते लोग. मूल्यविहीन राजनीती और दिग्भ्रमित प्रजा. क्या यही है हमारी तरक्की?
शशि जी उधर से बोले जा रहे थे. मै सुन रहा था. बहुत दिनों के बाद एक युवा से मुलाकात हुई थी. जो अच्छी और आराम कि नौकरी की बात नहीं बल्कि कोशिश कर रहा था अपने को युवा बनाये रखने का. साथ ही अपने जैसे और लोगों को इस बात का एहसास दिलाने का कि वो भी युवा हैं. शुक्रिया शशि जी इस बात को याद दिलाना के लिए हम आज भी युवा हैं. शायद ये देश इन युवों की बदौलत ही सही मायनों में जवाँ हो पाए..

O! Childhood,

Sometimes beginning the day with a whisper, sometimes with a cry
Sometimes gaping in the void, at times beginning it with an innocent invite

The sudden trance that it takes me into away from the colossal clutches of the trite
Dragging away, disconnected, liberating to the elementary momentary amnesia
Cruising to the myopic state of bionic reflections jaded by the hyperemia
The ephemeral circumvention of the moment drawn away from the empirical hysteria
To the cerebral existence of the self-efficacious creation, to that fleeting vision

There comes a time,
When debates become primordial, when the need of solutions become unreal

O! Childhood,
Why don't you stay forever transcending me to the realms of that fading Ideal

from my friend santosh

बारात में बसिऔरा

मैं ये दावा तो नहीं करता कि इस शीर्षक को पढ़ने वालों की बड़ी तादात शायद इस शीर्षक का मतलब ना समझ पाए लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि एक आदमी तो कम से कम होगा ही जिसे शायद इसका अर्थ समझने में कुछ परेशानी हो तो साहब बारात का मतलब आप जानते ही होंगे(नहीं जानते तो डूब मरिये कहीं, आजकल नालों में भी इतना पानी है कि काम हो जायेगा) और जहाँ तक बात बसिऔरा कि है तो जब घर मैं खाना बच जाता है तो उसे बासी कहते हैं और जब बारात या किसी अन्य बड़े आयोजन में बचा खाना फिर से परोसा जाता है तो उसे बसिऔरा कहते हैं.....अब समझ गए होंगे आप(नहीं समझे तो......) वर्तमान में इलेक्ट्रोनिक मीडिया की भी हालत कुछ ऐसी ही हो गयी है..पूरी बारात है लेकिन परोसा जा रह है वही बासी भोजन. दूरदर्शन का एक अपना ज़माना था. सधी हुयी भाषा में किसइ सरकारी प्रेस विज्ञप्ति की तरह ख़बरें पढ़ दी जाती थी. धीरे धीरे परिदृश्य बदलने लगा और निजी क्षेत्र में मीडिया का पदार्पण हुआ. बुद्धू बक्सा समझदार होने लगा. अब टीवी पर ऐसी ख़बरें बोलने और दिखने लगी जिनके बारे में कभी सोचा भी नहीं गया था. एदुम से लगा कि इस देश में गरीबों और दलितों का नया मसीहा आ गया. अब सूरत बदल जाएगी. समाज का वंचित वर्ग सबकुछ पा जायेगा. देश में भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी. तानाशाह होते जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह बनेंगे. लोकतांत्रिक आधार वाला देश सांस्कृतिक दृढ़ता और परिपक्व सभ्यता के साथ प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ के और अधिक मजबूत होने का उत्सव मनायेगा. लेकिन अब के हालात कुछ अलग हैं. ख़ास तौर पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने बहुत जल्द ही एक ऐसी स्थिथि में खुद को पहुंचा लिया जिसकी उम्मीद नहीं थी. ख़बरों को हद से अधिक खींचना, बार बार एक ही ख़बर को दिखाना, गंभीर शब्दों से दूरी बनना, सनसनी के लिए तथ्यों के साथ छेड़छाड़, ख़बरों को प्रोफाइल के नज़रिए से देखना. ये सबकुछ मीडिया को बधाई से अधिक आलोचना का पात्र बनता है.
बदलते परिवेश में मीडिया से जुड़े पुरनियों को नयी सोच के साथ सामने आना होगा. समाज की अवधारणा इस देश में बदल रही है. देश राज्य में बदला, राज्य जातियों में. बात शहर से होते हुए मोहल्ले में सिमटी और अब नज़रों के दायरे से ज्यादा कुछ नहीं दिखता. मीडिया भी अगर इसी राह पर चल पड़ेगी तो क्या होगा. ख़बरों के चुनाव में इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी होता है कि वो समाज के बड़े हिस्से से जुड़ी हो. हम सब जब मॉस कॉम की पढ़ाई किया करते थे तो हमें बताया जाता था कि ख़बरों का करीबी बड़े सामाजिक दायरे से वास्ता होना चाहिए. अमेरिका में दस लोग की मौत से अधिक ज़रूरी ख़बर मोहल्ले में एक व्यक्ति के साथ हुयी दुर्घटना है. इससे अधिक जगह मिलनी चाहिए. लेकिन क्या आज मीडिया इस नियम को मानती है. आज भी भारत के गावों में लगभग ६५ फ़ीसदी आबादी रहती है लेकिन न्यूज़ चैनलों के कंटेंट से गाँव गायब हैं. गाँव गीरावं की खबरे कोट पैंट पहने एंकर नहीं बोलते हैं. पिछले साल के बाद इस साल एक बार फिर गावों में पानी कि कमी है. बारिश खूब हुयी लेकिन तब जब धान की रोपाई का वक़्त निकाल चुका था. मजबूरन खेत खाली रह गए. अब दुनिया देख रही है की दिल्ली में बारिश ही रहो है. आईटीओ डूब जा रहा है. यमुना का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है. दिल्ली में बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो गया है लेकिन देश के कई गावों में बरसात के बीच सूखे का दर्द उभर रहा है. इसे मीडिया नहीं दिखाना चाहती. गावों में भूमिगत जलस्तर तेजी से गिर रहा है. कई गावों में पीने योग्य पानी की कमी हो रही है. फसलों के लिए खाद कि कमी है. सड़कें नहीं हैं. इलाज के लिए आज भी लोग शहरों की ओर भागते हैं. पढ़ाई की कोई सुविधा नहीं है. सरकारी योजनाओं का बुरा हाल है. देश का पेट भरने वाला ग्रामीण भूखा सो रहा है. किसान कहे जाने वाले इस जीव की दास्तान टीवी के चौखटे से गाएब है. इसका ज़िम्मेदार कौन है?
देश में हिंदी मीडिया ने तेजी से तरक्की की. शुरुआत में समाज के कई रंग सामने आये. धीरे धीरे सनसनी का रंग हिंदी मीडिया पर चढ़ा और अब तो हिंदी मीडिया को बस अपना ही रंग पता है. मीडिया के शीर्ष पर बैठे लोग सोचते हैं कि वह जो दिखा रहें हैं वही सही है. जो उनका नज़रियअ है वही सबका है. यहीं से बात बिगड़ती है. एक बात और है. मीडिया के साथ- साथ मीडिया पर्सन्स की भी तरक्की हो गयी. कथित आधुनिक होने की सभी योग्यताएं उनमे आ गयीं. अब उनका अपना एक स्तातास हो गया. और जब आँखों पर ऐसा चश्मा चढ़ गया तो देश का किसान, मजदूर सब त्याज्य समझ में आने लगे.नॉएडा और दिल्ली में इलेक्ट्रोनिक न्यूज़ चैनलों में बैठे लोग स्ट्रिंगर से पूछते हैं कि मरने वाला कैसी फॅमिली का था? अगर ठीक ठाक था तो भेज दो वरना ख़बर ड्रॉप. एक गरीब कि मौत को ख़बर बनने का कोई हक नहीं है. जब तक उसे राजनीतिक भूख या सियासी चालों ने ना मारा हो.
जब तक नॉएडा और दिल्ली में बैठे पत्रकार ख़बरों में प्रोफाईल तलाशते रहेंगे तब तक ख़बरों का इस देश के आम आदमी के साथ सरोकार नहीं बन पायेगा. दिल्ली और मुम्बई के बाहर भी भारतीय रहते हैं. इस बात को समझने का वक़्त आ गया है. बासी होती ख़बरों में कुछ नया खोजना होगा. जिसमे सनसनी ना हो बस ख़बर हो.

You the Indian dog

You the Indian dog, मेरे लिए यही संबोधन था उस व्यक्ति का फेसबुक पर कश्मीर पर चर्चा के दौरान. मई हैरान था, जहाँ तक मुझे पता था, ये कहने वाला एक हिन्दुस्तानी( कश्मीरी) था. बात चल रही थी कश्मीर में उछाले जा रहे पत्थरों की तभी एकायक इस विमर्ष में जगह बना ली इस्लाम ने. मैं अकेला था इस बात को कहने वाला कि कश्मीर समस्या का हल पत्थरों से नहीं हो सकता और कई थे इस मत के पोषक की अब तो इस जन्नत को पत्थरों के सहारे ही बचाया जा सकता है...
कश्मीर के हालात पर मुझ जैसे किसी नौसिखिया पत्रकार को कुछ भी लिखने का अधिकार बुद्धजीवियों की और से नहीं दिया गया है लेकिन मै ये दुस्साहस कर रहा हूँ. भारत का कोई भी नागरिक कश्मीर को अपने दिल में रखता है. देश का आम नागरिक जो किसी पार्टी विशेष से सरोकार नहीं रखता हो या कश्मीर के प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना से ग्रसित न हो(रखने को कई लोग तो बिहार के प्रति भी दुर्भावना रखते हैं) वो यही कहेगा की कश्मीर हमारे देश का ताज है. आज आखिर ऐसा क्या हो गया की लगभग एक अरब जनता की भावना पर घाटी के कुछ लाख लोगों के पत्थर भारी पड़ गए.
सन १९४७ में मिली आज़ादी के बाद से ही कश्मीर एक ऐसी समस्या के रूप में हमारे सामने आया है जिसका पूर्ण रूप से हल किसी पार्टी के पास नहीं है या शायद कोई हल निकालना भी नहीं चाहता. स्वतंत्र के बाद राज्यों का विलय हो रहा था. इसकी कमान सरदार पटेल के जिम्मे थी लेकिन कश्मीर को नेहरु अपने हाथ में रखना चाहते थे. लिहाजा पटेल यहाँ कुछ नहीं कर सके. नेहरु ने हरि सिंह से खुद ही बातचीत की. हरि सिंह कश्मीर को आज़ाद करवाना चाह रहे थे. उन्होंने नेहरु की बात नहीं सुनी. इसी बीच पकिस्तान के पख्तून कबीले के लोगों को आगे कर पाकिस्तानी हुक्मरानों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया. हरि सिंह भाग कर नेहरु के पास आये और भारत कि सहायता मांगी. इसी समय नेहरु ने हरि सिंह से कश्मीर के भारत में विलय के इकरारनामे पर दस्तखत करवा लिए. बस यहीं से कश्मीर भारत का हिस्सा हो गया. राजनीतिक रूप से कश्मीर भले ही भारत का अंग हो गया लेकिन भावनात्मक रूप से अभी तक नहीं हो पाया है. कभी पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाने वाले शेख अब्दुल्लाह ने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में अपने लिए समर्थन कि हवा बहा रख थी. उसी का नतीजा था कि कश्मीर में धारा ३७० भी लगवा दी. कश्मीर का अलग संविधान हो गया. देश कि संसद का कोई भी कानून वहां सीधे लागू नहीं हो सकता. शेख अब्दुल्लाह अमर हो गए और लगा कि कश्मीर कि आवाम अब विकास के रथ पर सवार हो जाएगी.
इस दौरान देश में एक पूरी पीढ़ी कश्मीर में इंसान और बंदूकों के रिश्तों को परिभाषित करते प्रौढ़ हो गयी. पीछे मुड़ कर देखा तो कश्मीर में चिनार के पेड़ों से ज्यादा सड़कों पर पत्थर और आवाम में असंतोष नज़र आया. आखिर क्या वजह थी इसकी?
अपने हक की आवाज़ उठाते- उठाते कश्मीर के लोगों को पत्थर उठाने पड़ गए. देश का सबसे युवा मुख्यमंत्री जिस प्रदेश के पास हो वो सूबा एक लाइलाज बिमारी से तड़प रहा है. जबरदस्त असंतोष की भावना ने महज डेढ़ साल पुरानी उमर अब्दुलाह सरकार की आफत बुला दी है. पिछले कुछ दिनों में कश्मीर में हुए सुरक्षा बलों और नागरिकों के बीच संघर्ष में ६० लोग मारे जा चुके हैं. समस्या जस की तस बनी हुयी है. उमर अब्दुलाह दिल्ली के चक्कर लगा रहें हैं. इसी बीच प्रधानमन्त्री के आये एक बयान ने नया पेंच फंसा दिया. मनमोहन सिंह कश्मीर कि स्वायतता की बात का समर्थन कर रहें हैं. लेकिन अगर संविधान विशेषज्ञों की मानी जाये तो कश्मीर पहले से ही स्वायत है. संविधान की धारा ३७० इस बात की दुहाई देती है. इसके अलावा भी कश्मीर को केंद्र की ओर से बहुत कुछ मिलता है. इतना मिलता है जितना देश के किसी राज्य के निवासियों को नहीं मिलता. लेकिन इसके बावजूद कश्मीर में सड़कों पर पत्थर क्यों नज़र आते हैं?
कश्मीर में भले ही भारत सरकार सबसे अधिक आर्थिक योगदान देती है लेकिन वहां के लोगों को इसका फायदा नहीं मिलता. क्योंकि वहां भ्रष्टाचार चरम पर है. केंद्र सरकार की दी धनराशि क्या बेहद कम हिस्सा वहां के नागरिकों को मिलता है. राज्य सरकार के मंत्री इस धनराशि का बड़ा भाग अपने लाभ पर खर्च करते हैं. जो कुछ बच जाता है उससे केंद्र सरकार के नौकरशाह उड़नखटोले में बैठ कर कश्मीर की वादियों की सैर करते हैं, दिल्ली ले जाने के लिए सेव और पश्मीना शाल पैक कराते हैं. इसके साथ ही यह कोशिश करते हैं कि कश्मीर के साथ जुदा 'समस्या' शब्द हटने ना पाए. कश्मीर हमेशा के लिए एक समस्या के तौर पर बना रहे.
अगर वास्तविकता में केंद्र सरकार ये चाहती है कि कश्मीर का मसला हल हो तो उसे इस बात के प्रमाण देने होंगे कि उसके पास इसे लेकर एक ठोस राजनीतिक योजना है. जो सहायता कश्मीर के नागरिकों को दी जा रही है उसका समुचित हिस्सा उन तक पहुँच रहा है. इसके अलावा सरकार को ये भी कोशिश करनी चाहिए कि पडोसी मुल्क की भीख पर पलने वाले कुछ अलगाव वादियों के इशारे पर हाथों में पत्थर उठाये युवा कश्मीर को वहीँ के बुजुर्ग इस काम से रोक ले. वरना ये पत्थर एक दिन इतने अधिक हो जायेंगे जो घाटी की ओर जाने वाले हर रास्ते को बंद कर देंगे और हम इस ओर खड़े होकर सुनेंगे you indian dog.

पाकिस्तान जिंदाबाद



आपको ये शीर्षक कुछ अजीब लग सकता है. आखिर लगे भी क्यों ना, साल में महज दो बार आपको याद आता है कि आज आप स्वतंत्र हैं, आज़ाद मुल्क में रहते हैं और इस आज़ादी को पाने के लिए कुछ लोगों ने कुर्बानी दी थी........१५ अगस्त और २६ जनवरी ना आये तो आप को याद ही ना आये कि आज आप जिस खुली हवा में सांस ले रहें हैं उसके लिए कईयों कि साँसे बंद कर दी गयीं हैं. वैसे आप भी अपना फ़र्ज़ अदा करते हैं इसमें कोई दो राय नहीं.....साल में एक एक बार आने वाली इन दो तारीखों पर आप फिल्मी गीत बजाते हैं....बच्चों का शौक पूरा करने के लिए २ रूपये में तीन रंगों में रंगा हुआ कागज का एक टुकड़ा खरीदते हैं.....कई दिनों बाद अपने कुछ ख़ास रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं, थोड़ी देर आराम करते हैं, शाम को किसी बड़े से मॉल में शॉपिंग करते हैं, बाहर खाना खाते हैं और घर आकर सो जाते हैं. अब भला इससे बेहतर दिनचर्या क्या हो सकती है? अब ऐसे में कोई आपको याद दिलाये कि आज पंद्रह अगस्त है तो आप उसपर नाराज़ तो होंगे ही. अब वो आपका सामान्य ज्ञान जांच रहा है...ऐसे हालात फिलवक्त हर युवा भारतीय के हैं...उन्हें पूरे साल याद नहीं रहता कि वो एक ऐसे मुल्क में रहते हैं जिसने बाद मिन्नतों के आज़ादी पाई वो भी ऐसी जो उन्हें कुछ भी करने कि छूट देती है...हुज़ूर इस आज़ादी को तो हम सीने से लगा कर रखते हैं....लेकिन बस साल में एक दो दिन....वैसे आप को लगता है की आज हमारे देश का युवा कहीं से भी देश के साथ जुदा हुआ है...मैं अपनी बात नहीं कहूँगा वरना आप कहेंगे कि मैं अपनी बात थोप रहा हूँ.... लेकिन साल भर 'पे पैकज' और इलेक्ट्रोनिक गजेट पर समय देना वाला युवा आज़ादी मुल्क कि खुली हवा में फैली एक अजीब सी कशिश का एहसास नहीं कर पा रहा है....आज हम सब अपना अपना सपना बुनते हैं और उसे पूरा करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं लेकिन 'freedom at midnight' को अपनी आँखों से देखने वाली पीढी के सपने पूरे हुए या नहीं इसकी फिक्र कौन करता है....
फेसबुक पर उधार का चेहरा ओढ़े और ट्विट्टर पर ट्विटीयाती पीढी के लिए आज़ादी के मायने बदल चुके हैं...... आज आज़ादी का मतलब नितांत व्यक्तिगत हो चला है....खुद का घर हर सुख सुविधा से संपन्न हो यही है हमारी आज़ाद खयाली ...
भारत जैसे देश के लिए आज़ादी सही अर्थों में क्या है इसका भान हमें तभी होता है जब इंडियन क्रिकेट टीम पाकिस्तान के साथ मैच खेलती है या फिर पाक से लगी हमारी सरहद पर तनाव बढ़ जाता है...तब हमें एहसास होता कि हम आज़ाद हैं और कोई हमारी आजादी पर खतरा बन रहा है...तब कहीं जाकर हमारी आँखों के सामने से वो मंजर गुजरते हैं जो हमें याद दिलाते हैं कि ज़मी के इस टुकड़े के साथ कितने जज़्बात अपनी हिस्सेदारी रखते हैं...क्या होती है वो सौगात जिसे हम आजादी कहते हैं....हमें शुक्रिया करना चाहिए इस पाकिस्तान का जो रह रह कर हमें १५ अगस्त और २६ जनवरी के अलावा भी आज़ाद होने का मतलब बताता तो फिर क्यों ना बोले हम पाकिस्तान जिंदाबाद....

गुरु, ई मीडिया वाले त.......

गुरु ई मीडिया वाले त पगला गैयल हववन....धोनिया के बिआयेह का समाचार कल रतिए से पेलले हववन और सबेरे तक वही दिखावत हववन...जब तक एकरे एक दू ठे बच्चा ना पैदा हो जैईहें लगत हव तब तक दिखवाते रहियें....इनकी माँ कि ...........
यह वो सहज प्रतिक्रिया थी जो मुझे अपने शहर बनारस में एक चाय की दुकान पर चुस्कियों के बीच सुनायी दी थी..यकीन जानिए मैंने बिल्कुल भी इस बात का खुलासा वहां नहीं किया था कि मैं भी इसी खेत में पिछले पांच सालों से 'उखाड़' रहा हूँ.....अगर मेरे मुहं से ये तथ्य गलती से भी निकल कर बाहर आ गया होता तो आप समझ सकते हैं कि मेरी बारे में वहां क्या क्या कहा जाता? वैसे एक बात जगजाहिर है कि बनारसी पैदा होते ही बुद्धजीवियों की कोटि में आ खड़े होते हैं....नुक्कड़ की चाय और पान की दुकाने इन बुद्धजीवियों के पाए जाने का केंद्र होती हैं और अगर आप उस दुकान के इर्द गिर्द बहने वाली हवा के विपरीत जाते हैं तो आप से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं होगा....हाँ अगर आपको अपनी बात कहने का बहुत शौक है तो बनारसी अंदाज़ में कहिये, शायद कोई सुन भी ले..वरना पढ़े लिखे लोगों की तरह तथ्यात्मक ज्ञान देने लेगे तो आप लौंडों में शुमार हो जायेंगे..खैर, हाथ में पुरवा, पुरवे में चाय और चाय में रोजी रोटी देने वाले काम को लेकर की गयी प्रतिक्रिया सुनने के बाद उठा तूफ़ान, कुल मिलाकर मामला गंभीर था....लिहाजा निकल लेने में ही भलाई थी....
वैसे जो कुछ भी चाय कि दुकान पर कहा गया उसमे कुछ ज्यादा गलत नहीं था....मीडिया को लेकर आम आदमी यही राय रखता है.....इस देश में जहाँ उत्तर भारत के किसान मानसून की बेरुखी से धान की रुपाई को लेकर चिंतित हैं वहीँ मीडिया वाले मुम्बई में होने वाली बारिश को ही फोकस किये हुए हैं मानो देश में बारिश तो बस मुम्बई में ही होती है....
यकीनन धोनी इस देश में धर्मं की तरह माने जाने वाले खेल क्रिकेट में एक बड़ा नाम है पर आम इंसान से बड़ा नहीं हो सकता ....मीडिया ने धोनी जैसे कई लोगों को को अपने ग्लैमर को ध्यान में रखकर बेहद उच्च कोटि का बना दिया है वो भी उनके सामजिक योगदान के बारे में विमर्ष किये बगैर......अक्सर मीडिया के हाथों में ऐसी ख़बरें होती हैं जो देश कि तकदीर से जुड़ी होती हैं पर उनकी तस्वीर अच्छी नहीं लगती लिहाजा उनकी न्यूज़ वैल्यू कम करके आंकी जाती है.....ख़ास तौर पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने जब से ख़बरों का प्रोफाइल देखना शुरू किया तब से ऐसे हालात सामने आते हैं... मीडिया में कंटेंट डिसाईड करने वालों से आखिर यह कौन पूछेगा कि किस आधार पर कंटेंट तय करते हैं? अब धोनी कि शादी होनी थी सो हुयी लेकिन बिन बुलाये बाराती कि तरह यूं नाचना क्या मीडिया को शोभा देता है ? आखिर कोई गंभीरता भी है या नहीं...ना जाने क्यों मीडिया पूरे देश को एक निगाह से नहीं देख पा रही है....तमाम बड़ी समस्याओं को दरकिनार कर कुछ ख़ास स्थानों और वर्ग की ही ख़बरें दिखाई जाती हैं....या पूरे दिन की ख़बरों में ऐसी ख़बरों का कंटेंट अधिक होता है......आम आदमी महंगाई से मर रहा है...पीने का पानी, बिजली, सड़क जैसी मूलभूत समस्याएँ हैं पर मीडिया मुम्बई की बारिश में नालों का पानी नाप रही है और धोनी कि शादी में प्लेट्स गिन रही है ....अब ऐसे में बनारसियों का गुस्सा फूटे ना तो क्यों? वैसे चाय कि दुकान पर मीडिया के लिए इतने ही आशीर्वचन नहीं कहे गए थे..और भी बहुत कुछ था...वह आपको यहाँ लिख कर नहीं बता सकता...जानना हो तो एक बार चले आईये बनारस ...
हर हर महादेव............

क्योंकि ख़्वाब देखने का कोई वक़्त नहीं होता.....


क्या सपने देखने के लिए भी कोई वक़्त तय किया जा सकता है....सोचता हूँ लोग क्यों कहते हैं कि ये दिन में सपने देखता है? क्या सपने महज रातों में देखे जाने चाहिए? क्या सपने देखने के लिए जगह भी ठीक ठाक होनी चाहिए? कहीं भी कभी भी सपने देखने में क्या बुराई है?
पता नहीं लेकिन जब से सपने देखने शुरू किया है तभी से यह सुनता रहा हूँ कि सपने देखने का एक वक़्त होता है...हर समय सपने नहीं देखे जाते...मुझे लगता है कि ये बातें तब कहीं गयी होंगी जब लोग किसी ख़ास समय पर सपने देखते होंगे और एक मुख़्तसर वक़्त उन्हें हकीकत में बदलने के लिए मुक़र्रर करते होंगे....लेकिन पवन से भी तेज इस मस्तिष्क में एक सवाल यहाँ और आता है कि क्या उनके सपने इतने छोटे हुआ करते थे कि किसी ख़ास वक़्त में देखे जाएँ और किसी ख़ास समय में उन्हें पूरा कर लिया जाये....और अगर पूरे नहीं हो पाए तो क्या? सपने ही नहीं देखते थे....? एक और सवाल मन में आ जाता है कि वो सपने कब देखते होंगे? जहाँ तक मुझे पता चला है वो वक़्त रात का था....लीजिये अब एक सवाल और आ गया मन में कि लोग रात को ही सपने क्यों देखते थे? क्या दिन में किसी का डर था? नहीं, शायद रात को भीड़- भाड़ कम रहती है, शोर कम रहता है इसीलिए रात को सपने देखते होंगे....लेकिन एक सवाल मन में फिर आ गया कि सपनो का भीड़-भाड़ और शोर से क्या लेना देना? समझ में नहीं आता कि क्या सोचकर कहा गया कि हर वक़्त सपने मत देखने लग जाया करो...सपने देखने के लिए अच्छी जगह तलाश लिए करो...जहाँ साफ़ सफाई हो....बैठने की अच्छी जगह हो वहीँ सपने देखा करो....
अब आप ही सोचिए कि अगर इंसान इन बंदिशों में बंधकर सपने देखेगा तो सपनो का क्या होगा.....अरे सपने तो जब चाहें तब देखे जा सकते हैं....जगह, समय देख कर ना तो आँखों में सपने आते हैं और ना तो उन्हें पलकों पर बैठाया जा सकता है.....सपने तो बस आँखों में आ जातें हैं या यूं कहें की आँखों में रौशनी इन्ही सपनो की बदौलत होती है....मेरी तरह आपने भी कई बार किसी सपने को देख आँखों में चमक महसूस की होगी.....इन सपनो को आहिस्ता आहिस्ता जवाँ करना पड़ता है..किसी छोटे बच्चे की मानिंद....इसके बाद ये ख़्वाब हो जाते हैं...दिन रात इन ख़्वाब में जीना कितना सुकून देता है....हर घड़ी इन ख़्वाबों की तस्वीर आँखों पर छायी रहती है....और
जब आँखों में ख़्वाब होंगे तो दिल में हौसला खुद- ब -खुद आ जाता है...वही हौसला जो इन ख़्वाबों को पूरा करने का जुनून आप में पैदा करता है.....और जब आँखों में कुछ कर गुजरने का ख़्वाब, दिल में हौसला और खून में जुनून हो तो वहीँ से शुरू होती है ज़िन्दगी......इसलिए मेरे यारों जितने हो सके उतने ख़्वाब देखो....जब चाहें तब देखो.....जहाँ चाहे वहां देखो क्योंकि ख़्वाब देखने का कोई वक़्त नहीं होता..........

गाँधी को समझे अरुंधती..............





क्या आपको याद है कि वर्ष २००४ में सिडनी शांति पुरस्कार किसे मिला था? नहीं याद है तो हम याद दिला देते हैं ..ये पुरस्कार मिला था अरुंधती रॉय को....कितनी अजीब बात है ना! कभी अपने अहिंसात्मक कार्यों के लिए इतने बड़े सम्मान से नवाजे जाने वाली महिला आज उसी अहिंसा को नौटंकी के समकक्ष रखने पर तुली है.....मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान अरुंधती रॉय ने कहा था कि 'गांधीवाद को दर्शकों की ज़रुरत होती है'...ये एक पंक्ति ही काफी है कि हम अरुंधती रॉय की मनोदशा के बारे में समझ सके....अरुंधती रॉय के गाँधी के विचारों के प्रति क्या नजरिया है ये भी आसानी से समझा जा सकता है....जिस तरीके से अरुंधती रॉय ने मावोवादियों के समर्थन में अपने सुर अलापे हैं उसका निहितार्थ देश की वर्तमान राजनीतिक और सामजिक व्यवस्था से परे है.....
आज देश में आतंरिक सुरक्षा को लेकर जो सबसे बड़ा खतरा है वो है नक्सालियों और मावोवादियों से और इस बात को आम आदमी से लेकर ख़ास तक जानता है तो क्या इसे अरुंधती रॉय नहीं समझ रही हैं....दंतेवाडा में सुरक्षा बलों पर हमले के बाद जिस तरीके से झारग्राम में ट्रेन को निशाना बनाया गया उसे देखकर क्या कोई भी शख्स इनका समर्थन कर सकता है?
यकीनी तौर पर यह कहा जा सकता है कि देश में हमेशा शांति नहीं रह सकती..और तब तो और जब संसाधनों का बंटवारा समान रूप से ना हुआ हो और उसका उपयोग वो समाज ना कर पा रहा हो जिसने उन संसाधनों को सुरक्षित रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो....नक्सलबाड़ी से जब एक आवाज़ उठी तो वो अपने अधिकारों की बात कर रही थी....उसका मकसद एक ऐसे अहिंसात्मक आन्दोलन को खड़ा करना था जो समता मूलक समाज की अवधारणा से प्रेरित था......लेकिन राजनीतिक नेतृत्व से भटकाव इस आन्दोलन को एक ऐसे मोड़ पर ले आया जहाँ इसका विरोध इसके अपने ही करने लगे.....यहीं से शुरू हो चुकी थी एक ऐसी जद्दोजहद जहाँ अपने को सही साबित तो करना ही था साथ ही अपना हक भी लेना था लेकिन राजनीतिक नेतृत्व से समन्वय ना हो पाना दुखद साबित हो रहा था....नक्सल वाद का समर्थन करने वालों को लगा कि अहिंसात्मक आन्दोलन से कुछ हासिल नहीं होने वाला लिहाजा बंदूकों का इंतज़ाम होने लगा....देश के जंगलों में जहाँ कभी माहौल खुशनुमा रहता था वहां की हवा में बारूद कि महक घुल गयी...बूटों की आवाजें आने लगी....इन बूटों की आवाजों के नीचे गाँधी की अहिंसात्मक सोच कराह रही थी... अभी तक अपना हक मांग कर अपनी ज़िन्दगी खुशहाल बनाने की सोच रखने वाले अब दूसरों की ज़िन्दगी को दुखों से भर रहे थे.....हैरानी की बात थी कि मर्ज़ बढ़ रहा था और सरकार इस बात पर सोच विचार कर रही थी कि ये रोग कितना फ़ैल सकता है? रोग को फैलना था सो फैला और सरकारें आती जाती रहीं....इसी दौरान इसी भारत में एक ऐसा वर्ग भी बन गया जो इस रोग के समर्थन में आ रहा था....
जहाँ तक मुझे मालूम है अरुंधती रॉय ने अपने जीवन में एक ही उपन्यास लिखा है ( और लिखा हो कृपा करके बताएं क्योंकि मेरा अंग्रेजी उपन्यासों का ज्ञान शून्य है) ...एक उपन्यास लिख कर अरुंधती जी आज देश में बुद्धजीवी वर्ग का चेहरा हैं....ये वर्ग जब अंग्रेजी में कुछ कहता है तो वह बेहद गंभीर बात हो जाती है...
इसी बीच ये बात भी जाहिर हो गयी कि लम्बे समय तक निराशा और हताशा के बाद अहिंसा, हिंसा की ओर बढ़ने लगी......ऐसे में कोई हैरानी नहीं हुयी कि देश के बुद्धजीवी वर्ग का नमूना मानी जाने वाली अरुंधती रॉय ने इस खून खराबे का समर्थन किया.... वैसे अरुंधती रॉय जैसे लोग हमारे देश में अब बहुतायत में पाए जाते हैं....ये भारत को 'इण्डिया' कहते हैं इसीलिए ये 'एलीट' वर्ग के हो चले हैं....भारत को जो लोग भारत कहते हैं वह निम्न हैं और जो इसे' भारत माता' कह दे वो तो निम्नतर हो जाते हैं.....अरुंधती रॉय जब मावोवादियों के साथ जंगल में गयी तो उन्हें पता चला कि ऐसी समस्याओं का हल गाँधी के अहिंसात्मक नज़रिए से नहीं हो सकता....जहाँ तक मुझे लगता है अरुंधती रॉय के विचारों में आया ये त्वरित परिवर्तन किसी ऐसे व्यक्ति के लिहाज से बिल्कुल उचित था जो वातानुकूलित कमरों और गाड़ियों का आदि हो चला हो और अति उत्साह में उसे कुछ गर्म जंगलों में पैदल घूमते हुए जंगली कीड़ों के बीच बिताना पड़े...पर इस सब के बीच दुःख इस बात का हुआ कि सुश्री रॉय ने गाँधी की अहिंसात्मक सोच पर प्रश्नचिंह लगा दिया....दरअसल वो भूल गयी कि जिन आदिवासियों के बारे में उन्होंने अब जाकर सोचना शुरू किया है उनके बारें में गाँधी ने लगभग सौ वर्ष पूर्व ही सोच लिया था....हाँ ये बात और है कि तब ये महज आदिवासी थे, नक्सली या मावोवादी नहीं.....गाँधी ने कभी भी जंगलों और आदिवासियों को अलग करने की बात नहीं कही....बल्कि उन्होंने रस्किन के उस अवधारणा का कि, श्रम की वास्तविकता से अलग हुआ असमान सामजिक जीवन अहिंसा की सम्भावना को आगे नहीं बढ़ने देता है, का हमेशा समर्थन किया...स्पष्ट है कि गाँधी जी इस बात को समझते थे कि यदि देश में असमान विकास हुआ तो वंचित लोग अहिंसा का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं....लिहाजा उन्होंने हमेशा एकरूप सामाजिक ढांचे का समर्थन किया.....गाँधी जी के अहिंसात्मक आंदोलनों को निष्क्रिय समझने वाले भी भूल करते हैं....हालाँकि शुरूआती दौर में किये गए आन्दोलन ज़रूर कमजोर थे लेकिन इस बात से प्रेरणा लेते हुए स्वयं गाँधी ने अपने आंदोलनों को सक्रिय रूप दिया...इसी के बाद सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ...गाँधी जी और तत्कालीन राजनीतिक विशेषज्ञों ने इसे बन्दूक की बदौलत बुलंद की गयी विरोध की आवाज़ से अधिक प्रभावशाली माना था....सविनय अवज्ञा आन्दोलन की अवधारणा अन्याय के खिलाफ सक्रिय विरोध का सुझाव देती है.... इस अवधारणा में कानून के प्रति गहन सम्मान भी निहित था....अरुंधती रॉय के साथ वाला बुद्धजीवी वर्ग आज जिस गाँधी को नक्सली समस्या के आईने में गलत साबित कर रहा है उसी गाँधी ने शहरों के विकास को गलत माना था...ख़ास तौर पर भारत जैसे देश के लिए उन्होंने शहरों को अशुभ बताया था.....अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज्य' में गाँधी जी ने निर्धनता और आधुनिक सभ्यता के 'पाप' के लिए प्रौद्योगिकी और उद्योगीकरण को जिम्मेदार ठहराया था....ऐसे में गांधी ना तो आदिवासियों के विरोधी हो सकते हैं और ना ही उनके अधिकारों के फिर जंगलों में रहने वाले इन लोगों को गाँधी के रास्ते पर चलकर मंजिल क्यों नही मिल सकती....? दरअसल इस देश में गाँधी की तस्वीर को दीवारों पर छिपकलियों के लिए टांग दिया जाता.....समय समय पर अरुंधती रॉय जैसा बुद्धजीवी वर्ग छिपकलियों के साथ गाँधी को भी गाली दे देता है....आज ज़रुरत इस बात कि है गाँधी के नज़रिए को वर्तमान परिपेक्ष्य में समझा जाये और देश को असमान विकास से एक समान विकास की ओर ले जाया जाये....और मेरी एक छोटी सी सलाह और है कि शहरी लोगों को जंगलों में ना जाने दिया जाये.......
हे राम..!

बंधे धागे खोल दो....


ना जाने किस पीर की दरगाह पर
कुछ कच्चे धागे बांध आया था मैं
किस वाली के
दरबार में
हथेलियाँ जोड़
मन्नत मांगी थी मैंने
गुलाबों की चादर से आती खुशबू
और
जलती अगरबत्तियों के धुएं के बीच
कुछ बुदबुदाया था मैंने
किसी मंदिर की चौखट पर
सिर झुकाया था मैंने
हाथों से घण्टियों को हिलाकर
अपने ही इर्द गिर्द घूम कर
कुछ तो मनाया था मैंने
तपती धूप में शायद किसी
साये की आस की थी मैंने
या फिर तेज़ बारिश में
ठौर की तलाश की थी मैंने
या कभी यूँ ही सुनसान राहों पर
चलते हुए
किसी साथी की ज़रुरत महसूस हुयी थी
तभी तो मुझे 'तुम' मिले हो
शायद अब वक़्त गया है
दरगाह पर बंधे धागों को खोलने का ...............

शुक्र है! ये कौम मुर्दा नहीं....


देश में लोकतंत्र बेहद मजबूत हो गया है लेकिन लोगों की बातें इस तंत्र में नहीं सुनी जाती....लोग बोलते बोलते थक चुके हैं और अब तो मुर्दई ख़ामोशी ओढ़ कर चुप बैठे हैं.....लोकतंत्र का उत्सव मनाया जाता है लेकिन शवों के साथ....कौम सांस लेती तो है लेकिन है मुर्दा...ऐसे में तसल्ली देती है एक मुहिम...अपने अधिकारों की भीख मांग- मांग कर थक चुके बच्चों ने अब वादाई कफ़न उतार दिया है और एक जिंदा कौम की तरह इंतज़ार नहीं करना चाहते....अब वो अपनी राह खुद बना रहें हैं...मंजिलें उन्हें मालूम है और सहारा उन्हें चाहिए नहीं......मैं बात कर रहा हूँ वाराणसी में बनाई गयी दुनिया कि पहली और अभी तक एकमात्र निर्वाचित बाल संसद की....
ये बाल संसद समाज के उस तबके के बच्चों की आवाज बुलंद कर रही है जहाँ तक किसी भी सरकार की योजनायें अपनी पहुँच नहीं बना पाती....इस संसद का गठन दो वर्षों पूर्व वाराणसी की एक स्वयं सेवी संस्था विशाल भारत संस्थान ने किया था ......हालाँकि अब ये संसद अपने तरीके से काम कर रही है...विशाल भारत संस्थान मुख्य रूप से समाज के गरीब तबके के बच्चों के लिए काम करती है...कूड़ा बीनने वाले और गरीब बुनकरों के हितों के ध्यान में रखकर इस बाल संसद का गठन किया गया....साथ ही इस बात की कोशिश भी है कि देश में महज नेहरु गाँधी परिवार के बच्चों का ही राजनीति का पेटेंट ना कराने दिया जाये.....( ये मेरी अपनी सोच है ).....इस बाल संसद में छः से तेरह साल के बच्चे बाल सांसद का चुनाव लड़ सकते हैं...बाल सांसद का चुनाव लड़ने के लिए बाकायदा एक आचार संहिता भी बनाई गयी है ताकि अभी से इन बच्चों को दागी और साफ़ सुथरी छवि का अंतर स्पष्ट हो जाये...इस आचार संहिता के मुताबिक प्रत्याशी की छवि दागदार नहीं होनी चाहिए मसलन वो स्कूल से जी ना चुराता हो, अध्यापकों की इज्ज़त करता हो, चोरी ना करता हो आदि....साथ ही प्रत्याशी देश के प्रति वफादार हो, जात पात में विश्वास ना करता हो, निम्न और गरीब तबके के बच्चों से प्रेम भाव रखता हो....आमतौर पर ये बातें हमारी बड़ी वाली संसद में चुने लोगों पर लागू नहीं हो पाती...
बाल संसद के चुनाव के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है....नामांकन हो चुका है और चार जून को मत डाले जायेंगे..परिणाम इग्यारह जून को घोषित किये जायेंगे....चुनाव के लिहाज से इस बार वाराणसी को छः बाल संसदीय क्षेत्रों में बांटा गया है....यानि कुल छः बाल सांसद और एक अध्यक्ष या स्पीकर चुना जायेगा.....अगर आप सोच रहें है ये बच्चे खिलवाड़ कर रहें हैं तो आप गलत हैं...क्योंकि इस देश के लोकतंत्र के साथ बड़ो ने जैसा खिलवाड़ किया है ये बच्चे ऐसा कुछ नहीं करने जा रहे हैं.....हमारी और आपकी वज़ह से इस देश की हालत ये है कि अब 'शरीफ' घरों के लोग चुनावों में वोट डालने नहीं जाते ...लेकिन जब कभी ट्रेन में राजनीतिज्ञों को गाली देने मौका मिलता है तो अपना पूरा गाली ज्ञान उड़ेल देते हैं.... इस बाल संसद में ऐसा कुछ नहीं होता ......इस बार के चुनावों में कुल चार बच्चा पार्टियाँ संगठित रूप से चुनाव लड़ रहीं हैं इसके साथ कई निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव में हैं...स्पीकर पद के लिए तो छः साल के अमन ने अपनी दावेदारी पेश की है....नामांकन पत्र में प्रत्याशियों को अपनी संपत्ति जैसे स्कूल बैग, साईकिल खेलकूद के सामानों की भी जानकारी देनी थी...नामांकन करने वालों को पांच रूपये की जमानत राशि भी जमा करनी पड़ी है...हार जाने पर ये जमानत राशि जब्त कर ली जाएगी....प्रत्याशी किसी वोटर को टॉफी, बिस्कुट का लालच भी नहीं दे सकते हैं और चुनाव से बारह घंटे पहले उन्हें अपना चुनाव प्रचार बंद करना होगा...साथ ही चुनाव में खर्च की गयी राशि का हिसाब भी उन्हें चुनाव के बाद देना होगा...इन कठिन नियमो के मानने के बाद कुल मिलाकर इक्कीस दावेदार हैं मैदान में..इनके भाग्य का फैसला करने के लिए बाल मतदाता भी हैं...वाराणसी में कुल मिलाकर ३६२६ नन्हे वोटर हैं जो अपने पसंदीदा प्रत्याशी का चुनाव करेंगे....इनमे से १२९४ लड़कियां हैं जबकि २३३२ लड़के हैं....प्रत्याशियों के चुनावी मुद्दे भी इस चुनाव का बेहद अहम हिस्सा हैं....उदहारण के तौर पर कोई बाल मजदूरी और बच्चों की शिक्षा के लिए लड़ रहा है तो कोई फीस वृद्धि और पर्यावरण को मुद्दा बनाये हुए है....
इस बार बाल संसद का दूसरा चुनाव हो रहा है और शत प्रतिशत वोटिंग के लिए एक नायाब नुस्खा निकाला गया है....दो पोलिंग बूथ तो बनाये ही गए हैं इसके अलावा एक मोबाइल बूथ का भी इंतज़ाम किया गया है....ये पहली बार है जब देश में मोबाइल बूथ का इस्तेमाल किया जा रहा है...शायद देश में चुनाव कराने वाले बच्चों के इस प्रयास से कुछ सीख ले...ये मोबाइल बूथ विभिन्न इलाकों में जाकर बाल वोटर्स के मत एकत्र करेगा....यही नहीं चुनावों की सुचिता बनाये रखने के लिए चिल्ड्रेन सिक्यूरिटी फोर्स यानि बाल सुरक्षा बाल या सी.एस.ऍफ़. की टुकड़ी भी तैनात रहेगी....जो इस बात की तसल्ली करेगी कि कहीं से भी आचार संहिता का उल्लंघन ना होने पाए...
बाल संसद के लिए पड़ने वाले मतों के हिसाब किताब के बाद परिणाम आने में अभी इग्यारह जून तक का इंतज़ार है लेकिन तब तक हम और आप ये सोच सकते हैं कि आखिर इस देश में बाल संसद जैसी सामानांतर लोकतान्त्रिक प्रणाली की आवश्यकता क्यों पड़ी? आखिर क्या वज़ह थी कि कूड़ा बीनने वाले बच्चों को अपना भाग्य लिखने के लिए अपनी कलम उठाने की ज़रुरत आन पड़ी? इस बारे में देश के भाग्यविधातायों को सोचना चाहिए...वैसे तसल्ली है कि देश के वंचित वर्ग ने अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए पूर्णरूप से लोकतान्त्रिक रास्ता अख्तियार किया है और पांच साल तक इंतज़ार करने वाली एक मुर्दा कौम से खुद को अलग साबित भी कर दिया........

सर, कोई जुगाड़ है ?

देश में मानसून का इंतज़ार हो रहा है..सब कह रहें हैं की मानसून इस बार अच्छा आएगा, सब इसलिए कह रहें हैं क्योंकि मौसम विभाग कह रहा है... वैसे मौसम विभाग गाहे बगाहे यह भी कह देता है की हो सकता है की कुछ गड़बड़ हो जाये...खैर, भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणियों पर यकीन करना किसी कचहरी में बैठे तोता गुरु की बातो पर भरोसा करने सरीखा ही है.....वैसे हर साल मानसून में एक और बारिश भी होती है वह है पत्रकारों की बारिश.....हर साल देश के विश्विद्यालयों से सैंकड़ो पत्रकार निकलते हैं( मैं भी कभी इसी तरह निकला था) बारिश के मौसम में निकलते हैं लिहाजा इनमे से कुछ बरसाती मेढ़क की तरह होते है....
जबसे देश में मीडिया ने अपने पाँव औरों की चादर में डालने शुरू किये तब से विश्विद्यालयों में हर साल ये बारिश अच्छी होती है...सबसे बड़ी बात की इसमें मौसम विभाग की एक नहीं सुनी जाती.....वैसे आप अंदाज़ लगा सकते हैं की अगर हर साल सैंकड़ो की संख्या में पत्रकार निकलते हैं तो देश का लोकतंत्र कितना मजबूत हो रहा होगा लेकिन आपको यहीं रोकता हूँ ....ये ज़रूरी नहीं है की पत्रकार बन जाने के बाद कोई पत्रकरिता भी करे ..अब आप कहेंगे की यह क्या बात हुयी.....जब कोई पत्रकारिता करेगा तभी तो पत्रकार कहलायेगा ...जी नहीं बिलकुल नहीं अगर आप इस मुगालते में हैं तो अपना सिर किसी पत्थर पर दे मारिये (अपने रिस्क पर)....कभी बनारस आये हैं आप ? एक बार आ जाइये ..यहाँ आप को सड़क पर दौड़ते हर दो पहिया वाहन में से दूसरे वाहन पर प्रेस लिखा मिलेगा.....उसपर सवार युवक यूं अकड़ कर बैठेंगे मानो अभी अभी माफिया दाउद का साक्षात्कार कर के आ रहें हो और अब कसाब का करने जा रहें हो....इनके जलवे को देखकर आप कह ही नहीं सकते की ये पत्रकार नहीं हैं....हालाँकि किसी पोलिसे वाले की मजाल नहीं होती की इन्हें रोक ले लेकिन अगर रोक कर वाहन के कागज़ मांग भी लिए तो उससे पहले ये अपना परिचय पत्र दिखा देते हैं ...अब आप बताइए की क्या पत्रकार, पत्रकारिता करे, ये ज़रूरी है ?
छोड़िये हम बात कर रहे थे पत्रकारों की सालाना बारिश की....देश के विश्वविद्यालयों से निकलने वाले इन तमाम छात्रों की आँखों में एक सुनहरा सपना होता है की वह अब पत्रकार बन कर अपनी जीविका चला लेंगे..आमतौर पर ऐसे नौसिखिये पत्रकार अख़बारों में जाते हैं....जो कोई किसी बड़े नामचीन अखबार में पहुँच गए वो तो कुछ दिनों के लिए इस क्षेत्र में बने रहेंगे लेकिन जो बेचारे किसी भयंकर अखबार में पहुँच गए तो समझिये की उनका बेडा गर्क....बेचारे अपनी गाड़ी में अपने पैसे का तेल भरा कर रिपोर्टिंग करेंगे....एक्का दुक्का विज्ञापन भी लायेंगे ..अपना दिन भर का समय देंगे लेकिन पैसा नहीं पाएंगे......पाएंगे तो सिर्फ एक परिचय पत्र जो उनके दिल को ये बताएगा की लो अब तुम भी पत्रकार बिरादरी के सदस्य हो गए हो...लेकिन कुछ दिनों बाद जब घर वाले ताना मारना शुरू करेंगे तो समझ लीजिये की पत्रकारिता तेल लेने चली गयी.....प्रिंट ही नहीं इलेक्ट्रोनिक मीडिया में भी यही हाल है...यहाँ तो स्ट्रिंगर अपना स्ट्रिंगर रखता है...डिग्री लेकर निकलने वाले बच्चे जब पुरनियों से संपर्क करते हैं तो पुरनिये उनसे फटाफट कैमरा, माईक और मोटर साइकिल का इंतज़ाम करने की सलाह दे देते हैं...फिर काम सिखने की लिए अपनी ख़बरों पर भेजना शुरू करते हैं...यानि यहाँ भी वही हालात...अपनी गाड़ी, अपना तेल, अपना कैमरा, अपना माईक, अपनी मेहनत लेकिन काम दूसरे का, नाम दूसरे का.....जब स्ट्रिंगर अपना स्ट्रिंगर रखेगा तो क्या होगा आप समझ सकते हैं....ऐसे में जो बचे रह गए वो कुछ दिन चल जायेंगे वरना ज्यादातर भाग जायेंगे....
वैसे जितने लोग डिग्री ले कर निकले वह इस क्षेत्र में आये ही ये भी ज़रूरी नहीं है....अधिकतर तो पहले ही कहीं कुछ और की तलाश में लग जाते हैं...कुछ एक हिम्मत करके इस मैदान में उतरते भी हैं तो ऐसी परेशानियाँ उन्हें भागने के लिए विवश करती है.....लिहाजा कईयों को अपने फैसले पर फिर से मंथन करना पड़ता है...
मीडिया पिछले कुछ सालों में बेहद व्यापक हुयी है लेकिन इसके बाद भी मीडिया की मुख्य धारा में पहुँच कर कार्य करने के लिए कोई सिस्टम नहीं है...कोई कहीं से भी आ सकता है...ऐसे में जुगाड़ तंत्र हावी होने लगता है..... जिसका जितना अच्छा जुगाड़ होगा उसको उतना भाव मिलेगा....इसके साथ ही पत्रकारिता में ऐसे लोग आ जाते हैं जो इसके प्रसार और ग्लैमर को देख कर प्रभावित होते हैं....जिनको पत्रकारिता नहीं भी करनी होती वो भी जुगाड़ देख कर इस क्षेत्र में आ जाते हैं.....लेकिन इनसे इस क्षेत्र को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला.....और हावी होते जुगाड़ तंत्र का ही परिणाम है की यूनिवर्सिटी कैम्पस से बाहर निकलते स्टुडेंट बस यही पूछते हैं की सर, कोई जुगाड़ है ?
वैसे इस बार मानसून अच्छा आएगा इसकी पूरी उम्मीद है लेकिन सूखी धरती की प्यास बुझेगी इसकी कोई उम्मीद नहीं है.......

भाग जाओ, नक्सली आ रहें हैं......

१९ मई को राहुल गाँधी की उत्तर प्रदेश के अहरौरा में सभा चल रही थी..उसी समय मेरे एक पत्रकार मित्र ने फ़ोन किया और कहा कि देश का पर्यटन मंत्री आपके करीब पहुंचा है आप वहां है कि नहीं ? मैंने राहुल गाँधी के लिए यह संबोधन पहली बार सुना था...मुझे क्षण भर में ही विश्वास हो गया कि मेरा कमजोर राजनीतिक ज्ञान अब शुन्य हो चला है...मैंने अपने मित्र से पूछा कि भाई यह राहुल गाँधी ने पर्यटन मंत्रालय कब संभाला? सवाल का अंत हुआ ही था कि जवाब शुरू हो गया मानो मित्र महोदय सवाल के लिए पहले ही से तैयार थे....खैर एक अखबार में कार्यकारी संपादक का पद संभाल रहे मित्र ने बताया कि उन्होंने राहुल गाँधी का यह पद स्वयं सृजन किया है...क्योंकि राहुल गाँधी पूरे देश के पर्यटन पर ही रहते हैं....लिहाजा उनके लिए इससे अच्छा मंत्रालय और क्या हो सकता है....मैं मित्र के तर्क से सहमत हो रहा था...अब तो मैं मित्र की बात आगे बढा रहा था..लगे हाथ मैंने राहुल को पर्यटन मंत्री नहीं बल्कि स्वयंभू पर्यटन मंत्री का दर्जा दे दिया....
वैसे मेरी इस बात से हाथ का साथ देने वाले खुश नहीं होंगे लेकिन कमल और हाथी के सवारों को बोलने का मौका मिलेगा....राहुल गाँधी का अहरौरा दौरा वाकई शानदार रहा...मैं वहां गया तो नहीं लेकिन जो लोग गए थे उन्होंने भीड़ के लिहाज से इस दौरे को सफल बताया.....अपने पूरे भाषण में राहुल ने कहीं भी इलाके में नक्सल आतंक के बारे में बातचीत नहीं की ...मतलब साफ़ था ....राहुल उस दाग को अपने सफ़ेद कुरते पैजामे पर लगने देने से बच रहे थे जिसे देश पर लम्बे समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी ने दिया था...सोनभद्र के जंगलों में नक्सल की पौध जिस कमजोर राजनीति ने उगाई राहुल उसी राजनीति की नयी पौध लगते हैं.....आखिर क्या कारण था की राहुल इस ज्वलंत मुद्दे पर ख़ामोशी की चादर ओढ़े रहे.......
मैं यहाँ राहुल के अहरौरा दौरे के सहारे महज कांग्रेस सरकार की नक्सल और माओवाद जैसी समस्याओं पर नीतियों की ओरे इशारा करना चाहता हूँ....जिस तरीके से नक्सलियों ने पश्चिमी मिदनापुर में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को निशाना बनाया उससे तो यही लगता है की इस देश में सरकार का खौफ इन दहशतगर्दो को नहीं है......देश में नक्सल वाद किस कदर अपनी पहुँच बढ़ा चुका है उसकी एक छोटी सी झलक दिखाने के लिए आपको एक ख़बर से रूबरू कराता हूँ.....मिदनापुर में रेल को निशाना बनाया गया और वाराणसी में पिछले दो दशकों से देश के इन दुश्मनों को कारतूस पहुँचाने वाला एक व्यक्ति पुलिस की हिरासत में आया..... इन दोनों ख़बरों से साफ़ है कि देश के हर कोने में नक्सलवाद अपनी जड़े जमा चुका है.....
केंद्र सरकार अभी भी नक्सलवादियों से बातचीत कर रही है....दंतेवाड़ा में जवानों को मौत की नींद सुलाने वाले नक्सलियों ने अब मासूम नागरिकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है.....झारग्राम में ट्रेन को निशाना बना कर नक्सल वादियों ने बता दिया है की अब वो नक्सलबाड़ी की सरहद से बहुत दूर चले आयें हैं....साथ ही अब उनकी वैचारिक लड़ाई अपनी राह से भटक चुकी है..... ऐसे में वंचित समाज की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले नक्सलवादियों से देश को खतरा उत्पन्न हो गया है.....

केंद्र सरकार की इस पूरे मुद्दे पर जो रणनीति है वो आम जनता में विश्वशनीय नहीं है.......झारग्राम में हुए हादसे के बाद जिस तरीके से इसके लिए जिम्मेदार तत्वों को लेकर विरोधाभाषी बयान जारी हुए वो इसका सबूत है....ये ठीक है की सरकार बिना किसी ठोस सबूत के कुछ भी नहीं कहना चाह रही थी...लेकिन कम से कम उसके जिम्मेदार मंत्री ये तो कह सकते थे की यदि इसमें किसी भी तरह से नक्सलवादियों या माओवादियों का हाथ हुआ तो उन्हें छोड़ा नहीं जायेगा...इससे देश की जनता को एक सन्देश जाता और सरकार की आतंरिक सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे को सुलझाने के प्रति इच्छाशक्ति (भले ही दृढ नहीं ) तो जाहिर होती, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया बल्कि पूरी घटना पर एक रहस्य का आवरण डाल दिया.....ऐसे में साफ़ है की अब ये मुद्दा भी राजनीति के चश्मे से देखा जा रहा है...कोई भी बयान या कदम उठाने से पहले राजनीतिक लाभ और हानि की पड़ताल की जा रही है...
अगर यही हाल रहा तो नक्सलवाद ख़त्म हो पायेगा इसमें शक है...
सरकार ने ट्रेनों पर हमले रोकने का जो तरीका ईजाद किया है वो लाजवाब है..अब ट्रेने ही नहीं चलायी जाएँगी...अगर किसी दिन सरकार आप से कहे की आप के शहर में नक्सली हमला करने वाले हैं लिहाजा अपने घर छोड़ कर भाग जाइये तो इसमें कोई हैरानी मत प्रदर्शित कर दिजीयेगा.......आखिर हमारी सरकार इस समस्या से निबट जो रही है उसकी कीमत हमें और आपको तो ख़ुशी ख़ुशी चुकानी ही होगी न.....क्यों 'सरकार' ?

जिंदा कौम का इंतज़ार .....

आखिर किस आधार पर बात हो माओवादियों से? क्या बसों पर हमले और ट्रेन्स पर हमले को लेकर बातचीत होगी ? पिछले दिनों जब प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे उस समय कहीं से भी नहीं लगा था कि केंद्र सरकार आतंरिक सुरक्षा के मामले में कोई बड़ा कदम उठाने जा रही है... पश्चिमी मिदनापुर के जिस इलाके में यह हादसा हुआ है उस ट्रैक को पिछले छह महीने के भीतर माओवादियों ने कई बार निशाना बनाया....कभी देश के इतिहास में पहली बार किसी ट्रेन का अपहरण किया तो कभी चलती ट्रेन पर गोलियां बरसाईं...और अब यह करतूत...क्या सरकार को इस बात को मान चुकी है कि बातचीत होती रहे खून खराबा तो चलता ही रहेगा...आखिर कौन सी बातचीत हो रही है....? क्या किया जा रहा है?....नक्सल और माओवाद जैसी समस्या से निबटने में सरकार का कोई भी कदम क्यों नहीं निर्णायक साबित हो रहा है.....पश्चिमी मिदनापुर में हुआ रेल हादसा साफ़ बता रहा है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार पूरी तरह से देश में खतरे का घंटा बजा रहे इन वैचारिक आतंकवादियों के आगे घुटने टेक चुकी है...और अब तो खुली छूट है नागरिकों का खून बहाने की ...विचारों की लड़ाई में अब बम धमाके होते हैं ....निरीह लोगों की जाने ली जाती हैं.....सरकार को पता था कि माओवादियों ने इस सफ्ताह को 'काला सफ्ताह' घोषित कर रखा है...लेकिन उसके बावजूद सरकार ट्रेन को निशाना बनने से नहीं रोक पायी...क्या कहेंगे आप इसे? क्या यह सरकार की नाकामी नहीं है? बयां दिए जा रहें है मुआवजा घोषित हो रहा है...रेलवे में नौकरी भी मिल जाएगी.....लेकिन जो लोग मारे गए उनके जाने से रिश्तों में आये खालीपन को भीख में मिली नौकरी भर देगी क्या?
रोजाना हमारे सुरक्षा बलों की कुर्बानी ली जाये...देश के नागरिक अपने ही देश में कहीं भी निशाना बनाये जा सकते हैं....लेकिन सरकार को इस बात की कोई परवाह नहीं है.....एक नागरिक की मौत हो या एक सौ नागरिकों की सरकार तो बातचीत में यकीन करती है ना...वोह तो बस बातचीत करती है... शर्म आती है ऐसी सरकार पर जो अपने ही देश में नागरिकों को सुरक्षित नहीं रख सकती.....नपुंसक राजनीती के गर्भ से कभी किसी देश को विकास रुपी संताने नहीं दी जा सकती......हे इस देश के शांति प्रिय नागरिकों अब तो चेतो...मुर्दे की मानिंद खामोश रहने से अब कुछ नहीं होगा...अगर हम जिंदा कौम के नागरिक हैं तो इंतज़ार क्यों?

एक माँ थी !

आज माँ का दिन है...अफ़सोस है की मैं यह बात आपको शाम का अँधेरा होने के बाद बता रहा हूँ लेकिन इस बात का यकीन भी है की आप की जानकारी मेरे बताये जाने का मोहताज नहीं होगी...
आज एक लड़की का दसवां भी है...या शायद एक बेटी का भी ? आज एक औरत को पेरोल भी मिली है या शायद एक माँ को अपनी बेटी के दसवें और तेरहवें में शामिल होने की कानूनी अनुमति भी मिली है?
हालाँकि मेरा कुछ भी लिखना इस नज़रिए से देखा जायेगा की मैं निरुपमा को न्याय दिलाने की बात करने वाला हूँ या फिर दकियानूसी विचार धारा का पोषक हूँ....लेकिन इन दोनों ही तरह की बातों से अलग होकर मैं कुछ लिखने की कोशिश ज़रूर कर रहा हूँ....पैराग्राफ बदलते ही निरुपमा का नाम गया...मुझे जहाँ तक लगता है की आप सभी निरुपमा से वाकिफ होंगे इसीलिए इस नाम को लिखने से पहले कोई भूमिका नहीं लिखी....वैसे मैंने निरुपमा को उसकी दुखद मौत के बाद जाना है...निरुपमा की मौत की खबर सुनते ही मेरे दिमाग में उसके घर वालों का ख्याल सबसे पहले आया था...लेकिन जब पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आई तबसे तो घर वालों का ही ख्याल रहता...आज हमारा देश तरक्की कर चुका है...कानून से ऊपर कुछ नहीं होता...हर मौत सबूतों के आधार पर हत्या, आत्महत्या, घटना कही जाती है....निरुपमा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ...पहले सबूत बता रहे थे की यह एक आत्महत्या है लेकिन फिर सबूतों ने रंग बदला तो यह एक हत्या करार दी गयी...लिहाजा पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए एक महिला को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.....लोग कहते हैं की महिला रिश्ते में निरुपमा की माँ लगती है...बड़ा अजीब लगता है...ऐसे वाक्ये बहुत कम आते हैं जब किसी महिला को रिश्ते में बेटा या बेटी लगने वाले लड़के या लड़की की मौत का 'ज़िम्मेदार' मना जाना जाता है...क्षमा चाहूँगा यहाँ मैं 'आरोपी' शब्द का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा हूँ क्योंकि आप लोगों ने बताया है कि माँ तो जिम्मेदारियां उठाती है तो मुझे लगता है की अपने बच्चों को मौत की नींद सुलाने में भी माँ ज़िम्मेदारी ही निभाती होगी....
बात आगे बढ़े इससे पहले आपको एक पुरानी फिल्म में अदा किये गए संवाद का एक हिस्सा याद दिलाता हूँ....."रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं......" मुझे नहीं लगता की मेरे इस टुच्चे से ब्लॉग पर लिखी गयी इस पोस्ट को पढ़ने वाला कोई ऐसा भी होगा जो इस संवाद को भूल गया होगा ....खैर छोडिये , वैसे यह जानता था की इस फिल्म में संवाद लिखने वाले ने रिश्ते में बाप ही क्यों बनाया? लेकिन जिस तरीके से कोडरमा पुलिस ने काम किया है उससे अब यह संवाद लिखने का रास्ता साफ़ हो गया है कि "रिश्ते में तो मैं तुम्हारी माँ लगती हूँ..." और इसके बाद कलाकार अपने कथित बच्चे के साथ मारपीट कर सकती है......
माँ एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ निकाल पाना मेरे जैसे लोगों के लिए संभव नहीं है...पूरी दुनिया माँ ही तो है.... सभी मदर डे मना रहे हैं और एक माँ अपनी बेटी की मौत का आरोप लपेटे उसका दसवां...शायद यह दुखद है...क्योंकि महज खबरिया निगाह से देखने वाले इसे मजाक में ले सकते हैं लेकिन ह्रदय की गहराई से सोचन वाले वाक्यात पर दुखी होंगे...इस समय यह बात कहना बहुत मुश्किल है कि एक माँ कभी अपनी संतान का गला नहीं घोंट सकती लेकिन कहे बिना रहा भी नहीं जा रहा है.....
लगे हाथ बात उस प्यार कि भी कर ली जाये जिसके चलते निरुपमा की जान गयी...यकीन प्यार एक कोमल एहसास है, यह मनुष्य को उसके अंतस तक एक स्फूर्त अनुभव कराता है....प्यार को प्रेम कहे तो यह और भी बेहतर अनुभूति होती है...पवित्रता का आभास होता है..प्रेम तो अमर होता है...क्या कभी प्रेम किसी मनुष्य को मृत्यु की ओर भी उन्मुख कर सकता है....?यह एक बड़ा सवाल है जिसको समझना हमारे संपूर्ण समाज के लिए ज़रूरी हो गया है क्योंकि इस देश के लोगों को अब 'ऑनर किलिंग' के बारे में पाता चल चुका है.....निरुपमा और प्रियभांशु ने एक दूसरे से 'प्यार' किया या 'प्रेम' यह तो पता नहीं लेकिन माँ और प्रेम इन दोनों ही एहसासों के साथ कहीं भी मौत का जुड़ाव नहीं होता......लिहाजा लगता है कि दोनों ही एहसासों को सबूतों की निगाह से गुमराह किया गया है....
मेरी इस पोस्ट को पढ़ने वाले कई लोग ऐसे होंगे जो यह नहीं समझ पाएंगे कि मैं आखिर कहना क्या चाह रहा हूँ.....? खैर कोई बात नहीं आप कोशिश कीजिये मेरे और मेरी पोस्ट के बारे में कोई राय बनाने की, मैं इस बात पर सोचने की कोशिश करता हूँ कि मदर डे मना रहे इस देश में क्या माँ शब्द के मायने बदल गएँ हैं. ....हालांकि इसमें एक दिक्कत भी है...बार बार मेरे जेहन में एक महिला का चेहरा उभर रहा है जो आज से कुछ दिन पहले तक एक मृत लड़की की माँ थी.....