क्योंकि आम भारतीय ट्विटीयाता नहीं....



आज कल मीडिया वालों के लिए ख़बरें शुरू होती हैं तो ट्विटर से और खत्म होती हैं तो ट्विटर पर......अगर ट्विटर न हो तो मीडिया वालों को ख़बरों का अकाल परेशान कर देगा..अब हर खबर को ट्विटिया चश्मे से देखा जाता है और ट्विटिया सरोकार से आँका जाता है....मुझे लगता है कि ट्विटर वालों को ललित मोदी और शशि थरूर को सम्मानित करना चाहिए क्योंकि इनके ट्विट ने ट्विटर को खासी प्रसिद्धी दिलाई और इतने बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में विशेष अनुष्ठान करा एक मंत्री कि आहुति तक ले ली....मीडिया वालों को भी बुला कर सम्मानित करना चाहिए क्योंकि इनकी बदौलत पूरा देश ट्विटर मय हो गया.....लगा देश में अगर कहीं कुछ घटता है तो वो है ट्विटर...ट्विटर न हो तो देश में सन्नाटा छा जायेगा.....
इस ट्विटर से जुदा एक और मसला भी है...वैसे मीडिया वालो के नज़र में खेल का मतलब होता है क्रिकेट....ये बात एक बार फिर साबित भी हुयी है...आई पी एल का उत्सव मना कर मीडिया ने इसे साबित किया है.....अरबो रूपये के इस गोरख धंधे से जुडी हर छोटी बड़ी खबर को आम आदमी तक पहुँचाने कि कोशिश कि गयी मानो ये राष्ट्रीय महत्व कि खबरें हो....आई पी एल को लेकर जिस तरह से विवाद चल रहा है उसके बौजूद मीडिया इसके गलैमर से बाहर नहीं निकल पाई...एक बुलेटिन में ललित मोदी के 'खेल' के बारें में बताया गया तो अगली ही बुलेटिन आई पी एल मैचों और उसके बाद होने वाली बेहूदा पार्टियों के महिमा मंडन में....मीडिया के कुछ वरिष्ठ लोगों ने विचार व्यक्त किया कि दर्शक निर्लज्ज हो गएँ हैं..इतने विवादों के बाद भी चले गए सेमी फाईनल देखने...लेकिन इस व्यक्त्व को देने से पहले यह भी तो देखना चाहिए कि मीडिया ने अपने कंटेंट में इस आई पी एल को कितना महत्व दिया....?
यही मीडिया दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले कि कवरेज कर रही थी...लगा कि अब मीडिया इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है और देश के भीतर चल रहे इस युद्ध को लेकर कोई निर्णायक परिणाम सामने आएगा...मीडिया के दबाव से केंद्र और राज्य सरकारें आपसी तालमेल करने को बाध्य होंगी...लेकिन आई पी एल के मोह में बंधी मीडिया ने जल्द ही इस ओर से मुहं फेर लिया और दंतेवाड़ा समेत देश के नक्सल प्रभावित राज्यों में रहने वाले करोड़ों लोगों से भी जो इस दंश को झेल रहें हैं.....मीडिया इन इलाकों में रोज़गार, पेयजल, सड़क जैसी मूलभूत ज़रूरतों के लिए जूझ रहें लोगों कि दास्तान दिखने में रूचि नहीं रखती..वहां के सामाजिक असंतुलन के बारे में कोई खबर तभी बनती है जब कोई बड़ा नक्सली हमला होता है...इन इलाकों में बेटी कि शादी के लिए कोई अपना सब कुछ पुश्तो के लिए गिरवी रख देता है तो कोई इलाज के अभाव में मर जाता है लेकिन मीडिया के लिए इन खबरों का कोई 'प्रोफाइल' नहीं है....
कहते हैं 'भारत' गांवों का देश है...बड़ी आबादी गांवों में बसती है...लेकिन मीडिया वालों के लिए इस देश का नाम 'इंडिया' है जो महानगरों में बसता है...तभी तो ख़बरें इस मुद्दे को लेकर नहीं बनती कि इस बार गेहूं का क्या दाम सरकार ने तय किया है और किसान को क्या मिल रहा है? और मिलना क्या चाहिए? आम की पैदावार कैसी होगी और मानसून कैसा आएगा तो फसलों पर क्या प्रभाव पड़ेगा..अगर मीडिया इन सारी बातों को बताती तो कहीं दूर किसी गांव में सेट टॉप बाक्स या छतरी लगा कर टी वी पर टकटकी लगाये आम इंसान को इस चौखटे के साथ अपने पन का एहसास होता लेकिन मीडिया ऐसा नहीं करती है...आखिर करे भी तो कैसे 'भारत का आम किसान इंडिया वालों कि तरह ट्विटर पर ट्विटीयाता भी तो नहीं.....

आँगन से गायब, लैपटॉप पर प्रगट


एक पिद्दी सी लगने वाली चिड़िया इतनी खतरनाक हो सकती है कि उसकी वजह से खतरों के खिलाडी शशि थरूर भी थर्रा जाये इस बात का अंदाज़ा नहीं था...थरूर साहब कि कुर्सी चली गयी इस ट्विट ट्विट के चक्कर में....यही नहीं दुनिया का सबसे बड़ा गेम शो विवादों के साये में आ जाये वोह भी एक चिड़िया के ट्विट ट्विट से....क्या कहने...वैसे अब ट्विट ट्विट करने के लिए इस चिड़िया को कहीं घर के बाहर उग आये झुरमुट में नहीं आना पड़ता....यह तो हमारे चौखटे चेहरे वाले कंप्यूटर के आसमान पर आती है....दो चार लाइने गाती है और हंगामा बरपाती है....
मीडिया वालों के नज़र से देखा जाये तो लगता है कि आज पूरा देश बस हर काम छोड़ कर इसी ट्विट का ही इंतज़ार कर रहा है....सूत्र बताते हैं कि आजकल कई बड़े चैनल वाले तो ट्विटियाने वाले पत्रकारों कि भर्ती करने कि सोच रहे हैं... उनका काम बस यही होगा कि दिन भर ट्विटियाते रहो...और कहीं से कोई थरूर या मोदी ट्विट ट्विट करें बस शुरू हो स्पेशल करने के लिए.... वैसे जिस तरीके से मीडिया वाले ट्विट के पीछे पड़े और राष्ट्रीय हित में इससे उपजी खबर को दिखा रहें उससे लगता है कि जल्द ही प्रधानमन्त्री कार्यालय भी इस सम्बन्ध में एक नया मंत्रालय ही बना सकता है...
वैसे आपको याद होगा कि कुछ वर्षो पहले तक ऐसी ही ट्विट हमारे और आपके घरो में भी सुनाई देती थी....आँगन हो, बरामदा हो, खिड़की हो, रोशनदान हो हर जगह एक प्यारी गौरया कि ट्विट सुनायी देती थी....लेकिन अब ऐसा नहीं है....गौरया अब ढूंढे नहीं मिलती है.....पहले जब घर में चावल बनाने से पहले उसे साफ़ किया जाता था तो उसमे से निकले धान को माँ खुली जगह पर रख देती थी...गौरया का झुण्ड वहां आता और धान अपनी चोंच से धान और चावल को अलग करता और लेकर उड़ जाता....अक्सर गौरया का एक बड़ा झुण्ड गर्मी कि दोपहर में घर के बाहर लगे झुरमुट में चला आता....देर तक शोर करता और शाम को उड़ जाता....खुली खिड़कियों से कमरे के अन्दर तेजी से उड़ते हुए इस कोने से उस कोने का चक्कर लगाती गौरया को हम बाहर भगाते थे....हमें डर लगता था कि कहीं कमरे में चलते पंखे से वोह कट ना जाये...घर के उपरी हिस्से में बने रोशनदान पर अक्सर यह गौरया घोंसला बनाती थी...हम गौरया के बच्चे को बड़ा होते देखते, उन्हें छोटे छोटे पंखो से ऊँची उड़ान भरने कि कोशिश करते देखते थे....अब ऐसा कोई नज़ारा नहीं दिखता...ना आँगन, ना रोशनदान और ना ही घरों के बाहर लगे झुरमुट में...ज़िन्दगी का ट्विट सुनाने वाली गौरया अब खामोश है ...बड़े बुजुर्ग कहते थे कि जिस घर में गौरया का आना जाना होता है वहां कोई बीमार नहीं होता...अब तो पूरे मोहल्ले के किसी भी घर में कोई गौरया नहीं जाती..तो क्या पूरा मोहल्ला ही बीमार हो गया?
ट्विट तो अब लैपटॉप पर सुनाई देती है ...मीडिया वाले भी इसी चौखटे चेहरे वाली ट्विट के इंतज़ार में रहते हैं.....आखिर क्यों ना हो आँगन कि गौरया टीआरपी भी तो नहीं देती......

ओका बोका तीन तड़ोका

भोजपुरिया माटी के लोगों ने बचपन में ज़रूर ही खेल कूद के दौरान कई पद्यांश को सुना या बोला होगा..इनमे से कई लोग ऐसे होंगे जिनके शायद यह पद्यांश पूरी तरह याद ना हो या ज़िन्दगी कि भाग दौड़ में इसे भूल गएँ हो..ऐसे ही एक पद्यांश कि कुछ पंक्तियाँ आप लोगों के लिए लिख रहा हूँ ..पढ़िए और अपने माटी को याद करिए.....हाँ कुछ लोगों को मैं यह सलाह ज़रूर देना चाहूँगा कि भूल कर भी इसका हिंदी या अंग्रेजी में अनुवाद करने कि कोशिश ना करें........

ओका बोका तीन तड़ोका
लउवा लाठी चन्दन काठी
इजई विजई पान फूल
पचका द.....
अथेला बथेल
कवन खेल
जटुली खेल
केकरा में गेल .....
का चान का सुरुज
कतना में कतना/ बिगहा पचीस
हगे का
मूस के लेड़ी
तेल कतना
ठोपे- ठोप......
तार काटो तरकूल काटो
काटो रे बरसिंगा
हाथी पर के घुघुरा
चमक चले राजा
राजा के रजईया काटो
हिंच मरो हिंच मरो
मुसहर के बेटा.....

एक कविता

सड़क पर बिखरी धूप सा
वो अक्सर मेरे साथ रहता है
यहाँ वहां
हवा के हर झोंके में
वो मिलता है
मेरे टूथब्रश और मेरी तौलीया में
उसकी महक होती है
चादर कि सिलवट और तकिये पर
वो नरमियत के साथ चुभता है
ना जाने कब और कैसे
इन आँखों पर लगे चश्मे के पीछे से
उसका एक साया चला आता है
मेरी कलम से लिखे शब्दों से
उसकी आवाज़ भी सुनी है मैंने
रात को अक्सर घने अँधेरे में भी वो
उभर आता है हल्की चांदनी कि तरह
ना जाने कौन है वो
कहने को अजनबी ही सही
लेकिन किसी अपने से कम भी नहीं
ऐसे भी धूप से कौन पहचान रखता है....





अतीत के पन्ने

साँझ ढलते ही
तेज़ी से बंद कर लेते हो तुम
अपने मन के कमरे के दरवाज़े
फिर पलटते हो पन्ने
सुनहरी यादों के
और मैं ...........
तुम्हारी सांसों संग
बन समीर
खिंच आती हूँ भीतर तक
देखती हूँ कमरा ..........
फैले हैं ढेरों पन्ने
आत्मीयता के बिस्तरे पर
और ..........
करीब ही रक्खी है
उम्मीद की मद्धिम लालटेन भी
जिसकी हलकी रौशनी काफी है .............
संजोने को हर सामान !

(यह कविता एक मित्र के द्वारा लिखी गयी है )


मेरे जेहन में उतरने दो


मेरे कमरे में हर ओर
एहसास है तुम्हारी मौजूदगी का
कुर्सियों पर तुम्हारी याद
ठहरी है
मेरे ह्रदय के स्पंदनो से
इनकी मित्रता गहरी है
आलमारी पर रखी किताबें
यकीनन बेतरतीब हो चली हैं
पर इनमे पड़े कुछ पुराने कागजों में
तुम्हारे हस्ताक्षर आज भी करीने से रखे हैं
कमरे कि दीवार पर टंगे आईने में
तुम्हारा अक्श मुस्कुरा का उभर आता है
नेपथ्य में प्रसन्नता के वही
भाव फिर संवर जाता हैं
क्लिप बोर्ड पर लगे कोरे कागज
और उनपर रखी कलम
तुम्हारी उपस्थिति का उत्सव मना रहें हैं
नीली स्याही से कई रंग भरी भावनाओं का
वर्णन लिखे जा रहें हैं
शायद खुली खिड़की अब
बंद करने कि ज़रुरत नहीं
तुम्हारे एहसास से भीगी इस हवा को
इस खुशबु को कैद करने कि
ज़रुरत नहीं
इसे बिखरने दो
जेहन में गहरे उतरने दो.....
(आशीष तिवारी )

एक लम्ब्रेटा के नज़ारे का सुख



तपती दोपहर में एक सुनसान सड़क पर बीते दौर के हो चुके लम्ब्रेटा स्कूटर को फर्राटा मारते देखना मेरे लिए एक सुखद अनुभव कि तरह था.....हालाँकि मुझे इस सड़क पर रुकना नहीं था लेकिन इस बेपरवाह गर्मी और एक मोबाइल कॉल कि मेहरबानियों के कारण मैंने एक सड़क पर लगे एक बैनर कि छांव ले ली थी...तभी मुझे यह लम्ब्रेटा स्कूटर दिखाई पड़ा....इस स्कूटर को लेकर किसी भी तकनीकि पहलु पर अब बात करना शायद बेमानी होगी....आजकल तो दो पहिया गाड़ी का कलर मेटेलिक होता है लेकिन इस लम्ब्रेटा का रंग कुछ यूं था मानो गलती से इसपर रंग गिर गया हो और फिर उससे ब्रश से फैला दिया गया हो....नए ज़माने
की गाड़ियों कि तरह यह लम्ब्रेटा सन्नाटे से नहीं गुजरता...इसके आने कि एक अपनी आवाज है...जो इसको जानने वालों को दूर से ही बता देती है कि लम्ब्रेटा आ रहा है....हालाँकि अब यह आवाज़ कम ही सुनाई देती है...लेकिन मेरे जैसे इंसान को किसी मधुर संगीत से कम सुखद अनुभव नहीं कराती.....जहाँ आज गाड़ियों को अन्दर से लेकर बाहर तक सँवारने के लिए विशेषज्ञ लगे रहते हैं ऐसे में यह स्कूटर कितनी सादगी से हर बात कह देता है... एक पारंपरिक हो चला डिजाइन, आज के परिपेक्ष्य में दबा सा रंग, आवाज़ करता इंजन...बस और क्या यही तो है एक लम्ब्रेटा कि दास्तान.....
इसको
चलाने वाले हाथों कि भी दाद देनी पड़ेगी...इस दौर में भी उस शख्स ने इस स्कूटर को कितना संभाल कर रखा है...मानो उनके घर का कोई सदस्य हो...आजकल तो लोग घर के बूढ़े बुजुर्गों को भी इस तरह एहतियात से नहीं रखते...सोचते हैं जितनी जल्दी निकल ले उतना अच्छा..लेकिन यह लम्ब्रेटा आज भी चलने वाले के घर में शान से रहता होगा...उसकी कंडीशन देखकर इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता था.....चलते लम्ब्रेटा पर बैठे उस बुजुर्ग को देखकर लग रहा था कि आखिर कितना गौरवान्वित महसूस कर रहा था वोह इसको चलाते समय.....धीमे लेकिन सधी हुयी चाल....शायद आपको मालूम ना हो लेकिन एक दौर था जब लम्ब्रेटा स्कूटर समाज में आपका रुतबा कायम करता था.....इस स्कूटर को खरीदने के लिए आर्डर देना पड़ता था....जल्दी नंबर आ जाये इसके लिए बड़े बड़े लोगों के सोर्स लगा करते थे....और जब यह स्कूटर घर आता तो अगल बगल के मोहल्लों में चर्चा होती थी कि फलां व्यक्ति ने तो लम्ब्रेटा लिया है..... सोचिये कितना जुड़ाव होगा ऐसी गाड़ी से...कितनी भावनाएं जुडी होंगी इस लम्ब्रेटा से....इस लम्ब्रेटा ने जीवन के कितने मोड़ों पर एक पूरे परिवार का साथ दिया होगा....कितने सुख दुःख साथ जिए होंगे इस परिवार और लम्ब्रेटा ने....यही वज़ह होगी कि यह लम्ब्रेटा आज बूढा ज़रूर हो गया है लेकिन निष्प्रयोज्य नहीं......इस लम्ब्रेटा को चलाने वाले हाथ जानते हैं कि बुढ़ापा निरर्थक होने का सबूत नहीं है...
नयी पीढ़ी के लिए एक पूरा दर्शन इस स्कूटर के रूप में जा रहा हैं...लेकिन तपती दोपहर में सुनसान सड़क पर इस कहानी को पढने वाला कोई नहीं है....180 सी सी कि बाईक पर सवार गुजरते कुछ चुनिन्दा युवा तो इसपर एक नज़र भी नहीं डाल रहें हैं......यही अंतर है इस लम्ब्रेटा की धीमी चाल और नए ज़माने कि गाड़ियों में......

बाजारू चीथड़ों में मुस्कुराती मीडियावी भोजपुरी


(इस लेख में मीडिया का तात्पर्य इलेक्ट्रानिक मीडिया से है)
लगभग डेढ़ सालों से भोजपुरी में पत्रकारिता करते हुए इस बात का एहसास शायद ही कभी हुआ हो कि गाँव दुआर से चल कर टीवी के चौखटे स्क्रीन तक पहुँचने वाली भोजपुरी का वाकई कोई भला हो रहा है....यकीनन यह एक बड़ा कदम रहा होगा जब किसी संस्थान ने एक ऐसे टी वी चैनल कि अवधारणा को पटल पर लाने का निर्णय किया होगा जिसकी भाषा भोजपुरी हो....उसके बाद भारतीय मीडिया जगत कि क्षेत्रीय समाचार सेवायों में अपनी अलग पहचान रखने वाले एक अन्य ग्रुप ने भी भोजपुरी में भारत का पहला न्यूज़ चैनल खोलने का साहस किया....यही नहीं इस न्यूज़ चैनल पर अंगिका. मैथली जैसी भाषाओँ में भी समाचार प्रसारित किये जा रहें हैं...मुनाफे कि सोच रखने वाले न्यूज़ चैनलों के बीच भोजपुरी भाषा के चैनलों को संघर्ष करते देखना किसी भी पुरबिया व्यक्ति के लिए सुखद अनुभव है...लेकिन इसके साथ ही जैसे जैसे यह टीवी चैनल अपनी उम्र बढ़ाते जा रहें हैं इनसे उम्मीदें बढती जा रही है जो स्वाभाविक भी है...भारतीय मीडिया जगत में भोजपुरी का हिस्सा अभी नाम मात्र का ही है....भले ही पूरी दुनिया में इसे बोलने वालों कि संख्या २५ करोड़ के आसपास हो लेकिन भारतीय मीडिया में इसकी भागीदारी बहुत कम है.....
दरअसल भोजपुरी टी वी चैनलों ने अपनी शुरुआत से
भोजपुरी भाषा को ही केंद्र में रखा है....हालाँकि उन्होंने इस बात का दावा ज़रूर किया कि वोह ना सिर्फ भोजपुरी भाषा बल्कि भोजपुरिया समाज को एक नयी दिशा देने कि कोशिश कर रहें हैं...लेकिन शायद अभी यह हो नहीं पा रहा है....भोजपुरी में प्रसारित होने वाले चैनलों कि अंतर्वस्तु पर जरा एक नज़र डालिए...पूरे कंटेंट को हम दो भागों में बाँट देते हैं- पहला समाचार और दूसरा मनोरंजन...चलिए पहले बात समाचारों कि कर लेते हैं...भोजपुरिया समाचार चैनलों में स्पष्ट विचारधारा का अभाव साफ़ परिलक्षित होता है...ख़ास तौर पर भोजपुरिया समाज से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय पहलुओं के साथ जोड़ पाने में अक्सर बिखराव नज़र आता है....एक विस्तृत राष्ट्रीय सोच का अभाव बुद्धजीवी पुरबिया समाज को सालता है...यहाँ यह तर्क दिया जा सकता है कि भोजपुरी समाचार चैनलों का टार्गेट ग्रुप भोजपुरिया क्षेत्रों में रहने वाले लोग ही हैं पर इससे भी यह बात तो साबित होती ही है कि राष्ट्रीय स्तर पर भोजपुरी को स्थापित करने के लिए इन चैनलों के पास कोई कार्ययोजना नहीं है.....उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखण्ड से आने वाली अपराध, धर्मं, कला और संस्कृति से जुडी ख़बरों को को महज भोजपुरी भाषा का चोला पहना कर प्रस्तुत कर देना ही काफी नहीं है....क्या इस माटी ने मंगल पाण्डेय, जय प्रकाश नारायण औउर लोहिया जैसे क्रांति दूत नहीं दियें हैं? क्या इनकी छवि के सहारे इस माटी से और सपूत नहीं पैदा किये जा सकते...? क्या गंगा- जमुना का सिंचित क्षेत्र महज अपराध, ठगी, पुलिस उत्पीडन, मानवाधिकार हनन, भूख, गरीबी और ऐसी ही फसलों कि उगा रहा है....आज देश में नक्सल वाद एक बड़ी समस्या है...यू पी. बिहार और झारखण्ड इससे बुरी तरह प्रभावित हैं...क्या यहाँ कि लोगों कि आवाज़ होने का दावा करने वाली भोजपुरी मीडिया इस मुद्दे कि तह तक जा पा रही है?.....भोजपुरी मीडिया के अगुवा होने का दम भरने वालो को इस समाज कि जड़ों को तलाशना होगा.....अपने मीडियावी चोले से भोजपुरी मीडिया के अग्रदूतों को इस समाज कि वास्तविक विचारधारा को आगे बढ़ाना होगा....
चलिए अब समाचारों से इतर छोटे परदे पर भोजपुरी के मनोरंजन जगत कि करते हैं...यूं तो भोजपुरी भाषा में मनोरंजन के नाम पर कुछ भी परोस देने वाले कई चैनल हैं लेकिन जिनके ऊपर जिम्मेदारी ज्यादा है वोह भी इस समाज के साथ इन्साफ नहीं कर पा रहें हैं....दरअसल शुरुआत में इन चैनलों ने ग्लैमर के तडके के साथ खूब नाच गाना दिखाया...लगा कि भोजपुरिया लोक संस्कृति को एक नयी पहचान मिल गयी....पर अभी के हालातों में ऐसा कह पाना शायद किसी कि लिए आसान नहीं होगा.....भोजपुरी भाषा के टीवी सीरिअल्स कि ही बात कर ली जाये तो घर घर में झगड़ा ही नज़र आएगा या फिर खेत खलिहान को लेकर साजिशों का दौर....सवाल यह कि क्या भोजपुरिया समाज में यही सब हो रहा है....इसके अलावा क्या कुछ भी ऐसा नहीं है जो सकारात्मक हो और टीवी पर आ सके....
इस बारे में भोजपुरी के कुछ विद्वानों से भी बातचीत हुयी...विश्व भोजपुरी समेलन के अंतर्राष्ट्रीय महासचिव और साहित्यकार अरुणेश नीरन जी इस मुद्दे पर बेहद तल्ख राय रखते हैं......उनका साफ़ कहना है कि भोजपुरी कि मीडिया भी अब बिकाऊ माल परोस रही है... समाज या भाषा कि उन्नति में योगदान देने में भोजपुरी कि मीडिया कुछ नहीं कर पा रही है...नीरन जी के तीखे तेवरों का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि 'यह मीडिया भाषा का नाश कर रही है'..... भोजपुरी के स्वभाव को समझे बिना सामाजिक सरोकारों कि बात बेमानी है....यही नहीं समाचारों के साथ साथ मनोरंजन के नाम पर परोसी जा रही अश्श्लीता से भी नीरन जी खासे नाराज़ दिखे....उनका मानना है की भोजपुरी कि लोक कला के व्यवसाय से अपसंस्कृति आई है....भोजपुरी कि उत्सव धर्मिता इन चैनलों ने समाप्त कर दी है.....
वहीँ समकालीन भोजपुरी साहित्य पत्रिका के उप संपादक प्रवीण तिवारी भी कुछ अलग राय नहीं रखते हैं....मीडियावी भोजपुरी से समाज और भाषा के भले के सवाल पर छुटते ही कहते हैं, 'कुछ भला नहीं होने वाला'.....प्रवीण जी का मानना है कि आज जो भोजपुरी कि मीडिया चला रहें हैं उन्हें तो मूल भोजपुरी कि जानकारी ही नहीं है..वोह तो महज एक रास्ता बना रहें हैं जिसपर चलकर वोह अपना व्यावसायिक हित साध सकें...हिंदी चैनलों कि नक़ल में भोजपुरी कि मूल परंपरा, साहित्य, संस्कृति, लोक गीत सब का बेड़ा गर्क हो रहा है....मीडियावी भोजपुरी ने एक लोक संस्कृति के लोप को आमंत्रण दे दिया है....
इन प्रतिक्रियाओं से साफ़ है कि मीडियावी भोजपुरी से स्वयं उनका समाज ही संतुष्ट नहीं है....यानि अगर यही तरीका रहा तो तो ना तो मुद्दे कि बात हो पायेगी और ना ही पहचान बन पायेगी....हाँ एक बाज़ार ज़रूर तैयार हो जायेगा जहाँ अब तक बिकाऊ ना बन पाई भोजपुरी कि बोली लग सकेगी......और पुरूस्कार बाँट सकेंगे.....लिहाजा अगर इन टीवी चैनलों को भोजपुरी भाषा और समाज के लिए कुछ करना है तो बाज़ारवाद, नक़ल और पुरुस्कारों कि दौड़ से हट कर इस समाज के अंतर्मन से जुड़ना होगा....एक विस्तृत, राष्ट्रीय विचारधारा के साथ आगे बढ़ना होगा और अगर ऐसा नहीं कर सकते तो श्याद उन्हें इस बात का हक नहीं कि वोह भोजपुरी को बाजारू चीथड़ों में मुस्कुराते दिखाए....