एक कविता

सड़क पर बिखरी धूप सा
वो अक्सर मेरे साथ रहता है
यहाँ वहां
हवा के हर झोंके में
वो मिलता है
मेरे टूथब्रश और मेरी तौलीया में
उसकी महक होती है
चादर कि सिलवट और तकिये पर
वो नरमियत के साथ चुभता है
ना जाने कब और कैसे
इन आँखों पर लगे चश्मे के पीछे से
उसका एक साया चला आता है
मेरी कलम से लिखे शब्दों से
उसकी आवाज़ भी सुनी है मैंने
रात को अक्सर घने अँधेरे में भी वो
उभर आता है हल्की चांदनी कि तरह
ना जाने कौन है वो
कहने को अजनबी ही सही
लेकिन किसी अपने से कम भी नहीं
ऐसे भी धूप से कौन पहचान रखता है....




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें