क्योंकि ख़्वाब देखने का कोई वक़्त नहीं होता.....


क्या सपने देखने के लिए भी कोई वक़्त तय किया जा सकता है....सोचता हूँ लोग क्यों कहते हैं कि ये दिन में सपने देखता है? क्या सपने महज रातों में देखे जाने चाहिए? क्या सपने देखने के लिए जगह भी ठीक ठाक होनी चाहिए? कहीं भी कभी भी सपने देखने में क्या बुराई है?
पता नहीं लेकिन जब से सपने देखने शुरू किया है तभी से यह सुनता रहा हूँ कि सपने देखने का एक वक़्त होता है...हर समय सपने नहीं देखे जाते...मुझे लगता है कि ये बातें तब कहीं गयी होंगी जब लोग किसी ख़ास समय पर सपने देखते होंगे और एक मुख़्तसर वक़्त उन्हें हकीकत में बदलने के लिए मुक़र्रर करते होंगे....लेकिन पवन से भी तेज इस मस्तिष्क में एक सवाल यहाँ और आता है कि क्या उनके सपने इतने छोटे हुआ करते थे कि किसी ख़ास वक़्त में देखे जाएँ और किसी ख़ास समय में उन्हें पूरा कर लिया जाये....और अगर पूरे नहीं हो पाए तो क्या? सपने ही नहीं देखते थे....? एक और सवाल मन में आ जाता है कि वो सपने कब देखते होंगे? जहाँ तक मुझे पता चला है वो वक़्त रात का था....लीजिये अब एक सवाल और आ गया मन में कि लोग रात को ही सपने क्यों देखते थे? क्या दिन में किसी का डर था? नहीं, शायद रात को भीड़- भाड़ कम रहती है, शोर कम रहता है इसीलिए रात को सपने देखते होंगे....लेकिन एक सवाल मन में फिर आ गया कि सपनो का भीड़-भाड़ और शोर से क्या लेना देना? समझ में नहीं आता कि क्या सोचकर कहा गया कि हर वक़्त सपने मत देखने लग जाया करो...सपने देखने के लिए अच्छी जगह तलाश लिए करो...जहाँ साफ़ सफाई हो....बैठने की अच्छी जगह हो वहीँ सपने देखा करो....
अब आप ही सोचिए कि अगर इंसान इन बंदिशों में बंधकर सपने देखेगा तो सपनो का क्या होगा.....अरे सपने तो जब चाहें तब देखे जा सकते हैं....जगह, समय देख कर ना तो आँखों में सपने आते हैं और ना तो उन्हें पलकों पर बैठाया जा सकता है.....सपने तो बस आँखों में आ जातें हैं या यूं कहें की आँखों में रौशनी इन्ही सपनो की बदौलत होती है....मेरी तरह आपने भी कई बार किसी सपने को देख आँखों में चमक महसूस की होगी.....इन सपनो को आहिस्ता आहिस्ता जवाँ करना पड़ता है..किसी छोटे बच्चे की मानिंद....इसके बाद ये ख़्वाब हो जाते हैं...दिन रात इन ख़्वाब में जीना कितना सुकून देता है....हर घड़ी इन ख़्वाबों की तस्वीर आँखों पर छायी रहती है....और
जब आँखों में ख़्वाब होंगे तो दिल में हौसला खुद- ब -खुद आ जाता है...वही हौसला जो इन ख़्वाबों को पूरा करने का जुनून आप में पैदा करता है.....और जब आँखों में कुछ कर गुजरने का ख़्वाब, दिल में हौसला और खून में जुनून हो तो वहीँ से शुरू होती है ज़िन्दगी......इसलिए मेरे यारों जितने हो सके उतने ख़्वाब देखो....जब चाहें तब देखो.....जहाँ चाहे वहां देखो क्योंकि ख़्वाब देखने का कोई वक़्त नहीं होता..........

गाँधी को समझे अरुंधती..............





क्या आपको याद है कि वर्ष २००४ में सिडनी शांति पुरस्कार किसे मिला था? नहीं याद है तो हम याद दिला देते हैं ..ये पुरस्कार मिला था अरुंधती रॉय को....कितनी अजीब बात है ना! कभी अपने अहिंसात्मक कार्यों के लिए इतने बड़े सम्मान से नवाजे जाने वाली महिला आज उसी अहिंसा को नौटंकी के समकक्ष रखने पर तुली है.....मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान अरुंधती रॉय ने कहा था कि 'गांधीवाद को दर्शकों की ज़रुरत होती है'...ये एक पंक्ति ही काफी है कि हम अरुंधती रॉय की मनोदशा के बारे में समझ सके....अरुंधती रॉय के गाँधी के विचारों के प्रति क्या नजरिया है ये भी आसानी से समझा जा सकता है....जिस तरीके से अरुंधती रॉय ने मावोवादियों के समर्थन में अपने सुर अलापे हैं उसका निहितार्थ देश की वर्तमान राजनीतिक और सामजिक व्यवस्था से परे है.....
आज देश में आतंरिक सुरक्षा को लेकर जो सबसे बड़ा खतरा है वो है नक्सालियों और मावोवादियों से और इस बात को आम आदमी से लेकर ख़ास तक जानता है तो क्या इसे अरुंधती रॉय नहीं समझ रही हैं....दंतेवाडा में सुरक्षा बलों पर हमले के बाद जिस तरीके से झारग्राम में ट्रेन को निशाना बनाया गया उसे देखकर क्या कोई भी शख्स इनका समर्थन कर सकता है?
यकीनी तौर पर यह कहा जा सकता है कि देश में हमेशा शांति नहीं रह सकती..और तब तो और जब संसाधनों का बंटवारा समान रूप से ना हुआ हो और उसका उपयोग वो समाज ना कर पा रहा हो जिसने उन संसाधनों को सुरक्षित रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो....नक्सलबाड़ी से जब एक आवाज़ उठी तो वो अपने अधिकारों की बात कर रही थी....उसका मकसद एक ऐसे अहिंसात्मक आन्दोलन को खड़ा करना था जो समता मूलक समाज की अवधारणा से प्रेरित था......लेकिन राजनीतिक नेतृत्व से भटकाव इस आन्दोलन को एक ऐसे मोड़ पर ले आया जहाँ इसका विरोध इसके अपने ही करने लगे.....यहीं से शुरू हो चुकी थी एक ऐसी जद्दोजहद जहाँ अपने को सही साबित तो करना ही था साथ ही अपना हक भी लेना था लेकिन राजनीतिक नेतृत्व से समन्वय ना हो पाना दुखद साबित हो रहा था....नक्सल वाद का समर्थन करने वालों को लगा कि अहिंसात्मक आन्दोलन से कुछ हासिल नहीं होने वाला लिहाजा बंदूकों का इंतज़ाम होने लगा....देश के जंगलों में जहाँ कभी माहौल खुशनुमा रहता था वहां की हवा में बारूद कि महक घुल गयी...बूटों की आवाजें आने लगी....इन बूटों की आवाजों के नीचे गाँधी की अहिंसात्मक सोच कराह रही थी... अभी तक अपना हक मांग कर अपनी ज़िन्दगी खुशहाल बनाने की सोच रखने वाले अब दूसरों की ज़िन्दगी को दुखों से भर रहे थे.....हैरानी की बात थी कि मर्ज़ बढ़ रहा था और सरकार इस बात पर सोच विचार कर रही थी कि ये रोग कितना फ़ैल सकता है? रोग को फैलना था सो फैला और सरकारें आती जाती रहीं....इसी दौरान इसी भारत में एक ऐसा वर्ग भी बन गया जो इस रोग के समर्थन में आ रहा था....
जहाँ तक मुझे मालूम है अरुंधती रॉय ने अपने जीवन में एक ही उपन्यास लिखा है ( और लिखा हो कृपा करके बताएं क्योंकि मेरा अंग्रेजी उपन्यासों का ज्ञान शून्य है) ...एक उपन्यास लिख कर अरुंधती जी आज देश में बुद्धजीवी वर्ग का चेहरा हैं....ये वर्ग जब अंग्रेजी में कुछ कहता है तो वह बेहद गंभीर बात हो जाती है...
इसी बीच ये बात भी जाहिर हो गयी कि लम्बे समय तक निराशा और हताशा के बाद अहिंसा, हिंसा की ओर बढ़ने लगी......ऐसे में कोई हैरानी नहीं हुयी कि देश के बुद्धजीवी वर्ग का नमूना मानी जाने वाली अरुंधती रॉय ने इस खून खराबे का समर्थन किया.... वैसे अरुंधती रॉय जैसे लोग हमारे देश में अब बहुतायत में पाए जाते हैं....ये भारत को 'इण्डिया' कहते हैं इसीलिए ये 'एलीट' वर्ग के हो चले हैं....भारत को जो लोग भारत कहते हैं वह निम्न हैं और जो इसे' भारत माता' कह दे वो तो निम्नतर हो जाते हैं.....अरुंधती रॉय जब मावोवादियों के साथ जंगल में गयी तो उन्हें पता चला कि ऐसी समस्याओं का हल गाँधी के अहिंसात्मक नज़रिए से नहीं हो सकता....जहाँ तक मुझे लगता है अरुंधती रॉय के विचारों में आया ये त्वरित परिवर्तन किसी ऐसे व्यक्ति के लिहाज से बिल्कुल उचित था जो वातानुकूलित कमरों और गाड़ियों का आदि हो चला हो और अति उत्साह में उसे कुछ गर्म जंगलों में पैदल घूमते हुए जंगली कीड़ों के बीच बिताना पड़े...पर इस सब के बीच दुःख इस बात का हुआ कि सुश्री रॉय ने गाँधी की अहिंसात्मक सोच पर प्रश्नचिंह लगा दिया....दरअसल वो भूल गयी कि जिन आदिवासियों के बारे में उन्होंने अब जाकर सोचना शुरू किया है उनके बारें में गाँधी ने लगभग सौ वर्ष पूर्व ही सोच लिया था....हाँ ये बात और है कि तब ये महज आदिवासी थे, नक्सली या मावोवादी नहीं.....गाँधी ने कभी भी जंगलों और आदिवासियों को अलग करने की बात नहीं कही....बल्कि उन्होंने रस्किन के उस अवधारणा का कि, श्रम की वास्तविकता से अलग हुआ असमान सामजिक जीवन अहिंसा की सम्भावना को आगे नहीं बढ़ने देता है, का हमेशा समर्थन किया...स्पष्ट है कि गाँधी जी इस बात को समझते थे कि यदि देश में असमान विकास हुआ तो वंचित लोग अहिंसा का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं....लिहाजा उन्होंने हमेशा एकरूप सामाजिक ढांचे का समर्थन किया.....गाँधी जी के अहिंसात्मक आंदोलनों को निष्क्रिय समझने वाले भी भूल करते हैं....हालाँकि शुरूआती दौर में किये गए आन्दोलन ज़रूर कमजोर थे लेकिन इस बात से प्रेरणा लेते हुए स्वयं गाँधी ने अपने आंदोलनों को सक्रिय रूप दिया...इसी के बाद सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ...गाँधी जी और तत्कालीन राजनीतिक विशेषज्ञों ने इसे बन्दूक की बदौलत बुलंद की गयी विरोध की आवाज़ से अधिक प्रभावशाली माना था....सविनय अवज्ञा आन्दोलन की अवधारणा अन्याय के खिलाफ सक्रिय विरोध का सुझाव देती है.... इस अवधारणा में कानून के प्रति गहन सम्मान भी निहित था....अरुंधती रॉय के साथ वाला बुद्धजीवी वर्ग आज जिस गाँधी को नक्सली समस्या के आईने में गलत साबित कर रहा है उसी गाँधी ने शहरों के विकास को गलत माना था...ख़ास तौर पर भारत जैसे देश के लिए उन्होंने शहरों को अशुभ बताया था.....अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज्य' में गाँधी जी ने निर्धनता और आधुनिक सभ्यता के 'पाप' के लिए प्रौद्योगिकी और उद्योगीकरण को जिम्मेदार ठहराया था....ऐसे में गांधी ना तो आदिवासियों के विरोधी हो सकते हैं और ना ही उनके अधिकारों के फिर जंगलों में रहने वाले इन लोगों को गाँधी के रास्ते पर चलकर मंजिल क्यों नही मिल सकती....? दरअसल इस देश में गाँधी की तस्वीर को दीवारों पर छिपकलियों के लिए टांग दिया जाता.....समय समय पर अरुंधती रॉय जैसा बुद्धजीवी वर्ग छिपकलियों के साथ गाँधी को भी गाली दे देता है....आज ज़रुरत इस बात कि है गाँधी के नज़रिए को वर्तमान परिपेक्ष्य में समझा जाये और देश को असमान विकास से एक समान विकास की ओर ले जाया जाये....और मेरी एक छोटी सी सलाह और है कि शहरी लोगों को जंगलों में ना जाने दिया जाये.......
हे राम..!

बंधे धागे खोल दो....


ना जाने किस पीर की दरगाह पर
कुछ कच्चे धागे बांध आया था मैं
किस वाली के
दरबार में
हथेलियाँ जोड़
मन्नत मांगी थी मैंने
गुलाबों की चादर से आती खुशबू
और
जलती अगरबत्तियों के धुएं के बीच
कुछ बुदबुदाया था मैंने
किसी मंदिर की चौखट पर
सिर झुकाया था मैंने
हाथों से घण्टियों को हिलाकर
अपने ही इर्द गिर्द घूम कर
कुछ तो मनाया था मैंने
तपती धूप में शायद किसी
साये की आस की थी मैंने
या फिर तेज़ बारिश में
ठौर की तलाश की थी मैंने
या कभी यूँ ही सुनसान राहों पर
चलते हुए
किसी साथी की ज़रुरत महसूस हुयी थी
तभी तो मुझे 'तुम' मिले हो
शायद अब वक़्त गया है
दरगाह पर बंधे धागों को खोलने का ...............

शुक्र है! ये कौम मुर्दा नहीं....


देश में लोकतंत्र बेहद मजबूत हो गया है लेकिन लोगों की बातें इस तंत्र में नहीं सुनी जाती....लोग बोलते बोलते थक चुके हैं और अब तो मुर्दई ख़ामोशी ओढ़ कर चुप बैठे हैं.....लोकतंत्र का उत्सव मनाया जाता है लेकिन शवों के साथ....कौम सांस लेती तो है लेकिन है मुर्दा...ऐसे में तसल्ली देती है एक मुहिम...अपने अधिकारों की भीख मांग- मांग कर थक चुके बच्चों ने अब वादाई कफ़न उतार दिया है और एक जिंदा कौम की तरह इंतज़ार नहीं करना चाहते....अब वो अपनी राह खुद बना रहें हैं...मंजिलें उन्हें मालूम है और सहारा उन्हें चाहिए नहीं......मैं बात कर रहा हूँ वाराणसी में बनाई गयी दुनिया कि पहली और अभी तक एकमात्र निर्वाचित बाल संसद की....
ये बाल संसद समाज के उस तबके के बच्चों की आवाज बुलंद कर रही है जहाँ तक किसी भी सरकार की योजनायें अपनी पहुँच नहीं बना पाती....इस संसद का गठन दो वर्षों पूर्व वाराणसी की एक स्वयं सेवी संस्था विशाल भारत संस्थान ने किया था ......हालाँकि अब ये संसद अपने तरीके से काम कर रही है...विशाल भारत संस्थान मुख्य रूप से समाज के गरीब तबके के बच्चों के लिए काम करती है...कूड़ा बीनने वाले और गरीब बुनकरों के हितों के ध्यान में रखकर इस बाल संसद का गठन किया गया....साथ ही इस बात की कोशिश भी है कि देश में महज नेहरु गाँधी परिवार के बच्चों का ही राजनीति का पेटेंट ना कराने दिया जाये.....( ये मेरी अपनी सोच है ).....इस बाल संसद में छः से तेरह साल के बच्चे बाल सांसद का चुनाव लड़ सकते हैं...बाल सांसद का चुनाव लड़ने के लिए बाकायदा एक आचार संहिता भी बनाई गयी है ताकि अभी से इन बच्चों को दागी और साफ़ सुथरी छवि का अंतर स्पष्ट हो जाये...इस आचार संहिता के मुताबिक प्रत्याशी की छवि दागदार नहीं होनी चाहिए मसलन वो स्कूल से जी ना चुराता हो, अध्यापकों की इज्ज़त करता हो, चोरी ना करता हो आदि....साथ ही प्रत्याशी देश के प्रति वफादार हो, जात पात में विश्वास ना करता हो, निम्न और गरीब तबके के बच्चों से प्रेम भाव रखता हो....आमतौर पर ये बातें हमारी बड़ी वाली संसद में चुने लोगों पर लागू नहीं हो पाती...
बाल संसद के चुनाव के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है....नामांकन हो चुका है और चार जून को मत डाले जायेंगे..परिणाम इग्यारह जून को घोषित किये जायेंगे....चुनाव के लिहाज से इस बार वाराणसी को छः बाल संसदीय क्षेत्रों में बांटा गया है....यानि कुल छः बाल सांसद और एक अध्यक्ष या स्पीकर चुना जायेगा.....अगर आप सोच रहें है ये बच्चे खिलवाड़ कर रहें हैं तो आप गलत हैं...क्योंकि इस देश के लोकतंत्र के साथ बड़ो ने जैसा खिलवाड़ किया है ये बच्चे ऐसा कुछ नहीं करने जा रहे हैं.....हमारी और आपकी वज़ह से इस देश की हालत ये है कि अब 'शरीफ' घरों के लोग चुनावों में वोट डालने नहीं जाते ...लेकिन जब कभी ट्रेन में राजनीतिज्ञों को गाली देने मौका मिलता है तो अपना पूरा गाली ज्ञान उड़ेल देते हैं.... इस बाल संसद में ऐसा कुछ नहीं होता ......इस बार के चुनावों में कुल चार बच्चा पार्टियाँ संगठित रूप से चुनाव लड़ रहीं हैं इसके साथ कई निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव में हैं...स्पीकर पद के लिए तो छः साल के अमन ने अपनी दावेदारी पेश की है....नामांकन पत्र में प्रत्याशियों को अपनी संपत्ति जैसे स्कूल बैग, साईकिल खेलकूद के सामानों की भी जानकारी देनी थी...नामांकन करने वालों को पांच रूपये की जमानत राशि भी जमा करनी पड़ी है...हार जाने पर ये जमानत राशि जब्त कर ली जाएगी....प्रत्याशी किसी वोटर को टॉफी, बिस्कुट का लालच भी नहीं दे सकते हैं और चुनाव से बारह घंटे पहले उन्हें अपना चुनाव प्रचार बंद करना होगा...साथ ही चुनाव में खर्च की गयी राशि का हिसाब भी उन्हें चुनाव के बाद देना होगा...इन कठिन नियमो के मानने के बाद कुल मिलाकर इक्कीस दावेदार हैं मैदान में..इनके भाग्य का फैसला करने के लिए बाल मतदाता भी हैं...वाराणसी में कुल मिलाकर ३६२६ नन्हे वोटर हैं जो अपने पसंदीदा प्रत्याशी का चुनाव करेंगे....इनमे से १२९४ लड़कियां हैं जबकि २३३२ लड़के हैं....प्रत्याशियों के चुनावी मुद्दे भी इस चुनाव का बेहद अहम हिस्सा हैं....उदहारण के तौर पर कोई बाल मजदूरी और बच्चों की शिक्षा के लिए लड़ रहा है तो कोई फीस वृद्धि और पर्यावरण को मुद्दा बनाये हुए है....
इस बार बाल संसद का दूसरा चुनाव हो रहा है और शत प्रतिशत वोटिंग के लिए एक नायाब नुस्खा निकाला गया है....दो पोलिंग बूथ तो बनाये ही गए हैं इसके अलावा एक मोबाइल बूथ का भी इंतज़ाम किया गया है....ये पहली बार है जब देश में मोबाइल बूथ का इस्तेमाल किया जा रहा है...शायद देश में चुनाव कराने वाले बच्चों के इस प्रयास से कुछ सीख ले...ये मोबाइल बूथ विभिन्न इलाकों में जाकर बाल वोटर्स के मत एकत्र करेगा....यही नहीं चुनावों की सुचिता बनाये रखने के लिए चिल्ड्रेन सिक्यूरिटी फोर्स यानि बाल सुरक्षा बाल या सी.एस.ऍफ़. की टुकड़ी भी तैनात रहेगी....जो इस बात की तसल्ली करेगी कि कहीं से भी आचार संहिता का उल्लंघन ना होने पाए...
बाल संसद के लिए पड़ने वाले मतों के हिसाब किताब के बाद परिणाम आने में अभी इग्यारह जून तक का इंतज़ार है लेकिन तब तक हम और आप ये सोच सकते हैं कि आखिर इस देश में बाल संसद जैसी सामानांतर लोकतान्त्रिक प्रणाली की आवश्यकता क्यों पड़ी? आखिर क्या वज़ह थी कि कूड़ा बीनने वाले बच्चों को अपना भाग्य लिखने के लिए अपनी कलम उठाने की ज़रुरत आन पड़ी? इस बारे में देश के भाग्यविधातायों को सोचना चाहिए...वैसे तसल्ली है कि देश के वंचित वर्ग ने अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए पूर्णरूप से लोकतान्त्रिक रास्ता अख्तियार किया है और पांच साल तक इंतज़ार करने वाली एक मुर्दा कौम से खुद को अलग साबित भी कर दिया........

सर, कोई जुगाड़ है ?

देश में मानसून का इंतज़ार हो रहा है..सब कह रहें हैं की मानसून इस बार अच्छा आएगा, सब इसलिए कह रहें हैं क्योंकि मौसम विभाग कह रहा है... वैसे मौसम विभाग गाहे बगाहे यह भी कह देता है की हो सकता है की कुछ गड़बड़ हो जाये...खैर, भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणियों पर यकीन करना किसी कचहरी में बैठे तोता गुरु की बातो पर भरोसा करने सरीखा ही है.....वैसे हर साल मानसून में एक और बारिश भी होती है वह है पत्रकारों की बारिश.....हर साल देश के विश्विद्यालयों से सैंकड़ो पत्रकार निकलते हैं( मैं भी कभी इसी तरह निकला था) बारिश के मौसम में निकलते हैं लिहाजा इनमे से कुछ बरसाती मेढ़क की तरह होते है....
जबसे देश में मीडिया ने अपने पाँव औरों की चादर में डालने शुरू किये तब से विश्विद्यालयों में हर साल ये बारिश अच्छी होती है...सबसे बड़ी बात की इसमें मौसम विभाग की एक नहीं सुनी जाती.....वैसे आप अंदाज़ लगा सकते हैं की अगर हर साल सैंकड़ो की संख्या में पत्रकार निकलते हैं तो देश का लोकतंत्र कितना मजबूत हो रहा होगा लेकिन आपको यहीं रोकता हूँ ....ये ज़रूरी नहीं है की पत्रकार बन जाने के बाद कोई पत्रकरिता भी करे ..अब आप कहेंगे की यह क्या बात हुयी.....जब कोई पत्रकारिता करेगा तभी तो पत्रकार कहलायेगा ...जी नहीं बिलकुल नहीं अगर आप इस मुगालते में हैं तो अपना सिर किसी पत्थर पर दे मारिये (अपने रिस्क पर)....कभी बनारस आये हैं आप ? एक बार आ जाइये ..यहाँ आप को सड़क पर दौड़ते हर दो पहिया वाहन में से दूसरे वाहन पर प्रेस लिखा मिलेगा.....उसपर सवार युवक यूं अकड़ कर बैठेंगे मानो अभी अभी माफिया दाउद का साक्षात्कार कर के आ रहें हो और अब कसाब का करने जा रहें हो....इनके जलवे को देखकर आप कह ही नहीं सकते की ये पत्रकार नहीं हैं....हालाँकि किसी पोलिसे वाले की मजाल नहीं होती की इन्हें रोक ले लेकिन अगर रोक कर वाहन के कागज़ मांग भी लिए तो उससे पहले ये अपना परिचय पत्र दिखा देते हैं ...अब आप बताइए की क्या पत्रकार, पत्रकारिता करे, ये ज़रूरी है ?
छोड़िये हम बात कर रहे थे पत्रकारों की सालाना बारिश की....देश के विश्वविद्यालयों से निकलने वाले इन तमाम छात्रों की आँखों में एक सुनहरा सपना होता है की वह अब पत्रकार बन कर अपनी जीविका चला लेंगे..आमतौर पर ऐसे नौसिखिये पत्रकार अख़बारों में जाते हैं....जो कोई किसी बड़े नामचीन अखबार में पहुँच गए वो तो कुछ दिनों के लिए इस क्षेत्र में बने रहेंगे लेकिन जो बेचारे किसी भयंकर अखबार में पहुँच गए तो समझिये की उनका बेडा गर्क....बेचारे अपनी गाड़ी में अपने पैसे का तेल भरा कर रिपोर्टिंग करेंगे....एक्का दुक्का विज्ञापन भी लायेंगे ..अपना दिन भर का समय देंगे लेकिन पैसा नहीं पाएंगे......पाएंगे तो सिर्फ एक परिचय पत्र जो उनके दिल को ये बताएगा की लो अब तुम भी पत्रकार बिरादरी के सदस्य हो गए हो...लेकिन कुछ दिनों बाद जब घर वाले ताना मारना शुरू करेंगे तो समझ लीजिये की पत्रकारिता तेल लेने चली गयी.....प्रिंट ही नहीं इलेक्ट्रोनिक मीडिया में भी यही हाल है...यहाँ तो स्ट्रिंगर अपना स्ट्रिंगर रखता है...डिग्री लेकर निकलने वाले बच्चे जब पुरनियों से संपर्क करते हैं तो पुरनिये उनसे फटाफट कैमरा, माईक और मोटर साइकिल का इंतज़ाम करने की सलाह दे देते हैं...फिर काम सिखने की लिए अपनी ख़बरों पर भेजना शुरू करते हैं...यानि यहाँ भी वही हालात...अपनी गाड़ी, अपना तेल, अपना कैमरा, अपना माईक, अपनी मेहनत लेकिन काम दूसरे का, नाम दूसरे का.....जब स्ट्रिंगर अपना स्ट्रिंगर रखेगा तो क्या होगा आप समझ सकते हैं....ऐसे में जो बचे रह गए वो कुछ दिन चल जायेंगे वरना ज्यादातर भाग जायेंगे....
वैसे जितने लोग डिग्री ले कर निकले वह इस क्षेत्र में आये ही ये भी ज़रूरी नहीं है....अधिकतर तो पहले ही कहीं कुछ और की तलाश में लग जाते हैं...कुछ एक हिम्मत करके इस मैदान में उतरते भी हैं तो ऐसी परेशानियाँ उन्हें भागने के लिए विवश करती है.....लिहाजा कईयों को अपने फैसले पर फिर से मंथन करना पड़ता है...
मीडिया पिछले कुछ सालों में बेहद व्यापक हुयी है लेकिन इसके बाद भी मीडिया की मुख्य धारा में पहुँच कर कार्य करने के लिए कोई सिस्टम नहीं है...कोई कहीं से भी आ सकता है...ऐसे में जुगाड़ तंत्र हावी होने लगता है..... जिसका जितना अच्छा जुगाड़ होगा उसको उतना भाव मिलेगा....इसके साथ ही पत्रकारिता में ऐसे लोग आ जाते हैं जो इसके प्रसार और ग्लैमर को देख कर प्रभावित होते हैं....जिनको पत्रकारिता नहीं भी करनी होती वो भी जुगाड़ देख कर इस क्षेत्र में आ जाते हैं.....लेकिन इनसे इस क्षेत्र को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला.....और हावी होते जुगाड़ तंत्र का ही परिणाम है की यूनिवर्सिटी कैम्पस से बाहर निकलते स्टुडेंट बस यही पूछते हैं की सर, कोई जुगाड़ है ?
वैसे इस बार मानसून अच्छा आएगा इसकी पूरी उम्मीद है लेकिन सूखी धरती की प्यास बुझेगी इसकी कोई उम्मीद नहीं है.......