संपादक केबिन से बाहर बैठें तो !


मुझे नहीं पता कि संपादकों के केबिन में बैठने की परंपरा कब शुरू हुई लेकिन अगर यह परंपरा खत्म हो जाए तो अच्छा। केबिन में संपादक क्यों बैठते हैं इस बारे में अगर गंभीरता से सोचा जाए तो पत्रकारिता में कारपोरेट कल्चर और मीडिया संस्थानों के प्रबंधन का आपसी गठजोड़ सामने आयेगा। इसी का परिणाम पेड न्यूज हैं। 
सिद्धांतों की पत्रकारिता में संपादक एक पद मात्र है। इस पद पर बैठा व्यक्ति खबरों और आम जनता के बीच एक सूत्र होता है। इसकी जिम्मेदारी खबरों की विश्वसनीयता बनाए रखने और समाज के प्रति होती है। जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से प्रस्तुत करना इनका परम धर्म है। लेकिन वक्त बदलने के साथ संपादक की भूमिका बदल गई। 
खबरों पर जब विज्ञापनदाता हावी होने लगे और पत्रकारिता का बीड़ा औद्योगिक समूहों ने उठा लिया तो संपादक की भूमिका गौड़ हो गई। प्रबंधन ऐसे पत्रकार की तलाश करने लगा जो मैनेजर की भूमिका भी बखूबी निभा सके। जिन पत्रकारों में मैनेजमेंट का गुण था उन्हें प्रबंधन ने संपादक की कुर्सी दे दी। अगर उस संपादक में पत्रकारिता का गुण कुछ कम भी हुआ तो चलेगा। यहां से खबरें मैनेज होने लगीं। खबरों का जन संदर्भ विज्ञापन संदर्भ के आगे बौना हो गया। इसे इस क्षेत्र में काम करने वाले आसानी से देख सकते हैं। संपादक के केबिन में मैनेजर के साथ एक व्यक्ति आता है। कुछ देर की बात-चीत और चाय नाश्ते के बाद संपादक अपने मातहतों को एक रिलीज पकड़ा देता है। इसके साथ ही आदेश देता है एक खबर बना कर ठीक-ठाक तरीके से लगा दी जाए। अखबारों में काम करने वाले जानते होंगे कि हर शाम विज्ञापन प्रभारी की ओर कई रिलीजें विज्ञापन लिखकर संपादक के पास पहुंचा दी जाती हैं। अब इन रिलीजों में लिखी बातों का आम जन से भले ही कोई लेना-देना न हो लेकिन इन सभी को अच्छी तरह से डिस्प्ले किया जाता है। इसके लिए प्रमुख खबरों को भी छोटा करना पड़े तो कर दिया जाता है। संभव है कि खबरों को स्थान देने की यह रणनीति संपादकीय मंडल के सभी सहयोगियों के साथ न बनाई जा सके। हो सकता है कोई विरोध कर दे। इसीलिए संपादकों को प्रबंधन ने केबिन दे दिए हैं बैठने के लिए। 
प्रबंधन का रवैया अपने पत्रकारों के लिए हमेशा की दमनात्मक रहा है इसमें दो राय नहीं है। पूरी दुनिया के लिए हक की आवाज उठाने वाला पत्रकार अपने दफ्तर में शोषण का शिकार होता है। इस शोषण में संपादकों का भी बड़ा हाथ होता है। अपने केबिन में बुलाकर सबको मैनेज करने की कोशिश में लगे रहते हैं। अगर कोई सहयोगी प्रबंधन के खिलाफ जाने की कोशिश करता है तो उसे सबसे पहले संपादक ही रोकते हैं। इस मैनेजमेंट की जगह फिर से वही उनका केबिन होती है। अपने चमचों से तेल लगवाने के लिए भी संपादक केबिन का बखूबी उपयोग करते हैं। 
कुछ मत यह भी कहते हैं कि संपादकों का केबिन में बैठना पेशागत मजबूरी है। लेकिन मुझे लगता है कि यह डीलिंग की मजबूरी है। सभी सहयोगियों के साथ बैठ कर डीलिंग नहीं की जा सकती है। प्रबंधन का मोहरा भी खुले में रहे यह प्रबंधन को भी मंजूर नहीं होगा। लेकिन इस सबके बीच पत्रकारिता का तो नाश निश्चित है। अगर समाज की नजरों में पत्रकारिता का महत्व और सम्मान बनाए रखना है तो केबिन प्रथा को खत्म करना ही होगा। 

Some rare photos of Dev anand

Dev anand sahab with Sadhna in '' ASLI NAQLI''



Dev Anand sahab in a pensive mood during the filming of '' MAIN SOLAH BARAS KI'' in Scotland 



Mr. Dev anand with his leading lady Sabrina ( who he introduced ) in '' MAIN SOLAH BARAS KI'' in Jaipur. 


Dev sahab with SD Burman, Kishor kumar, Lata ji, poet Neeraj and RD Burman during the recording of ''PREM PUJARI''. 


Dev sahab with Zeenat Aman in '' ISHK ISHK ISHK'' against the background of  Mt. Everst in 1976. 


Dev sahab with Madhubala in '' KALA PANI''. 

Dev sahab with Kalpana Kartik in ''HOUSE NO 44"

Dev sahab with Geeta Bali in '' BAAZI''

Dev sahab in '' HUM DONO''

Dev sahab with Mumtaaz in '' HARE RAMA HARE KRISHNA''. 
Dev sahab with Tina Munim ( who he introduced) in '' DES PARDES''

Dev sahab with Waheeda Rahman in ''GUIDE''


Dev sahab with Editor-in-Chief of Time Magzine and his wife on the sets of  'JEWEL THIEF''


Dev sahab with Mrs. Indira Gandhi ( then Prime Minister ) . 


Dev sahab with Jawaharlal Nehru at a political rally. 


Dev sahab in a still from his Blockbuster '' DES PARDES''. 

देव साहब की यादों को संजोते हुए

देव आनंद साहब के ऊपर फिल्माए गीतों को गुनगुनाकर एक अजीब सी ख़ुशी मिलती है. लगता है मानो जीवन का नया राग मिल गया. यूं दो देव साहब के ऊपर फिल्माया हर गाना अपने आप में ख़ास है लेकिन यहाँ कुछ चुनिन्दा गानों को आपके साथ बाँट रहा हूँ. उम्मीद है आप भी गुनगुनायेंगे....


देव साहब और नूतन पर फिल्माया गया यह गीत है फिल्म पेईंग गेस्ट का. 1957 में आई इस फिल्म को लिखा था नासीर हुसैन ने. एसडी बर्मन का संगीत था. 


यह गीत उनकी फिल्म 'हमदोनों' का है. 1961 में आई नवकेतन के बैनर तले यह फिल्म देव साहब ने ही बनाई थी. इसमें देव साहब का डबलरोल था. नायिकाएं थी साधना और नंदा. जयदेव का संगीत था.


यह गीत देव साहब की फिल्म 'गाईड' का है. 1965  में आई इस फिल्म का निर्माण भी नवकेतन के बैनर तले देव साहब ने ही किया था. आरके लक्ष्मण के उपन्यास पर बनी इस फिल्म में वहीदा रहमान नायिका थी. भारतीय फिल्म जगत में यह फिल्म एक मील का पत्थर है. 


 इस गीत को लिया गया है देव साहब की फिल्म   'जाली नोट' से. 1960 में बनी इस फिल्म के निर्देशक थे शक्ति सामंत. मधुबाला नायिका थीं. देव साहब ने इसमें एक की सीआईडी अफसर का रोल अदा किया था. 

'फंटूश' फिल्म का यह गीत है. 1956 में आई थी यह फिल्म. नवकेतन के बैनर तले बनी थी. 










1969 में आई इस फिल्म में देव साहब और आशा पारीख ने मुख्य किरदार निभाए. 

ओह देवसाहब! आप लौट आइये।


जीवन का सबसे बड़ा सच यही है कि मौत शाश्वत है। हम हमेशा इस सच से भागने की कोशिश भी करते हैं लेकिन कभी भाग नहीं पाते हैं। हिंदी फिल्मों के सदाबहार नायक देवआनंद साहब भी अब हमारे बीच नहीं हैं। दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। यह वही दिल है जिसने उन्हें 88 साल की उम्र में भी जवां बना कर रखा था। आखिरकार उसी दिल ने उन्हें हमसे छीन लिया। 
देवआनंद साहब अपने आप में एक किवदंती बन चुके थे। जिस उम्र में आम लोग भगवान के भजन में लग जाते हैं उस उम्र में नई फिल्मों की तैयारी में लगे थे। जिस जीवटता की बात हम किताबों में पढ़ा करते हैं उसकी मिसाल थे देवसाहब। मेरे जैसे करोड़ों लोग हैं जो कभी देवसाहब से नहीं मिले लेकिन उनकी फिल्मों ने ऐसा खिंचाव था कि सभी अपने को देवसाहब के साथ जोड़ लेते थे। 

छह दशक तक हिंदी फिल्म जगत में अपनी अलग पहचान रखने वाले देवसाहब ने कई फिल्मों में काम किया। उन्होंने कभी भी फिल्मों के सेल्समैन के रूप में नायक का रोल नहीं अदा किया। उन्हें कभी इस बात की चिंता नहीं रही कि उनकी फिल्म बाक्स ऑफिस पर चलेगी या पिट जायेगी। यही वजह थी कि उन्होंने 'गाइड' फिल्म बनाई। आरके लक्ष्मण के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में तत्कालीन रूढ़ीवादी समाज की बेडि़यों को तरजीह न देते हुये एक शादीशुदा भारतीय महिला का बिना शादी किए एक पराए व्यक्ति के साथ रहना दिखाया गया था। फिल्म के अंत में नायक की मौत भी हो जाती है। इस फिल्म का प्लाट ऐसा था कि कोई भी डिस्ट्रीब्यूटर खरीदने में डर रहा था। लेकिन देवसाहब की यह फिल्म जब चली तो चलती ही गई। गाइड में बेहतरीन अदाकारी के लिए देवआनंद साहब को फिल्म फेयर अवार्ड मिला। फिल्म को पांच कैटेगरीज में फिल्म फेयर अवार्ड के लिए चुना गया। आस्कर के लिए भी गाइड को भेजा गया। यही है देवसाहब का आकर्षण। युवाओं में नशाखोरी की समस्या को लेकर देवसाहब ने हरे रामा, रे कृष्णा बनाई तो प्रवासी भारतीयों की समस्या को देश-परदेस में दिखाया। 
पिछले छह दशक से देव साहब नवकेतन के बैनर तले फिल्में बनाते रहे। इतने लम्बे समय सक्रिय रहना साधारण बात नहीं। नवकेतन के बैनर तले बनी कई फिल्में फ्लॉप हो गयीं लेकिन देवसाहब कभी रुके नहीं। 1950 में फिल्म 'अफसर' से शुरु हुआ सिलसिला 2011 में चार्जशीट तक चलता रहा। बाजी, आंधियां, हमसफर, टैक्सी डाइवर, हाउस नं. 44, फंटूश, काला पानी, काला बाजार, हमदोनों, तेरे घर के सामने, ज्वेलथीफ, प्रेमपुजारी, शरीफ बदमाश, हीरा-पन्ना जैसी फिल्में नवकेतन और देवसाहब ने हमें दी हैं। देवसाहब ने कई चेहरों को भी हिंदी फिल्म जगत में पहचान दिलाई। इनमें गुरुदत्त, जयदेव, राज खोसला, जानी वाकर, किशोर कुमार, यश जौहर, सुधीर लुधायनवी, शत्रुघ्न सिंहा, जैकी श्राफ, तब्बू, उदित नारायण और अभिजीत के नाम शामिल हैं। जाने फिल्म निर्माता निर्देशक शेखर कपूर देव साहब की बहन के लड़के हैं और फिल्म निर्माण का ककहरा उन्होंने अपने मामा देवसाहब से ही सीखा है।
देव साहब न सिर्फ फिल्मों में नायक का किरदार अदा करते थे बल्कि वास्तविक दुनिया के लिए भी एक नायक थे। इसका उदाहरण है इमरजेंसी का विरोध। इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल का देवसाहब ने पूरजोर विरोध किया था। जबकि फिल्म जगत के और किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई। देवसाहब का रोमांच यही था कि हमारे दादा और पिता भी हमेशा देवसाहब की तरह युवा दिखना चाहते थे तो आज का युवा भी देवसाहब की तरह दिखने से गुरेज नहीं करता। देव साहब कहते थे, 'कि मैं यह नहीं सोचता कि मैं जवान था बल्कि यह सोचता हूं कि मैं आज भी जवान हूं।' देव साहब का यह कहना उनके करोड़ों चाहने वालों के लिए सू़त्र वाक्य है लेकिन आज यही वाक्य बेहद चुभ भी रहा है क्योंकि वक्त ने भरी जवानी में देव साहब को मौत की नींद सुला दी।
ओह देवसाहब! आप लौट आइये।

टच वुड


धीरे धीरे अब मौसम सर्द होने लगा है 
कमरे में आने वाली धूप अब अलसा गयी है 
गहरे रंग के कपड़ों से आलमारी भर गयी है 
ऊनी कपड़ों से आती नेफ्थलीन की महक तैर रही है 
कमरे में 
सुबह देर तक तुम्हारे आलिंगन में 
बिस्तर पर पड़ा हूँ 
ना तुम उठना चाहती हो 
ना मैं 
देखो हम साथ खुश हैं 
तुम हर बार की तरह कहती हो
टच वुड 
मैं भी कहता हूँ 
टच वुड 
तुम्हारे साथ घर तक का सफ़र हमेशा लम्बा लगता है 
हाँ, जब इसी रास्ते से 
स्टेशन जाता हूँ तो राह छोटी हो जाती 
मैं देर तक तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ 
हम हमेशा साथ रहेंगे 
तुम फिर कहती हो 
टच वुड 
मैं भी तुम्हारे साथ कहता हूँ 
टच वुड 
एक रिश्ते का ऐसा उत्सव 
विकल्पहीन है यह सौंदर्य 
तुम्हारी पतली ऊंगलियों के बीच में 
अपनी ऊंगलियों को डाल कर 
कितना कुछ पा जाता हूँ मैं 
तुम्हारे चेहरे पर तैरती हंसी भी 
बहुत अच्छी लगती है 
इस बार मैं पहले कहूँगा 
टच वुड 
बोलो 
अब तुम भी बोलो ना 
टच वुड 

माँ अब व्यस्त है


दो-चार दिनों पहले धूप सर्द सी लगी थी
पड़ोस की एक महिला ने भी बताया था कि सर्दी आ गयी है 
माँ अब व्यस्त है 
बक्से में रखे 
कम्बल, स्वेटर और मफलर निकालने में 
वो इसे धूप में रखेगी 
कई बार उलटेगी पलटेगी 
भागती धूप के साथ 
चटाई भी बिछाएगी 
वो जानती है
बच्चों को नेफ्थलीन की महक पसंद नहीं 
वो पूरी तरह से इत्मीनान कर लेना चाहती है 
बच्चों को खुश रखने का 
कई बार बोल बोल कर आखिरकार वह पहना ही देगी 
बच्चों को स्वेटर 
इस बार अपनी पुरानी शाल में 
अपना पुराना कार्डिगन पहने 
वो सोचती रहेगी 
बच्चों के लिए 
एक नया स्वेटर लेने के लिए. 

हंगामा है क्यों बरपा


प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन मार्कण्डेय काटजू का भारतीय मीडिया के संबंध में दिया गया बयान आजकल चर्चा में है। हैरानी इस बात की है कि जो लोग काटूज के न्यायाधीश के रूप में दिये गये फैसलों पर खुशी जताते थे आज उन्हीं में से कई लोग काटजू को गलत ठहरा रहे हैं। शायद सिर्फ इसलिये कि इस बार मार्कण्डेय काटजू ने उन्हीं लोगों को आईना देखने की नसीहत दे दी है। मुझे नहीं लगता है कि आईना देखने में कोई हर्ज है। आज भी प्रबल धारणा यही है कि आईना सच ही बताता है। ऐसे में भारतीय मीडिया इस अग्निपरीक्षा को स्वयं स्वीकार करे तो अच्छा होगा।  

भारत के लोकतंत्र की नींव में घुन तो बहुत पहले ही लग था लेकिन बात तब और बिगड़ी जब लोकतंत्र के चैथे स्तंभ पर काई लग गई। खबरों का आम जनता के प्रति कोई सरोकार नहीं रहा। खबरों के लिहाज से देश कई वर्गों में बंट गया। खबरों का भी प्रोफाइल होने लगा। किसी ग्रामीण महिला के साथ बलात्कार कोई मायने नहीं रखता बजाए इसके कि किसी नामचीन व्यक्ति ने तेज गति से गाड़ी चलाई हो। मानवीय दृष्टि से महिला के साथ बलात्कार की घटना अधिक महत्वपूर्ण है लेकिन प्रोफाइल के नजरिये से नामचीन व्यक्ति का तेज गति से गाड़ी चलाना लिहाजा ग्रामीण महिला की स्टोरी को कोई नहीं पूछता। मुझे नहीं लगता कि इस उदाहरण से समाज का स्वंयभू पहरुआ बनने वाला कोई भी पत्रकार मुंह छुपा सकता है। सभी जानते हैं कि सच्चाई क्या है।

 पत्रकारिता जबसे मीडिया हुई तो न ही जनता के प्रति उसकी उपादेयता रही और न ही कोई विश्वसनीयता बची। दलाल अब लाइजनर्स हो गये और मीडिया घराने उनके आगे लार टपकाते नजर आने लगे। सब कुछ मैनज होने लगा। कारपोरेट कल्चर ने न सिर्फ कलम की धार कुंद कर दी बल्कि कैमरों के लेंस को भी धुंधला कर दिया। खबरों भी पेड होने लगीं। यह तो वही बात हुई जैसे कोई कह दे कि सीता का अपहरण रावण ने नहीं हनुमान ने किया था। आम आदमी के मन से कभी पूछिये तो पता चलेगा कि उसे तुलसीदास के रामायण पर जितना भरोसा है उतना ही मीडिया पर। पर बेचारी जनता नहीं जानती कि अगर आज की मीडिया को कोई स्पाॅन्सर कर दे तो वो बिना किसी तर्क के तुलसीदास के रामायण पर भी प्रश्न चिह्न लगा देगी। साफ है कि आम जनमानस के विश्वास से लगातार धोखा हो रहा है। भला कोई यह कैसे मान सकता है कि पैसे देकर मनचाही खबरें छपवाईं और दिखाईं जा सकती हैं। लेकिन ऐसा हो रहा है। 

हैरानी होती है कि जब मीडिया पर्यावरण, गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर सरकार की खिंचाई करती है। कंटेंट एनालिसिस का सहारा लिया जाये तो नजर आयेगा कि खुद मीडिया पर्यावरण और बेरोजगारी जैसे विषयों से दूर ही रहती है। ऐसे विषयों पर वह तभी आती है जब कोई एजेंसी इस संबंध में कोई रिपोर्ट पेश करती है। वरना मीडिया को कोई जरूरत नहीं कि वो लोगों को इस संबंध में जागरुक करे।  

मीडिया ने अपने लिये इस देश में एक शीशमहल बना लिया है। पूरे देश को मीडिया उसका असली चेहरा दिखाने की कोशिश करती है लेकिन अपना चेहरा देखने की बात पर कन्नी काट लेती है। अब वक्त आ गया है कि एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की जगह स्वयं की सार्थकता सिद्ध करने के लिए खुद ही कदम बढ़ाया जाये। वरना न सिर्फ जनता का भरोसा मीडिया पर से उठ जायेगा बल्कि लोकतंत्र भी खतरे में पड़ जायेगा. 

कश्मीर को ज्यादा ज़रुरत है अन्ना की

पिछले दिनों कश्मीर के मुद्दे पर प्रशांत भूषण के बयान से अन्ना का किनारा कसना इस बात की ताकीद करता है कि अन्ना हजारे कश्मीर के बारे में उसी तरह से सोचते हैं जिस तरह से सरहद पर अपने मुल्क की सलामती के लिए खड़ा एक सिपाही सोचता है। यही वजह रही होगी कि प्रशांत भूषण पर हमले के कुछ देर बाद जब पत्रकारों ने अन्ना से इस संबंध में प्रतिक्रिया लेनी चाही तो वह चुप लगा गये। साफ है कि आदर्श बुद्धिजीविता का वह स्तर जहां कश्मीर को भारत से अलग कर देने की सलाह दी जाती है अन्ना वहां नहीं पहुंचे हैं। अन्ना हजारे अब भी एक सैनिक की तरह सोचते हैं जो कश्मीर को कभी इस देश से अलग रख कर नहीं सोच सकता। अन्ना हजारे का मौन व्रत भी इस बारे में उठने वाले सवालों से बच निकलने का एक जरिया हो सकता है।
अन्ना हजारे देश से भ्रष्टाचार खत्म करने की कोशिश में लगे हुये हैं और उनका एक सहयोगी भ्रष्टाचार से परेशान प्रदेशों को ही खत्म कर देना चाहता है। कश्मीर समस्या से जुड़े कई पहलुओं में एक भ्रष्टाचार का पहलू भी है। केंद्र सरकार ने अपनी प्राथमिकता की सूची में कश्मीर को सबसे उपर रखा है। देश के वार्षिक बजट का एक बड़ा हिस्सा कश्मीर को दिया जाता है। लेकिन दुख की बात यह है कि केंद्र की ओर से कश्मीर को मिलने वाली इस सहायता की बंदरबांट हो जाती है। वर्ष 2009-2010 में कश्मीर को विकास की योजनाओं पर खर्च करने के लिए 13, 252 करोड़ रुपये दिये गये। वहीं पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को कुल मिलाकर 29, 084 करोड़ का बजट आवंटित हुआ। साफ है कि केंद्र सरकार ने खुले हाथ से लुटाया और कश्मीर की अफसरशाही ने बटोरा या फिर खर्च ही नहीं कर पाये। कश्मीर समस्या के लगातार इतने दिनों तक बने रहने के पीछे एक वजह वहां व्याप्त भ्रष्टाचार भी है। बिहार, उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश जैसे प्रदेशों से अधिक बजट कश्मीर को आवंटित होता है। लेकिन विकास के मामले में कश्मीर इन प्रदेशों से पीछे है। इसकी वजह फंड का सही तरीके से खर्च न हो पाना है। विकास के कई कार्य ऐसे हैं जो देश के अन्य राज्यों और कश्मीर में एक साथ चल रहे हैं। ऐसे कार्यों में भी कश्मीर पिछड़ा हुआ है। यहां तक कि सामाजिक क्षेत्रों के लिये भी मिलने वाले कार्यों मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य में भी कश्मीर केंद्र सरकार से मिलने वाले धन को पूरी तरह खर्च नहीं कर पा रहा है। 
विकास कार्यों पर समुचित ध्यान न देना भी कश्मीर की समस्या को बढ़ावा देना है। कुछ दिनों पूर्व हुये एक सर्वे में खुलासा हुआ कि भ्रष्टचार के मामले में जम्मू-कश्मीर अन्य प्रदेशों से बहुत आगे है। स्पष्ट है कि पैसे के खेल में कश्मीर जन्नत से जहन्नुम बनता जा रहा है। टीम अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी अपना आंदोलन अगर कश्मीर में भी चलाये तो समस्या को दूर करने में सहयोग मिल सकता है और विकास की राह पर चलते प्रदेश को देख कर अलगाववादियों के हौसले भी पस्त हो जायेंगे. 

तन का बढ़ना ठीक, मन का बढ़ना नही

दिल्ली में प्रशांत भूषण पर हुआ हमला निंदनीय है इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन हमले के पीछे की वजहों को भी तलाशना बेहद जरूरी है। आखिर क्या वजह रही होगी कि इंदर वर्मा को ऐसा दुःसाहस करना पड़ा। क्या टीम अन्ना को लगने लगा है कि अब वो जो चाहेगी वो करवा सकती है ? क्या टीम आत्ममुग्धता की स्थिती में आ चुकी है ?  
कोर्ट में किसी वकील को उसी के चैंबर में घुस का मारना कोई आसान काम नहीं था। लेकिन इंदर वर्मा और उसके साथियों की नाराजगी इस कदर रही होगी कि उन्हें इस बात का भी डर नहीं रहा कि प्रशांत भूषण पर हमला करने के बाद उनके साथ क्या होगा। साफ है कि टीम अन्ना के व्यवहार से देश का एक वर्ग दुखी है। उसे लगने लगा है कि टीम अन्ना का मन बढ़ गया है। हालांकि टीम अन्ना ने हमेशा से इस बात का हवाला दिया है पूरा देश उनके साथ खड़ा है। अगर ऐसा है तो इंदर कहां रह गया था। इंदर इस देश में नया तो नहीं आया है। इंदर का गुस्सा शब्दों में बयां नहीं हो सकता था। ऐसा इंदर को लगा होगा। तभी तो उसने यह रास्ता चुना।
अन्ना और उनकी टीम देश में व्याप्त प्रशासनिक भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहती है। देश के लोग भी यही चाहते हैं। लेकिन शुरुआत का सिरा नहीं मिल रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश का हर नागरिक अपनी लड़ाई अपने तरीके से लड़ रहा है। आम आदमी ने जब देखा कि अन्ना और उनके साथ कुछ पढ़े लिखे लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में देश की सर्वोच्च सत्ता से लोहा लेने को तैयार हैं तो स्वतः स्फूर्त तरीके से उनके साथ हो चले।
भ्रष्टाचार और लोकपाल के मुद्दे पर बोलते-बोलते जब टीम अन्ना ने और मुद्दों की ओर रुख किया तो बात बिगड़ने लगी। अन्ना हजारे के प्रमुख सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने कह दिया कि देश की संसद से भी उपर अन्ना हैं। इसके बाद प्रशांत भूषण ने वाराणसी में बयान दिया कि कश्मीर को भारत से अलग कर देना चाहिये। इस बयान को देने के पीछे क्या वजह रही होगी यह तो प्रशांत जी ही जाने। लेकिन इतना तो जरूर है कि मीडिया के सामने आप इस तरह की राय रखेंगे तो उसका रियेक्शन तो होगा ही। अगर प्रशांत भूषण प्रेस से मिलिये कार्यक्रम में अन्ना के सहयोगी के तौर पर बोल रहे थे तो उन्हें सिर्फ लोकपाल और भ्रष्टाचार को ही बोलने का विषय बनाना चाहिये। बजाये इसके कि वो कश्मीर और नक्सलवाद पर बोलें। ऐसा बोलने पर लगता है मानों टीम अन्ना अब राजनीतिक होने लगी है।
इंदर को श्रीराम सेना का कार्यकर्ता बताया जा रहा है। लेकिन गौरतलब है कि श्रीराम सेना क्षेत्रीय विवादों से उपजा एक वर्ग है लेकिन रहता भारत में ही है। वह भी भ्रष्टाचार से उतना ही पीडि़त है जितना और लोग हैं। मैं एक बार फिर उस बात को याद दिलाना चाहूंगा जिसका हवाला अन्ना हजारे देते रहे हैं। वह है देश के सभी लोगों के उनकी मुहिम में साथ होने का हवाला। लेकिन लगता है ऐसा नहीं है। प्रशांत भूषण का कहना है कि श्रीराम सेना पर रोक लगनी चाहिये। यहां लगता है कि श्रीराम सेना के प्रति प्रशांत जी की नाराजगी नितांत व्यक्तिगत है। वरना श्रीराम सेना के खिलाफ उन्हें पहले ही आवाज उठानी चाहिये थी। यानी प्रशांत जी का विरोध का यह तरीका सही नहीं माना जा सकता। कुल मिलाकर प्रशांत जी के साथ-साथ पूरी टीम अन्ना को यह मान लेना चाहिये कि इस देश में कई ऐसे लोग हैं जो उनके कामकाज और बयानबाजी से नाराज हैं।

वो आवाज जो हर पल साथ रहती है



कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे आप ताजिंदगी नहीं मिलते हैं लेकिन वो लोग आपकी रोजाना की जिंदगी का हिस्सा होते हैं। जगजीत सिंह भी ऐसे ही थे। किसी नाजुक सी शायरी को जब वो अपने सुरीले गले से गाते थे तो लफ्ज मानों जिंदा हो उठते थे। आपकी जिंदगी में किसी बेजान से शब्द का कोई खास मोल नहीं होता लेकिन जब शब्द जगजीत सिंह के गले से निकल रहे हों तो एक-एक लाइन आपको जिंदगी का सच बताने लगती है। गजलें आमतौर पर इश्क का फलसफां बताती हैं। दिल कच्चा होता है और जब मोहब्बत की मझधार में उतरता है तो जगजीत सिंह की गजलें हर उतार-चढ़ाव में आपके साथ खड़ी नजर आती हैं। प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है, नये परिंदों को उड़ने में वक्त तो लगता है। यह लाइनें किसी ऐसे जोड़े के लिए बेहद मायने रखती हैं जिसने प्यार की दुनिया में पहला कदम रखा हो। जगजीत सिंह की गाई यह गजल आज भी जेहन में इतनी खलिस के साथ कौंधती है मानों कल ही सुनी हो। जगजीत सिंह की गजलों में किसी तेज झरने के करीब खड़े होने पर मिलनी वाली ताजगी का एहसास होता है। कुछ सालों पहले उन्होंने गाया था- इश्क कीजिए फिर समझिये। इन लाइनों को समझने के लिए आपके दिल में इश्क होना चाहिए। जगजीत सिंह को इश्क था गजलों से। उनकी गजलों में रवानगी थी वो भी सुकून भरी। प्रायः ऐसा नहीं मिलता। गजलें आपके साथ चलती हैं और आपको उनका साथ अच्छा लगता है। जगजीत सिंह के लिए निदा .फाजली ने लिखा हो या गुलजार साहब ने। वो सिर्फ जगजीत सिंह के लिए ही लिखा जा सकता था और उसे सिर्फ जगजीत सिंह ही गा सकते थे। डूब कर गाना किसे कहते हैं वो जगजीत सिंह ने बताया। मुझे याद है कि वो एक बार बनारस में एक लाइव प्रोग्राम कर रहे थे। खुले मैदान में हो रहे प्रोग्राम की आवाज खुले में काफी दूर तक जा रही थी। कई ऐसे लोग थे जो उस आवाज को भी सुन रहे थे और महसूस कर रहे थे। ऐसा सिर्फ जगजीत सिंह के साथ ही हो सकता था।

जब आप गमजदा होते हैं और जगजीत सिंह की गजल आपको छू कर निकलती है तो आप आंसुओं को थामने की कोशिश नहीं करते। लगता है मानों वो गजल आपके साथ है। आप खुल कर रो पाते हैं। यह हर गायक की गजल के साथ नहीं होता। जगजीत सिंह ने जिंदगी के गमों को झेला था। उन्होंने अपने इकलौते बेटे की मौत अपनी आंखों से देखी थी। उनका दर्द उनकी गजलों में झलकता था।

बेवफाई हो या तन्हाई, खुशी हो या गम। जगजीत सिंह की गजलें आपको अकेला नहीं छोड़तीं। मेरे जैसे कई युवा हैं जिनको गजल का मतलब जगजीत सिंह ने बताया। सुर के उतरने चढ़ने के साथ ही जगजीत सिंह के गले में होने वाले कंपन में आप फर्क महसूस कर सकते थे। आज मेरे जैसे करोड़ों गजल प्रेमी जगजीत सिंह के न होने का फर्क महसूस कर सकते हैं। जवानी की दहलीज से जिंदगी के प्रति जिस एहसास को जगजीत सिंह ने दिल में बसाया था वो आज भी कायम है और ताउम्र कायम रहेगा।

ऐ समय


कहो तो  ऐ समय
तुम क्यों हुए
इतने अधीर
तुम तो क्षण क्षण देखते हो ना
परकोटे से भविष्य को
मैं भी तो देख रहा हूं
लिए तुम्हारी दृष्टि
संजय तो नहीं
हां
यह कोई महाभारत भी तो नहीं
फिर भी जीवन के कुरुक्षेत्र में
मैं चक्रव्यूह में घिरा हूं
अठ्ठाहस न करो
विकल वेदना का उपहास न करो
गर्भस्थ ज्ञान नहीं तो क्या
अभिमन्यु सा
द्वार तो खुलते और बंद होते रहते हैं
मोह और मोक्ष से परे होते हैं
उर की विह्वलता
मार्ग प्रशस्त करती है
युद्ध की व्याकुलता ही
जीत का हर्ष करती है
जीवन व्योम का तल नहीं है
स्पंदनों का धरातल नहीं है
आलम्ब है
अविलम्ब है
तुम पर आवृत है
तुम से ही निवृत है
वंदन और वरण की चाह में
कब कहां कोई अश्रु छलका
स्पर्श हुआ तो होगा तुमको भी
बोलो अलका
अभिसिंचित मन का संकल्प पढ़ लो
हे समय
अधीरता छोड़ दो
मेरी दृष्टि का भविष्य
तुम गढ़ लो।

हम लाचार साबित हो जाएंगे


एक बार अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ था। इसके बाद पिछले दस सालों में एक बार भी वहां कोई हमला नहीं हुआ जबकि अमेरिका खुले आम आतंकियों के खिलाफ जंग लड़ रहा है। ब्रिटेन में भी एक बार कई साल पहले हमला हुआ था। वहां भी इसके बाद आतंकी हमले की कोई घटना नहीं सुनाई दी। भारत में महज तीन महीनों के भीतर एक ही स्थान पर आतंकी दो बार हमला कर चुके हैं। वह भी देश की राजधानी दिल्ली में। पहले आतंकी हमले का नमूना पेश करते हैं और उसके बाद हमला करते हैं। साफ है कि हमने साबित कर दिया है कि हम आतंकियों के सामने लाचार हैं। संकीर्ण सोच वाली राजनीति हमें एक ऐसे देश का दर्जा दिला रही है जहां आम नागरिक स्वयं को सुरक्षित नहीं महसूस करता है। पूरा विश्व समुदाय अब यह मान चुका है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का दावा पिलपिला है। आतंक पर लगाम लगाने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। 
देश की सरकार के पास ऐसे कई मंत्री हैं जो किसी भी आतंकवादी हमले के बाद राजनीतिक चाशनी में डुबोया हुआ बयान दे सकते हैं। इनका पूरा फायदा भी उठाया जाता है। नेताओं के बयान आते हैं और घटना स्थल पर उनके दौरे होते हैं लेकिन इन सबके बीच आम नागरिकों का जख्म रिसता रहता है। मुआवजों का ऐलान कर सरकार अपनी खानापूर्ति कर लेती है। लेकिन इस सबके बीच हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा पर मंडरा रहे खतरे पर गंभीरता पूर्वक विचार का समय राजनीतिज्ञों को नहीं मिलता है। दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर हुई आतंकवादी घटना ने साबित किया है कि हम न सिर्फ आतंकवाद से लड़ने में असफल रहे हैं बल्कि हमारा सुरक्षा ढांचा पूरी तरह नाकाबिल है। आतंकवाद से लड़ने के लिए हमारे पास कोई स्पष्ट तंत्र नहीं है। कई एजेंसियां मिल कर आतंकवाद से लड़ाई लड़ रही हैं लेकिन किसी भी इकाई में तालमेल नहीं दिखता। केंद्रीय एजेंसियां भी हर बार नाकाफी साबित होती हैं। ऐसे में देश की सुरक्षा का दावा खोखला है। निरंतर अंतराल पर देश में आतंकी हमले होते हैं लेकिन खुफिया तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगती। 
राजनीति की रोटी सेंकने के चक्कर में हमारे देश को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां से हमें विश्व समुदाय को यह बताना बहुत मुश्किल है कि आतंकवाद के खिलाफ हम निर्णायक लड़ाई लड़ना चाह रहे हैं। कम से कम आप भारत की जेलों में कसाब और अफजल गुरु को इतने दिनों तक सुरक्षित रख कर यह भरोसा तो नहीं ही दिला सकते हैं। ऐसे में महज लफ्फाजी से काम नहीं चलेगा। कोई ठोस कदम उठाना होगा। बयानबाजी और जांच के दिलासे से आगे बढ़कर प्रत्युत्तर देना सीखना होगा। कूटनीतिक ही सही लेकिन कदम ऐसे होने चाहिए जो देश के नागरिकों को सुरक्षा की तसल्ली दे सकें। आतंकियों को होने वाली सजा को अधिक देर तक लागू न कर के भी हम विश्व समुदाय को गलत संदेश देते हैं। मानवाधिकार की बातें को थोड़ी देर के लिए यहां भुलाया जा सकता है।  
इसके साथ ही आतंकवाद से लड़ने के लिए एक ऐसा प्रभावी तंत्र बनाना होगा जो किसी भी राजनीतिक स्वार्थ से अलग हो। आतंकियों को यह बताना होगा कि आतंकवाद के खिलाफ देश एकजुट है। अगर हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो हम अपनी नजरों में तो गिरेंगे ही पूरी दुनिया के सामने हमारी लाचारी भी साबित हो जाएगी।

अफ़सोस हम लाचार हैं, हम भारतीय जो हैं


आतंकवाद के खिलाफ भारत की जंग अब दिशाहीन हो चली है। पाकिस्तान को हर बार दोषी ठहरा कर अपनी गरदन बचा लेने का नतीजा है कि देश के अलग अलग हिस्सों में पिछले 10 सालों में तीन दर्जन से अधिक आतंकवादी हमले हुए हैं और इनमें 1000 से अधिक लोगों की मौत हुईं हैं। देश का कोई कोना ऐसा नहीं बचा है जहां आतंकवादियों ने अपनी दहशत न फैलायी हो। दिल्ली से लेकर बंगलुरू तक, आसाम से लेकर अहमदाबाद तक दहशतगर्दों ने आतंक फैला रखा है। इन आतंकियों के आगे देश का नागरिक लाचार है। वह जानता है कि उसकी जान खतरे में है। 
सुरक्षा एजेंसियों की एक बड़ी फौज है देश के पास लेकिन इनका काम त्यौहारों पर एलर्ट जारी करने से अधिक कुछ भी नहीं रह गया है। यह बात सुनने में अच्छी भले ही न लगे लेकिन देश की आतंरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन एजेंसियों पर है वो आम नागरिकों का विश्वास खो चुकी हैं। धमाके दर धमाके होते रहते हैं और सुरक्षा एजेंसियों को भनक तब तक नहीं लगती जब तक किसी न्यूज चैनल पर विस्फोट की खबर न चलने लगे। सवाल पैदा होता है कि क्या भ्रष्टाचार का घुन इन एजेंसियों को भी लग चुका है। क्या इन एजेंसियों के अफसरों ने मान लिया है कि आतंकवाद का खात्मा नहीं हो सकता। या फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। कुछ भी हो भुगतना देश के नागरिकों को पड़ रहा है।
सियासी दांवपेंच का हाल यह है कि मुल्क के गुनहगारों को पालना हमारी मजबूरी हो जाती है। हमें कई साल लग जाते हैं इस बात का निणर्य करने में कि आतंकवादी को फांसी दे या नहीं। भले ही इसके पीछे न्यायप्रक्रिया का सुस्त होना एक अहम कारण हो लेकिन पुलिसिया कार्रवाई भी तेज नहीं कही जा सकती है। इन सब का फायदा भारत के खिलाफ साजिश रचने वालों को मिलता है। पालिटिकल सिस्टम में पैदा हुए लूप होल्स ने देश को खोखला किया है। इस बात में अब कोई दो राय नहीं है। स्वार्थ की राजनीति में देश को गर्त में भेज रहे हैं नेता। देश की आंतरिक सुरक्षा दांव पर लगा दी है। 
 इस सब के बावजूद सवाल यही है कि आखिरकार आतंकवाद के नासूर से मुक्ति मिलेगी कैसे। क्या देश को बयानों के जरिए आतंकवाद से मुक्ति मिल सकती है। क्या यह दिलासा दे देने से कि जल्द ही गुनाहगार पकड़े जाएंगे नागरिकों की जिंदगी सुरक्षित हो जाएगी। मुआवजा कभी भी इस देश के नागरिकों को इस बात की तसल्ली नहीं दिला सकता कि अगली बार आतंकी हमला इस देश पर नहीं होगा। न ही इस बात की कि अब कभी उनका अपना कोई जख्मी नहीं होगा। वक्त अब यह सोचने का नहीं रहा कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। वक्त सबकुछ ठीक करने के लिए कदम बढ़ाने का है। वक्त निर्णायक जंग का है। 

रोजाना बुनता हूँ एक ख़्वाब नया



रोजाना बुनता हूँ एक ख़्वाब नया 

रख देता हूँ उसे 
तुम्हारी आँखों में
तुम सो जाते हो देखता हूँ
तुम्हे 
या शायद अपने ख्वाबों को 
आँखे खोलती हो तुम 
अंगडाई लेते हुए
फिर मुस्कुराती हो 
नज़र भर के देखती हो मुझे
सिर हिला देती हो हौले से 
मानो कुछ पूछ रही हो 
मैं क्या जवाब दूं
बस मुस्कुरा भर देता हूँ
एक ख़्वाब पूरा हो गया.

क्यों भाई बुखारी, खाते इसी देश का हो न!


एक पुरानी कहावत है, मियां मुसद्दी कहते थे। जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो। अब आप इस चक्कर में मत पडि़ये कि ये कहावत मुसद्दी ने कही थी या किसी और ने। बात को पकडि़ये। पकड़ ली। अरे अपने बुखारी मियां। साहब इस देश के मुसलमानों को समझा रहे हैं कि देश भक्ति के नारे मत लगाओ। हाथ में तिरंगा मत लो। कोई कहे कि हिन्दुस्तान जिंदाबाद तो उसके सुर में सुर मत मिलाओ। अन्ना का साथ मत दो। जनलोकपाल बिल में मुसलमानों के लिए कुछ खास नहीं है। लिहाजा जनलोकपाल बिल के चक्कर में मत पड़ो। बुखारी अपने भाई लोगों को समझा रहे हैं कि इस्लाम क्या है। बुखारी फरमान दे रहे हैं कि अन्ना का समर्थन मत करो क्योंकि इस्लाम इसकी अनुमति नहीं देता।
इतने उदाहरण काफी हैं थाली में छेद करने के कि कुछ और दूं। इतने में तो थाली छलनी बन जायेगी। मियां बुखारी की यही देशभक्ति है। इस देश में यही होता है।जि स थाली में खाओ उसी में छेद करो। लोकपाल हो या जनलोकपाल हो दोनों में पूरे देश की बात हो रही है। यह बात दीगर है कि कोई अन्ना का समर्थन कर रहा है और कोई नहीं। करप्शन के खिलाफ सभी हैं। लेकिन इसमें मियां बुखारी मुसलमानों के लिए अलग से व्यवस्था चाहते हैं। क्या चाहते हैं यह तो वहीं जाने लेकिन दिल दुखता है और भुजाएं फड़कती हैं यह सुन कर। कभी कभी बेहद अफसोस होता है यह सोचकर कि हमने सहिष्णुता का पाठ क्यों पढ़ा। आजाद और भगत से कहीं अधिक गांधी को क्यों महत्व दिया। यह इसी देश में हो सकता है। कोई खुद तो थाली में छेद करे ही औरों को भी करने की सलाह दे।
इस देश में कसाब को पाल कर रखा जाता है। इस देश में अफजल की खैरियत का पूरा ख्याल रखा जाता है। अजहर मसूद को बाइज्जत उसके साथियों के हवाले कर दिया जाता है। मौका मिलता है तो तिरंगे को जला भी दिया जाता है। 
बुखारी बाबा इसकी इजाजत कौन देता है। यही है आपका अपना बनाया इस्लाम। अब देश के मुसलमान कम से कम इतना इस्लाम तो जानते ही हैं कि मुल्क से बढ़कर कोई नहीं होता। लेकिन आप का क्या करे मियां बुखारी। आप हिंदुस्तान में है न लिहाजा आपको पूरी छूट है।

मैं अनशन पर नहीं बैठा तो देशद्रोही हूं, मुझे फांसी दे दो



देश के प्रति मेरी ईमानदारी पर सवाल खड़ा कर दिया गया है। मुझे बता दिया गया है कि मैं एक देशद्रोही हूं। क्योंकि मैं अन्ना का वैसा साथ नहीं दे रहा हूं जैसा और लोग चाहते हैं। क्योंकि मैं अन्ना के समर्थन में अनशन पर नहीं बैठ रहा हूं। धिक्कार है मुझपर। मुझे फांसी दे दी जायेगी। हम जैसे लोग परिवर्तन नहीं ला सकते। एक बुजुर्ग देश के भ्रष्टतंत्र के खिलाफ आवाज उठा रहा है और मरने के लिए तैयार है। लेकिन मैं एक युवा होकर भी घर में बैठा हूं। ऐसे शख्स को देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे आदमी को देश निकाला दे देना चाहिए। हो सके तो पाकिस्तान भेज देना चाहिए। 
यकीन नहीं होता ये वही देश है जहां गांधी हुआ करते थे। 
मुझे भी लगता है कि मैं बेकार हो गया हूं। अब मैं बदलाव लाने के लिए खुद से प्रयास कर रहा हूं। मैंने तय किया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने स्तर से जंग लड़ूंगा। अब कभी यातायात नियमों का उल्लंघन नहीं करूंगा। अगर कभी गलती हो गई तो तो पूरा फाइन भरूंगा। कभी हरी पत्तियां देकर अपनी गर्दन नहीं बचा लूंगा। किसी सरकारी ऑफिस में किसी कर्मचारी की मुठ्ठी नहीं गर्म नहीं करूंगा। अगर कभी किसी ने शार्टकट का रास्ता बताया और कुछ ले-देकर काम कराने का भरोसा दिलाया तो इसके खिलाफ पुरजोर आवाज बुलंद करूंगा। 
लोग रामलीला मैदान में तिरंगा लेकर खड़े हैं। देशभक्त हैं। कहते हैं कि भ्रष्टाचार की नाली उपर से नीचे बहती है। अगर ऑफिसर्स सुधर जाएं तो जनता को कोई समस्या नहीं होगी। जनता कब चाहती है कि घूस देकर काम करवाये। अफसर मांगते हैं इसलिए देते हैं। लेकिन यह कह कर हम अपने प्रदर्शन की खिल्ली उड़ायेंगे। जनता को सूचना का अधिकार मिला है। कितना प्रयोग होता है इसका? आम जनता आज भी इस अधिकार का उपयोग करने से कतराती है। उसको सिर्फ अपने काम से मतलब है। उसका काम होना चाहिए कीमत चाहें जो हो। अपने अधिकारों का प्रयोग हमारा फर्ज है। जब तक हम उसे अंजाम नहीं देंगे कहना मुश्किल है कि देश में बदलाव आ पायेगा। 
एक और बात जो चलते-चलते दिमाग में आ गई। ये उसी गांधी से जुड़ी है जिसकी तलाश आज पूरे देश में हो रही है। उसी गांधी ने कहा था कि यदि हम सभी लोग अधिकारों की मांग करें और कर्तव्यों की ओर से विमुख हो जाएं तो ऐसी स्थिती में सम्पूर्ण भ्रम और अव्यवस्था पैदा हो जायेगी। यदि अधिकारों की मांग न करके प्रत्येक व्यक्ति अपना कर्तव्य पूरा करे तो तुरन्त ही समाज में सुव्यवस्था स्वयं स्थापित हो जाएगी।
ये मैंने नहीं गांधी ने कहा था। 

Saans Albeli - Aarakshan (2011) Full Song Pt.Channulal Mishra *Exclusive* - YouTube

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पकड़ सौ की पत्ती और बोल अन्ना जिंदाबाद



सुनने में यह अजीब लगता है लेकिन बात है सही। यह मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं। अगर देश में इसी तरह से अन्ना की आंधी चलती रही तो आने वाले समय में अन्ना ईमानदारी के प्रतीक होंगे और बेइमानी को छुपाने का जरिया। रैलियों और सभाओं के ठेकेदार अन्ना के नाम पर नारा लगाने वालों की फौज रखेंगे। उन्हें एक पॉउच और सौ की पत्ती पकड़ा कर नारे लगवायेंगे। ठीक वैसे ही जैसे आज गांधी, सुभाष, आजाद, अंबेडकर के लिए लगाये जाते हैं। न तो नारे लगाने वालों को इससे कोई मतलब होगा कि वो किसके लिए और क्यों नारे लगा रहे हैं और न ही इन नारों को सुनने वालों को कोई फर्क पड़ेगा। एक संवेदनहीनता का जन्म हो जायेगा। आज सरकारी कार्यालयों में महात्मा गांधी की फोटो टंगी होती है और टेबुल के नीचे से लेन-देन होता रहता है। कुछ दिनों बाद गांधी की तस्वीर के बगल में मुस्कुराते अन्ना की भी तस्वीर होगी और हम और आप में से कोई एक टेबुल के नीचे से अपनी फाइल पार करा रहा होगा। 
यह ठीक है कि अन्ना के समर्थन में पूरा देश एक हो गया है। लेकिन यह भी सच है कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मन में गुस्सा अन्ना के लिए प्यार से अधिक है। इसके साथ ही एक अहम मुद्दा यह भी है कि हम कितने बदल रहे हैं। अगर हम भ्रष्टाचार को हटाना चाहते हैं तो बदलाव अपने भीतर भी तो लाना होगा। एक दिन के नारे से कहीं अधिक जरूरी है साल भर की व्यक्तिगत ईमानदारी। बिजली के बिल से लेकर रेलवे के टिकट तक में हम अपना काम सुविधा शुल्क के जरिए करवाने के आदती हो गये हैं। सिविल सोसाइटी का सिविक सेंस जब जागता है तो हम गवर्नमेंट पर ही आरोप मढ़ देते हैं। कह देते हैं कि सरकारी कर्मचारी लेते हैं तो हम देते हैं। क्यों नहीं हम अपना काम कराने से मना कर देते हैं। करप्शन को आश्रय हम नहीं देते हैं ? 
अन्ना का सच्चा समर्थन करना है तो प्रण कीजिए कि न तो भ्रष्टाचार सहेंगे और न ही उसके भागीदार बनेंगे। भले ही आपका बच्चा कम अनुपस्थिती के कारण परीक्षा न दे पाये लेकिन आप घूस न देकर एक इम्तिहान जरूर पास कर लेंगे। अगर ऐसा नहीं कर पा रहे तो चुपचाप घर पर बैठ जाइये और मत दावा करिए कि आप इस देश को एक नयी दिशा देना चाहते हैं।

थूक पार्ट -टू, आज नहीं थूके तो कल आप पर थूकेगा

चौंसठ सालों से हम सब अपनी थूक इसलिए निगलते आ रहे हैं क्योंकि सरकारी कागजों में सार्वजनिक स्थानों पर थूकना अपराध है। लिहाजा घोंट कर ही काम चलाना पड़ता है। लेकिन आज जब मौका मिला है तो देश का आम आदमी पीछे नहीं रहना चाहता है। वो जी भर के थूकना चाहता है उस सिस्टम के मुंह पर जो उसे आम आदमी का नाम तो देता है लेकिन सहूलियत जानवरों से भी बदतर। यही वजह है कि मुझे भी थूक पार्ट टू लिखने की अन्र्तप्रेरणा मिली। कुछ लोगों को जरूर बुरा लगा होगा और लग भी रहा होगा इसके लिए मैं क्षमा चाहता हूं। लेकिन एक बात भी लगे हाथ बता देना चाहता हूं कि अगर आज आपने इस सड़ चुके सिस्टम पर नहीं थूका तो आपका कल आप पर थूकेगा। मर्जी आपकी आखिर मुंह है आपका।
सरकार कहती है कि अन्ना और उनकी टीम पूरे देश का नेतृत्व नहीं कर सकते। सिविल सोसाइटी की नुमांइदगी चार-पांच लोगों को नहीं दी जा सकती। मैं भी इस बात से इतेफाक रखता हूं लेकिन मुझे लगता है कि सरकार की आंखों पर अहम का चश्मा लगा हुआ है। तभी तो उसे दिल्ली से लेकर चेन्नई तक हो रहे आंदोलन नहीं दिख रहे। लाखों लोग सड़कों पर हैं तो फिर किस बात का सबूत चाहती है सरकार? अगर देश का कानून देश के लोगों के हिसाब से बनता है तो जनलोकपाल बिल को पास करने में क्या परेशानी है ? आज की राजनीति में नैतिक मूल्यों को तलाशना हालांकि अपना समय बर्बाद करना है लेकिन फिर भी किसी भी लोकतांत्रिक सरकार से इस बात की उम्मीद नहीं की जा सकती कि जनता सड़क पर हो और आप संसद की गरिमा का हवाला देकर उनकी आवाज अनसुनी करते रहे। लोग थूकते रहे और मुंह पोछ कर बड़ी ही बेहयाई से सरकार अपनी बात पर अड़ी रहे। 
सड़ चुके सिस्टम के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाना जनता का संवैधानिक अधिकार है। सरकार उसे छीन नहीं सकती है। आज देश में वही हो रहा है। हम कागजातों में लोकतंत्र और गणतंत्र में जी रहे हैं लेकिन सच यही है हम भ्रष्टतंत्र में जी रहे हैं। 15 अगस्त उन्नीस सौ सैंतालिस से लेकर अब तक इस देश की जनता ने पल-पल जो मौत कबूली है आज उनमें से कुछ का हिसाब किताब हो रहा है। 
अब भी वक्त है। सफेदपोशों  को समझ लेना होगा कि देश परिवर्तन चाहता है। उन्हें अपना कुर्ता सलामत रखना है तो इस मुगालते में न रहे कि लोगों के मुंह पर ताले लगे हैं। वरना संसद के गलियारों में हवा का रुख बदलते देर नहीं लगती। खुदा न करे अगर यह हवा दिल्ली के रामलीला मैदान की ओर बह निकली तो फिर नौटंकी करने का काम भी आप सब को नहीं मिलेगा। 
बोलिए जनता जनार्दन की जय।।

बहुत दिनों से घोंट रहे थे अब थूक रहे हैं

देश में आजकल अन्ना की चर्चा है। हर ओर अन्ना ही अन्ना नजर आ रहे हैं। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने पूरे देश को अन्नामय कर दिया है। अन्ना के समर्थन में देश का एक बड़ा वर्ग सड़कों पर उतर आया है। कोई अनशन कर रहा है तो कोई गा-बजा कर अन्ना का साथ दे रहा है। कई लोग ऐसे भी हैं जो सड़कों पर प्रदर्शन तो नहीं कर रहे हैं लेकिन मुंह से अन्ना के साथ होने की बात कह रहे हैं। इन सब के बीच एक बात सामान्य है। सभी सालों से जिस थूक को घोंट रहे थे उसे जी भर के वहां थूक रहे हैं जहां थूकना चाह रहे हैं। वैचारिक रूप से अन्ना ने देश की ऐसी रग पर हाथ रखा है जिसकी ओर कोई देख भी ले तो दर्द उभर आता है। अन्ना ने उसी रग को दबा दिया है। जनता की वो भीड़ जो राजनीतिक रूप से लोकतंत्र का हिस्सा है चिल्ला रही है। ये भीड़ व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करने का यह मौका जाने नहीं देना चाहती है। 
राजनीतिक रूप से असंतुष्ट भारत के पास विकल्प बहुत कम हैं। जो हैं भी उनका उपयोग सीमित है और उनका उपयोग कर पाने के लिए लम्बा इंतजार भी करना पड़ता है। लिहाजा अंदर ही अंदर एक घुटन सी होने लगी है। रातों रात सिस्टम को बदला नहीं जा सकता है। यह एक लम्बी प्रक्रिया है और इसमें समय लगता है। बीच-बीच में अवरोध भी बहुत आते हैं। सिस्टम को कोसे बिना इस लम्बे समय को नहीं काटा जा सकता है। आमतौर पर सिस्टम में बदलाव की सोच हमारे दिमाग से निकलकर चाय की दुकान तक जाती है और फिर लौट आती है। ऐसे में यदि आपको अन्ना जैसा नेतृत्व कर्ता मिल जाये और अपनी भड़ास निकालने के लिए दिल्ली का रामलीला मैदान तो इससे बेहतर क्या हो सकता है। मन में कसक सबके है। सताये हुये सब हैं। इस देश का हर चौक तहरीर चौक बनने की उम्मीद लगाये बैठा है। यही वजह है कि जैसे ही उसे मौका मिलता है कम से कम वो जंतर-मंतर का रूप तो ले ही लेता है। कुछ युवाओं की टोली आती है हाथों में तिरंगा लहराते हुये और चीख-चीखकर अपनी आवाज बुलंद करती है और आगे बढ़ जाती है। 
ऐसा नहीं है कि जो सड़कों पर निकल पा रहे हैं वही भड़ास निकाल पाने का संपूर्ण आनंद ले रहे हों। घरों में भी चर्चा होती है और व्यवस्था को कोसा जा रहा है। अन्ना और उनकी टीम का जन लोकपाल बिल इस देश को कुछ नया दे पायेगा या बिलों के बिल में कहीं खो जायेगा ये तो पता नहीं। लेकिन फिलहाल देश के हर उस नागरिक को अन्ना हजारे के नाम पर छूट है कि वो बदबूदार सिस्टम के प्रति नाराजगी जता सके। 

अब यह संकल्प लेना होगा 
इस देश में रहने वाले राजनीतिक रूप से तो आजाद हैं लेकिन मानसिक रूप से आजादी का टुकड़ा भर भी हम आज तक हम नहीं ले पाये हैं. जिन संघर्षों और आंदोलनों के सहारे हमें आजादी मिली आज हम उन्हें ही महत्व नहीं देते हैं. शहीदों की शहादत पर भी वक्त-बेवक्त प्रश्नचिह्न लगाने वाले कम नहीं हैं. इतने के बाद अगर किसी ने टोक दिया तो उसे संविधान की दुहाई दी जाती है. कहा जाता है कि संविधान में हर एक को अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता है. अब जब संविधान की ही दुहाई दे दी तो कोई क्या करेगा? 
आजादी की लड़ाई लडऩे में महात्मा गांधी का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है. महात्मा गांधी और संविधान निर्माता बाबा भीमराव अंबेडकर के विचार कभी एक नहीं रहे. यहां तक की स्वतंत्रता आंदोलन में भी बाबा और बापू का मतभेद नजर आता है. कई गोष्ठियों में बाबा भीमराव ने देश में दलितों और शोषित वर्गों के लिए आंदोलन करने को ज्यादा तरजीह दी बजाए इसके कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी जाए. गांधी जी ने कई बार इसका विरोध किया. यही वजह थी बाबा और बापू आपको बहुत कम स्थानों पर ही एक साथ नजर आयेंगे. 
अंग्रेजों से जंग जीतने के बाद देश को एक संप्रभु और गणराज्य बनाने की कवायद शुरू हुई. इसके लिए आवश्यक था कि हमारे देश का अपना एक संविधान हो. इसके जिम्मेदारी सौंपी गई बाबा भीमराव अंबेडकर को. संविधान सभा ने दुनिया के कुछ पुराने और उस समय के प्रभावशाली देशों के संविधान का अध्ययन कर भारत का संविधान बना दिया. बिना किसी संदेह यह इस देश के लिए एक गौरवशाली बात थी. आजाद मुल्क का हर शख्स अब आजाद था. उसके लब आजाद थे. किसी भी विषय के बारे में बोलने की उसे पूरी स्वतंत्रता थी. शुरुआत में सब कुछ ठीक रहा. बोलने वाला अपनी मर्यादा और दूसरे की इज्जत का पूरा ख्याल रखता था. धीरे-धीरे यह अनुशासन टूटने लगा. बोलने की स्वतंत्रता अब छूट का रूप लेने लगी. वक्त थोड़ा और बीता. छूट हथियार बन गई और संविधान दुहाई. बोलने वाला कुछ भी बोल कर संविधान का पर्दा डाल देता है.  चौंसठ साला आजादी अब एक ऐसी स्थिति में आ चुकी है जहां एक बार फिर से कई बातों पर विचार करने की आवश्कता है. नेता और प्रजा दोनों अब अपना-अपना राज चलाने में लगे हैं. राजनीतिक रूप से अपरिपक्वता हमारे देश को खाये जा रही है ये सही है लेकिन जनता भी कहीं से परिपक्व है ऐसा नहीं लगता है. राजनेताओं के बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं. इस संबंध में नाना जी देशमुख के एक आलेख की कुछ पंक्तियां याद आती हैं कि आज इस देश में किसी राजनीतिक पार्टी में कोई नेता नहीं है बल्कि नेताओं की राजनीतिक पार्टियां हैं. अब ऐसे में नेताओं से फिलहाल कोई उम्मीद बेमानी के सिवा कुछ नहीं है. लिहाजा आइये इस 15 अगस्त हम और आप संकल्प लें कि नागरिक होने का अपना कर्तव्य हम पूरी निष्ठा से निभाएंगे. 

इस बार कलमाड़ी कैसे रहेंगे?


लीजिए आ गया एक बार फिर छुट्टी वाला दिन। वही दिन जिसकी छुट्टी आपके कैलेंडर में कभी इधर से उधर नहीं होती। वही दिन जब लाल किले की प्राचीर पर भारत तिरंगा फहराता है इंडिया छुट्टी मनाता है। पता नहीं क्यों लेकिन लगता है कि अब शायद ऐसे त्यौहारों पर लोगों में उत्साह नहीं होता। हो सकता है बार-बार एक ही जगह एक जैसा ही प्रोग्राम करने से लोगों में दिलचस्पी कम हो गई हो। इस बारे में मेरा एक सुझाव है। इससे 15 अगस्त के जश्न का जोश दुगुना हो सकता है।
हमें इस बार झण्डा फहराने के स्थान में थोड़ा परिवर्तन करना चाहिए। इस बार झण्डा फहराने के लिए हमें उस स्टेडियम का इस्तमाल करना चाहिए जिसका उपयोग कामन वेल्थ खेलों की ज्यादातर स्पर्धाओं के लिए हुआ है। वहां हम सब को एकत्र होना चाहिए और झण्डा फहराना चाहिए। आखिर यही जगह तो है जहां हमारे देश ने अपनी प्रगतिशीलता अन्य देशों के सामने बताई।
अब सवाल ये है कि हर बार देश का प्रधानमंत्री ही लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त को तिरंगा क्यों फहराये। क्या देश में कोई और नहीं है जो प्रधानमंत्री को थोड़ी राहत दे सके। मेरे पास इसका जवाब है। है ना। अपने कलमाड़ी जी। कसम से ऐसा योग्य और सुशील व्यक्ति मिलना मुश्किल है। देश की बागडोर ऐसे ही आदमी के हाथों में होनी चाहिए। कलमाड़ी जी कि योग्यता कितनी है इस बारे में न जाने कैग की कितनी रिपोट्र्स लिखीं जाएंगी। लेकिन इसके बावजूद कलमाड़ी पुराण खत्म नहीं हो पाएगा। महज एक खेल आयोजन कराने में जो कई अरबों का खेल कर सकता है उसकी योग्यता पर शक करने का तो सवाल ही नहीं उठता। सोचिए कितना अच्छा लगेगा जब कलमाड़ी जी अपने हाथों से तिरंगा फहराएंगे। सच कहता हूं एक बार आजमा के देखने में कोई हर्ज नहीं है। 

हर बात जुबां से कहना ज़रूरी तो नहीं...

मुझे इस बात का पक्का यकीन तो नहीं लेकिन शायद मेरी लेखनी से निकले शब्दों के पास खुद पर खुश होने के सिवा कोई और विकल्प नहीं होता है. लेकिन फिर भी अपने दोस्तों द्वारा पिछले कई दिनों से अपनी आभासी पुस्तिका पर ना लिख पाने की वजहों के बारे में पूछा जाना सुखद रहा. लगने लगा कि रगों में लिपटी एक आग जब कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर शब्द दर शब्द उतरती है है तो कुछ एक यार दोस्त उस आग को धधकते, सुलगते, हाहाकार करते देख खुश होते हैं.  शुक्रिया दोस्तों. 
वैसे जलने का अपना मजा होता है. यकीन जानिए इस बात का पता मुझे भी तब चला जब मैंने जलना सीख लिया. एक ऐसी आग में जो आपको जला कर राख नहीं स्वर्ण बना देती है. बेचेहरा हवाओं में, बेतरतीब बादलों में आपको मकसद नज़र आने लगता है. एक बाँध सा होता है जो उसके स्नेह ज्वार के आने के साथ ही टूट जाता है और आप जी भर के सांस लेते हैं. इसके बाद आपको एक नव जीवन मिलता है. एक गहरी सांस और उसके साथ घुली हुई एक नरगिसी खुशबु. सब कुछ क्षण भर में ही हो जाता है लेकिन हाथों में आया यह मुट्ठी भर आसमान आपको विश्व विजेता होने का एहसास दिला जाता है. अब इसे विरोधाभास कह लीजिये लेकिन अगले ही क्षण एक विश्वविजेता अपना सब कुछ खोकर भी दुनिया की सबसे कीमती चीज़ पा लेता है. एक इबारत ज़िन्दगी और ख़्वाब देखने की आज़ादी. खुले आसमान के नीचे बेतक्क्लुफ़. पैर पसार लेने के बाद आपके लिए कोई मंजिल मायने नहीं रखती. बेलौस आप. 
बेवजह आप मुस्कुरा सकते हैं. देर रात गए कोई खाली सड़क ना मिले ना सही भीड़ भरे बाज़ार में भी आपके पास गुनगुनाने के लिए कुछ नहीं बहुत कुछ  होता है. जीवन राग . किसी योगी तपस्वी सा आप निर्मूल विचार को थामे बहुत दूर तक चले जाते हैं और ना तो पीछे मुड़ कर देखने का मन करता है और ना ही रत्ती भर थकान होती है. बस चलते जाने का मन करता है. और आगे, और आगे. हर मंजिल से परे. 
माफ़ कीजियेगा. यदि यह विचार समीर आपको व्यथित कर गया तो. किसी युवा के पास अपनी सोच के कोलाज पर उकेरने के लिए बहुत कुछ होता है. बस रंगों का चयन सही होना चाहिए. मेरे रंगों वाले बक्से में कोई रंग नहीं था वही लेने गया था. लौटा हूँ तो सिर से लेकर पाँव तक खुद भी रंगा हूँ और रंगों वाले बक्से में सतरंगी रंग भी हैं. अब खूब खेलूंगा इन रंगों के साथ. 
ग़ालिब ने यह मुझसे तो नहीं कहा था लेकिन बुजुर्गों ने बताया है कि ग़ालिब ने ही कहा था.  कमबख्त इश्क निकम्मा  बना देता है. 
कमबख्त ग़ालिब हर बात जुबान से कहना ज़रूरी तो नहीं. 
खुदा हाफिज, आप के ना चाहने पर भी हम जल्द मिलेंगे. 
मिलते रहेंगे. 

ख़ामोशी

अक्सर चुप सी बैठ जाती है ख़ामोशी 
और मुझसे कहती है 
बतियाने के लिए 
कहती कि आज तुम बोलो 
मैं सुनना चाहती हूँ
शब्द ही नहीं मिलते हैं मुझको 
उससे बात करने के लिए
चुप सा रह जाता हूँ 
बस फटी आँखों से देखता हूँ 
वो कहती कि 
तुम भी अजीब हो 
मुझे में ही समो जाते हो 
खामोश हो जाते हो 
बस खिलखिलाकर हंस देती है 
ख़ामोशी.
मैं चुप बस देखता रहता हूँ उसे. 

माँ तो यह भी है...

गंगा का पानी स्थिर है. किनारों पर जमी काई बयां कर रही है माँ की दशा. 
आज भी हम सही अर्थों में उसे माँ का दर्जा नहीं दे पायें हैं. हाँ यह कहते नहीं थकते की यह तो हमारी माँ है. भारतीय समाज में आ रहा बदलाव हमें स्पष्ट रूप से वहां भी दिखता है. अर्थ प्रधान होते भारतीय समाज के लिए शब्दों का भावनात्मक स्वरुप बाज़ार भाव से निर्धारित होता है. हम पैसे खर्च कर अपनी माँ को माँ बनाये रखना चाह रहें हैं. 

कलेजा मुंह  को आता हैं जब आप गंगा की स्थिति से रूबरू होते हैं. लगभग ढाई हज़ार किलोमीटर के अपने लम्बे और कठिन सफ़र में गंगा एक नदी की तरह नहीं बल्कि एक माँ की तरह व्यवहार करती आगे बढती है. जिस तरह से माँ के आँचल में हर संतान के लिए कुछ न कुछ होता है वैसा ही गंगा के साथ है. गंगा कभी अपने पास से किसी को खाली हाथ नहीं लौटाती. जो भी आता है कुछ लेकर ही जाता है. इतने के बावजूद अब गंगा हमारे लिए कोई मायने नहीं रखती. हमने उसे मल ढोने  वाली एक धारा बना कर छोड़ा है. 

राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के अनुसार गंगा बेसिन में रोजाना १२,००० मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है. इसमें से महज ४००० मिलियन लीटर सीवेज को ट्रीट करने की क्षमता वाले ट्रीटमेंट प्लांट लग पायें हैं. गंगा किनारे बसे क्लास १ और क्लास २ के शहरों  से निकला ३००० मिलियन लीटर सीवेज सीधे गंगा की मुख्य धारा में बहा दिया जाता है.  कानपुर जैसे शहर में रामगंगा और काली नदी से बहकर आने वाला कारखानों का अपशिष्ट पूरी गंगा पर भारी पड़ता है. हमने जो भी थोड़े बहुत सीवेज को ट्रीट करने की व्यवस्था की है वो भी समुचित नहीं है. दरअसल भारत में लगाये गए ज्यादातर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट सिर्फ घरेलू सीवेज को ट्रीट करने में सक्षम हैं. जबकि हमारे यहाँ कारखानों से निकले  सीवेज और घरेलू सीवेज दोनों का प्रवाह एक ही सीवर लाईन से होता है. ऐसे में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट घरेलू सीवेज को ट्रीट कर देते हैं हैं लेकिन कारखानों से निकला सीवेज लगभग बिना ट्रीट किये ही गंगा में बहा दिया जाता है. ऐसे में कई धातुएं गंगा के पानी में आकर मिल जाती हैं. कहने को हम सीवेज को  ट्रीट कर रहें हैं लेकिन सही मायनों में हमने महज लम्बी लम्बी नालियों से गुजार कर सीवेज को गंगा में बहा दिया. 

गंगा में लगातार मिल रहे इस तरह के सीवेज से गंगा जल के गुणों में परिवर्तन आ गया है. चूँकि गंगोत्री से निकलती है तो लगभग ३००० मीटर की ऊंचाई से नीचे गिरती हैं. इसके बाद तेज वेग से पत्थरों से टकराते हुए  गंगा आगे बढती है. इस तरह के प्रवाह के कारण गंगा के पानी में आक्सीजन की प्रचुर मात्र घुल जाती है. यही आक्सीजन उसे अमृततुल्य बना देती है. लेकिन जिस तेज़ी से गंगा में औद्योगिक कचरा घुल रहा है उससे गंगा के पानी का गुण बदल गया है. मैदानी इलाकों में प्रवेश के बाद अब गंगा का पानी काफी दिनों तक संग्रह कर के नहीं रखा जा सकता. औद्योगिक कचरे का दुष्परिणाम हम अब अपनी पीढीयों में दिख रहा है. मैदानी इलाकों में गंगा बेसिन में होने वाली खेती में फसलें खराब हो रही हैं. इन फसलों में हेवी मेटल मिले हैं. यह हेवी मेटल गंगा से निकली नहरों से होकर खेतों तक पहुँचते हैं. 

कहने को हम गंगा को माँ का दर्जा देते हैं लेकिन माँ के प्रति हमारी धारणा बदल चुकी है. शायद आपको मेरी बात बुरी लगे लेकिन अब माँ हमारे लिए महज एक शब्द रह गया है जिसमे कोई भाव नहीं होता. 

बोल गिलानी 50 - 50

मोहाली में भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच होने वाला है. भारत के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह इस मैच का लुत्फ़ उठाने जायेंगे. उन्होंने पाकिस्तान के प्रधान मंत्री युसूफ राजा गिलानी को भी न्योता भेजा और गिलानी ने मंजूर भी कर लिया. अब दो-दो प्रधानमन्त्री इस मैच का आनंद उठाएंगे. वो भी जानते हैं कि यह मैच महज एक मैच नहीं है. यह जीने मरने का सवाल है. दोनों टीम्स के खिलाड़ी मैच को बैट और बॉल से ही नहीं हाथ और पैर से भी खेलते हैं. आमतौर पर भारत और पाकिस्तान के बीच का मैच बेहद रोमांचक ही होता है. पूरी दुनिया इसे देखती है. साँसे रोक देने वाला मैच होता है. हालांकि यह सब बातें आप सभी को पहले से पता हैं. इसमें कोई नयी बात नहीं है. 

इस बार मेरे दिमाग में एक आईडिया है. फिफ्टी-फिफ्टी का.मौका होली का है और हम होली में दुश्मनों को भी गले लगा लेते हैं. चैती गुलाब की खुशबू माहौल को गमका रही है. हम अमन की बात तो हमेशा से करते आयें हैं लिहाजा मौका भी है और दस्तूर भी. आ गले लग जा. देखो मैच तो हर बार होता है. इस बार अगर कुछ ख़ास हो जाये तो दुनिया देखे. वैसे फिफ्टी-फिफ्टी के कांसेप्ट में नुकसान भारत का ही है लेकिन फायदा इंसानियत का है.  सन ४७ से खून बह रहा है. तुम गोलियां चलाते हो हम बचाव करते हैं. तुम कश्मीर कश्मीर चिल्लाते हो हम शांति की दुहाई देते हैं. तुम ड्रैगन की पूँछ पकड़ कर दिल्ली के ताज पर बैठने का ख्वाब देखते हो. हम विकास की सीढियां चढ़ ड्रैगन से भी ऊँचा होने की कोशिश में लगे हैं. हमारे देश के लोग बर्फ से ढंकी वादियाँ देखने कश्मीर जातें हैं तो तुम अपने दहशतगर्दो को ठण्ड के मौसम में पहाड़ों की बीच छुपने के लिए भेजते हो. हम बस चलाते हैं दो मुल्कों के लोगों के दिलों को जोड़ने के लिए तो तुम कारगिल में मिर्ची बम छोड़ने लगते हो. हम ट्रेन चलाते हैं 'वीर ज़ारा' के लिए तो तुम 'ब्लैक फ्राईडे' दिखाते हो. फिर भी मेरे यार गिलानी कोई बात नहीं. 

जब तुम्हारा मुल्क आज़ाद हुआ तो तुम्हारे पास न तो खाने के लिए अनाज था और न ही सिर छुपाने के लिए मकान. हमने तुम्हे वो सब दिया जो एक मुकम्मल मुल्क को चाहिए. यह बात और है कि तुमने हमारी कई बस्तियों में वाशिंदों को बेघर किया लेकिन हमने हर बार तुम्हे माफ़ किया. मुंबई में तुमने दहशतगर्दी का मेगा एपिसोड खेला. लेकिन हमने तुम्हारे हर प्रायोजक की दूकान बंद करा दी. लीड रोल करने वाला एक कलाकार  हमारा मेहमान है. अब बतावो गिलानी और क्या चाहिए. 

बात क्रिकेट की करो तो वहां भी तुम कुछ ख़ास नहीं कर पाए हो. हाँ यह ज़रूर है कि शारजहाँ के मैदानों में बेईमानी कर के तुमने कई मैच जीत लिए और अपना रिकॉर्ड अच्छा कर लिया. लेकिन वर्ल्ड कप में हमने हर बार तुम्हे पटखनी दी है. इस बार हम तुम्हे हर गिला शिकवा भुला कर यह ऑफर दे रहें हैं. हम और तुम अगर मैच को फिफ्टी फिफ्टी बाँट ले तो? देखना दुनिया में फिर न कोई ड्रैगन रह जायेगा और न ही कोई दरोगा. सोच लो गिलानी. बात तुम्हारे फाएदे की है. 

तो गंगा को राष्ट्रीय नाला घोषित कर दे सरकार



समझ में नहीं आता की केंद्र सरकार अब इस काम में इतनी देर क्यों कर रही है. बिना देर किये केंद्र सरकार को राज्य सरकारों को विश्वास में लेकर सदानीरा को राष्ट्रीय नाला घोषित कर देना चाहिए. गंगा की लगातार बिगड़ती सेहत और केंद्र सरकार के प्रयासों को देखते हुए आम जन को इस बात की पूरी उम्मीद है कि जल्द ही गंगा नदी नहीं रह जाएगी बल्कि मल जल ढ़ोने वाले एक नाले के स्वरुप में आ जाएगी.

यह दोनों तस्वीरें वाराणसी के रविदास घाट की हैं
घाट के करीब ही अस्सी नाला सीधे गंगा में गिरता है 
गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक लगभग २५२५ किलोमीटर का सफ़र तय करने वाली गंगा अपने किनारों पर बसे करोड़ों लोगों को जीवन देती है. देव संस्कृति इसी के किनारे पुष्पित पल्लवित होती है तो दुनिया का सबसे पुराना और जीवंत शहर इसी के किनारे बसा है. माँ का स्थान रखने वाली गंगा भारतीय जनमानस के लिए अत्यन्त आवश्यक है. मोक्ष की अवधारणा में गंगा है. मृत्यु शैया पर पड़े जीव के मूंह में गंगा जल की दो बूंदे चली जाएँ तो उसको मोक्ष मिलना तय माना जाता है लेकिन अब यह अवधारणा बदलने का वक़्त आ गया है. सदानीरा अब अमृतमयी जल से नहीं घरों से निकलने वाले सीवर से प्रवाहमान है. जीवन मूल्यों की बलि चढ़ा कर होने वाले विकास का नतीजा टिहरी बाँध के बन जाने के बाद तो गंगा की धारा बिजली के तारों में चली गयी. अब गंगा का पानी ज़मीन पर नहीं टिहरी में बनने  वाली बिजली में चला गया है. 

गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के नाम पर इस देश के नौकरशाहों और राजनेताओं ने अपने बैंक एकाउंट में पैसे की गंगा बहा ली. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा एक्शन प्लान के पहले चरण में लगभग एक हज़ार करोड़ से भी ज्यादा की धनराशि खर्च की गयी. लगभग २५० से अधिक परियोजनाएं  पूरी हुयीं. गंगा एक्शन प्लान का पहला चरण अपने तय समय से सालों देर तक चला. अभी चल ही रहा था की गंगा एक्शन प्लान के दूसरे चरण की योजना बन गयी. अब गंगा एक्शन प्लान का दूसरा चरण चल रहा है. इसके लिए लगभग बाईस हज़ार करोड़ दिए गयें हैं. लेकिन गंगा पहले से और अधिक गन्दी हुयीं हैं यह एक अँधा भी बता सकता है.

हिन्दुओं  के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं गंगा और बनारस भी. यहीं का उदाहरण ले लीजिये. बनारस में रोजाना लगभग २५ एमएलडी सीवेज निकलता है. गंगा एक्शन प्लान के पहले चरण में १००० करोड़ रूपये फूंकने के बाद भी इस शहर में महज १० एमएलडी सीवेज को ट्रीट करने का इंतज़ाम हो पाया है. यानी १५ एमएलडी सीवेज सरकारी रूप से सीधे गंगा में बहाया जा रहा है. इसके साथ आपको यह भी बता दूं की १० एम एल डी  सीवेज को ट्रीट करने के लिए जो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं उनमें से अधिकतर बिजली न रहने पर नहीं चलते हैं यानी इस दौरान अगर प्लांट की टंकी ओवर  फ्लो हुयी तो सीवेज गंगा में बहा दिया जायेगा. यह आंकड़ा महज एक शहर का है. इससे उन सभी शहरों का अनुमान लगा सकतें हैं जो गंगा के किनारे बसे हैं. लगे हाथ आपको कैग के दिए एक और आंकड़े के बारे में बता देते हैं. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक आज भी लगभग छब्बीस सौ करोड़ लीटर सीवेज गंगा में बहाया जा रहा है.

राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य प्रोफेसर बीडी त्रिपाठी की लैब में हुयी शोध बताती है की गंगा का पानी अब आचमन के लायक भी नहीं बचा है फिर स्नान की तो बात भूल जाइये. यह हाल तब है जब एक हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि और २५० से ज्यादा परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं. गंगा एक्शन प्लान का दूसरा चरण चल रहा है और इसके तहत लगभग ४५० परियोजनाएं चलनी है या चल रहीं हैं. केंद्र सरकार ने गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण बना कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली. गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर खाने कमाने का नया जुगाड़ बना लिया है. गंगा की सेहत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है. पानी का रंग या तो गहरा हरा हो गया है या काला पड़ गया है. प्रवाह नाम मात्र का भी नहीं है. ऐसे में तो केंद्र सरकार के लिए यही अच्छा होगा की वह गंगा को राष्ट्रीय नदी की जगह इसे राष्ट्रीय नाला घोषित कर दे.