तुम्हे भी तो प्रेम है


अक्सर तुम्हारे बिम्ब का
आकार उतर आता है मुझमे
निराकार
साकार
क्या है
कुछ भी तो नहीं कह सकता
हाँ यह ज़रूर है कि
आकार तुम से ही है
कभी व्योम का कोई सिरा तलाशते जब दूर निकाल जाता हूँ
आक़र तुम्हारे इसी स्वरुप में सिमट जाता हूँ
मैं जानता हूँ तुम स्वतंत्र हो
पर बंधन भी तुम्हे प्रिय हैं
अधिकार और स्वीकार
भाव मेरे हैं
यह अनुबंध भी तो मेरे हैं
तुम तो हमेशा से मुक्त रहे हो
रूई के फाहे पर चलने की कोशिश
ओह
देखो तो, क्या स्वप्न है
नहीं
आह्लाद से विपन्न है
खिलखिलाकर हंस रहे हो ना तुम?
हंसो
और हंसो
कभी कभी विपन्न के लिए भी हँसना चाहिए
किसी स्वप्न के लिए भी हँसना चाहिए
तभी अचानक रूई के फाहे
बदल बन गए
ओह
नहीं वाह
अब बारिश होने वाली है
देखना प्रेम बरसेगा
तुम भी आना रससिक्त हो जाना
आखिर तुम्हे भी तो प्रेम है.

लाहौर पर ही तिरंगा फहरा दोगे क्या?


समझ में नहीं आता कि इस देश के लोगों को हो क्या गया है? आखिर वो करना क्या चाहते हैं? तिरंगा फहराना चाहते हैं. वो भी लाल चौक पर. हद ही तो है. भला ऐसा करने का हक उन्हें किसने दिया? केंद्र सरकार उन्हें रोकने की तैयारी में है तो कोई गलत नहीं है. सीआरपीएफ लगा कर सरकार उन्हें रोकने की तैयारी में है तो रोकने दो. मुझे इसमें कोई गलत बात नहीं नज़र आती. एक भारतीय होने का मतलब ये कतई नहीं है तुम श्रीनगर की लाल चौक पर जा कर तिरंगा फहरा दो. तुम अपनी गली में फहरा लो, बालकनी में फहरा लो. क्या कम जगहें हैं? लेकिन श्रीनगर में लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहर सकता, सुना तुमने.
केंद्र सरकार अपने विज्ञापनों में कहती है कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और अरुणाचल से गुजरात तक भारत एक है. अब कहने का क्या है? बहुत सी बातें कही जातीं हैं सब की सब सही ही होती है क्यां? यह सब तो कहने भर के लिए है. कश्मीर तो .....है किसी का, मुझे पता करने पड़ेगा. किसी पुरानी किताब में पढ़ा था कि कश्मीर भारत का है. अब पता नहीं ऐसा है या नहीं? हाँ, कन्याकुमारी तो खालिस अपना ही है अभी तक. जहाँ तक बात अरुणांचल कि है तो शायद यह भी भारत का ही हिस्सा है. लेकिन अगर कोई पड़ोसी मुल्क इससे अपने देश के नक़्शे में में दिखा ले तो भी हमें क्या फर्क पड़ता है? चलता है. कांग्रेस सरकार इन सब बातों का बुरा नहीं मानती है. गुजरात का क्या है, वो कहाँ जाने वाला है? इन सब बातों में पड़कर देश के लोगों को अपना वक़्त और देशभक्ति की भावना को बर्बाद नहीं करना चाहिए.
यह देश अलगाव वाद की राजनीती करने वालों को सुरक्षा देता है. उनपर कोई करवाई करने से डरता है. जब कभी वो देश के दिल दिल्ली में आकर पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लागतें हैं तो उन्हें सुरक्षा दी जाती है. उनकी सभाएं सकुशल सम्पन्न हो इसके लिए विशेष इन्तेजामात किये जाते हैं. देखा इस देश के लोगों का दिल. कितना बड़ा है. खासकर केंद्र सरकार का तो कहना ही क्या. सांसद के आरोपी को मेहमान बना कर रखा है. कोई देश ऐसा कर सकता है? नहीं ना. देखा ये तो कांग्रेस सरकार कर सकती है. सिर्फ कांग्रेस सरकार.
वैसे एक बात कहूं दोस्तों, अगर इंडियंस को छोड़ दो ना तो इस देश के 'हिन्दुस्तानी' लाल चौक पर तो क्या लाहौर पर भी पल में तिरंगा फहरा दे. वाशिंगटन डीसी पर भी केसरिया, सफ़ेद और हरा रंग ही नज़र आये. लेकिन करेंगे क्या? जब देश से बड़ा वोट हो. ईमान से बड़ा नोट हो, तो ऐसे कदम तो उठाने ही पड़ते हैं. कोई बात नहीं गिलानी को खुश रखो. एक पाकिस्तानी झंडा उसके लिए तैयार रखो. लेकिन इतना सुन लो, लाल चौक पर तिरंगा तो फहर कर ही रहेगा. क्योंकि ये हिन्दुस्तान की कसम है.

अब तो सपने में भी फुटकर दिखता है


बहुत लोगों को देखा साल के पहले दिन बनारस के संकट मोचन मंदिर के बाहर अपना सिर पटक रहे थे. ठण्ड से परेशान भगवान से चीख चीख कर कह रहे थे की आज साल का पहला दिन है. हम आपके दर्शन करने आयें हैं. हमारा पूरा साल अब आप के जिम्मे है. हम चाहे जो करे हमारा कुछ बिगड़ना नहीं चाहिए. कुछ बिगड़ा तो आप समझिएगा. उसके बाद मंदिर नहीं आयेंगे. भक्तो की प्रार्थना में भाव ऐसा की वो प्रार्थना कम और मांग ज्यादा लग रही थी. गोया भगवान को भगवान उन्होंने ही बनाया हो जैसा हर पांच साल में वोट देकर एक भगवान चुनते हैं. खैर भगवान को इन सब बातों की आदत हो चली है. लेकिन एक बात उन्हें परेशान कर गयी. संकट मोचन भगवान सोचने लगे कि आखिर यह साल नया कैसे हो गया. यह संवत बदला कब. कानो कान ख़बर तक नहीं हुयी. लेकिन अब इतने लोग बाहर जमा है तो सचमुच साल बदल ही गया होगा. फिर भी तसल्ली करने के भगवान ने अपने एक सेवक को बाहर भेजा कि पता लगा कर आयो कि माजरा क्या है. सेवक ने क्या बताया यह आपको उसके लौट कर आने के बाद पता चलेगा. तब तक आपको एक और दृश्य सुनाता हूँ.
एक जनवरी को एक मित्र के घर एक काम से एक मिनट के लिए गया. उसके घर पहुंचा तो देखा वो महाशय अब भी रजाई में औंधे पड़े हैं. अब उन्हें देख मुझे अपराध बोध हो आया कि मैं क्यों ना रजाई में रहा. खैर मैंने उन्हें जगाने का अपराध कर दिया. मित्र उठे तो उनके चेहरे से दुःख टपक रहा था. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से भारत के आम आदमी के चौखटे से टपकता है. मैंने पूछा क्या हुआ? कम से कम सोते समय तो खुश रहा करो. मित्र ने मेरी बात निर्विकार भाव से सुनी और अपने दोनों कानो का उपयोग किया. एक से सुना और एक से निकाल दिया. मित्र ने अपना कष्ट बताया. कहा कि यार अब तो सपने में भी फुटकर ही दिखता है. बड़ी नोट कहीं दिखती ही नहीं. महंगाई इतनी बढ़ गयी है कि 500 और 1000 की नोट का वजूद घंटे दो घंटे से अधिक बचता ही नहीं. सब्जी वाला भी अगर मन से सब्जी दे दे तो एक टाइम का सब्जी का खर्च 100 रुपये तो हो ही जाता है. यही कारण है कि सपना देख रहा तो पॉकेट में बस चिल्लर ही दिख रहे थे. बड़ी नोट थी ही नहीं. यही नहीं एटीएम से निकली वो स्लिप भी थी जो बता रही थी कि तुम कंगला हो गए हो.
मित्र को लगा जैसे उसने बड़ी नोटों के सपने देखने का अधिकार खो दिया है. मेरे पास भी इस तर्क का कोई जवाब नहीं था. आखिरकार हमारे देश के शीर्ष नेतायों ने भी बताया है कि दुनिया की महाशक्ति बनना है तो बड़े सपने मत देखो. सपने में फुटकर से काम चला लो. बाकी का कारोबार उनके जिम्मे छोड़ दो. नीरा और राजा तो है ही ऐसे सपने देखने के लिए. तेजी से बढ़ते इस देश के लोगों की जेब तेजी से खाली हो रही है. क्या फर्क पड़ता है. देश तो तरक्की कर रहा है. सड़कों के किनारे झुग्गी बन रही है तो क्या हुआ सड़क तो बनी.
मित्र की आँखों में आंसू थे. मै समझ गया कि ये हकीक़त में तो अब प्याज के आस पास भी नहीं भटकता, सपने में होने का फायदा उठा कर ये ज़रूर प्याज के पास गया होगा. दुकान दार से हेकड़ी में दाम भी पूछ लिया होगा. दाम सुन कर ही ये आंसू आये होंगे. लेकिन यारो इन आंसुयों में भारत के आम आदमी की लाचारी और प्याज के महंगाई वाले आंसुयों को अलग कर पाना मुश्किल है. खैर रोना ना सिर्फ मेरे मित्र का बल्कि इस देश के हर उस आदमी का संवैधानिक अधिकार बन गया है जो आम आदमी की श्रेणी में आता है. मेरा काम क्या था मैं भूल चुका था. लगा कि देश इतना आगे जा रहा है तो मैं भला अपना काम क्यों याद रखूँ. मैं भी देश के साथ आगे बढ़ लूं. इन्ही विचारों के साथ में वहां से चल दिया.
बात वापस संकट मोचन भगवान की करती हैं. भगवान अब भी परेशान थे. उनका सेवक नहीं लौटा था. भगवान ने मुझसे कहा कि जरा देख कर आओं सेवक कहाँ रह गया. भीड़ बढ़ चुकी थी. मुझे भगवान के सेवक को तलाशने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी. आँख गड़ा गड़ा कर देखा तो भगवान का सेवक भारतीय इंसानों की लाइन में दिखा. वो भी संकट मोचन भगवान के दर्शन करने के लिए खड़ा हो गया था. मैंने उससे पूछा कि तुम लाइन में क्यों खड़े हो? तुम्हारा तो भगवान से सीधा संपर्क होता है. सेवक थोड़ा अकड़ कर खड़ा हो गया. कहा इतने लोग जो नया साल मना रहे हैं तो कोई गलत तो नहीं कर रहे. क्या फर्क पड़ता है कि साल बदला है संवत नहीं. हम भारतीय तो इसके बाद भी बने हुए हैं. मैंने अपना सवाल दोहराया. तो सेवक ने कहा कि महंगाई इतनी बढ़ गयी और देश के नेता कुछ कर नहीं पा रहे हैं इसलिए अब भगवान का ही सहारा है. यही वजह है कि मैं भी लाइन में खड़ा हो गया हूँ.
अब मैं क्या कहूं. हर भारतीय नए साल के जश्न में है और बड़ी नोट का सपना देखने से डरता है. फिर भी यही कहता है कि वो तरक्की कर रहा है. क्योंकि देश तरक्की कर रहा. करो भईया. किसने माना किया है. महंगाई ने ऐसी कमर तोड़ी है प्याज तो क्या प्याज की महक से डर लगता है. देश के नेतायों से कोई उम्मीद नहीं है भगवान का ही सहारा है. मेरी हिम्मत नहीं हुयी कि संकट मोचन जी को जाकर बतायूं कि आपका सेवक भी अब लाइन में आ गया है. जब वो सामने पहुंचेगा तो मिल लीजियेगा.
लगता है दोस्तों इस देश के तरक्की भगवान के ही भरोसे है. वैसे इतना बड़ा बोरिंग लेख पढ़ कर आपको ज़रूर नींद आ रही होगी. लेकिन मेरी एक राय मानियेगा कि सपना मत देखिएगा.
जय हो संकट मोचन महाराज की.