एक बार याद उन्हें भी कर लिया होता।


जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में जितनी बार नाम राहुल गांधी का लिया गया अगर उसका एक फीसदी हेमराज और सुधाकर को याद किया होता तो शायद हमें गर्व होता कि हमारे देश पर कांग्रेस ने कई साल तक राज किया है। हैरानी होती है कि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी के नेताओं ने विदेश और रक्षा नीति पर एक भी नोट जारी नहीं किया। जबकि मुल्क का एक बड़ा तबका ये उम्मीद लगाए बैठा था कि कांग्रेस सबसे पहले सुधाकर और हेमराज के मुद्दे पर अपना बयान जारी करेगी। 
आखिर सुधाकर और हेमराज को याद न करने की मजबूरी कांग्रेस के लिए क्या हो सकती है। ये तो कांग्रेस के नेता ही जाने लेकिन इतना तो तय है कि कांग्रेस के इस रवैए से शहीदों के प्रति उसके चरित्र का पता चल गया है। कांग्रेस से उम्मीद थी कि कम से कम राहुल बाबा के ही जरिए कांग्रेस इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करेगी। लेकिन कांग्रेस चुप रही। 
मुझे लगता है कि कांग्रेस के पास कहने के लिए बहुत कुछ था भी नहीं। कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों ही महज इस बात के चिंतन में लगे रहे कि राहुल को कैसे आगे लाया जाए। कांग्रेस इस देश की ही दुनिया की एक बड़ा राजनीतिक पार्टी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस अगर कुछ कहती तो पाकिस्तान उसे अनसुना नहीं कर सकता था। कम से कम इस देश के लोगों को ये संदेश तो जाता ही कि कांग्रेस इस मुल्क के सपूतों के बारे में भी वक्त निकालकर कुछ सोचती है। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अफसोस ये कांग्रेस हमारे देश की पार्टी है। 


बोलिए बाबा राहुल की जय


राजस्थान में कांग्रेस का चिंतन शिविर चल रहा है। कांग्रेस के तमाम दिग्गज नेता इन दिनों एक साथ चिंतन शिविर के ही बहाने सही एक जगह बैठ तो गए ही हैं। लोग बाग न जाने इन नेताओं को क्या क्या कह रहे हैं। चोर, उच्चके, चापलूस, वादाखिलाफ और न जाने क्या क्या। लेकिन मैं इन संबोधनों से जरा सा भी इत्तफाक नहीं रखता। हुजूर आप भी नहीं रखते होंगे। क्योंकि इन नेताओं को तो शायद इससे भी कोई बड़ा संबोधन मिलना चाहिए। खैर छोडि़ए हम इस चिंतन में न पड़े तो ही अच्छा। 
कांग्रेस को अपने इस चिंतन शिविर का नाम शायद कुछ और रखना चाहिए था। शायद 'राहुल शिविर', 'मीट विथ राहुल बाबा', 'हाउ टू मेक राहुल बाबा अ पालिटीशियन' या कुछ ऐसा ही। ताकि इस देश के लोगों को पता तो चल जाता कि कांग्रेस का मतलब अब सिर्फ राहुल गांधी ही रहा गया है। इससे आगे और पीछे कुछ नहीं। चिंतन शिविर में कांग्रेस के नेता कहां तक तो दुनिया की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को और मजबूत बनाने की कोशिश करते तो वो महज गणेश परिक्रमा में ही लगे हुए हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी राजनीतिक पार्टी की क्या जवाबदेही हो सकती है इसके बारे में सोचने की बजाए कांग्रेस ये सोच रही है कि राहुल गांधी को कैसे राजनीतिक जिम्मेदारी सौंपी जाए। 
राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस ने जो चरित्र दिखाया है उससे साफ हो गया है कि कांग्रेस जनता से बेहद दूर महज व्यक्तिगत चिंतन में लगी है। कांग्रेस का यह चरित्र दिखाता है कि वो जनता के बीच किसी नेता को कैसे थोपती है। वही नेता जिसको कई राज्यों में जनता ने सिरे से नकार दिया। न यूपी में चली न गुजरात में चली। इसके बावजूद कांग्रेसी चाहती है कि कांग्रेस को लोग अब राहुल के नाम से जाने। 
आम आदमी महंगाई से मर रहा है। कांग्रेस को इस बात से कोई लेना देना नहीं है। कांग्रेस के चिंतन शिविर में इस बात पर चर्चा नहीं हुई। हां, यह जरूर है कि सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी पीड़ा व्यक्त की है। मुझे समझ नहीं आता कि सोनिया जी की इस पीड़ा पर देश कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करे। कांग्रेस का शुक्रिया अदा क्या ऐसे करें कि भाई पहले आपने हमें एक भ्रष्टतंत्र दिया और अब उसपर आप दुख जता रहे हैं। इसके लिए हम आपके शुक्रगुजार हैं। 
कांग्रेस के चिंतन शिविर में न कोई ताजगी है और न ही आम आदमी के लिए कोई उम्मीद। है तो बस परिवारवाद की पुरानी परिपाटी को कायम रखने की कोशिश और गणेश परिक्रमा का कांग्रेसियों का जज्बा। बढि़या होता कि कांग्रेस अपना नाम बिना किसी चिंता के राहुल कांग्रेस कर लेती। हम भी उम्मीद छोड़ देते। 
और हां, अगर आप बोल सकते हों तो बोलिए..........राहुल बाबा की जय

हिना रब्बानी खार, खैरियत मनाओ कि हिंदुस्तान में गांधी पैदा हुआ था

शक्ल खूबसूरत, सीरत बदसूरत

मैडम हिना रब्बानी खार कह रही हैं कि भारत युद्ध पर आमादा है। बड़ा हैरतअंगेज और हास्यास्पद बयान ये है। मैडम साहिबा को विदेश मामलों का कितना ज्ञान है ये तो नहीं पता लेकिन इतना जरूर है कि मैडम को अपना लुक बनाए रखने का पूरा ध्यान रहता है। 1977 में जब मैडम हिना का जन्म हुआ उसके बाद उन्होंने आज तक उन्होंने कोई वास्तविक जंग देखी भी नहीं। हां, ये जरूर है कि कारगिल की जंग उन्होंने जरूर देखी होगी। हालांकि उस वक्त मैडम हिना महज 22 साल की ही रहीं होंगी। और उन्हें जंग की कितनी समझ रही होगी ये आप और हम समझ सकते हैं। मैडम की कुल जमा उमर अब भी 36 ही है। अब 36 की उमर में वो न तो 47 की समझ सकती हैं, न 65 को समझ सकती हैं, न 71 को। मैडम हिना ने मैसाच्युट्स यूनिवर्सिटी से व्यापार प्रबंधन में एमएससी की डिग्री ली है। मैडम पहले पाकिस्तान में वाणिज्य मंत्रालय संभाला करती थीं। कुछ दिनों से भारत के साथ रिश्ते सुधारने में लगा दी गईं हैं। 
यहां भारतीयों का सौंदर्य प्रशंसक होना भी मैडम के ऐसे बयानों की वजह है। मैडम जब भारत आईं तो भारतीय मीडिया ने उनकी जो ग्लैमरस छवि पेश की, कि बस पूछिए मत। न्यूज पढ़ते पढ़ते एंकर भावुक होने लगे। मैडम हिना ने बयान दिया कि वो भारत को एक अलग लेंस से देख रहीं हैं। ऐसे बयानों ने हिना मैडम को सुर्खियों में ला दिया। हमें भी लगा कि चलो एक नासूर खत्म हो गया। लेकिन याद करिए कि उसी वक्त मैडम चीन भी गईं थीं। लेकिन भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया ने मैडम का जितना सौंदर्यमंडन किया उसका एक फीसदी भी चीन की मीडिया ने नहीं किया। खैर छोडि़ए, हमने मैडम से हाथ मिलाया तो छुरा भी तो हमारी ही पीठ में घोंपा जाएगा। 
हाल फिलहाल मैडम को अब लगता है कि भारत ने सीमा पर तनाव बढ़ा दिया है और यु़द्ध की स्थितियां पैदा कर दी हैं। लेकिन मैडम साहिबा आप शायद भूल रहीं हैं कि ये मुल्क 1947 के बाद से रोजाना एक नई अनजानी जंग का सामना करता है। ये जंग या तो आपकी रहनुमाई में होती है या फिर आप खुद छेड़ती हैं। कभी आप संसद पर हमला करवाती हैं तो कभी लोकल ट्रेनों में अपने भाड़े के ट्टुओं को भेज कर धमाके कराती हैं। आप भूल जाती हैं कि हम अमन का पैगाम लेकर कराची गए तो आप दहशतगर्दों का ठिकाना कारगिल की पहाडि़यों में बनवा रहीं थीं। 
हिना रब्बानी खार, खैरियत मनाओ कि हिंदुस्तान में गांधी पैदा हुआ था। लेकिन ये मत भूलो कि यहीं भगत और आजाद भी जन्मे थे। मैडम साहिबा जंग हमने कभी न चाही और न चाहेंगे लेकिन इतना जरूर है कि सरहदों का निगहबानी में हमें ही अपनी जमीं पर आपकी सेनाओं की बिछाई लैंडमाइंस मिलीं हैं। हम अब भी चुप हैं समझा रहे हैं, समझ जाइए। हाथ मिलाइए, दिल मिलाइए लेकिन पीठ में छुरा मत घोंपिए।

दिन गलती गिनाने के नहीं पीएम साहब सबक सिखाने के हैं


ठीक ठाक से चुप रहने वाले जब पीएम मनमोहन सिंह जी ने पाकिस्तान की तरफ से हो रही बर्बरता पर मुंह खोला तो लगा कि पीएम साहब का बयान पाकिस्तानी राजदूत को सामने बैठाकर टाइप कराया गया है। बयान तैयार कराते वक्त एक एक लाइन के बाद पाकिस्तानी राजदूत से पूछा गया होगा कि ठीक है न भाई साहब कोई गलती तो नहीं है। कहीं कुछ अधिक तो नहीं हो रहा। फिर पाकिस्तान के राजदूत ने कहा होगा कि आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि हमने गलती की। पाकिस्तानी राजदूत ने कहा होगा कि आप लिखिए कि आप अपनी गलती को मानिए। इसके बाद पाकिस्तान कहेगा कि हमने कोई गलती की ही नहीं तो मानने का तो सवाल ही नहीं उठता। बस हो गया काम। न भारत के पीएम को चुप रहने पर ताना सुनना होगा और न ही पाकिस्तान को गलती मानने की जरूरत होगी। शायद पड़ोसी के साथ रिश्ते सुधारने का इससे बेहतर तरीका हो भी नहीं सकता। यूं भी इस मुल्क का मुस्तकबिल कुछ ऐसा ही रहा है। हम कहने को शेर हैं लेकिन गीदड़ों की धमकियों से मांद में छुप जाते हैं। इसके बाद शांती पसंद होने का हवाला देकर अपनी इज्जत बचाने की कोशिश करते हैं। हमारे दो जवान शहीद हुए। एक जवान का सिर दुश्मन मुल्क के सैनिक काट कर अपने साथ लेते गए और हमारा देश अभी हाथ जोड़े ये याचना कर रहा है कि भाई सिर लौटाओ या मत लौटाओ लेकिन प्लीज अपनी गलती तो मान लो। यूं तो पाकिस्तान गलती मानेगा नहीं और मान भी लिया तो उससे क्या होना। क्या ऐसी हरकतें वो दोबार नहीं करेगा ? इसकी गारंटी कौन लेगा? वक्त अब गलती गिनाने का नहीं वक्त अब सबक सिखाने का है। हमारे एक जवान का सिर काट कर ले गए पाकिस्तानी सैनिक। मीडिया ने हल्ला मचाया। इसके बाद फ्लैग मीटिंग हुई। लगा कि हमने हड़का दिया टुच्चे पाकिस्तान को। लेकिन हुआ क्या। पाकिस्तान ने मीटिंग के 72 घंटों के भीतर सीजफायर का पांच बार उल्लंघन किया। गोलीबारी की और हमें बताया कि मीटिंग और जंग में सब जायज है। हम अभी इस मुगालते में हैं कि हमने समझा दिया तो पाकिस्तान सुधर गया। रिश्तों को सुधारने की कोशिश एक अलग बात है और सरहद पर अपने जवानों को सुरक्षित माहौल देना अलग। दोनों में फर्क समझना होगा। कूटनीति वीजा नियमों का भविष्य तय कर सकती है लेकिन जंग के मैदान में तोप का मुंह नहीं मोड़ सकती। इसके लिए तो अपनी सेना उतारनी ही होगी।

माफ करना हेमराज इस देश के लोग तुम्हारे लिए इंडिया गेट पर नहीं आ सकते।


यकीनन ये सोच कर दुख होता है लेकिन ये सोचना तो पड़ेगा ही। एक छोटा सा सवाल है कि क्या इस देश की सरहद को सलामत रखने वालों का सिर हमारे लिए अहमियत नहीं रखता ? क्या हमारे जवान का सिर इस लायक भी नहीं कि उसके लिए इंडिया गेट पर नहीं उतर सकते ? 
हमारे देश में भ्रष्टाचार है इसमें कोई दो राय नहीं है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी इससे प्रभावित होती है इसमें भी कोई दो राय नहीं है। हमारा गणतंत्र, भ्रष्टतंत्र में बदल चुका है लिहाजा हमारी नाराजगी जायज है। इस भ्रष्टाचार की ही देन है कि हमें अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव के दर्शन हुए। इस देश में लाखों लोगों ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए देश के अलग अलग हिस्सों में कभी धरना दिया तो कभी प्रदर्शन किया। हमारा हासिल हमें अभी पता नहीं। फिलहाल हम खुश हैं कि हमने आवाज तो उठाई। 
दिल्ली में चलती बस में गैंगरेप हुआ तो देश उबल पड़ा। युवाओं की बड़ी संख्या देश के अलग अलग हिस्सों से इंडिया गेट पर आई और आवाज उठाई। पत्थरों से घिरे लोकतंत्र पर ऐसी चोट लोक की हुई कि पूरा तंत्र हिल गया। देश में एक नई बहस शुरू हो गई। 
लेकिन इस सबके बाद ये सवाल भी आ गया कि आखिर ऐसे मुद्दों पर सरकार से जवाब की उम्मीद करने वाली भीड़ आखिर हेमराज और सुधाकर सिंह की शहादत को इतने हल्के में क्यों ले रही है। क्या अब इस देश की जनता ने मान लिया है कि देश की सरहद पर हमारे जवान शहीद होते रहे हैं और होते भी रहेंगे। क्या ऐसी घटनाओं से अब हमें कोई फर्क नहीं पड़ता ? मैं कहीं से नहीं कहता कि दिल्ली में गैंगरेप की घटना और मेंढ़र में जवानों की शहादत में कोई समानता है। लेकिन इतना तो आप सब मानेंगे कि इस देश के लोगों के लिए ये दोनों ही घटनाएं बेहद माएने रखती हैं। क्या हम उस दर्द को महसूस नहीं कर पा रहे जो दर्द हेमराज के परिवारजनों से सहा है। कोई जब सेना में भर्ती होता है उसी वक्त इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है कि उसकी कभी अपने फर्ज को निभाते हुए शहादत भी हो सकती है। लेकिन इस बात के लिए कोई तैयार नहीं होता कि शहादत के बाद किसी जवान का सिर कलम करके दुश्मन सेना के सैनिक ले जाएं। क्या गुजरी होगी उस परिवार पर जिसने अपने सपूत का सिरविहीन शव हाथ में लिया होगा। इस दर्द को क्या अभी आपने महसूस किया। मथुरा में हेमराज की पत्नी, मां और परिवार के अन्य लोग अनशन पर बैठ जाते हैं लेकिन इस देश के सिस्टम को बदलने के लिए इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने वाली भीड़ की एक फीसदी भीड़ भी मथुरा नहीं पहुंचती। क्या महज इसलिए कि मथुरा दिल्ली नहीं है। क्या मथुरा जाने वाले सभी रास्ते बंद हो गए हैं ? आखिर क्या वजह है कि देश का एक व्यक्ति भी प्रधानमंत्री से इस बात का जवाब नहीं चाहता कि आखिर पड़ोसी मुल्क के साथ वो कौन से सुधरे रिश्ते बना रहे हैं जो हमारे जवानों की जान पर भारी पड़ रही है। कहां सोए हैं अन्ना हजारे ? बाबा रामदेव को क्या ये खबर नहीं मिली ? वोटों का कोई बड़ा फायदा नहीं होने वाला शायद अरविंद केजरीवाल इसीलिए चुप हैं। 
मेरी सोच और मेरी अभिव्यक्ति, मैं किसी पर थोप नहीं सकता। लेकिन ये भी सच है कि इसे अभिव्यक्त करने से मुझे कोई रोक भी नहीं सकता। हम भीड़तंत्र के सहारे लोकतंत्र को मजबूत बनाने में लगे हुए हैं। खुश हैं कि भीड़ में हम भी शामिल हैं। लेकिन याद रखिएगा कि जो भीड़ से इतर होते हैं पहचान उन्हीं की होती है। दो जवानों की शहादत इस देश के लगभग सवा अरब लोगों के लिए कोइ माएने नहीं रखती। देशभक्ति का जज्बा अब हमारे भीतर महज रस्मी जज्बा है इस बात में भी कोई दो राय नहीं। कोई एक शख्स भी नहीं पहुंचा दिल्ली ये पूछने कि लिए पीएम साहब आप क्यों चुप हैं ? क्या अभी दो-चार और जवानों का सिर पाकिस्तान के सैनिकों को सौंपना चाहता हैं ? क्या हमारे मुल्क की सेनाएं लाचार हैं या फिर आपने उन्हें लाचार बना दिया है ? जवाब तो देना ही होगा पीएम साहब आज नहीं तो कल। जवाब की ये ख्वाहिश अकेली ही सही लेकिन मजबूत जरूर है। 
और हां, भीड़ में शामिल हर उस शख्स के लिए.....................भगत और आजाद कभी इंडिया गेट पर प्रदर्शन नहीं करते। वो असेंबली में धमाके करते हैं। गोरों से आजादी के बाद अब वक्त काले लोगों की गुलामी से मुक्त होने का है। माफ करना हेमराज इस देश के लोग तुम्हारे लिए इंडिया गेट पर नहीं आ सकते।