ये सोनम तो बेवफा नहीं है, चाहे तो अपनी आंखों से देख लो।


क्या करिएगा, आपको ये पता चल सके कि आप इंटरनेट के जिस वायरल मैसेज वाले मायावी दुनिया में रहते हैं उससे आगे भी दुनिया है, इस तरह की हेडिंग लगानी पड़ गई। हालांकि ये भी लगे हाथ साफ कर देना जरूरी है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आगे से ऐसा नहीं होगा। धोखा आपको कभी भी किसी भी रूप में दिया जा सकता है। फिलहाल अब नोट वाली सोनम गुप्ता की याद को अपने दिमाग से निकाल दीजिए और सोनम वांगचुक के बारे में जानिए।

सोनम वांगचुक विज्ञान और व्यावहारिकता के बीच की एक कड़ी हैं। लद्दाख में जन्मे और प्रारंभिक जीवन लद्दाख में शुरु करने वाले सोनम वांगचुक एक संगठन चलाते हैं जिसका नाम एजुकेशनर एंड सोशल मूवमेंट ऑफ लद्दाख है। सोनम इस संगठन के जरिए न सिर्फ लद्दाख में बल्कि कई अन्य जगहों पर सामाजिक और शिक्षा क्षेत्र में बदलाव लाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

सोनम वांगचुक की सबसे अधिक चर्चा उनके कृत्रिम ग्लेशियरों के लिए हो रही है। दरअसल लद्दाख के पानी की कमी से जूझ रहे इलाकों के लिए सोनम वांगचुक ने बेहद नया प्रयोग किया है जो पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। सोनम वांगचुक ने लद्दाख में विज्ञान की मदद से कृत्रिम ग्लेशियर बनाने में सफलता हासिल की है। जुगाड़ू तकनीक और विज्ञान के सामंजस्य के सोनम वांगचुक ने ये करिश्मा किया है। 
दरअसल सोनम वांगचुक ने लद्दाख के रेतीले स्थानों में गर्मियों के मौसम में पानी की समस्या को खत्म करने के लिए वहां ठंड के मौसम में कृत्रिम ग्लेशियरों का निर्माण किया। पहाड़ों की ऊंचाई से पानी को ठंड के मौसम में पाइपों के जरिए नीचे लाया गया और सर्द मौसम में पाइप से फव्वारे के रूप में निकलते पानी को वहीं जमा दिया गया। गर्मियों के मौसम में ये कृत्रिम ग्लेशियर पिघल कर पानी की कमी को पूरा कर रहें हैं।

वैसे इस काम में सोनम वांगचुक का इलाकाई लोगों ने खासा साथ दिया और पांच हजार पौधे रोप डाले। कृत्रिम ग्लेशियरों के पानी को इन पौधों की सिंचाई के लिए इस्तमाल किया जा रहा है और लद्दाख का रेगिस्तान अब हरा भरा हो रहा है। सोनम वांगचुक को उनके इस काम के लिए दुनिया के प्रतिष्ठित अवार्ड्स में से एक रोलेक्स अवार्ड दिया जा रहा है।

अब एक और सूचना, सोनम वांगचुक वही शख्स है जो आमिर खान में फुंसुख वांगडू थे। दरअसल थ्री इडियट्स में आमिर खान का फुंसुख वांगडू का किरदार सोनम वांगचुक को ही देखकर तैयार किया गया था। आप सोनम वांगचुक कहिए या फुंसुख वांगडू, काबिलियत बराबर ही रहेगी कम नहीं होगी। इस सोनम के बारे में मौका मिला तो अगली कुछ पोस्टों में आपको और बताएंगे।
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हम बुलेट ट्रेन में बैठकर पुखरायां से होकर गुजर जाएंगे, मरने वाले तो मर ही गए।

ये अच्छा है कि देश बुलेट ट्रेन में बैठकर रेल का सफर करने के सपने देख रहा है या शायद राजनीतिक नींद या राजनीतिक बेहोशी के हाल में देश को ये सपना दिखाया जा रहा है। अच्छा है कि देश सपना देख रहा है। हालांकि ऐसे सपने देखने के लिए आंखों की जरूरत नहीं होती और आंखों में रोशनी की जरूरत भी नहीं होती है। लिहाजा अंधे भी ऐसे सपनों को बिना भेदभाव के देख सकते हैं।

हम अक्सर इस बात को लेकर खुशी से फूले नहीं समाते हैं कि हमारे पास दुनिया के बड़े रेल नेटवर्क में से एक नेटवर्क है। हालांकि ये बात भी सच है कि दुनिया के किसी देश के प्लेटफार्म पर आपको जानवरों में सांड, कुत्ता, गाय, बंदर और इंसानों में भिखारी, कुष्ठ रोगी, पागल सबके दर्शन एक साथ हो जाएं। आप चाहें तो इस उपलब्धि के लिए भी अपना हाथ अपनी पीठ पर ले जाकर उसे थपाथपा सकते हैं। हाथ न पहुंचे तो किसी दोस्त का सहयोग ले सकते हैं।

दुनिया के इस बड़े रेल तंत्र की तल्ख सच्चाई यही है कि यहां रेल दुर्घटनाओं के बाद सिर्फ और सिर्फ जांच कमेटी बैठाई जाती है। ये जांच कमेटी बैठ कर कब उठती है, क्या करती है, कितने लोगों को उठाती है, कितनों को बैठाती है ये किसी को नहीं पता। इस उठक बैठक में हम अक्सर ये भी भूल जाते हैं कि कोई कमेटी भी बनाई गई थी। रेल नेटवर्क को संचालित करने वाला तंत्र इस कमेटी की जांच से क्या सीख लेता है ये देश की आम जनता को नहीं पता है।

एक मोटे आंकड़े के मुताबिक रेलवे में हादसों को न्यूनतम करने के लिए तकरीबन एक लाख कर्मियों की नियुक्ति करने की आवश्यकता है। एक अंग्रेजी अखबार के दावों के मुताबिक देश में एक लाख बारह हजार किलोमीटर लंबे रेल नेटवर्क में पिछले तीन वर्षों में 50 फीसदी हादसे डीरेलमेंट की वजह से हुए हैं। इनमें से 29 फीसदी के करीब रेल लाइन के दुरुस्त न होने की वजह से हुए। जानकार बताते हैं कि देश में रेल सुरक्षा को लेकर सरकारें गंभीर नहीं रहीं हैं। रेल हादसों को रोकने के लिए सुझाए गए कई सुझावों को धरातल पर उतारने की कोशिश नहीं की गई है। 2012 में काकोदर कमेटी की सिफारशों को भी पूरी तरह नहीं माना गया है। गौरतलब है कि काकोदर कमेटी ने 2012 में ट्रेन के सफर को सुरक्षित बनाने के लिए कई सुझाव दिए थे।

फिलहाल एक ढर्रे पर चल रही ट्रेन में सुरक्षित सफर की उम्मीदों के सच का अर्द्ध सत्य यही है कि हम भगवान भरोसे चलती ट्रेनों में एक चादर, प्लास्टिक की एक चटाई और एक कंबल के साथ चढ़ तो जाते हैं लेकिन हमें ये नहीं पता होता कि सफर के अंत में हम खुद उतरेंगे या फिर हमें उतारा जाएगा। फिर भी खुश हो लीजिए क्योंकि आप बुलेट ट्रेन के सपने देख सकते हैं और सपने देखने के लिए आंखे खुली रखने की जरूरत नहीं होती। कर लीजिए आंखें बंद, पुखरायां गुजर जाएगा।