अगर ट्रैफिक वाला राष्ट्रपति का काफिला रोक दे तो क्या भारत बदल जाएगा

बंगलुरु से आई खबर जितनी सुखद लगती है उतनी ही दुखद भी। ये खबर दिल को तसल्ली देती है तो सवालों की पोटली भी पीठ पर लाद देती है। हालांकि कई लोगों को जब फेसबुक, ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के माध्यम से इस खबर का पता चला तो उन्हें यकीन नहीं हुआ लेकिन अब आप यकीन कर लीजिए क्योंकि ये खबर सौ फीसदी सच है। 
वाक्या इस पोस्ट को लिखने से ठीक पहले वाले शनिवार का है। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी बंगलुरू में थे। उन्हें मेट्रो का उद्घाटन करना था। राष्ट्रपति को  राजभवन से कार्यक्रम स्थल तक सड़क मार्ग से जाना था। कार्यक्रम खत्म करके महामहिम का काफिला राजभवन को लौट रहा था। इसी बीच त्रिनिटी सर्किल पर तैनात ट्रैफिक पुलिस के एसआई एमएल निजलिंगप्पा ड्यूटी पर थे। निजलिंगप्पा को एक एंबुलेंस दिखाई दी। मैं तो कभी बंगलुरू गया नहीं लेकिन लोगों ने बताया और खबरों में पढ़ा कि वहां ट्रैफिक अधिक रहता है। इसी ट्रैफिक में एंबुलेंस भी थी। यही वक्त राष्ट्रपति के काफिले के गुजरने का भी था। निजलिंगप्पा की नजरें एंबुलेंस पर गईं। निजलिंगप्पा ने एंबुलेंस को रास्ता देना शुरु ही किया था कि राष्ट्रपति का काफिला आ गया, बस फिर क्या था। निजलिंगप्पा ने मन बना लिया था। उन्होंने राष्ट्रपति के काफिले को रुकने का इशारा किया और एंबुलेंस को पहले निकल जाने दिया। एंबुलेंस के बाद राष्ट्रपति का काफिला गुजरा। 
निजलिंगप्पा के इस काम की खूब सराहना हुई। 
बंगलुरू पुलिस ने ट्वीट कर इसकी सराहना सार्वजनिक रूप से की। लोगों ने भी इसे सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों को बहुत बड़ा जानकार बन कर बताया। 

लेकिन इस देश का काम एक निजलिंगप्पा से नहीं चलने वाला। आमतौर पर हम एंबुलेंस के लिए ग्रीन कॉरिडोर की खबरें दक्षिण भारत से सुनते हैं। या फिर दिल्ली और नोएडा से। यूपी और बिहार में आप संभवत: ऐसा सोच भी नहीं सकते। यूपी, बिहार, झारखंड, जैसे प्रदेशों में एंबुलेंस मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचा दे तो मरीज की किस्मत समझिए। इस संबंध में आंकड़ा देने की भी जरूरत मैं नहीं समझता क्योंकि इस बात को पूरा देश महसूस करता है। सड़क पर हमारी सोच सड़क छाप हो जाती है। हम इंसानी एहसासों को बेवजह की तराजू में तौलने लगते हैं। हमारे लिए एंबुलेंस को मौका देना अपनी गाड़ी निकालने से अधिक महत्वपूर्ण नहीं होता। हमारा सारा सिविक सेंस, मॉरल सेंस, पब्लिक सेंस खत्म हो जाता है। 

इस पोस्ट में बहुत बुद्धजीविता डालने की कोशिश नहीं कर रहा हूं। बस इतनी भर कोशिश कर रहा हूं कि आप और हम एंबुलेंस और उसके भीतर के मरीज के बारे में सोचना शुरु करें। एक मोटा आंकड़ा बताता है कि अगर एंबुलेंस को खाली रास्ता मिल जाए तो 60 फीसदी केसेज में मरीज को बचाया जा सकता है। अगली बार जब आप किसी एंबुलेंस को जाम में फंसा हुआ देखें तो उसके लिए रास्ता बनाने की कोशिश करें। करेंगे ना?

नहीं सुधर रहें हैं हालात, गंगा पर सिर्फ हो रही है राजनीति

दिल्ली में बंगाल की सीमा पर फरक्का बांध के बहाने बिहार की तरफ आने वाले मलबे के कारण बढ़ते गाद, उत्तर बिहार में भीषण बाढ़ और दक्षिण बिहार में सूखे की समस्या को लेकर एक सेमिनार हुआ। बिहार सरकार के जल संसाधन मंत्रालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम बिहार के गंगा जन्य समस्याओं से जुड़े हुए विषय पर था। स्वनाम धन्य जल पुरुषों का जमावड़ा जो भारत के एनजीओ संस्कृति को पल्लवित, पुष्पित करते रहते हैं, उनके द्वारा अंत में निष्कर्ष स्वरूप यह कहकर सम्मेलन को समाप्त कर दिया गया कि नीतीश कुमार जी भारत के प्रधानमंत्री बनने के योग्य उम्मीदवार हैं। इससे यह संदेश गया कि ये सम्मेलन बिहार में बाढ़ एवं सूखे पर आयोजित था अथवा जिन एनजीओ की रोजी-रोटी एनडीए सरकार में बंद हो गई उनके द्वारा नीतीश कुमार जी को बहाला-फुसलाकर, प्रधानमंत्री का योग्य उम्मीदवार बताकर बिहार के अंदर अपनी जड़े जमाने की कोशिश तो नहीं। १९८० के दशक में गंगा मुक्ति आंदोलन जिसको सफदर इमाम कादरी रामशरण अनिल प्रकाश सरीखें समाजवादियों ने शुरू किया था और उसका निष्कर्ष गंगा जी में मछली मारने की स्वतंत्रता को लेकर समाप्त हुआ। कहीं समाजवादियों का आंदोलन उसी दिशा में बढ़ता एक और कदम तो नहीं? उत्तर प्रदेश में चुनावी पराजय के बाद समाजवादी पार्टी को अचानक गंगा जी याद आ गर्इं और राष्ट्रीय महासचिव कुंवर रेवती रमण सिंह के हवाले काशी से गंगा की अविरलता व निर्मलता को लेकर आंदोलन शुरू करने की बात की गई। यह वो राजनैतिक दल हैं, जो सत्ता में काबिज होने पर कानपुर से ट्रेनरियां नहीं हटेंगी और पूरे उत्तर प्रदेश में एक भी एसटीपी निर्माण के लिए वेंâद्र सरकार को अनुमति नहीं देंगे और सत्ता से हटते ही गंगा के बहाने राजनीति चमकाने की जुगत करने लगेंगे। इसी बीच, उस सम्मेलन में मौजूद यूपीए सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बड़े साफगोई से यह स्वीकार किया कि बिहार में गाद और बांध की समस्याओं पर कभी विचार ही नहीं किया जा सका। कुल मिलाकर ये सभी महारथी अपने कालखंड की नाकामियों को बता रहे थे अथवा गंगा आंदोलन को धार देने के लिए आगे के दो वर्षों में लोकसभा चुनाव के लिए गंगा के बहाने महागठबंधन तैयार करने की कोशिश कर रहे थे। ऐसा नहीं है कि गंगा आंदोलन उतार-चढ़ाव के दौर से नहीं गुजरा है। परंतु हर समय सत्ता और विपक्ष ने अपने-अपने अनुसार माँ गंगा के हित में अपनी-अपनी भूमिका सुनिश्चित की है। अकेले उत्तराखंड के अंदर पांच सौ पैंतीस छोटे-बड़े बांधों को पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने स्वीकृति दी और उत्तराखंड की हरिश रावत सरकार ने पिछले तीन वर्ष प्रधानमंत्री जी से इस बात पर संघर्ष किया कि उत्तराखंड के बांध रूकने नहीं चाहिए। आज राजनैतिक विवशता के कारण उनके बड़े नेता जयराम रमेश अविरल और निर्मल गंगा की बात करते हैं। २०१० के अगस्त मास में तत्कालिन वित्त मंत्री एवं वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति जी ने साढ़े छह सौ करोड़ का नुकसान उठाकर लोहारी, नागपाला, पाला-मनेरी और मनेरी-भाली -२ को रद कर दिया था और जयराम रमेश को भेंजकर इको सेंसेटिव जोन उत्तरकाशी के ऊपर विधिवत् एक सर्वे करवाकर आदेश जारी करवाया था। वह आदेश कहा चला गया, कानून की शक्ल ले सका कि नहीं किसी को कुछ भी पता नहीं और कांग्रेस आज अविरल गंगा और इको सेंसेटिव जोन के मुद्दे पर आंदोलन की मुद्रा में खड़ी है। २०११ के दौर में देश में तीन प्रकार के आंदोलन एक साथ यूपीए के विरोध में प्रारम्भ हो गये थे। अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, रामदेव का कालाधन के खिलाफ आंदोलन और प्रोपेâसर जीडी अग्रवाल द्वारा अविरल गंगा के लिए उत्तराखंड के अंदर बन रहे बांधों को रोकने का आंदोलन इन तीनों के पीछे तीन प्रकार के सुपारी किलर लगाये गये जो इनकी कमियों को पकड़कर इस पूरे आंदोलन को खड़े होने से पहले नष्ट कर दें। अन्ना हजारे के साथ स्वामी अग्निमेश, रामदेव के साथ उनकी कंपनियों में डायरेक्टर सुबोधकांत सहाय और प्रोफेसर जीडी अग्रवाल के साथ स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती कांग्रेस की योजना से लगाये गये ताकि आंदोलन तो चले लेकिन हाथ से बाहर न जाए। परिणाम यह हुआ कि देश के आम जनता इस छल को समझते हुए यूपीए को ऐसी पटखनी दी कि भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का उद्भव ‘मुझे माँ गंगा ने बुलाया है..’ इस उक्ति के साथ हुआ। संघ परिवार के समवैचारिक संगठन ‘गंगा महासभा’ एवं ‘गंगा समग्र’ के साथ काम करने के कारण संगठन ने उमा भारती को जल संसाधन एवं गंगा पुुनरुद्धार मंत्रालय का काम देकर प्रधानमंत्री ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी कि गंगा जी के सवाल पर कोई समझौता नहीं होगा। हमारी सरकार प्राथमिकता के साथ माँ गंगा का काम करेगी। समय-समय पर प्रधानमंत्री के साथ उनके प्रधान सचिव ने भी गंगा मंत्रालय का हिसाब-किताब लेने की कोशिश की। परंतु अपने पूर्व के पूर्वाग्रहों से ग्रसित और सही दिशा और दशा के अभाव में उमा भारती ने इस मंत्रालय के कामकाज को वहीं लाकर छोड़ दिया है जहां तीन वर्ष पूर्व यह मंत्रालय था हालांकि स्वतंत्रता पश्चात् गंगा मंत्रालय का गठन मोदी जी की प्राथमिकता में था उनकी संवेदनाओं में है परंतु यह बात गंगा मंत्रालय से जुड़े मंत्री और अधिकारियों को समझ में नहीं आई और मंत्रालय के अंदर अधिकारी आपस में यह चर्चा करते हैं कि गंगा के सहारे वोट प्राप्त नहीं किया जा सकता तो जैसे चल रहा है वैसे ही चलने दो। नेशनल रीवर एक्ट के ड्रॉफ्टिंग कमेटी का गठन कर प्रधानमंत्री के प्रस्तावक रहे गंगा महासभा के मार्गदर्शक न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय की अध्यक्षता में एक कमेटी बना दी और इस कमेटी ने अपने रिपोर्ट सौंप दिये परंतु कमेटी में काम करने वाले विशेषज्ञों से जूनियर लोगों द्वारा कमेटी की अनुशंसा को परिक्षण कराना क्या विशेषज्ञों का अपमान नहीं है? ऐसी गलत सलाह मंत्रालय को कौन दे रहा है? भले ही प्रधानमंत्री अपना सूट नीलाम करके सीजीएफ (क्लीन गंगा फंड) में जमा कर दें। आजादी के बाद सबसे बड़ी राशि बीस हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था कर दें परंतु प्रधानमंत्री की इस पीड़ा को शायद गंगा मंत्रालय के अधिकारी समझ नहीं पायें। तभी तो मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में एनएमसीजी का कार्यालय दो करोड़ रुपये प्रतिमास के किराये पर फाइव स्टार सुविधाओं से युक्त करके अनावश्यक रूप से स्टाफ की नियुक्ति कर इस विभाग के अंदर सात-सात भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की नियुक्ति कर, ये वह अधिकारी हैं जिन्होंने गंगा जी को आदि से अंत तक देखा भी नहीं। जिन नगरों का इनके पास प्रभार है, उस नगर में कितने नाले गंगा जी में गिरते हैं, यह इन्हें पता नहीं। कितना एमएलडी सीवर किस नगर में उत्सर्जित होता है और उसको नापने का सही पैमाना क्या है? इस पर कोई वैज्ञानिक राय नहीं फिर भी आंकड़ों में मेजर ध्यानचंद स्टेडियम के वातानुवूâलित कमरों में बैठकर गंगा को साफ किये जा रहे हैं।
७ अक्टूबर २०१६ को केंद्रीय कैबिनेट ने एनएमसीजी को अथॉरिटी में बदल दिया और एक हजार करोड़ रुपये तक स्वयं खर्च करने का अधिकार दे दिया। यह स्ट्रक्चरल परिवर्तन तो था परंतु मंत्रालय के अधिकारी-कर्मचारियों के अंदर किसी भी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं दिखा। गंगोत्री से गंगा सागर तक जिस एसटीपी प्रोजेक्टों की बात की जा रही है, वह अपनी टेक्नोलॉजी के दारिद्रयभाव से पीड़ित हैं और मंत्रालय की मंत्री महोदया गंगा दर्शन यात्रा में व्यस्त हैं। जहां तीन वर्षों के अंदर एक भी सीवर के नाले को यह मंत्रालय बंद नहीं करा पाया वहां इस मंत्रालय के मंत्री के साथ अधिकारियों की और दर्जनों सलाहकार जो लाखों रुपये महीने की मानदेय पर नियुक्त हैं। उनकी गंगा निर्मलीकरण मंशा पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। जहां तक इस मंत्रालय का मंशा का सवाल है तो उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट के आदेश के विपरित जाकर सपा सरकार ने ट्रेनरियों को नहीं बंद करने का हलफनामा दिया था तब एनएमसीजी ट्रेनरी बंद करने की बात कर रहा था। जब योगी जी की सरकार ने गंगा में एक बूंद सीवर का पानी नहीं जायेगा और ट्रेनरियों को स्थानांतरित करना पड़ेगा, यह आदेश दिया तो एनएमसीजी इसके उलट एनजीटी में ट्रेनरी स्थानांतरित न की जाए, इसका शपथ पत्र लेकर पहुंच गया। प्रश्न यह उठता है कि एनएमसीजी गंगा के हितों का रखवाला है या गंगा के अंदर प्रदूषण पैदा करने वाली कल-कारखानों का दलाल? वैचारिक शून्यता के कारण गंगा मंत्रालय का यह विभाग अपने स्वयं के बुने जाल में बुरी तरह से उलझकर रह गया और ट्रेनरियों को हटाने की जगह कवि सम्मेलन कराने में व्यस्त हो गया। वास्तव में प्रशासनिक अधिकारियों का यह आर्थिक खेल जो यूपीए सरकार में शुरू हुआ वह एनडीए सरकार में भी बदस्तूर जारी है। किसी भी प्रोजेक्ट में अगर मिशन शब्द का इस्तेमाल किया जाए तो वह ठेका देने के लिए ग्लोबल टेंडरिंग की प्रक्रिया नहीं गुजरना होता है क्योंकि मिशन शब्द लगते ही आप जिसे चाहे उसे काम दे सकते हैं और यही मंत्री और अधिकारियों के हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट का खुला खेल शुरू होता है जहां पर गंगा के बहाने अपने लोगों को उपकृत करने का काम चलता है।
प्रश्न यह उठता है कि प्रधानमंत्री के प्रतिबद्धताओं को ताक पर रखकर मंत्रालय के अंदर रोज नया तमाशा खड़े किये जाते हैं। कभी ढाई सौ प्रोजेक्टों का उद्घाटन, कभी छोटे-बड़े साढ़े आठ सौ प्रोजेक्ट्स को क्लीयरेंस जैसे शब्दों का प्रयोग कर हम देश के साठ करोड़ गंगा पुत्र, नौ राज्यों के गंगा बेसिन और तीन सौ से ज्यादा लोकसभा सीटों वाले पुत्रों की माँ गंगा को क्या संदेश देना चाहते हैं? और आगे के दो वर्षों में अविरल और निर्मल गंगा के सपने को हम वैâसे साकार करेंगे, इसका कोई रोडमैप है क्या हमारे पास? २०१४ में २०१६ में गंगा साफ की बात होती थी और २०१६ में २०१८, २०१७ में २०२२ की बात होने लगी है और अविरल गंगा के मुद्दे पर तो सात वर्षों का समय मांगा जा रहा है जो विषय एक क्षण में निर्णय लेकर इको लॉजिकल फ्लो का भविष्य तय कर सकता है उसके लिए सात वर्षों का समय यह बात समझ से परे है। भगवान जाने यह मंत्रालय आज किन कारणों से तीन वर्षों में इस स्थिति में पहुंच गया कि सबसे फिसड्डी मंत्रालयों में .०१ प्रतिशत से प्रथम स्थान प्राप्त करने से चूक गया है। इस कारण गंगा पुत्रों के मन की पीड़ा के परिणामस्वरूप किसी नये गंगा मुक्ति आंदोलन का उद्भव हो जाए तो अकारण नहीं मानना चाहिए।
  यह आलेख गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती से साभार प्राप्त हुआ है। उनसे acharya_jeetendra@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है।

रहें होंगे पत्रकार कभी नारद लेकिन अब शकुनि हो गए हैं

जरूरी नहीं है कि जिसकी उम्र और अनुभव अधिक हो जाए वो अपने बाल्यकाल की तुलना में अधिक पूजनीय हो जाए। भारतीय पत्रकारिता के साथ भी कमोबेश यही स्थिती है। 30 मई 1826 में कोलकाता के कालू टोला मोहल्ले में पंडित जुगल किशोर ने जब उदन्त मार्तण्ड शुरु किया तो उन्हें नहीं पता रहा होगा कि 188 साल बाद उनका अखबार मीडिया की शक्ल ले लेगा। सामाजिक विमर्श से आगे बढ़कर कॉपरेट कल्चर में बदल जाएगा। खबरें पेड होंगी। सत्ता के समीप और जनता से दूरी बढ़ती जाएगी। प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया भले कहे कि अखबारों में विज्ञापन का अनुपात खबरों से कम होना चाहिए लेकिन कौन कहा माने। टीवी चैनल वाले तो उदंत मार्तण्ड की जयंती को पुण्यतिथि में ही बदल देंगे। दरबार और दरबारी काल की मूल प्रेरणा से लबालब चैनल वाले सिर्फ वही गाएंगे और बजाएंगे तो उनके आका को पंसद होगा। लाइजनिंग के लिए बकायदा पूरी एक टीम रखी जाएगी और कॉरपोरेट लॉबी और सरकारी गलियारों के बीच संबंधों की कड़ी बनाई जाएगी। इसके बदले मोटी रकम वसूली जाएगी।
राजनीतिक पार्टियों की सैंद्धांतिक विचार विमर्श के आधार पर आलोचना की पंरपरा को त्याग कर पैकेज के आधार पर एक की प्रशंसा तो दूसरे का मानमर्दन होगा।
बदलाव के दौर में मीडिया इतनी बदल गई कि बदलाव को शर्म आने लगी है। व्यवस्थागत मजबूरियां इतनी हावी हैं कि पत्रकारिता की आत्मा की चीख उठी है। स्वभाव से जिसे आलोचक होना चाहिए वो प्रशंसक बन बैठा। आलोचना का भाव तभी आता है जब फंडिग में दिक्कत महसूस हो।
पत्रकारिता, मीडिया में बदलने तक के सफर में इतनी व्यापक हुई कि रोजगार का मेला लग गया है। सैंकड़ों विश्वविद्यालय पत्रकारिता की पढ़ाई कराकर बेरोजगारों को भट्टी में झोंक रहें हैं लेकिन इस भट्टी में तप कर निकलने वाले पत्रकारों का औसत लगातार गिरता जा रहा है। कुछ एक तो माइक आईडी ठीक से पकड़ना बोलना सीख भी जाते हैं लेकिन बहुतेरे श और स का अंतर भी नहीं पकड़ पाते। फिर नुक्ता की तो बात छोड़िए।
ना जाने पत्रकारिता की क्यों जा रही है। मुद्दा राजनीति से ना जुड़ता हो तो खबर का कोई मतलब नहीं रहता। आपकी खबर से आग नहीं लगती तो आप बेकार हैं। आपकी खबर बेकार है। नारद की भूमिका में अब पत्रकार हरगिज नहीं रह गए। शकुनि हो गए हैं।
अंत में पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं।

भारतीय मीडिया के लिए ही नहीं, ये संकट लोकतंत्र की विश्वसनीयता का भी है

ये रिपोर्ट हैरान करने वाला कतई नहीं है। सांप बिच्छू दिखाते दिखाते भारतीय मीडिया नेताओं के भाषणों को लाइव दिखाने तक तो पहुंची। ये विकास नहीं है तो क्या है? अब भला कौन कहेगा कि ये देश संपेरों का देश है? कम से भारतीय मीडिया के सहारे इस देश के बारे में अपनी राय बनाने वाले तो नहीं ही कहेंगे। अब ये नेताओं का देश है।
दरअसल रिपोर्ट्स विद्आउट बार्डर्स संघठन के जरिए तैयार वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की रिपोर्ट आने के बाद ये पता चला कि साल 2017 में भारतीय मीडिया अन्य देशों के साथ रैंकिंग में 136वें स्थान पर है। कुल 180 देशों की रैंकिंग की गई इसमें भारत 2016 की तुलना में 3 स्थान लुढ़क कर 136वें स्थान पर आ चुका है।
हालांकि ये सर्वे मुख्य रूप से प्रेस की स्वतंत्रता को लक्ष्य करके किया जाता है लेकिन इस सर्वे का एक पहलु ये भी है कि ये रैंकिंग मीडिया के स्वतंत्र आकलन और व्यवहार को भी प्रदर्शित करती है। रैंकिन गिरने का अर्थ है कि भारतीय मीडिया का व्यवहार स्वतंत्र नहीं रह गया है या फिर यूं कहें कि भारतीय मीडिया पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर समाचार लिख और दिखा रही है।
भारतीय मीडिया के लिए ये स्थिती ठीक नहीं है। वो भी तब जब हम ये दावा करते हैं कि पत्रकारिता हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। जाहिर है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ की विश्वनीयता लगातार खतरे में पड़ रही है।
इस रिपोर्ट में कुछ और बातें भी हैं। ये रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में पत्रकारिता करना लगातार खतरे से भरा काम होता जा रहा है। 2017 में आई रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 193 पत्रकारों को इस समय जेलों में बंद रखा गया है। इनमें सबसे अधिक संख्या में तुर्की ने पत्रकारों को जेल में बंद किया है। यही नहीं 8 पत्रकारों की हत्या कर दी गई। इनमें सबसे अधिक मेक्सिकों में तीन पत्रकारों की हत्या हुई।
दुनिया के जिन 180 देशों में प्रेस की स्वतंत्रता का सर्वे कराने के बाद रैंकिंग दी गई है उनमें भारत अपने पड़ोसी मुल्कों से कुछ ही स्थान ऊपर है। यानी पाकिस्तान, श्रीलंका जैसे देशों की तुलना में भारतीय मीडिया बहुत अधिक बेहतर नहीं है।
इस रिपोर्ट को कई लोग खारिज कर सकते हैं। हो सकता है वो इस सर्वे के तौर तरीकों और अन्य संसाधनों पर सवाल उठाएं लेकिन ये सच है कि भारतीय मीडिया का व्यवहार लगातार पूर्वाग्रह से ग्रस्त होता जा रहा है। ये गंभीर चिंता का विषय है।

तीन हेलिकॉप्टरों के काफिले में चलते प्रधानमंत्री और ठेले पर लदी गर्भवती।

इस देश के बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि इस देश का प्रधानमंत्री आसमान में भी तीन हेलिकॉप्टरों के काफिले के साथ चलता है। यही प्रधानमंत्री इस काफिले में शामिल एक हेलीकॉप्टर से उतरकर एक विशाल मंच पर आता है और गरीबों के लिए एक नई योजना के शुरु होने की घोषणा करता है और फिर हेलीकॉप्टरों के काफिले के साथ उड़ जाता है।

इस देश में 2011 के आं कड़ो के मुताबिक तकरीबन छह लाख से अधिक गांव हैं। इन गांवों में देश की 68 फीसदी के करीब जनता रहती है। इन्हीं आंकड़ों में एक ये भी है कि 44 हजार के करीब गांव विरान हो चुके हैं। देश के लिए गांवों का विरान हो जाना न कोई खबर है और न ही नीति निर्माताओं के लिए शोध का विषय।

इस देश की आबादी का तकरीबन 16 फीसदी हिस्सा आदिवासियों का है। इनमें से लगभग 11 फीसदी के करीब आदिवासी गांवों में ही रहते हैं। देश के विकास की अधिकतर योजनाओं में इस 16 फीसदी आबादी का हिस्सा कम ही होता है। कम से कम कैशलेस होते भारतीय समाज की अवधारणा में तो इन आदिवासियों को फिट करने में बड़ी मुश्किल हो रही है।

हालांकि पीने के साफ पानी, अपने निवास के करीब ही स्वास्थय सेवाओं की उपलब्धता, शिक्षा और रोजगार जैसे मसलों का जिक्र देश की इस 16 फीसदी आबादी के लिए न ही किया जाए तो बेहतर है। वैसे आदिवासियों के लिए एक हेलिकॉप्टर भी अजूबा है और तीन एक साथ आ जाएं तो दुनिया के अजूबों में उनके लिए एक और अजूबा जोड़ देना पड़ेगा।

बात गरीबी की थी लिहाजा लगे हाथ ये भी बता दें कि देश में गरीबी के पैमाने सरकारों के हिसाब से बदलते रहते हैं। फिर भी 2012 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश का 22 फीसदी के करीब गरीब लोगों का है। ये सरकारी आंकड़ों हैं और इन आंकड़ों को बताने के लिए ही बनाया जाता है। आप चाहें तो गैरसरकारी रूप से इन आंकड़ों में पांच दस फीसदी खुद ही बढ़ा सकते हैं। 2016 की वर्ल्ड ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक देश ऐसी असमानता से भरा है जिसमें देश की एक फीसदी जनता के पास ही 60 फीसदी धन रखा है। मोटी बुद्धि के मुताबिक बची 99 फीसदी आबादी में देश का चालीस फीसदी धन बंट गया। अब ये समझना मुश्किल है कि 99 फीसदी आबादी गरीब है या 22 फीसदी।

अब आपको उत्तर प्रदेश के एक जिले सीतापुर के बिसवां की तस्वीर दिखाता हूं। यहां एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा हुई। सरकार की ओर से दी गई फ्री एंबुलेंस का इंतजाम नहीं हो पाया तो पति ने हाथ के ठेले पर ही लाद कर पास के स्वास्थ केंद्र पहुंचाया। सरकारी डाक्टर नहीं थी लिहाजा नर्स ने डिलिवरी कराई और दो घंटे में नवजात को कंबल में लपेट कर पिता को पकड़ा दिया और प्रसूता को ठेले पर ही वापस भेज दिया। ये जानकारी मुझे भी वरिष्ठ पत्रकार सुधीर मिश्रा की फेसबुक वॉल से मिली।
                 
खैर हमारे लिए ये सुखद खबर है कि हमारे प्रधानमंत्री स्वस्थ हैं और उनके साथ हमेशा विशेषज्ञ डाक्टरों की टीम रहती है। आपको एंबुलेंस नहीं मिली इसके लिए रोइए मत।

खुश रहिए कि देश के प्रधानमंत्री के लिए दुनिया के उन्नत हेलिकॉप्टरों में शुमार तीन हेलिकॉप्टरों का काफिला हर पल तैयार है।

और क्या चाहिए आपको।