You the Indian dog

You the Indian dog, मेरे लिए यही संबोधन था उस व्यक्ति का फेसबुक पर कश्मीर पर चर्चा के दौरान. मई हैरान था, जहाँ तक मुझे पता था, ये कहने वाला एक हिन्दुस्तानी( कश्मीरी) था. बात चल रही थी कश्मीर में उछाले जा रहे पत्थरों की तभी एकायक इस विमर्ष में जगह बना ली इस्लाम ने. मैं अकेला था इस बात को कहने वाला कि कश्मीर समस्या का हल पत्थरों से नहीं हो सकता और कई थे इस मत के पोषक की अब तो इस जन्नत को पत्थरों के सहारे ही बचाया जा सकता है...
कश्मीर के हालात पर मुझ जैसे किसी नौसिखिया पत्रकार को कुछ भी लिखने का अधिकार बुद्धजीवियों की और से नहीं दिया गया है लेकिन मै ये दुस्साहस कर रहा हूँ. भारत का कोई भी नागरिक कश्मीर को अपने दिल में रखता है. देश का आम नागरिक जो किसी पार्टी विशेष से सरोकार नहीं रखता हो या कश्मीर के प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना से ग्रसित न हो(रखने को कई लोग तो बिहार के प्रति भी दुर्भावना रखते हैं) वो यही कहेगा की कश्मीर हमारे देश का ताज है. आज आखिर ऐसा क्या हो गया की लगभग एक अरब जनता की भावना पर घाटी के कुछ लाख लोगों के पत्थर भारी पड़ गए.
सन १९४७ में मिली आज़ादी के बाद से ही कश्मीर एक ऐसी समस्या के रूप में हमारे सामने आया है जिसका पूर्ण रूप से हल किसी पार्टी के पास नहीं है या शायद कोई हल निकालना भी नहीं चाहता. स्वतंत्र के बाद राज्यों का विलय हो रहा था. इसकी कमान सरदार पटेल के जिम्मे थी लेकिन कश्मीर को नेहरु अपने हाथ में रखना चाहते थे. लिहाजा पटेल यहाँ कुछ नहीं कर सके. नेहरु ने हरि सिंह से खुद ही बातचीत की. हरि सिंह कश्मीर को आज़ाद करवाना चाह रहे थे. उन्होंने नेहरु की बात नहीं सुनी. इसी बीच पकिस्तान के पख्तून कबीले के लोगों को आगे कर पाकिस्तानी हुक्मरानों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया. हरि सिंह भाग कर नेहरु के पास आये और भारत कि सहायता मांगी. इसी समय नेहरु ने हरि सिंह से कश्मीर के भारत में विलय के इकरारनामे पर दस्तखत करवा लिए. बस यहीं से कश्मीर भारत का हिस्सा हो गया. राजनीतिक रूप से कश्मीर भले ही भारत का अंग हो गया लेकिन भावनात्मक रूप से अभी तक नहीं हो पाया है. कभी पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाने वाले शेख अब्दुल्लाह ने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में अपने लिए समर्थन कि हवा बहा रख थी. उसी का नतीजा था कि कश्मीर में धारा ३७० भी लगवा दी. कश्मीर का अलग संविधान हो गया. देश कि संसद का कोई भी कानून वहां सीधे लागू नहीं हो सकता. शेख अब्दुल्लाह अमर हो गए और लगा कि कश्मीर कि आवाम अब विकास के रथ पर सवार हो जाएगी.
इस दौरान देश में एक पूरी पीढ़ी कश्मीर में इंसान और बंदूकों के रिश्तों को परिभाषित करते प्रौढ़ हो गयी. पीछे मुड़ कर देखा तो कश्मीर में चिनार के पेड़ों से ज्यादा सड़कों पर पत्थर और आवाम में असंतोष नज़र आया. आखिर क्या वजह थी इसकी?
अपने हक की आवाज़ उठाते- उठाते कश्मीर के लोगों को पत्थर उठाने पड़ गए. देश का सबसे युवा मुख्यमंत्री जिस प्रदेश के पास हो वो सूबा एक लाइलाज बिमारी से तड़प रहा है. जबरदस्त असंतोष की भावना ने महज डेढ़ साल पुरानी उमर अब्दुलाह सरकार की आफत बुला दी है. पिछले कुछ दिनों में कश्मीर में हुए सुरक्षा बलों और नागरिकों के बीच संघर्ष में ६० लोग मारे जा चुके हैं. समस्या जस की तस बनी हुयी है. उमर अब्दुलाह दिल्ली के चक्कर लगा रहें हैं. इसी बीच प्रधानमन्त्री के आये एक बयान ने नया पेंच फंसा दिया. मनमोहन सिंह कश्मीर कि स्वायतता की बात का समर्थन कर रहें हैं. लेकिन अगर संविधान विशेषज्ञों की मानी जाये तो कश्मीर पहले से ही स्वायत है. संविधान की धारा ३७० इस बात की दुहाई देती है. इसके अलावा भी कश्मीर को केंद्र की ओर से बहुत कुछ मिलता है. इतना मिलता है जितना देश के किसी राज्य के निवासियों को नहीं मिलता. लेकिन इसके बावजूद कश्मीर में सड़कों पर पत्थर क्यों नज़र आते हैं?
कश्मीर में भले ही भारत सरकार सबसे अधिक आर्थिक योगदान देती है लेकिन वहां के लोगों को इसका फायदा नहीं मिलता. क्योंकि वहां भ्रष्टाचार चरम पर है. केंद्र सरकार की दी धनराशि क्या बेहद कम हिस्सा वहां के नागरिकों को मिलता है. राज्य सरकार के मंत्री इस धनराशि का बड़ा भाग अपने लाभ पर खर्च करते हैं. जो कुछ बच जाता है उससे केंद्र सरकार के नौकरशाह उड़नखटोले में बैठ कर कश्मीर की वादियों की सैर करते हैं, दिल्ली ले जाने के लिए सेव और पश्मीना शाल पैक कराते हैं. इसके साथ ही यह कोशिश करते हैं कि कश्मीर के साथ जुदा 'समस्या' शब्द हटने ना पाए. कश्मीर हमेशा के लिए एक समस्या के तौर पर बना रहे.
अगर वास्तविकता में केंद्र सरकार ये चाहती है कि कश्मीर का मसला हल हो तो उसे इस बात के प्रमाण देने होंगे कि उसके पास इसे लेकर एक ठोस राजनीतिक योजना है. जो सहायता कश्मीर के नागरिकों को दी जा रही है उसका समुचित हिस्सा उन तक पहुँच रहा है. इसके अलावा सरकार को ये भी कोशिश करनी चाहिए कि पडोसी मुल्क की भीख पर पलने वाले कुछ अलगाव वादियों के इशारे पर हाथों में पत्थर उठाये युवा कश्मीर को वहीँ के बुजुर्ग इस काम से रोक ले. वरना ये पत्थर एक दिन इतने अधिक हो जायेंगे जो घाटी की ओर जाने वाले हर रास्ते को बंद कर देंगे और हम इस ओर खड़े होकर सुनेंगे you indian dog.

पाकिस्तान जिंदाबाद



आपको ये शीर्षक कुछ अजीब लग सकता है. आखिर लगे भी क्यों ना, साल में महज दो बार आपको याद आता है कि आज आप स्वतंत्र हैं, आज़ाद मुल्क में रहते हैं और इस आज़ादी को पाने के लिए कुछ लोगों ने कुर्बानी दी थी........१५ अगस्त और २६ जनवरी ना आये तो आप को याद ही ना आये कि आज आप जिस खुली हवा में सांस ले रहें हैं उसके लिए कईयों कि साँसे बंद कर दी गयीं हैं. वैसे आप भी अपना फ़र्ज़ अदा करते हैं इसमें कोई दो राय नहीं.....साल में एक एक बार आने वाली इन दो तारीखों पर आप फिल्मी गीत बजाते हैं....बच्चों का शौक पूरा करने के लिए २ रूपये में तीन रंगों में रंगा हुआ कागज का एक टुकड़ा खरीदते हैं.....कई दिनों बाद अपने कुछ ख़ास रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं, थोड़ी देर आराम करते हैं, शाम को किसी बड़े से मॉल में शॉपिंग करते हैं, बाहर खाना खाते हैं और घर आकर सो जाते हैं. अब भला इससे बेहतर दिनचर्या क्या हो सकती है? अब ऐसे में कोई आपको याद दिलाये कि आज पंद्रह अगस्त है तो आप उसपर नाराज़ तो होंगे ही. अब वो आपका सामान्य ज्ञान जांच रहा है...ऐसे हालात फिलवक्त हर युवा भारतीय के हैं...उन्हें पूरे साल याद नहीं रहता कि वो एक ऐसे मुल्क में रहते हैं जिसने बाद मिन्नतों के आज़ादी पाई वो भी ऐसी जो उन्हें कुछ भी करने कि छूट देती है...हुज़ूर इस आज़ादी को तो हम सीने से लगा कर रखते हैं....लेकिन बस साल में एक दो दिन....वैसे आप को लगता है की आज हमारे देश का युवा कहीं से भी देश के साथ जुदा हुआ है...मैं अपनी बात नहीं कहूँगा वरना आप कहेंगे कि मैं अपनी बात थोप रहा हूँ.... लेकिन साल भर 'पे पैकज' और इलेक्ट्रोनिक गजेट पर समय देना वाला युवा आज़ादी मुल्क कि खुली हवा में फैली एक अजीब सी कशिश का एहसास नहीं कर पा रहा है....आज हम सब अपना अपना सपना बुनते हैं और उसे पूरा करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं लेकिन 'freedom at midnight' को अपनी आँखों से देखने वाली पीढी के सपने पूरे हुए या नहीं इसकी फिक्र कौन करता है....
फेसबुक पर उधार का चेहरा ओढ़े और ट्विट्टर पर ट्विटीयाती पीढी के लिए आज़ादी के मायने बदल चुके हैं...... आज आज़ादी का मतलब नितांत व्यक्तिगत हो चला है....खुद का घर हर सुख सुविधा से संपन्न हो यही है हमारी आज़ाद खयाली ...
भारत जैसे देश के लिए आज़ादी सही अर्थों में क्या है इसका भान हमें तभी होता है जब इंडियन क्रिकेट टीम पाकिस्तान के साथ मैच खेलती है या फिर पाक से लगी हमारी सरहद पर तनाव बढ़ जाता है...तब हमें एहसास होता कि हम आज़ाद हैं और कोई हमारी आजादी पर खतरा बन रहा है...तब कहीं जाकर हमारी आँखों के सामने से वो मंजर गुजरते हैं जो हमें याद दिलाते हैं कि ज़मी के इस टुकड़े के साथ कितने जज़्बात अपनी हिस्सेदारी रखते हैं...क्या होती है वो सौगात जिसे हम आजादी कहते हैं....हमें शुक्रिया करना चाहिए इस पाकिस्तान का जो रह रह कर हमें १५ अगस्त और २६ जनवरी के अलावा भी आज़ाद होने का मतलब बताता तो फिर क्यों ना बोले हम पाकिस्तान जिंदाबाद....

गुरु, ई मीडिया वाले त.......

गुरु ई मीडिया वाले त पगला गैयल हववन....धोनिया के बिआयेह का समाचार कल रतिए से पेलले हववन और सबेरे तक वही दिखावत हववन...जब तक एकरे एक दू ठे बच्चा ना पैदा हो जैईहें लगत हव तब तक दिखवाते रहियें....इनकी माँ कि ...........
यह वो सहज प्रतिक्रिया थी जो मुझे अपने शहर बनारस में एक चाय की दुकान पर चुस्कियों के बीच सुनायी दी थी..यकीन जानिए मैंने बिल्कुल भी इस बात का खुलासा वहां नहीं किया था कि मैं भी इसी खेत में पिछले पांच सालों से 'उखाड़' रहा हूँ.....अगर मेरे मुहं से ये तथ्य गलती से भी निकल कर बाहर आ गया होता तो आप समझ सकते हैं कि मेरी बारे में वहां क्या क्या कहा जाता? वैसे एक बात जगजाहिर है कि बनारसी पैदा होते ही बुद्धजीवियों की कोटि में आ खड़े होते हैं....नुक्कड़ की चाय और पान की दुकाने इन बुद्धजीवियों के पाए जाने का केंद्र होती हैं और अगर आप उस दुकान के इर्द गिर्द बहने वाली हवा के विपरीत जाते हैं तो आप से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं होगा....हाँ अगर आपको अपनी बात कहने का बहुत शौक है तो बनारसी अंदाज़ में कहिये, शायद कोई सुन भी ले..वरना पढ़े लिखे लोगों की तरह तथ्यात्मक ज्ञान देने लेगे तो आप लौंडों में शुमार हो जायेंगे..खैर, हाथ में पुरवा, पुरवे में चाय और चाय में रोजी रोटी देने वाले काम को लेकर की गयी प्रतिक्रिया सुनने के बाद उठा तूफ़ान, कुल मिलाकर मामला गंभीर था....लिहाजा निकल लेने में ही भलाई थी....
वैसे जो कुछ भी चाय कि दुकान पर कहा गया उसमे कुछ ज्यादा गलत नहीं था....मीडिया को लेकर आम आदमी यही राय रखता है.....इस देश में जहाँ उत्तर भारत के किसान मानसून की बेरुखी से धान की रुपाई को लेकर चिंतित हैं वहीँ मीडिया वाले मुम्बई में होने वाली बारिश को ही फोकस किये हुए हैं मानो देश में बारिश तो बस मुम्बई में ही होती है....
यकीनन धोनी इस देश में धर्मं की तरह माने जाने वाले खेल क्रिकेट में एक बड़ा नाम है पर आम इंसान से बड़ा नहीं हो सकता ....मीडिया ने धोनी जैसे कई लोगों को को अपने ग्लैमर को ध्यान में रखकर बेहद उच्च कोटि का बना दिया है वो भी उनके सामजिक योगदान के बारे में विमर्ष किये बगैर......अक्सर मीडिया के हाथों में ऐसी ख़बरें होती हैं जो देश कि तकदीर से जुड़ी होती हैं पर उनकी तस्वीर अच्छी नहीं लगती लिहाजा उनकी न्यूज़ वैल्यू कम करके आंकी जाती है.....ख़ास तौर पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने जब से ख़बरों का प्रोफाइल देखना शुरू किया तब से ऐसे हालात सामने आते हैं... मीडिया में कंटेंट डिसाईड करने वालों से आखिर यह कौन पूछेगा कि किस आधार पर कंटेंट तय करते हैं? अब धोनी कि शादी होनी थी सो हुयी लेकिन बिन बुलाये बाराती कि तरह यूं नाचना क्या मीडिया को शोभा देता है ? आखिर कोई गंभीरता भी है या नहीं...ना जाने क्यों मीडिया पूरे देश को एक निगाह से नहीं देख पा रही है....तमाम बड़ी समस्याओं को दरकिनार कर कुछ ख़ास स्थानों और वर्ग की ही ख़बरें दिखाई जाती हैं....या पूरे दिन की ख़बरों में ऐसी ख़बरों का कंटेंट अधिक होता है......आम आदमी महंगाई से मर रहा है...पीने का पानी, बिजली, सड़क जैसी मूलभूत समस्याएँ हैं पर मीडिया मुम्बई की बारिश में नालों का पानी नाप रही है और धोनी कि शादी में प्लेट्स गिन रही है ....अब ऐसे में बनारसियों का गुस्सा फूटे ना तो क्यों? वैसे चाय कि दुकान पर मीडिया के लिए इतने ही आशीर्वचन नहीं कहे गए थे..और भी बहुत कुछ था...वह आपको यहाँ लिख कर नहीं बता सकता...जानना हो तो एक बार चले आईये बनारस ...
हर हर महादेव............

क्योंकि ख़्वाब देखने का कोई वक़्त नहीं होता.....


क्या सपने देखने के लिए भी कोई वक़्त तय किया जा सकता है....सोचता हूँ लोग क्यों कहते हैं कि ये दिन में सपने देखता है? क्या सपने महज रातों में देखे जाने चाहिए? क्या सपने देखने के लिए जगह भी ठीक ठाक होनी चाहिए? कहीं भी कभी भी सपने देखने में क्या बुराई है?
पता नहीं लेकिन जब से सपने देखने शुरू किया है तभी से यह सुनता रहा हूँ कि सपने देखने का एक वक़्त होता है...हर समय सपने नहीं देखे जाते...मुझे लगता है कि ये बातें तब कहीं गयी होंगी जब लोग किसी ख़ास समय पर सपने देखते होंगे और एक मुख़्तसर वक़्त उन्हें हकीकत में बदलने के लिए मुक़र्रर करते होंगे....लेकिन पवन से भी तेज इस मस्तिष्क में एक सवाल यहाँ और आता है कि क्या उनके सपने इतने छोटे हुआ करते थे कि किसी ख़ास वक़्त में देखे जाएँ और किसी ख़ास समय में उन्हें पूरा कर लिया जाये....और अगर पूरे नहीं हो पाए तो क्या? सपने ही नहीं देखते थे....? एक और सवाल मन में आ जाता है कि वो सपने कब देखते होंगे? जहाँ तक मुझे पता चला है वो वक़्त रात का था....लीजिये अब एक सवाल और आ गया मन में कि लोग रात को ही सपने क्यों देखते थे? क्या दिन में किसी का डर था? नहीं, शायद रात को भीड़- भाड़ कम रहती है, शोर कम रहता है इसीलिए रात को सपने देखते होंगे....लेकिन एक सवाल मन में फिर आ गया कि सपनो का भीड़-भाड़ और शोर से क्या लेना देना? समझ में नहीं आता कि क्या सोचकर कहा गया कि हर वक़्त सपने मत देखने लग जाया करो...सपने देखने के लिए अच्छी जगह तलाश लिए करो...जहाँ साफ़ सफाई हो....बैठने की अच्छी जगह हो वहीँ सपने देखा करो....
अब आप ही सोचिए कि अगर इंसान इन बंदिशों में बंधकर सपने देखेगा तो सपनो का क्या होगा.....अरे सपने तो जब चाहें तब देखे जा सकते हैं....जगह, समय देख कर ना तो आँखों में सपने आते हैं और ना तो उन्हें पलकों पर बैठाया जा सकता है.....सपने तो बस आँखों में आ जातें हैं या यूं कहें की आँखों में रौशनी इन्ही सपनो की बदौलत होती है....मेरी तरह आपने भी कई बार किसी सपने को देख आँखों में चमक महसूस की होगी.....इन सपनो को आहिस्ता आहिस्ता जवाँ करना पड़ता है..किसी छोटे बच्चे की मानिंद....इसके बाद ये ख़्वाब हो जाते हैं...दिन रात इन ख़्वाब में जीना कितना सुकून देता है....हर घड़ी इन ख़्वाबों की तस्वीर आँखों पर छायी रहती है....और
जब आँखों में ख़्वाब होंगे तो दिल में हौसला खुद- ब -खुद आ जाता है...वही हौसला जो इन ख़्वाबों को पूरा करने का जुनून आप में पैदा करता है.....और जब आँखों में कुछ कर गुजरने का ख़्वाब, दिल में हौसला और खून में जुनून हो तो वहीँ से शुरू होती है ज़िन्दगी......इसलिए मेरे यारों जितने हो सके उतने ख़्वाब देखो....जब चाहें तब देखो.....जहाँ चाहे वहां देखो क्योंकि ख़्वाब देखने का कोई वक़्त नहीं होता..........

गाँधी को समझे अरुंधती..............





क्या आपको याद है कि वर्ष २००४ में सिडनी शांति पुरस्कार किसे मिला था? नहीं याद है तो हम याद दिला देते हैं ..ये पुरस्कार मिला था अरुंधती रॉय को....कितनी अजीब बात है ना! कभी अपने अहिंसात्मक कार्यों के लिए इतने बड़े सम्मान से नवाजे जाने वाली महिला आज उसी अहिंसा को नौटंकी के समकक्ष रखने पर तुली है.....मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान अरुंधती रॉय ने कहा था कि 'गांधीवाद को दर्शकों की ज़रुरत होती है'...ये एक पंक्ति ही काफी है कि हम अरुंधती रॉय की मनोदशा के बारे में समझ सके....अरुंधती रॉय के गाँधी के विचारों के प्रति क्या नजरिया है ये भी आसानी से समझा जा सकता है....जिस तरीके से अरुंधती रॉय ने मावोवादियों के समर्थन में अपने सुर अलापे हैं उसका निहितार्थ देश की वर्तमान राजनीतिक और सामजिक व्यवस्था से परे है.....
आज देश में आतंरिक सुरक्षा को लेकर जो सबसे बड़ा खतरा है वो है नक्सालियों और मावोवादियों से और इस बात को आम आदमी से लेकर ख़ास तक जानता है तो क्या इसे अरुंधती रॉय नहीं समझ रही हैं....दंतेवाडा में सुरक्षा बलों पर हमले के बाद जिस तरीके से झारग्राम में ट्रेन को निशाना बनाया गया उसे देखकर क्या कोई भी शख्स इनका समर्थन कर सकता है?
यकीनी तौर पर यह कहा जा सकता है कि देश में हमेशा शांति नहीं रह सकती..और तब तो और जब संसाधनों का बंटवारा समान रूप से ना हुआ हो और उसका उपयोग वो समाज ना कर पा रहा हो जिसने उन संसाधनों को सुरक्षित रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो....नक्सलबाड़ी से जब एक आवाज़ उठी तो वो अपने अधिकारों की बात कर रही थी....उसका मकसद एक ऐसे अहिंसात्मक आन्दोलन को खड़ा करना था जो समता मूलक समाज की अवधारणा से प्रेरित था......लेकिन राजनीतिक नेतृत्व से भटकाव इस आन्दोलन को एक ऐसे मोड़ पर ले आया जहाँ इसका विरोध इसके अपने ही करने लगे.....यहीं से शुरू हो चुकी थी एक ऐसी जद्दोजहद जहाँ अपने को सही साबित तो करना ही था साथ ही अपना हक भी लेना था लेकिन राजनीतिक नेतृत्व से समन्वय ना हो पाना दुखद साबित हो रहा था....नक्सल वाद का समर्थन करने वालों को लगा कि अहिंसात्मक आन्दोलन से कुछ हासिल नहीं होने वाला लिहाजा बंदूकों का इंतज़ाम होने लगा....देश के जंगलों में जहाँ कभी माहौल खुशनुमा रहता था वहां की हवा में बारूद कि महक घुल गयी...बूटों की आवाजें आने लगी....इन बूटों की आवाजों के नीचे गाँधी की अहिंसात्मक सोच कराह रही थी... अभी तक अपना हक मांग कर अपनी ज़िन्दगी खुशहाल बनाने की सोच रखने वाले अब दूसरों की ज़िन्दगी को दुखों से भर रहे थे.....हैरानी की बात थी कि मर्ज़ बढ़ रहा था और सरकार इस बात पर सोच विचार कर रही थी कि ये रोग कितना फ़ैल सकता है? रोग को फैलना था सो फैला और सरकारें आती जाती रहीं....इसी दौरान इसी भारत में एक ऐसा वर्ग भी बन गया जो इस रोग के समर्थन में आ रहा था....
जहाँ तक मुझे मालूम है अरुंधती रॉय ने अपने जीवन में एक ही उपन्यास लिखा है ( और लिखा हो कृपा करके बताएं क्योंकि मेरा अंग्रेजी उपन्यासों का ज्ञान शून्य है) ...एक उपन्यास लिख कर अरुंधती जी आज देश में बुद्धजीवी वर्ग का चेहरा हैं....ये वर्ग जब अंग्रेजी में कुछ कहता है तो वह बेहद गंभीर बात हो जाती है...
इसी बीच ये बात भी जाहिर हो गयी कि लम्बे समय तक निराशा और हताशा के बाद अहिंसा, हिंसा की ओर बढ़ने लगी......ऐसे में कोई हैरानी नहीं हुयी कि देश के बुद्धजीवी वर्ग का नमूना मानी जाने वाली अरुंधती रॉय ने इस खून खराबे का समर्थन किया.... वैसे अरुंधती रॉय जैसे लोग हमारे देश में अब बहुतायत में पाए जाते हैं....ये भारत को 'इण्डिया' कहते हैं इसीलिए ये 'एलीट' वर्ग के हो चले हैं....भारत को जो लोग भारत कहते हैं वह निम्न हैं और जो इसे' भारत माता' कह दे वो तो निम्नतर हो जाते हैं.....अरुंधती रॉय जब मावोवादियों के साथ जंगल में गयी तो उन्हें पता चला कि ऐसी समस्याओं का हल गाँधी के अहिंसात्मक नज़रिए से नहीं हो सकता....जहाँ तक मुझे लगता है अरुंधती रॉय के विचारों में आया ये त्वरित परिवर्तन किसी ऐसे व्यक्ति के लिहाज से बिल्कुल उचित था जो वातानुकूलित कमरों और गाड़ियों का आदि हो चला हो और अति उत्साह में उसे कुछ गर्म जंगलों में पैदल घूमते हुए जंगली कीड़ों के बीच बिताना पड़े...पर इस सब के बीच दुःख इस बात का हुआ कि सुश्री रॉय ने गाँधी की अहिंसात्मक सोच पर प्रश्नचिंह लगा दिया....दरअसल वो भूल गयी कि जिन आदिवासियों के बारे में उन्होंने अब जाकर सोचना शुरू किया है उनके बारें में गाँधी ने लगभग सौ वर्ष पूर्व ही सोच लिया था....हाँ ये बात और है कि तब ये महज आदिवासी थे, नक्सली या मावोवादी नहीं.....गाँधी ने कभी भी जंगलों और आदिवासियों को अलग करने की बात नहीं कही....बल्कि उन्होंने रस्किन के उस अवधारणा का कि, श्रम की वास्तविकता से अलग हुआ असमान सामजिक जीवन अहिंसा की सम्भावना को आगे नहीं बढ़ने देता है, का हमेशा समर्थन किया...स्पष्ट है कि गाँधी जी इस बात को समझते थे कि यदि देश में असमान विकास हुआ तो वंचित लोग अहिंसा का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं....लिहाजा उन्होंने हमेशा एकरूप सामाजिक ढांचे का समर्थन किया.....गाँधी जी के अहिंसात्मक आंदोलनों को निष्क्रिय समझने वाले भी भूल करते हैं....हालाँकि शुरूआती दौर में किये गए आन्दोलन ज़रूर कमजोर थे लेकिन इस बात से प्रेरणा लेते हुए स्वयं गाँधी ने अपने आंदोलनों को सक्रिय रूप दिया...इसी के बाद सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ...गाँधी जी और तत्कालीन राजनीतिक विशेषज्ञों ने इसे बन्दूक की बदौलत बुलंद की गयी विरोध की आवाज़ से अधिक प्रभावशाली माना था....सविनय अवज्ञा आन्दोलन की अवधारणा अन्याय के खिलाफ सक्रिय विरोध का सुझाव देती है.... इस अवधारणा में कानून के प्रति गहन सम्मान भी निहित था....अरुंधती रॉय के साथ वाला बुद्धजीवी वर्ग आज जिस गाँधी को नक्सली समस्या के आईने में गलत साबित कर रहा है उसी गाँधी ने शहरों के विकास को गलत माना था...ख़ास तौर पर भारत जैसे देश के लिए उन्होंने शहरों को अशुभ बताया था.....अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज्य' में गाँधी जी ने निर्धनता और आधुनिक सभ्यता के 'पाप' के लिए प्रौद्योगिकी और उद्योगीकरण को जिम्मेदार ठहराया था....ऐसे में गांधी ना तो आदिवासियों के विरोधी हो सकते हैं और ना ही उनके अधिकारों के फिर जंगलों में रहने वाले इन लोगों को गाँधी के रास्ते पर चलकर मंजिल क्यों नही मिल सकती....? दरअसल इस देश में गाँधी की तस्वीर को दीवारों पर छिपकलियों के लिए टांग दिया जाता.....समय समय पर अरुंधती रॉय जैसा बुद्धजीवी वर्ग छिपकलियों के साथ गाँधी को भी गाली दे देता है....आज ज़रुरत इस बात कि है गाँधी के नज़रिए को वर्तमान परिपेक्ष्य में समझा जाये और देश को असमान विकास से एक समान विकास की ओर ले जाया जाये....और मेरी एक छोटी सी सलाह और है कि शहरी लोगों को जंगलों में ना जाने दिया जाये.......
हे राम..!

बंधे धागे खोल दो....


ना जाने किस पीर की दरगाह पर
कुछ कच्चे धागे बांध आया था मैं
किस वाली के
दरबार में
हथेलियाँ जोड़
मन्नत मांगी थी मैंने
गुलाबों की चादर से आती खुशबू
और
जलती अगरबत्तियों के धुएं के बीच
कुछ बुदबुदाया था मैंने
किसी मंदिर की चौखट पर
सिर झुकाया था मैंने
हाथों से घण्टियों को हिलाकर
अपने ही इर्द गिर्द घूम कर
कुछ तो मनाया था मैंने
तपती धूप में शायद किसी
साये की आस की थी मैंने
या फिर तेज़ बारिश में
ठौर की तलाश की थी मैंने
या कभी यूँ ही सुनसान राहों पर
चलते हुए
किसी साथी की ज़रुरत महसूस हुयी थी
तभी तो मुझे 'तुम' मिले हो
शायद अब वक़्त गया है
दरगाह पर बंधे धागों को खोलने का ...............

शुक्र है! ये कौम मुर्दा नहीं....


देश में लोकतंत्र बेहद मजबूत हो गया है लेकिन लोगों की बातें इस तंत्र में नहीं सुनी जाती....लोग बोलते बोलते थक चुके हैं और अब तो मुर्दई ख़ामोशी ओढ़ कर चुप बैठे हैं.....लोकतंत्र का उत्सव मनाया जाता है लेकिन शवों के साथ....कौम सांस लेती तो है लेकिन है मुर्दा...ऐसे में तसल्ली देती है एक मुहिम...अपने अधिकारों की भीख मांग- मांग कर थक चुके बच्चों ने अब वादाई कफ़न उतार दिया है और एक जिंदा कौम की तरह इंतज़ार नहीं करना चाहते....अब वो अपनी राह खुद बना रहें हैं...मंजिलें उन्हें मालूम है और सहारा उन्हें चाहिए नहीं......मैं बात कर रहा हूँ वाराणसी में बनाई गयी दुनिया कि पहली और अभी तक एकमात्र निर्वाचित बाल संसद की....
ये बाल संसद समाज के उस तबके के बच्चों की आवाज बुलंद कर रही है जहाँ तक किसी भी सरकार की योजनायें अपनी पहुँच नहीं बना पाती....इस संसद का गठन दो वर्षों पूर्व वाराणसी की एक स्वयं सेवी संस्था विशाल भारत संस्थान ने किया था ......हालाँकि अब ये संसद अपने तरीके से काम कर रही है...विशाल भारत संस्थान मुख्य रूप से समाज के गरीब तबके के बच्चों के लिए काम करती है...कूड़ा बीनने वाले और गरीब बुनकरों के हितों के ध्यान में रखकर इस बाल संसद का गठन किया गया....साथ ही इस बात की कोशिश भी है कि देश में महज नेहरु गाँधी परिवार के बच्चों का ही राजनीति का पेटेंट ना कराने दिया जाये.....( ये मेरी अपनी सोच है ).....इस बाल संसद में छः से तेरह साल के बच्चे बाल सांसद का चुनाव लड़ सकते हैं...बाल सांसद का चुनाव लड़ने के लिए बाकायदा एक आचार संहिता भी बनाई गयी है ताकि अभी से इन बच्चों को दागी और साफ़ सुथरी छवि का अंतर स्पष्ट हो जाये...इस आचार संहिता के मुताबिक प्रत्याशी की छवि दागदार नहीं होनी चाहिए मसलन वो स्कूल से जी ना चुराता हो, अध्यापकों की इज्ज़त करता हो, चोरी ना करता हो आदि....साथ ही प्रत्याशी देश के प्रति वफादार हो, जात पात में विश्वास ना करता हो, निम्न और गरीब तबके के बच्चों से प्रेम भाव रखता हो....आमतौर पर ये बातें हमारी बड़ी वाली संसद में चुने लोगों पर लागू नहीं हो पाती...
बाल संसद के चुनाव के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है....नामांकन हो चुका है और चार जून को मत डाले जायेंगे..परिणाम इग्यारह जून को घोषित किये जायेंगे....चुनाव के लिहाज से इस बार वाराणसी को छः बाल संसदीय क्षेत्रों में बांटा गया है....यानि कुल छः बाल सांसद और एक अध्यक्ष या स्पीकर चुना जायेगा.....अगर आप सोच रहें है ये बच्चे खिलवाड़ कर रहें हैं तो आप गलत हैं...क्योंकि इस देश के लोकतंत्र के साथ बड़ो ने जैसा खिलवाड़ किया है ये बच्चे ऐसा कुछ नहीं करने जा रहे हैं.....हमारी और आपकी वज़ह से इस देश की हालत ये है कि अब 'शरीफ' घरों के लोग चुनावों में वोट डालने नहीं जाते ...लेकिन जब कभी ट्रेन में राजनीतिज्ञों को गाली देने मौका मिलता है तो अपना पूरा गाली ज्ञान उड़ेल देते हैं.... इस बाल संसद में ऐसा कुछ नहीं होता ......इस बार के चुनावों में कुल चार बच्चा पार्टियाँ संगठित रूप से चुनाव लड़ रहीं हैं इसके साथ कई निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव में हैं...स्पीकर पद के लिए तो छः साल के अमन ने अपनी दावेदारी पेश की है....नामांकन पत्र में प्रत्याशियों को अपनी संपत्ति जैसे स्कूल बैग, साईकिल खेलकूद के सामानों की भी जानकारी देनी थी...नामांकन करने वालों को पांच रूपये की जमानत राशि भी जमा करनी पड़ी है...हार जाने पर ये जमानत राशि जब्त कर ली जाएगी....प्रत्याशी किसी वोटर को टॉफी, बिस्कुट का लालच भी नहीं दे सकते हैं और चुनाव से बारह घंटे पहले उन्हें अपना चुनाव प्रचार बंद करना होगा...साथ ही चुनाव में खर्च की गयी राशि का हिसाब भी उन्हें चुनाव के बाद देना होगा...इन कठिन नियमो के मानने के बाद कुल मिलाकर इक्कीस दावेदार हैं मैदान में..इनके भाग्य का फैसला करने के लिए बाल मतदाता भी हैं...वाराणसी में कुल मिलाकर ३६२६ नन्हे वोटर हैं जो अपने पसंदीदा प्रत्याशी का चुनाव करेंगे....इनमे से १२९४ लड़कियां हैं जबकि २३३२ लड़के हैं....प्रत्याशियों के चुनावी मुद्दे भी इस चुनाव का बेहद अहम हिस्सा हैं....उदहारण के तौर पर कोई बाल मजदूरी और बच्चों की शिक्षा के लिए लड़ रहा है तो कोई फीस वृद्धि और पर्यावरण को मुद्दा बनाये हुए है....
इस बार बाल संसद का दूसरा चुनाव हो रहा है और शत प्रतिशत वोटिंग के लिए एक नायाब नुस्खा निकाला गया है....दो पोलिंग बूथ तो बनाये ही गए हैं इसके अलावा एक मोबाइल बूथ का भी इंतज़ाम किया गया है....ये पहली बार है जब देश में मोबाइल बूथ का इस्तेमाल किया जा रहा है...शायद देश में चुनाव कराने वाले बच्चों के इस प्रयास से कुछ सीख ले...ये मोबाइल बूथ विभिन्न इलाकों में जाकर बाल वोटर्स के मत एकत्र करेगा....यही नहीं चुनावों की सुचिता बनाये रखने के लिए चिल्ड्रेन सिक्यूरिटी फोर्स यानि बाल सुरक्षा बाल या सी.एस.ऍफ़. की टुकड़ी भी तैनात रहेगी....जो इस बात की तसल्ली करेगी कि कहीं से भी आचार संहिता का उल्लंघन ना होने पाए...
बाल संसद के लिए पड़ने वाले मतों के हिसाब किताब के बाद परिणाम आने में अभी इग्यारह जून तक का इंतज़ार है लेकिन तब तक हम और आप ये सोच सकते हैं कि आखिर इस देश में बाल संसद जैसी सामानांतर लोकतान्त्रिक प्रणाली की आवश्यकता क्यों पड़ी? आखिर क्या वज़ह थी कि कूड़ा बीनने वाले बच्चों को अपना भाग्य लिखने के लिए अपनी कलम उठाने की ज़रुरत आन पड़ी? इस बारे में देश के भाग्यविधातायों को सोचना चाहिए...वैसे तसल्ली है कि देश के वंचित वर्ग ने अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए पूर्णरूप से लोकतान्त्रिक रास्ता अख्तियार किया है और पांच साल तक इंतज़ार करने वाली एक मुर्दा कौम से खुद को अलग साबित भी कर दिया........

सर, कोई जुगाड़ है ?

देश में मानसून का इंतज़ार हो रहा है..सब कह रहें हैं की मानसून इस बार अच्छा आएगा, सब इसलिए कह रहें हैं क्योंकि मौसम विभाग कह रहा है... वैसे मौसम विभाग गाहे बगाहे यह भी कह देता है की हो सकता है की कुछ गड़बड़ हो जाये...खैर, भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणियों पर यकीन करना किसी कचहरी में बैठे तोता गुरु की बातो पर भरोसा करने सरीखा ही है.....वैसे हर साल मानसून में एक और बारिश भी होती है वह है पत्रकारों की बारिश.....हर साल देश के विश्विद्यालयों से सैंकड़ो पत्रकार निकलते हैं( मैं भी कभी इसी तरह निकला था) बारिश के मौसम में निकलते हैं लिहाजा इनमे से कुछ बरसाती मेढ़क की तरह होते है....
जबसे देश में मीडिया ने अपने पाँव औरों की चादर में डालने शुरू किये तब से विश्विद्यालयों में हर साल ये बारिश अच्छी होती है...सबसे बड़ी बात की इसमें मौसम विभाग की एक नहीं सुनी जाती.....वैसे आप अंदाज़ लगा सकते हैं की अगर हर साल सैंकड़ो की संख्या में पत्रकार निकलते हैं तो देश का लोकतंत्र कितना मजबूत हो रहा होगा लेकिन आपको यहीं रोकता हूँ ....ये ज़रूरी नहीं है की पत्रकार बन जाने के बाद कोई पत्रकरिता भी करे ..अब आप कहेंगे की यह क्या बात हुयी.....जब कोई पत्रकारिता करेगा तभी तो पत्रकार कहलायेगा ...जी नहीं बिलकुल नहीं अगर आप इस मुगालते में हैं तो अपना सिर किसी पत्थर पर दे मारिये (अपने रिस्क पर)....कभी बनारस आये हैं आप ? एक बार आ जाइये ..यहाँ आप को सड़क पर दौड़ते हर दो पहिया वाहन में से दूसरे वाहन पर प्रेस लिखा मिलेगा.....उसपर सवार युवक यूं अकड़ कर बैठेंगे मानो अभी अभी माफिया दाउद का साक्षात्कार कर के आ रहें हो और अब कसाब का करने जा रहें हो....इनके जलवे को देखकर आप कह ही नहीं सकते की ये पत्रकार नहीं हैं....हालाँकि किसी पोलिसे वाले की मजाल नहीं होती की इन्हें रोक ले लेकिन अगर रोक कर वाहन के कागज़ मांग भी लिए तो उससे पहले ये अपना परिचय पत्र दिखा देते हैं ...अब आप बताइए की क्या पत्रकार, पत्रकारिता करे, ये ज़रूरी है ?
छोड़िये हम बात कर रहे थे पत्रकारों की सालाना बारिश की....देश के विश्वविद्यालयों से निकलने वाले इन तमाम छात्रों की आँखों में एक सुनहरा सपना होता है की वह अब पत्रकार बन कर अपनी जीविका चला लेंगे..आमतौर पर ऐसे नौसिखिये पत्रकार अख़बारों में जाते हैं....जो कोई किसी बड़े नामचीन अखबार में पहुँच गए वो तो कुछ दिनों के लिए इस क्षेत्र में बने रहेंगे लेकिन जो बेचारे किसी भयंकर अखबार में पहुँच गए तो समझिये की उनका बेडा गर्क....बेचारे अपनी गाड़ी में अपने पैसे का तेल भरा कर रिपोर्टिंग करेंगे....एक्का दुक्का विज्ञापन भी लायेंगे ..अपना दिन भर का समय देंगे लेकिन पैसा नहीं पाएंगे......पाएंगे तो सिर्फ एक परिचय पत्र जो उनके दिल को ये बताएगा की लो अब तुम भी पत्रकार बिरादरी के सदस्य हो गए हो...लेकिन कुछ दिनों बाद जब घर वाले ताना मारना शुरू करेंगे तो समझ लीजिये की पत्रकारिता तेल लेने चली गयी.....प्रिंट ही नहीं इलेक्ट्रोनिक मीडिया में भी यही हाल है...यहाँ तो स्ट्रिंगर अपना स्ट्रिंगर रखता है...डिग्री लेकर निकलने वाले बच्चे जब पुरनियों से संपर्क करते हैं तो पुरनिये उनसे फटाफट कैमरा, माईक और मोटर साइकिल का इंतज़ाम करने की सलाह दे देते हैं...फिर काम सिखने की लिए अपनी ख़बरों पर भेजना शुरू करते हैं...यानि यहाँ भी वही हालात...अपनी गाड़ी, अपना तेल, अपना कैमरा, अपना माईक, अपनी मेहनत लेकिन काम दूसरे का, नाम दूसरे का.....जब स्ट्रिंगर अपना स्ट्रिंगर रखेगा तो क्या होगा आप समझ सकते हैं....ऐसे में जो बचे रह गए वो कुछ दिन चल जायेंगे वरना ज्यादातर भाग जायेंगे....
वैसे जितने लोग डिग्री ले कर निकले वह इस क्षेत्र में आये ही ये भी ज़रूरी नहीं है....अधिकतर तो पहले ही कहीं कुछ और की तलाश में लग जाते हैं...कुछ एक हिम्मत करके इस मैदान में उतरते भी हैं तो ऐसी परेशानियाँ उन्हें भागने के लिए विवश करती है.....लिहाजा कईयों को अपने फैसले पर फिर से मंथन करना पड़ता है...
मीडिया पिछले कुछ सालों में बेहद व्यापक हुयी है लेकिन इसके बाद भी मीडिया की मुख्य धारा में पहुँच कर कार्य करने के लिए कोई सिस्टम नहीं है...कोई कहीं से भी आ सकता है...ऐसे में जुगाड़ तंत्र हावी होने लगता है..... जिसका जितना अच्छा जुगाड़ होगा उसको उतना भाव मिलेगा....इसके साथ ही पत्रकारिता में ऐसे लोग आ जाते हैं जो इसके प्रसार और ग्लैमर को देख कर प्रभावित होते हैं....जिनको पत्रकारिता नहीं भी करनी होती वो भी जुगाड़ देख कर इस क्षेत्र में आ जाते हैं.....लेकिन इनसे इस क्षेत्र को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला.....और हावी होते जुगाड़ तंत्र का ही परिणाम है की यूनिवर्सिटी कैम्पस से बाहर निकलते स्टुडेंट बस यही पूछते हैं की सर, कोई जुगाड़ है ?
वैसे इस बार मानसून अच्छा आएगा इसकी पूरी उम्मीद है लेकिन सूखी धरती की प्यास बुझेगी इसकी कोई उम्मीद नहीं है.......

भाग जाओ, नक्सली आ रहें हैं......

१९ मई को राहुल गाँधी की उत्तर प्रदेश के अहरौरा में सभा चल रही थी..उसी समय मेरे एक पत्रकार मित्र ने फ़ोन किया और कहा कि देश का पर्यटन मंत्री आपके करीब पहुंचा है आप वहां है कि नहीं ? मैंने राहुल गाँधी के लिए यह संबोधन पहली बार सुना था...मुझे क्षण भर में ही विश्वास हो गया कि मेरा कमजोर राजनीतिक ज्ञान अब शुन्य हो चला है...मैंने अपने मित्र से पूछा कि भाई यह राहुल गाँधी ने पर्यटन मंत्रालय कब संभाला? सवाल का अंत हुआ ही था कि जवाब शुरू हो गया मानो मित्र महोदय सवाल के लिए पहले ही से तैयार थे....खैर एक अखबार में कार्यकारी संपादक का पद संभाल रहे मित्र ने बताया कि उन्होंने राहुल गाँधी का यह पद स्वयं सृजन किया है...क्योंकि राहुल गाँधी पूरे देश के पर्यटन पर ही रहते हैं....लिहाजा उनके लिए इससे अच्छा मंत्रालय और क्या हो सकता है....मैं मित्र के तर्क से सहमत हो रहा था...अब तो मैं मित्र की बात आगे बढा रहा था..लगे हाथ मैंने राहुल को पर्यटन मंत्री नहीं बल्कि स्वयंभू पर्यटन मंत्री का दर्जा दे दिया....
वैसे मेरी इस बात से हाथ का साथ देने वाले खुश नहीं होंगे लेकिन कमल और हाथी के सवारों को बोलने का मौका मिलेगा....राहुल गाँधी का अहरौरा दौरा वाकई शानदार रहा...मैं वहां गया तो नहीं लेकिन जो लोग गए थे उन्होंने भीड़ के लिहाज से इस दौरे को सफल बताया.....अपने पूरे भाषण में राहुल ने कहीं भी इलाके में नक्सल आतंक के बारे में बातचीत नहीं की ...मतलब साफ़ था ....राहुल उस दाग को अपने सफ़ेद कुरते पैजामे पर लगने देने से बच रहे थे जिसे देश पर लम्बे समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी ने दिया था...सोनभद्र के जंगलों में नक्सल की पौध जिस कमजोर राजनीति ने उगाई राहुल उसी राजनीति की नयी पौध लगते हैं.....आखिर क्या कारण था की राहुल इस ज्वलंत मुद्दे पर ख़ामोशी की चादर ओढ़े रहे.......
मैं यहाँ राहुल के अहरौरा दौरे के सहारे महज कांग्रेस सरकार की नक्सल और माओवाद जैसी समस्याओं पर नीतियों की ओरे इशारा करना चाहता हूँ....जिस तरीके से नक्सलियों ने पश्चिमी मिदनापुर में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को निशाना बनाया उससे तो यही लगता है की इस देश में सरकार का खौफ इन दहशतगर्दो को नहीं है......देश में नक्सल वाद किस कदर अपनी पहुँच बढ़ा चुका है उसकी एक छोटी सी झलक दिखाने के लिए आपको एक ख़बर से रूबरू कराता हूँ.....मिदनापुर में रेल को निशाना बनाया गया और वाराणसी में पिछले दो दशकों से देश के इन दुश्मनों को कारतूस पहुँचाने वाला एक व्यक्ति पुलिस की हिरासत में आया..... इन दोनों ख़बरों से साफ़ है कि देश के हर कोने में नक्सलवाद अपनी जड़े जमा चुका है.....
केंद्र सरकार अभी भी नक्सलवादियों से बातचीत कर रही है....दंतेवाड़ा में जवानों को मौत की नींद सुलाने वाले नक्सलियों ने अब मासूम नागरिकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है.....झारग्राम में ट्रेन को निशाना बना कर नक्सल वादियों ने बता दिया है की अब वो नक्सलबाड़ी की सरहद से बहुत दूर चले आयें हैं....साथ ही अब उनकी वैचारिक लड़ाई अपनी राह से भटक चुकी है..... ऐसे में वंचित समाज की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले नक्सलवादियों से देश को खतरा उत्पन्न हो गया है.....

केंद्र सरकार की इस पूरे मुद्दे पर जो रणनीति है वो आम जनता में विश्वशनीय नहीं है.......झारग्राम में हुए हादसे के बाद जिस तरीके से इसके लिए जिम्मेदार तत्वों को लेकर विरोधाभाषी बयान जारी हुए वो इसका सबूत है....ये ठीक है की सरकार बिना किसी ठोस सबूत के कुछ भी नहीं कहना चाह रही थी...लेकिन कम से कम उसके जिम्मेदार मंत्री ये तो कह सकते थे की यदि इसमें किसी भी तरह से नक्सलवादियों या माओवादियों का हाथ हुआ तो उन्हें छोड़ा नहीं जायेगा...इससे देश की जनता को एक सन्देश जाता और सरकार की आतंरिक सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे को सुलझाने के प्रति इच्छाशक्ति (भले ही दृढ नहीं ) तो जाहिर होती, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया बल्कि पूरी घटना पर एक रहस्य का आवरण डाल दिया.....ऐसे में साफ़ है की अब ये मुद्दा भी राजनीति के चश्मे से देखा जा रहा है...कोई भी बयान या कदम उठाने से पहले राजनीतिक लाभ और हानि की पड़ताल की जा रही है...
अगर यही हाल रहा तो नक्सलवाद ख़त्म हो पायेगा इसमें शक है...
सरकार ने ट्रेनों पर हमले रोकने का जो तरीका ईजाद किया है वो लाजवाब है..अब ट्रेने ही नहीं चलायी जाएँगी...अगर किसी दिन सरकार आप से कहे की आप के शहर में नक्सली हमला करने वाले हैं लिहाजा अपने घर छोड़ कर भाग जाइये तो इसमें कोई हैरानी मत प्रदर्शित कर दिजीयेगा.......आखिर हमारी सरकार इस समस्या से निबट जो रही है उसकी कीमत हमें और आपको तो ख़ुशी ख़ुशी चुकानी ही होगी न.....क्यों 'सरकार' ?

जिंदा कौम का इंतज़ार .....

आखिर किस आधार पर बात हो माओवादियों से? क्या बसों पर हमले और ट्रेन्स पर हमले को लेकर बातचीत होगी ? पिछले दिनों जब प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे उस समय कहीं से भी नहीं लगा था कि केंद्र सरकार आतंरिक सुरक्षा के मामले में कोई बड़ा कदम उठाने जा रही है... पश्चिमी मिदनापुर के जिस इलाके में यह हादसा हुआ है उस ट्रैक को पिछले छह महीने के भीतर माओवादियों ने कई बार निशाना बनाया....कभी देश के इतिहास में पहली बार किसी ट्रेन का अपहरण किया तो कभी चलती ट्रेन पर गोलियां बरसाईं...और अब यह करतूत...क्या सरकार को इस बात को मान चुकी है कि बातचीत होती रहे खून खराबा तो चलता ही रहेगा...आखिर कौन सी बातचीत हो रही है....? क्या किया जा रहा है?....नक्सल और माओवाद जैसी समस्या से निबटने में सरकार का कोई भी कदम क्यों नहीं निर्णायक साबित हो रहा है.....पश्चिमी मिदनापुर में हुआ रेल हादसा साफ़ बता रहा है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार पूरी तरह से देश में खतरे का घंटा बजा रहे इन वैचारिक आतंकवादियों के आगे घुटने टेक चुकी है...और अब तो खुली छूट है नागरिकों का खून बहाने की ...विचारों की लड़ाई में अब बम धमाके होते हैं ....निरीह लोगों की जाने ली जाती हैं.....सरकार को पता था कि माओवादियों ने इस सफ्ताह को 'काला सफ्ताह' घोषित कर रखा है...लेकिन उसके बावजूद सरकार ट्रेन को निशाना बनने से नहीं रोक पायी...क्या कहेंगे आप इसे? क्या यह सरकार की नाकामी नहीं है? बयां दिए जा रहें है मुआवजा घोषित हो रहा है...रेलवे में नौकरी भी मिल जाएगी.....लेकिन जो लोग मारे गए उनके जाने से रिश्तों में आये खालीपन को भीख में मिली नौकरी भर देगी क्या?
रोजाना हमारे सुरक्षा बलों की कुर्बानी ली जाये...देश के नागरिक अपने ही देश में कहीं भी निशाना बनाये जा सकते हैं....लेकिन सरकार को इस बात की कोई परवाह नहीं है.....एक नागरिक की मौत हो या एक सौ नागरिकों की सरकार तो बातचीत में यकीन करती है ना...वोह तो बस बातचीत करती है... शर्म आती है ऐसी सरकार पर जो अपने ही देश में नागरिकों को सुरक्षित नहीं रख सकती.....नपुंसक राजनीती के गर्भ से कभी किसी देश को विकास रुपी संताने नहीं दी जा सकती......हे इस देश के शांति प्रिय नागरिकों अब तो चेतो...मुर्दे की मानिंद खामोश रहने से अब कुछ नहीं होगा...अगर हम जिंदा कौम के नागरिक हैं तो इंतज़ार क्यों?