जूते भी ईमानदार हो गए...

दिल्ली में गिलानी की सभा में किसी ने उनपर जूता फेंक दिया. ये जूता उनको लगा नहीं. अब इसे क्या कहेगे आप? इससे पहले भी कई लोगों को निशाना बना कर जूते फेंके जा चुके हैं. कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी नीरिह जूते का निशाना बनाने की कोशिश की गयी थी पर ना जाने क्या हुआ. जूता बिकुल करीब जाकर भी नहीं लगा. यह भी नहीं कह सकते कि जूते के जरिये अपनी भावना को व्यक्त करने वाला नया खिलाडी था. भैया वो तो कश्मीर पुलिस का निलंबित अधिकारी था. और इस देश में पुलिस अधिकारियों को जूते मारने की तो बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है. यकीन ना हो तो देश के किसी भी पुलिस स्टेशन में जाइये और देख लीजिये. किस तरह एक आम आदमी जूते खाता है. वैसे ये काम आप अपने रिस्क पर कीजियेगा हुज़ूर. वहां कहीं एक-आध जूते आपको भी लग गए तो मुझे दोष ना दीजियेगा. लेकिन कलयुगी यक्ष का प्रश्न का आज भी जस का तस है कि जूता अपने मुख्य मार्ग से भटका क्यों? जूता नीतीश कुमार की सभा में भी चला था लेकिन हैरानी की बात यह कि ये भी नीतीश को लगा नहीं. मोदी को भी निशाना बनाने की कोशिश की गयी लेकिन सफलता नहीं मिली. क्या हो रहा है इस देश में? इस देश का आम नागरिक इस कदर अपने लक्ष्य से भटक चुका है. एक जूता तक वो निशाने पर नहीं मार सकता. कुछ तो गड़बड़ है. ये राष्ट्रीय चिंतन का विषय है. वैसे जूते तो बुश और ओबामा की सभाओं में भी चले हैं लेकिन वो भी भारतीय जूतों की ही तरह निशाने से चूक गए. ज़रूर कहीं कुछ तो है. अब भला अमेरिकन्स पर भी जूते नहीं पड़ रहें हैं तो कुछ गलत है. वरना भारतीयों का निशाना चूक जाना तो समझ में आता है. अमेरिकन्स कैसे निशाना चूक सकते हैं. यानी अब ये मुद्दा राष्ट्रीय ना रहकर अंतर्राष्ट्रीय भी हो गया है.
इस पूरा मसले को अलग नज़रिए से देखा जाये तो पूरी साजिश जूतों की लगती है. इंसानों वो भी खासकर राजनेताओं पर जब- जब इन्हें फेंका गया इन जूतों ने उनतक पहुँचने से पहले ही अपना रास्ता बदल दिया. साफ़ है कि इस ग्लोबल विचारधारा वाले समाज में सभी जूते भी एक जैसी सोच रखने लगे हैं. सफ़ेद पोशों ने इन जूतों को अपना बना लिया है. कुछ खिला- पिला कर अपने गोल में शामिल कर लिया है. ऐसे भी हमने ना जाने कितने नेताओं को जूतों की माला पहनाई है. लगता है, जूतों को इतने करीब से महसूस करने का फ़ायदा इन नेताओं ने खूब उठाया है. गले में लटके जूते से वार्ता की और उन्हें पटा लिया.
ये नेता खुद तो ईमानदार नहीं हो पाए लेकिन इन जूतों को ईमानदार बना दिया. जूतों को उनकी गरिमा के बारे में बता दिया. उनके कान में बता दिया है कि अगर यूं ही हम लोगों पर पड़ते रहे तो तुम्हारी इज्ज़त का फालूदा बन जायेगा. सच भी है भैया अब पुरानी कहावत है कि कीचड में पत्थर फेंकोगे तो छींटे तुम्हारे ऊपर ही आयेंगे. जूतों को भी लगा की नेताओं से दोस्ती में ही भलाई है. और इस तरह से ईमानदारी का तमगा भी लग जायेगा. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जूतों ने ये निर्णय लिया और सभी प्रकार के जूतों के लिए इसे मान्य किया गया. कंपनी चाहें जो भी हो नियम तो नियम होता है. सभी को मानना ही पड़ेगा. चूँकि भारत में इधर बीच इन जूतों को फेंकने की घटनाएँ कुछ ज्यादा ही हो रहीं हैं इसलिए यहाँ नियम कुछ सख्त हैं. जूते इन नियमो को पूरी तरह से मानते है.
लेकिन इसके साथ ही राज़ की एक बात और बताता हूँ. जूतों ने सिर पर न पड़ने का निर्णय सिर्फ नेताओं और माननीयों के लिए लिया है. आम आदमी इसमें शामिल नहीं है. इसलिए इस मुगालते में न रहें की अब आपका सिर सुरक्षित है. अगर आपने अपने को निरीह प्राणी ना समझ कर अपने दायरों से बाहर निकलने की कोशिश की तो ये जूते आपको आपकी औकात याद दिला देंगे. फिर इसमें इस बात का डर भी नहीं है कि कीचड़ के छींटे उन पर जायेंगे. आम आदमी के ऊपर पड़ने में जूतों को एक प्रकार की आत्मिक शांति भी मिलती है और इस बात का संतोष भी होता है कि एक पुरानी परंपरा का निर्वहन हो रहा है. जूते और नेताओं का साथ अब जन्म जन्म का हो गया है. इसलिए उनपर जूते फेंकने का कोई फायेदा नहीं होने वाला है. और हाँ आपके लिए एक सलाह है, बिल्कुल मुफ्त. वह ये कि यदि आप एक आम नागरिक हैं तो चुप- चाप अपने पैरों को जूतों में रखिये. अगर इनसे बाहर निकालने की कोशिश की तो ये जूते कब आपके सिर तक पहुँच जायेंगे आप को पता भी नहीं चलेगा.

एक स्पर्श रचता है मुझे

गूंथ गयी है वह जमीन मेरी आत्मा में
सालती है मेरे उतप्त प्राण
रचती है मेरी मेधा के त्रसरेणु
जगाती है विस्मृत हो चुके कूपों में
एक त्वरा , एक त्विषा

कोंचती है अपने इतिहास का बल्लम
मेरे शरीर में, पीड़ा की शिराओं के अंत तक
तोड़ देती है अपने हठ की कटार
अस्थियों की गहराई में
धीमे से दबा देती है अपने बीज
मेरे उदर की की तहों में

सींचती है वह नदी मेरे स्वप्न
बुनती है मुझे धीमे से
मद्धम स्वरों में पिरो कर
वो वीथियाँ,
जोतती है मेरी बंजर चेतना
घुस कर मेरे स्वप्न तंतुओं में
छेड़ती है एक राग
बहुत महीन, बहुत गाढ़

धंस गयी है वह सुबह मेरी नींदों में
धोती है जो मुझे मंदिरों के द्वार तक
झांकती है मेरे अंधेरों में
कुरेद कर जगाती है मेरे सोये हुए प्रश्नों को
पवित्र करती है मुझे मेरे आखिरी बिंदु तक

एक स्पर्श रचता है मुझे
गढ़ता है अपने चाक पर, अपनी परिभाषा में,
पकाता है अलाव में धीमी आंच पर
गलाता है मुझे अपने अवसादों तक

टेरती हैं मीनारों से लटकी आजानें
मेरे दोष बोध को
सीढ़ियों पर बैठा जो खोजता है
अपने उद्धार के मंत्र, अपनी मुक्ति का तंत्र

कन्धों पर लाद कर लाया हूँ उत्कंठा के स्तूप
समा गयी है सारी दिशाएं मेरे संकल्प में
पच गयी है सारी धारणाएं उसी जमीन में
जहाँ से उगता हूँ मैं

-
दीपांकर

शुक्र मनाओ तुम भारत में हो..

भारतीय समाज में बुद्धजीवी का दर्जा पा चुकी अरुंधती रॉय ने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है. गिलानी दिल्ली में सेमिनार में कह रहें है कि उन्हें आज़ादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए. गिलानी अगर ऐसी बात कहें तो कोई हैरानी नहीं होती लेकिन अरुंधती ऐसा कहें तो आश्चर्य होता है. हालांकि इसके पहले भी अरुंधती रॉय एक ऐसा ही बयान दे चुकी हैं. तब उन्होंने मावोवाद का समर्थन किया था. कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा ना मानने सम्बन्धी बयान वहां पर अपनी जान कि बाज़ी लगा रहे जवानों के लिए एक तमाचा है. साथ ही शेष देश के लोगों के लिए क्षोभ और शर्मिंदगी की वजह है.
चौंदहवी सदी में कश्मीर में इस्लाम के प्रवेश के बाद से लेकर आज तक कश्मीर हमेशा ही अपनी शांति के लिए जलता रहा है. सन १८४६ में कश्मीर में सिखों और अंग्रेजो के बीच संघर्ष हुआ. मुद्दा कश्मीर पर अंग्रेजों के अधिकार से जुड़ा था. बाद में अंग्रेजों ने ७५ लाख रुपये में राजा गुलाब सिंह को कश्मीर दे दिया. समय बीतता गया और सन १९२५ में गुलाब सिंह की ही पीढ़ी हरी सिंह को राजा बनाया गया. इसी समय एक बार फिर से घाटी में मुस्लिम सियासत शुरू हुयी. १९४७ में राजा हरी सिंह और भारत सरकार के बीच कश्मीर के विलय को लेकर बातचीत चल ही रही थी कि पाकिस्तान के पख्तून काबिले के लोगों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया. हरी सिंह कश्मीर की रक्षा कर पाने में असहाय थे. भारत की सेना ने कश्मीर का वजूद बचाया. इसके साथ ही कश्मीर और भारत एक हो गए. १९७५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और शेख अब्दुला के बीच हुए समझौते के बाद कश्मीर और भारत पूरी तरह से एक हो गए. लेकिन फिर भी ये कहना कि भारत और कश्मीर अलग अलग हैं, अजीब लगता है. तर्क दिया जा सकता है कि ये राजनीतिक दृष्टिकोण है.
१८ महीने पहले कश्मीर की आवाम ने भारतीय लोकतंत्र में अपना विश्वास जताया और बैलेट के जरिये अपना नेता चुना. हो सकता है कि उनका अपना नेता उनकी आशयों पर खरा ना उतरा हो लेकिन इसके बाद भी रास्ता बंद नहीं होता. बैलेट से फैसला लेने वाली जनता के हाथों में अचानक पत्थर कहाँ से आ गए. क्या डल झील से निकले? कौन नहीं जानता कि ये पत्थर पड़ोसी के नाम पर कलंक हो चुके पाकिस्तान से आये हैं. पत्थरों के कारोबार करने वाले कश्मीर की तरक्की से जल रहें हैं. कश्मीर में मंजिलों तक पहुँचने वाली सड़के बन रहीं हैं. रेल चल रही है. उम्मीदों के आसमान में गोते लगाने वाले हवाई जहाज उड़ रहें हैं. ईर्ष्या से जलता पड़ोसी हर कोशिश कर रहा है कि कश्मीर को तरक्की के रास्ते से हटा कर एक बार फिर से आतंकवाद की आग में झोंका जाये. लें वह कामयाब नहीं हो पा रहा. कश्मीर की जनता कभी नहीं चाहती कि वहां इन आताताईयों का राज हो. लेकिन कमजोर राजनीतिक नेतृत्व का फ़ायदा उठा कर अलगाववादी अपनी रोटी सेंक रहें हैं और जनता को उकसा रहें हैं.
आज देश में जितना अनुदान कश्मीर को जाता है उतना किसी और प्रदेश को नहीं मिलता. वर्ष २००९- १० में कश्मीर को विकास योजनाओं के लिए १३, २५२ करोड़ रूपये दिए गए. जबकि आठ पूर्वोत्तर राज्यों को कुल मिलाकर २९, ०८४ करोड़ रूपये दिए गए. साफ़ है कि कश्मीर के लिए केंद्र सरकार की ओर से भरपूर धनराशि दी जाती है. लेकिन फिर भी लोगों में असंतोष क्यों फैलता है? ये एक सहज प्रश्न किया जा सकता है.
दरअसल कश्मीर की समस्या पूर्णतया भारतीय राजनीति में आई गिरावट का नतीजा है. कश्मीर भ्रष्टाचार के मामले में काफी आगे है. यहाँ पैसे की बन्दर बाँट हो जाती है. ये सिलसिला पुराना है. यही कारण है कि कश्मीर को आज जिस स्तिथी में होना चाहिए था वो वहां नहीं है. लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि कश्मीर को अलग मुल्क बना दिया जाये.
वैसे इस बात कि गारेंटी देने वाला भी कोई नहीं है कि आज़ाद कश्मीर अफगानिस्तान नहीं बनेगा. चाहे महबूबा मुफ्ती हो या फिर गिलानी साहब. और हाँ अरुंधती जी जैसे लोगों को समझना चाहिए कि ये उनका सौभाग्य है क वो भारत में रहती है. इसलिए जो मन में बोल सकते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई तिरंगे में से केसरिया रंग चुरा लेगा और मुल्क चुप रहेगा....

भागती छिपकली और दो अक्टूबर



आज गाँधी जयंती है. लाबहादुर शास्त्री का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था. ये इस देश का सौभाग्य है की यहाँ ऐसे महान सपूत पैदा हुए. इन्होने अपने कार्यों से न सिर्फ भारत में बल्कि संपूर्ण विश्व को राह दिखाई. लेकिन अफ़सोस इस बात का है की भारत देश ने इन सपूतों के आदर्शों को व्यवहार में लाना बंद कर दिया है. स्वतंत्रता के साथ वर्ष बीत चुके हैं. गाँधी और शास्त्री अब महज किताबों में सिमट कर रह गए हैं. क्लास वन से लेकर क्लास टेन तक हम गाँधी और शास्त्री के बारे में पढ़ते हैं. इसके बाद धीरे-धीरे कोर्स में इनका हिस्सा कम होने लगता है. जब बात इन दोनों के आदर्शों को जीवन में उतारने की आती है तब तक हम लोग इन्हें भूलने की कगार पर आने लगते हैं. इसके बाद तो सत्य का सिपाही हो या कर्म का पुजारी दोनों ही बस दो अक्तूबर को याद आते हैं.
जो लोग अखबार मंगाते हैं उन्हें सुबह का अखबार देख कर पता चलता है. तमाम सरकारी विभागों को अचानक इस दिन गाँधी और शास्त्री याद आ जाते हैं. लिहाजा देश के लगभग सभी(जो छपते हो या जो न भी छपते हो) अख़बारों में यथा संभव जितने बड़े हो सके उतने बड़े विज्ञापन दिए हैं. भला इससे बेहतर क्या तरीका हो सकता है इस दो महापुरुषों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने का. इस दिन इस कई लोगों को ऑफिस की छुट्टी बता देती है की गाँधी जयंती है. आम लोग बंद बाजारों को देखकर जान पाते हैं की देश में सार्वजनिक अवकाश है. कुछ लोग इसके बाद भी निश्चत करते हैं औरों से पूछ कर. भैया क्या बात है आज दुकाने बंद हैं. कुछ है क्या? तब जाकर पता चलता है कि आज दो अक्टूबर है. ऐसे में कैसे उम्मीद की जाये कि इस देश के लोग गाँधी और शास्त्री को हमेशा याद रखेंगे और उनके आदर्शों पर चलेंगे. हमने पूरे देश में गली चौराहों पर न जाने कितनी मूर्तियाँ लगवा दी हैं इन दोनों की ही. न जाने कितनी कालोनीज के नाम इन दोनों के नाम पर होंगे. लेकिन कोई एक ऐसा मिल जाये जो वाकई में गाँधी या शस्त्री के दिखाए रस्ते पर चल रहा हो. सरकारी प्रतिष्ठानों में भ्रष्टाचार चरम पर है. आम नागरिकों और सरकार के बीच असंतोष ने जगह बना ली है. नागरिक हितों की अनदेखी आम हो चली है. नीतियां बनाने वाले इसे लक्ष्य समूह के लिए प्रतिपादित नहीं करा पा रहें हैं. आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी लगातार बज रह है. मावोवाद और नक्सल समस्या ने परेशान कर रखा है. देश के अन्दर जंग छिड़ी हुयी है. कश्मीर का मसला हल नहीं हो पा राह क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल अपने फायदे को कम नहीं करना चाहता. कभी अंग्रोजों के खिलाफ एकजुट खड़े होकर दुनिया की सबसे बड़ी ताकत ब्रितानी हुकूमत को हारने वाला देश आज मंदिर और मस्जिद के मुद्दे पर सहम जाता है. युवा न तो गाँधी और शास्त्री को पढना चाहतें हैं और न तो उनके बारे में सोचना या समझना कहते हैं. खादी और चरखा आज न जाने किस स्टोर रूम में बंद पड़ा है. अब खुद ही सोच लीजिये की दो अक्टूबर का हमारे लिए क्या महत्व है. वैसे एक बात बताना तो भूल ही गया. कुछ लोगों को दो अक्टूबर का पता तब चलता है जब दीवार पर टंगी गाँधी या शास्त्री की तस्वीर को साफ़ करने के लिए उतार लिया जाता है और उसके पीछे साल भर से आशियाना बना कर बैठी छिपकली बेघर हो जाती है. काफी देर तक ये छिपकली दीवार पर इधर से उधर भागती रहती है. लगता है दो अक्टूबर आ गया. हे राम.

शुक्रिया शशि जी, आपने याद दिलाया हम युवा हैं

एक सुबह जीमेल और ऑरकुट पर लोगिन करते ही फ्रेंड लिस्ट में जुड़े उदय गुप्ता जी ने मुझसे मेरा फ़ोन नंबर पूछा, मैंने दे दिया. इसके थोड़ी देर बाद मुझे लखनऊ से एक फ़ोन आया. इस फ़ोन पर मुझसे कहा गया कि आपके पास थोड़ी देर में देहरादून से फ़ोन आएगा. इतनी देर में मेरे मन में कौतूहल आ चुका था. दो लगभग अनजान फ़ोन और तीसरे का इंतज़ार. हालाँकि ये इंतज़ार लम्बा नहीं चल सका और जल्द ही एक फ़ोन और आया. फ़ोन पर शशि भूषण मैथानी जी थे देहरादून से. कुछ देर कि बातचीत के बाद मुझे पता चल गया कि शशि कि मुझसे उम्र में बड़े और अनुभव में सम्पन्न हैं. शशि जी के हाथ मेरा एक लेख लगा था. शशि जी उसे अपनी पत्रिका' यूथ आईकॉन' में प्रकाशित करना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने कई माध्यमों से होते हुए मेरा फ़ोन नंबर प्राप्त किया था. शशि जी युवाओं को ध्यान में रखकर एक पत्रिका का प्रकाशन करते हैं लिहाजा सोच भी युवा थी. मन में कुछ करने की ख्वाहिश और अन्याय के प्रति बागी तेवर. शशि जी के साथ मेरी बातचीत बहुत लम्बी नहीं थी लेकिन इस अल्प अवधि की बातचीत के दौरान मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैं आज भी युवा हूँ. किसी मुद्दे पर मेरे विचारों को कोई तो अपना मानेगा. यकीन मानिये इस देश में ऐसे लोगों कि संख्या बहुत है जिनकी उम्र १५ से लेकर ३५ के बीच होगी. लिखा पढ़त में इस उम्र के लोगों को युवा कहते हैं लेकिन विचारों में ये युवा हो ज़रूरी नहीं है. देश और समाज के प्रति कुछ कर गुजरने का जज्बा इनमे मिल पाना मुश्किल है. अच्छी पढ़ाई, अच्छा सेलरी पॅकेज, बढ़िया लाइफ स्टाईल यही सब इस उम्र के लोगों का शौक होता है. यकीनन हमारा देश तरक्की कर रहा है. देश में नए एअरपोर्ट बन रहे हैं, नयी और चौड़ी सड़कें बन रही हैं. कंक्रीट के नए पहाड़ बन रहे हैं. लेकिन कोई मुझे बताये कि क्या देश कि तरक्की इन्ही सब चीजों से होती है. देश में सड़ता अनाज और भूख से बिलबिलाते लोग. मूल्यविहीन राजनीती और दिग्भ्रमित प्रजा. क्या यही है हमारी तरक्की?
शशि जी उधर से बोले जा रहे थे. मै सुन रहा था. बहुत दिनों के बाद एक युवा से मुलाकात हुई थी. जो अच्छी और आराम कि नौकरी की बात नहीं बल्कि कोशिश कर रहा था अपने को युवा बनाये रखने का. साथ ही अपने जैसे और लोगों को इस बात का एहसास दिलाने का कि वो भी युवा हैं. शुक्रिया शशि जी इस बात को याद दिलाना के लिए हम आज भी युवा हैं. शायद ये देश इन युवों की बदौलत ही सही मायनों में जवाँ हो पाए..

O! Childhood,

Sometimes beginning the day with a whisper, sometimes with a cry
Sometimes gaping in the void, at times beginning it with an innocent invite

The sudden trance that it takes me into away from the colossal clutches of the trite
Dragging away, disconnected, liberating to the elementary momentary amnesia
Cruising to the myopic state of bionic reflections jaded by the hyperemia
The ephemeral circumvention of the moment drawn away from the empirical hysteria
To the cerebral existence of the self-efficacious creation, to that fleeting vision

There comes a time,
When debates become primordial, when the need of solutions become unreal

O! Childhood,
Why don't you stay forever transcending me to the realms of that fading Ideal

from my friend santosh

बारात में बसिऔरा

मैं ये दावा तो नहीं करता कि इस शीर्षक को पढ़ने वालों की बड़ी तादात शायद इस शीर्षक का मतलब ना समझ पाए लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि एक आदमी तो कम से कम होगा ही जिसे शायद इसका अर्थ समझने में कुछ परेशानी हो तो साहब बारात का मतलब आप जानते ही होंगे(नहीं जानते तो डूब मरिये कहीं, आजकल नालों में भी इतना पानी है कि काम हो जायेगा) और जहाँ तक बात बसिऔरा कि है तो जब घर मैं खाना बच जाता है तो उसे बासी कहते हैं और जब बारात या किसी अन्य बड़े आयोजन में बचा खाना फिर से परोसा जाता है तो उसे बसिऔरा कहते हैं.....अब समझ गए होंगे आप(नहीं समझे तो......) वर्तमान में इलेक्ट्रोनिक मीडिया की भी हालत कुछ ऐसी ही हो गयी है..पूरी बारात है लेकिन परोसा जा रह है वही बासी भोजन. दूरदर्शन का एक अपना ज़माना था. सधी हुयी भाषा में किसइ सरकारी प्रेस विज्ञप्ति की तरह ख़बरें पढ़ दी जाती थी. धीरे धीरे परिदृश्य बदलने लगा और निजी क्षेत्र में मीडिया का पदार्पण हुआ. बुद्धू बक्सा समझदार होने लगा. अब टीवी पर ऐसी ख़बरें बोलने और दिखने लगी जिनके बारे में कभी सोचा भी नहीं गया था. एदुम से लगा कि इस देश में गरीबों और दलितों का नया मसीहा आ गया. अब सूरत बदल जाएगी. समाज का वंचित वर्ग सबकुछ पा जायेगा. देश में भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी. तानाशाह होते जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह बनेंगे. लोकतांत्रिक आधार वाला देश सांस्कृतिक दृढ़ता और परिपक्व सभ्यता के साथ प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ के और अधिक मजबूत होने का उत्सव मनायेगा. लेकिन अब के हालात कुछ अलग हैं. ख़ास तौर पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने बहुत जल्द ही एक ऐसी स्थिथि में खुद को पहुंचा लिया जिसकी उम्मीद नहीं थी. ख़बरों को हद से अधिक खींचना, बार बार एक ही ख़बर को दिखाना, गंभीर शब्दों से दूरी बनना, सनसनी के लिए तथ्यों के साथ छेड़छाड़, ख़बरों को प्रोफाइल के नज़रिए से देखना. ये सबकुछ मीडिया को बधाई से अधिक आलोचना का पात्र बनता है.
बदलते परिवेश में मीडिया से जुड़े पुरनियों को नयी सोच के साथ सामने आना होगा. समाज की अवधारणा इस देश में बदल रही है. देश राज्य में बदला, राज्य जातियों में. बात शहर से होते हुए मोहल्ले में सिमटी और अब नज़रों के दायरे से ज्यादा कुछ नहीं दिखता. मीडिया भी अगर इसी राह पर चल पड़ेगी तो क्या होगा. ख़बरों के चुनाव में इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी होता है कि वो समाज के बड़े हिस्से से जुड़ी हो. हम सब जब मॉस कॉम की पढ़ाई किया करते थे तो हमें बताया जाता था कि ख़बरों का करीबी बड़े सामाजिक दायरे से वास्ता होना चाहिए. अमेरिका में दस लोग की मौत से अधिक ज़रूरी ख़बर मोहल्ले में एक व्यक्ति के साथ हुयी दुर्घटना है. इससे अधिक जगह मिलनी चाहिए. लेकिन क्या आज मीडिया इस नियम को मानती है. आज भी भारत के गावों में लगभग ६५ फ़ीसदी आबादी रहती है लेकिन न्यूज़ चैनलों के कंटेंट से गाँव गायब हैं. गाँव गीरावं की खबरे कोट पैंट पहने एंकर नहीं बोलते हैं. पिछले साल के बाद इस साल एक बार फिर गावों में पानी कि कमी है. बारिश खूब हुयी लेकिन तब जब धान की रोपाई का वक़्त निकाल चुका था. मजबूरन खेत खाली रह गए. अब दुनिया देख रही है की दिल्ली में बारिश ही रहो है. आईटीओ डूब जा रहा है. यमुना का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है. दिल्ली में बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो गया है लेकिन देश के कई गावों में बरसात के बीच सूखे का दर्द उभर रहा है. इसे मीडिया नहीं दिखाना चाहती. गावों में भूमिगत जलस्तर तेजी से गिर रहा है. कई गावों में पीने योग्य पानी की कमी हो रही है. फसलों के लिए खाद कि कमी है. सड़कें नहीं हैं. इलाज के लिए आज भी लोग शहरों की ओर भागते हैं. पढ़ाई की कोई सुविधा नहीं है. सरकारी योजनाओं का बुरा हाल है. देश का पेट भरने वाला ग्रामीण भूखा सो रहा है. किसान कहे जाने वाले इस जीव की दास्तान टीवी के चौखटे से गाएब है. इसका ज़िम्मेदार कौन है?
देश में हिंदी मीडिया ने तेजी से तरक्की की. शुरुआत में समाज के कई रंग सामने आये. धीरे धीरे सनसनी का रंग हिंदी मीडिया पर चढ़ा और अब तो हिंदी मीडिया को बस अपना ही रंग पता है. मीडिया के शीर्ष पर बैठे लोग सोचते हैं कि वह जो दिखा रहें हैं वही सही है. जो उनका नज़रियअ है वही सबका है. यहीं से बात बिगड़ती है. एक बात और है. मीडिया के साथ- साथ मीडिया पर्सन्स की भी तरक्की हो गयी. कथित आधुनिक होने की सभी योग्यताएं उनमे आ गयीं. अब उनका अपना एक स्तातास हो गया. और जब आँखों पर ऐसा चश्मा चढ़ गया तो देश का किसान, मजदूर सब त्याज्य समझ में आने लगे.नॉएडा और दिल्ली में इलेक्ट्रोनिक न्यूज़ चैनलों में बैठे लोग स्ट्रिंगर से पूछते हैं कि मरने वाला कैसी फॅमिली का था? अगर ठीक ठाक था तो भेज दो वरना ख़बर ड्रॉप. एक गरीब कि मौत को ख़बर बनने का कोई हक नहीं है. जब तक उसे राजनीतिक भूख या सियासी चालों ने ना मारा हो.
जब तक नॉएडा और दिल्ली में बैठे पत्रकार ख़बरों में प्रोफाईल तलाशते रहेंगे तब तक ख़बरों का इस देश के आम आदमी के साथ सरोकार नहीं बन पायेगा. दिल्ली और मुम्बई के बाहर भी भारतीय रहते हैं. इस बात को समझने का वक़्त आ गया है. बासी होती ख़बरों में कुछ नया खोजना होगा. जिसमे सनसनी ना हो बस ख़बर हो.

You the Indian dog

You the Indian dog, मेरे लिए यही संबोधन था उस व्यक्ति का फेसबुक पर कश्मीर पर चर्चा के दौरान. मई हैरान था, जहाँ तक मुझे पता था, ये कहने वाला एक हिन्दुस्तानी( कश्मीरी) था. बात चल रही थी कश्मीर में उछाले जा रहे पत्थरों की तभी एकायक इस विमर्ष में जगह बना ली इस्लाम ने. मैं अकेला था इस बात को कहने वाला कि कश्मीर समस्या का हल पत्थरों से नहीं हो सकता और कई थे इस मत के पोषक की अब तो इस जन्नत को पत्थरों के सहारे ही बचाया जा सकता है...
कश्मीर के हालात पर मुझ जैसे किसी नौसिखिया पत्रकार को कुछ भी लिखने का अधिकार बुद्धजीवियों की और से नहीं दिया गया है लेकिन मै ये दुस्साहस कर रहा हूँ. भारत का कोई भी नागरिक कश्मीर को अपने दिल में रखता है. देश का आम नागरिक जो किसी पार्टी विशेष से सरोकार नहीं रखता हो या कश्मीर के प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना से ग्रसित न हो(रखने को कई लोग तो बिहार के प्रति भी दुर्भावना रखते हैं) वो यही कहेगा की कश्मीर हमारे देश का ताज है. आज आखिर ऐसा क्या हो गया की लगभग एक अरब जनता की भावना पर घाटी के कुछ लाख लोगों के पत्थर भारी पड़ गए.
सन १९४७ में मिली आज़ादी के बाद से ही कश्मीर एक ऐसी समस्या के रूप में हमारे सामने आया है जिसका पूर्ण रूप से हल किसी पार्टी के पास नहीं है या शायद कोई हल निकालना भी नहीं चाहता. स्वतंत्र के बाद राज्यों का विलय हो रहा था. इसकी कमान सरदार पटेल के जिम्मे थी लेकिन कश्मीर को नेहरु अपने हाथ में रखना चाहते थे. लिहाजा पटेल यहाँ कुछ नहीं कर सके. नेहरु ने हरि सिंह से खुद ही बातचीत की. हरि सिंह कश्मीर को आज़ाद करवाना चाह रहे थे. उन्होंने नेहरु की बात नहीं सुनी. इसी बीच पकिस्तान के पख्तून कबीले के लोगों को आगे कर पाकिस्तानी हुक्मरानों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया. हरि सिंह भाग कर नेहरु के पास आये और भारत कि सहायता मांगी. इसी समय नेहरु ने हरि सिंह से कश्मीर के भारत में विलय के इकरारनामे पर दस्तखत करवा लिए. बस यहीं से कश्मीर भारत का हिस्सा हो गया. राजनीतिक रूप से कश्मीर भले ही भारत का अंग हो गया लेकिन भावनात्मक रूप से अभी तक नहीं हो पाया है. कभी पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाने वाले शेख अब्दुल्लाह ने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में अपने लिए समर्थन कि हवा बहा रख थी. उसी का नतीजा था कि कश्मीर में धारा ३७० भी लगवा दी. कश्मीर का अलग संविधान हो गया. देश कि संसद का कोई भी कानून वहां सीधे लागू नहीं हो सकता. शेख अब्दुल्लाह अमर हो गए और लगा कि कश्मीर कि आवाम अब विकास के रथ पर सवार हो जाएगी.
इस दौरान देश में एक पूरी पीढ़ी कश्मीर में इंसान और बंदूकों के रिश्तों को परिभाषित करते प्रौढ़ हो गयी. पीछे मुड़ कर देखा तो कश्मीर में चिनार के पेड़ों से ज्यादा सड़कों पर पत्थर और आवाम में असंतोष नज़र आया. आखिर क्या वजह थी इसकी?
अपने हक की आवाज़ उठाते- उठाते कश्मीर के लोगों को पत्थर उठाने पड़ गए. देश का सबसे युवा मुख्यमंत्री जिस प्रदेश के पास हो वो सूबा एक लाइलाज बिमारी से तड़प रहा है. जबरदस्त असंतोष की भावना ने महज डेढ़ साल पुरानी उमर अब्दुलाह सरकार की आफत बुला दी है. पिछले कुछ दिनों में कश्मीर में हुए सुरक्षा बलों और नागरिकों के बीच संघर्ष में ६० लोग मारे जा चुके हैं. समस्या जस की तस बनी हुयी है. उमर अब्दुलाह दिल्ली के चक्कर लगा रहें हैं. इसी बीच प्रधानमन्त्री के आये एक बयान ने नया पेंच फंसा दिया. मनमोहन सिंह कश्मीर कि स्वायतता की बात का समर्थन कर रहें हैं. लेकिन अगर संविधान विशेषज्ञों की मानी जाये तो कश्मीर पहले से ही स्वायत है. संविधान की धारा ३७० इस बात की दुहाई देती है. इसके अलावा भी कश्मीर को केंद्र की ओर से बहुत कुछ मिलता है. इतना मिलता है जितना देश के किसी राज्य के निवासियों को नहीं मिलता. लेकिन इसके बावजूद कश्मीर में सड़कों पर पत्थर क्यों नज़र आते हैं?
कश्मीर में भले ही भारत सरकार सबसे अधिक आर्थिक योगदान देती है लेकिन वहां के लोगों को इसका फायदा नहीं मिलता. क्योंकि वहां भ्रष्टाचार चरम पर है. केंद्र सरकार की दी धनराशि क्या बेहद कम हिस्सा वहां के नागरिकों को मिलता है. राज्य सरकार के मंत्री इस धनराशि का बड़ा भाग अपने लाभ पर खर्च करते हैं. जो कुछ बच जाता है उससे केंद्र सरकार के नौकरशाह उड़नखटोले में बैठ कर कश्मीर की वादियों की सैर करते हैं, दिल्ली ले जाने के लिए सेव और पश्मीना शाल पैक कराते हैं. इसके साथ ही यह कोशिश करते हैं कि कश्मीर के साथ जुदा 'समस्या' शब्द हटने ना पाए. कश्मीर हमेशा के लिए एक समस्या के तौर पर बना रहे.
अगर वास्तविकता में केंद्र सरकार ये चाहती है कि कश्मीर का मसला हल हो तो उसे इस बात के प्रमाण देने होंगे कि उसके पास इसे लेकर एक ठोस राजनीतिक योजना है. जो सहायता कश्मीर के नागरिकों को दी जा रही है उसका समुचित हिस्सा उन तक पहुँच रहा है. इसके अलावा सरकार को ये भी कोशिश करनी चाहिए कि पडोसी मुल्क की भीख पर पलने वाले कुछ अलगाव वादियों के इशारे पर हाथों में पत्थर उठाये युवा कश्मीर को वहीँ के बुजुर्ग इस काम से रोक ले. वरना ये पत्थर एक दिन इतने अधिक हो जायेंगे जो घाटी की ओर जाने वाले हर रास्ते को बंद कर देंगे और हम इस ओर खड़े होकर सुनेंगे you indian dog.

पाकिस्तान जिंदाबाद



आपको ये शीर्षक कुछ अजीब लग सकता है. आखिर लगे भी क्यों ना, साल में महज दो बार आपको याद आता है कि आज आप स्वतंत्र हैं, आज़ाद मुल्क में रहते हैं और इस आज़ादी को पाने के लिए कुछ लोगों ने कुर्बानी दी थी........१५ अगस्त और २६ जनवरी ना आये तो आप को याद ही ना आये कि आज आप जिस खुली हवा में सांस ले रहें हैं उसके लिए कईयों कि साँसे बंद कर दी गयीं हैं. वैसे आप भी अपना फ़र्ज़ अदा करते हैं इसमें कोई दो राय नहीं.....साल में एक एक बार आने वाली इन दो तारीखों पर आप फिल्मी गीत बजाते हैं....बच्चों का शौक पूरा करने के लिए २ रूपये में तीन रंगों में रंगा हुआ कागज का एक टुकड़ा खरीदते हैं.....कई दिनों बाद अपने कुछ ख़ास रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं, थोड़ी देर आराम करते हैं, शाम को किसी बड़े से मॉल में शॉपिंग करते हैं, बाहर खाना खाते हैं और घर आकर सो जाते हैं. अब भला इससे बेहतर दिनचर्या क्या हो सकती है? अब ऐसे में कोई आपको याद दिलाये कि आज पंद्रह अगस्त है तो आप उसपर नाराज़ तो होंगे ही. अब वो आपका सामान्य ज्ञान जांच रहा है...ऐसे हालात फिलवक्त हर युवा भारतीय के हैं...उन्हें पूरे साल याद नहीं रहता कि वो एक ऐसे मुल्क में रहते हैं जिसने बाद मिन्नतों के आज़ादी पाई वो भी ऐसी जो उन्हें कुछ भी करने कि छूट देती है...हुज़ूर इस आज़ादी को तो हम सीने से लगा कर रखते हैं....लेकिन बस साल में एक दो दिन....वैसे आप को लगता है की आज हमारे देश का युवा कहीं से भी देश के साथ जुदा हुआ है...मैं अपनी बात नहीं कहूँगा वरना आप कहेंगे कि मैं अपनी बात थोप रहा हूँ.... लेकिन साल भर 'पे पैकज' और इलेक्ट्रोनिक गजेट पर समय देना वाला युवा आज़ादी मुल्क कि खुली हवा में फैली एक अजीब सी कशिश का एहसास नहीं कर पा रहा है....आज हम सब अपना अपना सपना बुनते हैं और उसे पूरा करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं लेकिन 'freedom at midnight' को अपनी आँखों से देखने वाली पीढी के सपने पूरे हुए या नहीं इसकी फिक्र कौन करता है....
फेसबुक पर उधार का चेहरा ओढ़े और ट्विट्टर पर ट्विटीयाती पीढी के लिए आज़ादी के मायने बदल चुके हैं...... आज आज़ादी का मतलब नितांत व्यक्तिगत हो चला है....खुद का घर हर सुख सुविधा से संपन्न हो यही है हमारी आज़ाद खयाली ...
भारत जैसे देश के लिए आज़ादी सही अर्थों में क्या है इसका भान हमें तभी होता है जब इंडियन क्रिकेट टीम पाकिस्तान के साथ मैच खेलती है या फिर पाक से लगी हमारी सरहद पर तनाव बढ़ जाता है...तब हमें एहसास होता कि हम आज़ाद हैं और कोई हमारी आजादी पर खतरा बन रहा है...तब कहीं जाकर हमारी आँखों के सामने से वो मंजर गुजरते हैं जो हमें याद दिलाते हैं कि ज़मी के इस टुकड़े के साथ कितने जज़्बात अपनी हिस्सेदारी रखते हैं...क्या होती है वो सौगात जिसे हम आजादी कहते हैं....हमें शुक्रिया करना चाहिए इस पाकिस्तान का जो रह रह कर हमें १५ अगस्त और २६ जनवरी के अलावा भी आज़ाद होने का मतलब बताता तो फिर क्यों ना बोले हम पाकिस्तान जिंदाबाद....

गुरु, ई मीडिया वाले त.......

गुरु ई मीडिया वाले त पगला गैयल हववन....धोनिया के बिआयेह का समाचार कल रतिए से पेलले हववन और सबेरे तक वही दिखावत हववन...जब तक एकरे एक दू ठे बच्चा ना पैदा हो जैईहें लगत हव तब तक दिखवाते रहियें....इनकी माँ कि ...........
यह वो सहज प्रतिक्रिया थी जो मुझे अपने शहर बनारस में एक चाय की दुकान पर चुस्कियों के बीच सुनायी दी थी..यकीन जानिए मैंने बिल्कुल भी इस बात का खुलासा वहां नहीं किया था कि मैं भी इसी खेत में पिछले पांच सालों से 'उखाड़' रहा हूँ.....अगर मेरे मुहं से ये तथ्य गलती से भी निकल कर बाहर आ गया होता तो आप समझ सकते हैं कि मेरी बारे में वहां क्या क्या कहा जाता? वैसे एक बात जगजाहिर है कि बनारसी पैदा होते ही बुद्धजीवियों की कोटि में आ खड़े होते हैं....नुक्कड़ की चाय और पान की दुकाने इन बुद्धजीवियों के पाए जाने का केंद्र होती हैं और अगर आप उस दुकान के इर्द गिर्द बहने वाली हवा के विपरीत जाते हैं तो आप से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं होगा....हाँ अगर आपको अपनी बात कहने का बहुत शौक है तो बनारसी अंदाज़ में कहिये, शायद कोई सुन भी ले..वरना पढ़े लिखे लोगों की तरह तथ्यात्मक ज्ञान देने लेगे तो आप लौंडों में शुमार हो जायेंगे..खैर, हाथ में पुरवा, पुरवे में चाय और चाय में रोजी रोटी देने वाले काम को लेकर की गयी प्रतिक्रिया सुनने के बाद उठा तूफ़ान, कुल मिलाकर मामला गंभीर था....लिहाजा निकल लेने में ही भलाई थी....
वैसे जो कुछ भी चाय कि दुकान पर कहा गया उसमे कुछ ज्यादा गलत नहीं था....मीडिया को लेकर आम आदमी यही राय रखता है.....इस देश में जहाँ उत्तर भारत के किसान मानसून की बेरुखी से धान की रुपाई को लेकर चिंतित हैं वहीँ मीडिया वाले मुम्बई में होने वाली बारिश को ही फोकस किये हुए हैं मानो देश में बारिश तो बस मुम्बई में ही होती है....
यकीनन धोनी इस देश में धर्मं की तरह माने जाने वाले खेल क्रिकेट में एक बड़ा नाम है पर आम इंसान से बड़ा नहीं हो सकता ....मीडिया ने धोनी जैसे कई लोगों को को अपने ग्लैमर को ध्यान में रखकर बेहद उच्च कोटि का बना दिया है वो भी उनके सामजिक योगदान के बारे में विमर्ष किये बगैर......अक्सर मीडिया के हाथों में ऐसी ख़बरें होती हैं जो देश कि तकदीर से जुड़ी होती हैं पर उनकी तस्वीर अच्छी नहीं लगती लिहाजा उनकी न्यूज़ वैल्यू कम करके आंकी जाती है.....ख़ास तौर पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने जब से ख़बरों का प्रोफाइल देखना शुरू किया तब से ऐसे हालात सामने आते हैं... मीडिया में कंटेंट डिसाईड करने वालों से आखिर यह कौन पूछेगा कि किस आधार पर कंटेंट तय करते हैं? अब धोनी कि शादी होनी थी सो हुयी लेकिन बिन बुलाये बाराती कि तरह यूं नाचना क्या मीडिया को शोभा देता है ? आखिर कोई गंभीरता भी है या नहीं...ना जाने क्यों मीडिया पूरे देश को एक निगाह से नहीं देख पा रही है....तमाम बड़ी समस्याओं को दरकिनार कर कुछ ख़ास स्थानों और वर्ग की ही ख़बरें दिखाई जाती हैं....या पूरे दिन की ख़बरों में ऐसी ख़बरों का कंटेंट अधिक होता है......आम आदमी महंगाई से मर रहा है...पीने का पानी, बिजली, सड़क जैसी मूलभूत समस्याएँ हैं पर मीडिया मुम्बई की बारिश में नालों का पानी नाप रही है और धोनी कि शादी में प्लेट्स गिन रही है ....अब ऐसे में बनारसियों का गुस्सा फूटे ना तो क्यों? वैसे चाय कि दुकान पर मीडिया के लिए इतने ही आशीर्वचन नहीं कहे गए थे..और भी बहुत कुछ था...वह आपको यहाँ लिख कर नहीं बता सकता...जानना हो तो एक बार चले आईये बनारस ...
हर हर महादेव............