कैसी रही चाय साहब?

>> धमाके के वक़्त पुलिस के बड़े अफसर के घर चल रहा था जश्न.

यह सवाल आपको कुछ अटपटा सा ज़रूर लग सकता है लेकिन सवाल जायज है. दरअसल ये सवाल इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मंगलवार 6 दिसम्बर को जिस वक़्त वाराणसी के शीतला घाट पर बम धमाका हुआ ठीक उसी समय जिले के आला अफसर चाय पार्टी में व्यस्त थे. आप को हैरानी होगी ये जानकार कि ये चाय पार्टी दी किस ख़ुशी में गयी थी. दरअसल 6 दिसम्बर की बरसी शहर में शांतिपूर्वक बीत गयी इसका जश्न मनाया जा रहा था. शहर पुलिस महकमे के सबसे बड़े अफसर के बंगले पर इस पार्टी का आयजन किया गया था. बाकायदा पत्रकारों को फ़ोन करके इस पार्टी में बुलाया गया था. खुद एसपी सिटी ने मेरे एक पत्रकार मित्र को फ़ोन किया और चाय पार्टी का निमंत्रण दिया. कारण बताया कि 6 दिसम्बर की बरसी शांति पूर्वक बीत गयी इसलिए जश्न मानेगे. कोशिश थी कि अपनी पीठ खुद ठोक ली जाये. यानी साफ़ है कि 6 दिसम्बर बीत जाने के बाद सभी अधिकारिओं ने मान लिया था कि अब कुछ नहीं होने वाला है. इसी लापरवाही का फायदा उठा लिया इंडियन मुजाहिदीन ने.
सूत्रों की हवाले से ख़बर है कि लास्ट के एक दिन पहले तीन संदिग्ध लोग इस इलाके में देखे गए थे. इसके बावजूद पुलिस और खुफिया विभाग ने कोई विशेष सतर्कता नहीं बरती. तुर्रा यह कि पुलिस ने कहा कि हम लोगों ने इलाके की सघन तलाशी ली थी अब आप ही सोच ले कि पुलिस की ये सघन तलाशी कितनी विरल थी. ऐसा नहीं है कि इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने हाथ घुमाया होगा और बम शीतला घाट पर रखे कूड़ेदान में पहुँच गया होगा. इसके लिए बाकायदा रेकी हुयी होगी. कहीं स्थानीय ठिकाना बनाया होगा. कुछ दिनों तक हर चीज़ पर नज़र रखी होगी. तब जाकर पूरी घटना को अंजाम दिया होगा. यही नहीं 6 दिसम्बर को अगर पुलिस इतनी सतर्क थी तो भला आतंकवादी शहर में कैसे टिके रह गए? साफ़ है कि खुफिया तंत्र यहाँ नाकाम साबित हुआ.



अद्भुत और अलौकिक





वो दृश्य अद्भुत और अलौकिक होता है उसकी कल्पना मात्र भी आप को रोमांचित कर देती है. वाराणसी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाना वाला उत्सव देव दीपावली देश के भयातम आयोजनों में से एक है. जाह्नवी के तट पर बसे काशी में घाटो पर असंख्य दीये एक साथ जल उठते हैं. देवताओं के लिए मनाई जा रही ये देव्पावाली देश का एकमात्र ऐसा धार्मिक आयोजन है जिसमे देश प्रेम की भावना दिखती है. इस दिन कार्यक्रम की शुरुआत अमर शहीदों को नमन करने के बाद होती है. इसी आयोजन की कुछ तस्वीरें आपके लिए...

how long will it survive?



its a story that i covered in varanasi. it tell us the dangerous results of throwing soil that has been collected in flood at riverbank of ganga ghats, again in ganga. river scientists telling this continue process will change the flow of ganga in varanasi. this change of flow in ganga will dangerous for many ghats like panchganga, scindhiya and some others. these ghats may be in ganga in few years. the one of most important thing is that all this cleaning process is done by local andimistration.

अब तो गरियाने से भी नहीं फरियाता

मीडिया के बढ़ते कदमो ने कई बदलाव लायें हैं. लेकिन कुछ बदलाव तो ऐसे हैं जिनके बारे में आमतौर पर सोचा नहीं जा सकता है. अब गालियों को ही ले लीजिये. गालियों में कितना कुछ बदल गया है. नयी नयी तरह की गालियाँ आ गयी हैं. जिन्हें सुनकर आप अपने को आनंदित महसूस करते हैं. गालियों के साथ सबसे बड़ी खासियत ये है कि किसको कौन सी गाली कब लग जाएगी, यह आप पहले से नहीं तय कर सकते. कोई साले से ही बिदक जाता है और कोई माँ बहन करने पर भी नहीं संभलता. ये गाली की माया है. देश के जाने- माने सहित्यकार काशीनाथ सिंह ने इन गालियों को अपनी किताब में भी बेधड़क प्रयोग किया है. किताब के पन्नों पर आने के बाद इन गालियों ने ऐसा चोला बदला कि सामाजिक परिवेश इनके बिना अधूरा लगेगा. ये है गालियों की विशेषता. लेकिन आजकल यही गालियाँ अपने मौलिक स्वरुप को बचाने के लिए गुहार लगा रहीं हैं. वह चाह रहीं हैं कि लोग इन गालियों का सही उच्चारण शुरू करे ताकि इनका आस्तित्व बना रहे.
गालियों के स्वरुप में परिवर्तन का एहसास तब से हुआ जब से छोटे पर्दे पर लाफ्टर शो शरू हुए. गंभीर अर्थो वाली गालियों के साथ प्रयोग शुरू हुए और गालियाँ बिगड़ गयीं. अब तेरी माँ की ...... कि जगह ले ली तेरी माँ का साकी नाका ने. अब भला यह कौन सी गाली हुयी. ना कोई पंच ना कोई कोई ह्यूमर. इस गाली को सुनने के बाद सुनने वाले के मन में कोई भाव आ ही नहीं सकता. इसी गाली को कुछ लोग कहते हैं तेरी माँ की आंख. अब भला आप ही बताइए कि इस तरह की गाली देने का क्या मतलब हुआ. भईया जो गाली, गाली की तरह लगे वो दो ना. छोटा पर्दा एक बड़ी चीज़ संभालता है जिसका नाम है राखी सावंत. ये देवी इन्साफ करती हैं. इन्साफ कम हल्ला ज्यादा करती हैं. इनके शो पर जो लोग आतें हैं उनके बीच गाली- गलौज सौ फ़ीसदी तय होता है. कुछ कमी होती है तो स्वयं राखी सावंत उसे पूरा करती हैं. लेकिन राखी भी जो गालियां देती हैं वो दमदार नहीं होती. उनमे हल्का पन होता है. इस बात का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि राखी को आज तक किसी ने भी मारा नहीं है. अब ऐसी गाली का क्या हासिल जिसको देने के बाद मारपीट ना हो. कौन समझाए इन टी वी वालों को.
बड़े पर्दे वाले भी कम नहीं हैं. इनकी भी फट जाती है गाली को सही तरीके से उसके मूल रूप में दिखाने सुनाने में. ठीक से गाली भी नहीं दे पाते. अगर दिया भी तो वहां बीप- बीप करने लगते हैं. अब भला इसका क्या मतलब हुआ. जनता ने पैसा दिया है गाली सुनने का, सुनाओ. लगते हैं बीप बीप सुनाने.
गालियाँ किसी वाक्य को बेहद आत्मीय बनाती हैं. दो लोग जो हमेशा गाली से अपनी बातों की शुरुआत करते हैं उनमे अपनापन होता है. लेकिन आजकल जिस तरीके से गाली का बंटाधार हुआ है उस ने तो गालियों की पूरी परिभाषा ही बदल दी. उनका मन्तव ही बदल गया. गंभीरता नाम की तो चीज़ ही इन गालियों में नहीं रह गयी.
दुनिया का सबसे पुराना जीवंत शहर बनारस तक गालियों की क्राइसिस से जूझ रहा है. कभी गालियों का पूरा कवि सम्मेलन कराने वाला बनारस नयी गालियाँ तलाश रहा है. क्योंकि पुरानी गालियों का रूप बदल गया है और उनकी मारक क्षमता भी कम हो गयी है. पहले जिस गाली को देने की लिए मुंह बनाने भर से अगला पिनक जाता था अब चार बार पूरी गाली बक दीजिये कोई असर नहीं पड़ने वाला. क्या करेंगे अब जब राखी सावंत ही गाली देने लगेंगी तो किसी के ऊपर क्या ख़ाक असर पड़ेगा. गालियाँ बदल गयीं हैं और इनको बोलने वाले लोग भी बदल गएँ हैं. लेकिन इसके कारण सबसे बड़ा नुकसान जो हुआ है वो उन लोगों का हुआ है जो इन गालियों को शिद्दत से जीते थे. उन लोगों का हुआ है जिनके कई काम इन्ही गालियों ने करवा दिए थे. या तो उन्होंने गाली खा कर यह काम किये या फिर गाली देकर लेकिन अफ़सोस कि अब गरियाते हैं तो भी फरियाता नहीं है.

हे आज तक ये 'धर्म' है 'वारदात' नहीं...

धनतेरस के दिन दोपहर में आज तक ने ' धर्मं ' कार्यक्रम में वाराणसी में माँ अन्नपूर्णा मंदिर से जुड़ी एक ख़बर दिखाई. बिल्कुल इण्डिया टीवी वाले तरीके से. ख़बर में दिखाया जा रहा था कि वाराणसी में स्थित माँ अन्नपूर्णा का मंदिर एक ऐसा मंदिर है जो वर्ष में सिर्फ एक दिन धनतेरस के दिन खुलता है. ये तथ्य पूरी तरह गलत है. माँ अन्नपुर्णा का मंदिर तो हर रोज़ खुलता है. ख़ास बात ये है कि धनतेरस वाले दिन माँ अन्नपूर्णा की स्वर्णमयी प्रतिमा के दर्शन होते हैं. यह वर्ष में सिर्फ एक दिन धनतेरस के दिन ही होता है. माँ अन्नपुर्णा की स्वर्ण प्रतिमा बेहद भव्य और आकर्षक है. इसीलिए इस दिन माँ के दरबार में भक्तों का सैलाब उमड़ता है. यही नहीं इस दिन माँ का खजाना भी भक्तों के बीच बांटा जाता है. इसके तहत माँ को दान में मिले धन को भक्तों के बीच में वितरित किया जाता है. इस धन को लेने के लिए माँ के दरबार में जबरदस्त भीड़ उमड़ती है. ऐसा नहीं है कि धन कोई बहुत अधिक होता है. फुटकर पैसे होते हैं जिन्हें भक्तों के बीच उछाला जाता है. मान्यता है कि जिसके पास माँ का ये खजाना होता है वो हमेशा धन धान्य से परिपूर्ण होता है. माँ के मंदिर के प्रथम तल पर जो मूर्ति होती है वो अद्भुत आभा वाली होती है. इस मूर्ति के दर्शन धनतेरस के दिन ही होते हैं. इसी मूर्ति के दर्शन को लोग बड़ी संख्या में आते हैं.
लगे हाथ आपको ये भी बता देता हूँ कि माँ अन्नपुर्णा का दर्शन इतना महत्वपूर्ण क्यों है. दरअसल माँ अन्नपुर्णा स्वयं आदि शक्ति माँ पार्वती हैं. विवाह के बाद जब बाबा भोले नाथ पार्वती को लेकर कैलाश पर लेकर लौटे तो माँ ने शिव से कहा कि स्वामी आप तो मुझे मेरे मायके में ही वापस लेते आये. गौरतलब है कि माँ पार्वती हिमालय के पुत्री थी. इस तरह से हिमालय पर स्थित कैलाश पर्वत उनका मायका हुआ. माँ पार्वती की ये बात सुनने के बाद भगवान शिव ने अपने त्रिशूल पर काशी का निर्माण किया और माँ के साथ वहां स्वयं निवास किया. काशी पहुँचने के बाद माँ ने भोले नाथ से पूछा कि आप यहाँ क्या करेंगे? इसपर भगवान् शिव ने कहा कि मै यहाँ प्राणियों को मोक्ष प्रदान करूंगा. इसपर माँ पार्वती ने कहा कि यदि आप मोक्ष देंगे तो मैं सबको अन्न दूँगी. तभी से माँ का नाम अन्नपुर्णा भी हो गया. इसके बाद चूँकि काशी में शिव के सभी गण भी विराजते हैं, उनके भोजन का पूरा प्रबंध माँ अन्नपूर्णा के जिम्मे है. स्वयं भगवान शिव माँ के सामने याचक के रूप में खड़े रहते हैं. माँ का आशीर्वाद है कि काशी में कोई भी भूखा नहीं सोयेगा.
माँ अन्नपुर्णा के मंदिर भगवान् श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के लगभग सामने ही स्थित है. भगवान् श्री काशी विश्वनाथ के दर्शन करने को आने वाले श्रद्धालु माँ के दर्शन भी ज़रूर करते हैं. अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि आजतक जैसे चैनल ने इस तरह कि भ्रामक ख़बर क्यों दिखाई. वैसे इस सवाल का जवाब तो आजतक चैनल में जिम्मेदार पद पर बैठे लोग ही अच्छे से दे सकते हैं लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है कि इसमें वाराणसी के स्ट्रिंगर ने अपना पैसा बनाने के ख़बर को गलत तरीके से बताया. लेकिन फिर भी दिल्ली में बैठे लोगों को ख़बरों की सत्यता को अपने स्तर से जांच लेना चाहिए था. स्ट्रिंगर तो अपनी दिहाड़ी बना ही लेगा. लेकिन नाम तो चैनल का खराब होगा. इसके अल्वावा आम जनता में एक जिम्मेदार चैनल कि तरह पहचान बना चुका आजतक अपनी प्रतिष्ठा खो देगा. आजतक ने वाराणसी से ये कोई पहली फर्जी ख़बर नहीं चलायी है. इसके पहले भी आजतक वाराणसी में एयर इण्डिया की एक उड़ान कि फर्जी आपात लैंडिंग करा चुका है जिसमे उसने गूगल से एक विडियो निकाल कर उसे एयर इण्डिया का हवाई जहाज बता कर चला दिया था. आजतक जैसे चैनल से इस तरह की उम्मीद नहीं कि जा सकती है. टीआरपी की दौड़ में इण्डिया टीवी ने एक बार दो नंबर पर क्या किया लगे ऊलजलूल चलाने.
आजतक चैनल में जिम्मेदार पद संभाल रहें लोगों को समझना चाहिए कि उन्होंने एक संचार माध्यम के ज़रिये एक बड़े वर्ग को गलत जानकारी दी है. स्ट्रिंगर की दिहाड़ी सत्यता से बढ़कर होने लगे तो ऐसे चैनलों को बंद होते देर नहीं लगती. माँ अन्नपुर्णा आजतक में काम करने वाले लोगों को सुखी रखे.

देश का भविष्य बोस कि कुर्बानी तय करेगी, गिलानी नहीं

विरोध प्रदर्शन की यह तस्वीर है बनारस की. यहाँ बच्चों ने अरुंधती रॉय के उस बयान की खिलाफत की है जिसमे उन्होंने कहा था कि कश्मीर कभी भारत का हिस्सा रहा ही नहीं. देश में अलगाववाद का समर्थन करने वाली अरुंधती के इस बयान का विरोध करते वक़्त विशाल भारत संस्थान के इन बच्चों ने सुभाष चन्द्र बोस की पोशाक पहन रखी थी. इन बच्चों की कोशिश है कि अरुंधती बौद्धिकता के नाम पर वर्तमान के प्रति जो नजरिया रख रहीं हैं उसमे भारत के इतिहास को भी शामिल करें. क्योंकि इस देश के लिए सुभाष चन्द्र बोस. आज़ाद और बिस्मिल ने कुर्बानी दी है. किसी गिलानी ने नहीं. लिहाजा देश का भविष्य यह कुर्बानियां तय करेंगी, बंटवारे की राजनीती करने वाला गिलानी नहीं.

जूते भी ईमानदार हो गए...

दिल्ली में गिलानी की सभा में किसी ने उनपर जूता फेंक दिया. ये जूता उनको लगा नहीं. अब इसे क्या कहेगे आप? इससे पहले भी कई लोगों को निशाना बना कर जूते फेंके जा चुके हैं. कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी नीरिह जूते का निशाना बनाने की कोशिश की गयी थी पर ना जाने क्या हुआ. जूता बिकुल करीब जाकर भी नहीं लगा. यह भी नहीं कह सकते कि जूते के जरिये अपनी भावना को व्यक्त करने वाला नया खिलाडी था. भैया वो तो कश्मीर पुलिस का निलंबित अधिकारी था. और इस देश में पुलिस अधिकारियों को जूते मारने की तो बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है. यकीन ना हो तो देश के किसी भी पुलिस स्टेशन में जाइये और देख लीजिये. किस तरह एक आम आदमी जूते खाता है. वैसे ये काम आप अपने रिस्क पर कीजियेगा हुज़ूर. वहां कहीं एक-आध जूते आपको भी लग गए तो मुझे दोष ना दीजियेगा. लेकिन कलयुगी यक्ष का प्रश्न का आज भी जस का तस है कि जूता अपने मुख्य मार्ग से भटका क्यों? जूता नीतीश कुमार की सभा में भी चला था लेकिन हैरानी की बात यह कि ये भी नीतीश को लगा नहीं. मोदी को भी निशाना बनाने की कोशिश की गयी लेकिन सफलता नहीं मिली. क्या हो रहा है इस देश में? इस देश का आम नागरिक इस कदर अपने लक्ष्य से भटक चुका है. एक जूता तक वो निशाने पर नहीं मार सकता. कुछ तो गड़बड़ है. ये राष्ट्रीय चिंतन का विषय है. वैसे जूते तो बुश और ओबामा की सभाओं में भी चले हैं लेकिन वो भी भारतीय जूतों की ही तरह निशाने से चूक गए. ज़रूर कहीं कुछ तो है. अब भला अमेरिकन्स पर भी जूते नहीं पड़ रहें हैं तो कुछ गलत है. वरना भारतीयों का निशाना चूक जाना तो समझ में आता है. अमेरिकन्स कैसे निशाना चूक सकते हैं. यानी अब ये मुद्दा राष्ट्रीय ना रहकर अंतर्राष्ट्रीय भी हो गया है.
इस पूरा मसले को अलग नज़रिए से देखा जाये तो पूरी साजिश जूतों की लगती है. इंसानों वो भी खासकर राजनेताओं पर जब- जब इन्हें फेंका गया इन जूतों ने उनतक पहुँचने से पहले ही अपना रास्ता बदल दिया. साफ़ है कि इस ग्लोबल विचारधारा वाले समाज में सभी जूते भी एक जैसी सोच रखने लगे हैं. सफ़ेद पोशों ने इन जूतों को अपना बना लिया है. कुछ खिला- पिला कर अपने गोल में शामिल कर लिया है. ऐसे भी हमने ना जाने कितने नेताओं को जूतों की माला पहनाई है. लगता है, जूतों को इतने करीब से महसूस करने का फ़ायदा इन नेताओं ने खूब उठाया है. गले में लटके जूते से वार्ता की और उन्हें पटा लिया.
ये नेता खुद तो ईमानदार नहीं हो पाए लेकिन इन जूतों को ईमानदार बना दिया. जूतों को उनकी गरिमा के बारे में बता दिया. उनके कान में बता दिया है कि अगर यूं ही हम लोगों पर पड़ते रहे तो तुम्हारी इज्ज़त का फालूदा बन जायेगा. सच भी है भैया अब पुरानी कहावत है कि कीचड में पत्थर फेंकोगे तो छींटे तुम्हारे ऊपर ही आयेंगे. जूतों को भी लगा की नेताओं से दोस्ती में ही भलाई है. और इस तरह से ईमानदारी का तमगा भी लग जायेगा. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जूतों ने ये निर्णय लिया और सभी प्रकार के जूतों के लिए इसे मान्य किया गया. कंपनी चाहें जो भी हो नियम तो नियम होता है. सभी को मानना ही पड़ेगा. चूँकि भारत में इधर बीच इन जूतों को फेंकने की घटनाएँ कुछ ज्यादा ही हो रहीं हैं इसलिए यहाँ नियम कुछ सख्त हैं. जूते इन नियमो को पूरी तरह से मानते है.
लेकिन इसके साथ ही राज़ की एक बात और बताता हूँ. जूतों ने सिर पर न पड़ने का निर्णय सिर्फ नेताओं और माननीयों के लिए लिया है. आम आदमी इसमें शामिल नहीं है. इसलिए इस मुगालते में न रहें की अब आपका सिर सुरक्षित है. अगर आपने अपने को निरीह प्राणी ना समझ कर अपने दायरों से बाहर निकलने की कोशिश की तो ये जूते आपको आपकी औकात याद दिला देंगे. फिर इसमें इस बात का डर भी नहीं है कि कीचड़ के छींटे उन पर जायेंगे. आम आदमी के ऊपर पड़ने में जूतों को एक प्रकार की आत्मिक शांति भी मिलती है और इस बात का संतोष भी होता है कि एक पुरानी परंपरा का निर्वहन हो रहा है. जूते और नेताओं का साथ अब जन्म जन्म का हो गया है. इसलिए उनपर जूते फेंकने का कोई फायेदा नहीं होने वाला है. और हाँ आपके लिए एक सलाह है, बिल्कुल मुफ्त. वह ये कि यदि आप एक आम नागरिक हैं तो चुप- चाप अपने पैरों को जूतों में रखिये. अगर इनसे बाहर निकालने की कोशिश की तो ये जूते कब आपके सिर तक पहुँच जायेंगे आप को पता भी नहीं चलेगा.

एक स्पर्श रचता है मुझे

गूंथ गयी है वह जमीन मेरी आत्मा में
सालती है मेरे उतप्त प्राण
रचती है मेरी मेधा के त्रसरेणु
जगाती है विस्मृत हो चुके कूपों में
एक त्वरा , एक त्विषा

कोंचती है अपने इतिहास का बल्लम
मेरे शरीर में, पीड़ा की शिराओं के अंत तक
तोड़ देती है अपने हठ की कटार
अस्थियों की गहराई में
धीमे से दबा देती है अपने बीज
मेरे उदर की की तहों में

सींचती है वह नदी मेरे स्वप्न
बुनती है मुझे धीमे से
मद्धम स्वरों में पिरो कर
वो वीथियाँ,
जोतती है मेरी बंजर चेतना
घुस कर मेरे स्वप्न तंतुओं में
छेड़ती है एक राग
बहुत महीन, बहुत गाढ़

धंस गयी है वह सुबह मेरी नींदों में
धोती है जो मुझे मंदिरों के द्वार तक
झांकती है मेरे अंधेरों में
कुरेद कर जगाती है मेरे सोये हुए प्रश्नों को
पवित्र करती है मुझे मेरे आखिरी बिंदु तक

एक स्पर्श रचता है मुझे
गढ़ता है अपने चाक पर, अपनी परिभाषा में,
पकाता है अलाव में धीमी आंच पर
गलाता है मुझे अपने अवसादों तक

टेरती हैं मीनारों से लटकी आजानें
मेरे दोष बोध को
सीढ़ियों पर बैठा जो खोजता है
अपने उद्धार के मंत्र, अपनी मुक्ति का तंत्र

कन्धों पर लाद कर लाया हूँ उत्कंठा के स्तूप
समा गयी है सारी दिशाएं मेरे संकल्प में
पच गयी है सारी धारणाएं उसी जमीन में
जहाँ से उगता हूँ मैं

-
दीपांकर

शुक्र मनाओ तुम भारत में हो..

भारतीय समाज में बुद्धजीवी का दर्जा पा चुकी अरुंधती रॉय ने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है. गिलानी दिल्ली में सेमिनार में कह रहें है कि उन्हें आज़ादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए. गिलानी अगर ऐसी बात कहें तो कोई हैरानी नहीं होती लेकिन अरुंधती ऐसा कहें तो आश्चर्य होता है. हालांकि इसके पहले भी अरुंधती रॉय एक ऐसा ही बयान दे चुकी हैं. तब उन्होंने मावोवाद का समर्थन किया था. कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा ना मानने सम्बन्धी बयान वहां पर अपनी जान कि बाज़ी लगा रहे जवानों के लिए एक तमाचा है. साथ ही शेष देश के लोगों के लिए क्षोभ और शर्मिंदगी की वजह है.
चौंदहवी सदी में कश्मीर में इस्लाम के प्रवेश के बाद से लेकर आज तक कश्मीर हमेशा ही अपनी शांति के लिए जलता रहा है. सन १८४६ में कश्मीर में सिखों और अंग्रेजो के बीच संघर्ष हुआ. मुद्दा कश्मीर पर अंग्रेजों के अधिकार से जुड़ा था. बाद में अंग्रेजों ने ७५ लाख रुपये में राजा गुलाब सिंह को कश्मीर दे दिया. समय बीतता गया और सन १९२५ में गुलाब सिंह की ही पीढ़ी हरी सिंह को राजा बनाया गया. इसी समय एक बार फिर से घाटी में मुस्लिम सियासत शुरू हुयी. १९४७ में राजा हरी सिंह और भारत सरकार के बीच कश्मीर के विलय को लेकर बातचीत चल ही रही थी कि पाकिस्तान के पख्तून काबिले के लोगों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया. हरी सिंह कश्मीर की रक्षा कर पाने में असहाय थे. भारत की सेना ने कश्मीर का वजूद बचाया. इसके साथ ही कश्मीर और भारत एक हो गए. १९७५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और शेख अब्दुला के बीच हुए समझौते के बाद कश्मीर और भारत पूरी तरह से एक हो गए. लेकिन फिर भी ये कहना कि भारत और कश्मीर अलग अलग हैं, अजीब लगता है. तर्क दिया जा सकता है कि ये राजनीतिक दृष्टिकोण है.
१८ महीने पहले कश्मीर की आवाम ने भारतीय लोकतंत्र में अपना विश्वास जताया और बैलेट के जरिये अपना नेता चुना. हो सकता है कि उनका अपना नेता उनकी आशयों पर खरा ना उतरा हो लेकिन इसके बाद भी रास्ता बंद नहीं होता. बैलेट से फैसला लेने वाली जनता के हाथों में अचानक पत्थर कहाँ से आ गए. क्या डल झील से निकले? कौन नहीं जानता कि ये पत्थर पड़ोसी के नाम पर कलंक हो चुके पाकिस्तान से आये हैं. पत्थरों के कारोबार करने वाले कश्मीर की तरक्की से जल रहें हैं. कश्मीर में मंजिलों तक पहुँचने वाली सड़के बन रहीं हैं. रेल चल रही है. उम्मीदों के आसमान में गोते लगाने वाले हवाई जहाज उड़ रहें हैं. ईर्ष्या से जलता पड़ोसी हर कोशिश कर रहा है कि कश्मीर को तरक्की के रास्ते से हटा कर एक बार फिर से आतंकवाद की आग में झोंका जाये. लें वह कामयाब नहीं हो पा रहा. कश्मीर की जनता कभी नहीं चाहती कि वहां इन आताताईयों का राज हो. लेकिन कमजोर राजनीतिक नेतृत्व का फ़ायदा उठा कर अलगाववादी अपनी रोटी सेंक रहें हैं और जनता को उकसा रहें हैं.
आज देश में जितना अनुदान कश्मीर को जाता है उतना किसी और प्रदेश को नहीं मिलता. वर्ष २००९- १० में कश्मीर को विकास योजनाओं के लिए १३, २५२ करोड़ रूपये दिए गए. जबकि आठ पूर्वोत्तर राज्यों को कुल मिलाकर २९, ०८४ करोड़ रूपये दिए गए. साफ़ है कि कश्मीर के लिए केंद्र सरकार की ओर से भरपूर धनराशि दी जाती है. लेकिन फिर भी लोगों में असंतोष क्यों फैलता है? ये एक सहज प्रश्न किया जा सकता है.
दरअसल कश्मीर की समस्या पूर्णतया भारतीय राजनीति में आई गिरावट का नतीजा है. कश्मीर भ्रष्टाचार के मामले में काफी आगे है. यहाँ पैसे की बन्दर बाँट हो जाती है. ये सिलसिला पुराना है. यही कारण है कि कश्मीर को आज जिस स्तिथी में होना चाहिए था वो वहां नहीं है. लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि कश्मीर को अलग मुल्क बना दिया जाये.
वैसे इस बात कि गारेंटी देने वाला भी कोई नहीं है कि आज़ाद कश्मीर अफगानिस्तान नहीं बनेगा. चाहे महबूबा मुफ्ती हो या फिर गिलानी साहब. और हाँ अरुंधती जी जैसे लोगों को समझना चाहिए कि ये उनका सौभाग्य है क वो भारत में रहती है. इसलिए जो मन में बोल सकते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई तिरंगे में से केसरिया रंग चुरा लेगा और मुल्क चुप रहेगा....

भागती छिपकली और दो अक्टूबर



आज गाँधी जयंती है. लाबहादुर शास्त्री का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था. ये इस देश का सौभाग्य है की यहाँ ऐसे महान सपूत पैदा हुए. इन्होने अपने कार्यों से न सिर्फ भारत में बल्कि संपूर्ण विश्व को राह दिखाई. लेकिन अफ़सोस इस बात का है की भारत देश ने इन सपूतों के आदर्शों को व्यवहार में लाना बंद कर दिया है. स्वतंत्रता के साथ वर्ष बीत चुके हैं. गाँधी और शास्त्री अब महज किताबों में सिमट कर रह गए हैं. क्लास वन से लेकर क्लास टेन तक हम गाँधी और शास्त्री के बारे में पढ़ते हैं. इसके बाद धीरे-धीरे कोर्स में इनका हिस्सा कम होने लगता है. जब बात इन दोनों के आदर्शों को जीवन में उतारने की आती है तब तक हम लोग इन्हें भूलने की कगार पर आने लगते हैं. इसके बाद तो सत्य का सिपाही हो या कर्म का पुजारी दोनों ही बस दो अक्तूबर को याद आते हैं.
जो लोग अखबार मंगाते हैं उन्हें सुबह का अखबार देख कर पता चलता है. तमाम सरकारी विभागों को अचानक इस दिन गाँधी और शास्त्री याद आ जाते हैं. लिहाजा देश के लगभग सभी(जो छपते हो या जो न भी छपते हो) अख़बारों में यथा संभव जितने बड़े हो सके उतने बड़े विज्ञापन दिए हैं. भला इससे बेहतर क्या तरीका हो सकता है इस दो महापुरुषों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने का. इस दिन इस कई लोगों को ऑफिस की छुट्टी बता देती है की गाँधी जयंती है. आम लोग बंद बाजारों को देखकर जान पाते हैं की देश में सार्वजनिक अवकाश है. कुछ लोग इसके बाद भी निश्चत करते हैं औरों से पूछ कर. भैया क्या बात है आज दुकाने बंद हैं. कुछ है क्या? तब जाकर पता चलता है कि आज दो अक्टूबर है. ऐसे में कैसे उम्मीद की जाये कि इस देश के लोग गाँधी और शास्त्री को हमेशा याद रखेंगे और उनके आदर्शों पर चलेंगे. हमने पूरे देश में गली चौराहों पर न जाने कितनी मूर्तियाँ लगवा दी हैं इन दोनों की ही. न जाने कितनी कालोनीज के नाम इन दोनों के नाम पर होंगे. लेकिन कोई एक ऐसा मिल जाये जो वाकई में गाँधी या शस्त्री के दिखाए रस्ते पर चल रहा हो. सरकारी प्रतिष्ठानों में भ्रष्टाचार चरम पर है. आम नागरिकों और सरकार के बीच असंतोष ने जगह बना ली है. नागरिक हितों की अनदेखी आम हो चली है. नीतियां बनाने वाले इसे लक्ष्य समूह के लिए प्रतिपादित नहीं करा पा रहें हैं. आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी लगातार बज रह है. मावोवाद और नक्सल समस्या ने परेशान कर रखा है. देश के अन्दर जंग छिड़ी हुयी है. कश्मीर का मसला हल नहीं हो पा राह क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल अपने फायदे को कम नहीं करना चाहता. कभी अंग्रोजों के खिलाफ एकजुट खड़े होकर दुनिया की सबसे बड़ी ताकत ब्रितानी हुकूमत को हारने वाला देश आज मंदिर और मस्जिद के मुद्दे पर सहम जाता है. युवा न तो गाँधी और शास्त्री को पढना चाहतें हैं और न तो उनके बारे में सोचना या समझना कहते हैं. खादी और चरखा आज न जाने किस स्टोर रूम में बंद पड़ा है. अब खुद ही सोच लीजिये की दो अक्टूबर का हमारे लिए क्या महत्व है. वैसे एक बात बताना तो भूल ही गया. कुछ लोगों को दो अक्टूबर का पता तब चलता है जब दीवार पर टंगी गाँधी या शास्त्री की तस्वीर को साफ़ करने के लिए उतार लिया जाता है और उसके पीछे साल भर से आशियाना बना कर बैठी छिपकली बेघर हो जाती है. काफी देर तक ये छिपकली दीवार पर इधर से उधर भागती रहती है. लगता है दो अक्टूबर आ गया. हे राम.