जंग लडि़ए लेकिन अपने गुनहगारों को भी पहचानिए

पत्रकारिता की नगरी कहे जाने वाले शहर बनारस में इन दिनों पत्रकारों और पुलिस में ठनी है। यहां यह अभी स्पष्ट कर दूं कि पत्रकारों से तात्पर्य टीवी माध्यम के लिए काम करने वाले लोगों से है। दरअसल इस पूरी तनातनी के मूल में कुछ दिनों पहले काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर लाशों पर सट्टा लगाए जाने की खबर है। इस खबर में दिखाया गया कि आईपीएल में ही नहीं काशी में लाशों पर भी सट्टा लगता है। यह खबर सबसे पहले एक नेशनल न्यूज चैनल पर चली। इसके बाद कुछ क्षेत्रीय चैनलों पर भी सनसनीखेज तरीके से दिखायी गई। 
पुलिस का आरोप है कि खबर प्रायोजित थी और मीडिया कर्मियों ने जानबूझकर यह खबर प्लांट की। सीधे शब्दों में कहें तो खबर मैनेज किए जाने का आरोप मीडिया कर्मियों पर लगा। लिहाजा पुलिस ने मीडिया कर्मियों के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया। पुलिस, पुलिसिया अंदाज मंे आ गई है। टीवी चैनलों के पत्रकारों के साथ पुलिस किसी अपराधी की तरह पेश आ रही है। हालात ये हैं कि पत्रकारों पर आरोप साबित हुए बिना ही उन्हें अपराधी की तरह दिखाया और बताया जाने लगा है। खबरें यह भी हैं कि कुछ पत्रकारों को मारा पीटा गया और उनके घर की महिलाओं के साथ भी गलत व्यवहार किया गया। 
इसके बाद पुलिस और टीवी पत्रकारों के बीच रस्साकशी तेज हो गई। एक ओर पुलिस जहां अपने अंदाज में आरोपी पत्रकारों के घरों पर दबिश दे रही है वहीं दूसरी ओर मीडिया कर्मी आपात बैठकें बुला रहे हैं। मुकदमे के मंथन के बाद चाहें जो भी निकले लेकिन इस बीच एक बहस का मौका जरूर मिल गया है। क्या पुलिस और पत्रकारों, विशेष तौर पर टीवी पत्रकारों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं? क्या विश्वास की जो डोर इन दोनों के बीच होनी चाहिए वह टूट चुकी है? आखिर पुलिस और पत्रकारों के बीच संवादहीनता की स्थिती क्यों आ गई? 
इन सवालों के जवाब तलाशना मुश्किल तो नहीं लेकिन इच्छाशक्ति से प्रभावित जरूर है। बनारस ही नहीं पूरे देश मंे पुलिस और टीवी पत्रकारों के बीच इस तरह का व्यवहार अब साधारण रूप से दिखने लगा है। पुलिस को जब अपने मैनेज्ड वर्क को गुडवर्क की श्रेणी में खड़ा करना होता है तब वह पत्रकारों की शरण लेती है। कई पत्रकार भी अपनी पुलिस भक्ति में सराबोर जरूरत के हिसाब से किसी टुच्चे चेन स्नैचर को हार्डकोर नक्सली या फिर अंतरप्रातीय अपराधी बना कर बेच देते हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भी पढ़ा लिखा समझदार पत्रकार दिल पर हाथ रखने के बाद मेरी इस बात से इंकार कर सकेगा। इन्हीं में से चैनल वाले कई पत्रकार तो कुछ पुलिस थानों में बाकायदा अपनी दुकान लगा लेते हैं। सिपाहियों के ट्रांसफर और प्रमोशन की सिफारिशें बड़े साहब तक पहुंचाई जाती हैं। बदले में क्या मिलता होगा सब जानते हैं। उस चर्चा तक न जाएं तो भी चलेगा। यह हमारी टीवी मीडिया की विडम्बना का एक हिस्सा है। अक्सर किसी टीवी पत्रकार की काबीलियत का पता उसके रिश्तेदार इस बात से लगाते हैं कि वो पुलिस या प्रशासनिक महकमे में कितने काम करा सकते हैं। टीवी पत्रकारिता में एक बड़ी जमात ऐसे लोगों की है जो किसी कोड आॅफ कंडक्ट को तो छोडि़ए अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को भी नहीं जानते। सच शायद कड़वा हो लेकिन मैंने जब वाराणसी में टीवी पत्रकारिता की शुरुआत से जुड़े एक वरिष्ठतम पत्रकार से दबी जुबान से यह कहा कि चैनल के पत्रकार की शक्ल में कई विशुद्ध दलाल भी हैं तो उन्होंने कोई प्रतिकार नहीं किया। मेरे लिए यह सुखद तो नहीं लेकिन हैरानी भरा जरूर था। आप जानते हैं कि आपके बीच, आपकी ही छवि खराब करने वाले लोग मौजूद हैं लेकिन आप कुछ नहीं कर सकते। यह भी किसी विडंबना से कम नहीं। लेकिन यहां एक बात और स्पष्ट करना जरूरी है कि इस भेड़ चाल में सभी को दोषी नहीं ठहरा सकते। 
अविष्कार, आवश्कता की जननी है। क्या यह बात खबरों की दुनिया में भी लागू होती है। मुझे लगता है कि हां। नब्बे के दशक में जब प्राइवेट न्यूज चैनलों का युग शुरू हुआ तब कैमरे की जानकारी रखने वाले लोग कम ही होते थे। चैनलों को विजुअल्स की आवश्कता थी लिहाजा कई पत्रकारों का अविष्कार कर दिया गया। इनमें से कइयों को आप दुर्घटना से पत्रकार बनने वालों की श्रेणी में भी डाल सकते हैं। किसी भी तरीके के फिल्टर को यहां प्रयोग में नहीं लाया गया। अच्छे और योग्य की तलाश लगभग नहीं के बराबर रही। धीरे धीरे चैनलों की संख्या बढ़ती गई और दुर्घटनावश पत्रकार बने लोग भी बढ़ते गए। जाहिर है कि इससे पत्रकारिता मरती गई। लेकिन बावजूद इसे रोकनी की छटपटाहट कम ही दिखी। आखिर क्यों नहीं वरिष्ठ पत्रकार इस क्षेत्र में आए किसी नवांगतुक को उसकी सामाजिक और पेशागत जिम्मेदारियों के बारे में बताते हैं? क्यांे नहीं किसी टीवी पत्रकार के गलत आचरण को पूरा कुनबा साथ मिलकर दूर करने की कोशिश करता है? आपात बैठकें ऐसे समय में भी बुलायी जानी चाहिए। 
वाराणसी में हुई घटना के बाद भी कम से कम पूरे देश के पत्रकारों को सबक लेना चाहिए। पुलिस ने सहयोग मांगने के नाम पर पत्रकारों का लगभग उत्पीड़न ही शुरू कर दिया। पुलिस की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में रही है इसमें कोई दो राय नहीं हैं। एक कहावत है कि पुलिस वालों से दोस्ती अच्छी न दुश्मनी। फिर चैनल वाले पत्रकार इस लकीर को पकड़ कर क्यांे नहीं चल पाते? क्या किसी मोह के शिकार हैं? बनारस एक ऐसा शहर है जहां के लगभग 75 फीसदी टीवी पत्रकार पिछले कुछ सालों मंे पुलिसिया मुकदमें मंे फंस चुके हैं। इस बारे मंे बनारस में टीवी पत्रकारिता की शुरुआत से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार गिरीश दुबे भी हैरानी जताते हैं। छूटते ही सवाल दागते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है कि दो तिहाई के करीब पत्रकार गलत ही हों। वो प्रशासन पर प्रहार करते हैं। कहते हैं अपनी गलती छुपाने के लिए पुलिस पत्रकारों को फंसा देती है। कुछ देर कर बातचीत के बाद हालांकि गिरीश जी यह जरूर कहते हैं कि मीडिया वालों की और खासकर इस टीवी मीडिया की विधा की मजबूरी को सभी को समझना चाहिए। दृश्य और श्रव्य माध्यम में अक्सर खबरों में ‘कुछ मैनेज‘ करना होता है। चलते चलते वह यह भी मान लेते हैं पत्रकारों के बीच कई दलाल भी हैं जिन्हें फिल्टर किया जाना जरूरी है। लेकिन इस बीच गिरीश जी पूरी मजबूती के साथ पुलिस के खिलाफ खड़े रहे। पुलिसिया कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा करते रहे और कहते रहे कि अब पुलिस पत्रकारों को अपराधी बना रही है। वैसे प्रश्न यह भी उठता है पुलिस ने जजों वाला काम कब से शुरू कर दिया। पुलिस कैसे यह तय कर सकती है कि अमुक खबर गलत है या फिर अमुक खबर सही। यह प्रश्न तत्कालिक लग सकता है लेकिन मेरी समझ में यह पत्रकारिता के स्वतंत्र भविष्य से जुड़ा मसला है। काशी में इलेक्ट्रानिक मीडिया की शुरुआत से जुड़े वरिष्ठतम पत्रकारों में शामिल अजय सिंह जब यह सवाल उठाते हैं तो इससे जुड़े कई और पहलुओं पर भी सिलसिलेवार चले जाते हैं। अजय सिंह तल्खी भरे अंदाज में कहते हैं कि खबरों की सत्यता परखने का काम संपादक का है, पुलिस का नहीं। अगर पुलिस खबरों के सही या गलत होने का निर्णय करने लगी तो छप चुके अखबार और चल चुके न्यूज चैनल। बात बात मंे सवाल यह भी उठा कि किसी पहुंच वाले के खिलाफ मुकदमा करने के लिए पुलिस किसी शिकायत का इंतजार करती है लेकिन पत्रकारों के खिलाफ बिना किसी शिकायत के ही मुकदमा दर्ज हो जाता है। शायद पुलिस अपने को जज समझ कर स्वयं संज्ञान की अवधारणा को अपना चुकी है। ऐसे में पुलिस की कार्यशैली को गुंडई के रूप में परिभाषित करना ज्यादा आसान होगा। 
इस देश का कानून कुछ यूं है कि यहां बेगुनाह अपनी बेगुनाही साबित करता है। किसी खद्दरधारी ने अगर सौ खून भी किए हों तो पुलिस दो-चार साल तक सोचने के बाद उसके खिलाफ रपट लिखती है और इसके दो-चार साल बाद एकाध घंटे के लिए उसे थाने में बैठा लेती है। लेकिन मामला किसी आम आदमी का हो तो न सोचना, न जांचना। बस उठाना, मुकदमा लिखना और अंदर कर देना। करते रहिए आप अपनी बेगुनाही साबित। इतने में आठ-दस साल तो निकल ही जाएंगे। वाराणसी में पत्रकारों के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। लेकिन इसी बहाने टीवी माध्यम के पत्रकारों से भी उम्मीद होगी कि ऐसे लोगों की पहचान कर लें जो खबरों को अपनी रखैल समझते हैं। जब चाहा, जैसे चाहा नचा दिया। 
क्षमा प्रार्थना- चूंकि इस विधा से मैं भी जुड़ा रहा हूं और इसी की रोटी खाता हूं लिहाजा इस बारे में मुझे बोलने का कोई हक नहीं लेकिन इसी वजह से मेरी जिम्मेदारी भी है। हो सकता है सच की आदत कुछ सहयोगियांे को न हो लेकिन शीशे सबके घरों में। बस एक बार हम सब को शक्ल अपनी देखनी होगी। 

बदल गया है मुस्तकबिल


नार्थ ब्लाक में चल रहा एक संवाद - 
इतना हंगामा मचाने की क्या जरूरत है। आखिर ऐसा क्या हो गया। कोई तुफान आ गया? सुनामी आ गई? एक वोट से सरकार के गिरने का खतरा आ गया? सीबीआई ने अपनी क्लीन चिट वापस ले ली? नहीं न। तब इतना शोर क्यों मवा रहे हो। यार चीन ही तो है। भारत की सीमा में 19 किलोमीटर ही तो आए हैं। कोई दिल्ली तक तो नहीं आ गए न चीनी। अगर आ भी जाएं तो उनके साथ पहले फ्लैग मीटिंग करना। उनको समझाना। बातचीत करके उनको वापस जाने को कहना। न माने तो भी कोई बात नहीं। फिर मनाना। मान ही जाएंगे। तुम तो जानते हो कि चीन की आबादी लगातार बढ़ रही है। रहने की जगह नहीं। दिनचर्या के कई और काम हैं जिनके लिए खुली जगह कम पड़ गई होगी। आने दो, हम सहिष्णुता की मूरत हैं। और हां, उनके खाने पीने का पूरा ध्यान रखना। कोई परेशानी न होने पाए। आखिर पड़ोसी हैं हमारे। 
संवाद खत्म। 

कुछ ऐसे ही हालात लग रहे हैं। देश की सरकार का जो रवैया चीनी सैनिकों की घुसपैठ को लेकर रहा है। उससे देश का कोई भी नागरिक संतुष्ट नहीं हो सकता। 
पहले खबर आई कि चीनी सैनिक देश की सरहद पार कर भारत में घुस आए हैं। जाहिर है कि देश की जनता को पता चलने से पहले मुल्क के प्रधानमंत्री को पता चला होगा। लेकिन प्रतिक्रिया देश के लोगों की पहले आई, पीएम साहब की बाद में। लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेक्टर यानी डीबीए में चीनी सेना ने बाकायदा अपने तम्बू तान लिए हैं। सरकार के पास इस रास्ते का एक ही हल नजर आया। वो था फ्लैग मीटिंग का। कोई समाधान नहीं निकला। दो बार की फ्लैग मीटिंग्स बेनतीजा रहीं। इसके बाद अब ये बताया जा रहा है कि ये सब चीनी सेना का सामान्य अभ्यास है। वाह साहब, वाह। यही हाल रहा तो चीनी सेना कल दिल्ली के रामलीला मैदान में भी तम्बू तान लेगी तो सरकार यही कहेगी कि ये सब चीनी सेना का सामान्य अभ्यास। आखिर सरकार जताना क्या चाहती है? क्या भारत इतना सक्षम भी नहीं रह गय कि वो अपनी ही सरहद में घुस आए दुश्मन को बाहर कर सके? डीबीए सेक्टर में न सिर्फ चीनी सैनिकों ने अपने तम्बू ताने हैं बल्कि चीनी सेना के हवाई जहाज भी इन इलाकों में उड़ान भर चुके हैं। जाहिर 15 अप्रैल को भारतीयों द्वारा चीनियों को देखे जाने के बाद और प्रतिरोध जताए जाने के बाद भी चीन नहीं मान रहा है। चीन ने इसके बाद कुछ और नए तम्बू तान लिए। अब चीन भारत पर इस बात के लिए दबाव डाल रहा है कि भारत सामरिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण सीमा चैकियों को हटा ले। आखिर भारत इतना लाचार कैसे हो सकता है? क्या हम कूटनीतिक रूप से दुनिया के आगे फेल हो चुके हैं। हमार विदेश नीति ने पिछले कुछ सालों में हमारे देश की क्या ऐसी छवि पेश कर दी है जो सहिष्णुता से आगे बढ़कर बेचारगी तक पहुंच गई है। अगर ऐसा नहीं है तो चीन की हिम्मत भारत की सीमा में घुसने और आंखे दिखाने की न होती। अगर हम मजबूत होते तो चीन अपनी बात रखने के लिए राजनयिक स्तर पर बातचीत करता। यूं हमारे ही घर में घुस कर हमें न धमकाता। 
इतने के बाद पीएम साहब कहते हैं कि ये लद्दाख का स्थानीय मुद्दा है और इसे तूल देने की आवश्यकता नहीं है। धन्य, हमारे भाग्य विधाता। 

लगे हाथ आपको इस देश से जुड़ा एक और पहलु याद दिलाता हूं। श्रीनगर में लाल चौक पर आप तिरंगा नहीं लहरा सकते, पाकिस्तान का झंडा भले लहरा जाए। 
यही इस देश का मुस्तकबिल हो गया है। 

आजम खां चले लेक्चर देने


कितनी अजीब बात है न कि आजम खां को अमेरिका के बोस्टन में लोगान एअरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के लिए रोक लिया गया। एक भारतीय होने के नाते आप और हम पहली बार में इसकी आलोचना ही करेंगे लेकिन जैसे ही इसके बाद आजम खां के व्यवहार और आरोपों की याद आएगी हम इसका मजा लेने लग रहे हैं। आजम खां काबीना मंत्री हैं ये उनके सरकारी प्रोफाइल में लिखा है लेकिन कुछ चीजें बिना लिखे ही आपको समझ में आ जाएंगी। कभी कभी नहीं बल्कि अक्सर ये लगता है कि आजम खां कैबिनेट मंत्री नहीं बल्कि खुद मुख्यमंत्री हैं। ये व्यवहार यूपी की जनता को कुछ अजीब जरूर लगता है लेकिन उसकी मजबूरी है। हमारे फिलहाल के संविधान में हमारे पास ये अधिकार नहीं है कि हम किसी की चलती साइकिल को रोक सकें। पांच साल तक तो हमें सहना ही होगा। 

वैसे सपा के अधिकतर नेताओं को लग रहा है कि यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार होने का मतलब है कि खुला राज। यहां कानून का राज कहने की कोई जरूरत नहीं है। आजम खां की भी स्थिती ऐसी ही होगी। आप समझ सकते हैं। उन दिनों को याद कीजिए जब लग रहा था कि आजम खां का राजनीतिक करियर लगभग खत्म सा हो गया है। ऐसे में आजम खां को भी नहीं आभास रहा होगा कि कभी सपा की सरकार इतने प्रचंड बहुमत से आएगी और आजम खां को भी इसमें पूरा रसूख मिल सकेगा। लेकिन आजम खां सियासत के माहिर खिलाड़ी हैं। वो उस मुस्लिम वर्ग की नुमांइदगी करते हैं जिसके बल पर सपा अपना बड़ा वोट बैंक खड़ा करती है। एम वाई समीकरण यानी मुस्लिम यादव समीकरण हमेशा से यूपी में निर्णायक भूमिका में रहा है। इस बात को मुलायम भी बखूबी समझते हैं। यही वजह है कि मुलायम ने आजम को खुली छूट दे रखी है। उन्हें आखिर मुस्लिमों को खुश भी रखना है। ऐसे में आजम खां थोड़ा अकड़ भी सकते हैं। लेकिन यूपी की अकड़ अमेरिका में निकालेंगे तो मामला उल्टा पड़ेगा ही। हावर्ड यूनिवर्सिटी ने जब कहा कि आपको क्राउड मैनेजमेंट का पाठ पढ़ाना है तो बड़ी जल्दी में तैयार हो लिए खां साहब। भला हो हावर्ड वालों का भी। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर हुई दुर्घटना का पता उन्हें है ही नहीं। लोग मारे गए। कई घायल हो गए। लेकिन आजम साहब हैं कि क्राउड मैनेज कर के ही मानेंगे। इससे ये भी साबित होता है कि इलाहाबाद में हुई दुर्घटना यूपी सरकार के लिए मामूली की श्रेणी में आती है। खैर, छोडि़ए। आजम खां से सहानुभूति होने भी लगी थी। एकाएक उनका बयान आया कि मुस्लिम होने के नाते उन्हें एअरपोर्ट पर रोका गया। इसके बाद भी खां साहब से थोड़ी बहुत सहानुभूति बची थी। लेकिन तभी खां साहब ने एक और सनसनीखेज बयान दे डाला। सलमान खुर्शीद, जो इस वक्त देश का विदेश मंत्रालय देख रहे हैं, उन्हें खां साहब ने लपेट लिया। आजम खां साहब का आरोप है कि सलमान खुर्शीद की वजह से ही उन्हें एअरपोर्ट पर परेशान किया गया। अब भला ऐसा क्यों होगा? लेकिन खां साहब चाहते हैं कि दुनिया वो मान ले जो वो कह रहे हैं। अब खां साहब चाहते हैं कि हम सब ये मान लें कि कांग्रेस सरकार यूपी की सपा सरकार के मंत्रियों और दिग्गज नेताओं को परेशान कर रही है। चलिए मान लिया। लेकिन इतना मान लेने के बाद एक सवाल पूछने का अधिकार तो मिल ही जाता है। सवाल ये है कि इतना सब कुछ हुआ तो सपा ने कांग्रेस को बेसहारा क्यों नहीं छोड़ा? जवाब नहीं मिलेगा। हुजूर सब सियासत है। एक हाथ देना, दूसरे हाथ से लेना। मौका मिले तो गाल बजाना। समझ गए न।

जब नगरिया हो अंधेरी तो राजा हुआ न चौपट


अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बने काफी वक्त बीत चुका है। इस दौरान अखिलेश यादव दो बार बजट भी पेश कर चुके हैं। अखिलेश यादव जब देश के सबसे बड़े राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने तो उनके समर्थकों के साथ ही उनसे पार्टीगत तौर पर अलग लोगों में भी एक मौन खुशी देखी गई। अखिलेश के सत्ता संभालते ही लगा कि अब जल्द ही यूपी का काया कल्प हो जाएगा। लेकिन हुआ ठीक उलट। मायावती के राज से पीछा छूटने के बाद अखिलेश का राज आया तो कहावत याद आई कि आसमान से गिरे खजूर में अटके। दरअसल अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री जरूर हैं लेकिन शासन किसी और का है। ये बात छुपाने की कोशिश जरूर होती रहें लेकिन अब लोग समझ चुके हैं कि अप्रत्यक्ष तौर पर शासन अखिलेश के पिता और राजनीतिक गुरू मुलायम सिंह यादव ही चला रहे हैं। इसमें आप कुछ और नाम भी जोड़ सकते हैं। आजम खां, शिवपाल यादव, नरेश अग्रवाल वगैरह वगैरह। यहां पर सपा और कांग्रेस का एक भेद भी सामने आता है। हालांकि दोनों ही पार्टियों ने युवा चेहरे को आगे रखकर चुनाव लड़ा लेकिन अगर कांग्रेस जीत जाती और राहुल सीएम बनते तो सोनिया का इतना हस्तक्षेप शायद नहीं होता। खैर, बात अखिलेश यादव की हो रही है। अखिलेश यादव से यूपी की जनता की उम्मीदें धीरे धीरे कर टूटने लगी हैं। सत्ता संभालने के कुछ ही दिनों के भीतर अखिलेश अपने दागी मंत्रियों  को लेकर चर्चा में आ गए। ये एक ऐसी समस्या थी जिससे पार पाना अखिलेश के लिए मुश्किल था। लिहाजा अखिलेश ने कइयों से नाता तोड़ा। लेकिन बचते बचाते भी मिस्टर यंग के दामन पर राजा भैया ने कुछ कीचड़ डलवा ही दिया। सीओ हत्याकांड से चर्चा में आए राजा भैया ने अखिलेश सरकार को खासा परेशान किया। 
वहीं सपा शासन के आते ही सूबे में सांप्रदायिक दंगे भी शुरू हो गए। अब तक लगभग दो दर्जन जगहों से सांप्रदायिक दंगों या तनाव की खबरें आ चुकी हैं। ये यूपी में एमवाई समीकरण का एक अहम पहलु है। एम यानी मुसलमान और वाई मतलब यादव। सपा से इन दोनों की नजदीकियां हैं। अखिलेश सरकार और उसके एमवाई समीकरण को संतुलित रखने के प्रयासों का पूरा सबूत तब मिल गया जब सरकार ने यूपी के फैजाबाद और वाराणसी में हुए धमाकों के आरोपियों पर से केस हटाने का ऐलान किया। राजनीति का ये स्वरूप अगर अखिलेश यादव का है तो भी किसी को भाएगा, लगता नहीं है। 
वहीं सरकार लैपटाप बांट कर 2014 के लिए अपना वोट बैंक तैयार करने मंे लगी है। उत्तर प्रदेश के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री अभिषेक मिश्रा हैं। मिश्रा जी कैंब्रिज से पढ़े हैं और आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफेसर थे। फिलहाल अखिलेश यादव के थिंक टैंक का हिस्सा हैं। माना जाता है कि मिश्रा जी ने लैपटाॅप बांटने की योजना को अमली जामा पहनाने में अहम रोल अदा किया। सपा सरकार बारहवीं पास करने वाले 15 लाख और दसवीं पास करने वाले लगभग 18 लाख छात्रों को लैपटाॅप बांटेगी। ये बड़ा आंकड़ा है। इसके साथ ही बेराजगारी भत्ते के लिए 1200 करोड़ खर्च करेगी। लेकिन इसी के साथ इस बात भी गौर कर लीजिए कि सूबे में बिजली के हालात खराब हैं। गर्मियों के महीने में सूबे में हाहाकार मच जाता है। हालात ये हैं बिजली की कमी से कई औद्योगिक ईकाइयों में उत्पादन गिर जाता है। छोटे व्यापारी तो भुखमरी के कगार पर आ जाते हैं। ऐसे में सूबे की विद्युत व्यवस्था को सुधारे बिना लैपटाप बांटने का औचित्य लोगों को समझ नहीं आ रहा। खबरें ये भी हैं कि अब तो लैपटाप बाजार में बिकने के लिए आ गए हैं। जाहिर है कि जिन चीजों के न होने से भी काम चल जाएगा सरकार उन्हीं चीजों को उपलब्ध कराने में पूरा ध्यान और धन लगा रही है जबकि बिजली जैसी आवश्यक जरूरत पर ध्यान नहीं है। ऐसे में ये कवायद महज वोट बैंक तैयार करने की ही लगती है। 
अखिलेश यादव एक युवा और दूरदर्शी नेता हैं ये बात उनके विरोधी भी मानते हैं लेकिन यूपी की दलगत और जातिवादी राजनीति से आगे अखिलेश भी नहीं निकल पा रहे हैं। ऐसे में अखिलेश यादव के युवा होने का टूटता तिलिस्म न सिर्फ सपा के लिए खतरे की घंटी है बल्कि मुलायम और उनके प्रधानमंत्री बनने के सपने के लिए भी। 

किस आदमी की बात कर रहें हैं अरविंद ?


नई दिल्ली में बिजली बिलों के मुद्दे पर अनशन पर बैठे अरविंद केजरीवाल आखिर किसी आदमी की बात कर रहे हैं ये एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। यकीनन इस देश की राजनीति आजादी के साठ दशक बाद भी बिजली, सड़क और पानी के इर्द गिर्द ही घूम रही है। राजनीतिज्ञों ने इस देश के हर इलाके तक बिजली, सड़क और पानी को न जाने पहुंचाने की मशक्कत की या फिर न पहुंचाने की इसका फर्क भी अब मुश्किल हो गया है। फिलहाल इस बहस से आगे निकल कर राजनीति में आने की जद्दोजहद में लगे अरविंद केजरीवाल की। 

अरविंद केजरीवाल और आवाम से जुड़ने की उनकी कोशिश पर चर्चा करने से पहले हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि अरविंद दुनिया के सबसे बड़े  लोकतंत्र के राजनीतिक परिदृश्य में आना कैसे चाहते हैं। अरविंद केजरीवाल असंतोष और मूक बना दिए जाने का दंश झेल रही जनता के लिए बहुत हद तक एक क्रान्तिकारी के रूप में आए। तब उनके साथ अन्ना हजारे थे। ये वही अरविंद हैं जो पहले राजनीति में आने से इंकार करते रहे और इसके बाद आ भी गए। हालांकि इस दौरान उन्हें अन्ना का साथ छोड़ना पड़ा। यहां एक सवाल पैदा होता है कि क्या अरविंद हर हाल में राजनीति में आना ही चाहते हैं। चाहें इसके लिए उन्हे अन्ना जैसे सहयोगियों का साथ छोड़ना ही पड़े। 
अरविंद केजरीवाल ने नई दिल्ली में बिजली के बिलों को मुद्दा बनाया और अनशन पर बैठ गए। अरविंद के अनशन के दौरान न लोगों की भीड़ जुटी और न ही मीडिया का रेला लगा। सवाल पैदा होना लाजमी है कि आखिर ये दोनों ही क्यों नदारद रहे। अरविंद केजरीवाल ने अनशन स्थल से अपील की और कहा कि लोग बिजली के बिल न जमा करें। इस अपील का कोई खास असर नहीं हुआ। बिजली कंपनियों के ओर से जारी बयान में बताया गया कि बिजली के बिलों का पूरा भुगतान लोगों ने किया है। तो इस बात के ये माएने निकाले जा सकते हैं कि अरविंद जिन मुद्दों और जिस तरीके से जनता के बीच पैठ बनाना चाह रहे हैं वो प्रभावशाली नहीं हैं। 
वहीं दूसरी ओर अन्ना हजारे आज भी अपने पुराने तरीके पर कायम हैं। वो लोगों के बीच जाकर उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं। सिस्टम से लड़ने के लिए वो सिस्टम में प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं कर रहे हैं लेकिन जिन लोगों के लिए सिस्टम बना है उन्हें सिस्टम की खामी समझा रहे हैं। ये ठीक वैसा ही जैसे किसी ग्राहक को उसके खरीदे गए सामान की गुणवत्ता के बारे में बताया जा रहा हो। अन्ना हजारे को लगता है कि जब ग्राहक खुद जागरुक होगा तो सिस्टम में खामियां नहीं डाली जा सकतीं।
आम आदमी पार्टी बनाने के बाद अरविंद का कद बढ़ा है घटा है इसका आकलन तो वो खुद ही करें तो अच्छा लेकिन इतना जरूर है कि वो जिस आम आदमी की बात कर रहे हैं उसके लिए बिजली इतना बड़ा मुद्दा है तो वो क्यांे नहीं अरविंद के साथ जुड़ रहा है। 

एक बार याद उन्हें भी कर लिया होता।


जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में जितनी बार नाम राहुल गांधी का लिया गया अगर उसका एक फीसदी हेमराज और सुधाकर को याद किया होता तो शायद हमें गर्व होता कि हमारे देश पर कांग्रेस ने कई साल तक राज किया है। हैरानी होती है कि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी के नेताओं ने विदेश और रक्षा नीति पर एक भी नोट जारी नहीं किया। जबकि मुल्क का एक बड़ा तबका ये उम्मीद लगाए बैठा था कि कांग्रेस सबसे पहले सुधाकर और हेमराज के मुद्दे पर अपना बयान जारी करेगी। 
आखिर सुधाकर और हेमराज को याद न करने की मजबूरी कांग्रेस के लिए क्या हो सकती है। ये तो कांग्रेस के नेता ही जाने लेकिन इतना तो तय है कि कांग्रेस के इस रवैए से शहीदों के प्रति उसके चरित्र का पता चल गया है। कांग्रेस से उम्मीद थी कि कम से कम राहुल बाबा के ही जरिए कांग्रेस इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करेगी। लेकिन कांग्रेस चुप रही। 
मुझे लगता है कि कांग्रेस के पास कहने के लिए बहुत कुछ था भी नहीं। कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों ही महज इस बात के चिंतन में लगे रहे कि राहुल को कैसे आगे लाया जाए। कांग्रेस इस देश की ही दुनिया की एक बड़ा राजनीतिक पार्टी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस अगर कुछ कहती तो पाकिस्तान उसे अनसुना नहीं कर सकता था। कम से कम इस देश के लोगों को ये संदेश तो जाता ही कि कांग्रेस इस मुल्क के सपूतों के बारे में भी वक्त निकालकर कुछ सोचती है। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अफसोस ये कांग्रेस हमारे देश की पार्टी है। 


बोलिए बाबा राहुल की जय


राजस्थान में कांग्रेस का चिंतन शिविर चल रहा है। कांग्रेस के तमाम दिग्गज नेता इन दिनों एक साथ चिंतन शिविर के ही बहाने सही एक जगह बैठ तो गए ही हैं। लोग बाग न जाने इन नेताओं को क्या क्या कह रहे हैं। चोर, उच्चके, चापलूस, वादाखिलाफ और न जाने क्या क्या। लेकिन मैं इन संबोधनों से जरा सा भी इत्तफाक नहीं रखता। हुजूर आप भी नहीं रखते होंगे। क्योंकि इन नेताओं को तो शायद इससे भी कोई बड़ा संबोधन मिलना चाहिए। खैर छोडि़ए हम इस चिंतन में न पड़े तो ही अच्छा। 
कांग्रेस को अपने इस चिंतन शिविर का नाम शायद कुछ और रखना चाहिए था। शायद 'राहुल शिविर', 'मीट विथ राहुल बाबा', 'हाउ टू मेक राहुल बाबा अ पालिटीशियन' या कुछ ऐसा ही। ताकि इस देश के लोगों को पता तो चल जाता कि कांग्रेस का मतलब अब सिर्फ राहुल गांधी ही रहा गया है। इससे आगे और पीछे कुछ नहीं। चिंतन शिविर में कांग्रेस के नेता कहां तक तो दुनिया की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को और मजबूत बनाने की कोशिश करते तो वो महज गणेश परिक्रमा में ही लगे हुए हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी राजनीतिक पार्टी की क्या जवाबदेही हो सकती है इसके बारे में सोचने की बजाए कांग्रेस ये सोच रही है कि राहुल गांधी को कैसे राजनीतिक जिम्मेदारी सौंपी जाए। 
राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस ने जो चरित्र दिखाया है उससे साफ हो गया है कि कांग्रेस जनता से बेहद दूर महज व्यक्तिगत चिंतन में लगी है। कांग्रेस का यह चरित्र दिखाता है कि वो जनता के बीच किसी नेता को कैसे थोपती है। वही नेता जिसको कई राज्यों में जनता ने सिरे से नकार दिया। न यूपी में चली न गुजरात में चली। इसके बावजूद कांग्रेसी चाहती है कि कांग्रेस को लोग अब राहुल के नाम से जाने। 
आम आदमी महंगाई से मर रहा है। कांग्रेस को इस बात से कोई लेना देना नहीं है। कांग्रेस के चिंतन शिविर में इस बात पर चर्चा नहीं हुई। हां, यह जरूर है कि सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी पीड़ा व्यक्त की है। मुझे समझ नहीं आता कि सोनिया जी की इस पीड़ा पर देश कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करे। कांग्रेस का शुक्रिया अदा क्या ऐसे करें कि भाई पहले आपने हमें एक भ्रष्टतंत्र दिया और अब उसपर आप दुख जता रहे हैं। इसके लिए हम आपके शुक्रगुजार हैं। 
कांग्रेस के चिंतन शिविर में न कोई ताजगी है और न ही आम आदमी के लिए कोई उम्मीद। है तो बस परिवारवाद की पुरानी परिपाटी को कायम रखने की कोशिश और गणेश परिक्रमा का कांग्रेसियों का जज्बा। बढि़या होता कि कांग्रेस अपना नाम बिना किसी चिंता के राहुल कांग्रेस कर लेती। हम भी उम्मीद छोड़ देते। 
और हां, अगर आप बोल सकते हों तो बोलिए..........राहुल बाबा की जय

हिना रब्बानी खार, खैरियत मनाओ कि हिंदुस्तान में गांधी पैदा हुआ था

शक्ल खूबसूरत, सीरत बदसूरत

मैडम हिना रब्बानी खार कह रही हैं कि भारत युद्ध पर आमादा है। बड़ा हैरतअंगेज और हास्यास्पद बयान ये है। मैडम साहिबा को विदेश मामलों का कितना ज्ञान है ये तो नहीं पता लेकिन इतना जरूर है कि मैडम को अपना लुक बनाए रखने का पूरा ध्यान रहता है। 1977 में जब मैडम हिना का जन्म हुआ उसके बाद उन्होंने आज तक उन्होंने कोई वास्तविक जंग देखी भी नहीं। हां, ये जरूर है कि कारगिल की जंग उन्होंने जरूर देखी होगी। हालांकि उस वक्त मैडम हिना महज 22 साल की ही रहीं होंगी। और उन्हें जंग की कितनी समझ रही होगी ये आप और हम समझ सकते हैं। मैडम की कुल जमा उमर अब भी 36 ही है। अब 36 की उमर में वो न तो 47 की समझ सकती हैं, न 65 को समझ सकती हैं, न 71 को। मैडम हिना ने मैसाच्युट्स यूनिवर्सिटी से व्यापार प्रबंधन में एमएससी की डिग्री ली है। मैडम पहले पाकिस्तान में वाणिज्य मंत्रालय संभाला करती थीं। कुछ दिनों से भारत के साथ रिश्ते सुधारने में लगा दी गईं हैं। 
यहां भारतीयों का सौंदर्य प्रशंसक होना भी मैडम के ऐसे बयानों की वजह है। मैडम जब भारत आईं तो भारतीय मीडिया ने उनकी जो ग्लैमरस छवि पेश की, कि बस पूछिए मत। न्यूज पढ़ते पढ़ते एंकर भावुक होने लगे। मैडम हिना ने बयान दिया कि वो भारत को एक अलग लेंस से देख रहीं हैं। ऐसे बयानों ने हिना मैडम को सुर्खियों में ला दिया। हमें भी लगा कि चलो एक नासूर खत्म हो गया। लेकिन याद करिए कि उसी वक्त मैडम चीन भी गईं थीं। लेकिन भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया ने मैडम का जितना सौंदर्यमंडन किया उसका एक फीसदी भी चीन की मीडिया ने नहीं किया। खैर छोडि़ए, हमने मैडम से हाथ मिलाया तो छुरा भी तो हमारी ही पीठ में घोंपा जाएगा। 
हाल फिलहाल मैडम को अब लगता है कि भारत ने सीमा पर तनाव बढ़ा दिया है और यु़द्ध की स्थितियां पैदा कर दी हैं। लेकिन मैडम साहिबा आप शायद भूल रहीं हैं कि ये मुल्क 1947 के बाद से रोजाना एक नई अनजानी जंग का सामना करता है। ये जंग या तो आपकी रहनुमाई में होती है या फिर आप खुद छेड़ती हैं। कभी आप संसद पर हमला करवाती हैं तो कभी लोकल ट्रेनों में अपने भाड़े के ट्टुओं को भेज कर धमाके कराती हैं। आप भूल जाती हैं कि हम अमन का पैगाम लेकर कराची गए तो आप दहशतगर्दों का ठिकाना कारगिल की पहाडि़यों में बनवा रहीं थीं। 
हिना रब्बानी खार, खैरियत मनाओ कि हिंदुस्तान में गांधी पैदा हुआ था। लेकिन ये मत भूलो कि यहीं भगत और आजाद भी जन्मे थे। मैडम साहिबा जंग हमने कभी न चाही और न चाहेंगे लेकिन इतना जरूर है कि सरहदों का निगहबानी में हमें ही अपनी जमीं पर आपकी सेनाओं की बिछाई लैंडमाइंस मिलीं हैं। हम अब भी चुप हैं समझा रहे हैं, समझ जाइए। हाथ मिलाइए, दिल मिलाइए लेकिन पीठ में छुरा मत घोंपिए।

दिन गलती गिनाने के नहीं पीएम साहब सबक सिखाने के हैं


ठीक ठाक से चुप रहने वाले जब पीएम मनमोहन सिंह जी ने पाकिस्तान की तरफ से हो रही बर्बरता पर मुंह खोला तो लगा कि पीएम साहब का बयान पाकिस्तानी राजदूत को सामने बैठाकर टाइप कराया गया है। बयान तैयार कराते वक्त एक एक लाइन के बाद पाकिस्तानी राजदूत से पूछा गया होगा कि ठीक है न भाई साहब कोई गलती तो नहीं है। कहीं कुछ अधिक तो नहीं हो रहा। फिर पाकिस्तान के राजदूत ने कहा होगा कि आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि हमने गलती की। पाकिस्तानी राजदूत ने कहा होगा कि आप लिखिए कि आप अपनी गलती को मानिए। इसके बाद पाकिस्तान कहेगा कि हमने कोई गलती की ही नहीं तो मानने का तो सवाल ही नहीं उठता। बस हो गया काम। न भारत के पीएम को चुप रहने पर ताना सुनना होगा और न ही पाकिस्तान को गलती मानने की जरूरत होगी। शायद पड़ोसी के साथ रिश्ते सुधारने का इससे बेहतर तरीका हो भी नहीं सकता। यूं भी इस मुल्क का मुस्तकबिल कुछ ऐसा ही रहा है। हम कहने को शेर हैं लेकिन गीदड़ों की धमकियों से मांद में छुप जाते हैं। इसके बाद शांती पसंद होने का हवाला देकर अपनी इज्जत बचाने की कोशिश करते हैं। हमारे दो जवान शहीद हुए। एक जवान का सिर दुश्मन मुल्क के सैनिक काट कर अपने साथ लेते गए और हमारा देश अभी हाथ जोड़े ये याचना कर रहा है कि भाई सिर लौटाओ या मत लौटाओ लेकिन प्लीज अपनी गलती तो मान लो। यूं तो पाकिस्तान गलती मानेगा नहीं और मान भी लिया तो उससे क्या होना। क्या ऐसी हरकतें वो दोबार नहीं करेगा ? इसकी गारंटी कौन लेगा? वक्त अब गलती गिनाने का नहीं वक्त अब सबक सिखाने का है। हमारे एक जवान का सिर काट कर ले गए पाकिस्तानी सैनिक। मीडिया ने हल्ला मचाया। इसके बाद फ्लैग मीटिंग हुई। लगा कि हमने हड़का दिया टुच्चे पाकिस्तान को। लेकिन हुआ क्या। पाकिस्तान ने मीटिंग के 72 घंटों के भीतर सीजफायर का पांच बार उल्लंघन किया। गोलीबारी की और हमें बताया कि मीटिंग और जंग में सब जायज है। हम अभी इस मुगालते में हैं कि हमने समझा दिया तो पाकिस्तान सुधर गया। रिश्तों को सुधारने की कोशिश एक अलग बात है और सरहद पर अपने जवानों को सुरक्षित माहौल देना अलग। दोनों में फर्क समझना होगा। कूटनीति वीजा नियमों का भविष्य तय कर सकती है लेकिन जंग के मैदान में तोप का मुंह नहीं मोड़ सकती। इसके लिए तो अपनी सेना उतारनी ही होगी।

माफ करना हेमराज इस देश के लोग तुम्हारे लिए इंडिया गेट पर नहीं आ सकते।


यकीनन ये सोच कर दुख होता है लेकिन ये सोचना तो पड़ेगा ही। एक छोटा सा सवाल है कि क्या इस देश की सरहद को सलामत रखने वालों का सिर हमारे लिए अहमियत नहीं रखता ? क्या हमारे जवान का सिर इस लायक भी नहीं कि उसके लिए इंडिया गेट पर नहीं उतर सकते ? 
हमारे देश में भ्रष्टाचार है इसमें कोई दो राय नहीं है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी इससे प्रभावित होती है इसमें भी कोई दो राय नहीं है। हमारा गणतंत्र, भ्रष्टतंत्र में बदल चुका है लिहाजा हमारी नाराजगी जायज है। इस भ्रष्टाचार की ही देन है कि हमें अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव के दर्शन हुए। इस देश में लाखों लोगों ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए देश के अलग अलग हिस्सों में कभी धरना दिया तो कभी प्रदर्शन किया। हमारा हासिल हमें अभी पता नहीं। फिलहाल हम खुश हैं कि हमने आवाज तो उठाई। 
दिल्ली में चलती बस में गैंगरेप हुआ तो देश उबल पड़ा। युवाओं की बड़ी संख्या देश के अलग अलग हिस्सों से इंडिया गेट पर आई और आवाज उठाई। पत्थरों से घिरे लोकतंत्र पर ऐसी चोट लोक की हुई कि पूरा तंत्र हिल गया। देश में एक नई बहस शुरू हो गई। 
लेकिन इस सबके बाद ये सवाल भी आ गया कि आखिर ऐसे मुद्दों पर सरकार से जवाब की उम्मीद करने वाली भीड़ आखिर हेमराज और सुधाकर सिंह की शहादत को इतने हल्के में क्यों ले रही है। क्या अब इस देश की जनता ने मान लिया है कि देश की सरहद पर हमारे जवान शहीद होते रहे हैं और होते भी रहेंगे। क्या ऐसी घटनाओं से अब हमें कोई फर्क नहीं पड़ता ? मैं कहीं से नहीं कहता कि दिल्ली में गैंगरेप की घटना और मेंढ़र में जवानों की शहादत में कोई समानता है। लेकिन इतना तो आप सब मानेंगे कि इस देश के लोगों के लिए ये दोनों ही घटनाएं बेहद माएने रखती हैं। क्या हम उस दर्द को महसूस नहीं कर पा रहे जो दर्द हेमराज के परिवारजनों से सहा है। कोई जब सेना में भर्ती होता है उसी वक्त इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है कि उसकी कभी अपने फर्ज को निभाते हुए शहादत भी हो सकती है। लेकिन इस बात के लिए कोई तैयार नहीं होता कि शहादत के बाद किसी जवान का सिर कलम करके दुश्मन सेना के सैनिक ले जाएं। क्या गुजरी होगी उस परिवार पर जिसने अपने सपूत का सिरविहीन शव हाथ में लिया होगा। इस दर्द को क्या अभी आपने महसूस किया। मथुरा में हेमराज की पत्नी, मां और परिवार के अन्य लोग अनशन पर बैठ जाते हैं लेकिन इस देश के सिस्टम को बदलने के लिए इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने वाली भीड़ की एक फीसदी भीड़ भी मथुरा नहीं पहुंचती। क्या महज इसलिए कि मथुरा दिल्ली नहीं है। क्या मथुरा जाने वाले सभी रास्ते बंद हो गए हैं ? आखिर क्या वजह है कि देश का एक व्यक्ति भी प्रधानमंत्री से इस बात का जवाब नहीं चाहता कि आखिर पड़ोसी मुल्क के साथ वो कौन से सुधरे रिश्ते बना रहे हैं जो हमारे जवानों की जान पर भारी पड़ रही है। कहां सोए हैं अन्ना हजारे ? बाबा रामदेव को क्या ये खबर नहीं मिली ? वोटों का कोई बड़ा फायदा नहीं होने वाला शायद अरविंद केजरीवाल इसीलिए चुप हैं। 
मेरी सोच और मेरी अभिव्यक्ति, मैं किसी पर थोप नहीं सकता। लेकिन ये भी सच है कि इसे अभिव्यक्त करने से मुझे कोई रोक भी नहीं सकता। हम भीड़तंत्र के सहारे लोकतंत्र को मजबूत बनाने में लगे हुए हैं। खुश हैं कि भीड़ में हम भी शामिल हैं। लेकिन याद रखिएगा कि जो भीड़ से इतर होते हैं पहचान उन्हीं की होती है। दो जवानों की शहादत इस देश के लगभग सवा अरब लोगों के लिए कोइ माएने नहीं रखती। देशभक्ति का जज्बा अब हमारे भीतर महज रस्मी जज्बा है इस बात में भी कोई दो राय नहीं। कोई एक शख्स भी नहीं पहुंचा दिल्ली ये पूछने कि लिए पीएम साहब आप क्यों चुप हैं ? क्या अभी दो-चार और जवानों का सिर पाकिस्तान के सैनिकों को सौंपना चाहता हैं ? क्या हमारे मुल्क की सेनाएं लाचार हैं या फिर आपने उन्हें लाचार बना दिया है ? जवाब तो देना ही होगा पीएम साहब आज नहीं तो कल। जवाब की ये ख्वाहिश अकेली ही सही लेकिन मजबूत जरूर है। 
और हां, भीड़ में शामिल हर उस शख्स के लिए.....................भगत और आजाद कभी इंडिया गेट पर प्रदर्शन नहीं करते। वो असेंबली में धमाके करते हैं। गोरों से आजादी के बाद अब वक्त काले लोगों की गुलामी से मुक्त होने का है। माफ करना हेमराज इस देश के लोग तुम्हारे लिए इंडिया गेट पर नहीं आ सकते।