माफ करना बिटिया रानी, हमारे पास रॉकेट है लेकिन एंबुलेंस नहीं

एक तरफ सोमवार को आंध्रप्रदेश के श्री हरिकोटा से पीएसएलवी सी – 35 की सफल लांचिंग की तस्वीरें आईं तो इसके ठीक 24 घंटे बाद उसी आंध्र प्रदेश से ऐसी तस्वीरें भी आईं जिन्होंने इस देश की चिकित्सा सेवाओं की पोल खोल कर रख दी। श्रीहरिकोटा के लांच पैड पर वैज्ञानिक अपने अब तक के सबसे लंबे मिशन की सफलता की खुशी मना रहे थे तो इसके 24 घंटे बाद यहां से तकरीबन 800 किलोमीटर दूर एक शख्स बारिश से लबालब अपने गांव में अपनी छह महीने की बच्ची की जान बचाने की जद्दोजहद में लगा था। आंध्र के चिंतापल्ली मंडल के कोदुमुसेरा (kudumsare) गांव से आईं इन तस्वीरों में एक सतीबाबू नामक शख्स छह महीने की अपनी बीमार बच्ची को कंधे तक पानी में किसी तरह डाक्टर तक लेकर जा रहा है। दरअसल इस इलाके में भारी बारिश की वजह से पूरा गांव तालाब में तब्दील हो गया है। ऐसे में बुखार में तप रही सतीबाबू की छह महीने की बच्ची को कोई चिकित्सकीय सहायता नहीं उपलब्ध हो पाई। आखिरकार कहीं से कोई रास्ता न निकलता देख ये शख्स खुद ही अपनी बच्ची को लेकर डाक्टर के पास रवाना हो गया। हालांकि गांव के लोगों ने सतीबाबू को ऐसा दुस्साहस करने से रोकने की भी कोशिश की लेकिन सतीबाबू अपनी बेटी को हर हाल में डाक्टर तक जल्द से जल्द पहुंचाना चाहते थे। वहीं इस तस्वीर के सामने आने के बाद एक बार फिर से देश के सुदूर इलाकों में बदहाल स्वास्थ सेवाओं के बारे में चर्चाएं होने लगी हैं। अंतरिक्ष में छलांग लगा रहे देश के गांवों के हालात की हर ओर चर्चा हो रही है। सोशल वेबसाइट्स पर भी इस खबर को खासा शेयर किया जा रहा है। वैसे सतीबाबू की छह महीने की बेटी की तबीयत अब ठीक है और वो खतरे से बाहर है। समय से अस्पताल पहुंच जाने की वजह से बच्ची को इलाज मिल गया।

भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा, मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा



आम आदमी पार्टी के मंत्री संदीप कुमार को लेकर पार्टी के भीतर कुछ ऐसी चर्चाएं चल रहीं हों तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कुमार विश्वास की कविताओं में यकीन रखने वाली पार्टी के नेताओं से यही उम्मीद की जा सकती है। आम आदमी पार्टी के शैशवकाल में ही उसके जन्मदाताओं ने पार्टी की ऐसी की तैसी कर ऱखी है और इसके बाद सुनने सुनाने के लिए पहले से ही कविता तैयार रखी है।
संदीप कुमार, सोमनाथ भारती, जितेंद्र तोमर जैसे नाम न सिर्फ आम आदमी पार्टी के लिए कलंक बन गए हैं बल्कि उस पूरे मिडिल क्लास को तकलीफ दे रहें हैं जो अन्ना के आंदोलन से उम्मीद बांधे हुए थे। अन्ना आंदोलन की बाईप्रोडक्ट आम आदमी पार्टी ने देश के नब्बे फीसदी लोगों की उम्मीदों को यमुना के काले पानी में डुबा कर खत्म कर दिया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने जिस तरह से सुचिता और पारदर्शिता के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाई थी उन सभी का इस पार्टी ने पिंडदान करा दिया।

गैरपरंपरागत राजनीति की शुरुआत करने का दावा करने वाली पार्टी को दिल्ली की जनता ने ऐतिहासिक बहुमत दिया। लगा कि देश में एक नई क्रांति आ रही है। जो शायद मनोज कुमार वाली क्रांति से अलग होगी। लेकिन अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी ने ऐसा बेड़ा गर्क किया कि कहना ही क्या।

वैसे कुमार विश्वास की जिस कविता की एक लाइन को इस लेख के शीर्षक के तौर पर प्रयोग किया गया है आप उस कविता का कुछ हिस्सा और पढ़ लेते तो शायद आम आदमी पार्टी पर इतना भरोसा नहीं करते। लीजिए पढ़ लीजिए –

भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूबकर सुनते थे सब किस्सा मुहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा

कभी कोई जो खुलकर हंस लिया दो पल तो हंगामा
कोई ख़्वाबों में आकर बस लिया दो पल तो हंगामा
मैं उससे दूर था तो शोर था साजिश है , साजिश है
उसे बाहों में खुलकर कस लिया दो पल तो हंगामा

जब आता है जीवन में खयालातों का हंगामा
ये जज्बातों, मुलाकातों हंसी रातों का हंगामा
जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते हैं सब
ये हंगामे की रातें हैं या है रातों का हंगामा

बाप के कांधे पर बेटे की लाश और स्क्रैमजेट इंजन वाला प्रगतिशील भारत


सटीक तो नहीं पता है लेकिन शायद दुनिया में तीसरे या चौथे नंबर की अर्थवस्वस्था वाले देश का अर्धसत्य यही है कि यहां अस्पताल के बाहर बारह साल का एक बच्चा मर जाता है लेकिन उसे इलाज नहीं मिल पाता है। मुझे ये भी सटीक नहीं पता लेकिन शायद दुनिया में पांचवे या छठे नंबर पर अरबपतियों वाले देश में एक शख्स को अपनी पत्नी का शव अपने कांधे पर लादकर 13 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है और उसे एंबुलेंस नहीं मिल पाती। देश के स्क्रैमजेट इंजन की तकनीक विकसित कर लेने का एक पहलु ये भी है कि ट्रेन एक्सीडेंट में मरी एक वृद्धा का शव पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंचाने के लिए उसकी लाश की हड्डियों को पहले तोड़ा जाता है और फिर गठरी बना कर पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाता है।

यकीनी तौर पर देश में ये मुद्दे बहस के लिए पसंद ही नहीं किए जाते। हमारी संवेदनाएं ऐसे मुद्दों पर तब तक नहीं जागती जब तक ऐसी कोई घटना न हो जाए और वो टीवी पर न दिए जाए। ये बात दीगर है कि हम ऐसी हर बहस के बीच में इस बात को स्वीकार करते हैं कि ऐसी न जाने कितनी घटनाएं होती हैं और हमें पता नहीं चलता।

देश में स्वास्थ सेवाओं के हाल बेहद खराब हैं। देश की अस्सी फीसदी जनता भगवान भरोसे चल रही है। आंकड़े बताते हैं कि भारत स्वास्थ पर अपनी जीडीपी का एक फीसदी के आसपास खर्च करता है। अमेरिका जैसे देशों में ये खर्च सत्रह फीसदी के आसपास रहता है। आमतौर पर हम अक्सर प्रगति के पैमाने अमेरिका जैसे देशों को देखकर तय करते हैं लेकिन स्वास्थय सेवाओं में ऐसा नहीं है। हालांकि इस बात का कोई मेल नहीं है लेकिन एक सत्य ये भी है कि भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश है। दुनिया के 14 फीसदी हथियार भारत ही खरीदता है। यानि हथियारों की इस देश में कोई कमी नहीं है लेकिन दवाओं की कमी से मरने वालों का आंकड़ा निकालना भी मुश्किल है।

देश की शहरी आबादी के लिए डोमिनोज और मैकडी का पिज्जा एक फोन कॉल पर उपलब्ध है लेकिन देश की 90 फीसदी ग्रामीण आबादी को मूलभूत चिकित्सा सेवा के लिए भी कम से कम आठ किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। कहने सुनने के लिए बहुतेरी बातें हैं पर मानों हर बार यही लगता है कि बहस लंबी हो गई अब बंद करो। आप इस मसले पर अधिक पढ़ना नहीं चाहते और मेरा लिखना भी मुश्किल है। लीजिए बंद कर रहा हूं तब तक, जब तक फिर कोई दाना मांझी न मिले। आइए जश्न मनाएं इस बीमार विकास का।

ट्विटर, बीएमडब्लू और आठ लाख की साड़ियों के बीच दाना मांझी कहां रहा

देश में बहस मुहाबिसों के दौर छोटे, संकीर्ण और संकुचित हो गए हैं। हमारी सोच एक दिन या फिर अधिकतम दो दिनों तक हमारे साथ ठहरती है। वो भी फेसबुक और ट्विटर के ट्रेंड को फालो करते हुए। कितनी हैरानी होती है कि हम दाना मांझी की दारुण कथा को देख-सुन कर दुखी तो होते हैं लेकिन चूंकि दाना मांझी ट्विटर पर ट्रेंड नहीं करता लिहाजा समाज में बहस का मुद्दा नहीं बन पाता। फेसबुक और गूगल में ट्रेंड नहीं करता लिहाजा धारा से अलग हो जाता है दाना मांझी, कालाहांडी और इस देश में गरीब होने के तमगे के साथ जी रहा इंसान।

देश बीएमडब्लू का जश्न मना रहा है। आठ लाख की साड़ियां खरीदे जाने पर सोशल नेटवर्किंग साइट्स चहक रहीं हैं। दाना सिसक रहा है। चौला अपनी मां की याद को अपने टूटे घर की टपकती छत से बचा कर सहेजना चाहती है। वो 12 साल की उम्र में 13 किलोमीटर का ऐसा रास्ता तय कर चुकी है जो उसे कभी पीवी सिंधू नहीं बनाएगा। वो कभी साक्षी मलिक नहीं बनेगी। हो सकता है वो कालाहांडी में सिसकती कौम का हिस्सा जरूर बन कर रह जाए।  

आखिर हम उम्मीद भी क्यों करें। हमारे घरों में पिज्जा गरम पहुंच रहें हैं लिहाजा हमें दाना मांझी के लिए एंबुलेंस की बहुत चिंता नहीं होती। हां, इतना जरूर है कि हम दाना मांझी और उसकी बेटी के लिए फौरी तौर पर चिंता जता देते हैं। क्योंकि सोशल साइट्स पर इससे जुड़ी चर्चा चल रही होती है। लेकिन इस सबके बीच हमें ये याद रहता है कि हमारा पिज्जा समय से हमारे घर डिलिवर हुआ भी या नहीं।

यही देश है मेरा। हमारे लिए मौत तब तक मौत नहीं होती जब तक हम अपने कंधे पर लाश का बोझ न महसूस करें। वैसे कालाहांडी में पिज्जा डिलीवरी है क्या?  

...तो साक्षी का पदक सिंधु के पदक से कीमती है

भारत के लिए रियो ओलंपिक में चांदी का पदक लाने वाली पी वी सिंधु की सफलता के पीछे उनके समाज का भी योगदान माना जा सकता है। सिंधु देश के दक्षिण में बसे शहर हैदराबाद से आती हैं। देश का ये इलाका सेक्स रेशियो और चाइल्ड सेक्स रेशियो के लिहाज से देश के अन्य हिस्सों से कहीं बेहतर स्थिती में है। 2011 का सेंसस बताता है कि आंध्र प्रदेश देश में सेक्स रेशियो के क्रम में चौथे नंबर पर है। यहां प्रति 1000 पुरुषों की तुलना में 993 महिलाएं हैं। ये एक सुखद स्थिती कही जा साकती है यदि आप देश के अन्य राज्यों के हाल देखें। 
इनमें से कई राज्य तो ऐसे हैं जिन्हें हम बेहद विकसित राज्य के तौर पर मानते हैं। मसलन आप पंजाब और हरियाणा का उदाहरण ले सकते हैं। पंजाब में सेक्स रेशियो 895 है। यानि प्रति 1000 पुरुषों पर महज 895 महिलाएं ही हैं। हालांकि कन्या भ्रूण हत्या को लेकर हरियाणा की चर्चा पहले भी कई बार हो चुकी है लेकिन फिर भी ये एक बार याद किया जा सकता है कि हरियाणा में 2011 के सेंसस के मुताबिक प्रति 1000 पुरुषों पर महज 879 महिलाएं हैं। ये बात और है कि हरियाणा की एक बहादुर लड़की भी रियो ओलंपिक से एक कांस्य पदक लेकर लौटी है। ऐसे में इस बात को समझा जा सकता है कि हरियाणा के समाज में एक लड़की होना और खेलों में कैरियर बनाना कितना मुश्किल काम है। साक्षी मलिक ने जाने अनजाने इस मुश्किल को महसूस तो किया ही होगा। हालांकि उनके रियो में पदक जीतने के बाद शायद ये चर्चा का विषय न रह जाए लेकिन इस लिहाज से ये कहा जा सकता है कि साक्षी का पदक, सिंधू के पदक की तुलना में कहीं अधिक कीमती है। 

देश के बड़े राज्य यूपी, बिहार और गुजरात का हाल भी अच्छा नहीं कहा जा सकता। यूपी में 912, बिहार में 918 तो गुजरात में सेक्स रेशियो 919 तक पहुंचा है। शायद यही वजह रही होगी कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सेल्फी विथ डॉटर जैसे कैंपेन को इंडोर्स करना पड़ गया। ये जरूर है कि हालात के बेहतर होने की उम्मीद बंधी है लेकिन अब भी ये नहीं कहा जा सकता है कि हम सिंधू और साक्षी को कोख में नहीं मारेंगे। उम्मीद करेंगे कि आगे होने ओलंपिक खेलों में हम कुछ और सिंधु और साक्षी भेज पाएं। 

जो सीखा सत्तर सालों में

पिछले कुछ सालों में देश के हालात तेजी से बदले हैं। कई ऐसी चीजें हुईं जो देश में पहली बार इतने बड़े आयाम पर नजर आ रही हैं। देश अब राष्ट्रभक्तों और कथित राष्ट्रभक्तों की श्रेणी में बंट चुका है। एक गाय को माता मानने वाला समाज है और एक बीफ वाला समाज है। मुल्क की आजादी के सत्तर सालों में हम अखलाक और आजाद की आजादी को अब अलग अलग नजरिए से देखने की स्थिती में आ चुके हैं। पिछले सत्तर सालों में हम इतना ही विकास कर पाए कि पंद्रह अगस्त को हम फ्रिज में रखे मटन और बीफ से लेकर गाय के रक्षकों और गाय के मांस के कारोबारियों के बारे में अपना मत बना पाएं। ये देश के शायद नब्बे के दशक में लौटने की शुरुआत है जब देश में सिर्फ और सिर्फ राम मंदिर की बातें हुआ करती थीं। या फिर हम नब्बे के दशक में लौटकर अस्सी के दशक में लौटना चाहते हैं जब हम प्रधानमंत्री की हत्या करने वाले शख्स की पूरी कौम को ही मारने दौड़ पड़े थे। शायद इतिहास के काल खंड में पीछे जाने की हमारी उत्तेजना हमें अस्सी के दशक से भी पीछे उन अमानवीय क्षणों में ले जाना चाहती है जब जमीन पर खिंची एक लकीर मानवीय इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन को देखकर समय स्वयं कराह रहा था। 
पिछले सत्तर सालों में हमने इतनी ही तरक्की की है कि हमने अपने दुर्गुणों को सहेज कर रखना सीख लिया है। हम भूलने की कोशिश भी नहीं करना चाहते, भूल जाना तो दूर की बात है। अब हम इक्कीसवीं सदी की बात करने में रुचि नहीं रखते। हमें इस बात में भी रुचि नहीं होती कि हमारे देश का भविष्य और बेहतर कैसे होगा। इससे अधिक आवश्यक ये है कि हम ये याद करें कि फलां ने राष्ट्रगान गाया और फलां ने नहीं गाया। देश के सत्तर सालों में विकास का हाल ये है कि हमने इतिहास में पीछे जाने की कला को अगली पीढ़ियों में सौंपना भी सीख लिया है। 
पिछले सत्तर सालों में हमारी सत्ता का विकास ऐसा हुआ कि हमने सत्ता के लिए हर हद को पार करना सीख लिया। सत्ता की सार्थकता हमने अपने व्यक्तिगत हितो तक सीमित कर ली और हम अब इसी में खुश हैं। सत्ता की व्यापकता और जन के प्रति सार्थकता से हमारा कोई लेना देना नहीं है। 
पिछले सत्तर सालों में हमने एक दूसरे पर शक करना भी सीख लिया। अब हम एक दूसरे पर आसानी से उंगलियां उठा सकते हैं। हमारे पास तर्कों की संक्रीणता विकसित करने की कला आ चुकी है। अब हम कुतर्कों के आधार पर भी विमर्श और निर्णयों के लिए स्वतंत्र हैं। 
इतना भर ही रह गया है हमारा देश। हम शायद इसी में खुश भी हैं। 

मनमोहन ने केजरी दिया, मोदी, कन्हैया देंगे !

याद कीजिए वो दौर जब मनमोहन सिंह की सरकार पर लग रहे भ्रष्ट्राचार के आरोपों के बीच देश में एक पारदर्शी सरकार बनाने के लिए रालेगांव के अन्ना के नेतृत्व में जनसमूह उमड़ पड़ा था। भारत के लोकतंत्र ने विचारों का ऐसा प्रवाह पहली बार देखा था। पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि देश में सिर्फ भीड़ नहीं रहती। सैंतालिस का संग्राम से चूकी पीढ़ी को पहली बार ये एहसास हुआ कि इस देश में लोकतंत्र है तो क्यों है, क्यों हमें संविधान निर्माताओं ने ऐसा मंच दिया। इस देश की आजाद पीढ़ी ने पहली बार समझा कि लोकतंत्र में विचारों के सहारे, बहस के जरिए बेहतरी की राह निकाली जा सकती है...हालांकि ये सच है कि इस युवा पीढ़ी को ये राह दिखाने वाला एक बुजुर्ग ही था और सच ये भी है कि अन्ना के आंदोलन से जिस निहितार्थ की उम्मीद थी वो पूरी तो नहीं हुई लेकिन एक उम्मीद सी जरूर बंध गई....लगा कि अब इस देश में खुलकर भ्रष्ट्राचार के खिलाफ आवाज उठाई जा सकती है....
लेखपाल, पटवारी, मुंशी, बाबू, दरोगा, सिपाही....हम कितने जकड़े थे.....हालांकि आज भी ये बेड़ियां टूटीं तो नहीं हैं लेकिन ढीली तो हुईं हैं...28 – 30 साल का युवा जिस घुटन को महसूस कर रहा है वो कम सी लगने लगी है...
अन्ना के आंदोलन का शुरुआत में कोई राजनीतिक परिणाम समझ में नहीं आता था लेकिन समय बीतने के साथ विचारों के भेद ने देश को एक नया राजनीतिक विकल्प दे दिया... मनमोहन सरकार की नाकामियों और अन्ना आंदोलन की सफलता ने आम आदमी पार्टी की राजनीति को रफ्तार दे दी...ये साफ है कि अरविंद केजरीवाल टाइप राजनीति के जनक जितने अन्ना हैं उतना ही मनमोहन सरकार है...
लोकतंत्र में बेहतर गवर्नेंस की कोशिश में जनता हमेशा लगी रहती है...देश को बेहतर तौर पर चलाने के बारे में जितना मंथन देश की आम जनता करती है उतना तो देश की संसद भी नहीं करती...हालांकि इस बात में भी कोई दो राय नहीं है कि बेहतरी की उम्मीद में जनता अतिश्योक्तियों पर भी भरोसा करने लगी है...नरेंद्र मोदी बेहतर विकल्प थे या नहीं ये पांच सालों बाद ही तय हो पाएगा लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं कि चुनावी सभाओं में नरेंद्र मोदी जब बोलते थे तो लगता था कि वो वही बोल रहे हैं जो हम सुनना चाह रहे हैं...लेकिन सरकार बनने के दो सालों बाद ही न जाने क्यों ये लगने लगा कि मोदी सरकार वो सबकुछ नहीं कर रही है जिसकी हम उससे उम्मीद कर रहे थे...
मोदी सरकार के बनने के दो सालों में कई ऐसी बहसें भी देश की मुख्य धारा में आ गईं जिनकी उम्मीद देश का पढ़ा लिखा तबका नहीं कर रहा था...देश के इस तबके को विरोध जताने की इच्छा हुई और रास्ता कन्हैया जैसों से मिलता नजर आ रहा है...हां, ये जरूर है कि जिस विरोध के प्याले को मनमोहन सिंह की सरकार ने दस सालों में जनता को पिलाया उसे नरेंद्र मोदी की सरकार ने दो सालों में जनता को पूरा पिला दिया...
इस बात को दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि कन्हैया का राजनीतिक लक्ष्य क्या होगा लेकिन अगर कन्हैया को प्रतीक के तौर पर लिया जाए तो इस बात की पूरी संभावना है कि जिस तरह मनमोहन सरकार ने अरविंद केजरीवाल दिया उसी तरह से मोदी सरकार कन्हैया को देगी....

कन्हैया को लेकर भावुक होने और उसके साथ खड़े होने से पहले हमें ये समझना होगा कि हम भारतीय राजनीति को लेकर लक्ष्यों को बेहद करीब में रख लेते हैं...ऐसी प्रवृति मेरी समझ में लोकतंत्र की गंभीरता और टिकाऊपन के लिए ठीक नहीं है....हालांकि इन सब बहसों के बीच न जाने क्यों कन्हैया वही सब बोल रहा है जिसे कहने की हम कोशिश कर रहे थे और जिसे सुनना हमें अच्छा लग रहा है....

केजरी बाबा का एसएमएस पैक खत्म हो गया क्या !

चुनाव से पहले हर बात के लिए जनता से एसएमएस मंगाने वाले स्वघोषित महापुरुष अरविंद केजरीवाल का एसएमएस पैक अब खत्म हो गया है। अब उनके पास जनता का एसएमएस पढ़ने का समय नहीं है। यही वजह है कि अब अरविंद केजरीवाल वैट प्रतिशत बढ़ाने से पहले जनता से राय शुमारी नहीं करते। यही वजह है कि अपने प्रचार पर 526 करोड़ रुपए खर्च करने से पहले वो जनता से नहीं पूछते। जाहिर है कि अरविंद केजरीवाल भी उसी रास्ते पर चल चुके हैं जिस पर देश के अन्य राजनीतिक दल चल रहे हैं। मुलभूत प्रश्न ये है कि क्या अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के साथ विश्वासघात किया है या फिर दिल्ली की जनता का राजनीतिक प्रयोग अब धीरे धीरे गलत साबित होने लगा है।

अरविंद केजरीवाल ने भारतीय जनमानस के उस साठ फीसदी हिस्से में उम्मीद की अलख जगाई जिसे हम युवा कहते हैं। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था की गहरी जानकारी रखने वालों को अरविंद केजरीवाल से कोई बड़ी उम्मीद पहले से ही नहीं थी लेकिन फिर भी अरविंद केजरीवाल को लोग एक बार देखना चाहते थे। अरविंद केजरीवाल की जनसभाओं में युवाओं ने बड़ी संख्या में शिरकत की। कइयों ने अपनी अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ कर अरविंद का साथ पकड़ा और वालंटियर बन गए। इन सब को अरविंद केजरीवाल से यही उम्मीद थी कि आम आदमी पार्टी की सरकार सही माएनों में आम आदमी की ही सरकार होगी। राजनीतिक सुचिता का सपना सभी की आंखों में एक बार फिर से तैरने लगा था। अरविंद केजरीवाल चूंकि अन्ना के मंच से निकलकर आए थे लिहाजा लोगों को अरविंद केजरीवाल पर भरोसा था लेकिन पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ उससे अरविंद केजरीवाल ने अपने ही वादों को गलत साबित कर दिया है।

अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी को वैसे ही चला रहे हैं जैसे बहुजन समाज पार्टी को काशीराम ने चलाया और मायावती चला रहीं हैं। आम आदमी पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र मजबूत है इस बात को लेकर सभी को संशय है। अरविंद केजरीवाल के विधायकों के कृत्य तो सभी के सामने आ गए हैं। साफ हो चुका है कि अरविंद केजरीवाल अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी सख्त हिदायत नहीं दे पाए बेईमानी से बचने की। अरविंद केजरीवाल अपने स्वार्थी साथियों के साथ काम करते रहे और उन्हें भनक नहीं लगी।

अरविंद केजरीवाल ने अपने और अपनी सरकार के प्रचार पर शुरुआती दौर में ही 526 करोड़ रुपए खर्च कर डाले। हैरान करने वाली बात ये कि अरविंद केजरीवाल ने इस भारी भरकम खर्च को राज्य के अन्य विभागों के बजट को काट कर किया है। जाहिर है कि सरकार के अन्य विभागों के पास अपनी योजनाओं का प्रचार प्रसार करने के लिए बजट कम पड़ जाएगा। अरविंद केजरीवाल का प्रचार अभियान तार्किक रूप से भी सही नहीं बैठता। यदि अलग अलग विभाग अपनी अपनी योजनाओं का प्रचार करते तो बेहतर और व्यापक संदेश प्रसारित करते लेकिन शायद उसमें अरविंद केजरीवाल को इतना मौका नहीं मिलता। विभागों के जरिए प्रचार में केंद्र सरकार को कोसने का मौका भी अरविंद केजरीवाल के हाथ नहीं आता लिहाजा अरविंद केजरीवाल ने विभागों का बजट कम किया और अपना गुणगान शुरू कर दिया।


अब सवाल ये उठता है कि क्या 526 करोड़ का भारी भरकम बजट खर्च करना अरविंद केजरीवाल के लिए जरूरी था। बात बात में जनमन संग्रह कराने की सलाह देने वाले अरविंद केजरीवाल ने 526 करोड़ खर्च करने से पहले एक बार भी जनता से पूछने की जहमत क्यों नहीं उठाई। क्या अब अरविंद केजरीवाल को जनता से डर लगने लगा है। 

जनता करेगी फाइव फिंगर टेस्ट, तब देखेंगे केजरी बाबू...

मानिए या न मानिए लेकिन एहसास दिल्ली को हो रहा होगा कि अरंविद केजरीवाल को इतना बड़ा जनमत देना उनकी भूल थी। दिल्ली के विकास के लिए छटपटाने का दावा कर रहे अरविंद केजरीवाल का जितना ध्यान मनपसंद अफसरों की तैनाती करने, कांग्रेस की गलतियां गिनने और उपराज्यपाल से विवाद में है उसका आधा भी वो सही माएने में दिल्ली पर देते तो सूरत के बदल जाने का एहसास होने लगता। हैरानी होती है अरविंद केजरीवाल को देखकर। दिल्ली अपनी आने वाली पीढ़ियों को ये कैसे बता पाएगी कि उसके अरविंद केजरीवाल को चुनने की वजह क्या थी। सवाल ये भी उठेगा कि अरविंद केजरीवाल को बदलने से दिल्ली क्यों नहीं रोक पाई और इस प्रयोग से दिल्ली को मिला क्या।

सरकार में आते ही अरविंद केजरीवाल की सरकार ने पूरा ध्यान कांग्रेस सरकार की गलतियों तलाशनें में लगा दिया। हालात ये हैं कि अभी तक दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की सरकार अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान होने वाले विकास कार्यों का खाका सार्वजनिक नहीं कर पाई है। अफसरों की तैनाती के विवाद इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल की सरकार का ध्यान अपने मुताबिक अफसरों की तैनाती पर अधिक है। हम ये मान सकते हैं कि अफसरों के कुनबे का कुछ हिस्सा जनता के साथ जुड़ाव न रखता हो लेकिन सभी अफसर बेकार हैं ये मानना मुश्किल है। अफसरों की इसी फौज ने दिल्ली की सूरत को खूबसूरत बनाया है। ऐसे में अरविंद अफसरों से इतने नाराज क्यों है ये समझ से परे है। अरविंद केजरीवाल में एक अच्छा प्रशासक होता तो बेईमान अफसर भी ईमानदारी से काम करने के लिए बाध्य होता।

अरविंद केजरीवाल के पास मौका था लेकिन वो स्वयं को औरों से अलग साबित करने में असफल होते नजर आ रहे हैं। जंतर मंतर में उनकी मौजूदगी में किसान की आत्महत्या ने भी समाज में उनके मौका परस्त हो रहे व्यवहार को साबित किया है। आंदोलन में अरविंद के खास सहयोगी रहे योगेंद्र यादव को जिस तरह से पार्टी ने किनारे किया उस कार्रवाई को सभी ने हिटलरशाही की ही संज्ञा दी क्योंकि यही मुफीद लगा। इस देश के कई मौका परस्त नेताओं और पार्टियों की ही तरह अब अरविंद केजरीवाल भी राजनीतिक तरण ताल में अर्द्ध नग्न तो नजर आने ही लगे हैं।

अरविंद केजरीवाल के कानून मंत्री की करनी को उदाहरण के तौर पर लें तो साफ होता है कि केजरी बाबू के इर्द गिर्द झूठ का कारोबार सीना ठोंक कर हो रहा है। अरविंद केजरीवाल अपने सहयोगियों को भी ये संदेश देने में नाकाम रहे हैं कि आप की ईमानदारी पर दाग बर्दाश्त नहीं है।

सुचिता के साथ चलने वाली पारदर्शक सत्ता व्यवस्था जनता का दिल बहुत जल्दी जीत सकती है। भारतीय लोकतंत्र की यही खूबी है। भारतीय लोकतंत्र सत्ता को दण्डित करने में भी सक्षम है। अरविंद केजरीवाल की 67 सीटों वाली सत्ता का भी दिल्ली की जनता पांच साल बाद फाइव फिंगर टेस्ट करेगी। जिस टू फिंगर टेस्ट से केजरी बाबू की सत्ता का चरित्र पता चल रहा है कहीं फाइव फिंगर टेस्ट में वो चरित्र पूर्णरुपेण सत्य न साबित हो जाए। संभलिए, केजरी बाबू।