हम बुलेट ट्रेन में बैठकर पुखरायां से होकर गुजर जाएंगे, मरने वाले तो मर ही गए।

ये अच्छा है कि देश बुलेट ट्रेन में बैठकर रेल का सफर करने के सपने देख रहा है या शायद राजनीतिक नींद या राजनीतिक बेहोशी के हाल में देश को ये सपना दिखाया जा रहा है। अच्छा है कि देश सपना देख रहा है। हालांकि ऐसे सपने देखने के लिए आंखों की जरूरत नहीं होती और आंखों में रोशनी की जरूरत भी नहीं होती है। लिहाजा अंधे भी ऐसे सपनों को बिना भेदभाव के देख सकते हैं।

हम अक्सर इस बात को लेकर खुशी से फूले नहीं समाते हैं कि हमारे पास दुनिया के बड़े रेल नेटवर्क में से एक नेटवर्क है। हालांकि ये बात भी सच है कि दुनिया के किसी देश के प्लेटफार्म पर आपको जानवरों में सांड, कुत्ता, गाय, बंदर और इंसानों में भिखारी, कुष्ठ रोगी, पागल सबके दर्शन एक साथ हो जाएं। आप चाहें तो इस उपलब्धि के लिए भी अपना हाथ अपनी पीठ पर ले जाकर उसे थपाथपा सकते हैं। हाथ न पहुंचे तो किसी दोस्त का सहयोग ले सकते हैं।

दुनिया के इस बड़े रेल तंत्र की तल्ख सच्चाई यही है कि यहां रेल दुर्घटनाओं के बाद सिर्फ और सिर्फ जांच कमेटी बैठाई जाती है। ये जांच कमेटी बैठ कर कब उठती है, क्या करती है, कितने लोगों को उठाती है, कितनों को बैठाती है ये किसी को नहीं पता। इस उठक बैठक में हम अक्सर ये भी भूल जाते हैं कि कोई कमेटी भी बनाई गई थी। रेल नेटवर्क को संचालित करने वाला तंत्र इस कमेटी की जांच से क्या सीख लेता है ये देश की आम जनता को नहीं पता है।

एक मोटे आंकड़े के मुताबिक रेलवे में हादसों को न्यूनतम करने के लिए तकरीबन एक लाख कर्मियों की नियुक्ति करने की आवश्यकता है। एक अंग्रेजी अखबार के दावों के मुताबिक देश में एक लाख बारह हजार किलोमीटर लंबे रेल नेटवर्क में पिछले तीन वर्षों में 50 फीसदी हादसे डीरेलमेंट की वजह से हुए हैं। इनमें से 29 फीसदी के करीब रेल लाइन के दुरुस्त न होने की वजह से हुए। जानकार बताते हैं कि देश में रेल सुरक्षा को लेकर सरकारें गंभीर नहीं रहीं हैं। रेल हादसों को रोकने के लिए सुझाए गए कई सुझावों को धरातल पर उतारने की कोशिश नहीं की गई है। 2012 में काकोदर कमेटी की सिफारशों को भी पूरी तरह नहीं माना गया है। गौरतलब है कि काकोदर कमेटी ने 2012 में ट्रेन के सफर को सुरक्षित बनाने के लिए कई सुझाव दिए थे।

फिलहाल एक ढर्रे पर चल रही ट्रेन में सुरक्षित सफर की उम्मीदों के सच का अर्द्ध सत्य यही है कि हम भगवान भरोसे चलती ट्रेनों में एक चादर, प्लास्टिक की एक चटाई और एक कंबल के साथ चढ़ तो जाते हैं लेकिन हमें ये नहीं पता होता कि सफर के अंत में हम खुद उतरेंगे या फिर हमें उतारा जाएगा। फिर भी खुश हो लीजिए क्योंकि आप बुलेट ट्रेन के सपने देख सकते हैं और सपने देखने के लिए आंखे खुली रखने की जरूरत नहीं होती। कर लीजिए आंखें बंद, पुखरायां गुजर जाएगा।

उठती आवाजों से तसल्ली, वक्त बदलेगा जरूर

ये अच्छा है कि हमारा समाज महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए चर्चा तो कर रहा है लेकिन दुखद ये है कि हमारी चर्चाओं औऱ कोशिशों के बावजूद हमारे ही समाज का एक हिस्सा महिलाओं के साथ अत्याचार करता ही आ रहा है। पता नहीं लेकिन कभी कभी लगता है कि ये अत्याचार पारंपरिक रवायतों के हिस्से तो नहीं हो गए। या फिर पुरुषवादी मानसिकता को ऊपर रखने की कोशिश। कुछ भी हो लेकिन समाज को बदलने में वक्त लगेगा और उम्मीद ही कर सकते हैं कि समाज बदलेगा तो जरूर।
सुखद लगता है कि जब महिलाएं इस बारे में
मुखर होकर बोलती और आवाज उठाती हैं। पूजा बतुरा भी आवाज उठाने वालों में से एक हैं। एक छोटी सी फिल्म और एक लंबी कहानी। यू ट्यूब लिंक साझा कर रहा हूं शायद आपका देखना भी महिला अधिकारों का समर्थन करना होगा।
 

माफ करना बिटिया रानी, हमारे पास रॉकेट है लेकिन एंबुलेंस नहीं

एक तरफ सोमवार को आंध्रप्रदेश के श्री हरिकोटा से पीएसएलवी सी – 35 की सफल लांचिंग की तस्वीरें आईं तो इसके ठीक 24 घंटे बाद उसी आंध्र प्रदेश से ऐसी तस्वीरें भी आईं जिन्होंने इस देश की चिकित्सा सेवाओं की पोल खोल कर रख दी। श्रीहरिकोटा के लांच पैड पर वैज्ञानिक अपने अब तक के सबसे लंबे मिशन की सफलता की खुशी मना रहे थे तो इसके 24 घंटे बाद यहां से तकरीबन 800 किलोमीटर दूर एक शख्स बारिश से लबालब अपने गांव में अपनी छह महीने की बच्ची की जान बचाने की जद्दोजहद में लगा था। आंध्र के चिंतापल्ली मंडल के कोदुमुसेरा (kudumsare) गांव से आईं इन तस्वीरों में एक सतीबाबू नामक शख्स छह महीने की अपनी बीमार बच्ची को कंधे तक पानी में किसी तरह डाक्टर तक लेकर जा रहा है। दरअसल इस इलाके में भारी बारिश की वजह से पूरा गांव तालाब में तब्दील हो गया है। ऐसे में बुखार में तप रही सतीबाबू की छह महीने की बच्ची को कोई चिकित्सकीय सहायता नहीं उपलब्ध हो पाई। आखिरकार कहीं से कोई रास्ता न निकलता देख ये शख्स खुद ही अपनी बच्ची को लेकर डाक्टर के पास रवाना हो गया। हालांकि गांव के लोगों ने सतीबाबू को ऐसा दुस्साहस करने से रोकने की भी कोशिश की लेकिन सतीबाबू अपनी बेटी को हर हाल में डाक्टर तक जल्द से जल्द पहुंचाना चाहते थे। वहीं इस तस्वीर के सामने आने के बाद एक बार फिर से देश के सुदूर इलाकों में बदहाल स्वास्थ सेवाओं के बारे में चर्चाएं होने लगी हैं। अंतरिक्ष में छलांग लगा रहे देश के गांवों के हालात की हर ओर चर्चा हो रही है। सोशल वेबसाइट्स पर भी इस खबर को खासा शेयर किया जा रहा है। वैसे सतीबाबू की छह महीने की बेटी की तबीयत अब ठीक है और वो खतरे से बाहर है। समय से अस्पताल पहुंच जाने की वजह से बच्ची को इलाज मिल गया।

भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा, मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा



आम आदमी पार्टी के मंत्री संदीप कुमार को लेकर पार्टी के भीतर कुछ ऐसी चर्चाएं चल रहीं हों तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कुमार विश्वास की कविताओं में यकीन रखने वाली पार्टी के नेताओं से यही उम्मीद की जा सकती है। आम आदमी पार्टी के शैशवकाल में ही उसके जन्मदाताओं ने पार्टी की ऐसी की तैसी कर ऱखी है और इसके बाद सुनने सुनाने के लिए पहले से ही कविता तैयार रखी है।
संदीप कुमार, सोमनाथ भारती, जितेंद्र तोमर जैसे नाम न सिर्फ आम आदमी पार्टी के लिए कलंक बन गए हैं बल्कि उस पूरे मिडिल क्लास को तकलीफ दे रहें हैं जो अन्ना के आंदोलन से उम्मीद बांधे हुए थे। अन्ना आंदोलन की बाईप्रोडक्ट आम आदमी पार्टी ने देश के नब्बे फीसदी लोगों की उम्मीदों को यमुना के काले पानी में डुबा कर खत्म कर दिया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने जिस तरह से सुचिता और पारदर्शिता के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाई थी उन सभी का इस पार्टी ने पिंडदान करा दिया।

गैरपरंपरागत राजनीति की शुरुआत करने का दावा करने वाली पार्टी को दिल्ली की जनता ने ऐतिहासिक बहुमत दिया। लगा कि देश में एक नई क्रांति आ रही है। जो शायद मनोज कुमार वाली क्रांति से अलग होगी। लेकिन अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी ने ऐसा बेड़ा गर्क किया कि कहना ही क्या।

वैसे कुमार विश्वास की जिस कविता की एक लाइन को इस लेख के शीर्षक के तौर पर प्रयोग किया गया है आप उस कविता का कुछ हिस्सा और पढ़ लेते तो शायद आम आदमी पार्टी पर इतना भरोसा नहीं करते। लीजिए पढ़ लीजिए –

भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूबकर सुनते थे सब किस्सा मुहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा

कभी कोई जो खुलकर हंस लिया दो पल तो हंगामा
कोई ख़्वाबों में आकर बस लिया दो पल तो हंगामा
मैं उससे दूर था तो शोर था साजिश है , साजिश है
उसे बाहों में खुलकर कस लिया दो पल तो हंगामा

जब आता है जीवन में खयालातों का हंगामा
ये जज्बातों, मुलाकातों हंसी रातों का हंगामा
जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते हैं सब
ये हंगामे की रातें हैं या है रातों का हंगामा

बाप के कांधे पर बेटे की लाश और स्क्रैमजेट इंजन वाला प्रगतिशील भारत


सटीक तो नहीं पता है लेकिन शायद दुनिया में तीसरे या चौथे नंबर की अर्थवस्वस्था वाले देश का अर्धसत्य यही है कि यहां अस्पताल के बाहर बारह साल का एक बच्चा मर जाता है लेकिन उसे इलाज नहीं मिल पाता है। मुझे ये भी सटीक नहीं पता लेकिन शायद दुनिया में पांचवे या छठे नंबर पर अरबपतियों वाले देश में एक शख्स को अपनी पत्नी का शव अपने कांधे पर लादकर 13 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है और उसे एंबुलेंस नहीं मिल पाती। देश के स्क्रैमजेट इंजन की तकनीक विकसित कर लेने का एक पहलु ये भी है कि ट्रेन एक्सीडेंट में मरी एक वृद्धा का शव पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंचाने के लिए उसकी लाश की हड्डियों को पहले तोड़ा जाता है और फिर गठरी बना कर पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाता है।

यकीनी तौर पर देश में ये मुद्दे बहस के लिए पसंद ही नहीं किए जाते। हमारी संवेदनाएं ऐसे मुद्दों पर तब तक नहीं जागती जब तक ऐसी कोई घटना न हो जाए और वो टीवी पर न दिए जाए। ये बात दीगर है कि हम ऐसी हर बहस के बीच में इस बात को स्वीकार करते हैं कि ऐसी न जाने कितनी घटनाएं होती हैं और हमें पता नहीं चलता।

देश में स्वास्थ सेवाओं के हाल बेहद खराब हैं। देश की अस्सी फीसदी जनता भगवान भरोसे चल रही है। आंकड़े बताते हैं कि भारत स्वास्थ पर अपनी जीडीपी का एक फीसदी के आसपास खर्च करता है। अमेरिका जैसे देशों में ये खर्च सत्रह फीसदी के आसपास रहता है। आमतौर पर हम अक्सर प्रगति के पैमाने अमेरिका जैसे देशों को देखकर तय करते हैं लेकिन स्वास्थय सेवाओं में ऐसा नहीं है। हालांकि इस बात का कोई मेल नहीं है लेकिन एक सत्य ये भी है कि भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश है। दुनिया के 14 फीसदी हथियार भारत ही खरीदता है। यानि हथियारों की इस देश में कोई कमी नहीं है लेकिन दवाओं की कमी से मरने वालों का आंकड़ा निकालना भी मुश्किल है।

देश की शहरी आबादी के लिए डोमिनोज और मैकडी का पिज्जा एक फोन कॉल पर उपलब्ध है लेकिन देश की 90 फीसदी ग्रामीण आबादी को मूलभूत चिकित्सा सेवा के लिए भी कम से कम आठ किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। कहने सुनने के लिए बहुतेरी बातें हैं पर मानों हर बार यही लगता है कि बहस लंबी हो गई अब बंद करो। आप इस मसले पर अधिक पढ़ना नहीं चाहते और मेरा लिखना भी मुश्किल है। लीजिए बंद कर रहा हूं तब तक, जब तक फिर कोई दाना मांझी न मिले। आइए जश्न मनाएं इस बीमार विकास का।

ट्विटर, बीएमडब्लू और आठ लाख की साड़ियों के बीच दाना मांझी कहां रहा

देश में बहस मुहाबिसों के दौर छोटे, संकीर्ण और संकुचित हो गए हैं। हमारी सोच एक दिन या फिर अधिकतम दो दिनों तक हमारे साथ ठहरती है। वो भी फेसबुक और ट्विटर के ट्रेंड को फालो करते हुए। कितनी हैरानी होती है कि हम दाना मांझी की दारुण कथा को देख-सुन कर दुखी तो होते हैं लेकिन चूंकि दाना मांझी ट्विटर पर ट्रेंड नहीं करता लिहाजा समाज में बहस का मुद्दा नहीं बन पाता। फेसबुक और गूगल में ट्रेंड नहीं करता लिहाजा धारा से अलग हो जाता है दाना मांझी, कालाहांडी और इस देश में गरीब होने के तमगे के साथ जी रहा इंसान।

देश बीएमडब्लू का जश्न मना रहा है। आठ लाख की साड़ियां खरीदे जाने पर सोशल नेटवर्किंग साइट्स चहक रहीं हैं। दाना सिसक रहा है। चौला अपनी मां की याद को अपने टूटे घर की टपकती छत से बचा कर सहेजना चाहती है। वो 12 साल की उम्र में 13 किलोमीटर का ऐसा रास्ता तय कर चुकी है जो उसे कभी पीवी सिंधू नहीं बनाएगा। वो कभी साक्षी मलिक नहीं बनेगी। हो सकता है वो कालाहांडी में सिसकती कौम का हिस्सा जरूर बन कर रह जाए।  

आखिर हम उम्मीद भी क्यों करें। हमारे घरों में पिज्जा गरम पहुंच रहें हैं लिहाजा हमें दाना मांझी के लिए एंबुलेंस की बहुत चिंता नहीं होती। हां, इतना जरूर है कि हम दाना मांझी और उसकी बेटी के लिए फौरी तौर पर चिंता जता देते हैं। क्योंकि सोशल साइट्स पर इससे जुड़ी चर्चा चल रही होती है। लेकिन इस सबके बीच हमें ये याद रहता है कि हमारा पिज्जा समय से हमारे घर डिलिवर हुआ भी या नहीं।

यही देश है मेरा। हमारे लिए मौत तब तक मौत नहीं होती जब तक हम अपने कंधे पर लाश का बोझ न महसूस करें। वैसे कालाहांडी में पिज्जा डिलीवरी है क्या?  

...तो साक्षी का पदक सिंधु के पदक से कीमती है

भारत के लिए रियो ओलंपिक में चांदी का पदक लाने वाली पी वी सिंधु की सफलता के पीछे उनके समाज का भी योगदान माना जा सकता है। सिंधु देश के दक्षिण में बसे शहर हैदराबाद से आती हैं। देश का ये इलाका सेक्स रेशियो और चाइल्ड सेक्स रेशियो के लिहाज से देश के अन्य हिस्सों से कहीं बेहतर स्थिती में है। 2011 का सेंसस बताता है कि आंध्र प्रदेश देश में सेक्स रेशियो के क्रम में चौथे नंबर पर है। यहां प्रति 1000 पुरुषों की तुलना में 993 महिलाएं हैं। ये एक सुखद स्थिती कही जा साकती है यदि आप देश के अन्य राज्यों के हाल देखें। 
इनमें से कई राज्य तो ऐसे हैं जिन्हें हम बेहद विकसित राज्य के तौर पर मानते हैं। मसलन आप पंजाब और हरियाणा का उदाहरण ले सकते हैं। पंजाब में सेक्स रेशियो 895 है। यानि प्रति 1000 पुरुषों पर महज 895 महिलाएं ही हैं। हालांकि कन्या भ्रूण हत्या को लेकर हरियाणा की चर्चा पहले भी कई बार हो चुकी है लेकिन फिर भी ये एक बार याद किया जा सकता है कि हरियाणा में 2011 के सेंसस के मुताबिक प्रति 1000 पुरुषों पर महज 879 महिलाएं हैं। ये बात और है कि हरियाणा की एक बहादुर लड़की भी रियो ओलंपिक से एक कांस्य पदक लेकर लौटी है। ऐसे में इस बात को समझा जा सकता है कि हरियाणा के समाज में एक लड़की होना और खेलों में कैरियर बनाना कितना मुश्किल काम है। साक्षी मलिक ने जाने अनजाने इस मुश्किल को महसूस तो किया ही होगा। हालांकि उनके रियो में पदक जीतने के बाद शायद ये चर्चा का विषय न रह जाए लेकिन इस लिहाज से ये कहा जा सकता है कि साक्षी का पदक, सिंधू के पदक की तुलना में कहीं अधिक कीमती है। 

देश के बड़े राज्य यूपी, बिहार और गुजरात का हाल भी अच्छा नहीं कहा जा सकता। यूपी में 912, बिहार में 918 तो गुजरात में सेक्स रेशियो 919 तक पहुंचा है। शायद यही वजह रही होगी कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सेल्फी विथ डॉटर जैसे कैंपेन को इंडोर्स करना पड़ गया। ये जरूर है कि हालात के बेहतर होने की उम्मीद बंधी है लेकिन अब भी ये नहीं कहा जा सकता है कि हम सिंधू और साक्षी को कोख में नहीं मारेंगे। उम्मीद करेंगे कि आगे होने ओलंपिक खेलों में हम कुछ और सिंधु और साक्षी भेज पाएं। 

जो सीखा सत्तर सालों में

पिछले कुछ सालों में देश के हालात तेजी से बदले हैं। कई ऐसी चीजें हुईं जो देश में पहली बार इतने बड़े आयाम पर नजर आ रही हैं। देश अब राष्ट्रभक्तों और कथित राष्ट्रभक्तों की श्रेणी में बंट चुका है। एक गाय को माता मानने वाला समाज है और एक बीफ वाला समाज है। मुल्क की आजादी के सत्तर सालों में हम अखलाक और आजाद की आजादी को अब अलग अलग नजरिए से देखने की स्थिती में आ चुके हैं। पिछले सत्तर सालों में हम इतना ही विकास कर पाए कि पंद्रह अगस्त को हम फ्रिज में रखे मटन और बीफ से लेकर गाय के रक्षकों और गाय के मांस के कारोबारियों के बारे में अपना मत बना पाएं। ये देश के शायद नब्बे के दशक में लौटने की शुरुआत है जब देश में सिर्फ और सिर्फ राम मंदिर की बातें हुआ करती थीं। या फिर हम नब्बे के दशक में लौटकर अस्सी के दशक में लौटना चाहते हैं जब हम प्रधानमंत्री की हत्या करने वाले शख्स की पूरी कौम को ही मारने दौड़ पड़े थे। शायद इतिहास के काल खंड में पीछे जाने की हमारी उत्तेजना हमें अस्सी के दशक से भी पीछे उन अमानवीय क्षणों में ले जाना चाहती है जब जमीन पर खिंची एक लकीर मानवीय इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन को देखकर समय स्वयं कराह रहा था। 
पिछले सत्तर सालों में हमने इतनी ही तरक्की की है कि हमने अपने दुर्गुणों को सहेज कर रखना सीख लिया है। हम भूलने की कोशिश भी नहीं करना चाहते, भूल जाना तो दूर की बात है। अब हम इक्कीसवीं सदी की बात करने में रुचि नहीं रखते। हमें इस बात में भी रुचि नहीं होती कि हमारे देश का भविष्य और बेहतर कैसे होगा। इससे अधिक आवश्यक ये है कि हम ये याद करें कि फलां ने राष्ट्रगान गाया और फलां ने नहीं गाया। देश के सत्तर सालों में विकास का हाल ये है कि हमने इतिहास में पीछे जाने की कला को अगली पीढ़ियों में सौंपना भी सीख लिया है। 
पिछले सत्तर सालों में हमारी सत्ता का विकास ऐसा हुआ कि हमने सत्ता के लिए हर हद को पार करना सीख लिया। सत्ता की सार्थकता हमने अपने व्यक्तिगत हितो तक सीमित कर ली और हम अब इसी में खुश हैं। सत्ता की व्यापकता और जन के प्रति सार्थकता से हमारा कोई लेना देना नहीं है। 
पिछले सत्तर सालों में हमने एक दूसरे पर शक करना भी सीख लिया। अब हम एक दूसरे पर आसानी से उंगलियां उठा सकते हैं। हमारे पास तर्कों की संक्रीणता विकसित करने की कला आ चुकी है। अब हम कुतर्कों के आधार पर भी विमर्श और निर्णयों के लिए स्वतंत्र हैं। 
इतना भर ही रह गया है हमारा देश। हम शायद इसी में खुश भी हैं।