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जो गांव के प्रधान लायक नहीं वो विधायक बन गए...

क्या आपको पता है कि इस देश में एक धरना राज्य भी है। अगर जानकारी नहीं है तो खुद को अपडेट कर लीजिए। इस राज्य का नाम है उत्तराखंड। 8 नवंबर सन 2000 को जमीन का ये टुकड़ा उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक राज्य बना। पहले इसका नाम उत्तरांचल रखा गया और फिर बाद में बदल कर उत्तराखंड कर दिया गया। राज्य के फिलहाल के हालात देखने के बाद जब आपको ये बताया जाएगा कि इस राज्य को बनाने के लिए इस इलाके के लोगों ने एक मजबूत राजनीतिक तंत्र से लड़ाई लड़ी तो आपको हैरानी होगी है। उत्तरांचल कहिए, उत्तराखंड कहिए, पहाड़ों वाला प्रदेश कहिए या फिर धरने का प्रदेश कहिए, शिकायतों का प्रदेश कहिए।
इस राज्य को लेकर जो सोच निर्माण के दौरान थी वो अब समाप्त हो चुकी है। उम्मीदों की जो गठरी पहाड़ी ढलानों से उतरकर लखनऊ की सड़कों तक पहुंची थी वो मानों कहीं गुम हो चुकी है। हो सकता है कि राज्य पूरे देश में एक आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था की नजीर के तौर पर उभर पाता लेकिन राज्य के मुस्तकबिल में कुछ और था। निर्माण के चौदह सालों में राज्य ने शिकायतों का ऐसा कारखाना लगाया कि हर गली से गिले शिकवे सुनाई देने लगे। राज्य में कौन ऐसा है (सिवाए नेताओं के) जिसे शिकायत नहीं।
जहां तक मुझे लगता है, इस राज्य में एक सबसे बड़ी समस्या इस बात की है कि हर कोई किसी विशेष श्रेणी में आना चाहता है। हर एक शख्स यही चाहता है कि उसे राज्य सरकार विशेष दर्जा दे दे। पता नहीं ये आदत पहाड़ के लोगों में कहां से आई लेकिन ऐसा कुछ पहले नहीं था। किसी को नौकरी नहीं मिली तो वो पानी की टंकी पर चढ़ जाता है, किसी के कॉलेज मे क्लास शुरू नहीं हुई तो वो मोबाइल टॉवर पर चढ़ जाता है।
राज्य की विडंबना यही खत्म नहीं होती। इस पृथक राज्य के निर्माण के दौरान अवधारणा का बड़ा हिस्सा पर्वतीय क्षेत्र को नियोजित तरीके से विकसित करने से जुड़ा था। एक ऐसे राज्य की परिकल्पना थी जिसमें प्रमुख रूप से पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। अफसोस ऐसा कुछ नहीं हुआ।
राजनीतिक स्वच्छता की उम्मीद तो टूटी ही, जवाबदेह शासन का खाका खींचने में भी हम असफल रहे।
राज्य में राजनीति का ऐसा रूप दिखा कि शर्मसार होने के सिवा कोई और चारा नहीं था। राज्य को बने 14 साल हुए और फिलहाल यहां तीसरी विधानसभा का कार्यकाल चल रहा है। कायदों में यहां इतने सालों में तीन मुख्यमंत्री होने चाहिए थे लेकिन यहां के वर्तमान मुख्यमंत्री का नंबर आठवां है। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद यहां के नागरिकों का कितना विकास हुआ इसकी चर्चा तो बाद में कर लेंगे लेकिन नेताओं का जिक्र पहले कर लीजिए। दरअसल राज्य बनने के बाद किसी प्रजाति का विकास बिना किसी शक्तिवर्धक टॉनिक के हुआ है तो वो है नेता। इस बात को कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि उत्तराखंड में ऐसे लोग विधायक हैं जो ग्राम प्रधान भी बनने लायक नहीं है। हो सकता है मैं जिनके लिए ये कह रहा हूं उन्हें ये बात खराब लगे लेकिन ये एहसास अब हर उत्तराखंडी को होने लगा है।  

हालात अच्छे नहीं हैं। राज्य अभी तक ये तय नहीं कर पाया कि उसकी राजधानी कहां होगी। अब भी राज्य की विधानसभा और सचिवालय अस्थायी राजधानी में ही चल रहा है। मजबूती से कठोर निर्णय लेने की ताकत किसी में दिखती नहीं। राज्य में दो राज्य नजर आते हैं। 13 में 4 मैदानी जिलों की सूरत बचे 9 पहाड़ी जिलों से बिल्कुल अलग है। विकास का ध्रुवीकरण देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर के आसपास ही होकर रह गया है। उत्तराकशी, चमोली, पिथौरागढ़ जैसे इलाकों में हालात बस इतने ही बदले कि हम चर्चा कर सकें। इतने नहीं कि हम चर्चा करें ही। 
लोगों को पानी तो प्रकृति ही दे देती है लेकिन बिजली और सड़क सरकार नहीं दे पा रही है। स्कूलों में शिक्षिकों का टोटा है। सवाल छोटा सा है, उत्तराखंड के लोगों को समझ लेना चाहिए या शायद लोग समझने भी लगे हैं कि वो जमीन पर लकीर खींचकर अपने लिए राज्य बना सकते हैं लेकिन अपने लिए एक बेहतर जीवन की गारंटी नहीं ले सकते।



लिख दिया पेशावर





लिख दिया पेशावर
दर्द, आंसू, चीख
लिखना था सन्नाटा
लिख दिया पेशावर ।
मौत, जुल्म, जिंदगी
लिखना था जज्बात
लिख दिया पेशावर ।
कॉपी, पेंसिल, हरा लिबास
लिखना था इम्तहान
लिख दिया पेशावर ।
जनाजा, कब्र, मय्यत
लिखना था मातम
लिख दिया पेशावर ।
बेबसी, बेसबब, बदहवास
लिखना था बारूद
लिख दिया पेशावर ।। 

आवाज उठेगी बरास्ता तुम्हारे

नारस में इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रारंभ से जुड़े रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार नरेश रुपानी जी के आक्समिक निधन से समूचा पत्रकार जगत स्तब्ध है। नरेश रुपानी जी बनारस के सबसे चर्चित टीवी पत्रकारों में से एक थे। प्रारंभ से ही बनारस की स्थानीय मीडिया से जुड़े रहने वाले नरेश रुपानी के नाम को संबोधित करने वाला हमेशा उन्हें रुपानी जी ही कहा करता था।
रुपानी जी बनारस की टीवी पत्रकारिता के एक जाने माने चेहरे थे। उनका नाम जेहन में आते ही आंखों पर मोटा चश्मा लगाए, गले में मोबाइल लटकाए और हाथों में लेटर पैड लिए एक ऐसे शख्स की तस्वीर उभर कर सामने आती है जो किसी भी प्रेस कांफ्रेंस में आगे बैठना पसंद करता था। रुपानी जी न सिर्फ आगे बैठते थे बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ बैठते थे। सवालों की एक लंबी लिस्ट उनके दिमाग में पहले से ही तैयार रहती थी। स्थानीय नेताओं से लगायत राष्ट्रीय नेताओं तक को घेरने के लिए रुपानी जी पूरी तैयारी से आते थे। यह वही शख्स कर सकता है जो हर मुद्दे पर अपनी मुख्तलिफ राय रखता हो। साथ ही जिसे हर विषय के बारे में जानकारी हो। रुपानी जी में वह सबकुछ था।
बनारस में स्थानीय स्तर पर टीवी पत्रकारिता को स्थापित करने में रुपानी जी के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। रुपानी जी ने उस वक्त बनारस में पत्रकारिता की शुरुआत की जब संसाधनों का नितांत अभाव था। मोबाइल का प्रयोग भी बेहद सीमित था। लोगों के लिए प्रेस का मतलब सिर्फ अखबार ही हुआ करता था। ऐसे समय में मीडिया वालों का उदय हो रहा था। रुपानी जी ने मीडिया वालों की पहचान स्थापित करने में अपनी अहम भूमिका निभाई। स्थानीय स्तर पर जितना मजबूत नेटवर्क रुपानी जी का था उतना बड़ा नेटवर्क बनाने के लिए पत्रकारों को खासी मेहनत करनी पड़ती है। आम आदमी से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक रुपानी जी को दूर से ही पहचान लेते थे।
रुपानी जी सामाजिक जीवन में भी खासे सक्रिय रहे। झूलेलाल जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित कराने में उन्होंने जो योगदान दिया उसको नकारा नहीं जा सकता। रुपानी जी अपने जीवट के लिए हम सब के आदर्श हैं। अफसोस इस बात का है कि रुपानी जी इलेक्ट्रानिक मीडिया की लड़ाई को अधूरा छोड़ कर चले गए। पत्रकारों की मुफलिसी को रुपानी जी ने करीब से देखा था और यही वजह है कि वह चाहते थे कि इसे दूर करने के लिए गंभीर प्रयास हों। इमजा भी हमेशा ऐसे मुद्दों को उठाता रहा है। इमजा की कोशिश है कि टीवी पत्रकारिता से जुड़े पत्रकारों की वह श्रेणी जहां भविष्य की अनिश्चितता उम्मीदों पर हावी रहती है उनके लिए सरकारें गंभीर प्रयास करें। समाज की अंतिम पंक्ति तक की पूरी खबर हर खासो आम तक पहुंचाने वाले टीवी रिपोर्टरों में जमात में बहुतायत ऐसे हैं जो किसी दैनिक मजदूर से भी कम पर काम करते हैं। समाज की मुख्यधारा को प्रभावित करने वाले यह चेहरे अपनों के बीच बेगाने हैं। यह वही लोग हैं जो सुबह खबरों पर निकलने से पहले अपनी मोटरसाइकिल की टंकी की पेंदी मंे जा चुकी पेट्रोल की बंूदों को हिलाकर यह इत्मीनान करते हैं कि चलो आज पहुंच जाएंगे। यह वही लोग हैं जो बारहमासी मजदूरों की तरह रोज खटते हैं और वक्त मिले तो अपने लिए सबसे सस्ता मोबाइल टैरिफ तलाशते हैं। एक मिनट की फुटेज के लिए अपनी जान लड़ा देने वाले इन टीवी वालों को शाम की बुलेटिन में चली खबर अफीम से कहीं अधिक नशा देती है। लेकिन अफसोस कि इनका हर नशा रात में इनके बच्चों के स्कूलों से आई फीस न जमा की होनी नोटिसों के साथ काफूर हो जाता है। कोई नीतिगत निर्णय सरकारें इन टीवी पत्रकारों के लिए नहीं ले पाईं हैं। इमजा की कोशिशें हैं कि ऐसे पत्रकारों के लिए गंभीर प्रयासांे की मुहिम शुरू की जा सके। आइए आप और हम साथ आएं। मिलें, चलें और मुकाम तक पहुंचे। रास्ता भी हमें खुद बनाना है और उसे तय भी खुद ही करना है। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक आवाज हम उठा रहे हैं। जरूरत आपकी और आपके सहयोग की है।

‘मौसेरे भाई‘ सब साथ आए

हैरानी नहीं हुई जब इस देश के तमाम राजनीतिक दल दागियों की परिभाषा तय करने और उन्हें बचाने के लिए एकजुट हो गए। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से ही राजनीतिक हलकों में बेचैनी बढ़ गई थी। हमाम में नंगे होेने के लिए बेताब नेताओं ने आखिरकार बेशर्मी की सभी हदें पार कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ संसद की सर्वोच्चता का हथियार चल दिया। सांसदों को लगता है कि जन प्रतिनिधी कैसा हो इसे चुनने का अधिकार सिर्फ जन प्रतिनिधियों को ही है। यही वजह है कि संसद में एक दूसरे पर चीखने चिल्लाने वाले सभी दलों के नेता इस परिस्थिती में एक हो चुके हैं। उन्हें पता है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ संसद की सर्वोच्चता का ब्रह्मास्त्र का प्रयोग नहीं हुआ तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में दागी सांसदों के आने का रास्ता बंद हो जाएगा। 

10 जुलाई 2013 को लिली थामस, चुनाव आयोग, बसंत चैधरी और जनमूल्यों को समर्पित संस्था लोकप्रहरी के द्वारा दायर जनहित याचिका पर फैसला देते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ कर दिया कि दो वर्ष या उससे अधिक की सजा पाने वाले व्यक्तियांे को जनप्रतिनिधि नहीं बनाया जा सकता है। यही नहीं जेल से चुनाव लड़ने पा भी सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह रोक लगा दी। कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को ही निरस्त कर दिया। दरअसल यह धारा दागियों के लिए संसद में पहुंचने के लिए बाईपास का काम करती है। कानून की इस धारा के तहत प्रावधान है कि दोषी जनप्रतिनिधि ऊपरी अदालत में अपील दायर करने के और उस अपील पर फैसला आने तक अपनी सदस्यता को बरकरार रख सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यही व्यवस्था खत्म कर दी है। कोर्ट ने राजनीति को मूल्यपरक विषयों पर केंद्रित करने के लिहाज से भड़काऊ भाषण देने के दोषी की सदस्यता को समाप्त करने की व्यवस्था दी है। 

कोर्ट की यह दवा राजनीतिज्ञों को कुछ अधिक ही कड़वी लगी। फैसला आने के बाद से ही राजनीतिक दल अपनी असलियत छुपाने के लिए एकजुट होने लगे। मुखौटों के पीछे की स्याह सच कहीं सामने न आ जाए इसलिए संसद की सर्वोच्चता और संसद की गिरती साख जैसी भावुक शब्दों का प्रयोग शुरू हो गया। सांसदों ने मिलकर व्यूह की रचना की। अब तय हुआ है कि किस जनप्रतिनिधि को दागी कहा जाए और किसे क्लीन चिट दी जाए यह कोर्ट नहीं बल्कि संसद ही तय करेगी। बाकायदा इसके लिए कानून में बदलाव किया जा रहा है। लेकिन हमारे माननीय यह बताने के लिए तैयार नहीं है कि संसद की गिरती साख का जिम्मेदार कौन है। माननीय यह भी नहीं बताना चाहते कि आखिर संसद की सर्वोच्चता क्यों खत्म हो गई। संसद की विशाल इमारत में गोल हाल में बैठकर तमाम मुद्दों पर एक दूसरे को पूरी तरह गलत साबित करने वाले सांसदों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि आखिर इस मुद्दे पर उनकी सहमति इतनी जल्दी कैसे बन गई। 

दरअसल 1952 से शुरू हुआ भारतीय गणतंत्र का सफर पैंसठ सालों में इतना भटक चुका है कि उसे अपनी मंजिल ही याद नहीं रह गई है। चुनाव प्रणाली और उससे जुड़े तमाम पहलुओं पर शोध करने वाली संस्था एडीआर और नेशनल इलेक्शन वाच की रिपोर्ट के मुताबिक देश 30 फीसदी जनप्रतिनिधियों ने माना है कि उनके खिलाफ अपराधिक मुकदमें चल रहे हैं। इनमें से 14 फीसदी ऐसे हैं जिनपर गंभीर आरोप हैं। झारखंड जैसे नए राज्य की विडंबना देखिए कि यहां 2009 के विधानसभा चुनावों में जीत कर पहुंचे 74 फीसदी जनप्रतिनिधि अपराधिक मामलों का सामना कर रहे थे। बिहार की 2010 विधानसभा में 58 फीसदी जनप्रतिनिधि अपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी मंे 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में 47 फीसदी जनप्रतिनिधि अपराधिक मुकदमें झेल रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के टिकट पर चुनाव लड़कर जीतने वाले 82 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों ने चुनाव आयोग के समक्ष दायर अपने हलफनामे में माना है कि वह अपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। 

यह सच है कि इस बात की आशंका भी है कि राजनीतिक दांव पेंच के बीच सुप्रीम कोर्ट के इन प्रावधानों का दुरुप्रयोग भी हो सकता है। लेकिन सरकार का रवैया इस पूरे मामले में बेहद हैरान करने वाला है। सरकार ने इस बात की कोई कोशिश नहीं कि चुनाव सुधारों के दौर को आगे बढ़ाया जाए और संसद में दागियों के पहंुचने पर रोक लगाई जाए। बल्कि सरकार ने अपने और अपने ‘मौसेरे भाइयों‘ को सुरक्षित रखने के लिए नई व्यवस्था बना दी। अब ऐसे में अगली बार जब सांसद, संसद की सर्वोच्चता की बात करेंगे तो जवाब क्या दिया जाए ?

टुकड़ा टुकड़ा टूट रहा है मुलायम का सपना

यूपी के गौतम बु़द्ध नगर की एसडीएम दुर्गा शक्ति के निलंबन के बाद जिस तरह से अखिलेश सरकार घेरे में आई है उससे साफ हो चला है कि देश के सबसे बड़े सूबे में सपा की सरकार में मुख्यमंत्री अखिलेश से कहीं अधिक उनके रिश्तेदारों का प्रभाव है। गौतम बुद्ध नगर की एसडीएम दुर्गा शक्ति को अखिलेश सरकार ने निलंबित कर के यह साफ कर दिया है सूबे में ईमानदार अफसरों को काम नहीं करने दिया जाएगा। दुर्गा शक्ति को निलंबित करने के पीछे अखिलेश सरकार ने बड़ा अजीब तर्क दिया। पहली बार तो लगा कि सपा सरकार ने अपने बनने के बाद से हुए 27 दंगों से सबक ले लिया है लेकिन जल्द ही सच्चाई सामने आ गई। अखिलेश सरकार ने कहा कि गौतमबुद्ध नगर में एक मस्जिद की दिवार एसडीएम दुर्गा शक्ति ने गिरवाई है। इससे धार्मिक उन्माद पैदा होने का खतरा है लिहाजा एसडीएम को निलंबित करना जरूरी है। यूपी सरकार के इस फैसले के खिलाफ समूचे देश की नौकरशाही के एकजुट होने के बाद इस घटना के जांच के आदेश दिए गए। उसमें साफ हो गया कि दिवार एसडीएम ने नहीं गिरवाई। यहां एक और बात गौर करने वाली है। जिस दिवार को गिराए जाने को यूपी की समाजवादी सरकार सांप्रदायिक चश्मे से देख रही है उसे बचाने के लिए किसी ने कोई प्रयास नहीं किए। और न ही एसडीएम के खिलाफ कोई शिकायत कहीं दर्ज हुई। बावजूद इसके सरकार ने सबकुछ खुद ही सोच लिया और नतीजा सामने है। हैरानी इस बात को भी लेकर होती है कि अखिलेश यादव ने अपने सत्ता संभालने के बाद से अब तक 27 दंगे होने की बात कही है लेकिन यह कभी नहीं बताया कि उन दंगों को रोकने के लिए सरकार ने क्या कोई कोशिश की थी। 

अब जबकि समाजवादी नेता और यूपी एग्रो के चेयरमैन नरेंद्र भाटी ने यह कबूल कर लिया है कि उनके ही फोन काॅल के बाद दुर्गा शक्ति का निलंबन हुआ तो साफ हो जाता है कि अखिलेश सरकार में सत्ता के कई केंद्र हो चुके हैं। अखिलेश यादव का बतौर मुख्यमंत्री सरकार पर कोई नियंत्रण भी नहीं रह गया है। नरेंद्र भाटी का भाषण कई बातों की ओर इशारा करता है। नरेंद्र भाटी अपने भाषण में दुर्गा शक्ति के प्रति अपनी नाराजगी को बेहद आपत्तिजनक भाषा के इस्तमाल के जरिए जता रहे हैं। इससे साफ होता है यूपी सरकार में नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों के रिश्ते मधुर नहीं हैं। राज्य की इन दो प्रमुख ईकाइयों के बीच गहरी खाई है। यह बात कुछ दिनों पूर्व प्रतापगढ़ के कुंडा में डीएसपी की हत्या के बाद भी सामने आई थी। सरकारी कर्मचारी अपने को सुरक्षित नहीं महसूस कर रहे हैं और शायद वह हैं भी नहीं। इलाहाबाद में सरेराह एक दरोगा की हुई हत्या यह साबित करने के लिए काफी है। नरेंद्र भाटी ने अपने भाषण में यह भी बताने की कोशिश की है उनका मुलायम और अखिलेश से सीधा संपर्क है। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि अखिलेश यादव को रिमोट के जरिए संचालित किया जा रहा है। मुलायम से लेकर शिवपाल और आजम खां तक इस प्रतापी पुत्र को अपने हिसाब से चला रहे हैं। हालात यह हैं नरेंद्र भाटी जैसे नेता भी सीएम पर एक आईएएस के निलंबन के लिए दबाव डालने में सफल हो जाते हैं। 

यूपी में अखिलेश यादव ने जब सत्ता संभाली थी तो सूबे के साथ साथ पूरे देश के लोगों को उम्मीद थी कि भारत के सबसे बड़े राज्य और राजनीतिक रूप से बेहद अहम राज्य की एक नई और विकसित तस्वीर हमारे सामने होगी। लेकिन अब धीरे धीरे अखिलेश का मायाजाल टूटने लगा है। साफ दिखने लगा है कि अखिलेश यादव महज मोहरे के रूप में इस्तमाल हो रहे हैं। पूरे प्रदेश में एक अजीब सी अराजकता है। यह ठीक वैसी ही है जैसी कभी मुलायम के मुख्यमंत्रीत्व काल में हुआ करती थी। सत्ता के कई कंेद्र हो चुके हैं। तंत्र प्रभावी नहीं रह गया है। अखिलेश यादव ने हालात सुधारने की तमाम कोशिशें कीं लेकिन स्थिती बदली नहीं। अब तो जनता भी मुफ्त में बंटने लैपटाप से अधिक कानून व्यवस्था की बातें कर रही हैं। हत्या, बलात्कार, दंगे सपा सरकार की पहचान बन चुके हैं। ऐसे में 2014 में पीएम बनने का सपना पालने वाले मुलायम के लिए दुश्वारियां खड़ी हो सकती हैं। यूपी की 80 में से 40 लोकसभा सीटों को जीतने का ख्वाब देख रही समाजवादी पार्टी अपने ही जाल में फंसती जा रही है। एक तरफ जनता को लगने लगा है कि सपा को विधानसभा चुनावों में वोट देकर गलती की तो वहीं सपा के थिंकटैंक को लग रहा है कि अखिलेश पर जरूरत से अधिक नियंत्रण ने वोट बैंक पर से कंट्रोल खत्म कर दिया है। ऐसे में आने वाले दिनों में स्थिती को संभालना अखिलेश यादव के लिए बेहद मुश्किल होगा।  

बुरके में फाइटर हीरोइन

वह पूरी तरह बुरके से ढंकी हुई है. सिर्फ आंखें और उसकी अंगुलियां देखी जा सकती हैं. जिया पाकिस्तान की नई सुपर हीरोइन हैं. अपने दुश्मनों से लड़ते समय भी वह बुरके में ही रहती है.
जिया पाकिस्तान की पहली एनिमेशन सीरीज की हीरोइन है. इस सीरीज में मुख्य किरदार एक महिला का है जो बुरके में अपने दुश्मनों से हाथ दो चार करती है. इसे बनाने वाले हारून रशीद देश में लड़कियों के लिए आदर्श किरदार डिजाइन करना चाहते हैं.
अपनी लड़ाई के दौरान जिया किसी हथियार का नहीं बल्कि किताबों और पेंसिलों का इस्तेमाल करती है. डॉयचे वेले के साथ इंटरव्यू में हारून रशीद बताते हैं, "ये प्रतीक के तौर पर हैं कि पेन या कलम हमेशा तलवार से ताकतवर होती है. हम दर्शकों को दिखाना चाहते हैं कि पढ़ाई से कई समस्याएं हल हो सकती हैं."
यह टीवी सीरियल 13 एपिसोड वाला है और 22 मिनट दिखाया जाता है. इसमें सुपर हीरोइन की कहानियां हैं जो रोजमर्रा में एक शिक्षक हैं. वह और उनके तीन छात्र काल्पनिक शहर हवालपुर से आते हैं.
बुरका दमन का प्रतीक नहीं
सीरियल की हीरोइन को बुरका पहनाना पाकिस्तान में पूरी तरह पसंद किया जा रहा हो, ऐसा नहीं है. बुरका पाकिस्तान और अफगानिस्तान में रुढ़िवादी इस्लाम का प्रतीक है. कुछ लोग इसे महिलाओं के दमन का प्रतीक मानते हैं. जर्मनी के शहर एरलांगन में मीडिया रिस्पॉन्सिबिलिटी इंस्टीट्यूट की सबीने शिफर कहती हैं, "पश्चिम में बुरका एक मजबूत प्रतीक है. इसलिए पहली नजर में वह चौंकाता है. लेकिन ये सुपर हीरोइन उस पुरातनपंथी विचार के बारे में नहीं बोलती. वह बहुत मजबूती से अन्याय के खिलाफ लड़ती है."
 बुरका एवेंजर सीरीज
इस सीरीज का बुरका निन्जा के ड्रेस जैसा लगता है. रशीद के मुताबिक,"वह दूसरे सुपर हीरो हीरोइनों की तरह अपनी पहचान साथ लाती है." रशीद दलील देते हैं कि इस पहनावे का चुनाव करके वह सीरीज को स्थानीय रंग देना चाहते थे. उन्होंने बहुत सोच समझ कर कैट वुमन या वंडर वुमन जैसे कैरेक्टर से अलग रंग और पहचान अपने किरदार को दी है. पश्चिम से आने वाली अधिकतर सुपर हीरोइनें बहुत कम कपड़े पहनी होती हैं. इससे महिला के वस्तु बन जाने का खतरा रहता है.
हर बार नई कहानी
एक बार जिया पर्यावरण संरक्षण के लिए खड़ी होती है तो दूसरी कहानी में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए. वैसे तो इस सीरीज में पाकिस्तान के सामाजिक ताने बाने की विषमताओं को दिखाया गया है लेकिन साथ ही वह बच्चों को पसंद आने वाले फॉर्मेट में रखी गई हैं. इसमें हिंसक फाइट्स नहीं हैं बल्कि हल्के फुल्के संवाद हैं.
पहली कड़ी में किसी गांव के स्कूल बंद करने के आदेश दिए गए लेकिन बुरका एवेंजर ने इस फैसले को किसी तरह पलट दिया. यह एक ऐसी लड़ाई है जो पाकिस्तान के लोग अच्छे से जानते हैं. तालिबानियों ने हाल के दिनों में कबायली इलाकों में कई स्कूल बंद करवाए हैं खासकर लड़कियों के क्योंकि वह लड़कियों की शिक्षा के खिलाफ हैं. यह कड़ी मलाला यूसुफजई की भी याद दिलाता है जिसे अक्टूबर 2012 में चरमपंथियों ने गोली मारी थी क्योंकि उसने पाकिस्तान में लड़कियों का स्कूल बंद करने का खुला विरोध किया था.
अंतरराष्ट्रीय नहीं
रशीद ने यह सीरीज पाकिस्तान को ध्यान में रखते हुए बनाई है और फिलहाल यह उर्दू में चल रही है. इसे पश्तो में भी बनाया जाएगा ताकि यह पश्चिमोत्तर के इलाकों में दिखाई जा सके. इस सीरीज के साथ ही रशीद ने एक स्मार्ट फोन ऐप भी बनाया है. क्योंकि इसी से सब शुरू हुआ है. रशीद ने बताया कि तीन साल पहले उन्होंने आईटी विशेषज्ञों के साथ मिल कर बुरका फाइटर्स का एक इंटरएक्टिव ऐप बनाया था. इसके विज्ञापन के लिए उन्होंने एक एनिमेशन सीरीज बनाई. उन्हें ये इतनी पसंद आई कि उन्होंने टीवी के लिए इसकी और कड़ियां बनाने का फैसला किया. इसके लिए पैसे उन्होंने खुद ही इकट्ठा किए और इसके लिए म्यूजिक भी खुद ही बनाया. 13 कड़ियों में कुछ गाने हैं जो उन्होंने और पाकिस्तान के कुछ रॉक स्टार ने लिखे और गाए हैं.
धीमा बदलाव
रशीद कहते हैं कि इस सीरीज का मुख्य उद्देश्य लोगों को हंसाना है, उनका मनोरंजन करना है. साथ ही किशोरों तक यह संदेश पहुंचाना कि लोगों में कोई फर्क नहीं और शिक्षा से उनकी जिंदगी बेहतर होती है.
मीडिया विशेषज्ञ सबीने शिफर को लगता है कि पाकिस्तान में कुछ बदलाव होना चाहिए ताकि सीरियल में दिखाई गई बातें सच हो सकें. "अच्छी शिक्षा से सब मिल सकता है, पाकिस्तान में यह पूरी तरह सच नहीं." सामाजिक ऊंच नीच के सिस्टम से तेजी से बाहर निकल पाना अक्सर मुश्किल ही होता है.
रिपोर्टः राहेल बेग/आभा मोंढे
संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

सौजन्य - www.dw.de

केदारघाटी में अब उम्मीदें भी चीखने लगीं

इस मुल्क के रहनुमाओं से जितनी भी उम्मीदें थीं वह सब केदारघाटी के सैलाब में बह गईं। इंसानों की लाशों के बीच अब हमारी उम्मीदों की चीख भी सुनाई देने लगी है। इतना तो हमें पहले से पता था कि खद्दर पहनने वालों की सोच अब समाजिक उत्थान से बदलकर व्यक्तिगत उत्थान तक पहुंच गई है। लेकिन केदार घाटी में सैलाब के आने से लेकर अब जो कुछ भी सामने आ रहा है उससे लगता है कि इन रहनुमाओं को मौका मिले तो लाशों के अंगूठे पर स्याही लगाकर अपने नाम के आगे ठप्पा लगवा लेंगे। घिन आने लगी है अब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नुमांइदो से। 
‘देश‘ की जनता पत्थरों के नीचे दब रही है और नेता अपने ‘राज्य‘ के लोगों को बचाने के लिए कुत्तों की तरह लड़ रहे हैं। देहरादून मंे सिस्टम के सड़ने की बू तो बहुत पहले से आ रही थी लेकिन हमारे सिस्टम में कीड़े पड़ चुके हैं यह केदारघाटी में आए सैलाब के बाद पता चला। उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा आने के बाद एक-एक करके सियासी चोला ओढ़े कुकरमुत्ते देहरादून में पहुंचने लगे। उत्तराखंड में आपदा राहत के लिए भले ही इनके राज्यों ने हेलिकाप्टर न भेजे हों लेकिन चुनावी तैयारी को ध्यान में रखकर अपने अपने ‘वोटों‘ को बचाने के लिए सियासी ‘दलाल‘ पहुंच गए। इसके बाद शुरू हुआ इंसानों को बांटने का काम। केदारघाटी से लेकर ऋषिकेश तक देश की जनता को बांट दिया गया। कोई आंध्रा वाला हो गया तो कोई गुजरात वाला। इसके बाद जिंदगी का बंटवारा भी शुरू हो गया। आपदा में फंसे लोगों को उनके प्रदेश के आधार पर बचाया जाने लगा। अपने अपने राज्यों से आए सफेदपोशों ने अपने अपने राज्य के लोगों को बचाने के लिए हेलिकाप्टर से लेकर बसें तक लगाईं। किसी को यह याद नहीं रहा कि भारत के लोगों को बचाया जाए। नेताओं ने न सिर्फ भारत के संविधान की आत्मा को बांट दिया बल्कि जिसने लिखा था कि ‘हम भारत के लोग‘ को भी बदल दिया। अब तो ऐसा लगता है जैसे हर राज्य का अपना अलग संविधान हो गया है। ‘हम आंध्र प्रदेश के लोग‘, ‘हम गुजरात के नागरिक‘। 

देहरादून में टीडीपी और कांग्रेस के नेताओं के बीच की झड़प इस बात का इशारा नहीं बल्कि पुख्ता सबूत है कि हमने लोकतांत्रिक संस्कृति को खो दिया है। राजनीति के लिए लाशों का इस्तमाल जिस देश में होने लगे उस कौम में मातम छा जाता है। राजनीतिज्ञों का स्तर इतना गिर गया है इस बात का एहसास दुखद है। हमसब को उम्मीद थी कि पूरे देश के राज्य एकजुट होकर उत्तराखंड में आई आपदा के बाद राहत कार्यों में लगेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। बातें कहां तक सेंट्रल कंमाड की हो रही है और काम रिजनल कंमाड का हो रहा है। महराष्ट्र से आए कुछ लोगों को अपनों की तलाश थी। उसने अधिकारियों से गुहार लगाई। गुहार को अनसुना कर दिया गया। नाराज लोगों ने वहीं हंगामा शुरू कर दिया। इसी बीच एक हेलिकाप्टर के पायलट को भी इन लोगों ने पकड़ लिया। पायलट के पास से एक लिस्ट मिली जिसमें कुछ खास लोगों के नाम मिले। पायलट से इन बचे लोगों मंे से लिस्ट में शामिल लोगों को प्राथमिकता के आधार पर लाने के लिए कहा गया था। ये हालात बताते हैं कि आपदा न सिर्फ केदारघाटी में आई है बल्कि राजपथ पर भी आई है। संसद के दोनों सदनों में भी अब मलबा ही भरा है। अब बस देर इस मलबे को साफ करने की है। शुक्र है कि अभी तक हमारी कौम जिंदा है और यह जिंदा कौम यकीनन केदारघाटी से मलबा हटाने के बाद संसद का मलबा भी हटा ही देगी। 

पहले आपदा ने मारा, अब सिस्टम मार रहा।

यह सच है कि उत्तराखंड में जिस तरह से प्राकृतिक आपदा आई है उसके आगे सभी आपदा राहत के काम बौने ही है। आपदा प्रबंधन मंत्रालय की सोच से भी कहीं भयावह है यह आपदा। इसमें भी किसी को दो राय नहीं होगी कि इस आपदा से निबटने का काम अकेले उत्तराखंड की सरकार नहीं कर सकती है। पूरे देश को इस घड़ी में साथ खड़ा होना पड़ेगा। लेकिन इसी सब के बीच एक बात साफ है कि जितनी मौतें आपदा से नहीं हुई उससे कहीं अधिक मौतें हमारे अव्यवहारिक सिस्टम से हो रही है। सरकारें संवेदनशून्य होती जा रही हैं और मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों के पास आपदा प्रभावित लोगों के साथ वक्त बिताने का समय नहीं है। साफ है कि हमारा सिस्टम अगर ईमानदार कोशिश करता तो इस तबाही में मरने वालों का आंकड़ा बहुत कम होता। 
उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जो प्राकृतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। उत्तराखंड को यूपी से अलग होकर अलग राज्य बने हुए लगभग 12 साल हो रहे हैं। इन बारह सालों में बनी सरकारों को सूबे का विकास करने के लिए एक ही माध्यम दिखा और वो है राज्य की लगभग 65 फीसदी क्षेत्र में फैली वन व अन्य प्राकृतिक संपदा। जमकर और बेहद अवैज्ञानिक तरीके से प्रदेश में बनी सरकारों ने राज्य में बहने वाली नदियों भागीरथी, अलकनंदा, पिंडर वगैरह पर बड़े बड़े बांध बनाने शुरू किए। बड़ी कंपनियों को ठेका दिया गया। ठेका देने लेने के खेल में न जाने कितने का खेल हुआ। इनमें से कई परियोजनाएं ऐसी थीं जो पर्यावरण के लिहाज से बेहद खतरनाक थीं। अधिकतर परियोजनाओं के खिलाफ पर्यावरण मंत्रालय और पर्यावरणविदों ने आवाज भी उठाई। लेकिन हुक्मरानों ने ऐसा व्यूह रचा कि हर आवाज दब कर रह गई। सरकार को यह पता है कि हिमायल का यह हिस्सा भूकंप के लिहाज से देश का सबसे अधिक संवेदनशील इलाका है। उत्तराखंड के उपरी पहाड़ी इलाकों में प्रायः भूकंप आते रहते हैं। इनमें जान माल की हानि भी होती है। ऐसे में अक्सर उत्तराखंड की सरकार को आपदा से निबटना पड़ता है। हर बार हालात इतने बुरे नहीं होते और यही वजह है कि उत्तराखंड सरकार के आपदा प्रबंधन की पोल सबके सामने नहीं खुल पाती। लेकिन इस बार सबने देखा कि किस तरह से उत्तराखंड का सिस्टम लोगों की जान पर भारी पड़ रहा है। आपदा से निबटने के लिए उत्तराखंड को केंद्र का मुंह देखना पड़ रहा है। उसके पास अनुभवी और दक्ष लोगों की कमी है जो आपदा के समय काम आ सकें। उत्तराखंड में आपदा के समय का जो रिएक्शन टाइम है उसको भी लेकर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का आरोप है कि सिस्टम बहुत देर से सक्रिय हुआ। हेलिकाॅटरों की व्यवस्था से लेकर राहत सामग्री पहुंचाने तक के कामों में देरी हुई। जो लोग घायल थे उन तक चिकित्सा सुविधा भी देर से पहुंची। इसका परिणाम यह हुआ कि कई घायल भी मरने वालों मंे शुमार हो गए। 
इसके साथ ही समन्वय की कमी भी साफ देखी गई। विभिन्न विभागों में तालमेल का घोर अभाव दिखा। संचार, चिकित्सा, राहत सामग्री और फंसे लोगों को निकालने का काम विभिन्न विभाग अपने अपने ही तरीके से अंजाम देते रहे। इसका नतीजा हुआ कि हम आपदा प्रबंधन को प्रभावी नहीं बना पाए। इसके साथ ही सरकार यह भी तय नहीं कर पाई कि किस काम को पहले करें और किसे बाद मंे। अपनी प्राथमिकता को तय करने में ही सरकार को खासा समय लग गया। 
उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा कोई नई बात नहीं है। पिछले साल भी उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा आई थी। यह जरूर है कि आपदा का स्वरूप इतना बड़ा नहीं था। लेकिन बावजूद इसके सरकार को आपदा के बाद राहत कार्यों में देरी की वजह से लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ी थी। इस बार भी लोग सवाल कर रहे हैं कि यदि सरकार को पता कि मौसम खराब होने वाला है तो केदारनाथ और आसपास के इलाके को खाली क्यों नहीं कराया गया। केदारनाथ की यात्रा को क्यों नहीं रोका गया? सरकार का वेदर अलार्मिंग सिस्टम बेकार साबित हुआ। इसके साथ ही सरकार ने मौसम पूर्वानुमानों को बेहद हल्के में लिया। यही वजह है कि मरने वालों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। 
दुख होता है इस बात का जिस राज्य में प्राकृतिक आपदाओं से निबटने के लिए पूरा एक मंत्रालय काम करता हो, जहां एक कैबिनेट मंत्री ऐसी आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए तनख्वाह पाता हो, पूरा एक तंत्र हो जो इस बात की निगरानी करता हो कि सूबे में प्राकृतिक आपदा से होने वाले जान -माल को कैसे कम किया जाए, वहां भी हजारों लोग एक झटके में मौत के मुंह में चले जा रहे हैं। क्या कहेंगे इसे कि आपदा आने के एक हफ्ते बाद भी हम हर जगह राहत नहीं पहुंचा पाए हैं। न जाने उत्तराखंड सरकार किस रफ्तार से काम कर रही है लेकिन इतना जरूर है कि जितने लोग इस आपदा से नहीं मरेंगे उससे कहीं अधिक इस सरकारी सिस्टम से मर जाएंगे क्योंकि उन्हें उम्मीद होगी कि आसमान से कोई हेलिकाप्टर आएगा और उन्हें बचा ले जाएगा। लेकिन कइयों की यह उम्मीद आठ दिनों में भी पूरी नहीं हुई। उम्मीद टूट रही है और ऐसे हालात में उम्मीद के टूटने के बाद आदमी जिंदा लाश से अधिक कुछ नहीं रह जाता। उम्मीद के टूटने से हो रही इन मौतों का जिम्मेदार सीधे तौर पर हमारा सिस्टम है। लाख कोशिश कर ले सरकार लेकिन इन उम्मीदों की लाशों से वह मुंह नहीं फेर सकती। इन गुनाहों से उन्हें बरी नहीं किया जा सकता। हरगिज नहीं। ये सभी उम्मीद की लाशें आज नहीं तो कल गवाही देंगी। जरूर देंगी। 

अनियोजित विकास की कीमत चुकाई हमने

बादलों और पहाड़ों के नजारे करने वालों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि शांत से दिखने वाले ये बादल भी उन्हें जिंदगी का रौद्र रूप दिखा सकते हैं। केदार घाटी में आए हिमालयी सुनामी ने उत्तराखंड ही नहीं देश के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। यह चुनौती है उत्तराखंड के साथ साथ पूरे देश में हो रहे अनियोजित विकास को फिर से परिभाषित करने की। 
विकास का ढोल, खुल गई पोल
अपने गठन के कुछ दिनों के बाद ही उत्तराखंड ने अपने लिए विकास के लिए मानक गढ़ने शुरू कर दिए। उत्तराखंड का लगभग 65 फीसदी हिस्सा वन क्षेत्र है। यह वन क्षेत्र न सिर्फ उत्तराखंड के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि पूरे देश के पर्यावरण संतुलन के लिहाज से भी बेहद अहम हैं। इसके साथ ही उत्तराखंड में ही देश ही कई प्रमुख नदियों का उद्गम भी है। उत्तराखंड ने इन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन शुरू किया। जल्द ही राज्य में बड़ी तेजी के साथ पनविद्युत बिजली परियोजनाओं के लगने का सिलसिला शुरू हो गया। हालात ये हुए कि अपने गठन के बारह सालों के भीतर ही उत्तराखंड में लगभग 300 से अधिक परियोजाएं सामने आ गईं। परियोजनाओं को लगाने की जल्दी को लेकर कई बार सवाल भी उठे। हालात यह हुए कि मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने एक झटके में दो दर्जन से अधिक बिजली ऐसी परियोजनाओं को मंजूरी दे दी जिन्हें पर्यावरण मंत्रालय की ओर से हरी झंडी भी नहीं मिली थी। बाद में हो हल्ला मचा और मामला कोर्ट में चला गया।  इसके बाद कहीं जाकर इन परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन शुरू हो पाया। ऐसे न जाने कितने उदाहरण आपको मिलेंगे जो यह बताने के लिए काफी हैं कि सरकारों ने उत्तराखंड को विकास के नाम पर कितना पीछे ढकेल दिया है। सरकारें आमतौर पर उत्तराखंड का प्रचार प्रसार उर्जा प्रदेश के रूप में करती रहीं और अपनी पर्यावरणीय जिम्मेदारियों से बचती रहीं। हालात पिछले दस सालों में कहां से कहां पहुंच गए यह हम सब देख सकते हैं। 
अनियंत्रित पर्यटन ने दिए जख्म 
वन क्षेत्र के लिहाज से भी उत्तराखंड बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। दुनिया की नवीनतम पर्वत श्रृृंखला जिसे हम हिमालय के नाम से जानते हैं उसका बड़ा हिस्सा उत्तराखंड में पड़ता है। दुनिया के कई बड़े ग्लेश्यिर हिमालय में ही हैं। लेकिन लगातार कम हो रहे वन क्षेत्र और बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप ने हिमालय को हिला कर रख दिया है। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर वह सब कुछ हो रहा है जिससे पर्यावरण को नुकसान हो। अनियंत्रित पर्यटक आवाजाही। वाहनों का अंधाधुंध परिचालन और अवैध इमारतों के निर्माण ने हिमालयी क्षेत्रों की शक्ल बिगाड़ कर रख दी है। आज से लगभग तीस पैंतीस सालों पहले जहां महज झोपडि़यां हुआ करती थीं वहां अब आपको हर सुविधा से सुसज्जित होटल मिल जाएंगे। केदारनाथ का ही उदाहरण ले लिया जाए तो चालीस के दशक में यहां महज कुछ झोपडि़यां ही हुआ करती थीं। रास्ता दुर्गम हुआ करता था। इलाके के लोगों की मानें तो दूरदराज से आए जो यात्री यहां पहुंच जाते थे वो खुद को भाग्यशाली समझते थे। केदारनाथ पूरी तरह से साधना स्थल था। लोग यहां गंभीर तीर्थाटन के लिए ही आया करते थे। महज घूमने के लिहाज से यहां आने वाले लोगों की संख्या ना के बराबर थी। लेकिन पिछले कुछ सालों में तेजी से बदलाव हुआ। सरकार ने चारधाम यात्रा समिति बनाई और बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को बड़े पैमाने पर कैश कराने की कोशिशें शुरू कर दीं। सरकार की इस अधूरी कवायद का परिणाम यह हुआ कि इन चारों स्थानों पर आने वाले लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ। इन यात्रियों को ठहराव देने के लिए अवैध धर्मशालाएं और होटल बनने लगे। इनमें से अधिकतर ऐसे थे जो बेहतर साइट सीन के चक्कर में नदी के ठीक किनारे पर बनाए गए। खबरें बताती हैं कि अकेले केदारघाटी में ही नब्बे धर्मशालाएं इस आपदा में बह र्गइंं। स्थानीय प्रशासन से लेकर सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को भी पता है कि इनमें से अधिकतर धर्मशालाएं अवैध थीं। सबकुछ देखते हुए भी आखिर शासन और प्रशासन मौन क्यों रहा? यह सवाल सब पूछ रहे हैं। जवाब किसी के पास नहीं है। न सिर्फ केदार घाटी बल्कि बल्कि गंगोत्री, यमुनोत्री और बद्रीनाथ में भी हालात यही हैं। रास्ते में पड़ने वाले प्रमुख पड़ावों का हाल भी ऐसा ही है। फाटा, उत्तरकाशी, जोशीमठ, रुद्रप्रयाग, गौचर सभी जगहों पर बाजारवाद का ऐसा स्वरूप पनप चुका है जिसने पूरे पर्यावरण के सीने पर अनगिनत

जख्म दे दिए। पिछले कई सालों में हिमालयी पर्यावरण को लेकर हुए रिपोर्टों ने बताया है कि पूरे क्षेत्र में बड़े बदलाव आ रहे हैं और इन्हें रोकने की जरूरत है। वाहनों की बेधड़क आवाजाही से होने वाले हाइड्रोकार्बन के उत्सर्जन से पूरा पर्यावरण दूषित होता गया। पर्यावरणविद् शोर मचाते रहे और पेड़ांे को काटकर रिजार्ट बनते रहे। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि घरेलू और विदेशी पर्यटकों को मिलाने के बाद 2011 में आंकड़ा लगभग दो करोड़ के करीब पहुंच जाता है। सरकारें हमेशा से यह कोशिश करती हैं कि उनके राज्य में अधिक से अधिक पर्यटक आएं लेकिन इसी बीच वह अनियंत्रित पर्यटन से होने वाले दुष्परिणामों को भूल जाती हैं और उन्हें रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। 
अवैध खनन 
उत्तराखंड में नदियों में खनन के पट्टे सरकार आवंटित करती है। पट्टे आवंटित करने में बहुत बड़ा खेल होता है यह बात किसी से छुपी नहीं है। जिन ठेकेदारों को पट्टा मिलता है वह न सिर्फ पट्टे के लिए आवंटित स्थान पर खनन करते हैं बल्कि आसपास के इलाकों में भी खनन करते हैं। खनन करने वाले साधारण मजूदर होते हैं और उन्हें इस बात का इल्म भी नहीं होता कि किस तरह से खनन हो कि नदियों का मूल स्परूप बचा रहे। जेसीबी से होने वाले खनन से नदियां अपना रास्ता तक बदल सकती हैं। उत्तराखंड के कई इलाकों में अवैज्ञानिक तरीके से नदियों में अवैध खनन जारी है। शासन और प्रशासन की मिलीभगत से कई ऐसी नदियों में भी खनन होता है जहां सिर्फ चुगान की अनुमति होती है। पिछले कुछ सालों में यह खतरा तेजी से बढ़ा है। नदियों के रास्ता बदल लेने का खतरा बढ़ रहा है। नदियां अगर अपना रास्ता बदलती हैं तो कई बाजार और मानव सक्रियता के केंद्र समाप्त हो जाएंगे। 
आपदा से निबटने के उपाय नाकाफी 
उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जिसमें पहाड़ी क्षेत्र की बहुलता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस सूबे की तकदीर मैदान मैं बैठकर आज भी लिखी जाती है। देहरादून में बनी विधानसभा में बैठने वाले कई अधिकारियों को उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ों में बसे लोगों की परेशानियों के बारे में पता भी नहीं होता है। मौसम के पूर्वानुमान के लिए आज देश में अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग होता है। उत्तराखंड की सरकार भी वेदर अलार्मिंग सिस्टम का उपयोग करती है। लेकिन संचार व्यवस्था की कमी और प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही के चलते यह अलार्मिंग सिस्टम बेकार साबित होता है। केदारघाटी में मौसम बदलने की सूचना सिस्टम को मिल रही थी लेकिन बावजूद इसके यह सूचना उपर पहाड़ों में नहीं पहुंच पाई। शासन इतना लापरवाह रहा कि केदारनाथ के आसपास से लोगों को हटाना उचित नहीं समझा। इसका परिणाम सबके सामने है। आपदा आ जाने के बाद भी उत्तराखंड सरकार का आपदा प्रबंधन मंत्रालय एक अजीब सी पशोपेश में पड़ा रहा। क्या करें और क्या न करें उसे समझ ही नहीं आ रहा था। आपदा राहत के लिए प्रयास देर से शुरू हुए और नाकाफी रहे।