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जनता करेगी फाइव फिंगर टेस्ट, तब देखेंगे केजरी बाबू...

मानिए या न मानिए लेकिन एहसास दिल्ली को हो रहा होगा कि अरंविद केजरीवाल को इतना बड़ा जनमत देना उनकी भूल थी। दिल्ली के विकास के लिए छटपटाने का दावा कर रहे अरविंद केजरीवाल का जितना ध्यान मनपसंद अफसरों की तैनाती करने, कांग्रेस की गलतियां गिनने और उपराज्यपाल से विवाद में है उसका आधा भी वो सही माएने में दिल्ली पर देते तो सूरत के बदल जाने का एहसास होने लगता। हैरानी होती है अरविंद केजरीवाल को देखकर। दिल्ली अपनी आने वाली पीढ़ियों को ये कैसे बता पाएगी कि उसके अरविंद केजरीवाल को चुनने की वजह क्या थी। सवाल ये भी उठेगा कि अरविंद केजरीवाल को बदलने से दिल्ली क्यों नहीं रोक पाई और इस प्रयोग से दिल्ली को मिला क्या।

सरकार में आते ही अरविंद केजरीवाल की सरकार ने पूरा ध्यान कांग्रेस सरकार की गलतियों तलाशनें में लगा दिया। हालात ये हैं कि अभी तक दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की सरकार अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान होने वाले विकास कार्यों का खाका सार्वजनिक नहीं कर पाई है। अफसरों की तैनाती के विवाद इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल की सरकार का ध्यान अपने मुताबिक अफसरों की तैनाती पर अधिक है। हम ये मान सकते हैं कि अफसरों के कुनबे का कुछ हिस्सा जनता के साथ जुड़ाव न रखता हो लेकिन सभी अफसर बेकार हैं ये मानना मुश्किल है। अफसरों की इसी फौज ने दिल्ली की सूरत को खूबसूरत बनाया है। ऐसे में अरविंद अफसरों से इतने नाराज क्यों है ये समझ से परे है। अरविंद केजरीवाल में एक अच्छा प्रशासक होता तो बेईमान अफसर भी ईमानदारी से काम करने के लिए बाध्य होता।

अरविंद केजरीवाल के पास मौका था लेकिन वो स्वयं को औरों से अलग साबित करने में असफल होते नजर आ रहे हैं। जंतर मंतर में उनकी मौजूदगी में किसान की आत्महत्या ने भी समाज में उनके मौका परस्त हो रहे व्यवहार को साबित किया है। आंदोलन में अरविंद के खास सहयोगी रहे योगेंद्र यादव को जिस तरह से पार्टी ने किनारे किया उस कार्रवाई को सभी ने हिटलरशाही की ही संज्ञा दी क्योंकि यही मुफीद लगा। इस देश के कई मौका परस्त नेताओं और पार्टियों की ही तरह अब अरविंद केजरीवाल भी राजनीतिक तरण ताल में अर्द्ध नग्न तो नजर आने ही लगे हैं।

अरविंद केजरीवाल के कानून मंत्री की करनी को उदाहरण के तौर पर लें तो साफ होता है कि केजरी बाबू के इर्द गिर्द झूठ का कारोबार सीना ठोंक कर हो रहा है। अरविंद केजरीवाल अपने सहयोगियों को भी ये संदेश देने में नाकाम रहे हैं कि आप की ईमानदारी पर दाग बर्दाश्त नहीं है।

सुचिता के साथ चलने वाली पारदर्शक सत्ता व्यवस्था जनता का दिल बहुत जल्दी जीत सकती है। भारतीय लोकतंत्र की यही खूबी है। भारतीय लोकतंत्र सत्ता को दण्डित करने में भी सक्षम है। अरविंद केजरीवाल की 67 सीटों वाली सत्ता का भी दिल्ली की जनता पांच साल बाद फाइव फिंगर टेस्ट करेगी। जिस टू फिंगर टेस्ट से केजरी बाबू की सत्ता का चरित्र पता चल रहा है कहीं फाइव फिंगर टेस्ट में वो चरित्र पूर्णरुपेण सत्य न साबित हो जाए। संभलिए, केजरी बाबू।



कहानी मैगी से आगे भी है, जो अनसुनी है

मैगी पर देश भर में बैन लग जाने के बाद ये लग रहा है मानों पूरे देश में खाद्य पदार्थ पूरी तरह से सुरक्षित हो गए हैं लेकिन सच इससे परे है। इस देश में एक संस्था काम करती है जिसका नाम है, भारतीय खाद्य सरंक्षा एवं मानक प्राधिकरण। अंग्रेजी में इसे ही फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड ऑफ इंडिया कहते हैं। संक्षेप में fssai। भारत सरकार के इस प्राधिकरण का काम देश भर में खाद्य पदार्थों के लिए मानक तय करना और ये सुनिश्चित करना है कि मानकों का पूरा अनुपालन हो। अब ये संस्था करती क्या है हम इस बहस में नहीं पड़ेंगे बल्कि हम आपको ये बताना चाहते हैं कि ये संस्था जो कुछ भी करती है वो भी इस देश के काम नहीं आ रहा है।
ऐसा नहीं है कि fssai ने देश में सिर्फ मैगी की ही जांच की है और उसे ही खाद्य मानकों के विपरीत पाया है। मैगी से अलावा भी इस देश में हजारों ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जो मानकों पर खरे नहीं पाए गए हैं लेकिन दुर्भाग्य से उनपर कभी चर्चा नहीं हुई। ऐसा क्यों हुआ इस पर चर्चा करना जरूरी है लेकिन उससे पहले आपको ये बताते हैं कि देश में मिलावट का जाल कितना बड़ा हो चुका है। fssai के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। आंकड़े बताते हैं कि साल 2012 -13 में खाद्य पदार्थों के दस हजार से अधिक नमूने फेल हो गए। हालांकि कुल जांचे गए नमूने की संख्या सत्तर हजार के करीब थी। आपको ये जानकर और भी हैरानी होगी कि प्राधिकरण ने ऐसे खाद्य पदार्थ बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी की जिनके नमूने जांच में फेल हो गए थे। इनसे पांच करोड़ से अधिक का जुर्माना भी वसूला गया।
2013-14 में लिए गए 72,994 सैंपल्स में से 72,200 नमूनों की जांच की गई। इनमें से 13,571 नमूनों में मिलावट पाई गई।
1 अप्रैल 2014 से 30 सितंबर 2014 तक fssai ने 32,389 नमूने लिए जिनमें से 28,784 नमूनों की जांच हुई। इन सैंपल्स में से 4924 ऐसे निकले जो 2006 के फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट के मुताबिक खरे नहीं थे। ये आंकड़ें fssai के जरिए ही उपलब्ध कराए गए हैं।
जाहिर है कि इतनी बड़ी संख्या में देश में अगर खाद्य पर्दाथों के नमूने फेल हो रहे हैं तो हम में हर एक शख्स कुछ न कुछ मिलावटी खा ही रहा है। ये जानते हुए भी हम रोजाना मिलावटी और मानकों पर खरे न उतरने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन कर रहे हैं, हम चुप हैं। हमें कोई परेशानी नहीं है। हमने ये मान लिया है कि हमें तो मिलावटी ही खाना है। हमने ये माना इसके पीछे हमारा सिस्टम भी कम दोषी नहीं है। सिस्टम की जो सख्ती हमने मैगी मामले में देखी है उतनी सख्ती हमें हमेशा दिखनी चाहिए लेकिन अफसोस है कि हमें दिखी नहीं। सिस्टम की ये लापरवाही हमारी एक आदत को मजबूत करती गई। हमने मिलावटी खाने को अपनी आदत में शुमार कर लिया। अब हमें मिलावटी खाना कम ही बुरा लगता है। इस मुद्दे पर चर्चा करने के दौरान अक्सर हम जमाने को ही खराब बताकर खुद को तसल्ली दे लेते हैं।







लगे हाथ इस संबंध में भी चर्चा करना जरूरी है कि जब पूरे देश में खाद्य पदार्थों में इतनी मिलावट साबित हो रही है तो जनता तक ये जानकारी क्यों नहीं पहुंच रही है। ये एक मूलभूत परेशानी है। प्राधिकरण जांच तो कर रहा है लेकिन जनता को नहीं बता रहा। क्या प्राधिकरण इस जानकारी का बहुत अधिक प्रचार प्रसार करना नहीं चाहता या फिर करने के बारे में कभी सोचा ही नहीं। ये दोनों ही स्थितियां हमारे लिए घातक हैं। एक सूरत ये भी हो सकती है कि कंपनियों और मिलावटी खाद्य पदार्थों का कारोबार करने वालों के साथ प्राधिकरण का दोस्ताना हो और इसीलिए ऐसी जानकारियों को बड़े पैमाने पर प्रचारित प्रसारित नहीं किया जाता।

फिलहाल मैगी के टू मिनट्स मायाजाल से बाहर निकले भारतीय समाज के पास मिलावटी खाद्य पदार्थों की लंबी फेहरिस्त है लेकिन हमारी आंखों पर पट्टी है। हम मिलावट के कारोबार को भी सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं।  

गंगा के लिए अब कोई भगिरथ नहीं...

कैसी विडंबना है कि इस देश की जिस जलधारा में करोड़ों सनातनियों की सहर्ष आस्था हो....जिसकी एक बूंद पर लौकिक जगत के भंवर से पार अलौकिक आनंद का मार्ग प्रशस्त करती हो....उसी जलधारा को भौतिक जगत में पैसों के जरिए साफ करने की दो दशकीय व्यवस्था के असफल होने के बाद एक बार फिर वैसी ही कोशिशें हो रहीं हैं....
गंगा में प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए नरेंद्र मोदी की सरकार ने नमामि गंगे नाम से एक योजना शुरू की है...ऐसी कोशिशों की शुरुआत राजीव गांधी ने की थी और उसके बाद कई और प्रधानमंत्रियों ने इस कोशिश को कोशिश के तौर पर बरकरार रखा...भले ही आप जुमले के तौर पर ये मानते हों कि कोशिशें कभी बेकार नहीं जाती लेकिन यहां आपको कोशिशों के बेकार होने का पता चल जाता है....दरअसल 1984 में राजीव गांधी ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए गंगा एक्शन प्लान शुरू तो किया लेकिन बेहद अनप्लैन्ड रूप में...राजीव गांधी से लगायत मनमोहन सिंह तक गंगा को साफ करने की कोशिश ही करते रह गए और गंगा हर आज में बीते कल से कहीं अधिक गंदी होती रही...गंगा एक्शन प्लान के चरण एक और दो खत्म हो गया...गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया गया...यही नहीं गंगा बेसिन अथॉरिटी बना दी गई लेकिन ढाक तीन पात तो छोड़िए ढाक के ढाई पात भी नहीं दिखे....
सरकारों को समझ ही नहीं आ रहा है कि गंगा को साफ करने के लिए पैसों से कहीं अधिक गंभीर प्रयास की जरूरत होती है...हर बार गंगा को साफ करने के लिए पैसों के प्रयोग पर अधिक जोर दिया गया बजाए इसके कि इन पैसों से जो योजनाएं लागू हो रहीं है वो प्रभावी रूप से चलती रहीं इसपर ध्यान दिया जाता...
फिलहाल दो दशकों में हुई गंगा की दुर्दशा की चिंता से आगे बढ़कर आप जब गंगा को नमामि गंगे के आइने में देखते हैं तो उस समय भी संभावनों का ज्वार नहीं आता...गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की
कोशिशें योजनाओं को शुरू करने और उनके नाम बदले जाने से आगे नहीं बढ़ पा रहीं हैं...

हालांकि हम ये उम्मीद नहीं कर सकते कि गंगा की दुर्दशा को चुटकी बजा कर खत्म कर दिया जाएगा लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले एक साल में जो कुछ भी गंगा के लिए वो काफी नहीं है...बतौर सांसद नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी गंगा को स्वच्छ करने के लिहाज से कोई नजीर पेश नहीं कर पाए हैं...हालात ये हैं कि वाराणसी में गंगा के पानी में माला फूल, मलजल, अधजली लाशें आज भी दिख रहीं हैं....बनारस में गंगा के पानी में अब भी दर्जन भर के करीब नाले बिना किसी ट्रीटमेंट के गिर रहे हैं...हां ये जरूर है कि गंगा के किनारे के घाटों को साफ करने के लिए खूब उठापटक हो रही है....

देख दिनन के फेर...

भारतीय मीडिया के लिए अरविंद केजरीवील कई माएनों में अहम हैं...भारतीय मीडिया मजबूत हो रही है और सृजन कर सकती है इसकी पुष्टि भी अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं.....भारतीय मीडिया भस्मासुर भी बना सकती है ये बात भी अरविंद केजरीवाल को देख कर पता चलती है...
याद कीजिए वो दौर जब अरविंद केजरीवाल अन्ना के मंच पर टोपी पहने किनारे बैठे रहते थे...धीरे धीरे अरविंद केजरीवाल मंच के मध्य में अपनी जगह बनाते गए और अन्ना को किनारे लगाते गए.....सियासत में सुचिता की दुहाई देकर राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल पर सवाल कई बार उठे.....अरविंद केजरीवाल ने हर बार सवाल का जवाब कुछ ऐसे दिया कि मानों सवाल पूछना ही गलत हो....अब जब आधिकारिक तौर पर अरविंद केजरीवाल ने ये साफ कर दिया है कि उन्हें आलोचना पसंद नहीं तो ऐसे में ये भी तय हो जाता है कि मीडिया को अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका में आना होगा....
इस बात में कोई दो राय नहीं कि 2013 और 2014 के अन्ना आंदोलनों की न्यूज चैनलों के जरिए हुई लगातार लाइव कवरेज से लाइमलाइट में आए अरविंद केजरीवाल ने हर मौके का भरपूर फायदा उठाया....सिद्धांतों की राजनीति का दावा करने वालों के मौका देखकर सिद्धांतों से समझौता करने की खबरें भी आती रहीं...लेकिन राजनीति में जब सत्ता पाना ही एकमात्र ध्येय रह जाए तो फिर सिद्धांतों को चूल्हे या भांड़ में रख देना ही पड़ता है.....मीडिया समाज की नब्ज को समझता है लेकिन उसे जब अपनी भावनाओं के साथ जोड़ लेता है तो नब्ज दोगुनी चाल से चलती है...ये किसी भी मीडिया समाज के साथ हो सकता है...जहां प्रोफेशनलज्मि संस्कारों पर हावी नहीं हुआ है...यूरोपीय देशो में भी मीडिया का व्यवहार समाज के जरिए ही तय हो रहा है...यही वजह है कि जब सभी को अरविंद केजरीवाल के तौर पर देश में एक नई उम्मीद दिख रही थी तो ठीक उसी समय मीडिया को भी दिख रही थी...
उम्मीद को पूरा करने की राह में मीडिया ने अरविंद केजरीवाल को आगे किया और पीछे से देश की आम जनता के मिजाज को आगे बढ़ाने की कोशिशें शुरू कर दीं.....लेकिन अरविंद केजरीवाल जनता के भी उस्ताद निकले...कुर्सी पर बैठने के बाद इतनी जल्दी रंग बदलने वाला नेता देश के लोकतांत्रिक इतिहास ने इससे पहले शायद ही देखा होगा....लेकिन दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर दिल्ली सचिवालय तक के सफर में हमने एक क्रांतिकारी आंदोलन से निकले नेता को हिटलर की वर्दी में ढलते देखा....भले ही देश की सर्वोच्च अदालत ने देश के संविधान की आत्मा का सम्मान करते हुए मीडिया को आलोचना का अधिकार बहाल कर दिया लेकिन अरविंद के आदेश ने उनकी मनोदशा को साफ कर दिया है....मीडिया का मुंह बंद करने की अरविंद की कोशिश ने मीडिया को बता दिया है भारत के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ एक भस्मासुर पैदा करने की ताकत भी रखता है....
ये तब है जब अरविंद के नवरत्नों में एक पत्रकार भी शामिल है...जाहिर है पत्रकारिता पर चाबुक चलाने का तरीका एक पत्रकार ही बता सकता है.... जो भी हो लेकिन मीडिया की आलोचना से बचने के लिए ऐसे हथियार के प्रयोग की कोशिश बताती है कि मीडिया को पहले से कहीं अधिक मजबूत और तार्किक होना होगा....सतही और आधारहीन खबरों से तौबा करनी ही होगी....सनसनी वाली पत्रकारिता के दिन हालांकि अब बहुत हद तक लद गए हैं लेकिन जो कुछ बचे हैं उन्हें भी लाद देना ही होगा....अन्यथा अरविंदों की नोटिसें आती रहेंगी।


जो गांव के प्रधान लायक नहीं वो विधायक बन गए...

क्या आपको पता है कि इस देश में एक धरना राज्य भी है। अगर जानकारी नहीं है तो खुद को अपडेट कर लीजिए। इस राज्य का नाम है उत्तराखंड। 8 नवंबर सन 2000 को जमीन का ये टुकड़ा उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक राज्य बना। पहले इसका नाम उत्तरांचल रखा गया और फिर बाद में बदल कर उत्तराखंड कर दिया गया। राज्य के फिलहाल के हालात देखने के बाद जब आपको ये बताया जाएगा कि इस राज्य को बनाने के लिए इस इलाके के लोगों ने एक मजबूत राजनीतिक तंत्र से लड़ाई लड़ी तो आपको हैरानी होगी है। उत्तरांचल कहिए, उत्तराखंड कहिए, पहाड़ों वाला प्रदेश कहिए या फिर धरने का प्रदेश कहिए, शिकायतों का प्रदेश कहिए।
इस राज्य को लेकर जो सोच निर्माण के दौरान थी वो अब समाप्त हो चुकी है। उम्मीदों की जो गठरी पहाड़ी ढलानों से उतरकर लखनऊ की सड़कों तक पहुंची थी वो मानों कहीं गुम हो चुकी है। हो सकता है कि राज्य पूरे देश में एक आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था की नजीर के तौर पर उभर पाता लेकिन राज्य के मुस्तकबिल में कुछ और था। निर्माण के चौदह सालों में राज्य ने शिकायतों का ऐसा कारखाना लगाया कि हर गली से गिले शिकवे सुनाई देने लगे। राज्य में कौन ऐसा है (सिवाए नेताओं के) जिसे शिकायत नहीं।
जहां तक मुझे लगता है, इस राज्य में एक सबसे बड़ी समस्या इस बात की है कि हर कोई किसी विशेष श्रेणी में आना चाहता है। हर एक शख्स यही चाहता है कि उसे राज्य सरकार विशेष दर्जा दे दे। पता नहीं ये आदत पहाड़ के लोगों में कहां से आई लेकिन ऐसा कुछ पहले नहीं था। किसी को नौकरी नहीं मिली तो वो पानी की टंकी पर चढ़ जाता है, किसी के कॉलेज मे क्लास शुरू नहीं हुई तो वो मोबाइल टॉवर पर चढ़ जाता है।
राज्य की विडंबना यही खत्म नहीं होती। इस पृथक राज्य के निर्माण के दौरान अवधारणा का बड़ा हिस्सा पर्वतीय क्षेत्र को नियोजित तरीके से विकसित करने से जुड़ा था। एक ऐसे राज्य की परिकल्पना थी जिसमें प्रमुख रूप से पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। अफसोस ऐसा कुछ नहीं हुआ।
राजनीतिक स्वच्छता की उम्मीद तो टूटी ही, जवाबदेह शासन का खाका खींचने में भी हम असफल रहे।
राज्य में राजनीति का ऐसा रूप दिखा कि शर्मसार होने के सिवा कोई और चारा नहीं था। राज्य को बने 14 साल हुए और फिलहाल यहां तीसरी विधानसभा का कार्यकाल चल रहा है। कायदों में यहां इतने सालों में तीन मुख्यमंत्री होने चाहिए थे लेकिन यहां के वर्तमान मुख्यमंत्री का नंबर आठवां है। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद यहां के नागरिकों का कितना विकास हुआ इसकी चर्चा तो बाद में कर लेंगे लेकिन नेताओं का जिक्र पहले कर लीजिए। दरअसल राज्य बनने के बाद किसी प्रजाति का विकास बिना किसी शक्तिवर्धक टॉनिक के हुआ है तो वो है नेता। इस बात को कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि उत्तराखंड में ऐसे लोग विधायक हैं जो ग्राम प्रधान भी बनने लायक नहीं है। हो सकता है मैं जिनके लिए ये कह रहा हूं उन्हें ये बात खराब लगे लेकिन ये एहसास अब हर उत्तराखंडी को होने लगा है।  

हालात अच्छे नहीं हैं। राज्य अभी तक ये तय नहीं कर पाया कि उसकी राजधानी कहां होगी। अब भी राज्य की विधानसभा और सचिवालय अस्थायी राजधानी में ही चल रहा है। मजबूती से कठोर निर्णय लेने की ताकत किसी में दिखती नहीं। राज्य में दो राज्य नजर आते हैं। 13 में 4 मैदानी जिलों की सूरत बचे 9 पहाड़ी जिलों से बिल्कुल अलग है। विकास का ध्रुवीकरण देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर के आसपास ही होकर रह गया है। उत्तराकशी, चमोली, पिथौरागढ़ जैसे इलाकों में हालात बस इतने ही बदले कि हम चर्चा कर सकें। इतने नहीं कि हम चर्चा करें ही। 
लोगों को पानी तो प्रकृति ही दे देती है लेकिन बिजली और सड़क सरकार नहीं दे पा रही है। स्कूलों में शिक्षिकों का टोटा है। सवाल छोटा सा है, उत्तराखंड के लोगों को समझ लेना चाहिए या शायद लोग समझने भी लगे हैं कि वो जमीन पर लकीर खींचकर अपने लिए राज्य बना सकते हैं लेकिन अपने लिए एक बेहतर जीवन की गारंटी नहीं ले सकते।



लिख दिया पेशावर





लिख दिया पेशावर
दर्द, आंसू, चीख
लिखना था सन्नाटा
लिख दिया पेशावर ।
मौत, जुल्म, जिंदगी
लिखना था जज्बात
लिख दिया पेशावर ।
कॉपी, पेंसिल, हरा लिबास
लिखना था इम्तहान
लिख दिया पेशावर ।
जनाजा, कब्र, मय्यत
लिखना था मातम
लिख दिया पेशावर ।
बेबसी, बेसबब, बदहवास
लिखना था बारूद
लिख दिया पेशावर ।। 

आवाज उठेगी बरास्ता तुम्हारे

नारस में इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रारंभ से जुड़े रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार नरेश रुपानी जी के आक्समिक निधन से समूचा पत्रकार जगत स्तब्ध है। नरेश रुपानी जी बनारस के सबसे चर्चित टीवी पत्रकारों में से एक थे। प्रारंभ से ही बनारस की स्थानीय मीडिया से जुड़े रहने वाले नरेश रुपानी के नाम को संबोधित करने वाला हमेशा उन्हें रुपानी जी ही कहा करता था।
रुपानी जी बनारस की टीवी पत्रकारिता के एक जाने माने चेहरे थे। उनका नाम जेहन में आते ही आंखों पर मोटा चश्मा लगाए, गले में मोबाइल लटकाए और हाथों में लेटर पैड लिए एक ऐसे शख्स की तस्वीर उभर कर सामने आती है जो किसी भी प्रेस कांफ्रेंस में आगे बैठना पसंद करता था। रुपानी जी न सिर्फ आगे बैठते थे बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ बैठते थे। सवालों की एक लंबी लिस्ट उनके दिमाग में पहले से ही तैयार रहती थी। स्थानीय नेताओं से लगायत राष्ट्रीय नेताओं तक को घेरने के लिए रुपानी जी पूरी तैयारी से आते थे। यह वही शख्स कर सकता है जो हर मुद्दे पर अपनी मुख्तलिफ राय रखता हो। साथ ही जिसे हर विषय के बारे में जानकारी हो। रुपानी जी में वह सबकुछ था।
बनारस में स्थानीय स्तर पर टीवी पत्रकारिता को स्थापित करने में रुपानी जी के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। रुपानी जी ने उस वक्त बनारस में पत्रकारिता की शुरुआत की जब संसाधनों का नितांत अभाव था। मोबाइल का प्रयोग भी बेहद सीमित था। लोगों के लिए प्रेस का मतलब सिर्फ अखबार ही हुआ करता था। ऐसे समय में मीडिया वालों का उदय हो रहा था। रुपानी जी ने मीडिया वालों की पहचान स्थापित करने में अपनी अहम भूमिका निभाई। स्थानीय स्तर पर जितना मजबूत नेटवर्क रुपानी जी का था उतना बड़ा नेटवर्क बनाने के लिए पत्रकारों को खासी मेहनत करनी पड़ती है। आम आदमी से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक रुपानी जी को दूर से ही पहचान लेते थे।
रुपानी जी सामाजिक जीवन में भी खासे सक्रिय रहे। झूलेलाल जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित कराने में उन्होंने जो योगदान दिया उसको नकारा नहीं जा सकता। रुपानी जी अपने जीवट के लिए हम सब के आदर्श हैं। अफसोस इस बात का है कि रुपानी जी इलेक्ट्रानिक मीडिया की लड़ाई को अधूरा छोड़ कर चले गए। पत्रकारों की मुफलिसी को रुपानी जी ने करीब से देखा था और यही वजह है कि वह चाहते थे कि इसे दूर करने के लिए गंभीर प्रयास हों। इमजा भी हमेशा ऐसे मुद्दों को उठाता रहा है। इमजा की कोशिश है कि टीवी पत्रकारिता से जुड़े पत्रकारों की वह श्रेणी जहां भविष्य की अनिश्चितता उम्मीदों पर हावी रहती है उनके लिए सरकारें गंभीर प्रयास करें। समाज की अंतिम पंक्ति तक की पूरी खबर हर खासो आम तक पहुंचाने वाले टीवी रिपोर्टरों में जमात में बहुतायत ऐसे हैं जो किसी दैनिक मजदूर से भी कम पर काम करते हैं। समाज की मुख्यधारा को प्रभावित करने वाले यह चेहरे अपनों के बीच बेगाने हैं। यह वही लोग हैं जो सुबह खबरों पर निकलने से पहले अपनी मोटरसाइकिल की टंकी की पेंदी मंे जा चुकी पेट्रोल की बंूदों को हिलाकर यह इत्मीनान करते हैं कि चलो आज पहुंच जाएंगे। यह वही लोग हैं जो बारहमासी मजदूरों की तरह रोज खटते हैं और वक्त मिले तो अपने लिए सबसे सस्ता मोबाइल टैरिफ तलाशते हैं। एक मिनट की फुटेज के लिए अपनी जान लड़ा देने वाले इन टीवी वालों को शाम की बुलेटिन में चली खबर अफीम से कहीं अधिक नशा देती है। लेकिन अफसोस कि इनका हर नशा रात में इनके बच्चों के स्कूलों से आई फीस न जमा की होनी नोटिसों के साथ काफूर हो जाता है। कोई नीतिगत निर्णय सरकारें इन टीवी पत्रकारों के लिए नहीं ले पाईं हैं। इमजा की कोशिशें हैं कि ऐसे पत्रकारों के लिए गंभीर प्रयासांे की मुहिम शुरू की जा सके। आइए आप और हम साथ आएं। मिलें, चलें और मुकाम तक पहुंचे। रास्ता भी हमें खुद बनाना है और उसे तय भी खुद ही करना है। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक आवाज हम उठा रहे हैं। जरूरत आपकी और आपके सहयोग की है।

‘मौसेरे भाई‘ सब साथ आए

हैरानी नहीं हुई जब इस देश के तमाम राजनीतिक दल दागियों की परिभाषा तय करने और उन्हें बचाने के लिए एकजुट हो गए। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से ही राजनीतिक हलकों में बेचैनी बढ़ गई थी। हमाम में नंगे होेने के लिए बेताब नेताओं ने आखिरकार बेशर्मी की सभी हदें पार कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ संसद की सर्वोच्चता का हथियार चल दिया। सांसदों को लगता है कि जन प्रतिनिधी कैसा हो इसे चुनने का अधिकार सिर्फ जन प्रतिनिधियों को ही है। यही वजह है कि संसद में एक दूसरे पर चीखने चिल्लाने वाले सभी दलों के नेता इस परिस्थिती में एक हो चुके हैं। उन्हें पता है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ संसद की सर्वोच्चता का ब्रह्मास्त्र का प्रयोग नहीं हुआ तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में दागी सांसदों के आने का रास्ता बंद हो जाएगा। 

10 जुलाई 2013 को लिली थामस, चुनाव आयोग, बसंत चैधरी और जनमूल्यों को समर्पित संस्था लोकप्रहरी के द्वारा दायर जनहित याचिका पर फैसला देते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ कर दिया कि दो वर्ष या उससे अधिक की सजा पाने वाले व्यक्तियांे को जनप्रतिनिधि नहीं बनाया जा सकता है। यही नहीं जेल से चुनाव लड़ने पा भी सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह रोक लगा दी। कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को ही निरस्त कर दिया। दरअसल यह धारा दागियों के लिए संसद में पहुंचने के लिए बाईपास का काम करती है। कानून की इस धारा के तहत प्रावधान है कि दोषी जनप्रतिनिधि ऊपरी अदालत में अपील दायर करने के और उस अपील पर फैसला आने तक अपनी सदस्यता को बरकरार रख सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यही व्यवस्था खत्म कर दी है। कोर्ट ने राजनीति को मूल्यपरक विषयों पर केंद्रित करने के लिहाज से भड़काऊ भाषण देने के दोषी की सदस्यता को समाप्त करने की व्यवस्था दी है। 

कोर्ट की यह दवा राजनीतिज्ञों को कुछ अधिक ही कड़वी लगी। फैसला आने के बाद से ही राजनीतिक दल अपनी असलियत छुपाने के लिए एकजुट होने लगे। मुखौटों के पीछे की स्याह सच कहीं सामने न आ जाए इसलिए संसद की सर्वोच्चता और संसद की गिरती साख जैसी भावुक शब्दों का प्रयोग शुरू हो गया। सांसदों ने मिलकर व्यूह की रचना की। अब तय हुआ है कि किस जनप्रतिनिधि को दागी कहा जाए और किसे क्लीन चिट दी जाए यह कोर्ट नहीं बल्कि संसद ही तय करेगी। बाकायदा इसके लिए कानून में बदलाव किया जा रहा है। लेकिन हमारे माननीय यह बताने के लिए तैयार नहीं है कि संसद की गिरती साख का जिम्मेदार कौन है। माननीय यह भी नहीं बताना चाहते कि आखिर संसद की सर्वोच्चता क्यों खत्म हो गई। संसद की विशाल इमारत में गोल हाल में बैठकर तमाम मुद्दों पर एक दूसरे को पूरी तरह गलत साबित करने वाले सांसदों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि आखिर इस मुद्दे पर उनकी सहमति इतनी जल्दी कैसे बन गई। 

दरअसल 1952 से शुरू हुआ भारतीय गणतंत्र का सफर पैंसठ सालों में इतना भटक चुका है कि उसे अपनी मंजिल ही याद नहीं रह गई है। चुनाव प्रणाली और उससे जुड़े तमाम पहलुओं पर शोध करने वाली संस्था एडीआर और नेशनल इलेक्शन वाच की रिपोर्ट के मुताबिक देश 30 फीसदी जनप्रतिनिधियों ने माना है कि उनके खिलाफ अपराधिक मुकदमें चल रहे हैं। इनमें से 14 फीसदी ऐसे हैं जिनपर गंभीर आरोप हैं। झारखंड जैसे नए राज्य की विडंबना देखिए कि यहां 2009 के विधानसभा चुनावों में जीत कर पहुंचे 74 फीसदी जनप्रतिनिधि अपराधिक मामलों का सामना कर रहे थे। बिहार की 2010 विधानसभा में 58 फीसदी जनप्रतिनिधि अपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी मंे 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में 47 फीसदी जनप्रतिनिधि अपराधिक मुकदमें झेल रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के टिकट पर चुनाव लड़कर जीतने वाले 82 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों ने चुनाव आयोग के समक्ष दायर अपने हलफनामे में माना है कि वह अपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। 

यह सच है कि इस बात की आशंका भी है कि राजनीतिक दांव पेंच के बीच सुप्रीम कोर्ट के इन प्रावधानों का दुरुप्रयोग भी हो सकता है। लेकिन सरकार का रवैया इस पूरे मामले में बेहद हैरान करने वाला है। सरकार ने इस बात की कोई कोशिश नहीं कि चुनाव सुधारों के दौर को आगे बढ़ाया जाए और संसद में दागियों के पहंुचने पर रोक लगाई जाए। बल्कि सरकार ने अपने और अपने ‘मौसेरे भाइयों‘ को सुरक्षित रखने के लिए नई व्यवस्था बना दी। अब ऐसे में अगली बार जब सांसद, संसद की सर्वोच्चता की बात करेंगे तो जवाब क्या दिया जाए ?

टुकड़ा टुकड़ा टूट रहा है मुलायम का सपना

यूपी के गौतम बु़द्ध नगर की एसडीएम दुर्गा शक्ति के निलंबन के बाद जिस तरह से अखिलेश सरकार घेरे में आई है उससे साफ हो चला है कि देश के सबसे बड़े सूबे में सपा की सरकार में मुख्यमंत्री अखिलेश से कहीं अधिक उनके रिश्तेदारों का प्रभाव है। गौतम बुद्ध नगर की एसडीएम दुर्गा शक्ति को अखिलेश सरकार ने निलंबित कर के यह साफ कर दिया है सूबे में ईमानदार अफसरों को काम नहीं करने दिया जाएगा। दुर्गा शक्ति को निलंबित करने के पीछे अखिलेश सरकार ने बड़ा अजीब तर्क दिया। पहली बार तो लगा कि सपा सरकार ने अपने बनने के बाद से हुए 27 दंगों से सबक ले लिया है लेकिन जल्द ही सच्चाई सामने आ गई। अखिलेश सरकार ने कहा कि गौतमबुद्ध नगर में एक मस्जिद की दिवार एसडीएम दुर्गा शक्ति ने गिरवाई है। इससे धार्मिक उन्माद पैदा होने का खतरा है लिहाजा एसडीएम को निलंबित करना जरूरी है। यूपी सरकार के इस फैसले के खिलाफ समूचे देश की नौकरशाही के एकजुट होने के बाद इस घटना के जांच के आदेश दिए गए। उसमें साफ हो गया कि दिवार एसडीएम ने नहीं गिरवाई। यहां एक और बात गौर करने वाली है। जिस दिवार को गिराए जाने को यूपी की समाजवादी सरकार सांप्रदायिक चश्मे से देख रही है उसे बचाने के लिए किसी ने कोई प्रयास नहीं किए। और न ही एसडीएम के खिलाफ कोई शिकायत कहीं दर्ज हुई। बावजूद इसके सरकार ने सबकुछ खुद ही सोच लिया और नतीजा सामने है। हैरानी इस बात को भी लेकर होती है कि अखिलेश यादव ने अपने सत्ता संभालने के बाद से अब तक 27 दंगे होने की बात कही है लेकिन यह कभी नहीं बताया कि उन दंगों को रोकने के लिए सरकार ने क्या कोई कोशिश की थी। 

अब जबकि समाजवादी नेता और यूपी एग्रो के चेयरमैन नरेंद्र भाटी ने यह कबूल कर लिया है कि उनके ही फोन काॅल के बाद दुर्गा शक्ति का निलंबन हुआ तो साफ हो जाता है कि अखिलेश सरकार में सत्ता के कई केंद्र हो चुके हैं। अखिलेश यादव का बतौर मुख्यमंत्री सरकार पर कोई नियंत्रण भी नहीं रह गया है। नरेंद्र भाटी का भाषण कई बातों की ओर इशारा करता है। नरेंद्र भाटी अपने भाषण में दुर्गा शक्ति के प्रति अपनी नाराजगी को बेहद आपत्तिजनक भाषा के इस्तमाल के जरिए जता रहे हैं। इससे साफ होता है यूपी सरकार में नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों के रिश्ते मधुर नहीं हैं। राज्य की इन दो प्रमुख ईकाइयों के बीच गहरी खाई है। यह बात कुछ दिनों पूर्व प्रतापगढ़ के कुंडा में डीएसपी की हत्या के बाद भी सामने आई थी। सरकारी कर्मचारी अपने को सुरक्षित नहीं महसूस कर रहे हैं और शायद वह हैं भी नहीं। इलाहाबाद में सरेराह एक दरोगा की हुई हत्या यह साबित करने के लिए काफी है। नरेंद्र भाटी ने अपने भाषण में यह भी बताने की कोशिश की है उनका मुलायम और अखिलेश से सीधा संपर्क है। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि अखिलेश यादव को रिमोट के जरिए संचालित किया जा रहा है। मुलायम से लेकर शिवपाल और आजम खां तक इस प्रतापी पुत्र को अपने हिसाब से चला रहे हैं। हालात यह हैं नरेंद्र भाटी जैसे नेता भी सीएम पर एक आईएएस के निलंबन के लिए दबाव डालने में सफल हो जाते हैं। 

यूपी में अखिलेश यादव ने जब सत्ता संभाली थी तो सूबे के साथ साथ पूरे देश के लोगों को उम्मीद थी कि भारत के सबसे बड़े राज्य और राजनीतिक रूप से बेहद अहम राज्य की एक नई और विकसित तस्वीर हमारे सामने होगी। लेकिन अब धीरे धीरे अखिलेश का मायाजाल टूटने लगा है। साफ दिखने लगा है कि अखिलेश यादव महज मोहरे के रूप में इस्तमाल हो रहे हैं। पूरे प्रदेश में एक अजीब सी अराजकता है। यह ठीक वैसी ही है जैसी कभी मुलायम के मुख्यमंत्रीत्व काल में हुआ करती थी। सत्ता के कई कंेद्र हो चुके हैं। तंत्र प्रभावी नहीं रह गया है। अखिलेश यादव ने हालात सुधारने की तमाम कोशिशें कीं लेकिन स्थिती बदली नहीं। अब तो जनता भी मुफ्त में बंटने लैपटाप से अधिक कानून व्यवस्था की बातें कर रही हैं। हत्या, बलात्कार, दंगे सपा सरकार की पहचान बन चुके हैं। ऐसे में 2014 में पीएम बनने का सपना पालने वाले मुलायम के लिए दुश्वारियां खड़ी हो सकती हैं। यूपी की 80 में से 40 लोकसभा सीटों को जीतने का ख्वाब देख रही समाजवादी पार्टी अपने ही जाल में फंसती जा रही है। एक तरफ जनता को लगने लगा है कि सपा को विधानसभा चुनावों में वोट देकर गलती की तो वहीं सपा के थिंकटैंक को लग रहा है कि अखिलेश पर जरूरत से अधिक नियंत्रण ने वोट बैंक पर से कंट्रोल खत्म कर दिया है। ऐसे में आने वाले दिनों में स्थिती को संभालना अखिलेश यादव के लिए बेहद मुश्किल होगा।