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मनमोहन ने केजरी दिया, मोदी, कन्हैया देंगे !

याद कीजिए वो दौर जब मनमोहन सिंह की सरकार पर लग रहे भ्रष्ट्राचार के आरोपों के बीच देश में एक पारदर्शी सरकार बनाने के लिए रालेगांव के अन्ना के नेतृत्व में जनसमूह उमड़ पड़ा था। भारत के लोकतंत्र ने विचारों का ऐसा प्रवाह पहली बार देखा था। पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि देश में सिर्फ भीड़ नहीं रहती। सैंतालिस का संग्राम से चूकी पीढ़ी को पहली बार ये एहसास हुआ कि इस देश में लोकतंत्र है तो क्यों है, क्यों हमें संविधान निर्माताओं ने ऐसा मंच दिया। इस देश की आजाद पीढ़ी ने पहली बार समझा कि लोकतंत्र में विचारों के सहारे, बहस के जरिए बेहतरी की राह निकाली जा सकती है...हालांकि ये सच है कि इस युवा पीढ़ी को ये राह दिखाने वाला एक बुजुर्ग ही था और सच ये भी है कि अन्ना के आंदोलन से जिस निहितार्थ की उम्मीद थी वो पूरी तो नहीं हुई लेकिन एक उम्मीद सी जरूर बंध गई....लगा कि अब इस देश में खुलकर भ्रष्ट्राचार के खिलाफ आवाज उठाई जा सकती है....
लेखपाल, पटवारी, मुंशी, बाबू, दरोगा, सिपाही....हम कितने जकड़े थे.....हालांकि आज भी ये बेड़ियां टूटीं तो नहीं हैं लेकिन ढीली तो हुईं हैं...28 – 30 साल का युवा जिस घुटन को महसूस कर रहा है वो कम सी लगने लगी है...
अन्ना के आंदोलन का शुरुआत में कोई राजनीतिक परिणाम समझ में नहीं आता था लेकिन समय बीतने के साथ विचारों के भेद ने देश को एक नया राजनीतिक विकल्प दे दिया... मनमोहन सरकार की नाकामियों और अन्ना आंदोलन की सफलता ने आम आदमी पार्टी की राजनीति को रफ्तार दे दी...ये साफ है कि अरविंद केजरीवाल टाइप राजनीति के जनक जितने अन्ना हैं उतना ही मनमोहन सरकार है...
लोकतंत्र में बेहतर गवर्नेंस की कोशिश में जनता हमेशा लगी रहती है...देश को बेहतर तौर पर चलाने के बारे में जितना मंथन देश की आम जनता करती है उतना तो देश की संसद भी नहीं करती...हालांकि इस बात में भी कोई दो राय नहीं है कि बेहतरी की उम्मीद में जनता अतिश्योक्तियों पर भी भरोसा करने लगी है...नरेंद्र मोदी बेहतर विकल्प थे या नहीं ये पांच सालों बाद ही तय हो पाएगा लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं कि चुनावी सभाओं में नरेंद्र मोदी जब बोलते थे तो लगता था कि वो वही बोल रहे हैं जो हम सुनना चाह रहे हैं...लेकिन सरकार बनने के दो सालों बाद ही न जाने क्यों ये लगने लगा कि मोदी सरकार वो सबकुछ नहीं कर रही है जिसकी हम उससे उम्मीद कर रहे थे...
मोदी सरकार के बनने के दो सालों में कई ऐसी बहसें भी देश की मुख्य धारा में आ गईं जिनकी उम्मीद देश का पढ़ा लिखा तबका नहीं कर रहा था...देश के इस तबके को विरोध जताने की इच्छा हुई और रास्ता कन्हैया जैसों से मिलता नजर आ रहा है...हां, ये जरूर है कि जिस विरोध के प्याले को मनमोहन सिंह की सरकार ने दस सालों में जनता को पिलाया उसे नरेंद्र मोदी की सरकार ने दो सालों में जनता को पूरा पिला दिया...
इस बात को दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि कन्हैया का राजनीतिक लक्ष्य क्या होगा लेकिन अगर कन्हैया को प्रतीक के तौर पर लिया जाए तो इस बात की पूरी संभावना है कि जिस तरह मनमोहन सरकार ने अरविंद केजरीवाल दिया उसी तरह से मोदी सरकार कन्हैया को देगी....

कन्हैया को लेकर भावुक होने और उसके साथ खड़े होने से पहले हमें ये समझना होगा कि हम भारतीय राजनीति को लेकर लक्ष्यों को बेहद करीब में रख लेते हैं...ऐसी प्रवृति मेरी समझ में लोकतंत्र की गंभीरता और टिकाऊपन के लिए ठीक नहीं है....हालांकि इन सब बहसों के बीच न जाने क्यों कन्हैया वही सब बोल रहा है जिसे कहने की हम कोशिश कर रहे थे और जिसे सुनना हमें अच्छा लग रहा है....

केजरी बाबा का एसएमएस पैक खत्म हो गया क्या !

चुनाव से पहले हर बात के लिए जनता से एसएमएस मंगाने वाले स्वघोषित महापुरुष अरविंद केजरीवाल का एसएमएस पैक अब खत्म हो गया है। अब उनके पास जनता का एसएमएस पढ़ने का समय नहीं है। यही वजह है कि अब अरविंद केजरीवाल वैट प्रतिशत बढ़ाने से पहले जनता से राय शुमारी नहीं करते। यही वजह है कि अपने प्रचार पर 526 करोड़ रुपए खर्च करने से पहले वो जनता से नहीं पूछते। जाहिर है कि अरविंद केजरीवाल भी उसी रास्ते पर चल चुके हैं जिस पर देश के अन्य राजनीतिक दल चल रहे हैं। मुलभूत प्रश्न ये है कि क्या अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के साथ विश्वासघात किया है या फिर दिल्ली की जनता का राजनीतिक प्रयोग अब धीरे धीरे गलत साबित होने लगा है।

अरविंद केजरीवाल ने भारतीय जनमानस के उस साठ फीसदी हिस्से में उम्मीद की अलख जगाई जिसे हम युवा कहते हैं। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था की गहरी जानकारी रखने वालों को अरविंद केजरीवाल से कोई बड़ी उम्मीद पहले से ही नहीं थी लेकिन फिर भी अरविंद केजरीवाल को लोग एक बार देखना चाहते थे। अरविंद केजरीवाल की जनसभाओं में युवाओं ने बड़ी संख्या में शिरकत की। कइयों ने अपनी अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ कर अरविंद का साथ पकड़ा और वालंटियर बन गए। इन सब को अरविंद केजरीवाल से यही उम्मीद थी कि आम आदमी पार्टी की सरकार सही माएनों में आम आदमी की ही सरकार होगी। राजनीतिक सुचिता का सपना सभी की आंखों में एक बार फिर से तैरने लगा था। अरविंद केजरीवाल चूंकि अन्ना के मंच से निकलकर आए थे लिहाजा लोगों को अरविंद केजरीवाल पर भरोसा था लेकिन पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ उससे अरविंद केजरीवाल ने अपने ही वादों को गलत साबित कर दिया है।

अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी को वैसे ही चला रहे हैं जैसे बहुजन समाज पार्टी को काशीराम ने चलाया और मायावती चला रहीं हैं। आम आदमी पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र मजबूत है इस बात को लेकर सभी को संशय है। अरविंद केजरीवाल के विधायकों के कृत्य तो सभी के सामने आ गए हैं। साफ हो चुका है कि अरविंद केजरीवाल अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी सख्त हिदायत नहीं दे पाए बेईमानी से बचने की। अरविंद केजरीवाल अपने स्वार्थी साथियों के साथ काम करते रहे और उन्हें भनक नहीं लगी।

अरविंद केजरीवाल ने अपने और अपनी सरकार के प्रचार पर शुरुआती दौर में ही 526 करोड़ रुपए खर्च कर डाले। हैरान करने वाली बात ये कि अरविंद केजरीवाल ने इस भारी भरकम खर्च को राज्य के अन्य विभागों के बजट को काट कर किया है। जाहिर है कि सरकार के अन्य विभागों के पास अपनी योजनाओं का प्रचार प्रसार करने के लिए बजट कम पड़ जाएगा। अरविंद केजरीवाल का प्रचार अभियान तार्किक रूप से भी सही नहीं बैठता। यदि अलग अलग विभाग अपनी अपनी योजनाओं का प्रचार करते तो बेहतर और व्यापक संदेश प्रसारित करते लेकिन शायद उसमें अरविंद केजरीवाल को इतना मौका नहीं मिलता। विभागों के जरिए प्रचार में केंद्र सरकार को कोसने का मौका भी अरविंद केजरीवाल के हाथ नहीं आता लिहाजा अरविंद केजरीवाल ने विभागों का बजट कम किया और अपना गुणगान शुरू कर दिया।


अब सवाल ये उठता है कि क्या 526 करोड़ का भारी भरकम बजट खर्च करना अरविंद केजरीवाल के लिए जरूरी था। बात बात में जनमन संग्रह कराने की सलाह देने वाले अरविंद केजरीवाल ने 526 करोड़ खर्च करने से पहले एक बार भी जनता से पूछने की जहमत क्यों नहीं उठाई। क्या अब अरविंद केजरीवाल को जनता से डर लगने लगा है। 

जनता करेगी फाइव फिंगर टेस्ट, तब देखेंगे केजरी बाबू...

मानिए या न मानिए लेकिन एहसास दिल्ली को हो रहा होगा कि अरंविद केजरीवाल को इतना बड़ा जनमत देना उनकी भूल थी। दिल्ली के विकास के लिए छटपटाने का दावा कर रहे अरविंद केजरीवाल का जितना ध्यान मनपसंद अफसरों की तैनाती करने, कांग्रेस की गलतियां गिनने और उपराज्यपाल से विवाद में है उसका आधा भी वो सही माएने में दिल्ली पर देते तो सूरत के बदल जाने का एहसास होने लगता। हैरानी होती है अरविंद केजरीवाल को देखकर। दिल्ली अपनी आने वाली पीढ़ियों को ये कैसे बता पाएगी कि उसके अरविंद केजरीवाल को चुनने की वजह क्या थी। सवाल ये भी उठेगा कि अरविंद केजरीवाल को बदलने से दिल्ली क्यों नहीं रोक पाई और इस प्रयोग से दिल्ली को मिला क्या।

सरकार में आते ही अरविंद केजरीवाल की सरकार ने पूरा ध्यान कांग्रेस सरकार की गलतियों तलाशनें में लगा दिया। हालात ये हैं कि अभी तक दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की सरकार अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान होने वाले विकास कार्यों का खाका सार्वजनिक नहीं कर पाई है। अफसरों की तैनाती के विवाद इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल की सरकार का ध्यान अपने मुताबिक अफसरों की तैनाती पर अधिक है। हम ये मान सकते हैं कि अफसरों के कुनबे का कुछ हिस्सा जनता के साथ जुड़ाव न रखता हो लेकिन सभी अफसर बेकार हैं ये मानना मुश्किल है। अफसरों की इसी फौज ने दिल्ली की सूरत को खूबसूरत बनाया है। ऐसे में अरविंद अफसरों से इतने नाराज क्यों है ये समझ से परे है। अरविंद केजरीवाल में एक अच्छा प्रशासक होता तो बेईमान अफसर भी ईमानदारी से काम करने के लिए बाध्य होता।

अरविंद केजरीवाल के पास मौका था लेकिन वो स्वयं को औरों से अलग साबित करने में असफल होते नजर आ रहे हैं। जंतर मंतर में उनकी मौजूदगी में किसान की आत्महत्या ने भी समाज में उनके मौका परस्त हो रहे व्यवहार को साबित किया है। आंदोलन में अरविंद के खास सहयोगी रहे योगेंद्र यादव को जिस तरह से पार्टी ने किनारे किया उस कार्रवाई को सभी ने हिटलरशाही की ही संज्ञा दी क्योंकि यही मुफीद लगा। इस देश के कई मौका परस्त नेताओं और पार्टियों की ही तरह अब अरविंद केजरीवाल भी राजनीतिक तरण ताल में अर्द्ध नग्न तो नजर आने ही लगे हैं।

अरविंद केजरीवाल के कानून मंत्री की करनी को उदाहरण के तौर पर लें तो साफ होता है कि केजरी बाबू के इर्द गिर्द झूठ का कारोबार सीना ठोंक कर हो रहा है। अरविंद केजरीवाल अपने सहयोगियों को भी ये संदेश देने में नाकाम रहे हैं कि आप की ईमानदारी पर दाग बर्दाश्त नहीं है।

सुचिता के साथ चलने वाली पारदर्शक सत्ता व्यवस्था जनता का दिल बहुत जल्दी जीत सकती है। भारतीय लोकतंत्र की यही खूबी है। भारतीय लोकतंत्र सत्ता को दण्डित करने में भी सक्षम है। अरविंद केजरीवाल की 67 सीटों वाली सत्ता का भी दिल्ली की जनता पांच साल बाद फाइव फिंगर टेस्ट करेगी। जिस टू फिंगर टेस्ट से केजरी बाबू की सत्ता का चरित्र पता चल रहा है कहीं फाइव फिंगर टेस्ट में वो चरित्र पूर्णरुपेण सत्य न साबित हो जाए। संभलिए, केजरी बाबू।



कहानी मैगी से आगे भी है, जो अनसुनी है

मैगी पर देश भर में बैन लग जाने के बाद ये लग रहा है मानों पूरे देश में खाद्य पदार्थ पूरी तरह से सुरक्षित हो गए हैं लेकिन सच इससे परे है। इस देश में एक संस्था काम करती है जिसका नाम है, भारतीय खाद्य सरंक्षा एवं मानक प्राधिकरण। अंग्रेजी में इसे ही फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड ऑफ इंडिया कहते हैं। संक्षेप में fssai। भारत सरकार के इस प्राधिकरण का काम देश भर में खाद्य पदार्थों के लिए मानक तय करना और ये सुनिश्चित करना है कि मानकों का पूरा अनुपालन हो। अब ये संस्था करती क्या है हम इस बहस में नहीं पड़ेंगे बल्कि हम आपको ये बताना चाहते हैं कि ये संस्था जो कुछ भी करती है वो भी इस देश के काम नहीं आ रहा है।
ऐसा नहीं है कि fssai ने देश में सिर्फ मैगी की ही जांच की है और उसे ही खाद्य मानकों के विपरीत पाया है। मैगी से अलावा भी इस देश में हजारों ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जो मानकों पर खरे नहीं पाए गए हैं लेकिन दुर्भाग्य से उनपर कभी चर्चा नहीं हुई। ऐसा क्यों हुआ इस पर चर्चा करना जरूरी है लेकिन उससे पहले आपको ये बताते हैं कि देश में मिलावट का जाल कितना बड़ा हो चुका है। fssai के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। आंकड़े बताते हैं कि साल 2012 -13 में खाद्य पदार्थों के दस हजार से अधिक नमूने फेल हो गए। हालांकि कुल जांचे गए नमूने की संख्या सत्तर हजार के करीब थी। आपको ये जानकर और भी हैरानी होगी कि प्राधिकरण ने ऐसे खाद्य पदार्थ बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी की जिनके नमूने जांच में फेल हो गए थे। इनसे पांच करोड़ से अधिक का जुर्माना भी वसूला गया।
2013-14 में लिए गए 72,994 सैंपल्स में से 72,200 नमूनों की जांच की गई। इनमें से 13,571 नमूनों में मिलावट पाई गई।
1 अप्रैल 2014 से 30 सितंबर 2014 तक fssai ने 32,389 नमूने लिए जिनमें से 28,784 नमूनों की जांच हुई। इन सैंपल्स में से 4924 ऐसे निकले जो 2006 के फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट के मुताबिक खरे नहीं थे। ये आंकड़ें fssai के जरिए ही उपलब्ध कराए गए हैं।
जाहिर है कि इतनी बड़ी संख्या में देश में अगर खाद्य पर्दाथों के नमूने फेल हो रहे हैं तो हम में हर एक शख्स कुछ न कुछ मिलावटी खा ही रहा है। ये जानते हुए भी हम रोजाना मिलावटी और मानकों पर खरे न उतरने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन कर रहे हैं, हम चुप हैं। हमें कोई परेशानी नहीं है। हमने ये मान लिया है कि हमें तो मिलावटी ही खाना है। हमने ये माना इसके पीछे हमारा सिस्टम भी कम दोषी नहीं है। सिस्टम की जो सख्ती हमने मैगी मामले में देखी है उतनी सख्ती हमें हमेशा दिखनी चाहिए लेकिन अफसोस है कि हमें दिखी नहीं। सिस्टम की ये लापरवाही हमारी एक आदत को मजबूत करती गई। हमने मिलावटी खाने को अपनी आदत में शुमार कर लिया। अब हमें मिलावटी खाना कम ही बुरा लगता है। इस मुद्दे पर चर्चा करने के दौरान अक्सर हम जमाने को ही खराब बताकर खुद को तसल्ली दे लेते हैं।







लगे हाथ इस संबंध में भी चर्चा करना जरूरी है कि जब पूरे देश में खाद्य पदार्थों में इतनी मिलावट साबित हो रही है तो जनता तक ये जानकारी क्यों नहीं पहुंच रही है। ये एक मूलभूत परेशानी है। प्राधिकरण जांच तो कर रहा है लेकिन जनता को नहीं बता रहा। क्या प्राधिकरण इस जानकारी का बहुत अधिक प्रचार प्रसार करना नहीं चाहता या फिर करने के बारे में कभी सोचा ही नहीं। ये दोनों ही स्थितियां हमारे लिए घातक हैं। एक सूरत ये भी हो सकती है कि कंपनियों और मिलावटी खाद्य पदार्थों का कारोबार करने वालों के साथ प्राधिकरण का दोस्ताना हो और इसीलिए ऐसी जानकारियों को बड़े पैमाने पर प्रचारित प्रसारित नहीं किया जाता।

फिलहाल मैगी के टू मिनट्स मायाजाल से बाहर निकले भारतीय समाज के पास मिलावटी खाद्य पदार्थों की लंबी फेहरिस्त है लेकिन हमारी आंखों पर पट्टी है। हम मिलावट के कारोबार को भी सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं।  

गंगा के लिए अब कोई भगिरथ नहीं...

कैसी विडंबना है कि इस देश की जिस जलधारा में करोड़ों सनातनियों की सहर्ष आस्था हो....जिसकी एक बूंद पर लौकिक जगत के भंवर से पार अलौकिक आनंद का मार्ग प्रशस्त करती हो....उसी जलधारा को भौतिक जगत में पैसों के जरिए साफ करने की दो दशकीय व्यवस्था के असफल होने के बाद एक बार फिर वैसी ही कोशिशें हो रहीं हैं....
गंगा में प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए नरेंद्र मोदी की सरकार ने नमामि गंगे नाम से एक योजना शुरू की है...ऐसी कोशिशों की शुरुआत राजीव गांधी ने की थी और उसके बाद कई और प्रधानमंत्रियों ने इस कोशिश को कोशिश के तौर पर बरकरार रखा...भले ही आप जुमले के तौर पर ये मानते हों कि कोशिशें कभी बेकार नहीं जाती लेकिन यहां आपको कोशिशों के बेकार होने का पता चल जाता है....दरअसल 1984 में राजीव गांधी ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए गंगा एक्शन प्लान शुरू तो किया लेकिन बेहद अनप्लैन्ड रूप में...राजीव गांधी से लगायत मनमोहन सिंह तक गंगा को साफ करने की कोशिश ही करते रह गए और गंगा हर आज में बीते कल से कहीं अधिक गंदी होती रही...गंगा एक्शन प्लान के चरण एक और दो खत्म हो गया...गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया गया...यही नहीं गंगा बेसिन अथॉरिटी बना दी गई लेकिन ढाक तीन पात तो छोड़िए ढाक के ढाई पात भी नहीं दिखे....
सरकारों को समझ ही नहीं आ रहा है कि गंगा को साफ करने के लिए पैसों से कहीं अधिक गंभीर प्रयास की जरूरत होती है...हर बार गंगा को साफ करने के लिए पैसों के प्रयोग पर अधिक जोर दिया गया बजाए इसके कि इन पैसों से जो योजनाएं लागू हो रहीं है वो प्रभावी रूप से चलती रहीं इसपर ध्यान दिया जाता...
फिलहाल दो दशकों में हुई गंगा की दुर्दशा की चिंता से आगे बढ़कर आप जब गंगा को नमामि गंगे के आइने में देखते हैं तो उस समय भी संभावनों का ज्वार नहीं आता...गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की
कोशिशें योजनाओं को शुरू करने और उनके नाम बदले जाने से आगे नहीं बढ़ पा रहीं हैं...

हालांकि हम ये उम्मीद नहीं कर सकते कि गंगा की दुर्दशा को चुटकी बजा कर खत्म कर दिया जाएगा लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले एक साल में जो कुछ भी गंगा के लिए वो काफी नहीं है...बतौर सांसद नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी गंगा को स्वच्छ करने के लिहाज से कोई नजीर पेश नहीं कर पाए हैं...हालात ये हैं कि वाराणसी में गंगा के पानी में माला फूल, मलजल, अधजली लाशें आज भी दिख रहीं हैं....बनारस में गंगा के पानी में अब भी दर्जन भर के करीब नाले बिना किसी ट्रीटमेंट के गिर रहे हैं...हां ये जरूर है कि गंगा के किनारे के घाटों को साफ करने के लिए खूब उठापटक हो रही है....

देख दिनन के फेर...

भारतीय मीडिया के लिए अरविंद केजरीवील कई माएनों में अहम हैं...भारतीय मीडिया मजबूत हो रही है और सृजन कर सकती है इसकी पुष्टि भी अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं.....भारतीय मीडिया भस्मासुर भी बना सकती है ये बात भी अरविंद केजरीवाल को देख कर पता चलती है...
याद कीजिए वो दौर जब अरविंद केजरीवाल अन्ना के मंच पर टोपी पहने किनारे बैठे रहते थे...धीरे धीरे अरविंद केजरीवाल मंच के मध्य में अपनी जगह बनाते गए और अन्ना को किनारे लगाते गए.....सियासत में सुचिता की दुहाई देकर राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल पर सवाल कई बार उठे.....अरविंद केजरीवाल ने हर बार सवाल का जवाब कुछ ऐसे दिया कि मानों सवाल पूछना ही गलत हो....अब जब आधिकारिक तौर पर अरविंद केजरीवाल ने ये साफ कर दिया है कि उन्हें आलोचना पसंद नहीं तो ऐसे में ये भी तय हो जाता है कि मीडिया को अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका में आना होगा....
इस बात में कोई दो राय नहीं कि 2013 और 2014 के अन्ना आंदोलनों की न्यूज चैनलों के जरिए हुई लगातार लाइव कवरेज से लाइमलाइट में आए अरविंद केजरीवाल ने हर मौके का भरपूर फायदा उठाया....सिद्धांतों की राजनीति का दावा करने वालों के मौका देखकर सिद्धांतों से समझौता करने की खबरें भी आती रहीं...लेकिन राजनीति में जब सत्ता पाना ही एकमात्र ध्येय रह जाए तो फिर सिद्धांतों को चूल्हे या भांड़ में रख देना ही पड़ता है.....मीडिया समाज की नब्ज को समझता है लेकिन उसे जब अपनी भावनाओं के साथ जोड़ लेता है तो नब्ज दोगुनी चाल से चलती है...ये किसी भी मीडिया समाज के साथ हो सकता है...जहां प्रोफेशनलज्मि संस्कारों पर हावी नहीं हुआ है...यूरोपीय देशो में भी मीडिया का व्यवहार समाज के जरिए ही तय हो रहा है...यही वजह है कि जब सभी को अरविंद केजरीवाल के तौर पर देश में एक नई उम्मीद दिख रही थी तो ठीक उसी समय मीडिया को भी दिख रही थी...
उम्मीद को पूरा करने की राह में मीडिया ने अरविंद केजरीवाल को आगे किया और पीछे से देश की आम जनता के मिजाज को आगे बढ़ाने की कोशिशें शुरू कर दीं.....लेकिन अरविंद केजरीवाल जनता के भी उस्ताद निकले...कुर्सी पर बैठने के बाद इतनी जल्दी रंग बदलने वाला नेता देश के लोकतांत्रिक इतिहास ने इससे पहले शायद ही देखा होगा....लेकिन दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर दिल्ली सचिवालय तक के सफर में हमने एक क्रांतिकारी आंदोलन से निकले नेता को हिटलर की वर्दी में ढलते देखा....भले ही देश की सर्वोच्च अदालत ने देश के संविधान की आत्मा का सम्मान करते हुए मीडिया को आलोचना का अधिकार बहाल कर दिया लेकिन अरविंद के आदेश ने उनकी मनोदशा को साफ कर दिया है....मीडिया का मुंह बंद करने की अरविंद की कोशिश ने मीडिया को बता दिया है भारत के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ एक भस्मासुर पैदा करने की ताकत भी रखता है....
ये तब है जब अरविंद के नवरत्नों में एक पत्रकार भी शामिल है...जाहिर है पत्रकारिता पर चाबुक चलाने का तरीका एक पत्रकार ही बता सकता है.... जो भी हो लेकिन मीडिया की आलोचना से बचने के लिए ऐसे हथियार के प्रयोग की कोशिश बताती है कि मीडिया को पहले से कहीं अधिक मजबूत और तार्किक होना होगा....सतही और आधारहीन खबरों से तौबा करनी ही होगी....सनसनी वाली पत्रकारिता के दिन हालांकि अब बहुत हद तक लद गए हैं लेकिन जो कुछ बचे हैं उन्हें भी लाद देना ही होगा....अन्यथा अरविंदों की नोटिसें आती रहेंगी।


जो गांव के प्रधान लायक नहीं वो विधायक बन गए...

क्या आपको पता है कि इस देश में एक धरना राज्य भी है। अगर जानकारी नहीं है तो खुद को अपडेट कर लीजिए। इस राज्य का नाम है उत्तराखंड। 8 नवंबर सन 2000 को जमीन का ये टुकड़ा उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक राज्य बना। पहले इसका नाम उत्तरांचल रखा गया और फिर बाद में बदल कर उत्तराखंड कर दिया गया। राज्य के फिलहाल के हालात देखने के बाद जब आपको ये बताया जाएगा कि इस राज्य को बनाने के लिए इस इलाके के लोगों ने एक मजबूत राजनीतिक तंत्र से लड़ाई लड़ी तो आपको हैरानी होगी है। उत्तरांचल कहिए, उत्तराखंड कहिए, पहाड़ों वाला प्रदेश कहिए या फिर धरने का प्रदेश कहिए, शिकायतों का प्रदेश कहिए।
इस राज्य को लेकर जो सोच निर्माण के दौरान थी वो अब समाप्त हो चुकी है। उम्मीदों की जो गठरी पहाड़ी ढलानों से उतरकर लखनऊ की सड़कों तक पहुंची थी वो मानों कहीं गुम हो चुकी है। हो सकता है कि राज्य पूरे देश में एक आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था की नजीर के तौर पर उभर पाता लेकिन राज्य के मुस्तकबिल में कुछ और था। निर्माण के चौदह सालों में राज्य ने शिकायतों का ऐसा कारखाना लगाया कि हर गली से गिले शिकवे सुनाई देने लगे। राज्य में कौन ऐसा है (सिवाए नेताओं के) जिसे शिकायत नहीं।
जहां तक मुझे लगता है, इस राज्य में एक सबसे बड़ी समस्या इस बात की है कि हर कोई किसी विशेष श्रेणी में आना चाहता है। हर एक शख्स यही चाहता है कि उसे राज्य सरकार विशेष दर्जा दे दे। पता नहीं ये आदत पहाड़ के लोगों में कहां से आई लेकिन ऐसा कुछ पहले नहीं था। किसी को नौकरी नहीं मिली तो वो पानी की टंकी पर चढ़ जाता है, किसी के कॉलेज मे क्लास शुरू नहीं हुई तो वो मोबाइल टॉवर पर चढ़ जाता है।
राज्य की विडंबना यही खत्म नहीं होती। इस पृथक राज्य के निर्माण के दौरान अवधारणा का बड़ा हिस्सा पर्वतीय क्षेत्र को नियोजित तरीके से विकसित करने से जुड़ा था। एक ऐसे राज्य की परिकल्पना थी जिसमें प्रमुख रूप से पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। अफसोस ऐसा कुछ नहीं हुआ।
राजनीतिक स्वच्छता की उम्मीद तो टूटी ही, जवाबदेह शासन का खाका खींचने में भी हम असफल रहे।
राज्य में राजनीति का ऐसा रूप दिखा कि शर्मसार होने के सिवा कोई और चारा नहीं था। राज्य को बने 14 साल हुए और फिलहाल यहां तीसरी विधानसभा का कार्यकाल चल रहा है। कायदों में यहां इतने सालों में तीन मुख्यमंत्री होने चाहिए थे लेकिन यहां के वर्तमान मुख्यमंत्री का नंबर आठवां है। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद यहां के नागरिकों का कितना विकास हुआ इसकी चर्चा तो बाद में कर लेंगे लेकिन नेताओं का जिक्र पहले कर लीजिए। दरअसल राज्य बनने के बाद किसी प्रजाति का विकास बिना किसी शक्तिवर्धक टॉनिक के हुआ है तो वो है नेता। इस बात को कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि उत्तराखंड में ऐसे लोग विधायक हैं जो ग्राम प्रधान भी बनने लायक नहीं है। हो सकता है मैं जिनके लिए ये कह रहा हूं उन्हें ये बात खराब लगे लेकिन ये एहसास अब हर उत्तराखंडी को होने लगा है।  

हालात अच्छे नहीं हैं। राज्य अभी तक ये तय नहीं कर पाया कि उसकी राजधानी कहां होगी। अब भी राज्य की विधानसभा और सचिवालय अस्थायी राजधानी में ही चल रहा है। मजबूती से कठोर निर्णय लेने की ताकत किसी में दिखती नहीं। राज्य में दो राज्य नजर आते हैं। 13 में 4 मैदानी जिलों की सूरत बचे 9 पहाड़ी जिलों से बिल्कुल अलग है। विकास का ध्रुवीकरण देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर के आसपास ही होकर रह गया है। उत्तराकशी, चमोली, पिथौरागढ़ जैसे इलाकों में हालात बस इतने ही बदले कि हम चर्चा कर सकें। इतने नहीं कि हम चर्चा करें ही। 
लोगों को पानी तो प्रकृति ही दे देती है लेकिन बिजली और सड़क सरकार नहीं दे पा रही है। स्कूलों में शिक्षिकों का टोटा है। सवाल छोटा सा है, उत्तराखंड के लोगों को समझ लेना चाहिए या शायद लोग समझने भी लगे हैं कि वो जमीन पर लकीर खींचकर अपने लिए राज्य बना सकते हैं लेकिन अपने लिए एक बेहतर जीवन की गारंटी नहीं ले सकते।



लिख दिया पेशावर





लिख दिया पेशावर
दर्द, आंसू, चीख
लिखना था सन्नाटा
लिख दिया पेशावर ।
मौत, जुल्म, जिंदगी
लिखना था जज्बात
लिख दिया पेशावर ।
कॉपी, पेंसिल, हरा लिबास
लिखना था इम्तहान
लिख दिया पेशावर ।
जनाजा, कब्र, मय्यत
लिखना था मातम
लिख दिया पेशावर ।
बेबसी, बेसबब, बदहवास
लिखना था बारूद
लिख दिया पेशावर ।। 

आवाज उठेगी बरास्ता तुम्हारे

नारस में इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रारंभ से जुड़े रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार नरेश रुपानी जी के आक्समिक निधन से समूचा पत्रकार जगत स्तब्ध है। नरेश रुपानी जी बनारस के सबसे चर्चित टीवी पत्रकारों में से एक थे। प्रारंभ से ही बनारस की स्थानीय मीडिया से जुड़े रहने वाले नरेश रुपानी के नाम को संबोधित करने वाला हमेशा उन्हें रुपानी जी ही कहा करता था।
रुपानी जी बनारस की टीवी पत्रकारिता के एक जाने माने चेहरे थे। उनका नाम जेहन में आते ही आंखों पर मोटा चश्मा लगाए, गले में मोबाइल लटकाए और हाथों में लेटर पैड लिए एक ऐसे शख्स की तस्वीर उभर कर सामने आती है जो किसी भी प्रेस कांफ्रेंस में आगे बैठना पसंद करता था। रुपानी जी न सिर्फ आगे बैठते थे बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ बैठते थे। सवालों की एक लंबी लिस्ट उनके दिमाग में पहले से ही तैयार रहती थी। स्थानीय नेताओं से लगायत राष्ट्रीय नेताओं तक को घेरने के लिए रुपानी जी पूरी तैयारी से आते थे। यह वही शख्स कर सकता है जो हर मुद्दे पर अपनी मुख्तलिफ राय रखता हो। साथ ही जिसे हर विषय के बारे में जानकारी हो। रुपानी जी में वह सबकुछ था।
बनारस में स्थानीय स्तर पर टीवी पत्रकारिता को स्थापित करने में रुपानी जी के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। रुपानी जी ने उस वक्त बनारस में पत्रकारिता की शुरुआत की जब संसाधनों का नितांत अभाव था। मोबाइल का प्रयोग भी बेहद सीमित था। लोगों के लिए प्रेस का मतलब सिर्फ अखबार ही हुआ करता था। ऐसे समय में मीडिया वालों का उदय हो रहा था। रुपानी जी ने मीडिया वालों की पहचान स्थापित करने में अपनी अहम भूमिका निभाई। स्थानीय स्तर पर जितना मजबूत नेटवर्क रुपानी जी का था उतना बड़ा नेटवर्क बनाने के लिए पत्रकारों को खासी मेहनत करनी पड़ती है। आम आदमी से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक रुपानी जी को दूर से ही पहचान लेते थे।
रुपानी जी सामाजिक जीवन में भी खासे सक्रिय रहे। झूलेलाल जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित कराने में उन्होंने जो योगदान दिया उसको नकारा नहीं जा सकता। रुपानी जी अपने जीवट के लिए हम सब के आदर्श हैं। अफसोस इस बात का है कि रुपानी जी इलेक्ट्रानिक मीडिया की लड़ाई को अधूरा छोड़ कर चले गए। पत्रकारों की मुफलिसी को रुपानी जी ने करीब से देखा था और यही वजह है कि वह चाहते थे कि इसे दूर करने के लिए गंभीर प्रयास हों। इमजा भी हमेशा ऐसे मुद्दों को उठाता रहा है। इमजा की कोशिश है कि टीवी पत्रकारिता से जुड़े पत्रकारों की वह श्रेणी जहां भविष्य की अनिश्चितता उम्मीदों पर हावी रहती है उनके लिए सरकारें गंभीर प्रयास करें। समाज की अंतिम पंक्ति तक की पूरी खबर हर खासो आम तक पहुंचाने वाले टीवी रिपोर्टरों में जमात में बहुतायत ऐसे हैं जो किसी दैनिक मजदूर से भी कम पर काम करते हैं। समाज की मुख्यधारा को प्रभावित करने वाले यह चेहरे अपनों के बीच बेगाने हैं। यह वही लोग हैं जो सुबह खबरों पर निकलने से पहले अपनी मोटरसाइकिल की टंकी की पेंदी मंे जा चुकी पेट्रोल की बंूदों को हिलाकर यह इत्मीनान करते हैं कि चलो आज पहुंच जाएंगे। यह वही लोग हैं जो बारहमासी मजदूरों की तरह रोज खटते हैं और वक्त मिले तो अपने लिए सबसे सस्ता मोबाइल टैरिफ तलाशते हैं। एक मिनट की फुटेज के लिए अपनी जान लड़ा देने वाले इन टीवी वालों को शाम की बुलेटिन में चली खबर अफीम से कहीं अधिक नशा देती है। लेकिन अफसोस कि इनका हर नशा रात में इनके बच्चों के स्कूलों से आई फीस न जमा की होनी नोटिसों के साथ काफूर हो जाता है। कोई नीतिगत निर्णय सरकारें इन टीवी पत्रकारों के लिए नहीं ले पाईं हैं। इमजा की कोशिशें हैं कि ऐसे पत्रकारों के लिए गंभीर प्रयासांे की मुहिम शुरू की जा सके। आइए आप और हम साथ आएं। मिलें, चलें और मुकाम तक पहुंचे। रास्ता भी हमें खुद बनाना है और उसे तय भी खुद ही करना है। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक आवाज हम उठा रहे हैं। जरूरत आपकी और आपके सहयोग की है।