सुनो प्रदीप, अब तुम मार्क्स की सोच नहीं, पूंजीवाद के वाहक हो

ये शीर्षक न सिर्फ एक प्रदीप के लिए है बल्कि उन जैसे और मुझ जैसे तमाम प्रदीपों के लिए हैं जो ये सोचते हैं कि पत्रकार बन कर समाज को एक नई दिशा देंगे। अपनी बात लेकर आगे बढ़ूं इससे पहले आपको बता दूं कि आखिर ये प्रदीप हैं कौन। सामान्य कद, गोरा रंग, गोल चेहरा, गालों पर चिपकी ढाढ़ी, सदरी और जींस। इसके साथ ही आजकल मोटे फ्रेम का चश्मा आंखों पर है। ये हुलिया हम तमाम पत्रकारों को अपना सा लगता है। शायद हम ऐसा ही होना चाहते हैं। मन की बेचैनी आंखों के साथ साथ हाव भाव में भी झलक ही जाती है। दरअसल प्रदीप एक पत्रकार बनने की कोशिश में लगे हैं। प्रदीप को उनके सहयोगी कामरेड कहते हैं।
प्रदीप को इस लेखन का आधार बनाने के पीछे एक नहीं कई वजहें हैं। प्रदीप युवा हैं, बेचैन हैं, जागरुक हैं। जैसे हम कभी हुआ करते थे। आठ साल के सफर में कई विशेषताएं दब सी गईं हैं। प्रदीप फिलहाल एक अखबार के नए संस्करण के साथ आगे बढ़ रहे हैं। जैसे कभी हम बढ़े थे। पत्रकारिता को मिशन मान कर प्रोफेशन के तौर पर अपनाया और फिर देखा कि अब सब कुछ कमीशन बेसिस पर हो गया है। हम जिस अखबार के साथ बढ़े, वो अखबार आगे बढ़ गया है और हम पीछे रह गए।
प्रदीप जिस अखबार के साथ जुड़े हैं उसके औपचारिक उद्घाटन के मौके पर उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी ने भाषण के दौरान कहा कि अब अखबार पूंजीपति निकालते हैं। लोगों ने तालियां बजाईं और कहा कि राज्यपाल ने बहुत बड़ी बात कह दी। लेकिन हम भूल गए कि अब ये बात तालियां बजाने के लिए नहीं बल्कि शर्म से डूब मरने की है। अखबार के पन्ने पर खबर से ज्यादा विज्ञापन होते हैं। कौन सी खबर छपेगी और कौन सी नहीं ये तय संपादक नहीं बल्कि मैनेजर करता है। अखबार खबरों के लिए नहीं बल्कि विज्ञापनों के लिए जाने जाते हैं। किसी पत्रकार की खबर जब इस बात को लेकर गिर जाती है या उसका काॅलम कर दिया जाता है क्योंकि अखबार में उस दिन विज्ञापन अधिक होते हैं तो जाहिर है कि युवा पत्रकार का कलेजा कांपेगा। लेकिन कोई फायदा नहीं प्रदीप आदत डाल लो।
न कोई राज्यपाल, न कोई मुख्यमंत्री, सब सिर्फ सच्चाई बयां करके रह जाएंगे। इस पूंजीवाद के खिलाफ आवाज सिर्फ तुम ही उठाओगे। ओह प्रदीप, लेकिन मैं तो भूल गया कि तुम फिलहाल पूंजीवाद के ध्वज वाहक हो। माफ करना।

हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं.


अरविंद केजरीवाल ने अब लगभग पूरी तरह से राजनीति में कदम रख दिया है। अब ऐसे में सवाल ये हैं कि भारतीय राजनीति के वर्तमान हालात में अरविंद केजरीवाल के सामने आखिर वो कौन सी चुनौतियां होंगी जिनसे वो आने वाले दिनों में दो चार होंगे। 
भारतीय राजनीति में पिछले कुछ दिनों में साझा सरकारों का चलन हो गया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक पार्टी के पास इतना जनाधार नहीं बचा कि वो अकेले दम पर बहुमत हासिल कर सके। दुनिया की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टियों में शामिल कांग्रेस भी अब ऐसी स्थिती में नहीं है कि वो भारत के आम आदमी का विश्वास पूरी तरह से जीत सके। सदस्यों के आधार पर देखें तो कांग्रेस दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है। लेकिन 2004 के आम चुनावों में कांग्रेस को महज 145 सीटें ही मिलीं। 2009 में कांग्रेस 206 सीटें ही जीत पाई। कांग्रेस को सत्ता में आने के लिए छोटे दलों का हाथ थामना पड़ा। 
कुछ ऐसा ही हाल भारतीय जनता पार्टी का भी है। सत्ता का सुख बीजेपी को सहयोगियों के साथ बंटा हुआ ही मिला। यही नहीं बीजेपी को सियासी लहरों का इंतजार भी करना पड़ा ताकि वो केंद्र में आ सके। 1996 में बीजेपी को अटल बिहारी बाजपेयी के नेत्तृव में 13 दिनों का सत्ता सुख मिला। इसके बाद 1998 और 1999 में बीजेपी को सहयोगियों के साथ ही सत्ता में रहने का सुख मिला पाया। अटल बिहारी बाजपेयी जैसा करिश्माई व्यक्तित्व भी कंप्लीट मेजारिटी में पार्टी को नहीं ला पाया। 
अब जबकि अरिवंद केजरीवाल देश को पूर्ण आजादी दिलाने का भरोसा दिला रहे हैं ऐसे में सवाल ये कि आखिर कैसे केजरीवाल ये सबकुल कर पाएंगे। साझा सरकारों के ट्रेंड को तोड़ पाने के लिए आम आदमी की पार्टी को पूर्ण बहुमत की जरूरत होगी। ये काम आसान नहीं। वोटों का ध्रुवीकरण क्या इतनी तेजी से हो पायेगा कि वो आम आदमी की पार्टी को कांग्रेस और बीजेपी सरीखी पार्टियों से आगे ला सके। 
अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि उनकी पार्टी का ढांचा राष्ट्रीय और प्रदेश कार्यकारिणी से होते हुए जिले स्तर तक जाएगा। ऐसे में जाहिर है कि न सिर्फ सदस्यों की संख्या बढ़ेंगी बल्कि डिसिजन मेकर्स के पाॅवर का डिसेंट्रिलाईजेशन भी होगा। यानि अरविंद केजरीवाल की शक्तियों का विकेंद्रीकरण। अब ऐसे में केजरीवाल आखिर ये कैसे तय करेंगे कि वो या उनकी पार्टी जिसके हाथ में शक्तियां दे रही है वो हाथ किसी भी तरीके से भ्रष्टाचार में काले नहीं हैं। इसके साथ ही इस बात की गारंटी कौन लेगा कि आज जिनका चयन एक साफ सुथरे व्यक्ति के तौर पर किया गया वो कल भी साफ सुथरा ही रहेगा। 
इसके साथ ही इस देश के गली चैराहों तक अपनी पहुंच बना चुके उस पाॅलिटिकल सिस्टम से अलग कैसे होंगे केजरीवाल जिसमें चुनाव से एक दिन पहले वोटरों में पैसे और शराब बांटी जाती है। 
अरविंद केजरीवाल सियासत के किंग बनेंगे ये कहना मुश्किल है, किंग मेकर बनना चाहेंगे इस बात से फिलहाल किसी को इत्तफाक नहीं। लेकिन सियासत में न कोई किसी का परमानेंट दोस्त होता है और न परमानेंट दुश्मन।  

खैर, दुष्यंत कुमार ने इस देश के हालातों को देख कर लिखा था कि 

जिस तरह चाहो बजाओ तुम हमें 
हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं.

उम्मीद यही कि इस देश में आम आदमी की तस्वीर अब बदलेगी 


दिशाहीन होती जा रही है इलेक्ट्रानिक मीडिया


क्कीसवीं सदी के भारत में मीडियावी चश्मे से देखने पर अब दो हिस्से साफ नजर आते हैं। एक है भारत जो आज भी गांवों में बसता है और दूसरा है इंडिया जो चकाचैंध भरे शहरों में रहता है। मंथन का केंद्र बिंदु मीडिया की भूमिका हो तो प्रिंट और इलेक्ट्रानिक को अलग अलग कर लेना वैचारिक रूप से सहूलियत भरा हो सकता है। युवाओं के इस देश में जब स्मार्ट फोन और टेबलेट्स की समीक्षा के पाठक हमारी कृषि नीति से अधिक हो तो प्रश्न सहज ही उठता है कि क्या हमने अपने लिए उचित देशकाल का निर्माण किया है? इस संबंध में प्रिंट मीडिया की भूमिका को लेकर चर्चा करना इतना उपयोगी नहीं है जितना न्यूज चैनलों की। चूंकि न्यूज चैनल अभी इस स्थिती में हैं कि वह अपनी दिशाहीनता को त्याग कर लक्ष्य निर्धारण कर सकें। इनका विस्तार अपने प्रारंभिक दौर में तो नहीं लेकिन बदले जा सकने के दौर में तो है ही।

ज भी भारत के एक बड़े हिस्से में केबल नेटवर्किंग सिस्टम नहीं है। हां यह अवश्य है कि सेट टाॅप बाक्स आने के बाद गांवों में डिजिटल न्यूज चैनल पहुंच गए हैं। लेकिन जब पूरे विश्व की मीडिया स्थानीय खबरों को प्रमुखता से दिखाने के जन स्फूर्त नियम को मान रहा है ऐसे में भारत का आम आदमी टीवी के चैखटे का उपयोग सास बहु के प्रोग्राम को देखने के लिए करता है। खबरों के लिए आज भी वह अखबारों पर ही अधिक विश्वास करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि न्यूज चैनलों पर दिखाई जाने वाली सौ खबरों में आमतौर पर एक भी ऐसी नहीं होती जो उसे उसके आस पास के समाचारों से वाकिफ कराए। यही वजह है कि टीवी के चैखटे के साथ भारत में बसने वाले आम आदमी को अपनेपन का एहसास नहीं मिल पाता और न्यूज चैनलों को देखने की जगह किसी मनोरंजन करने वाले चैनल को देखना अधिक पसंद करता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है और इसी का नतीजा है कि देश के कई चैनलों ने समाचारों के प्रस्तुतीकरण का तरीका मनोरंजक बना लिया है। खबरों में कृत्रिम तत्वों का समावेश किया जाता है ताकि इंडिया में बनी खबरों को भारत में भी देखा जाए। 

न्यूज चैनलों पर भारत के लिए खबरों का अकाल पड़ रहा है। प्रश्न उठता है कि किस तरह से यह बात तर्कसंगत है। खबरें तो किसी के लिए भी खबर ही होती है। खबरों के साथ निकटता का सिद्धांत कार्य करता है। कोई समाचार आप के जितने निकट होगा उसमें आपकी उतनी ही रुचि होगी। यही वजह है कि अखबारों के स्थानीय संस्करण छपते हैं। समाचार पत्रों के लिए किसी समाचार को लिखते समय कोई भी अच्छा संपादक अपने रिपोर्टर को यही सलाह देता है कि वह समाचार में स्थानीय परिवेश के अनुसार एंगल की तलाश करे। समाचार के साथ जुड़ा यह दृष्टिकोण किसी भी व्यक्ति को समाचार पढ़ने के लिए आकर्षित कर सकता है। और यदि समाचार पढ़ लिया गया और उसमें समाई सूचना पढ़ने वाले तक उचित तरीके से पहुंच गई तो समझिए कि समाचार लिखने का उदेश्य पूरा हो गया। लेकिन तेजी से बढ़ रहे न्यूज चैनलों के परिवार के साथ अब भी यह नियम पूर्ण रूप से लागू नहीं हो पा रहा है। 

न्यूज चैनलों के लिए यह एक दिशाहीन स्थिती है। यद्यपि न्यूज चैनलों ने नैना साहनी हत्याकांड से लेकर निठारी कांड तक एक अभियान छेड़ा हो लेकिन यह सोची समझी कार्यशैली से अलग हटकर एक घटनात्मक रिपोर्टिंग अधिक है। अन्ना के आंदोलन से यह तय हो गया कि भारत में न्यूज चैनलों अभी इस स्थिती में नहीं पहुंचे हैं कि दिल्ली के रामलीला मैदान को मिस्र का तहरीर चैक बनाया जा सके। जनआंदोलन खड़ा कर पाने में न्यूज चैनल आज भी अक्षम हैं। लगभग पंद्रह साल के अपने जीवनकाल में भारत के न्यूज चैनलों में से किसी भी एक न्यूज चैनल ने आज तक जनता के बीच इस बात की घोषणा नहीं की कि वह देश की जनता के बीच किस उदेश्य से आया है। जनसरोकारों के मुद्दे पर न्यूज चैनलों की कार्यप्रणाली स्पष्ट नहीं है। किसी विषय विशेष को लेकर की जाने वाली न्यूज चैनलों की रिपोर्टिंग का अहम हिस्सा उस समाचार की ठेकेदारी तक जा पहुंचता हैं। खबर का असर दिखाने की होड़ अधिक होती है और समाचारों को आखिरी पड़ाव तक पहुंचाने की ललक कम होती जा रही है। 

दैनिक समाचार पत्र आज के अग्रलेख में बाबू विष्णु राव पराड़कर ने लिखा था कि हम किसी के निजि जीवन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इन पक्तिंयों के पीछे उन्होंने स्वामी विवेकानंद के उस वक्तव्य को आधार बनाया था जिसमें उन्होंने कहा था कि हमें किसी के सिर्फ सामाजिक जीवन से ही सरोकार रखना चाहिए। उसके व्यक्तिगत जीवन का हिसाब किताब तो परमेश्वर और वह व्यक्ति स्वयं कर लेगा। यह उद्बोधन न्यूज चैनलों के लिए कभी प्रेरणा दायक बन पायेगा? 

संपूर्ण भारत के लोगों का टीवी के चैखटे के अपनापन पनप सके इसके लिए अब जरूरी हो गया है कि न्यूज चैनलों में इस बात पर चर्चा हो कि इस बार देश की कृषि नीति क्या है और क्या होनी चाहिए। सरकार ने गेंहूं का सरकारी क्रय मूल्य क्या रखा है और क्या होना चाहिए। प्रोफाइल तलाश करती खबरें समाचारों के वासनाकाल का प्रदर्शन करती हैं लेकिन भारत की बड़ी आबादी से देर होती खबरें न्यूज चैनलों के डरपोक दिल होने और अभिजात्य होने की कोशिश भी बयां करती हैं। आवश्यकता अब इस बात की है कि जब इंडिया में बैठ कर भारत के लिए समाचार तय किए जाएं तो उनके सामाजिक सरोकारों का भी निर्णय देश काल और परिस्थिती के अनुसार किया जाए। ऐसा न हो कि हम दिन भर दिल्ली के आईटीओ में हुए जलभराव को ही दिखाते रहे हैं और दूर किसी गांव में दुर्भिक्ष की खबरों के लिए हमारे पास समय ही न हो। न्यूज चैनलों को अपने प्रतिमान खुद गढ़ने होंगे। 

संत तोड़े बाँध, सिस्टम तोड़े आस्था


गंगा की निर्मलता को लेकर इस देश में आज तक जितना पैसा खर्च हुआ है उसमें शायद उत्तराखंड में लगभग दस बड़े बांध बनाए जा सकते थे। इन बांधों से न्यूनतम 100 मेगावाट की बिजली भी पैदा होती तो कुल 1000 मेगावाट की बिजली इस प्रदेश को मिलती। इतनी बिजली के उत्पादन से उर्जा के क्षेत्र में उत्तराखंड को काफी हद तक निर्भरता मिल जाती। इसके बाद न सिर्फ हरिद्वार में बल्कि उत्तराखंड के कई और क्षेत्रों में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट को चलाने के लिए पर्याप्त बिजली मिल जाती और गंगा को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है। इससे पहाड़ के लोगों को रोजगार भी मिलता और पलायन पर रोक भी लगती। यही नहीं सिंचाई और पेयजल की समस्या से भी बहुत हद तक मुक्ति मिल सकती थी। जरा एक नजर डालते हैं गंगा एक्शन प्लान के दो चरणों में खर्च हुई रकम पर 
 1984 में शुरू हुए गंगा एक्शन प्लान के पहले चरण में 462 करोड़ रुपए खर्च करने का प्रावधान रखा गया। 
1993 में मंजूर हुये गंगा एक्शन प्लान के दूसरे चरण में लगभग 22 सौ करोड़ रुपए खर्च करने का प्रावधान रखा गया 
सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा एक्शन प्लान के पहले चरण में उस वक्त पैदा हो रहे 1340 एमएलडी सीवरेज में से 882 एमएलडी सिवरेज को ट्रीट करने का लक्ष्य रखा गया था। 
वहीं गंगा एक्शन प्लान के दूसरे चरण में जिसे कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनोमी अफेयर्स ने 1993 से 1996 के बीच मंजूर किया कुल 1912 एमएलडी सीवरेज को ट्रीट करना था। 

आपको इसके साथ ही एक तत्थ और बताते हैं कि गैप फर्स्ट का उद्देश्य गंगा के पानी को स्नान योग्य बनाना था। लेकिन गैप फर्स्ट और सेकेंड फेज में लगभग 3000 करोड़ रुपए खर्च कर देने बाद आज गंगा की हालत ये है कि इसका पानी आचमन योग्य भी नहीं बचा है। ये वैज्ञानिकों के शोध में साफ हो चुका है। 

अब जबकि राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन किया गया है और गंगा को साफ करने के लिए एक बार फिर से नई योजनाएं बनाई जा रही हैं। ऐसे में विश्व बैंक से गंगा की सफाई के लिए एक बिलियन डालर का ऋण मिला है। भारतीय करेंसी में इसका न्युनतम मूल्य लगभग 4000 करोड़ रुपए होगा। ये पैसा भारत को विश्व बैंक को ब्याज के साथ वापस भी करना है। 
अब जरा आप अंदाज लगाइए कि गंगा की सफाई के लिए सन् 1984 से 2012 तक गंगा को साफ करने के लिए लगभग 7000 करोड़ का इंतजाम हो चुका है। अब सवाल ये है कि लगभग चालीस करोड़ की आबादी, 2525 किलोमीटर का गंगा का सफर और चंद बांध। क्या बांधों का निर्माण रोक देना समस्या का समाधान है। या फिर गलती सिस्टम की है। शायद संतों ये भूल गए हैं कि इस देश में सिस्टम खराब है। सिस्टम को सही करना ही गंगा की निर्मलता और अविरलता के जरूरी है बजाए इसके कि बांधों को तोड़ देना। 

उत्तराखंड की हिलती बुनियाद



उत्तरखंड देवभूमि है. लेकिन यह देवभूमि आजकल परेशानियों से जूझ रही है. ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में सब कुछ स्वर्ग सा सुंदर है और यहां की जनता को कोई परेशानी ही नहीं है। देवभूमि का स्याह सच तो ये है कि 13 जिलों और 70 विधानसभाओं वाले इस प्रदेश के कई इलाकों में मूलभूत सुविधाएं भी लोगों को मयस्सर नहीं हैं। पहाड़ों के बीच में बसे कई ऐसे इलाके हैं जिनमें बिजली, सड़क और पीने का पानी तक नहीं मिलता। लोगों को कहीं आने जाने में जबरदस्त दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। जिन सड़कों को गांवों तक विकास की किरण लानी थीं वो खुद ही रास्ता भटक गईं। कुछ इलाकों में गिट्टी और तारकोल एक दूसरे में लिपटे तो दिख जाएंगे लेकिन सरकारी फाइलों के अलावा और कोई इन्हें सड़क मानने को तैयार नहीं होता। 
पहाड़ों पर किसी तरह बस झूल भर रहे पुलों को देखकर और उनपर लोगों को आते जाते देख यकीन नहीं होता कि ये इक्कीसवीं सदी के भारत के गांव हैं। इन पुलों पर कभी कोई इलाकाई राजनीति का नुमाइंदा पांव नहीं रखता क्योंकि उसे गिर जाने का डर होता है। लेकिन वहां रहने वाले रोज ही ऐसे रास्तों से आते-जाते हैं। उत्तराखंड के कई गांव ऐसे हैं जहां साल के कई महीने ऐसे बीतते हैं जब गांव वाले बाकी दुनिया से कटे रहते हैं। 
स्वास्थय सुविधाओं का हाल बुरा है। दूर-दराज के गांव में कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए तो उसे अच्छी मेडिकल फैसिलिटी मिल पाना बहुत मुश्किल है। उसे आस-पास किसी नीम-हकीम का ही सहारा लेना पड़ता है। अधिकतर बीमार खुद ही ठीक हो जाते हैं या फिर बीमार स्वास्थय सेवाओं की भेंट चढ़ जाते हैं। ये बात और है कि यहां की इमरजेंसी सर्विस 108 का नाम भुनाने की कोशिश हमेशा से होती रहती है। भले ही ये सर्विस भी अब दम तोड़ रही है। 
पहाड़ों में ज्ञान का खजाना है लेकिन उत्तराखंड में बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कूल नहीं मिलते। पीठ पर बस्ता उठाए नौनिहालों को कई किलोमीटर का सफर मास्टर साहब का मुंह देखने के लिए तय करना पड़ता है। देश के अन्य भागों के स्कूली बच्चों की तरह यहां के बच्चे स्कूलिंग नहीं पाते। एबीसी और कखग की पढ़ाई ही किसी तरह पूरी हो पाती है। प्राइमरी एजुकेशन के बाद बच्चों को पढ़ाई जारी रखने के लिए काॅलेजेज और यूनिवर्सिटीज मैदानी इलाकों तक ही सिमटे हैं। पहाड़ों में अगर कोई एजुकेशनल इंस्टीट्यूट सरकार ने खोला भी है तो वहां टीचर्स नहीं जाते। साफ है कि शिक्षण संस्थानों का वितरण असामान्य है।  ऐसे में सिर्फ दो रास्ते बचते हैं.........या तो पढ़ाई छोड़ दें या फिर घर।  हाॅयर एजुकेशन का सपना अधिकतर बच्चों की आंखों का सपना ही रह जाता है। 
रोजी रोटी का इंतजाम न हो पाने के कारण यहां के लोगों का पलायन भी खूब हो रहा है। पुरुषों को देश के अन्य राज्यों में जाकर होटलों और अन्य जगहों पर काम कर कमाई करनी पड़ती है। इसके चलतेे घर की जिम्मेदारियों को संभालने का पूरा बोझ महिलाओं के उपर आ जाता है। गांव की महिलाओं का दिन जंगलों में लकडि़यां काटते और घास इकट्ठा करने में चला जाता है। इसका असर पूरे घर की परवरिश पर पड़ता है। बच्चों की अच्छी देखभाल नहीं हो पाती है और उनका भविष्य अंधेरों में डूब जाता है। राज्य की व्यवस्थाओं पर ये पलायन बुरा असर डाल रहा है।  स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक हर मामले में उत्तराखंड की हालत फिसड्डी है। भले ही जनता बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में बैठी है लेकिन राज्य बनने के बाद यहां के नेताओं ने खूब तरक्की की। विडंबना ये भी है कि अब देवभूमि के लोगों के पास कोई मजबूत राजनीतिक विकल्प भी नहीं है। 
उत्तराखंड में दो राष्ट्रीय दल राजनीति की मुख्य धारा में हैं। कांगे्रस और भाजपा। दस बरस के उत्तराखंड में ज्यादातर समय बीजेपी ने शासन किया है। लेकिन इस शासनकाल का अधिकतर वक्त मुख्यमंत्री बदलने में ही गया। साढ़े छह साल में बीजेपी ने पांच मुख्यमंत्री बदले हैं। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड में जनसरोकारों के मुद्दे किस तरह राजनीतिक अस्थिरता की भेंट चढ़ गए होंगे। साफ है कि बीजेपी का रामराज्य विधायक निवास से बाहर नहीं आ पाया। कांग्रेस का हाथ भी पहाड़ों में विकास की गंगा नहीं बहा सका। 2002 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला था। सरकार बनी और देश की राजनीति में कद्दावर स्थान रखने वाले नारायण दत्त तिवारी को सीएम बनाया गया। लगा कि अब उत्तराखंड की तस्वीर बहुरने वाली है। लेकिन अफसोस कुछ मैदानी इलाकों में लगे छोटे-मोटे इंडस्ट्रियल यूनिट्स को छोड़ दें तो राज्य में रत्ती भर भी चमत्कार नहीं हो सका। कांग्रेस के हाथ ने भी देवभूमि की जनता को मायूस कर दिया। 
उत्तराखंड में मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक विकल्प भी लोगों को नहीं मिला। उत्तराखंड आंदोलन के गर्भ से निकला क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रान्ति दल यानी यूकेडी भी अपनी स्वार्थ साधना के चलते आज तक परिपक्व नहीं हो पाया। उत्तराखंड की जनता ने राज्य में हुए पहले विधानसभा चुनावों में यूकेडी को चार और दूसरी विधानसभा में तीन विधायक दिए। लेकिन यूकेडी को अपने राजनीतिक हित अधिक प्यारे थे। लिहाजा उन्होंने कमल का साथ देकर पूरे पांच साल मलाई काटी। जनता को छल कर यूकेडी ने बता दिया कि उसे उत्तराखंड के आंदोलन में शहीद हुए लोगों की शहादत का सम्मान करना भी नहीं आता। शर्म और हया तो यूं भी आज की राजनीति में ओल्ड एज फैशन है। यूकेडी भी इससे अलग नहीं है। स्वार्थ साधना के महाभारत में यूकेडी ने ऐसी तरक्की की कि पार्टी में गुट बने, गुटबाजी शुरू हुई और आखिरकार पार्टी ही टूट गई। इसी के साथ उत्तराखंड के लोगों की उम्मीदें भी दफन हो गईं। अपने राज्य में बेगाने हो चुके उत्तराखंडियों को अब राजनेताओं के सफेद लिबास के नीचे छिपे उनके असली चेहरों के बारे में पता चल चुका है। 
  विधानसभा चुनावों में बहुत हद तक बेहया हो चुके नेता हाथ जोड़े जनता के बीच नज़र आये  पांच सालों से उनके स्टोर रूम में धूल खा रही वादों की पोटली भी वो एक बार फिर से अपने साथ लाए थे। चुनाव जीतने के बाद जिन गलियों की याद भी कभी नहीं उनमें पैदल घूम कर वोट मांगते रहे। कहते रहे कि इस बार वोट दे दो तो सड़क भी बनवा देंगे और नलों में पानी भी ले आयेंगे। जनता की याददाश्त जरा कमजोर होती है वरना अगर वो याद करती तो कुछ ऐसे ही वादे नेता जी ने पिछले चुनावों में भी किए थे। लाचार जनता कान बंद किए इस बार भी वादों का फ्लैश बैक सुनती रही है। मुद्दे जब न हो तो और हो भी क्या सकता है। उत्तराखंड के पहाड़ों में आम आदमी विकास नाम की चिडि़या को ढूंढ़ रहा है तो यहां के नेता पार्टी कार्यालय में बैठ सियासी दांव पेंच लगाने में व्यस्त रहे।
देवभूमि में अब कोई ऐसा सियासी रहनुमां नहीं बचा जो वाकई में इस राज्य के लिए निस्वार्थ भाव से सेवा कर सके. बनने के एक दशक के भीतर ही यह राज्य अपनी बुनियाद से हिलता नज़र आ रहा है. 

Ganga Basin par baithak part-1

फंस सकते हैं तरुन विजय

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