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जंग लडि़ए लेकिन अपने गुनहगारों को भी पहचानिए

पत्रकारिता की नगरी कहे जाने वाले शहर बनारस में इन दिनों पत्रकारों और पुलिस में ठनी है। यहां यह अभी स्पष्ट कर दूं कि पत्रकारों से तात्पर्य टीवी माध्यम के लिए काम करने वाले लोगों से है। दरअसल इस पूरी तनातनी के मूल में कुछ दिनों पहले काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर लाशों पर सट्टा लगाए जाने की खबर है। इस खबर में दिखाया गया कि आईपीएल में ही नहीं काशी में लाशों पर भी सट्टा लगता है। यह खबर सबसे पहले एक नेशनल न्यूज चैनल पर चली। इसके बाद कुछ क्षेत्रीय चैनलों पर भी सनसनीखेज तरीके से दिखायी गई। 
पुलिस का आरोप है कि खबर प्रायोजित थी और मीडिया कर्मियों ने जानबूझकर यह खबर प्लांट की। सीधे शब्दों में कहें तो खबर मैनेज किए जाने का आरोप मीडिया कर्मियों पर लगा। लिहाजा पुलिस ने मीडिया कर्मियों के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया। पुलिस, पुलिसिया अंदाज मंे आ गई है। टीवी चैनलों के पत्रकारों के साथ पुलिस किसी अपराधी की तरह पेश आ रही है। हालात ये हैं कि पत्रकारों पर आरोप साबित हुए बिना ही उन्हें अपराधी की तरह दिखाया और बताया जाने लगा है। खबरें यह भी हैं कि कुछ पत्रकारों को मारा पीटा गया और उनके घर की महिलाओं के साथ भी गलत व्यवहार किया गया। 
इसके बाद पुलिस और टीवी पत्रकारों के बीच रस्साकशी तेज हो गई। एक ओर पुलिस जहां अपने अंदाज में आरोपी पत्रकारों के घरों पर दबिश दे रही है वहीं दूसरी ओर मीडिया कर्मी आपात बैठकें बुला रहे हैं। मुकदमे के मंथन के बाद चाहें जो भी निकले लेकिन इस बीच एक बहस का मौका जरूर मिल गया है। क्या पुलिस और पत्रकारों, विशेष तौर पर टीवी पत्रकारों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं? क्या विश्वास की जो डोर इन दोनों के बीच होनी चाहिए वह टूट चुकी है? आखिर पुलिस और पत्रकारों के बीच संवादहीनता की स्थिती क्यों आ गई? 
इन सवालों के जवाब तलाशना मुश्किल तो नहीं लेकिन इच्छाशक्ति से प्रभावित जरूर है। बनारस ही नहीं पूरे देश मंे पुलिस और टीवी पत्रकारों के बीच इस तरह का व्यवहार अब साधारण रूप से दिखने लगा है। पुलिस को जब अपने मैनेज्ड वर्क को गुडवर्क की श्रेणी में खड़ा करना होता है तब वह पत्रकारों की शरण लेती है। कई पत्रकार भी अपनी पुलिस भक्ति में सराबोर जरूरत के हिसाब से किसी टुच्चे चेन स्नैचर को हार्डकोर नक्सली या फिर अंतरप्रातीय अपराधी बना कर बेच देते हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भी पढ़ा लिखा समझदार पत्रकार दिल पर हाथ रखने के बाद मेरी इस बात से इंकार कर सकेगा। इन्हीं में से चैनल वाले कई पत्रकार तो कुछ पुलिस थानों में बाकायदा अपनी दुकान लगा लेते हैं। सिपाहियों के ट्रांसफर और प्रमोशन की सिफारिशें बड़े साहब तक पहुंचाई जाती हैं। बदले में क्या मिलता होगा सब जानते हैं। उस चर्चा तक न जाएं तो भी चलेगा। यह हमारी टीवी मीडिया की विडम्बना का एक हिस्सा है। अक्सर किसी टीवी पत्रकार की काबीलियत का पता उसके रिश्तेदार इस बात से लगाते हैं कि वो पुलिस या प्रशासनिक महकमे में कितने काम करा सकते हैं। टीवी पत्रकारिता में एक बड़ी जमात ऐसे लोगों की है जो किसी कोड आॅफ कंडक्ट को तो छोडि़ए अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को भी नहीं जानते। सच शायद कड़वा हो लेकिन मैंने जब वाराणसी में टीवी पत्रकारिता की शुरुआत से जुड़े एक वरिष्ठतम पत्रकार से दबी जुबान से यह कहा कि चैनल के पत्रकार की शक्ल में कई विशुद्ध दलाल भी हैं तो उन्होंने कोई प्रतिकार नहीं किया। मेरे लिए यह सुखद तो नहीं लेकिन हैरानी भरा जरूर था। आप जानते हैं कि आपके बीच, आपकी ही छवि खराब करने वाले लोग मौजूद हैं लेकिन आप कुछ नहीं कर सकते। यह भी किसी विडंबना से कम नहीं। लेकिन यहां एक बात और स्पष्ट करना जरूरी है कि इस भेड़ चाल में सभी को दोषी नहीं ठहरा सकते। 
अविष्कार, आवश्कता की जननी है। क्या यह बात खबरों की दुनिया में भी लागू होती है। मुझे लगता है कि हां। नब्बे के दशक में जब प्राइवेट न्यूज चैनलों का युग शुरू हुआ तब कैमरे की जानकारी रखने वाले लोग कम ही होते थे। चैनलों को विजुअल्स की आवश्कता थी लिहाजा कई पत्रकारों का अविष्कार कर दिया गया। इनमें से कइयों को आप दुर्घटना से पत्रकार बनने वालों की श्रेणी में भी डाल सकते हैं। किसी भी तरीके के फिल्टर को यहां प्रयोग में नहीं लाया गया। अच्छे और योग्य की तलाश लगभग नहीं के बराबर रही। धीरे धीरे चैनलों की संख्या बढ़ती गई और दुर्घटनावश पत्रकार बने लोग भी बढ़ते गए। जाहिर है कि इससे पत्रकारिता मरती गई। लेकिन बावजूद इसे रोकनी की छटपटाहट कम ही दिखी। आखिर क्यों नहीं वरिष्ठ पत्रकार इस क्षेत्र में आए किसी नवांगतुक को उसकी सामाजिक और पेशागत जिम्मेदारियों के बारे में बताते हैं? क्यांे नहीं किसी टीवी पत्रकार के गलत आचरण को पूरा कुनबा साथ मिलकर दूर करने की कोशिश करता है? आपात बैठकें ऐसे समय में भी बुलायी जानी चाहिए। 
वाराणसी में हुई घटना के बाद भी कम से कम पूरे देश के पत्रकारों को सबक लेना चाहिए। पुलिस ने सहयोग मांगने के नाम पर पत्रकारों का लगभग उत्पीड़न ही शुरू कर दिया। पुलिस की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में रही है इसमें कोई दो राय नहीं हैं। एक कहावत है कि पुलिस वालों से दोस्ती अच्छी न दुश्मनी। फिर चैनल वाले पत्रकार इस लकीर को पकड़ कर क्यांे नहीं चल पाते? क्या किसी मोह के शिकार हैं? बनारस एक ऐसा शहर है जहां के लगभग 75 फीसदी टीवी पत्रकार पिछले कुछ सालों मंे पुलिसिया मुकदमें मंे फंस चुके हैं। इस बारे मंे बनारस में टीवी पत्रकारिता की शुरुआत से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार गिरीश दुबे भी हैरानी जताते हैं। छूटते ही सवाल दागते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है कि दो तिहाई के करीब पत्रकार गलत ही हों। वो प्रशासन पर प्रहार करते हैं। कहते हैं अपनी गलती छुपाने के लिए पुलिस पत्रकारों को फंसा देती है। कुछ देर कर बातचीत के बाद हालांकि गिरीश जी यह जरूर कहते हैं कि मीडिया वालों की और खासकर इस टीवी मीडिया की विधा की मजबूरी को सभी को समझना चाहिए। दृश्य और श्रव्य माध्यम में अक्सर खबरों में ‘कुछ मैनेज‘ करना होता है। चलते चलते वह यह भी मान लेते हैं पत्रकारों के बीच कई दलाल भी हैं जिन्हें फिल्टर किया जाना जरूरी है। लेकिन इस बीच गिरीश जी पूरी मजबूती के साथ पुलिस के खिलाफ खड़े रहे। पुलिसिया कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा करते रहे और कहते रहे कि अब पुलिस पत्रकारों को अपराधी बना रही है। वैसे प्रश्न यह भी उठता है पुलिस ने जजों वाला काम कब से शुरू कर दिया। पुलिस कैसे यह तय कर सकती है कि अमुक खबर गलत है या फिर अमुक खबर सही। यह प्रश्न तत्कालिक लग सकता है लेकिन मेरी समझ में यह पत्रकारिता के स्वतंत्र भविष्य से जुड़ा मसला है। काशी में इलेक्ट्रानिक मीडिया की शुरुआत से जुड़े वरिष्ठतम पत्रकारों में शामिल अजय सिंह जब यह सवाल उठाते हैं तो इससे जुड़े कई और पहलुओं पर भी सिलसिलेवार चले जाते हैं। अजय सिंह तल्खी भरे अंदाज में कहते हैं कि खबरों की सत्यता परखने का काम संपादक का है, पुलिस का नहीं। अगर पुलिस खबरों के सही या गलत होने का निर्णय करने लगी तो छप चुके अखबार और चल चुके न्यूज चैनल। बात बात मंे सवाल यह भी उठा कि किसी पहुंच वाले के खिलाफ मुकदमा करने के लिए पुलिस किसी शिकायत का इंतजार करती है लेकिन पत्रकारों के खिलाफ बिना किसी शिकायत के ही मुकदमा दर्ज हो जाता है। शायद पुलिस अपने को जज समझ कर स्वयं संज्ञान की अवधारणा को अपना चुकी है। ऐसे में पुलिस की कार्यशैली को गुंडई के रूप में परिभाषित करना ज्यादा आसान होगा। 
इस देश का कानून कुछ यूं है कि यहां बेगुनाह अपनी बेगुनाही साबित करता है। किसी खद्दरधारी ने अगर सौ खून भी किए हों तो पुलिस दो-चार साल तक सोचने के बाद उसके खिलाफ रपट लिखती है और इसके दो-चार साल बाद एकाध घंटे के लिए उसे थाने में बैठा लेती है। लेकिन मामला किसी आम आदमी का हो तो न सोचना, न जांचना। बस उठाना, मुकदमा लिखना और अंदर कर देना। करते रहिए आप अपनी बेगुनाही साबित। इतने में आठ-दस साल तो निकल ही जाएंगे। वाराणसी में पत्रकारों के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। लेकिन इसी बहाने टीवी माध्यम के पत्रकारों से भी उम्मीद होगी कि ऐसे लोगों की पहचान कर लें जो खबरों को अपनी रखैल समझते हैं। जब चाहा, जैसे चाहा नचा दिया। 
क्षमा प्रार्थना- चूंकि इस विधा से मैं भी जुड़ा रहा हूं और इसी की रोटी खाता हूं लिहाजा इस बारे में मुझे बोलने का कोई हक नहीं लेकिन इसी वजह से मेरी जिम्मेदारी भी है। हो सकता है सच की आदत कुछ सहयोगियांे को न हो लेकिन शीशे सबके घरों में। बस एक बार हम सब को शक्ल अपनी देखनी होगी। 

संपादक केबिन से बाहर बैठें तो !


मुझे नहीं पता कि संपादकों के केबिन में बैठने की परंपरा कब शुरू हुई लेकिन अगर यह परंपरा खत्म हो जाए तो अच्छा। केबिन में संपादक क्यों बैठते हैं इस बारे में अगर गंभीरता से सोचा जाए तो पत्रकारिता में कारपोरेट कल्चर और मीडिया संस्थानों के प्रबंधन का आपसी गठजोड़ सामने आयेगा। इसी का परिणाम पेड न्यूज हैं। 
सिद्धांतों की पत्रकारिता में संपादक एक पद मात्र है। इस पद पर बैठा व्यक्ति खबरों और आम जनता के बीच एक सूत्र होता है। इसकी जिम्मेदारी खबरों की विश्वसनीयता बनाए रखने और समाज के प्रति होती है। जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से प्रस्तुत करना इनका परम धर्म है। लेकिन वक्त बदलने के साथ संपादक की भूमिका बदल गई। 
खबरों पर जब विज्ञापनदाता हावी होने लगे और पत्रकारिता का बीड़ा औद्योगिक समूहों ने उठा लिया तो संपादक की भूमिका गौड़ हो गई। प्रबंधन ऐसे पत्रकार की तलाश करने लगा जो मैनेजर की भूमिका भी बखूबी निभा सके। जिन पत्रकारों में मैनेजमेंट का गुण था उन्हें प्रबंधन ने संपादक की कुर्सी दे दी। अगर उस संपादक में पत्रकारिता का गुण कुछ कम भी हुआ तो चलेगा। यहां से खबरें मैनेज होने लगीं। खबरों का जन संदर्भ विज्ञापन संदर्भ के आगे बौना हो गया। इसे इस क्षेत्र में काम करने वाले आसानी से देख सकते हैं। संपादक के केबिन में मैनेजर के साथ एक व्यक्ति आता है। कुछ देर की बात-चीत और चाय नाश्ते के बाद संपादक अपने मातहतों को एक रिलीज पकड़ा देता है। इसके साथ ही आदेश देता है एक खबर बना कर ठीक-ठाक तरीके से लगा दी जाए। अखबारों में काम करने वाले जानते होंगे कि हर शाम विज्ञापन प्रभारी की ओर कई रिलीजें विज्ञापन लिखकर संपादक के पास पहुंचा दी जाती हैं। अब इन रिलीजों में लिखी बातों का आम जन से भले ही कोई लेना-देना न हो लेकिन इन सभी को अच्छी तरह से डिस्प्ले किया जाता है। इसके लिए प्रमुख खबरों को भी छोटा करना पड़े तो कर दिया जाता है। संभव है कि खबरों को स्थान देने की यह रणनीति संपादकीय मंडल के सभी सहयोगियों के साथ न बनाई जा सके। हो सकता है कोई विरोध कर दे। इसीलिए संपादकों को प्रबंधन ने केबिन दे दिए हैं बैठने के लिए। 
प्रबंधन का रवैया अपने पत्रकारों के लिए हमेशा की दमनात्मक रहा है इसमें दो राय नहीं है। पूरी दुनिया के लिए हक की आवाज उठाने वाला पत्रकार अपने दफ्तर में शोषण का शिकार होता है। इस शोषण में संपादकों का भी बड़ा हाथ होता है। अपने केबिन में बुलाकर सबको मैनेज करने की कोशिश में लगे रहते हैं। अगर कोई सहयोगी प्रबंधन के खिलाफ जाने की कोशिश करता है तो उसे सबसे पहले संपादक ही रोकते हैं। इस मैनेजमेंट की जगह फिर से वही उनका केबिन होती है। अपने चमचों से तेल लगवाने के लिए भी संपादक केबिन का बखूबी उपयोग करते हैं। 
कुछ मत यह भी कहते हैं कि संपादकों का केबिन में बैठना पेशागत मजबूरी है। लेकिन मुझे लगता है कि यह डीलिंग की मजबूरी है। सभी सहयोगियों के साथ बैठ कर डीलिंग नहीं की जा सकती है। प्रबंधन का मोहरा भी खुले में रहे यह प्रबंधन को भी मंजूर नहीं होगा। लेकिन इस सबके बीच पत्रकारिता का तो नाश निश्चित है। अगर समाज की नजरों में पत्रकारिता का महत्व और सम्मान बनाए रखना है तो केबिन प्रथा को खत्म करना ही होगा। 

हंगामा है क्यों बरपा


प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन मार्कण्डेय काटजू का भारतीय मीडिया के संबंध में दिया गया बयान आजकल चर्चा में है। हैरानी इस बात की है कि जो लोग काटूज के न्यायाधीश के रूप में दिये गये फैसलों पर खुशी जताते थे आज उन्हीं में से कई लोग काटजू को गलत ठहरा रहे हैं। शायद सिर्फ इसलिये कि इस बार मार्कण्डेय काटजू ने उन्हीं लोगों को आईना देखने की नसीहत दे दी है। मुझे नहीं लगता है कि आईना देखने में कोई हर्ज है। आज भी प्रबल धारणा यही है कि आईना सच ही बताता है। ऐसे में भारतीय मीडिया इस अग्निपरीक्षा को स्वयं स्वीकार करे तो अच्छा होगा।  

भारत के लोकतंत्र की नींव में घुन तो बहुत पहले ही लग था लेकिन बात तब और बिगड़ी जब लोकतंत्र के चैथे स्तंभ पर काई लग गई। खबरों का आम जनता के प्रति कोई सरोकार नहीं रहा। खबरों के लिहाज से देश कई वर्गों में बंट गया। खबरों का भी प्रोफाइल होने लगा। किसी ग्रामीण महिला के साथ बलात्कार कोई मायने नहीं रखता बजाए इसके कि किसी नामचीन व्यक्ति ने तेज गति से गाड़ी चलाई हो। मानवीय दृष्टि से महिला के साथ बलात्कार की घटना अधिक महत्वपूर्ण है लेकिन प्रोफाइल के नजरिये से नामचीन व्यक्ति का तेज गति से गाड़ी चलाना लिहाजा ग्रामीण महिला की स्टोरी को कोई नहीं पूछता। मुझे नहीं लगता कि इस उदाहरण से समाज का स्वंयभू पहरुआ बनने वाला कोई भी पत्रकार मुंह छुपा सकता है। सभी जानते हैं कि सच्चाई क्या है।

 पत्रकारिता जबसे मीडिया हुई तो न ही जनता के प्रति उसकी उपादेयता रही और न ही कोई विश्वसनीयता बची। दलाल अब लाइजनर्स हो गये और मीडिया घराने उनके आगे लार टपकाते नजर आने लगे। सब कुछ मैनज होने लगा। कारपोरेट कल्चर ने न सिर्फ कलम की धार कुंद कर दी बल्कि कैमरों के लेंस को भी धुंधला कर दिया। खबरों भी पेड होने लगीं। यह तो वही बात हुई जैसे कोई कह दे कि सीता का अपहरण रावण ने नहीं हनुमान ने किया था। आम आदमी के मन से कभी पूछिये तो पता चलेगा कि उसे तुलसीदास के रामायण पर जितना भरोसा है उतना ही मीडिया पर। पर बेचारी जनता नहीं जानती कि अगर आज की मीडिया को कोई स्पाॅन्सर कर दे तो वो बिना किसी तर्क के तुलसीदास के रामायण पर भी प्रश्न चिह्न लगा देगी। साफ है कि आम जनमानस के विश्वास से लगातार धोखा हो रहा है। भला कोई यह कैसे मान सकता है कि पैसे देकर मनचाही खबरें छपवाईं और दिखाईं जा सकती हैं। लेकिन ऐसा हो रहा है। 

हैरानी होती है कि जब मीडिया पर्यावरण, गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर सरकार की खिंचाई करती है। कंटेंट एनालिसिस का सहारा लिया जाये तो नजर आयेगा कि खुद मीडिया पर्यावरण और बेरोजगारी जैसे विषयों से दूर ही रहती है। ऐसे विषयों पर वह तभी आती है जब कोई एजेंसी इस संबंध में कोई रिपोर्ट पेश करती है। वरना मीडिया को कोई जरूरत नहीं कि वो लोगों को इस संबंध में जागरुक करे।  

मीडिया ने अपने लिये इस देश में एक शीशमहल बना लिया है। पूरे देश को मीडिया उसका असली चेहरा दिखाने की कोशिश करती है लेकिन अपना चेहरा देखने की बात पर कन्नी काट लेती है। अब वक्त आ गया है कि एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की जगह स्वयं की सार्थकता सिद्ध करने के लिए खुद ही कदम बढ़ाया जाये। वरना न सिर्फ जनता का भरोसा मीडिया पर से उठ जायेगा बल्कि लोकतंत्र भी खतरे में पड़ जायेगा. 

गुरु, ई मीडिया वाले त.......

गुरु ई मीडिया वाले त पगला गैयल हववन....धोनिया के बिआयेह का समाचार कल रतिए से पेलले हववन और सबेरे तक वही दिखावत हववन...जब तक एकरे एक दू ठे बच्चा ना पैदा हो जैईहें लगत हव तब तक दिखवाते रहियें....इनकी माँ कि ...........
यह वो सहज प्रतिक्रिया थी जो मुझे अपने शहर बनारस में एक चाय की दुकान पर चुस्कियों के बीच सुनायी दी थी..यकीन जानिए मैंने बिल्कुल भी इस बात का खुलासा वहां नहीं किया था कि मैं भी इसी खेत में पिछले पांच सालों से 'उखाड़' रहा हूँ.....अगर मेरे मुहं से ये तथ्य गलती से भी निकल कर बाहर आ गया होता तो आप समझ सकते हैं कि मेरी बारे में वहां क्या क्या कहा जाता? वैसे एक बात जगजाहिर है कि बनारसी पैदा होते ही बुद्धजीवियों की कोटि में आ खड़े होते हैं....नुक्कड़ की चाय और पान की दुकाने इन बुद्धजीवियों के पाए जाने का केंद्र होती हैं और अगर आप उस दुकान के इर्द गिर्द बहने वाली हवा के विपरीत जाते हैं तो आप से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं होगा....हाँ अगर आपको अपनी बात कहने का बहुत शौक है तो बनारसी अंदाज़ में कहिये, शायद कोई सुन भी ले..वरना पढ़े लिखे लोगों की तरह तथ्यात्मक ज्ञान देने लेगे तो आप लौंडों में शुमार हो जायेंगे..खैर, हाथ में पुरवा, पुरवे में चाय और चाय में रोजी रोटी देने वाले काम को लेकर की गयी प्रतिक्रिया सुनने के बाद उठा तूफ़ान, कुल मिलाकर मामला गंभीर था....लिहाजा निकल लेने में ही भलाई थी....
वैसे जो कुछ भी चाय कि दुकान पर कहा गया उसमे कुछ ज्यादा गलत नहीं था....मीडिया को लेकर आम आदमी यही राय रखता है.....इस देश में जहाँ उत्तर भारत के किसान मानसून की बेरुखी से धान की रुपाई को लेकर चिंतित हैं वहीँ मीडिया वाले मुम्बई में होने वाली बारिश को ही फोकस किये हुए हैं मानो देश में बारिश तो बस मुम्बई में ही होती है....
यकीनन धोनी इस देश में धर्मं की तरह माने जाने वाले खेल क्रिकेट में एक बड़ा नाम है पर आम इंसान से बड़ा नहीं हो सकता ....मीडिया ने धोनी जैसे कई लोगों को को अपने ग्लैमर को ध्यान में रखकर बेहद उच्च कोटि का बना दिया है वो भी उनके सामजिक योगदान के बारे में विमर्ष किये बगैर......अक्सर मीडिया के हाथों में ऐसी ख़बरें होती हैं जो देश कि तकदीर से जुड़ी होती हैं पर उनकी तस्वीर अच्छी नहीं लगती लिहाजा उनकी न्यूज़ वैल्यू कम करके आंकी जाती है.....ख़ास तौर पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने जब से ख़बरों का प्रोफाइल देखना शुरू किया तब से ऐसे हालात सामने आते हैं... मीडिया में कंटेंट डिसाईड करने वालों से आखिर यह कौन पूछेगा कि किस आधार पर कंटेंट तय करते हैं? अब धोनी कि शादी होनी थी सो हुयी लेकिन बिन बुलाये बाराती कि तरह यूं नाचना क्या मीडिया को शोभा देता है ? आखिर कोई गंभीरता भी है या नहीं...ना जाने क्यों मीडिया पूरे देश को एक निगाह से नहीं देख पा रही है....तमाम बड़ी समस्याओं को दरकिनार कर कुछ ख़ास स्थानों और वर्ग की ही ख़बरें दिखाई जाती हैं....या पूरे दिन की ख़बरों में ऐसी ख़बरों का कंटेंट अधिक होता है......आम आदमी महंगाई से मर रहा है...पीने का पानी, बिजली, सड़क जैसी मूलभूत समस्याएँ हैं पर मीडिया मुम्बई की बारिश में नालों का पानी नाप रही है और धोनी कि शादी में प्लेट्स गिन रही है ....अब ऐसे में बनारसियों का गुस्सा फूटे ना तो क्यों? वैसे चाय कि दुकान पर मीडिया के लिए इतने ही आशीर्वचन नहीं कहे गए थे..और भी बहुत कुछ था...वह आपको यहाँ लिख कर नहीं बता सकता...जानना हो तो एक बार चले आईये बनारस ...
हर हर महादेव............