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सुनो प्रदीप, अब तुम मार्क्स की सोच नहीं, पूंजीवाद के वाहक हो

ये शीर्षक न सिर्फ एक प्रदीप के लिए है बल्कि उन जैसे और मुझ जैसे तमाम प्रदीपों के लिए हैं जो ये सोचते हैं कि पत्रकार बन कर समाज को एक नई दिशा देंगे। अपनी बात लेकर आगे बढ़ूं इससे पहले आपको बता दूं कि आखिर ये प्रदीप हैं कौन। सामान्य कद, गोरा रंग, गोल चेहरा, गालों पर चिपकी ढाढ़ी, सदरी और जींस। इसके साथ ही आजकल मोटे फ्रेम का चश्मा आंखों पर है। ये हुलिया हम तमाम पत्रकारों को अपना सा लगता है। शायद हम ऐसा ही होना चाहते हैं। मन की बेचैनी आंखों के साथ साथ हाव भाव में भी झलक ही जाती है। दरअसल प्रदीप एक पत्रकार बनने की कोशिश में लगे हैं। प्रदीप को उनके सहयोगी कामरेड कहते हैं।
प्रदीप को इस लेखन का आधार बनाने के पीछे एक नहीं कई वजहें हैं। प्रदीप युवा हैं, बेचैन हैं, जागरुक हैं। जैसे हम कभी हुआ करते थे। आठ साल के सफर में कई विशेषताएं दब सी गईं हैं। प्रदीप फिलहाल एक अखबार के नए संस्करण के साथ आगे बढ़ रहे हैं। जैसे कभी हम बढ़े थे। पत्रकारिता को मिशन मान कर प्रोफेशन के तौर पर अपनाया और फिर देखा कि अब सब कुछ कमीशन बेसिस पर हो गया है। हम जिस अखबार के साथ बढ़े, वो अखबार आगे बढ़ गया है और हम पीछे रह गए।
प्रदीप जिस अखबार के साथ जुड़े हैं उसके औपचारिक उद्घाटन के मौके पर उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी ने भाषण के दौरान कहा कि अब अखबार पूंजीपति निकालते हैं। लोगों ने तालियां बजाईं और कहा कि राज्यपाल ने बहुत बड़ी बात कह दी। लेकिन हम भूल गए कि अब ये बात तालियां बजाने के लिए नहीं बल्कि शर्म से डूब मरने की है। अखबार के पन्ने पर खबर से ज्यादा विज्ञापन होते हैं। कौन सी खबर छपेगी और कौन सी नहीं ये तय संपादक नहीं बल्कि मैनेजर करता है। अखबार खबरों के लिए नहीं बल्कि विज्ञापनों के लिए जाने जाते हैं। किसी पत्रकार की खबर जब इस बात को लेकर गिर जाती है या उसका काॅलम कर दिया जाता है क्योंकि अखबार में उस दिन विज्ञापन अधिक होते हैं तो जाहिर है कि युवा पत्रकार का कलेजा कांपेगा। लेकिन कोई फायदा नहीं प्रदीप आदत डाल लो।
न कोई राज्यपाल, न कोई मुख्यमंत्री, सब सिर्फ सच्चाई बयां करके रह जाएंगे। इस पूंजीवाद के खिलाफ आवाज सिर्फ तुम ही उठाओगे। ओह प्रदीप, लेकिन मैं तो भूल गया कि तुम फिलहाल पूंजीवाद के ध्वज वाहक हो। माफ करना।