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होली तो बाज़ार मांगती है

फाल्गुन के बारे में जितना कहा जाये उतना कम ही होता है......अभी तक जाने कितने कवियों ने अपनी लेखनी को इस फल्गुम के मौसम के नाम कर दिया है......फाल्गुन की पूर्णिमा को होली का जो त्यौहार मनाया जाता है वोह अब महज रंग लगाने का एक दिन रह गया है....होली पर अब होलियार्रों की टोली गली मोह्हलों में नहीं दिखती है......घर के बड़े बूढ़े नुक्कड़ पर होलियाना अंदाज़ में नहीं दिखाई देते..... होरी गाने की तो परंपरा भी मानो ख़त्म सी हो गयी है.....होली ना सिर्फ एक त्योहार है बल्कि एक उत्सव है.....मनुष्य जीवन में उल्लास के क्षणों को भरने का एक जरिया है......स्वंतंत्र और स्वछंद होने के बीच के महीन से अंतर को बताने का माध्यम भी है होली....पहले कि होली तो अपनों का प्यार मांगती थी....बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद और दुलार मांगती थी लेकिन आज कि होली तो बाज़ार मांगती है....आज होली कि ख़ुशी तो बाज़ार में मिलती है...गुझिया, पापड़, चिप्प्स से लेकर हर चीज़ अब बाज़ार से आती है..... घरों कि छतों पर अब महिलायें हलकी ठंडक वाली गुनगुनी सी धूप में बैठ कर यह सब चीज़ें नहीं बनाती...अब तो हर चीज़ बाज़ार से जाती है....लेकिन एक सवाल फिर भी मन में आता है.....कि क्या होली इन बाज़ारों कि रौनक तक ही सीमित रह रही है.....क्या होली के मौके पर मिलनी वाली ख़ुशी भी इन बाज़ारों में मिल जाएगी? कहाँ है वोह दूकान मुझे भी ज़रूर बताना. फिलहाल कोशिश कि जाये कि होली को बाज़ारों से दूर गली और मोहल्लों में होलियान्ना हुडदंग के बीच मनाया जाये......

ज़रुरत भूतवाद कि है

यह एक अजीब नज़ारा था....यह वही शहर है जिसे लोग आधुनिक इतिहास के लिहाज से सबसे पुराना जीवंत शहर कहतें हैं... वही शहर जो कई मायने में बेहद खूबसूरत है.....कहतें हैं शिव के त्रिशूल पर बसा है.....यहीं माँ गंगा उलटी बहती है....यही एक ऐसा शमशान है जहाँ कभी भी चितायों कि आग नहीं बुझती लिहाजा इसे महाशमशान भी कहतें हैं.....बहुत कुछ जो इस शहर को और शहरों से अलग बना देता है...अलग इस लिहाज से नहीं कि यहाँ रहने वालो लोग कुछ अलग हैं बल्कि इस शहर कि पूरी कि पूरी आबो हवा ही अजीब है...मेरी एक मित्र हैं जो देहरादून मेंएक प्रोडक्शन हाउस में प्रोग्राम डारेक्टर हैं..उन्होंने कहा कि बनारस घूमने आना चाहती हैं....मैंने पूछा कि क्या कोई ख़ास वजह है...उन्होंने कहा नहीं बस यूं ही ....ज्यादातर लोग आज बनारस को महज घूमने के नज़रिए से ही देखने आते हैं....यह एक अच्छा सन्देश नहीं है....बनारस को समझना होगा .....दरअसल तीर्थाटन और पर्यटन के अंतर को समझना होगा.....हाँ पहले आप को उस शुरूआती वाक्य पर लिए चलता हूँ जहाँ से बात शुरू कि थी....दरअसल मैं बनारस के एक बेहद पॉश मने जाने वाले इलाके सिगरा से गुजर रहा हूँ....यहाँ बनारस के पहला मल्टीप्लेक्स खुला है....यूं तो इसे खुले हुए कुछ दिन हो चुके हैं लेकिन इसमें जाने वाली भीड़ देखता हूँ तो सहसा यकीन ही नहीं होता कि यह पुराना है....इतनी भीड़ रहती है कि रस्ते से चलना मुश्किल....इस मल्टीप्लेक्स में इतनी भीड़ के होने क़ा मकसद मुझे नहीं समझ आता है....गाड़ियों कि लाइन लगी है...पार्किंग में जगह नहीं है लेकिन लोगों के आने क़ा सिलसिला लगातार जारी है....क्या यह महज एक भीड़ है? लेकिन अगर भीड़ भी है तो इसका अपना एक मनोविज्ञान तो होगा....आखिर क्या है वोह सोच....इस मल्टी प्लेक्स में जमा भीड़ में कुछ वोह लोग भी हैं जिन्हें देख कर यह अंदाज़ लगा पाना मुश्किल है कि वोह यहाँ क्यों है...लेकिन वोह यहाँ हैं....क्या भौतिकतावाद आपकी आवश्यक आवाश्यक्तायों पर भी भारी है? इस जमा भीड़ के बड़ा हिस्सा वोह है जिसके कंधों पर देश क़ा भविष्य टिका बताया जाता है...नयी जींस, नयी टी शर्ट एक महंगी सी दुपहिया गाड़ी और महंगा मोबाइल....क्या यह पहचान होगी इस देश के भविष्य कि..? मेरे लिखने क़ा मतलब कुछ यह भी निकाल सकतें हैं है कि मैं भी संघ या लेफ्ट कि विचारधारा से प्रभवित हूँ लेकिन ऐसा हरगिज़ नहीं है...मैं भूतवाद से प्रभावित हूँ...वही भूत वाद जो आपको आपके भारतीय होने का एहसास कराता हैं...इस बनारस जैसे शहर को जो दिखता कम है महसूस अधिक होता है वहां पर हर भीड़ का एक उद्देश्य होता है...यहाँ हर गली हर चौक का मकसद है...यहाँ लोग शाम को हर काम निबटा के बहरी अलंग के लिए जाया करते थे...बहुत से लोगों को अब तो यह पता ही नहीं होगा कि बहरी अलंग होता क्या है......इसमें होता क्या है...खाने कि चीज़ है या पहनने कि ....दरअसल यह ना खाने कि चीज़ है और ना ही कि...यह तो वोह ख़ुशी है जो गंगा के साथ बाटी जाती है...यह वोह दुःख हइ जिससे बाहर आने का रास्ता गंगा से पूछा जाता है..वही गंगा जो हमारी पहचान से जुडी है..वही गंगा जो हमारी संस्कृति कि वाहक है...मैं एक बार फिर कहता हूँ ही मैं मल्टीप्लेक्स में जाने का विरोधी नहीं हूँ लेकिन अपनी पहचान से.... अपनी संस्कृति से दूर होते किसी को देखना मुझे दुःख ज़रूर देता है...हम युवा हैं लिहाजा हमारी ओर यह जमाना आशा भरी निगाह से देखता है....कोशिश हमें भी करनी होगी अतीत को साथ लेकर वर्तमान और भविष्य के लिए तभी शायद हम और हमारा देश अपनी पृथक पहचान के साथ नज़र आएगा.......

कुछ उधार के मौसम ले आयो..

कुछ उधार के मौसम ले आयो..
बहुत दिन हुए
यहाँ कोई मौसम नहीं आया....
ना कभी जेठ कि दोपहर से बचने के लिए
किसी नीम का सहारा लिया.....
ना कभी बारिश में भीगने को
मैदान में नंगे पाँव दौड़ा
खुले आकाश से सीधे बदन पर
पड़ती बूंदों क स्पर्श
भूल सा गया हूँ..
ठिठुरती ठण्ड में आज भी
आग के सामने बैठने क़ा मन करता है
बहुत दिनों से एहसास नहीं किया
उन हवायों को
जिनके बीच हर दर्द
दूर हो जाता है
क्या वोह भी मुझे याद करती होंगी
क्या बूंदों को भी अच्छा लगा होगा स्पर्श मेरा
यह पूछना है मुझे उनसे
जायो उधार ही सही लेकिन
कोई मौसम ले आयो.........

बचपना छोड़ दीजिये.......

मैं जब यह पोस्ट टाइप कर रहा हूँ उस वक़्त सभी न्यूज़ चैनल्स पर पुणे में हुए आतंकवादी धमाकों के बारे में ख़बरें दिखाई जा रही हैं....महज कुछ देर पहले तक यह सभी चैनल्स प्यार के परिभाषा बता रहें थे...एक ऐसी बहस ka झंडा बुलंद किये हुए थे जिसका कोई राष्ट्रीय सरोकार नहीं था...एक चैनल तो अपने न्यूज़ रूम से ही प्यार प्यार खेल रहा था.....कितना अजीब देश है ना.....और कितनी अजीब मीडिया है यहाँ कि...प्यार प्यार का खेल पिछले कुछ सालों से इन न्यूज़ चैनल्स पर बदस्तूर जारी है.....स्पेशल प्रोग्राम बनाये जाते हैं ......पूरा दिन इसी पर खेलने कि कोशिश कि जाती है...मानो बहुत बड़ा पर्व आ गया हो.....उसकी कवरेज को लगभग सभी चैनल वाले बेहद बड़ी खबर के रूप में दिखातें हैं......शायद टी आर पी के चक्कर में.....शायद क्या यकीनन.....दरअसल प्यार वोह एहसास है जो हमेशा जवान रहता है....महबूब का साथ हो तो जवानी कब बचपने में बदल जाती है पता ही नहीं चलता.....किसी ने इसी मौके के लिए कहा है कि दिल तो बच्चा है जी ....सच ही कहा है हुज़ूर मान लीजिये....लेकिन पिछले कुछ सालों में इस बच्चे कि हालत बहुत ख़राब हो चली है.....इन मुएँ चैनल वालों ने हर धड़कन को खबरिया जमा पहना दिया है ......एक तरफ प्यार को सही साबित करने वाले होते हैं और दूसरी तरफ बजरंग दल.....वही बजरंग दल जिसका बारे में जानने का मौका आप को कम ही मिलता होगा.....यह ऐसे जीव हैं जो कभी कभार ही प्रगट होते हैं.....इनका पौरुष ऐसे ही मौकों पर जागता है....इन्हें एक बीमारी है..वोह बिमारी साल में एक दो बार देश के युवा लोगों को परेशान करती है.......क्या बिमारी है आप को बताने कि ज़रुरत तो नहीं है ना......पूछियेगा भी मत.......इसका इलाज़ कोई नहीं कर प् रहा है...देश के डोक्टरों से उम्मीद नहीं है ......नेता सब निकम्में हैं ......बीड़ा कुछ हद तक मीडिया ने उठाया है पर बेहद बिखराव के साथ....एक गंभीर बहस का अभाव है....एक ऐसी बहस जो दूध का ढूध और पानी को पानी पानी कर दे.....दरअसल आज हम जिस सामाजिक ठेकेदारी से परेशान हैं....वोह हमारा ही बोया हुआ एक बीज है.....आगे बढ़ने कि सोच ने हमें हमारी ही जड़ों से काट दिया.....हम अपनी किताबों को कवर को देखने लगे उसके अन्दर के सन्देश को नहीं समझा......वैलेंतिने डे को मनाने का अधिकार सबको हइ ..जो मनाना चाहे.....उन्हें रोकने का अधिकार किसी को नहीं है......लेकिन इसके साथ ही यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि कहीं से भी मामला अश्लील ना होने पाए......दरअसल अश्लील होने कि कोई कानूनी परिभाषा नहीं दी जा सकती.....यह एक सामाजिक पाबन्दी है जो समाज के हिसाब से बदलती है...हमारा भारतीय समाज कहने को तो भारतीय है लेकिन इसमें तेजी से पाश्चात्य सभ्यता के भी अंश आयें हैं..... उसे हमने आत्मसात किया है ...एक ही शहर के दो अलग अलग इलाकों के लोगों के रहन शहं में बदलाव मिलता है...ऐसे में valentine day को लेकर उठने वाले विवाद को सुलझाने के लिए एक वैचारिक बहस आवश्यक है.....महज टी आर पी के लिए हल्ला मचाने से कुछ होने वाला नहीं है....यही नहीं इन जैसे तमाम अन्य मुद्दे हैं जो आज कि पंचायत या सामाजिक ठेकेदारों को काम दे रहें हैं इन सभी के बारे में इस तरह कि ही बहस होनी चाहिए....यह ऐसे मुद्दे हैं जिनके बारे में सरकारें कुछ नहीं कह सकती हैं....अदालत कुछ नहीं कर सकती है ...हमे और आप को आगे आना होगा.....इस बहस और इन जैसी कई और बहसों के लिए....तब कहीं जाकर valentine day को होने वाला हंगामा बंद हो सकेगा.....वैसे हमारी मीडिया इस किस हद तक बंद करना चाहेगी मुझे नहीं पता .....हाँ आज कल एक गाना बहुत सुना जा रहा है .......दिल तो बच्चा है जी....सच कहूं तो दिल हमेशा बच्चा ही रहता है इसे बुजुर्ग तो हम और आप बना देते हैं......