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ऐ समय


कहो तो  ऐ समय
तुम क्यों हुए
इतने अधीर
तुम तो क्षण क्षण देखते हो ना
परकोटे से भविष्य को
मैं भी तो देख रहा हूं
लिए तुम्हारी दृष्टि
संजय तो नहीं
हां
यह कोई महाभारत भी तो नहीं
फिर भी जीवन के कुरुक्षेत्र में
मैं चक्रव्यूह में घिरा हूं
अठ्ठाहस न करो
विकल वेदना का उपहास न करो
गर्भस्थ ज्ञान नहीं तो क्या
अभिमन्यु सा
द्वार तो खुलते और बंद होते रहते हैं
मोह और मोक्ष से परे होते हैं
उर की विह्वलता
मार्ग प्रशस्त करती है
युद्ध की व्याकुलता ही
जीत का हर्ष करती है
जीवन व्योम का तल नहीं है
स्पंदनों का धरातल नहीं है
आलम्ब है
अविलम्ब है
तुम पर आवृत है
तुम से ही निवृत है
वंदन और वरण की चाह में
कब कहां कोई अश्रु छलका
स्पर्श हुआ तो होगा तुमको भी
बोलो अलका
अभिसिंचित मन का संकल्प पढ़ लो
हे समय
अधीरता छोड़ दो
मेरी दृष्टि का भविष्य
तुम गढ़ लो।

हम लाचार साबित हो जाएंगे


एक बार अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ था। इसके बाद पिछले दस सालों में एक बार भी वहां कोई हमला नहीं हुआ जबकि अमेरिका खुले आम आतंकियों के खिलाफ जंग लड़ रहा है। ब्रिटेन में भी एक बार कई साल पहले हमला हुआ था। वहां भी इसके बाद आतंकी हमले की कोई घटना नहीं सुनाई दी। भारत में महज तीन महीनों के भीतर एक ही स्थान पर आतंकी दो बार हमला कर चुके हैं। वह भी देश की राजधानी दिल्ली में। पहले आतंकी हमले का नमूना पेश करते हैं और उसके बाद हमला करते हैं। साफ है कि हमने साबित कर दिया है कि हम आतंकियों के सामने लाचार हैं। संकीर्ण सोच वाली राजनीति हमें एक ऐसे देश का दर्जा दिला रही है जहां आम नागरिक स्वयं को सुरक्षित नहीं महसूस करता है। पूरा विश्व समुदाय अब यह मान चुका है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का दावा पिलपिला है। आतंक पर लगाम लगाने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। 
देश की सरकार के पास ऐसे कई मंत्री हैं जो किसी भी आतंकवादी हमले के बाद राजनीतिक चाशनी में डुबोया हुआ बयान दे सकते हैं। इनका पूरा फायदा भी उठाया जाता है। नेताओं के बयान आते हैं और घटना स्थल पर उनके दौरे होते हैं लेकिन इन सबके बीच आम नागरिकों का जख्म रिसता रहता है। मुआवजों का ऐलान कर सरकार अपनी खानापूर्ति कर लेती है। लेकिन इस सबके बीच हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा पर मंडरा रहे खतरे पर गंभीरता पूर्वक विचार का समय राजनीतिज्ञों को नहीं मिलता है। दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर हुई आतंकवादी घटना ने साबित किया है कि हम न सिर्फ आतंकवाद से लड़ने में असफल रहे हैं बल्कि हमारा सुरक्षा ढांचा पूरी तरह नाकाबिल है। आतंकवाद से लड़ने के लिए हमारे पास कोई स्पष्ट तंत्र नहीं है। कई एजेंसियां मिल कर आतंकवाद से लड़ाई लड़ रही हैं लेकिन किसी भी इकाई में तालमेल नहीं दिखता। केंद्रीय एजेंसियां भी हर बार नाकाफी साबित होती हैं। ऐसे में देश की सुरक्षा का दावा खोखला है। निरंतर अंतराल पर देश में आतंकी हमले होते हैं लेकिन खुफिया तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगती। 
राजनीति की रोटी सेंकने के चक्कर में हमारे देश को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां से हमें विश्व समुदाय को यह बताना बहुत मुश्किल है कि आतंकवाद के खिलाफ हम निर्णायक लड़ाई लड़ना चाह रहे हैं। कम से कम आप भारत की जेलों में कसाब और अफजल गुरु को इतने दिनों तक सुरक्षित रख कर यह भरोसा तो नहीं ही दिला सकते हैं। ऐसे में महज लफ्फाजी से काम नहीं चलेगा। कोई ठोस कदम उठाना होगा। बयानबाजी और जांच के दिलासे से आगे बढ़कर प्रत्युत्तर देना सीखना होगा। कूटनीतिक ही सही लेकिन कदम ऐसे होने चाहिए जो देश के नागरिकों को सुरक्षा की तसल्ली दे सकें। आतंकियों को होने वाली सजा को अधिक देर तक लागू न कर के भी हम विश्व समुदाय को गलत संदेश देते हैं। मानवाधिकार की बातें को थोड़ी देर के लिए यहां भुलाया जा सकता है।  
इसके साथ ही आतंकवाद से लड़ने के लिए एक ऐसा प्रभावी तंत्र बनाना होगा जो किसी भी राजनीतिक स्वार्थ से अलग हो। आतंकियों को यह बताना होगा कि आतंकवाद के खिलाफ देश एकजुट है। अगर हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो हम अपनी नजरों में तो गिरेंगे ही पूरी दुनिया के सामने हमारी लाचारी भी साबित हो जाएगी।

अफ़सोस हम लाचार हैं, हम भारतीय जो हैं


आतंकवाद के खिलाफ भारत की जंग अब दिशाहीन हो चली है। पाकिस्तान को हर बार दोषी ठहरा कर अपनी गरदन बचा लेने का नतीजा है कि देश के अलग अलग हिस्सों में पिछले 10 सालों में तीन दर्जन से अधिक आतंकवादी हमले हुए हैं और इनमें 1000 से अधिक लोगों की मौत हुईं हैं। देश का कोई कोना ऐसा नहीं बचा है जहां आतंकवादियों ने अपनी दहशत न फैलायी हो। दिल्ली से लेकर बंगलुरू तक, आसाम से लेकर अहमदाबाद तक दहशतगर्दों ने आतंक फैला रखा है। इन आतंकियों के आगे देश का नागरिक लाचार है। वह जानता है कि उसकी जान खतरे में है। 
सुरक्षा एजेंसियों की एक बड़ी फौज है देश के पास लेकिन इनका काम त्यौहारों पर एलर्ट जारी करने से अधिक कुछ भी नहीं रह गया है। यह बात सुनने में अच्छी भले ही न लगे लेकिन देश की आतंरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन एजेंसियों पर है वो आम नागरिकों का विश्वास खो चुकी हैं। धमाके दर धमाके होते रहते हैं और सुरक्षा एजेंसियों को भनक तब तक नहीं लगती जब तक किसी न्यूज चैनल पर विस्फोट की खबर न चलने लगे। सवाल पैदा होता है कि क्या भ्रष्टाचार का घुन इन एजेंसियों को भी लग चुका है। क्या इन एजेंसियों के अफसरों ने मान लिया है कि आतंकवाद का खात्मा नहीं हो सकता। या फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। कुछ भी हो भुगतना देश के नागरिकों को पड़ रहा है।
सियासी दांवपेंच का हाल यह है कि मुल्क के गुनहगारों को पालना हमारी मजबूरी हो जाती है। हमें कई साल लग जाते हैं इस बात का निणर्य करने में कि आतंकवादी को फांसी दे या नहीं। भले ही इसके पीछे न्यायप्रक्रिया का सुस्त होना एक अहम कारण हो लेकिन पुलिसिया कार्रवाई भी तेज नहीं कही जा सकती है। इन सब का फायदा भारत के खिलाफ साजिश रचने वालों को मिलता है। पालिटिकल सिस्टम में पैदा हुए लूप होल्स ने देश को खोखला किया है। इस बात में अब कोई दो राय नहीं है। स्वार्थ की राजनीति में देश को गर्त में भेज रहे हैं नेता। देश की आंतरिक सुरक्षा दांव पर लगा दी है। 
 इस सब के बावजूद सवाल यही है कि आखिरकार आतंकवाद के नासूर से मुक्ति मिलेगी कैसे। क्या देश को बयानों के जरिए आतंकवाद से मुक्ति मिल सकती है। क्या यह दिलासा दे देने से कि जल्द ही गुनाहगार पकड़े जाएंगे नागरिकों की जिंदगी सुरक्षित हो जाएगी। मुआवजा कभी भी इस देश के नागरिकों को इस बात की तसल्ली नहीं दिला सकता कि अगली बार आतंकी हमला इस देश पर नहीं होगा। न ही इस बात की कि अब कभी उनका अपना कोई जख्मी नहीं होगा। वक्त अब यह सोचने का नहीं रहा कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। वक्त सबकुछ ठीक करने के लिए कदम बढ़ाने का है। वक्त निर्णायक जंग का है। 

रोजाना बुनता हूँ एक ख़्वाब नया



रोजाना बुनता हूँ एक ख़्वाब नया 

रख देता हूँ उसे 
तुम्हारी आँखों में
तुम सो जाते हो देखता हूँ
तुम्हे 
या शायद अपने ख्वाबों को 
आँखे खोलती हो तुम 
अंगडाई लेते हुए
फिर मुस्कुराती हो 
नज़र भर के देखती हो मुझे
सिर हिला देती हो हौले से 
मानो कुछ पूछ रही हो 
मैं क्या जवाब दूं
बस मुस्कुरा भर देता हूँ
एक ख़्वाब पूरा हो गया.