लिख दिया पेशावर





लिख दिया पेशावर
दर्द, आंसू, चीख
लिखना था सन्नाटा
लिख दिया पेशावर ।
मौत, जुल्म, जिंदगी
लिखना था जज्बात
लिख दिया पेशावर ।
कॉपी, पेंसिल, हरा लिबास
लिखना था इम्तहान
लिख दिया पेशावर ।
जनाजा, कब्र, मय्यत
लिखना था मातम
लिख दिया पेशावर ।
बेबसी, बेसबब, बदहवास
लिखना था बारूद
लिख दिया पेशावर ।। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (19-12-2014) को "नई तामीर है मेरी ग़ज़ल" (चर्चा-1832) पर भी होगी।
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    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. मर्मस्पर्शी प्रस्तुति ....

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  3. लगा दिया एक काला दाग़ जो कभी नहीं हटेगा!

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