जो सीखा सत्तर सालों में

पिछले कुछ सालों में देश के हालात तेजी से बदले हैं। कई ऐसी चीजें हुईं जो देश में पहली बार इतने बड़े आयाम पर नजर आ रही हैं। देश अब राष्ट्रभक्तों और कथित राष्ट्रभक्तों की श्रेणी में बंट चुका है। एक गाय को माता मानने वाला समाज है और एक बीफ वाला समाज है। मुल्क की आजादी के सत्तर सालों में हम अखलाक और आजाद की आजादी को अब अलग अलग नजरिए से देखने की स्थिती में आ चुके हैं। पिछले सत्तर सालों में हम इतना ही विकास कर पाए कि पंद्रह अगस्त को हम फ्रिज में रखे मटन और बीफ से लेकर गाय के रक्षकों और गाय के मांस के कारोबारियों के बारे में अपना मत बना पाएं। ये देश के शायद नब्बे के दशक में लौटने की शुरुआत है जब देश में सिर्फ और सिर्फ राम मंदिर की बातें हुआ करती थीं। या फिर हम नब्बे के दशक में लौटकर अस्सी के दशक में लौटना चाहते हैं जब हम प्रधानमंत्री की हत्या करने वाले शख्स की पूरी कौम को ही मारने दौड़ पड़े थे। शायद इतिहास के काल खंड में पीछे जाने की हमारी उत्तेजना हमें अस्सी के दशक से भी पीछे उन अमानवीय क्षणों में ले जाना चाहती है जब जमीन पर खिंची एक लकीर मानवीय इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन को देखकर समय स्वयं कराह रहा था। 
पिछले सत्तर सालों में हमने इतनी ही तरक्की की है कि हमने अपने दुर्गुणों को सहेज कर रखना सीख लिया है। हम भूलने की कोशिश भी नहीं करना चाहते, भूल जाना तो दूर की बात है। अब हम इक्कीसवीं सदी की बात करने में रुचि नहीं रखते। हमें इस बात में भी रुचि नहीं होती कि हमारे देश का भविष्य और बेहतर कैसे होगा। इससे अधिक आवश्यक ये है कि हम ये याद करें कि फलां ने राष्ट्रगान गाया और फलां ने नहीं गाया। देश के सत्तर सालों में विकास का हाल ये है कि हमने इतिहास में पीछे जाने की कला को अगली पीढ़ियों में सौंपना भी सीख लिया है। 
पिछले सत्तर सालों में हमारी सत्ता का विकास ऐसा हुआ कि हमने सत्ता के लिए हर हद को पार करना सीख लिया। सत्ता की सार्थकता हमने अपने व्यक्तिगत हितो तक सीमित कर ली और हम अब इसी में खुश हैं। सत्ता की व्यापकता और जन के प्रति सार्थकता से हमारा कोई लेना देना नहीं है। 
पिछले सत्तर सालों में हमने एक दूसरे पर शक करना भी सीख लिया। अब हम एक दूसरे पर आसानी से उंगलियां उठा सकते हैं। हमारे पास तर्कों की संक्रीणता विकसित करने की कला आ चुकी है। अब हम कुतर्कों के आधार पर भी विमर्श और निर्णयों के लिए स्वतंत्र हैं। 
इतना भर ही रह गया है हमारा देश। हम शायद इसी में खुश भी हैं। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस स्थिति के लिए शायद हम सब ही सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं ... ऐसा माहोल स्वतंत्रता के बाद ही बना सिया गया था और आज भी है ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (17-08-2016) को "क्या सच में गाँव बदल रहे हैं?" (चर्चा अंक-2437) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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