भारतीय मीडिया के लिए ही नहीं, ये संकट लोकतंत्र की विश्वसनीयता का भी है

ये रिपोर्ट हैरान करने वाला कतई नहीं है। सांप बिच्छू दिखाते दिखाते भारतीय मीडिया नेताओं के भाषणों को लाइव दिखाने तक तो पहुंची। ये विकास नहीं है तो क्या है? अब भला कौन कहेगा कि ये देश संपेरों का देश है? कम से भारतीय मीडिया के सहारे इस देश के बारे में अपनी राय बनाने वाले तो नहीं ही कहेंगे। अब ये नेताओं का देश है।
दरअसल रिपोर्ट्स विद्आउट बार्डर्स संघठन के जरिए तैयार वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की रिपोर्ट आने के बाद ये पता चला कि साल 2017 में भारतीय मीडिया अन्य देशों के साथ रैंकिंग में 136वें स्थान पर है। कुल 180 देशों की रैंकिंग की गई इसमें भारत 2016 की तुलना में 3 स्थान लुढ़क कर 136वें स्थान पर आ चुका है।
हालांकि ये सर्वे मुख्य रूप से प्रेस की स्वतंत्रता को लक्ष्य करके किया जाता है लेकिन इस सर्वे का एक पहलु ये भी है कि ये रैंकिंग मीडिया के स्वतंत्र आकलन और व्यवहार को भी प्रदर्शित करती है। रैंकिन गिरने का अर्थ है कि भारतीय मीडिया का व्यवहार स्वतंत्र नहीं रह गया है या फिर यूं कहें कि भारतीय मीडिया पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर समाचार लिख और दिखा रही है।
भारतीय मीडिया के लिए ये स्थिती ठीक नहीं है। वो भी तब जब हम ये दावा करते हैं कि पत्रकारिता हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। जाहिर है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ की विश्वनीयता लगातार खतरे में पड़ रही है।
इस रिपोर्ट में कुछ और बातें भी हैं। ये रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में पत्रकारिता करना लगातार खतरे से भरा काम होता जा रहा है। 2017 में आई रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 193 पत्रकारों को इस समय जेलों में बंद रखा गया है। इनमें सबसे अधिक संख्या में तुर्की ने पत्रकारों को जेल में बंद किया है। यही नहीं 8 पत्रकारों की हत्या कर दी गई। इनमें सबसे अधिक मेक्सिकों में तीन पत्रकारों की हत्या हुई।
दुनिया के जिन 180 देशों में प्रेस की स्वतंत्रता का सर्वे कराने के बाद रैंकिंग दी गई है उनमें भारत अपने पड़ोसी मुल्कों से कुछ ही स्थान ऊपर है। यानी पाकिस्तान, श्रीलंका जैसे देशों की तुलना में भारतीय मीडिया बहुत अधिक बेहतर नहीं है।
इस रिपोर्ट को कई लोग खारिज कर सकते हैं। हो सकता है वो इस सर्वे के तौर तरीकों और अन्य संसाधनों पर सवाल उठाएं लेकिन ये सच है कि भारतीय मीडिया का व्यवहार लगातार पूर्वाग्रह से ग्रस्त होता जा रहा है। ये गंभीर चिंता का विषय है।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-05-2017) को
    "लजाती भोर" (चर्चा अंक-2631)
    पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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