तुम्हे भी तो प्रेम है


अक्सर तुम्हारे बिम्ब का
आकार उतर आता है मुझमे
निराकार
साकार
क्या है
कुछ भी तो नहीं कह सकता
हाँ यह ज़रूर है कि
आकार तुम से ही है
कभी व्योम का कोई सिरा तलाशते जब दूर निकाल जाता हूँ
आक़र तुम्हारे इसी स्वरुप में सिमट जाता हूँ
मैं जानता हूँ तुम स्वतंत्र हो
पर बंधन भी तुम्हे प्रिय हैं
अधिकार और स्वीकार
भाव मेरे हैं
यह अनुबंध भी तो मेरे हैं
तुम तो हमेशा से मुक्त रहे हो
रूई के फाहे पर चलने की कोशिश
ओह
देखो तो, क्या स्वप्न है
नहीं
आह्लाद से विपन्न है
खिलखिलाकर हंस रहे हो ना तुम?
हंसो
और हंसो
कभी कभी विपन्न के लिए भी हँसना चाहिए
किसी स्वप्न के लिए भी हँसना चाहिए
तभी अचानक रूई के फाहे
बदल बन गए
ओह
नहीं वाह
अब बारिश होने वाली है
देखना प्रेम बरसेगा
तुम भी आना रससिक्त हो जाना
आखिर तुम्हे भी तो प्रेम है.

लाहौर पर ही तिरंगा फहरा दोगे क्या?


समझ में नहीं आता कि इस देश के लोगों को हो क्या गया है? आखिर वो करना क्या चाहते हैं? तिरंगा फहराना चाहते हैं. वो भी लाल चौक पर. हद ही तो है. भला ऐसा करने का हक उन्हें किसने दिया? केंद्र सरकार उन्हें रोकने की तैयारी में है तो कोई गलत नहीं है. सीआरपीएफ लगा कर सरकार उन्हें रोकने की तैयारी में है तो रोकने दो. मुझे इसमें कोई गलत बात नहीं नज़र आती. एक भारतीय होने का मतलब ये कतई नहीं है तुम श्रीनगर की लाल चौक पर जा कर तिरंगा फहरा दो. तुम अपनी गली में फहरा लो, बालकनी में फहरा लो. क्या कम जगहें हैं? लेकिन श्रीनगर में लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहर सकता, सुना तुमने.
केंद्र सरकार अपने विज्ञापनों में कहती है कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और अरुणाचल से गुजरात तक भारत एक है. अब कहने का क्या है? बहुत सी बातें कही जातीं हैं सब की सब सही ही होती है क्यां? यह सब तो कहने भर के लिए है. कश्मीर तो .....है किसी का, मुझे पता करने पड़ेगा. किसी पुरानी किताब में पढ़ा था कि कश्मीर भारत का है. अब पता नहीं ऐसा है या नहीं? हाँ, कन्याकुमारी तो खालिस अपना ही है अभी तक. जहाँ तक बात अरुणांचल कि है तो शायद यह भी भारत का ही हिस्सा है. लेकिन अगर कोई पड़ोसी मुल्क इससे अपने देश के नक़्शे में में दिखा ले तो भी हमें क्या फर्क पड़ता है? चलता है. कांग्रेस सरकार इन सब बातों का बुरा नहीं मानती है. गुजरात का क्या है, वो कहाँ जाने वाला है? इन सब बातों में पड़कर देश के लोगों को अपना वक़्त और देशभक्ति की भावना को बर्बाद नहीं करना चाहिए.
यह देश अलगाव वाद की राजनीती करने वालों को सुरक्षा देता है. उनपर कोई करवाई करने से डरता है. जब कभी वो देश के दिल दिल्ली में आकर पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लागतें हैं तो उन्हें सुरक्षा दी जाती है. उनकी सभाएं सकुशल सम्पन्न हो इसके लिए विशेष इन्तेजामात किये जाते हैं. देखा इस देश के लोगों का दिल. कितना बड़ा है. खासकर केंद्र सरकार का तो कहना ही क्या. सांसद के आरोपी को मेहमान बना कर रखा है. कोई देश ऐसा कर सकता है? नहीं ना. देखा ये तो कांग्रेस सरकार कर सकती है. सिर्फ कांग्रेस सरकार.
वैसे एक बात कहूं दोस्तों, अगर इंडियंस को छोड़ दो ना तो इस देश के 'हिन्दुस्तानी' लाल चौक पर तो क्या लाहौर पर भी पल में तिरंगा फहरा दे. वाशिंगटन डीसी पर भी केसरिया, सफ़ेद और हरा रंग ही नज़र आये. लेकिन करेंगे क्या? जब देश से बड़ा वोट हो. ईमान से बड़ा नोट हो, तो ऐसे कदम तो उठाने ही पड़ते हैं. कोई बात नहीं गिलानी को खुश रखो. एक पाकिस्तानी झंडा उसके लिए तैयार रखो. लेकिन इतना सुन लो, लाल चौक पर तिरंगा तो फहर कर ही रहेगा. क्योंकि ये हिन्दुस्तान की कसम है.

अब तो सपने में भी फुटकर दिखता है


बहुत लोगों को देखा साल के पहले दिन बनारस के संकट मोचन मंदिर के बाहर अपना सिर पटक रहे थे. ठण्ड से परेशान भगवान से चीख चीख कर कह रहे थे की आज साल का पहला दिन है. हम आपके दर्शन करने आयें हैं. हमारा पूरा साल अब आप के जिम्मे है. हम चाहे जो करे हमारा कुछ बिगड़ना नहीं चाहिए. कुछ बिगड़ा तो आप समझिएगा. उसके बाद मंदिर नहीं आयेंगे. भक्तो की प्रार्थना में भाव ऐसा की वो प्रार्थना कम और मांग ज्यादा लग रही थी. गोया भगवान को भगवान उन्होंने ही बनाया हो जैसा हर पांच साल में वोट देकर एक भगवान चुनते हैं. खैर भगवान को इन सब बातों की आदत हो चली है. लेकिन एक बात उन्हें परेशान कर गयी. संकट मोचन भगवान सोचने लगे कि आखिर यह साल नया कैसे हो गया. यह संवत बदला कब. कानो कान ख़बर तक नहीं हुयी. लेकिन अब इतने लोग बाहर जमा है तो सचमुच साल बदल ही गया होगा. फिर भी तसल्ली करने के भगवान ने अपने एक सेवक को बाहर भेजा कि पता लगा कर आयो कि माजरा क्या है. सेवक ने क्या बताया यह आपको उसके लौट कर आने के बाद पता चलेगा. तब तक आपको एक और दृश्य सुनाता हूँ.
एक जनवरी को एक मित्र के घर एक काम से एक मिनट के लिए गया. उसके घर पहुंचा तो देखा वो महाशय अब भी रजाई में औंधे पड़े हैं. अब उन्हें देख मुझे अपराध बोध हो आया कि मैं क्यों ना रजाई में रहा. खैर मैंने उन्हें जगाने का अपराध कर दिया. मित्र उठे तो उनके चेहरे से दुःख टपक रहा था. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से भारत के आम आदमी के चौखटे से टपकता है. मैंने पूछा क्या हुआ? कम से कम सोते समय तो खुश रहा करो. मित्र ने मेरी बात निर्विकार भाव से सुनी और अपने दोनों कानो का उपयोग किया. एक से सुना और एक से निकाल दिया. मित्र ने अपना कष्ट बताया. कहा कि यार अब तो सपने में भी फुटकर ही दिखता है. बड़ी नोट कहीं दिखती ही नहीं. महंगाई इतनी बढ़ गयी है कि 500 और 1000 की नोट का वजूद घंटे दो घंटे से अधिक बचता ही नहीं. सब्जी वाला भी अगर मन से सब्जी दे दे तो एक टाइम का सब्जी का खर्च 100 रुपये तो हो ही जाता है. यही कारण है कि सपना देख रहा तो पॉकेट में बस चिल्लर ही दिख रहे थे. बड़ी नोट थी ही नहीं. यही नहीं एटीएम से निकली वो स्लिप भी थी जो बता रही थी कि तुम कंगला हो गए हो.
मित्र को लगा जैसे उसने बड़ी नोटों के सपने देखने का अधिकार खो दिया है. मेरे पास भी इस तर्क का कोई जवाब नहीं था. आखिरकार हमारे देश के शीर्ष नेतायों ने भी बताया है कि दुनिया की महाशक्ति बनना है तो बड़े सपने मत देखो. सपने में फुटकर से काम चला लो. बाकी का कारोबार उनके जिम्मे छोड़ दो. नीरा और राजा तो है ही ऐसे सपने देखने के लिए. तेजी से बढ़ते इस देश के लोगों की जेब तेजी से खाली हो रही है. क्या फर्क पड़ता है. देश तो तरक्की कर रहा है. सड़कों के किनारे झुग्गी बन रही है तो क्या हुआ सड़क तो बनी.
मित्र की आँखों में आंसू थे. मै समझ गया कि ये हकीक़त में तो अब प्याज के आस पास भी नहीं भटकता, सपने में होने का फायदा उठा कर ये ज़रूर प्याज के पास गया होगा. दुकान दार से हेकड़ी में दाम भी पूछ लिया होगा. दाम सुन कर ही ये आंसू आये होंगे. लेकिन यारो इन आंसुयों में भारत के आम आदमी की लाचारी और प्याज के महंगाई वाले आंसुयों को अलग कर पाना मुश्किल है. खैर रोना ना सिर्फ मेरे मित्र का बल्कि इस देश के हर उस आदमी का संवैधानिक अधिकार बन गया है जो आम आदमी की श्रेणी में आता है. मेरा काम क्या था मैं भूल चुका था. लगा कि देश इतना आगे जा रहा है तो मैं भला अपना काम क्यों याद रखूँ. मैं भी देश के साथ आगे बढ़ लूं. इन्ही विचारों के साथ में वहां से चल दिया.
बात वापस संकट मोचन भगवान की करती हैं. भगवान अब भी परेशान थे. उनका सेवक नहीं लौटा था. भगवान ने मुझसे कहा कि जरा देख कर आओं सेवक कहाँ रह गया. भीड़ बढ़ चुकी थी. मुझे भगवान के सेवक को तलाशने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी. आँख गड़ा गड़ा कर देखा तो भगवान का सेवक भारतीय इंसानों की लाइन में दिखा. वो भी संकट मोचन भगवान के दर्शन करने के लिए खड़ा हो गया था. मैंने उससे पूछा कि तुम लाइन में क्यों खड़े हो? तुम्हारा तो भगवान से सीधा संपर्क होता है. सेवक थोड़ा अकड़ कर खड़ा हो गया. कहा इतने लोग जो नया साल मना रहे हैं तो कोई गलत तो नहीं कर रहे. क्या फर्क पड़ता है कि साल बदला है संवत नहीं. हम भारतीय तो इसके बाद भी बने हुए हैं. मैंने अपना सवाल दोहराया. तो सेवक ने कहा कि महंगाई इतनी बढ़ गयी और देश के नेता कुछ कर नहीं पा रहे हैं इसलिए अब भगवान का ही सहारा है. यही वजह है कि मैं भी लाइन में खड़ा हो गया हूँ.
अब मैं क्या कहूं. हर भारतीय नए साल के जश्न में है और बड़ी नोट का सपना देखने से डरता है. फिर भी यही कहता है कि वो तरक्की कर रहा है. क्योंकि देश तरक्की कर रहा. करो भईया. किसने माना किया है. महंगाई ने ऐसी कमर तोड़ी है प्याज तो क्या प्याज की महक से डर लगता है. देश के नेतायों से कोई उम्मीद नहीं है भगवान का ही सहारा है. मेरी हिम्मत नहीं हुयी कि संकट मोचन जी को जाकर बतायूं कि आपका सेवक भी अब लाइन में आ गया है. जब वो सामने पहुंचेगा तो मिल लीजियेगा.
लगता है दोस्तों इस देश के तरक्की भगवान के ही भरोसे है. वैसे इतना बड़ा बोरिंग लेख पढ़ कर आपको ज़रूर नींद आ रही होगी. लेकिन मेरी एक राय मानियेगा कि सपना मत देखिएगा.
जय हो संकट मोचन महाराज की.

ये तो दर्द में भी मुस्कुराता है


एक शहर जिसकी पहचान
महज घंटे और घड़ियालों से नहीं
मंदिर के शिखर और
उनपर बैठे परिंदों से नहीं
यहाँ ज़िन्दगी
ज़ज्बातों से चलती है
अविरल, अविनाशी माँ की
लहरों पर मचलती है
शहर अल्लहड़ कहलाता है
ये तो दर्द में भी
मुस्कुराता है
यकीनन इसके सीने पर
एक ज़ख़्म मिला है
कपूर की गंध में
बारूद घुला है
एक सुबह सूरज सकपकाया सा है
गंगा पर खौफ का साया भी है
किनारों पर लगी छतरियो के नीचे
एक अजीब सी तपिश है
सीढ़ियों पर लगे पत्थर
कुछ सख्त से हैं
डरे- सहमे तो दरख्त भी हैं
तभी अचानक
एक गली से एक आवाज़ आती है
महादेव
देखो, दहशत कहीं दूर सिमट जाती है
घरों से अब लोग निकल आयें हैं
उजाले वो अपने साथ लायें हैं
चाय की दुकानों पर अब भट्ठियां सुलग रहीं हैं
पान की दुकानों पर चूने का कटोरा भी
खनक रहा है
देखो, ये शहर अपनी रवानगी में
चल रहा है
सुनो, उसने पुछा था
इस शहर की मिट्टी
मिट्टी है या पारस
लेकिन उससे पहले
दुआ है यही की
बना रहे बनारस
बना रहे बनारस .

कैसी रही चाय साहब?

>> धमाके के वक़्त पुलिस के बड़े अफसर के घर चल रहा था जश्न.

यह सवाल आपको कुछ अटपटा सा ज़रूर लग सकता है लेकिन सवाल जायज है. दरअसल ये सवाल इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मंगलवार 6 दिसम्बर को जिस वक़्त वाराणसी के शीतला घाट पर बम धमाका हुआ ठीक उसी समय जिले के आला अफसर चाय पार्टी में व्यस्त थे. आप को हैरानी होगी ये जानकार कि ये चाय पार्टी दी किस ख़ुशी में गयी थी. दरअसल 6 दिसम्बर की बरसी शहर में शांतिपूर्वक बीत गयी इसका जश्न मनाया जा रहा था. शहर पुलिस महकमे के सबसे बड़े अफसर के बंगले पर इस पार्टी का आयजन किया गया था. बाकायदा पत्रकारों को फ़ोन करके इस पार्टी में बुलाया गया था. खुद एसपी सिटी ने मेरे एक पत्रकार मित्र को फ़ोन किया और चाय पार्टी का निमंत्रण दिया. कारण बताया कि 6 दिसम्बर की बरसी शांति पूर्वक बीत गयी इसलिए जश्न मानेगे. कोशिश थी कि अपनी पीठ खुद ठोक ली जाये. यानी साफ़ है कि 6 दिसम्बर बीत जाने के बाद सभी अधिकारिओं ने मान लिया था कि अब कुछ नहीं होने वाला है. इसी लापरवाही का फायदा उठा लिया इंडियन मुजाहिदीन ने.
सूत्रों की हवाले से ख़बर है कि लास्ट के एक दिन पहले तीन संदिग्ध लोग इस इलाके में देखे गए थे. इसके बावजूद पुलिस और खुफिया विभाग ने कोई विशेष सतर्कता नहीं बरती. तुर्रा यह कि पुलिस ने कहा कि हम लोगों ने इलाके की सघन तलाशी ली थी अब आप ही सोच ले कि पुलिस की ये सघन तलाशी कितनी विरल थी. ऐसा नहीं है कि इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने हाथ घुमाया होगा और बम शीतला घाट पर रखे कूड़ेदान में पहुँच गया होगा. इसके लिए बाकायदा रेकी हुयी होगी. कहीं स्थानीय ठिकाना बनाया होगा. कुछ दिनों तक हर चीज़ पर नज़र रखी होगी. तब जाकर पूरी घटना को अंजाम दिया होगा. यही नहीं 6 दिसम्बर को अगर पुलिस इतनी सतर्क थी तो भला आतंकवादी शहर में कैसे टिके रह गए? साफ़ है कि खुफिया तंत्र यहाँ नाकाम साबित हुआ.



अद्भुत और अलौकिक





वो दृश्य अद्भुत और अलौकिक होता है उसकी कल्पना मात्र भी आप को रोमांचित कर देती है. वाराणसी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाना वाला उत्सव देव दीपावली देश के भयातम आयोजनों में से एक है. जाह्नवी के तट पर बसे काशी में घाटो पर असंख्य दीये एक साथ जल उठते हैं. देवताओं के लिए मनाई जा रही ये देव्पावाली देश का एकमात्र ऐसा धार्मिक आयोजन है जिसमे देश प्रेम की भावना दिखती है. इस दिन कार्यक्रम की शुरुआत अमर शहीदों को नमन करने के बाद होती है. इसी आयोजन की कुछ तस्वीरें आपके लिए...

how long will it survive?



its a story that i covered in varanasi. it tell us the dangerous results of throwing soil that has been collected in flood at riverbank of ganga ghats, again in ganga. river scientists telling this continue process will change the flow of ganga in varanasi. this change of flow in ganga will dangerous for many ghats like panchganga, scindhiya and some others. these ghats may be in ganga in few years. the one of most important thing is that all this cleaning process is done by local andimistration.

अब तो गरियाने से भी नहीं फरियाता

मीडिया के बढ़ते कदमो ने कई बदलाव लायें हैं. लेकिन कुछ बदलाव तो ऐसे हैं जिनके बारे में आमतौर पर सोचा नहीं जा सकता है. अब गालियों को ही ले लीजिये. गालियों में कितना कुछ बदल गया है. नयी नयी तरह की गालियाँ आ गयी हैं. जिन्हें सुनकर आप अपने को आनंदित महसूस करते हैं. गालियों के साथ सबसे बड़ी खासियत ये है कि किसको कौन सी गाली कब लग जाएगी, यह आप पहले से नहीं तय कर सकते. कोई साले से ही बिदक जाता है और कोई माँ बहन करने पर भी नहीं संभलता. ये गाली की माया है. देश के जाने- माने सहित्यकार काशीनाथ सिंह ने इन गालियों को अपनी किताब में भी बेधड़क प्रयोग किया है. किताब के पन्नों पर आने के बाद इन गालियों ने ऐसा चोला बदला कि सामाजिक परिवेश इनके बिना अधूरा लगेगा. ये है गालियों की विशेषता. लेकिन आजकल यही गालियाँ अपने मौलिक स्वरुप को बचाने के लिए गुहार लगा रहीं हैं. वह चाह रहीं हैं कि लोग इन गालियों का सही उच्चारण शुरू करे ताकि इनका आस्तित्व बना रहे.
गालियों के स्वरुप में परिवर्तन का एहसास तब से हुआ जब से छोटे पर्दे पर लाफ्टर शो शरू हुए. गंभीर अर्थो वाली गालियों के साथ प्रयोग शुरू हुए और गालियाँ बिगड़ गयीं. अब तेरी माँ की ...... कि जगह ले ली तेरी माँ का साकी नाका ने. अब भला यह कौन सी गाली हुयी. ना कोई पंच ना कोई कोई ह्यूमर. इस गाली को सुनने के बाद सुनने वाले के मन में कोई भाव आ ही नहीं सकता. इसी गाली को कुछ लोग कहते हैं तेरी माँ की आंख. अब भला आप ही बताइए कि इस तरह की गाली देने का क्या मतलब हुआ. भईया जो गाली, गाली की तरह लगे वो दो ना. छोटा पर्दा एक बड़ी चीज़ संभालता है जिसका नाम है राखी सावंत. ये देवी इन्साफ करती हैं. इन्साफ कम हल्ला ज्यादा करती हैं. इनके शो पर जो लोग आतें हैं उनके बीच गाली- गलौज सौ फ़ीसदी तय होता है. कुछ कमी होती है तो स्वयं राखी सावंत उसे पूरा करती हैं. लेकिन राखी भी जो गालियां देती हैं वो दमदार नहीं होती. उनमे हल्का पन होता है. इस बात का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि राखी को आज तक किसी ने भी मारा नहीं है. अब ऐसी गाली का क्या हासिल जिसको देने के बाद मारपीट ना हो. कौन समझाए इन टी वी वालों को.
बड़े पर्दे वाले भी कम नहीं हैं. इनकी भी फट जाती है गाली को सही तरीके से उसके मूल रूप में दिखाने सुनाने में. ठीक से गाली भी नहीं दे पाते. अगर दिया भी तो वहां बीप- बीप करने लगते हैं. अब भला इसका क्या मतलब हुआ. जनता ने पैसा दिया है गाली सुनने का, सुनाओ. लगते हैं बीप बीप सुनाने.
गालियाँ किसी वाक्य को बेहद आत्मीय बनाती हैं. दो लोग जो हमेशा गाली से अपनी बातों की शुरुआत करते हैं उनमे अपनापन होता है. लेकिन आजकल जिस तरीके से गाली का बंटाधार हुआ है उस ने तो गालियों की पूरी परिभाषा ही बदल दी. उनका मन्तव ही बदल गया. गंभीरता नाम की तो चीज़ ही इन गालियों में नहीं रह गयी.
दुनिया का सबसे पुराना जीवंत शहर बनारस तक गालियों की क्राइसिस से जूझ रहा है. कभी गालियों का पूरा कवि सम्मेलन कराने वाला बनारस नयी गालियाँ तलाश रहा है. क्योंकि पुरानी गालियों का रूप बदल गया है और उनकी मारक क्षमता भी कम हो गयी है. पहले जिस गाली को देने की लिए मुंह बनाने भर से अगला पिनक जाता था अब चार बार पूरी गाली बक दीजिये कोई असर नहीं पड़ने वाला. क्या करेंगे अब जब राखी सावंत ही गाली देने लगेंगी तो किसी के ऊपर क्या ख़ाक असर पड़ेगा. गालियाँ बदल गयीं हैं और इनको बोलने वाले लोग भी बदल गएँ हैं. लेकिन इसके कारण सबसे बड़ा नुकसान जो हुआ है वो उन लोगों का हुआ है जो इन गालियों को शिद्दत से जीते थे. उन लोगों का हुआ है जिनके कई काम इन्ही गालियों ने करवा दिए थे. या तो उन्होंने गाली खा कर यह काम किये या फिर गाली देकर लेकिन अफ़सोस कि अब गरियाते हैं तो भी फरियाता नहीं है.

हे आज तक ये 'धर्म' है 'वारदात' नहीं...

धनतेरस के दिन दोपहर में आज तक ने ' धर्मं ' कार्यक्रम में वाराणसी में माँ अन्नपूर्णा मंदिर से जुड़ी एक ख़बर दिखाई. बिल्कुल इण्डिया टीवी वाले तरीके से. ख़बर में दिखाया जा रहा था कि वाराणसी में स्थित माँ अन्नपूर्णा का मंदिर एक ऐसा मंदिर है जो वर्ष में सिर्फ एक दिन धनतेरस के दिन खुलता है. ये तथ्य पूरी तरह गलत है. माँ अन्नपुर्णा का मंदिर तो हर रोज़ खुलता है. ख़ास बात ये है कि धनतेरस वाले दिन माँ अन्नपूर्णा की स्वर्णमयी प्रतिमा के दर्शन होते हैं. यह वर्ष में सिर्फ एक दिन धनतेरस के दिन ही होता है. माँ अन्नपुर्णा की स्वर्ण प्रतिमा बेहद भव्य और आकर्षक है. इसीलिए इस दिन माँ के दरबार में भक्तों का सैलाब उमड़ता है. यही नहीं इस दिन माँ का खजाना भी भक्तों के बीच बांटा जाता है. इसके तहत माँ को दान में मिले धन को भक्तों के बीच में वितरित किया जाता है. इस धन को लेने के लिए माँ के दरबार में जबरदस्त भीड़ उमड़ती है. ऐसा नहीं है कि धन कोई बहुत अधिक होता है. फुटकर पैसे होते हैं जिन्हें भक्तों के बीच उछाला जाता है. मान्यता है कि जिसके पास माँ का ये खजाना होता है वो हमेशा धन धान्य से परिपूर्ण होता है. माँ के मंदिर के प्रथम तल पर जो मूर्ति होती है वो अद्भुत आभा वाली होती है. इस मूर्ति के दर्शन धनतेरस के दिन ही होते हैं. इसी मूर्ति के दर्शन को लोग बड़ी संख्या में आते हैं.
लगे हाथ आपको ये भी बता देता हूँ कि माँ अन्नपुर्णा का दर्शन इतना महत्वपूर्ण क्यों है. दरअसल माँ अन्नपुर्णा स्वयं आदि शक्ति माँ पार्वती हैं. विवाह के बाद जब बाबा भोले नाथ पार्वती को लेकर कैलाश पर लेकर लौटे तो माँ ने शिव से कहा कि स्वामी आप तो मुझे मेरे मायके में ही वापस लेते आये. गौरतलब है कि माँ पार्वती हिमालय के पुत्री थी. इस तरह से हिमालय पर स्थित कैलाश पर्वत उनका मायका हुआ. माँ पार्वती की ये बात सुनने के बाद भगवान शिव ने अपने त्रिशूल पर काशी का निर्माण किया और माँ के साथ वहां स्वयं निवास किया. काशी पहुँचने के बाद माँ ने भोले नाथ से पूछा कि आप यहाँ क्या करेंगे? इसपर भगवान् शिव ने कहा कि मै यहाँ प्राणियों को मोक्ष प्रदान करूंगा. इसपर माँ पार्वती ने कहा कि यदि आप मोक्ष देंगे तो मैं सबको अन्न दूँगी. तभी से माँ का नाम अन्नपुर्णा भी हो गया. इसके बाद चूँकि काशी में शिव के सभी गण भी विराजते हैं, उनके भोजन का पूरा प्रबंध माँ अन्नपूर्णा के जिम्मे है. स्वयं भगवान शिव माँ के सामने याचक के रूप में खड़े रहते हैं. माँ का आशीर्वाद है कि काशी में कोई भी भूखा नहीं सोयेगा.
माँ अन्नपुर्णा के मंदिर भगवान् श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के लगभग सामने ही स्थित है. भगवान् श्री काशी विश्वनाथ के दर्शन करने को आने वाले श्रद्धालु माँ के दर्शन भी ज़रूर करते हैं. अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि आजतक जैसे चैनल ने इस तरह कि भ्रामक ख़बर क्यों दिखाई. वैसे इस सवाल का जवाब तो आजतक चैनल में जिम्मेदार पद पर बैठे लोग ही अच्छे से दे सकते हैं लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है कि इसमें वाराणसी के स्ट्रिंगर ने अपना पैसा बनाने के ख़बर को गलत तरीके से बताया. लेकिन फिर भी दिल्ली में बैठे लोगों को ख़बरों की सत्यता को अपने स्तर से जांच लेना चाहिए था. स्ट्रिंगर तो अपनी दिहाड़ी बना ही लेगा. लेकिन नाम तो चैनल का खराब होगा. इसके अल्वावा आम जनता में एक जिम्मेदार चैनल कि तरह पहचान बना चुका आजतक अपनी प्रतिष्ठा खो देगा. आजतक ने वाराणसी से ये कोई पहली फर्जी ख़बर नहीं चलायी है. इसके पहले भी आजतक वाराणसी में एयर इण्डिया की एक उड़ान कि फर्जी आपात लैंडिंग करा चुका है जिसमे उसने गूगल से एक विडियो निकाल कर उसे एयर इण्डिया का हवाई जहाज बता कर चला दिया था. आजतक जैसे चैनल से इस तरह की उम्मीद नहीं कि जा सकती है. टीआरपी की दौड़ में इण्डिया टीवी ने एक बार दो नंबर पर क्या किया लगे ऊलजलूल चलाने.
आजतक चैनल में जिम्मेदार पद संभाल रहें लोगों को समझना चाहिए कि उन्होंने एक संचार माध्यम के ज़रिये एक बड़े वर्ग को गलत जानकारी दी है. स्ट्रिंगर की दिहाड़ी सत्यता से बढ़कर होने लगे तो ऐसे चैनलों को बंद होते देर नहीं लगती. माँ अन्नपुर्णा आजतक में काम करने वाले लोगों को सुखी रखे.

देश का भविष्य बोस कि कुर्बानी तय करेगी, गिलानी नहीं

विरोध प्रदर्शन की यह तस्वीर है बनारस की. यहाँ बच्चों ने अरुंधती रॉय के उस बयान की खिलाफत की है जिसमे उन्होंने कहा था कि कश्मीर कभी भारत का हिस्सा रहा ही नहीं. देश में अलगाववाद का समर्थन करने वाली अरुंधती के इस बयान का विरोध करते वक़्त विशाल भारत संस्थान के इन बच्चों ने सुभाष चन्द्र बोस की पोशाक पहन रखी थी. इन बच्चों की कोशिश है कि अरुंधती बौद्धिकता के नाम पर वर्तमान के प्रति जो नजरिया रख रहीं हैं उसमे भारत के इतिहास को भी शामिल करें. क्योंकि इस देश के लिए सुभाष चन्द्र बोस. आज़ाद और बिस्मिल ने कुर्बानी दी है. किसी गिलानी ने नहीं. लिहाजा देश का भविष्य यह कुर्बानियां तय करेंगी, बंटवारे की राजनीती करने वाला गिलानी नहीं.