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यहां फुटपाथ वाले बच्चे निकालते हैं अखबार, रिपोर्टर भी खुद और संपादक भी

पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने के लिए हम जाने-माने कॉलेजों में एडमिशन लेते हैं और महंगी-महंगी फीस देकर डिग्रियां हासिल करते है. तब भी वह मुकाम नहीं पा पाते जो पाना चाहते है. एक चैनल से लेकर एक अखबार छापने के लिए कई जतन करने पड़ते है…पूरा का पूरा ऑफिस खोलने में लाखों रुपये लगाते है, फिर उसमें स्टाफ को हायर करते है जिसमें हर महीने लाखों रुपये खर्च होते है लेकिन दिल्ली के गैतम नगर में रहने वाले बच्चों के कारनामे सुनाोगे तो आपको याकीन नहीं होगा. यहां फुटपाथ वाले बच्‍चे निकालते हैं अखबार, रिपोर्टर और संपादक भी खुद..नाम है बालकनामा
बच्‍चे निकालते हैं अखबार
कभी-कभी बच्‍चे वो काम कर जाते हैं जिसकी कल्‍पना हम और आप नहीं कर सकते। जहां चाह है वहीं राह है…इसे भलीभांति समझते हैं दिल्‍ली के गौतम नगर में रहने वाले बच्‍चे। इनका न तो घर है न कोई ठिकाना। बस जो कुछ भी है, वो है अंदर की जिज्ञासा। इसी को साथ लेकर बच्‍चों के एक समूह ने दैनिक अखबार निकला दिया। जिसका नाम है ‘बालकनामा’ इसमें काम करने वाले रिपोर्टर से लेकर फोटो जर्नलिस्‍ट या एडिटर तक सब बच्‍चे ही हैं।
हिंदी और अंग्रेजी में छपता है
ये बच्‍चे घूम-घूमकर बच्‍चों के हित में जुड़ी खबरें लाते हैं और शाम को एक जगह इकठ्ठा हो जाते हैं। यह अखबार बच्‍चों के लिए निकाला जाता है ताकि वह इसमें छपी खबरों को पढ़कर सचेत रहें और अच्‍छी-अच्‍छी बातें सीख सकें। यह अखबार हिन्दी के अलावा अंग्रेजी में भी छपता है। यह एक टैबलॉयड साइज का न्यूजपेपर है और इस न्यूजपेपर के लिए काम करने वाले अधिकांश रिपोर्टरों ने इस अखबार से जुड़ने के बाद पढ़ना-लिखना शुरू किया है। कैसे करते हैं काम
इस अखबार में काम करने वाले बच्‍चों की संख्‍या करीब 50 से ऊपर है। सभी के जिम्‍मे कुछ न कुछ काम होता है। कोई रिपोर्टिंग करता है तो कोई फोटो खींचकर लाता है। बाद में खबर लिखने का काम भी किसी और बच्‍चे को दिया जाता है। हर महीने की 25 तारीख को बालकनामा की एडिटोरियल मीटिंग भी होती हैं। एडिटोरियल मीटिंग में किसी भी अन्य अखबार की तरह इन सब बातों पर चर्चा होती है कि कौन सी खबर कवर स्‍टोरी बनेगी, पहला पन्‍ना कैसा दिखेगा।

 गैर सरकारी संगठनों से है जुड़ाव
इस अखबार से जुड़े अधिकांश रिपोर्टर किन्हीं गैर सरकारी संगठनों से जुड़े हैं। महीने में एक बार छपने वाले इस न्यूजपेपर की कीमत महज 2 रुपये रखी गई है और अकेले दिल्ली में इसकी कुल 8000 प्रतियां बिक जाती हैं। इनमें से अधिकतर अखबार पुलिस स्टेशनों और गैर सरकारी संगठनों को जाते हैं। यह अखबार बिना किसी फायदे वाले मॉडल पर चलता है।
आप चाहें तो फेसबुक पर इनका पेज लाइक कर इनका उत्साह वर्धन कर सकते हैं। लिंक है - https://www.facebook.com/balaknama.in/

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गौरी लंकेश पर विवादित ट्वीट वाले निखिल दधीच का वीडियो इंटरव्यू

सामने आए निखिल दधीच, ट्वीटर पर हंगामे के बाद अब डरे सहमे हैं फिर भी माफी नहीं मांगेंगे

पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद निखिल दधीच के एक ट्वीट को लेकर जबरदस्त हंगामा मचा था। निखिल दधीच ने एक ट्वीट कर गौरी लंकेश पर अभद्र टिप्पणी की थी। हालांकि अब हंगामे के बाद निखिल दधीच सफाई दे रहें हैं कि उन्होंने गौरी लंकेश को टारगेट कर ये ट्वीट नहीं किया था। निखिल ने आरोप लगाया है कि उनके ट्वीट को जबरदस्ती राजनीतिक रंग दिया गया।
ट्वीट पर हंगामे के बाद निखिल दधीच का दावा है कि वो और उनका परिवार बेहद तनाव में है। हालात ये हैं कि वो ऑफिस में होकर भी काम नहीं कर पा रहें हैं। the quint नाम की वेबसाइट के साथ बातचीत में निखिल ने दावा किया है वो नरेंद्र मोदी की विचारधारा से प्रभावित हैं और इसी लिए उन्हें फॉलो करते हैं। हालांकि उन्हें नहीं पता कि पीएम मोदी उन्हें ट्वीटर पर क्यों फॉलो करते हैं।
निखिल ने किसी भी तरह की माफी मांगने से साफ इंकार किया है। निखिल ने कहा है कि इस मसले पर उन लोगों को माफी मांगनी चाहिए जिन्होंने उनके ट्वीट को राजनीतिक रंग दिया है।
आप निखिल की पूरी बातचीत सुनने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं।

सद्गुरू की पर्यावरण बचाओ रैली से ही हो रहा है इतना प्रदूषण कि 80 लाख पेड़ लगाने पड़ेंगे

पर्यावरण के प्रति हमारी सोच किसी भी सूरत से बेहतर नहीं कही जा सकती है। हमारे विकास के मॉडल में ही खोट नजर आता है। अब तो पर्यावरण बचाने की मुहिम में भी झोल नजर आने लगे हैं। ना जाने क्यों लेकिन पर्यावरण बचाने की हमारी ऐसी मुहिम कारगर हो भी पाएंगी इसमें शक लगता है।
दक्षिण भारत के योगी, कवि और ईशा फाउंडेशन के कर्ता धर्ता और पर्यावरणीय मसलों पर मुखर रहने वाले सद्गुर इन दिनों रैली फॉर रीवर निकाल रहें हैं। ये रैली कोयम्बटूर से तीन सितंबर को शुरु हो चुकी है। पहले ये कन्याकुमारी गई और अब वहां देश के कई शहरों से होते हुए दो अक्टूबर को चंडीगढ़ में खत्म होगी। इस दौरान ये रैली 7000 किलोमीटर का सफर तय करेगी। इस रैली का मकसद भारत की नदियों को सूखने से बचाने के लिए उनके किनारों पर पेड़ लगाने के लिए लोगों को जागरुक करना है।
सद्गुरू की इस रैली में दस suv गाड़ियों का प्रयोग हो रहा है जो निश्चित तौर पर चलेंगी। हो सकता है कि कुछ समय के लिए कुछ और गाड़ियां इस काफिले में जुड़ती हटती रहें लेकिन दस गाड़ियां तो निश्चित हैं। सद्गुरू की रैली में चलने वाली गाड़ियां मुख्य रुप से डीजल चलित हैं। जाहिर है कि इन गाड़ियों से बड़ी मात्रा में कार्बन डाई ऑक्साइड निकलेगा। अब सात हजार किलोमीटर का हिसाब लगाया जाए तो रैली में शामिल गाड़ियों से इतना प्रदूषण होगा जिसे दूर करने के लिए तकरीबन आठ लाख पेड़ लगाने पड़ेंगे।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सदगुरू ने जिस मसले को उठाया है वो वाकई में देश के लिए एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। सदानीरा नदियां भी अब सूखने लगीं हैं। इन नदियों को बचाने के लिए हमारे पास कोई प्रबंध तंत्र नहीं है। लेकिन सद्गुरू का आवाज उठाने का तरीका कुछ खास लगा नहीं। अच्छा होता कि वो नदियों के किनारे पैदल मार्च करते और लोगों को जागरुक करते। लेकिन लगता है कि सद्गुरू कुछ जल्दी में हैं।


फिलहाल आप the quint का ये वीडियो देख सकते हैं जो आपके सद्गुरू की रैली के बारे में सिलसिलेवार बताएगा।



वो शहनाई का जादूगर था, इंसानी जज्बातों का रखवाला भी, वो बिस्मिल्ला था

बिस्मिल्लाह खां को यूं तो पूरी दुनिया जानती है लेकिन जो लोग उनसे मिले थे वो बिस्मिल्ला खां को उनके संगीत के साथ साथ उनके इंसानी जज्बातों के प्रति संवेदनशीलता के लिए भी मानते थे। मेरा सौभाग्य रहा कि जिस शहर में बिस्मिल्ला खां ने शहनाई के सुर साधे उसी शहर में मेरी भी आंख खुली। बिस्मिल्ला खां को करीब से देखा तो महसूस हुआ कि ये दुनिया बिस्मिल्ला खां को जितना जानती है कुछ कम ही जानती है।

शहर बनारस की तंग गली में एक छोटे से मकान में रहने वाले बिस्मिल्ला खां अपने घर के ड्राइंग रूम में बांह वाली बनियान या बंडी पहने मिल जाते। कमरे में उनके मिले पुरुस्कारों और सम्मान की तस्वीरे लगी थीं। बिस्मिल्ला खां की शहनाई उनके संगीत के शिखर पर तो ले आई थी लेकिन बतौर इंसान वो बिल्कुल सरल थे। बनारसी अंदाज और ठसक हर ओर से झलकती। बातों में मुलायमियत थी ही। रह रह कर ठहाके लगाकर हंसते फिर प प प प करते शहनाई की धुन गुनगुना देते।

बनारस और गंगा के प्रति उनका लगाव गजब का था। एक बार उन्हें अमेरिका में रहने का निमंत्रण दिया गया। बिस्मिल्ला खां ने निमंत्रण देने वाले से पूछा कि सब तो ठीक है लेकिन अमेरिका में बनारस की मस्ती और गंगा का किनारा कहां से आएगा?
                           

बिस्मिल्ला खां के संगीत साधना से जुड़ी भी एक अजीब कहानी है। खां साहब ने बनारस में गंगा किनारे एक मंदिर में बैठकर अपनी शहनाई के सुर साधे। बालाजी मंदिर में बिस्मिल्ला खां शहनाई बजाया करते। कहते हैं कि बिस्मिल्ला को भगवान का आशीर्वाद मिला हुआ था। बिस्मिल्ला खां मां गंगा को खुश करने के लिए भी देर तक शहनाई बजाते रहते। बिस्मिल्ला थे तो धर्म से मुसलमान लेकिन बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में वो नियमित शहनाई बजाया करते। मोहर्रम के मौके पर बिस्मिल्ला की मातमी धुन हर एक की आंखों से बरबस आंसू ले आती। बनारस की गंगा जमुनी तहजीब के नजीर थे बिस्मिल्ला।


बिस्मिल्ला खां ने मुल्क की आजादी के मौके पर 1947 में लाल किले से अपनी शहनाई की धुन छेड़ी थी। जवाहरलाल नेहरू के खास बुलावे पर बिस्मिल्ला खां दिल्ली पहुंचे थे। यही नहीं बहुत कम लोग जानते हैं कि 26 जनवरी 1950 को  भी दिल्ली में अपनी शहनाई बजाई।

जीते जी बिस्मिल्ला और बनारस का साथ कभी नहीं छूटा। 90 की उमर में बिस्मिल्ला खां बीमार पड़े। बनारस के एक निजी अस्पताल में बिस्मिल्ला खां ने 21 अगस्त 2006 को दुनिया को अलविदा कहा। भारत रत्न बिस्मिल्ला खां के निधन पर राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। जिसने जीते जी बनारस नहीं छोड़ा वो मरने के बाद कहां जाता। बिस्मिल्ला खां वहीं बनारस में एक गहरी नींद में आज भी सो रहें हैं।

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गौरी लंकेश ने मरने से पहले लिखा था ये लेख, ये उनके आखिरी शब्द हैं

गौरी लंकेश नाम है पत्रिका का। 16 पन्नों की यह पत्रिका हर हफ्ते निकलती है। 15 रुपये कीमत होती है। 13 सितंबर का अंक गौरी लंकेश के लिए आख़िरी साबित हुआ। हमने अपने मित्र की मदद से उनके आख़िरी संपादकीय का हिन्दी में अनुवाद किया है ताकि आपको पता चल सके कि कन्नडा में लिखने वाली इस पत्रकार की लिखावट कैसी थी, उसकी धार कैसी थी। हर अंक में गौरी ‘कंडा हागे’ नाम से कालम लिखती थीं। कंडा हागे का मतलब होता है जैसा मैने देखा। उनका संपादकीय पत्रिका के तीसरे पन्ने पर छपता था। इस बार का संपादकीय फेक न्यूज़ पर था और उसका टाइटल था- फेक न्यूज़ के ज़माने में-
इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज़ बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है। झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज़्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं। झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी। अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी। उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया। फैलाने वाले संघ के लोग थे। ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाज़िट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं। पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं। संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया। ये झूठ इतना ज़ोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है। ये सब झूठ है।

इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा POSTCARD.IN नाम की वेबसाइट पर। यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है। इसका काम हर दिन फ़ेक न्यूज़ बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है। 11 अगस्त को POSTCARD.IN में एक हेडिंग लगाई गई। कर्नाटक में तालिबान सरकार। इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई। संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए। जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज़ रहते हैं उन लोगों ने इस फ़ेक न्यूज़ को अपना हथियार बना लिया। सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बग़ैर सोचे समझे इसे सही मान लिया। अपने कान, नाक और भेजे का इस्तमाल नहीं किया।
पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सज़ा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायर होने लगी। इस ढोंगी बाबा के साथ मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा। इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए। इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाज़ू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई। यह तस्वीर फोटोशाप थी। असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया। शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी।
एक्चुअली, पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था। अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है। पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं।
उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को ख़ूब वायरल हुआ। ध्रुव राठी ने उसका विश्लेषण किया था। ध्रुव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है। पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17 अगस्त के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया। ( गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे)। ध्रुव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिया’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं। उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी। अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हज़ार नए करदाता जुड़े हैं। तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है।
आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है। मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है। उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं। उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रज़ी टीवी चैनलों ने ख़बर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है। वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30 लाख बढ़ गया। उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं। बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं। संघ का ही काम करते हैं। जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया। जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए। इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे।
आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं। ध्रुव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं। प्रतीक सिन्हा altnews.in नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं। होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है। साथ ही साथ THEWIERE.IN, SCROLL.IN, newslaundry, the quint जैसी वेबसाइट भी सक्रिय हैं। मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई को उजागर किया है। इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं। इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना।
कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में ज़ोरदार बारिश हुई। उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया। कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है। बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है। संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मज़ाक उड़ाना। जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था। लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है।
हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए। एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी। दूसरे फोटो में एक महीला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है। बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया। पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे। दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी। सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं। उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे। फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है। अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है, उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है। प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के ज़रिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी। पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है। पाकिस्तान का है जहां एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है।
इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है। यह सवाप पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई। बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर क़ब्ज़ा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था। मगर फोटोशाप के ज़रिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे। लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया। ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मज़ाक उड़ाया।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक तस्वीर साझा की। लिखा कि भारत 50,000 किलोमीटर रास्तों पर सरकार ने तीस लाख एल ई डी बल्ब लगा दिए हैं। मगर जो तस्वीर उन्होंने लगाई वो फेक निकली। भारत की नहीं, 2009 में जापान की तस्वीर की थी। इसी गोयल ने पहले भी एक ट्वीट किया था कि कोयले की आपूर्ति में सरकार ने 25,900 करोड़ की बचत की है। उस ट्वीट की तस्वीर भी झूठी निकली।
छत्तीसगढ़ के पी डब्ल्यू डी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया। अपनी सरकार की कामयाबी बताई। उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले। बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है।
ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में हमारे कर्नाटक के आर एस एस और बीजेपी लीडर भी कुछ कम नहीं हैं। कर्नाटक के सांसद प्रताप सिम्हा ने एक रिपोर्ट शेयर किया, कहा कि ये टाइम्स आफ इंडिया मे आया है। उसकी हेड लाइन ये थी कि हिन्दू लड़की को मुसलमान ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दुनिया भर को नैतिकता का ज्ञान देने वाले प्रताप सिम्हा ने सच्चाई जानने की ज़रा भी कोशिश नहीं की। किसी भी अखबार ने इस न्यूज को नहीं छापा था बल्कि फोटो शॉप के ज़रिए किसी दूसरे न्यूज़ में हेड लाइन लगा दिया गया था और हिन्दू मुस्लिम रंग दिया गया। इसके लिए टाइम्स आफ इंडिया का नाम इस्तमाल किया गया। जब हंगामा हुआ कि ये तो फ़ेक न्यूज़ है तो सांसद ने डिलिट कर दिया मगर माफी नहीं मांगी। सांप्रादायिक झूठ फैलाने पर कोई पछतावा ज़ाहिर नहीं किया।
जैसा कि मेरे दोस्त वासु ने इस बार के कॉलम में लिखा है, मैंने भी एक बिना समझे एक फ़ेक न्यूज़ शेयर कर दिया। पिछले रविवार पटना की अपनी रैली की तस्वीर लालू यादव ने फोटोशाप करके साझा कर दी। थोड़ी देर में दोस्त शशिधर ने बताया कि ये फोटो फर्ज़ी है। नकली है। मैंने तुरंत हटाया और ग़लती भी मानी। यही नहीं फेक और असली तस्वीर दोनों को एक साथ ट्वीट किया। इस गलती के पीछे सांप्रदियाक रूप से भड़काने या प्रोपेगैंडा करने की मंशा नहीं थी। फासिस्टों के ख़िलाफ़ लोग जमा हो रहे थे, इसका संदेश देना ही मेरा मकसद था। फाइनली, जो भी फ़ेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करते हैं, उनको सलाम । मेरी ख़्वाहिश है कि उनकी संख्या और भी ज़्यादा हो।
(यह गौरी लंकेश की कन्नड में प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका में 13 सितंबर के अंक के लिए लिखा गया संपादकीय है जिसका हिंदी तर्जुमा हमने पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग से लिया है)

गौरी लंकेश को मार दिया गया, फिर बोधिसत्व की ये कविता क्या कह गई

गौरी लंकेश की हत्या के बाद बोधिसत्व की एक कविता 

अपना शुभ लाभ देख कर मैं चुप हूँ गौरी लंकेश

एक एक कर मारे जा रहे हैं लोग
और मैं चुप हूँ
मैं चुप हूँ
इसीलिए किसी भी
खतरे में नहीं मैं गौरी लंकेश ?

मैं देख नहीं रहा उधर
लोग मारे जा रहे हैं जिधर
जिधर जहाँ आग लगी है
जिधर संताप का सुराज है
वह दिशा ओझल है मुझसे 

सुनों गौरी लंंकेश 

मैं बोलूँगा तो
पद्मश्री नहीं मिलेगा मुझे
मैं बोलूँगा तो
पुरस्कार नहीं मिलेगा मुझे
मैं बोलूँगा तो
भारत रत्न नहीं बन पाऊँगा 

देखो गौरी
कितना
सुखी हूँ और सुरक्षित हूँ मैं चुप रह कर
कितना उज्जवल भविष्य है मेरा
हर दिशा से शुभ और लाभ से घिरा हूँ 

और कितना बोलूँंगा
हर दिन होगी हत्या
हत्यारे कितने कितने हैं
कितने रूप में
अनूठे और सर्वव्यापी
कण-कण में है उनका प्रभाव
उत्तर दक्षिण
पूरब पच्छिम मध्य भारत
सब में सर्वत्र समान
हैं वे विराजमान 

वे तो हत्यारे हैें
उनसे कितना मुकाबला करूँगा
कितनों को मारते रहेंगे
किन किन का
शोक मनाता रहूँगा गौरी 

और जब हत्यारों को विरोध पसंद नहीं
तो कुछ दिन
चुप रह जाना क्या बुरा है
उनके मन का दो एक नारा
लगा देने में
क्या चला जाता है मेरा या तुम्हारा गौरी ?

तो अब मान लो कि
मेरे पास तक किसी गौरी लंकेश की
हत्यारी सूचना नहीं हैै
कौन था पनसारे
कौन था दाभोलकर
कौन था कलबुर्गी
मैं किसी के शोक में नहीं 

गोरखपुर का नाम मैं नहीं जानता
मुजफ्फरपुर कहाँ है जापान में या चीन में
या बांग्लादेश में
यह जानकर भी क्या कर लूँगा
गौरी लंकेश कौन थी?
क्या थी
यह जान कर क्या करूँगा ?

कितनी औरतों को घर में जलाते हैं
कितने बच्चों को
कितनेे बूढ़ों को
किसानों को कब से मारते  रहे हैं
निर्विरोध अविरल अविराम
तब भी तो चुप रहता हूँ मैं
हे राम 

ओह सावन भादौं के
इन उत्फुल्ल दिनों में
यह शोक रुदन का राग लिए मैं क्यों बैठूँ
बादल घिर आए हैं
तड़ित का मोहक अनुनाद
झंकृत कर रहा है
कातर हृदय को
तन्वंगी कामनाओं के
किल्लोल से बाहर क्यों देखूँ 

देख रहा हूँ
रातें बड़ी कोमल और पारदर्शी हो रही हैं
आलोकित है विकट अंधकार
दिखती है हर दिशा तार तार 

देख रहा हूँ शामें कितनी बहुरंगी
पर सब पर
एक रंग का कफन चढ़ा है
एक ही रंग का मुकुट मढ़ा है 

और दिन दुपहरी नहीं झलकती राहें
अकाल बेला सा हो जाता है संसार
नहीं सुझाता किसी दिशा का वार पार 

ऐसा युग पहले कभी नहीं आया था
जब हाहाकार को मंगलगान सा
समाज ने मिलकर गाया था
जब शोक को समय ने माथे चढ़ाया था
ऐसा युग पहले कभी नहीं आया था 

ओह प्रज्वलित गौरी
मैं इस लुभावने हाहाकार की
आरती उतारूँगा
मैं हत्यारों को 'भारत'
और हत्या को 'यज्ञपुकारूँगा
मैं हर दिन हर पल
महायुद्ध हारूँगा 

देखो
मुझे पद्मश्री पाना है
मुझे भारत रत्न होना है
मुझे हर हत्या और शोक से परे रहना है
मुझे केवल चुप रहना है 

चुप रहना अब मेरा राष्ट्रीय धर्म है गौरी
हत्या करना जैसे अब एक राष्ट्रीय कर्म है 
मैं राष्ट्र धर्म निभाऊँगा
मैं चुप रह कर हत्यारों की महिमा
गुनगुनाऊँगा
तभी तो मनचाहा पाऊँगा 

तुम्हें मरना था तुम मरी
मुझे जीना है
मान मर्यादा का अमित हलाहल पीना है
सुन लो गौरी लंकेश 

अब मैं किसी हाल में
शुभ और लाभ से ध्यान  हटाऊँगा
मैं तो हत्या और हत्यारा गुन गाऊँगा 

मैं गौरी लंकेश की तरह क्यों मारा जाऊँ
मैं क्यों नहीं सब कुछ भूल कर
एक विराट नींद सो जाऊँ ?
क्यों नहीं मैं महामरण गान गाऊँ ?
क्यों नहीं मैं तम आरोहण कर जाऊँ

वो महिला जो तीन तलाक की जंग जीत चुकी थी लेकिन राजीव गांधी ने उसे संसद में हरा दिया था

ये वाक्या सन 1978 का है। मध्य प्रदेश के एक वकील हुआ करते थे मोहम्मद अहमद खां। साहब हुजूर ने अपनी पहली शादी को 14 साल गुजारने के बाद दूसरी शादी कर ली।  बाद में अपनी पहली बीवी को तलाक दे दिया। अपने पांच बच्चों को लेकर ये महिला अपने पति से अलग हो गई। यही वो महिला थी जिसने तीन तलाक के खिलाफ सबसे पहले आवाज उठायी। इस महिला का नाम था शाह बानो।    





नई शादी करने के बाद वकील अहमद ने कुछ दिनों तक शाह बानो को गुजारा भत्ता दिया। बाद में देना बंद कर दिया। शाह बानो उस वक्त साठ साल की उम्र पार कर चुकी थीं। शाह बानो ने गुजारा भत्ता के लिए निचली अदालत में अपील दायर की। ये 1978 की गर्मियों की बात रही होगी। वकील साहब ने इस्लाम की आड़ लेकर होशियारी दिखाई और शाह बानो को तीन तलाक दे दिया। इसके बाद अहमद खां ने कोर्ट से कहा कि अब वो उनकी बीवी हैं ही नहीं तो गुजारा भत्ता देने का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि इसके बावजूद कोर्ट ने 1979 में अहमद खां को शाह बानो को भत्ता देने का आदेश सुनाया। 
शाह बानो (pic by - scroll.in)

1980 में शाह बानो अपना भत्ता बढ़वाने के लिए एमपी हाइकोर्ट पहुंच गईं तो वकील अहमद खां ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वकील अहमद ने दलील दी कि वो शाह बानो को तीन तलाक दे चुके हैं लिहाजा गुजारा देने का मतलब नहीं बनता। मसला पेचीदा था लिहाजा सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने 3 फरवरी 1981 को सुनवाई शुरु की। लेकिन जल्द ही और अधिक बड़ी बेंच को ये मामला सौंप दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कई सालों की सुनवाई के बाद पाया कि  वकील अहमद खां को गुजारा भत्ता देना पड़ेगा।

इसी दौरान तीन तलाक के मसले पर सियासत भी शुरु हो चुकी थी। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बन चुका था। ये दौर कांग्रेस का था। संसद में कांग्रेस का बहुमत था और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। बताते हैं कि राजीव गांधी के एक तत्कालीन मुस्लिम सलाहकारों ने उन्हें मुस्लिम बिरादरी के नाराज होने का खौफ दिखाया। लिहाजा राजीव गांधी ने अदालत के फैसले को संसद में पलट दिया। एक नया एक्ट बनाकर ये व्यवस्था कर दी गई कि तलाकशुदा पत्नी को सिर्फ तीन महीने तक ही गुजारा भत्ता मिलेगा। शाह बानो जिस मुकदमे को मुल्क की सबसे बड़ी अदालत में जीत गईं थीं उसे संसद में हार गईं। शाह बानो की मौत 1992 में हो गई।
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शायरा बानो

शाह बानो के केस के बाद तीन तलाक के खिलाफ एक मामला शायरा बानो नाम की महिला ने फिर उठाया। शायरा बानो उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली हैं। शायरा की शादी इलाहाबाद के एक शख्स से 2002 में हुई थी। शायरा को 2015 में उन्हें जबरन उनके माएके भेज दिया और बाद में तीन तलाक देकर रिश्ता ही खत्म कर दिया। शायरा ने इसी तलाक की वैधता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी। शायरा की याचिका का अहम हिस्सा ये भी है कि उन्होंने माध्यम से 'मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937' की धारा 2 की संवैधानिकता को भी चुनौती दी थी. यही वह धारा है जिसके जरिये मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह, 'तीन तलाक' (तलाक-ए-बिद्दत) और 'निकाह-हलाला' जैसी प्रथाओं को वैधता मिलती है.

एक दिलचस्प वाक्या और। दरअसल शाह बानो केस के बाद संसद में सर्वोच्च अदालत का फैसला पलटने वाले राजीव गांधी पर जब मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लगने लगे तो उन्होंने हिंदुओं को खुश करने के लिए बाबरी मस्जिद के ताले खुलवा दिए। इसके बाद क्या हुआ ये कहानी फिर कभी। बीजेपी को यूनिफार्म सिविल कोड का मसला भी इसी शाह बानो केस के बाद मिला था।

                                                                 
                                                           

माटुंगा की खुशी बांटी जाए, फिर खुशी बढ़ाने की सोची जाए

महाराष्ट्र का माटुंगा रेलवे स्टेशन हाल में पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में दे दिया गया। ये देश का ऐसा पहला रेलवे स्टेशन है जिसकी सभी व्यवस्थाएं महिलाओं के हाथ में होंगी। स्टेशन में गाड़ियों के आने जाने के समय के एनाउंसमेंट्स से लेकर यात्रियों के टिकट चेक करने तक के सभी काम महिलाओं के ही जिम्मे हैं। स्टेशन का कंट्रोल रूम भी महिलाएं संभालती हैं। टिकट काटने का काम भी महिलाओं के ही जिम्मे है। ये एक सुखद एहसास है।
जिस देश में बच्चियों को गर्भ में मारने की प्रवृत्ति भी समाज में व्याप्त हो उसी देश में जब ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं तो किसी को भी सुखद एहसास स्वाभाविक है। माटुंगा को दिमाग में जब हरियाणा का ख्याल आता है तो मानों दिल ये सोचने को मजबूर हो जाता है कि यदि वहां गर्भ में मरने वाली बच्चियों को बचा लिया जाता तो शायद वो भी किसी 'माटुंगा' को संभाल रहीं होती।

देश में महिला और पुरुषों में कई स्तरों में असंतुलन है। बच्चियों के साथ भेदभाव मां के गर्भ में ही शुरु हो जाता है। बच्चियों की स्कूलिंग का हाल भी देश में बुरा है। आंकड़े देने की आवश्यकता नहीं है। ये अब इतना गूढ़ विषय भी नहीं रहा है कि समझाना पड़े। स्कूलिंग में भेदभाव की वजह से मेल फिमेल के लिट्रेसी रेट में भी खासा अंतर है। स्वास्थय सुविधाओं से लेकर सामान्य रहन सहन में भी बेटियां भेदभाव का शिकार रहती हैं।

हालांकि खुशी की बात ये है कि हालात में बदलाव हो रहें हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक सन 2016 में 144 देशों में बने वैश्विक जेंडर गैप इंडेक्स में भारत का क्रमांक 87 है। भारत की रैंकिंग में लगातार सुधार हो रहा है।
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जेंडर गैप इंडेक्स हर देश में महिलाओं और पुरुषों के बीच चार तरह के अंतर पर आधारित होता है. ये हैं आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा प्राप्ति, स्वास्थ्य एवं अस्तित्व, और राजनीतिक सशक्तिकरण. इन चार कसौटियों में राजनीतिक सशक्तिकरण को छोड़कर भारत का प्रदर्शन बाकी तीन क्षेत्रों में बहुत खराब रहा है।

फिर भी स्थितियां सुधर रहीं हैं और हमारे लिए वाया माटुंगा ये खबर पहुंच भी रही है। लेकिन ये निश्चित है कि समाज में जागरुकता का बहुत कम हिस्सा ही आया है। अभी प्रयास और संघर्ष की लंबी कहानी सुननी देखनी बाकी है। हमें अभी कई और माटुंगा बनाने हैं।