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यहां फुटपाथ वाले बच्चे निकालते हैं अखबार, रिपोर्टर भी खुद और संपादक भी

पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने के लिए हम जाने-माने कॉलेजों में एडमिशन लेते हैं और महंगी-महंगी फीस देकर डिग्रियां हासिल करते है. तब भी वह मुकाम नहीं पा पाते जो पाना चाहते है. एक चैनल से लेकर एक अखबार छापने के लिए कई जतन करने पड़ते है…पूरा का पूरा ऑफिस खोलने में लाखों रुपये लगाते है, फिर उसमें स्टाफ को हायर करते है जिसमें हर महीने लाखों रुपये खर्च होते है लेकिन दिल्ली के गैतम नगर में रहने वाले बच्चों के कारनामे सुनाोगे तो आपको याकीन नहीं होगा. यहां फुटपाथ वाले बच्‍चे निकालते हैं अखबार, रिपोर्टर और संपादक भी खुद..नाम है बालकनामा
बच्‍चे निकालते हैं अखबार
कभी-कभी बच्‍चे वो काम कर जाते हैं जिसकी कल्‍पना हम और आप नहीं कर सकते। जहां चाह है वहीं राह है…इसे भलीभांति समझते हैं दिल्‍ली के गौतम नगर में रहने वाले बच्‍चे। इनका न तो घर है न कोई ठिकाना। बस जो कुछ भी है, वो है अंदर की जिज्ञासा। इसी को साथ लेकर बच्‍चों के एक समूह ने दैनिक अखबार निकला दिया। जिसका नाम है ‘बालकनामा’ इसमें काम करने वाले रिपोर्टर से लेकर फोटो जर्नलिस्‍ट या एडिटर तक सब बच्‍चे ही हैं।
हिंदी और अंग्रेजी में छपता है
ये बच्‍चे घूम-घूमकर बच्‍चों के हित में जुड़ी खबरें लाते हैं और शाम को एक जगह इकठ्ठा हो जाते हैं। यह अखबार बच्‍चों के लिए निकाला जाता है ताकि वह इसमें छपी खबरों को पढ़कर सचेत रहें और अच्‍छी-अच्‍छी बातें सीख सकें। यह अखबार हिन्दी के अलावा अंग्रेजी में भी छपता है। यह एक टैबलॉयड साइज का न्यूजपेपर है और इस न्यूजपेपर के लिए काम करने वाले अधिकांश रिपोर्टरों ने इस अखबार से जुड़ने के बाद पढ़ना-लिखना शुरू किया है। कैसे करते हैं काम
इस अखबार में काम करने वाले बच्‍चों की संख्‍या करीब 50 से ऊपर है। सभी के जिम्‍मे कुछ न कुछ काम होता है। कोई रिपोर्टिंग करता है तो कोई फोटो खींचकर लाता है। बाद में खबर लिखने का काम भी किसी और बच्‍चे को दिया जाता है। हर महीने की 25 तारीख को बालकनामा की एडिटोरियल मीटिंग भी होती हैं। एडिटोरियल मीटिंग में किसी भी अन्य अखबार की तरह इन सब बातों पर चर्चा होती है कि कौन सी खबर कवर स्‍टोरी बनेगी, पहला पन्‍ना कैसा दिखेगा।

 गैर सरकारी संगठनों से है जुड़ाव
इस अखबार से जुड़े अधिकांश रिपोर्टर किन्हीं गैर सरकारी संगठनों से जुड़े हैं। महीने में एक बार छपने वाले इस न्यूजपेपर की कीमत महज 2 रुपये रखी गई है और अकेले दिल्ली में इसकी कुल 8000 प्रतियां बिक जाती हैं। इनमें से अधिकतर अखबार पुलिस स्टेशनों और गैर सरकारी संगठनों को जाते हैं। यह अखबार बिना किसी फायदे वाले मॉडल पर चलता है।
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