युगान्तरों तक...

प्रात के पहर में
अप्रतिम रूप से फैली
अरुणिमा की सिन्दूरी विमायें
करती हैं सर्जना
प्रीत तूलिका की
प्रति, दिन- बरस - युग

झुरमुटों से झांकती
अलसाई पड़ी सुथराई
बहकर बयार संग
गाती राग फाग का
अटा पड़ा है लालित्य
हर, पुष्प-विटप-निकुंज पर

मुकुलित पड़े हैं सब
कचनार-कुमुदनी औ 'कदम्ब'
भिन्न रंगों में रंग गए
खेत-बाग-वन

इक रंग तो मुझ पर भी है
रहेगा युगों तक
नेह-प्रेम -औचित्य का
गहराता जाता है
हर क्षण - पल -पहर

देता है अपरिसीम पुलकित स्नेह
अंतस से करता आलिंगन
गूंजता है चहुं ओर
चटक जैसे अंशुमाली

रंग...
बन हर्षिल प्रभाएं
करता नव्याभिमाएं
भरता पुष्प नवश्वास के
हर शिरा - रोम -व्योम में


देखो ना 'सांवरे'
फाग के इन
लाल-पीले-हरे-नीले
विविध रंगों से
कितना चटक है
तुम्हारी प्रीत का रंग
रहेगा मुझ पर बरसों-बरस
युगान्तरों तक...


(पंक्तियाँ कुछ इस तरह से शब्दों के साथ बुनी गयीं हैं की अर्थ सहज ही स्पष्ट हो जाता है. पार्श्व भाव भी ऐसा की मोहपाश में बंधना निश्चित है. सम्बोधन पूर्ण तो नहीं है लेकिन मेरे अत्यंत प्रिय मित्र द्वारा लिखी गयी यह कविता मुझे बहुत अच्छी लगी और लगा की अपने ब्लॉग पर इसे प्रकाशित करूंगा (बिना अनुमति के भी) तो मेरा ब्लॉग रसमयी हो जायेगा.)

इस फाल्गुन न चढ़ेगा कोई रंग सांवरी


फिर एक बार फाल्गुन आ गया है. मदमस्त कर देने वाली एक सुगंध नथुनों से होती हुयी अंतस तक उतर गयी है. इस बार का फाल्गुन हर बार से कुछ अलग है. यह तो ज़रूर है की आने वाली जेठ में धूप त्वचा को झुलसा देगी लेकिन इस विचार से दूर मैं आज फाल्गुन की मुलायम ठण्ड वाली हवा में घुली एक खुशबू को महसूस कर रहा हूँ. शायद यह हवा इस लिए भी अच्छी लग रही है क्योंकि इसमें तुम्हारी बदन से आती महक की अनुभूति होती है. किसी मैदान के किनारे लगे पलाश के पेड़ों पर लगे फूल अचानक उद्देश्यपरक लगने लगे हैं. इन्हें छूना बिलकुल तुम्हरे स्पर्श का एहसास कराता है. इन फूलों को उठा कर देर तक अपनी हथेलियों के बीच दबाये रहता हूँ. लगता है मानो कुछ देर तक तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में रहा. इसके बाद जब हथेलियों को खोलता हूँ तो उनपर लाल रंग चढ़ चुका होता है. चटख लाल रंग, खुशबूदार लाल रंग. उत्साह और उर्जा का प्रतीक लाल रंग. कुछ ऐसा ही तो तुम्हारी हथेलियों को अपनी हथेलियों के साथ जोड़ने पर महसूस होता है.
इस फाल्गुन में सब के साथ रंग खेलूंगा. जम कर खेलूंगा. सुबह से भरी दोपहर तक खेलूंगा. लेकिन यकीन मानो मेरे ऊपर अब कोई रंग चढ़ने वाला नहीं है. शायद इसीलिए मैं अब निश्चिन्त हो गया हूँ. सतरंगी रंग में तो मैं रंग ही चुका हूँ. नित नए हो जाते हैं यह रंग. छुड़ाने की कोशिश तो मैं कभी करता नहीं हाँ यह रंग रोजाना कुछ और ही चटख होते जा रहें हैं. दोस्त पूछते हैं मुझसे की कहाँ से लाया मैं यह रंग? मैं हंसकर रह जाता हूँ.
हर तरफ लोग उल्लास और उत्साह से भरे हैं. मैं भी भरा हूँ. बस कारण कुछ अलग है परिणाम तो सामान ही है. हर वक़्त तुम्हारी यादों के साथ रहता हूँ. मदनोत्सव मना रहा हूँ. रितुराग तो सभी गा रहें हैं मैं भी गा रहा हूँ शायद सुर कुछ अलग हैं. अचानक कई भाव आ रहें हैं और चलें भी जातें हैं. कुछ मुकाम ऐसे हैं जो मेरे इन सभी भावों से परिचित हैं. आंसू हो, बेचैनी हो, गुस्सा हो या मन में भरा असीमित स्नेह. अचानक बारिश होने लगती है और मैं उससे बचने का कोई प्रयास नहीं करता. इसमें तुम्हारा नेह होता है न इसीलिए. बहुत दूर तक यूं चला जाता हूँ. यह कटाई मत सोचना की अकेला हूँ. नहीं हरगिज नहीं. हर वक़्त कोई रंगीन परछाई मेरे साथ चलती है. मैं कहीं सहसा रुकता हूँ, ठिठकता हूँ तो वो मेरे पास आकर पूछती है, क्या हुआ? मैं उससे झूठ ही कह दूं की मैं अकेला हूँ तो धीरे से मेरे कानो में कहती है, नहीं. तुम अकेले नहीं हो. मैं हूँ तुम्हारे साथ. आह. इतना सुनाने के बाद न जाने कहाँ से नयी ऊर्जा आ जाती है भीतर. मैं चल पड़ता हूँ फिर एक बार तुम्हारे साथ. अब रुक नहीं सकता क्योंकि बहुत लम्बी दूरी जो तय करनी है.

ई सरवा अपने के बहुत बड़ा साहित्यकार लगावत हव

मोहल्ला अस्सी की शूटिंग के दौरान काशी नाथ सिंह के लिए आई ये अभिव्यक्ति बता रही है की फिल्म में अस्सी की आत्मा मरी नहीं है.

कुछ ऐसे ही वाक्य का प्रयोग किया था उसने उन महानुभाव के लिए। वही जिन्होंने गालियों के प्रति एक ऐसा नजरिया पेश कर दिया कि अब गाली खाना सभी के लिए सम्मान का विषय हो गया। हालांकि उन्होंने कभी ये नहीं सोचा होगा कि कभी इस तरह से कोई उनका सम्मान करेगा। इससे पहले कि आप मुझे गरियाने के मूड में आ जाये मैं आपको बता ही देता हूं कि माजरा क्या है।
दरअसल पूरा वाक्या बनारस के अस्सी घाट का है जहां डाक्टर चंद्र प्रकाष द्विवेदी अपनी फिल्म मोहल्ला अस्सी की शूटिंग कर रहे हैं। फिल्म की कहानी प्रख्यात हो चले साहित्यकार काशीनाथ सिंह की अनुपम रचना काषी का अस्सी पर आधारित है। शूटिंग के दौरान ही एक दिन मैं भी वहां पहुंचा। काशी नाथ सिंह जी भी वहीं मौजूद थे। उनके आस-पास कुछ लोग टहल रहे। कुछ ऐसे भी थे जो उनका ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते थे। दुर्भाग्य से काशी नाथ सिंह ने उनकी ओर ध्यान दिये बिना ही पास खड़ी वैनिटी वैन की ओर कदम बढ़ा दिये। ये बात पास खड़े कुछ लोगों को नागवार गुजरी और उन्होंने बेहद सहज तरीके से इतना ही कहा कि 'ई सरवा अपने के बहुत बड़ा साहित्यकार लगावेला।' अपने बारे में ये सम्मान भरा वाक्य सुनने के लिए न तो काशी नाथ सिंह जी वहां नहीं थे।
गालियों को लेकर काशी नाथ सिंह जी ने प्रयोग किये वो एक खांटी बनारसी ही कर सकता है। गालियों का एक दर्शन है और उसकी समझ एक बनारसी को होती है। किस समय कौन सी गाली दी जाती है ये एक बनारसी को पता होता है। आमतौर पर गाली के लिए सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होता है लेकिन बनारस के जीवन से अगर गाली को निकाल दिया जाये तो कुछ बचता ही नहीं हैं। उन्मुक्त और सहज विचार प्रवाह के लिए गालियों की नितांत आवश्यकताहोती है।
काशी का अस्सी उपन्यास में काशी नाथ जी ने पूरी कोशिश की है कि ग्लोब्लाइज्ड होते सिनेरियो को पूरी तरह लोकलाइज्ड मैनर में पेश कर दिया जाये। अस्सी की अड़ी एक ऐसा ही स्थान है जहां दुनिया जहान की हर बात लोकल मैनर में आती है और ग्लोब्लाइज्ड तरीके से उसका विश्लेषण किया जाता है। एक चाय की दुकान के इर्द-गिर्द पूरी दुनिया घूमती हुई नजर आयेगी आपको। संसार की कई बड़ी हस्तियों की आत्मायें भी अपने बारे में लोगों की राय जानने के लिए यहां आती हैं। ऐसा लोग कहते हैं।
इस मोहल्ले पर फिल्म बन सकती है इसका तो मुझे यकीन था लेकिन फिल्म डाक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी बनायेंगे ये उम्मीद नहीं थी। मोहल्ला अस्सी बनाने से पहले अस्सी इलाके को महसूस करना बहुत जरूरी है। जिसने अस्सी इलाके को महसूस नहीं किया उसके लिए फिल्म बना पाना न तो संभव है और न ही उचित है। इसके बावजूद मेरे मन में ये आशंका थी कि मुम्बईया रंग का आदमी क्या वाकई में कुछ ईमानदार कर पायेगा। इसी आशंका को लेकर बनारस के अस्सी घाट पर शूटिंग देखने पंहुचा था। वहां जब आदरणीय काशी नाथ सिंह के बारे में सुना कि 'ई सरवा अपने के बहुत बड़ा साहित्यकार लगावत हव' तब मेरी आशंका दूर हो गई। अब लगता है कि शीला की जवानी से खेल रही जनता को मुन्नी का स्वाद भी फीका लगेगा जब वो बनारस का रस चख लेगी।

धूल चेहरे पर होती तो क्या करते?


देश के सबसे विशाल प्रदेश की सबसे ताकतवर महिला के जूते पर धूल जमी थी। ये देख मैडम के साथ चल रहे एक अफसर से रहा नहीं गया। उसने तुरंत रुमाल निकाली और मैडम की जूतियों को साफ कर दिया। ये देख विपक्ष से रहा नहीं गया, लगे हल्ला मचाने। शाम तक सरकार ने एक बिल्कुल सोलिड कारण पेश कर दिया। बताया गया कि जूतियों पर जो धूल जमी थी उससे मैडम की सुरक्षा को खतरा था। लिहाजा सुरक्षा में लगे अफसरों का फर्ज बनता है कि धूल साफ करें। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मैं भी तो यही कह रहा हूं। इसमें गलत कुछ भी नहीं है। अब भला देश के इतने बडे राज्य का कोई मुख्यमंत्री है। उसके जूते पर धूल लगी रहे और सुरक्षा में लगे अधिकारी देखते रहें। नहीं, बिलकुल नहीं।
भले ही सूबे का मुखिया दलितों का सबसे बडा रहनुमां होने का दावा करता हो। सूबे में दलितों के कल्याण के लिए चलाई जा रही योजनाओं का जायजा लेने निकला हो। वो तो बस उड.न खटोले में बैठकर दूसरों पर धूल उड़ाता है। अपने जूते धूल में नहीं डालता। अगर गलती से जमीन पर पड.ी धूल ने उसकी जूती तक को छू लिया तो हमारे अफसर उसे कहीं का नहीं छोडगे।
प्रदेश की धूल को समझ लेना चाहिए कि वो सिर्फ आम आदमी के पैरों और जूतों में ही लग सकती है सूबे के मुखिया के पैरों में नहीं
वैसे यारों एक ख्याल मन में आ रहा है। सोच रहा हूं आपसे उसकी चर्चा कर लूं। एक पुराना गाना है न- इस माटी से तिलक करो ये धरती है.......आगे की लाइनें याद नहीं हैं। आप को याद हों तो बताइयेगा।
खैर आप को लगता नहीं कि इस देश में कई चीजें हैं जो अब बस धूल में ही मिलती हैं। राजनीतिक सुचिता, कार्यपालिका की ईमानदारी, विधायिका की आम जनता के प्रति जवाबदेही वगैरह वगैरह। सब धूल में मिल गये हैं। तो भइया जब इतनी कीमती चीजें धूल में मिली हैं तो उससे तिलक नहीं करोगे तो और क्या करोगे।
चलते-चलते एक बात और दोस्तो। ये बात अपने तक ही रखियेगा। किसी और को मत बताइयेगा। लेकिन क्या आपके मन में ये ख्याल नहीं आता कि जिस मुख्यमंत्री की जूतियों पर इतनी धूल लग सकती है तो उसके चेहरे पर भी धूल लगी होगी। अफसर ने उसे साफ क्यों नहीं किया। क्या उससे सुरक्षा को खतरा नहीं था। या फिर अफसर का ध्यान सिर्फ जूती पर ही गया। पता नहीं क्यों गया। यारों आप को इस बारे में कुछ पता हो मुझे जरूर बताइयेगा। और हां ये बात आपके और मेरे बीच में ही रहे वरना हम दोनों को धूल में मिलते वक्त नहीं लगेगा। जय माटी हिन्दुस्तान की।
आपके उत्तर की आस लिये।

न जाने वो क्या था.


न जाने वो क्या था.
एक रेशमी एहसास था,
एक ज़िम्मेदारी थी,
एक ख़्वाब था,
किसी कहानी कि शुरुआत थी,
किसी दास्तान का आखिरी हिस्सा था,
किसी बगीचे में खिले पहले गुलाब की महक थी,
किसी पहाड़ से लिपटी कोई पवन थी,
चांदनी रात में रात रानी का खिलना था,
किसी लम्बी और सुनसान सड़क में किसी सड़क का आकर मिलना था,
किसी रेगिस्तान में कोई घना पेड़ था,
ठण्ड की सुबह में निकली सूरज की पहली किरण थी,
दूर तक देख कर लौटी एक नज़र थी,
ज़िन्दगी को हर हाल में जी लेने का हौसला था,
हाथ कि हर लकीर से अपनी खुशी की इबारत लिखवा लेने का ज़ज्बा था,
किसी अँधेरी रात को सुबह होने की उम्मीद थी,
सागर में उड़ते किसी परिंदे को मिला कोई ठौर था,
पुरानी डायरी के पन्नों पर यूं ही बनी तस्वीरों का कोई साकार रूप था,
बादलों के बीच बना कोई मुकाम था,
किसी से मन की बात कह पाने का साहस था,
किसी के कंधो पर सिर रख बतियाने का अधिकार था,
मन्दिर में भगवान के सामने हाथ जोड़े खड़े हुए तो मन में आई कोई तस्वीर थी,
दूर तक बिखरी धूप में साथ चलता साया था,
किसी नदी के किनारे पानी में पैर डाले मिला सुकून था,
दिन भर ज़िन्दगी की ज़द्दोजहद के बाद
शाम को घर लौटने पर मिला किसी अपने का साथ था,
किसी बेहद गर्म रात में चली एक ठंडी हवा का झोंका था,
अपनी तकदीर के खिलाफ चला एक कदम था,
देर तक मोबाइल निहारने के बाद बजी घंटी थी
अकेले में मन ही मन किसी का नाम बुदबुदाने कि वजह थी,
दूर तक अकेले ही चलते जाने की हिम्मत थी,
जीवन समर में डटे रहने की ऊर्जा थी,
कमरे में रखे हर सामान को छूकर गयीं,
उँगलियों के निशाँ थे,
किसी शरारत के बाद खिलखिलाकर हँसना था,
चेतन और अचेतन का समर्पण था
समस्त भाव और रस का आलंबन था
बंद मुट्ठी से निकली एक दुआ थी
तलाश रहा हूँ आज
न जाने वो क्या था?

तुम्हे भी तो प्रेम है


अक्सर तुम्हारे बिम्ब का
आकार उतर आता है मुझमे
निराकार
साकार
क्या है
कुछ भी तो नहीं कह सकता
हाँ यह ज़रूर है कि
आकार तुम से ही है
कभी व्योम का कोई सिरा तलाशते जब दूर निकाल जाता हूँ
आक़र तुम्हारे इसी स्वरुप में सिमट जाता हूँ
मैं जानता हूँ तुम स्वतंत्र हो
पर बंधन भी तुम्हे प्रिय हैं
अधिकार और स्वीकार
भाव मेरे हैं
यह अनुबंध भी तो मेरे हैं
तुम तो हमेशा से मुक्त रहे हो
रूई के फाहे पर चलने की कोशिश
ओह
देखो तो, क्या स्वप्न है
नहीं
आह्लाद से विपन्न है
खिलखिलाकर हंस रहे हो ना तुम?
हंसो
और हंसो
कभी कभी विपन्न के लिए भी हँसना चाहिए
किसी स्वप्न के लिए भी हँसना चाहिए
तभी अचानक रूई के फाहे
बदल बन गए
ओह
नहीं वाह
अब बारिश होने वाली है
देखना प्रेम बरसेगा
तुम भी आना रससिक्त हो जाना
आखिर तुम्हे भी तो प्रेम है.

लाहौर पर ही तिरंगा फहरा दोगे क्या?


समझ में नहीं आता कि इस देश के लोगों को हो क्या गया है? आखिर वो करना क्या चाहते हैं? तिरंगा फहराना चाहते हैं. वो भी लाल चौक पर. हद ही तो है. भला ऐसा करने का हक उन्हें किसने दिया? केंद्र सरकार उन्हें रोकने की तैयारी में है तो कोई गलत नहीं है. सीआरपीएफ लगा कर सरकार उन्हें रोकने की तैयारी में है तो रोकने दो. मुझे इसमें कोई गलत बात नहीं नज़र आती. एक भारतीय होने का मतलब ये कतई नहीं है तुम श्रीनगर की लाल चौक पर जा कर तिरंगा फहरा दो. तुम अपनी गली में फहरा लो, बालकनी में फहरा लो. क्या कम जगहें हैं? लेकिन श्रीनगर में लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहर सकता, सुना तुमने.
केंद्र सरकार अपने विज्ञापनों में कहती है कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और अरुणाचल से गुजरात तक भारत एक है. अब कहने का क्या है? बहुत सी बातें कही जातीं हैं सब की सब सही ही होती है क्यां? यह सब तो कहने भर के लिए है. कश्मीर तो .....है किसी का, मुझे पता करने पड़ेगा. किसी पुरानी किताब में पढ़ा था कि कश्मीर भारत का है. अब पता नहीं ऐसा है या नहीं? हाँ, कन्याकुमारी तो खालिस अपना ही है अभी तक. जहाँ तक बात अरुणांचल कि है तो शायद यह भी भारत का ही हिस्सा है. लेकिन अगर कोई पड़ोसी मुल्क इससे अपने देश के नक़्शे में में दिखा ले तो भी हमें क्या फर्क पड़ता है? चलता है. कांग्रेस सरकार इन सब बातों का बुरा नहीं मानती है. गुजरात का क्या है, वो कहाँ जाने वाला है? इन सब बातों में पड़कर देश के लोगों को अपना वक़्त और देशभक्ति की भावना को बर्बाद नहीं करना चाहिए.
यह देश अलगाव वाद की राजनीती करने वालों को सुरक्षा देता है. उनपर कोई करवाई करने से डरता है. जब कभी वो देश के दिल दिल्ली में आकर पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लागतें हैं तो उन्हें सुरक्षा दी जाती है. उनकी सभाएं सकुशल सम्पन्न हो इसके लिए विशेष इन्तेजामात किये जाते हैं. देखा इस देश के लोगों का दिल. कितना बड़ा है. खासकर केंद्र सरकार का तो कहना ही क्या. सांसद के आरोपी को मेहमान बना कर रखा है. कोई देश ऐसा कर सकता है? नहीं ना. देखा ये तो कांग्रेस सरकार कर सकती है. सिर्फ कांग्रेस सरकार.
वैसे एक बात कहूं दोस्तों, अगर इंडियंस को छोड़ दो ना तो इस देश के 'हिन्दुस्तानी' लाल चौक पर तो क्या लाहौर पर भी पल में तिरंगा फहरा दे. वाशिंगटन डीसी पर भी केसरिया, सफ़ेद और हरा रंग ही नज़र आये. लेकिन करेंगे क्या? जब देश से बड़ा वोट हो. ईमान से बड़ा नोट हो, तो ऐसे कदम तो उठाने ही पड़ते हैं. कोई बात नहीं गिलानी को खुश रखो. एक पाकिस्तानी झंडा उसके लिए तैयार रखो. लेकिन इतना सुन लो, लाल चौक पर तिरंगा तो फहर कर ही रहेगा. क्योंकि ये हिन्दुस्तान की कसम है.

अब तो सपने में भी फुटकर दिखता है


बहुत लोगों को देखा साल के पहले दिन बनारस के संकट मोचन मंदिर के बाहर अपना सिर पटक रहे थे. ठण्ड से परेशान भगवान से चीख चीख कर कह रहे थे की आज साल का पहला दिन है. हम आपके दर्शन करने आयें हैं. हमारा पूरा साल अब आप के जिम्मे है. हम चाहे जो करे हमारा कुछ बिगड़ना नहीं चाहिए. कुछ बिगड़ा तो आप समझिएगा. उसके बाद मंदिर नहीं आयेंगे. भक्तो की प्रार्थना में भाव ऐसा की वो प्रार्थना कम और मांग ज्यादा लग रही थी. गोया भगवान को भगवान उन्होंने ही बनाया हो जैसा हर पांच साल में वोट देकर एक भगवान चुनते हैं. खैर भगवान को इन सब बातों की आदत हो चली है. लेकिन एक बात उन्हें परेशान कर गयी. संकट मोचन भगवान सोचने लगे कि आखिर यह साल नया कैसे हो गया. यह संवत बदला कब. कानो कान ख़बर तक नहीं हुयी. लेकिन अब इतने लोग बाहर जमा है तो सचमुच साल बदल ही गया होगा. फिर भी तसल्ली करने के भगवान ने अपने एक सेवक को बाहर भेजा कि पता लगा कर आयो कि माजरा क्या है. सेवक ने क्या बताया यह आपको उसके लौट कर आने के बाद पता चलेगा. तब तक आपको एक और दृश्य सुनाता हूँ.
एक जनवरी को एक मित्र के घर एक काम से एक मिनट के लिए गया. उसके घर पहुंचा तो देखा वो महाशय अब भी रजाई में औंधे पड़े हैं. अब उन्हें देख मुझे अपराध बोध हो आया कि मैं क्यों ना रजाई में रहा. खैर मैंने उन्हें जगाने का अपराध कर दिया. मित्र उठे तो उनके चेहरे से दुःख टपक रहा था. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से भारत के आम आदमी के चौखटे से टपकता है. मैंने पूछा क्या हुआ? कम से कम सोते समय तो खुश रहा करो. मित्र ने मेरी बात निर्विकार भाव से सुनी और अपने दोनों कानो का उपयोग किया. एक से सुना और एक से निकाल दिया. मित्र ने अपना कष्ट बताया. कहा कि यार अब तो सपने में भी फुटकर ही दिखता है. बड़ी नोट कहीं दिखती ही नहीं. महंगाई इतनी बढ़ गयी है कि 500 और 1000 की नोट का वजूद घंटे दो घंटे से अधिक बचता ही नहीं. सब्जी वाला भी अगर मन से सब्जी दे दे तो एक टाइम का सब्जी का खर्च 100 रुपये तो हो ही जाता है. यही कारण है कि सपना देख रहा तो पॉकेट में बस चिल्लर ही दिख रहे थे. बड़ी नोट थी ही नहीं. यही नहीं एटीएम से निकली वो स्लिप भी थी जो बता रही थी कि तुम कंगला हो गए हो.
मित्र को लगा जैसे उसने बड़ी नोटों के सपने देखने का अधिकार खो दिया है. मेरे पास भी इस तर्क का कोई जवाब नहीं था. आखिरकार हमारे देश के शीर्ष नेतायों ने भी बताया है कि दुनिया की महाशक्ति बनना है तो बड़े सपने मत देखो. सपने में फुटकर से काम चला लो. बाकी का कारोबार उनके जिम्मे छोड़ दो. नीरा और राजा तो है ही ऐसे सपने देखने के लिए. तेजी से बढ़ते इस देश के लोगों की जेब तेजी से खाली हो रही है. क्या फर्क पड़ता है. देश तो तरक्की कर रहा है. सड़कों के किनारे झुग्गी बन रही है तो क्या हुआ सड़क तो बनी.
मित्र की आँखों में आंसू थे. मै समझ गया कि ये हकीक़त में तो अब प्याज के आस पास भी नहीं भटकता, सपने में होने का फायदा उठा कर ये ज़रूर प्याज के पास गया होगा. दुकान दार से हेकड़ी में दाम भी पूछ लिया होगा. दाम सुन कर ही ये आंसू आये होंगे. लेकिन यारो इन आंसुयों में भारत के आम आदमी की लाचारी और प्याज के महंगाई वाले आंसुयों को अलग कर पाना मुश्किल है. खैर रोना ना सिर्फ मेरे मित्र का बल्कि इस देश के हर उस आदमी का संवैधानिक अधिकार बन गया है जो आम आदमी की श्रेणी में आता है. मेरा काम क्या था मैं भूल चुका था. लगा कि देश इतना आगे जा रहा है तो मैं भला अपना काम क्यों याद रखूँ. मैं भी देश के साथ आगे बढ़ लूं. इन्ही विचारों के साथ में वहां से चल दिया.
बात वापस संकट मोचन भगवान की करती हैं. भगवान अब भी परेशान थे. उनका सेवक नहीं लौटा था. भगवान ने मुझसे कहा कि जरा देख कर आओं सेवक कहाँ रह गया. भीड़ बढ़ चुकी थी. मुझे भगवान के सेवक को तलाशने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी. आँख गड़ा गड़ा कर देखा तो भगवान का सेवक भारतीय इंसानों की लाइन में दिखा. वो भी संकट मोचन भगवान के दर्शन करने के लिए खड़ा हो गया था. मैंने उससे पूछा कि तुम लाइन में क्यों खड़े हो? तुम्हारा तो भगवान से सीधा संपर्क होता है. सेवक थोड़ा अकड़ कर खड़ा हो गया. कहा इतने लोग जो नया साल मना रहे हैं तो कोई गलत तो नहीं कर रहे. क्या फर्क पड़ता है कि साल बदला है संवत नहीं. हम भारतीय तो इसके बाद भी बने हुए हैं. मैंने अपना सवाल दोहराया. तो सेवक ने कहा कि महंगाई इतनी बढ़ गयी और देश के नेता कुछ कर नहीं पा रहे हैं इसलिए अब भगवान का ही सहारा है. यही वजह है कि मैं भी लाइन में खड़ा हो गया हूँ.
अब मैं क्या कहूं. हर भारतीय नए साल के जश्न में है और बड़ी नोट का सपना देखने से डरता है. फिर भी यही कहता है कि वो तरक्की कर रहा है. क्योंकि देश तरक्की कर रहा. करो भईया. किसने माना किया है. महंगाई ने ऐसी कमर तोड़ी है प्याज तो क्या प्याज की महक से डर लगता है. देश के नेतायों से कोई उम्मीद नहीं है भगवान का ही सहारा है. मेरी हिम्मत नहीं हुयी कि संकट मोचन जी को जाकर बतायूं कि आपका सेवक भी अब लाइन में आ गया है. जब वो सामने पहुंचेगा तो मिल लीजियेगा.
लगता है दोस्तों इस देश के तरक्की भगवान के ही भरोसे है. वैसे इतना बड़ा बोरिंग लेख पढ़ कर आपको ज़रूर नींद आ रही होगी. लेकिन मेरी एक राय मानियेगा कि सपना मत देखिएगा.
जय हो संकट मोचन महाराज की.

ये तो दर्द में भी मुस्कुराता है


एक शहर जिसकी पहचान
महज घंटे और घड़ियालों से नहीं
मंदिर के शिखर और
उनपर बैठे परिंदों से नहीं
यहाँ ज़िन्दगी
ज़ज्बातों से चलती है
अविरल, अविनाशी माँ की
लहरों पर मचलती है
शहर अल्लहड़ कहलाता है
ये तो दर्द में भी
मुस्कुराता है
यकीनन इसके सीने पर
एक ज़ख़्म मिला है
कपूर की गंध में
बारूद घुला है
एक सुबह सूरज सकपकाया सा है
गंगा पर खौफ का साया भी है
किनारों पर लगी छतरियो के नीचे
एक अजीब सी तपिश है
सीढ़ियों पर लगे पत्थर
कुछ सख्त से हैं
डरे- सहमे तो दरख्त भी हैं
तभी अचानक
एक गली से एक आवाज़ आती है
महादेव
देखो, दहशत कहीं दूर सिमट जाती है
घरों से अब लोग निकल आयें हैं
उजाले वो अपने साथ लायें हैं
चाय की दुकानों पर अब भट्ठियां सुलग रहीं हैं
पान की दुकानों पर चूने का कटोरा भी
खनक रहा है
देखो, ये शहर अपनी रवानगी में
चल रहा है
सुनो, उसने पुछा था
इस शहर की मिट्टी
मिट्टी है या पारस
लेकिन उससे पहले
दुआ है यही की
बना रहे बनारस
बना रहे बनारस .

कैसी रही चाय साहब?

>> धमाके के वक़्त पुलिस के बड़े अफसर के घर चल रहा था जश्न.

यह सवाल आपको कुछ अटपटा सा ज़रूर लग सकता है लेकिन सवाल जायज है. दरअसल ये सवाल इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मंगलवार 6 दिसम्बर को जिस वक़्त वाराणसी के शीतला घाट पर बम धमाका हुआ ठीक उसी समय जिले के आला अफसर चाय पार्टी में व्यस्त थे. आप को हैरानी होगी ये जानकार कि ये चाय पार्टी दी किस ख़ुशी में गयी थी. दरअसल 6 दिसम्बर की बरसी शहर में शांतिपूर्वक बीत गयी इसका जश्न मनाया जा रहा था. शहर पुलिस महकमे के सबसे बड़े अफसर के बंगले पर इस पार्टी का आयजन किया गया था. बाकायदा पत्रकारों को फ़ोन करके इस पार्टी में बुलाया गया था. खुद एसपी सिटी ने मेरे एक पत्रकार मित्र को फ़ोन किया और चाय पार्टी का निमंत्रण दिया. कारण बताया कि 6 दिसम्बर की बरसी शांति पूर्वक बीत गयी इसलिए जश्न मानेगे. कोशिश थी कि अपनी पीठ खुद ठोक ली जाये. यानी साफ़ है कि 6 दिसम्बर बीत जाने के बाद सभी अधिकारिओं ने मान लिया था कि अब कुछ नहीं होने वाला है. इसी लापरवाही का फायदा उठा लिया इंडियन मुजाहिदीन ने.
सूत्रों की हवाले से ख़बर है कि लास्ट के एक दिन पहले तीन संदिग्ध लोग इस इलाके में देखे गए थे. इसके बावजूद पुलिस और खुफिया विभाग ने कोई विशेष सतर्कता नहीं बरती. तुर्रा यह कि पुलिस ने कहा कि हम लोगों ने इलाके की सघन तलाशी ली थी अब आप ही सोच ले कि पुलिस की ये सघन तलाशी कितनी विरल थी. ऐसा नहीं है कि इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने हाथ घुमाया होगा और बम शीतला घाट पर रखे कूड़ेदान में पहुँच गया होगा. इसके लिए बाकायदा रेकी हुयी होगी. कहीं स्थानीय ठिकाना बनाया होगा. कुछ दिनों तक हर चीज़ पर नज़र रखी होगी. तब जाकर पूरी घटना को अंजाम दिया होगा. यही नहीं 6 दिसम्बर को अगर पुलिस इतनी सतर्क थी तो भला आतंकवादी शहर में कैसे टिके रह गए? साफ़ है कि खुफिया तंत्र यहाँ नाकाम साबित हुआ.