एक बार याद उन्हें भी कर लिया होता।


जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में जितनी बार नाम राहुल गांधी का लिया गया अगर उसका एक फीसदी हेमराज और सुधाकर को याद किया होता तो शायद हमें गर्व होता कि हमारे देश पर कांग्रेस ने कई साल तक राज किया है। हैरानी होती है कि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी के नेताओं ने विदेश और रक्षा नीति पर एक भी नोट जारी नहीं किया। जबकि मुल्क का एक बड़ा तबका ये उम्मीद लगाए बैठा था कि कांग्रेस सबसे पहले सुधाकर और हेमराज के मुद्दे पर अपना बयान जारी करेगी। 
आखिर सुधाकर और हेमराज को याद न करने की मजबूरी कांग्रेस के लिए क्या हो सकती है। ये तो कांग्रेस के नेता ही जाने लेकिन इतना तो तय है कि कांग्रेस के इस रवैए से शहीदों के प्रति उसके चरित्र का पता चल गया है। कांग्रेस से उम्मीद थी कि कम से कम राहुल बाबा के ही जरिए कांग्रेस इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करेगी। लेकिन कांग्रेस चुप रही। 
मुझे लगता है कि कांग्रेस के पास कहने के लिए बहुत कुछ था भी नहीं। कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों ही महज इस बात के चिंतन में लगे रहे कि राहुल को कैसे आगे लाया जाए। कांग्रेस इस देश की ही दुनिया की एक बड़ा राजनीतिक पार्टी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस अगर कुछ कहती तो पाकिस्तान उसे अनसुना नहीं कर सकता था। कम से कम इस देश के लोगों को ये संदेश तो जाता ही कि कांग्रेस इस मुल्क के सपूतों के बारे में भी वक्त निकालकर कुछ सोचती है। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अफसोस ये कांग्रेस हमारे देश की पार्टी है। 


बोलिए बाबा राहुल की जय


राजस्थान में कांग्रेस का चिंतन शिविर चल रहा है। कांग्रेस के तमाम दिग्गज नेता इन दिनों एक साथ चिंतन शिविर के ही बहाने सही एक जगह बैठ तो गए ही हैं। लोग बाग न जाने इन नेताओं को क्या क्या कह रहे हैं। चोर, उच्चके, चापलूस, वादाखिलाफ और न जाने क्या क्या। लेकिन मैं इन संबोधनों से जरा सा भी इत्तफाक नहीं रखता। हुजूर आप भी नहीं रखते होंगे। क्योंकि इन नेताओं को तो शायद इससे भी कोई बड़ा संबोधन मिलना चाहिए। खैर छोडि़ए हम इस चिंतन में न पड़े तो ही अच्छा। 
कांग्रेस को अपने इस चिंतन शिविर का नाम शायद कुछ और रखना चाहिए था। शायद 'राहुल शिविर', 'मीट विथ राहुल बाबा', 'हाउ टू मेक राहुल बाबा अ पालिटीशियन' या कुछ ऐसा ही। ताकि इस देश के लोगों को पता तो चल जाता कि कांग्रेस का मतलब अब सिर्फ राहुल गांधी ही रहा गया है। इससे आगे और पीछे कुछ नहीं। चिंतन शिविर में कांग्रेस के नेता कहां तक तो दुनिया की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को और मजबूत बनाने की कोशिश करते तो वो महज गणेश परिक्रमा में ही लगे हुए हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी राजनीतिक पार्टी की क्या जवाबदेही हो सकती है इसके बारे में सोचने की बजाए कांग्रेस ये सोच रही है कि राहुल गांधी को कैसे राजनीतिक जिम्मेदारी सौंपी जाए। 
राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस ने जो चरित्र दिखाया है उससे साफ हो गया है कि कांग्रेस जनता से बेहद दूर महज व्यक्तिगत चिंतन में लगी है। कांग्रेस का यह चरित्र दिखाता है कि वो जनता के बीच किसी नेता को कैसे थोपती है। वही नेता जिसको कई राज्यों में जनता ने सिरे से नकार दिया। न यूपी में चली न गुजरात में चली। इसके बावजूद कांग्रेसी चाहती है कि कांग्रेस को लोग अब राहुल के नाम से जाने। 
आम आदमी महंगाई से मर रहा है। कांग्रेस को इस बात से कोई लेना देना नहीं है। कांग्रेस के चिंतन शिविर में इस बात पर चर्चा नहीं हुई। हां, यह जरूर है कि सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी पीड़ा व्यक्त की है। मुझे समझ नहीं आता कि सोनिया जी की इस पीड़ा पर देश कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करे। कांग्रेस का शुक्रिया अदा क्या ऐसे करें कि भाई पहले आपने हमें एक भ्रष्टतंत्र दिया और अब उसपर आप दुख जता रहे हैं। इसके लिए हम आपके शुक्रगुजार हैं। 
कांग्रेस के चिंतन शिविर में न कोई ताजगी है और न ही आम आदमी के लिए कोई उम्मीद। है तो बस परिवारवाद की पुरानी परिपाटी को कायम रखने की कोशिश और गणेश परिक्रमा का कांग्रेसियों का जज्बा। बढि़या होता कि कांग्रेस अपना नाम बिना किसी चिंता के राहुल कांग्रेस कर लेती। हम भी उम्मीद छोड़ देते। 
और हां, अगर आप बोल सकते हों तो बोलिए..........राहुल बाबा की जय

हिना रब्बानी खार, खैरियत मनाओ कि हिंदुस्तान में गांधी पैदा हुआ था

शक्ल खूबसूरत, सीरत बदसूरत

मैडम हिना रब्बानी खार कह रही हैं कि भारत युद्ध पर आमादा है। बड़ा हैरतअंगेज और हास्यास्पद बयान ये है। मैडम साहिबा को विदेश मामलों का कितना ज्ञान है ये तो नहीं पता लेकिन इतना जरूर है कि मैडम को अपना लुक बनाए रखने का पूरा ध्यान रहता है। 1977 में जब मैडम हिना का जन्म हुआ उसके बाद उन्होंने आज तक उन्होंने कोई वास्तविक जंग देखी भी नहीं। हां, ये जरूर है कि कारगिल की जंग उन्होंने जरूर देखी होगी। हालांकि उस वक्त मैडम हिना महज 22 साल की ही रहीं होंगी। और उन्हें जंग की कितनी समझ रही होगी ये आप और हम समझ सकते हैं। मैडम की कुल जमा उमर अब भी 36 ही है। अब 36 की उमर में वो न तो 47 की समझ सकती हैं, न 65 को समझ सकती हैं, न 71 को। मैडम हिना ने मैसाच्युट्स यूनिवर्सिटी से व्यापार प्रबंधन में एमएससी की डिग्री ली है। मैडम पहले पाकिस्तान में वाणिज्य मंत्रालय संभाला करती थीं। कुछ दिनों से भारत के साथ रिश्ते सुधारने में लगा दी गईं हैं। 
यहां भारतीयों का सौंदर्य प्रशंसक होना भी मैडम के ऐसे बयानों की वजह है। मैडम जब भारत आईं तो भारतीय मीडिया ने उनकी जो ग्लैमरस छवि पेश की, कि बस पूछिए मत। न्यूज पढ़ते पढ़ते एंकर भावुक होने लगे। मैडम हिना ने बयान दिया कि वो भारत को एक अलग लेंस से देख रहीं हैं। ऐसे बयानों ने हिना मैडम को सुर्खियों में ला दिया। हमें भी लगा कि चलो एक नासूर खत्म हो गया। लेकिन याद करिए कि उसी वक्त मैडम चीन भी गईं थीं। लेकिन भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया ने मैडम का जितना सौंदर्यमंडन किया उसका एक फीसदी भी चीन की मीडिया ने नहीं किया। खैर छोडि़ए, हमने मैडम से हाथ मिलाया तो छुरा भी तो हमारी ही पीठ में घोंपा जाएगा। 
हाल फिलहाल मैडम को अब लगता है कि भारत ने सीमा पर तनाव बढ़ा दिया है और यु़द्ध की स्थितियां पैदा कर दी हैं। लेकिन मैडम साहिबा आप शायद भूल रहीं हैं कि ये मुल्क 1947 के बाद से रोजाना एक नई अनजानी जंग का सामना करता है। ये जंग या तो आपकी रहनुमाई में होती है या फिर आप खुद छेड़ती हैं। कभी आप संसद पर हमला करवाती हैं तो कभी लोकल ट्रेनों में अपने भाड़े के ट्टुओं को भेज कर धमाके कराती हैं। आप भूल जाती हैं कि हम अमन का पैगाम लेकर कराची गए तो आप दहशतगर्दों का ठिकाना कारगिल की पहाडि़यों में बनवा रहीं थीं। 
हिना रब्बानी खार, खैरियत मनाओ कि हिंदुस्तान में गांधी पैदा हुआ था। लेकिन ये मत भूलो कि यहीं भगत और आजाद भी जन्मे थे। मैडम साहिबा जंग हमने कभी न चाही और न चाहेंगे लेकिन इतना जरूर है कि सरहदों का निगहबानी में हमें ही अपनी जमीं पर आपकी सेनाओं की बिछाई लैंडमाइंस मिलीं हैं। हम अब भी चुप हैं समझा रहे हैं, समझ जाइए। हाथ मिलाइए, दिल मिलाइए लेकिन पीठ में छुरा मत घोंपिए।

दिन गलती गिनाने के नहीं पीएम साहब सबक सिखाने के हैं


ठीक ठाक से चुप रहने वाले जब पीएम मनमोहन सिंह जी ने पाकिस्तान की तरफ से हो रही बर्बरता पर मुंह खोला तो लगा कि पीएम साहब का बयान पाकिस्तानी राजदूत को सामने बैठाकर टाइप कराया गया है। बयान तैयार कराते वक्त एक एक लाइन के बाद पाकिस्तानी राजदूत से पूछा गया होगा कि ठीक है न भाई साहब कोई गलती तो नहीं है। कहीं कुछ अधिक तो नहीं हो रहा। फिर पाकिस्तान के राजदूत ने कहा होगा कि आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि हमने गलती की। पाकिस्तानी राजदूत ने कहा होगा कि आप लिखिए कि आप अपनी गलती को मानिए। इसके बाद पाकिस्तान कहेगा कि हमने कोई गलती की ही नहीं तो मानने का तो सवाल ही नहीं उठता। बस हो गया काम। न भारत के पीएम को चुप रहने पर ताना सुनना होगा और न ही पाकिस्तान को गलती मानने की जरूरत होगी। शायद पड़ोसी के साथ रिश्ते सुधारने का इससे बेहतर तरीका हो भी नहीं सकता। यूं भी इस मुल्क का मुस्तकबिल कुछ ऐसा ही रहा है। हम कहने को शेर हैं लेकिन गीदड़ों की धमकियों से मांद में छुप जाते हैं। इसके बाद शांती पसंद होने का हवाला देकर अपनी इज्जत बचाने की कोशिश करते हैं। हमारे दो जवान शहीद हुए। एक जवान का सिर दुश्मन मुल्क के सैनिक काट कर अपने साथ लेते गए और हमारा देश अभी हाथ जोड़े ये याचना कर रहा है कि भाई सिर लौटाओ या मत लौटाओ लेकिन प्लीज अपनी गलती तो मान लो। यूं तो पाकिस्तान गलती मानेगा नहीं और मान भी लिया तो उससे क्या होना। क्या ऐसी हरकतें वो दोबार नहीं करेगा ? इसकी गारंटी कौन लेगा? वक्त अब गलती गिनाने का नहीं वक्त अब सबक सिखाने का है। हमारे एक जवान का सिर काट कर ले गए पाकिस्तानी सैनिक। मीडिया ने हल्ला मचाया। इसके बाद फ्लैग मीटिंग हुई। लगा कि हमने हड़का दिया टुच्चे पाकिस्तान को। लेकिन हुआ क्या। पाकिस्तान ने मीटिंग के 72 घंटों के भीतर सीजफायर का पांच बार उल्लंघन किया। गोलीबारी की और हमें बताया कि मीटिंग और जंग में सब जायज है। हम अभी इस मुगालते में हैं कि हमने समझा दिया तो पाकिस्तान सुधर गया। रिश्तों को सुधारने की कोशिश एक अलग बात है और सरहद पर अपने जवानों को सुरक्षित माहौल देना अलग। दोनों में फर्क समझना होगा। कूटनीति वीजा नियमों का भविष्य तय कर सकती है लेकिन जंग के मैदान में तोप का मुंह नहीं मोड़ सकती। इसके लिए तो अपनी सेना उतारनी ही होगी।

माफ करना हेमराज इस देश के लोग तुम्हारे लिए इंडिया गेट पर नहीं आ सकते।


यकीनन ये सोच कर दुख होता है लेकिन ये सोचना तो पड़ेगा ही। एक छोटा सा सवाल है कि क्या इस देश की सरहद को सलामत रखने वालों का सिर हमारे लिए अहमियत नहीं रखता ? क्या हमारे जवान का सिर इस लायक भी नहीं कि उसके लिए इंडिया गेट पर नहीं उतर सकते ? 
हमारे देश में भ्रष्टाचार है इसमें कोई दो राय नहीं है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी इससे प्रभावित होती है इसमें भी कोई दो राय नहीं है। हमारा गणतंत्र, भ्रष्टतंत्र में बदल चुका है लिहाजा हमारी नाराजगी जायज है। इस भ्रष्टाचार की ही देन है कि हमें अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव के दर्शन हुए। इस देश में लाखों लोगों ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए देश के अलग अलग हिस्सों में कभी धरना दिया तो कभी प्रदर्शन किया। हमारा हासिल हमें अभी पता नहीं। फिलहाल हम खुश हैं कि हमने आवाज तो उठाई। 
दिल्ली में चलती बस में गैंगरेप हुआ तो देश उबल पड़ा। युवाओं की बड़ी संख्या देश के अलग अलग हिस्सों से इंडिया गेट पर आई और आवाज उठाई। पत्थरों से घिरे लोकतंत्र पर ऐसी चोट लोक की हुई कि पूरा तंत्र हिल गया। देश में एक नई बहस शुरू हो गई। 
लेकिन इस सबके बाद ये सवाल भी आ गया कि आखिर ऐसे मुद्दों पर सरकार से जवाब की उम्मीद करने वाली भीड़ आखिर हेमराज और सुधाकर सिंह की शहादत को इतने हल्के में क्यों ले रही है। क्या अब इस देश की जनता ने मान लिया है कि देश की सरहद पर हमारे जवान शहीद होते रहे हैं और होते भी रहेंगे। क्या ऐसी घटनाओं से अब हमें कोई फर्क नहीं पड़ता ? मैं कहीं से नहीं कहता कि दिल्ली में गैंगरेप की घटना और मेंढ़र में जवानों की शहादत में कोई समानता है। लेकिन इतना तो आप सब मानेंगे कि इस देश के लोगों के लिए ये दोनों ही घटनाएं बेहद माएने रखती हैं। क्या हम उस दर्द को महसूस नहीं कर पा रहे जो दर्द हेमराज के परिवारजनों से सहा है। कोई जब सेना में भर्ती होता है उसी वक्त इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है कि उसकी कभी अपने फर्ज को निभाते हुए शहादत भी हो सकती है। लेकिन इस बात के लिए कोई तैयार नहीं होता कि शहादत के बाद किसी जवान का सिर कलम करके दुश्मन सेना के सैनिक ले जाएं। क्या गुजरी होगी उस परिवार पर जिसने अपने सपूत का सिरविहीन शव हाथ में लिया होगा। इस दर्द को क्या अभी आपने महसूस किया। मथुरा में हेमराज की पत्नी, मां और परिवार के अन्य लोग अनशन पर बैठ जाते हैं लेकिन इस देश के सिस्टम को बदलने के लिए इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने वाली भीड़ की एक फीसदी भीड़ भी मथुरा नहीं पहुंचती। क्या महज इसलिए कि मथुरा दिल्ली नहीं है। क्या मथुरा जाने वाले सभी रास्ते बंद हो गए हैं ? आखिर क्या वजह है कि देश का एक व्यक्ति भी प्रधानमंत्री से इस बात का जवाब नहीं चाहता कि आखिर पड़ोसी मुल्क के साथ वो कौन से सुधरे रिश्ते बना रहे हैं जो हमारे जवानों की जान पर भारी पड़ रही है। कहां सोए हैं अन्ना हजारे ? बाबा रामदेव को क्या ये खबर नहीं मिली ? वोटों का कोई बड़ा फायदा नहीं होने वाला शायद अरविंद केजरीवाल इसीलिए चुप हैं। 
मेरी सोच और मेरी अभिव्यक्ति, मैं किसी पर थोप नहीं सकता। लेकिन ये भी सच है कि इसे अभिव्यक्त करने से मुझे कोई रोक भी नहीं सकता। हम भीड़तंत्र के सहारे लोकतंत्र को मजबूत बनाने में लगे हुए हैं। खुश हैं कि भीड़ में हम भी शामिल हैं। लेकिन याद रखिएगा कि जो भीड़ से इतर होते हैं पहचान उन्हीं की होती है। दो जवानों की शहादत इस देश के लगभग सवा अरब लोगों के लिए कोइ माएने नहीं रखती। देशभक्ति का जज्बा अब हमारे भीतर महज रस्मी जज्बा है इस बात में भी कोई दो राय नहीं। कोई एक शख्स भी नहीं पहुंचा दिल्ली ये पूछने कि लिए पीएम साहब आप क्यों चुप हैं ? क्या अभी दो-चार और जवानों का सिर पाकिस्तान के सैनिकों को सौंपना चाहता हैं ? क्या हमारे मुल्क की सेनाएं लाचार हैं या फिर आपने उन्हें लाचार बना दिया है ? जवाब तो देना ही होगा पीएम साहब आज नहीं तो कल। जवाब की ये ख्वाहिश अकेली ही सही लेकिन मजबूत जरूर है। 
और हां, भीड़ में शामिल हर उस शख्स के लिए.....................भगत और आजाद कभी इंडिया गेट पर प्रदर्शन नहीं करते। वो असेंबली में धमाके करते हैं। गोरों से आजादी के बाद अब वक्त काले लोगों की गुलामी से मुक्त होने का है। माफ करना हेमराज इस देश के लोग तुम्हारे लिए इंडिया गेट पर नहीं आ सकते। 

चुनौतियों भरा एक साल

संभव है कि कोई ये सोचे कि इस आत्मविवेचना को सफलता भरा एक साल नाम देना कहीं अधिक उचित था। लेकिन मुझे लगता है कि सफलता से कहीं अधिक हमारे लिए चुनौतियां थीं और हैं। एक ऐसा राज्य जो 12 साल का हो चुका है वहां पत्रकारिता के लिहाज से अभी बहुत कुछ बचा हुआ है। विशेष तौर पर टीवी पत्रकारिता के क्षेत्र में। हम एक ऐसी टीम का हिस्सा बने जो उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में बैठकर पूरे देश की खबरों पर नजर रख रही थी। आम तौर पर टीवी पत्रकारिता का केंद्र नोएडा और दिल्ली है। जाहिर सी बात है कि देहरादून से क्षेत्रीय सरोकारों से जुड़े मुद्दों के साथ राष्ट्रीय मुद्दों पर पैनी नजर रखना एक मुश्किल काम था। लेकिन टीम ने वो सब कुछ किया। शुरुआत में ही हमने अपने लिए खुद के लिए प्रतिमान स्थापित कर लिए। तसल्ली रही कि हमने उन प्रतिमानों को बहुत हद तक छू भी लिया। आत्म विवेचना को अगर कुछ बिंदुओं पर केंद्रित करें तो शायद वो बिंदु होंगे चुनौतियां, संभावनाएं, प्रयोग और जनपक्ष।



आमतौर पर जब आप एक नई शुरुआत करते हैं तो आपके सामने कई मुश्किलें होती हैं। इसके साथ ही आपके पास हारने के लिए कुछ होता भी नहीं है। आप खुलकर प्रयोग करते हैं। हां, ये जरूर है कि आप जब मास कनेक्ट की विधा से जुड़े होते हैं तो आपके सामने प्रयोग करने के लिए तर्कों की जरुरत होती है। चुनौतियां कल भी थीं और आगे भी रहेंगी। उत्तराखंड में टीवी पत्रकारिता के लिए कई बड़ी चुनौतियां हैं। आमतौर पर राष्ट्रीय न्यूज चैनलों में उत्तराखंड की खबरें कम ही दिखती हैं। दिखती भी हैं तो बस दिखाने भर के लिए। शायद मामला प्रोफाइल का है। ऐसे में नेटवर्क 10 को राष्ट्रीय न्यूज चैनलों की स्क्रीन से बेहतर स्क्रीन उत्तराखंड की खबरों को देनी थी। जाहिर है कि एक ऐसी टीम को खड़ा करना बड़ा काम था। वो हमने किया भी। चूंकि अब भी उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी इलाकों में आपको दिल्ली जैसे रिपोर्टर नहीं मिलेंगे। ऐसे में छोटी सी लगनी वाली खबरों को न्यूज डेस्क ने न सिर्फ मजबूती के साथ पेश किया बल्कि आमजन मानस को ऐसी खबरों के साथ जोड़ा भी।


बात संभावनाओं की करें तो इनका विस्तार उत्तराखंड के किसी पहाड़ी इलाके से खड़े होकर दूर तक फैले पर्वत शिखरों के विस्तार से कहीं कम नहीं है। एक क्षेत्रीय न्यूज चैनल के एंकर होने के नाते मुझे अक्सर यह एहसास हुआ कि आप जब सड़क, बिजली और पानी की समस्या से जूझ रहे किसी राज्य की सच्ची तस्वीर को पेश करने का जिम्मा उठाते हैं तो आपको संभावनाओं की कमी हो भी नहीं सकती है। फिर उत्तराखंड में तो विकास देहरादून और आसपास के इलाकों में ही केंद्रित हो कर रहा गया है। सियासी पार्टियों को यहां सर्कस करने का खुला मंच भी मिला है। महज 12 सालों में उत्तराखंड की राजनीति यूपी के नक्शे कदम पर चलने लगी है। शायद ये गुण यूपी ने उपहार में उत्तराखंड को विभाजन के दौरान दे दिया। अव्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठा सकने का माद्दा कम ही लोगों में होता है। एक बेहतर मंच भी चाहिए होता है। मुझे खुशी है कि नेटवर्क 10 ने उत्तराखंड को वह मंच दिया। न सिर्फ देहरादून बल्कि पुरोला और मुनस्यारी की खबरों को हमने प्रमुखता से दिखाया। आमतौर पर पहाड़ में लोग शाम को जल्द ही बिस्तरों में दुबक जाते हैं। इसके बावजूद हमने अपने प्राइम टाइम को देखने के लिए लोगों को विवश कर दिया। यह किसी उपहारा से कम नहीं है। फोन इन प्रोग्रामों में लोगों की काल्स इस बात की गवाह बनीं कि हमने बहुत हद तक उन्हें फोन करने के लिए बाध्य किया। आपको इससे अधिक क्या चाहिए। सिस्टम ने भी आपको पहचाना और कई खबरों पर सरकार को संज्ञान लेना पड़ा। यहीं नहीं हमने हिमाचल में भी महज एक महीने के कम वक्त में एक बेहतर पहचान बना ली। आम आदमी से लेकर हिमाचल के बड़े राजनीतिज्ञों तक ने नेटवर्क 10 की माइक आइडी को पहचाना।
आमतौर पर आम लोगों को लगता है कि किसी न्यूज चैनल पर चल रही खबर किसी व्यक्ति विशेष की मेहनत होगी। लेकिन किसी भी न्यूज चैनल को कंटेट के आधार पर मजबूत बनाने के लिए उसकी डेस्क के साथ साथ पूरी टीम का मजबूत होना जरूरी होता है। सौभाग्य से नेटवर्क 10 की शुरुआती टीम में युवा उत्साह के साथ प्रौढ़ अनुभव भी मिल गया। इन सबके साथ देश के वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार अशोक पाण्डेय का एक्जीक्यूटिव एडिटर के रूप में मार्गदर्शन। इसके साथ ही न्यूज हेड के रूप में राकेश खंडूड़ी जैसे जुझारू और जमीन से जुड़े पत्रकारों का सानिध्य। हालांकि राकेश जी अब किसी अन्य मीडिया हाउस के साथ जुड़ चुके हैं लेकिन योगदान सभी को हमेशा याद रहेगा। एक बड़ी टीम और सभी के नाम लिखना संभव नहीं इसलिए महज प्रतीक रूप में इन दोनों नामों से काम चला रहा हूं। मुझे लगता है कि अशोक पाण्डेय और राकेश खंडूड़ी को इस बात से इत्तेफाक होगा कि इस टीम के बिना वो महज एक साल में इतना बड़ी पहचान नहीं बना सकते थे।

किसी भी मीडिया हाउस के लिए उद्देश्य परक पत्रकारिता जरूरी होती है। उद्देश्य विहीन पत्रकारिता महज खबरों के संकलन और प्रकाशन-प्रसारण तक ही रह जाती है। मेरी समझ में इसे पत्रकारिता की संज्ञा देना गलत होगा। आप एक ऐसी विधा के साथ जुड़े हैं जो मिशन से प्रोफेशन और कमीशन तक का सफर तय कर चुकी है। फिर भी आपको मिशन के साथ रहना हो तो मुश्किलें तो आएंगी हीं। तमाम प्रबंधकीय उठापटक और विरोधाभासों के बीच खड़े रहना ही तो संघर्ष हैं और इस संघर्ष का अपना ही मजा है। उम्मीद है 2013 में नेटवर्क 10 कई मामलों में अपने प्रतिद्वंदी चैनलों से बीस हो जाएगा। अब भी कई काम बचे हैं। आखिर में जनता जनार्दन को सलाम जिसने हमें अपनी नजरों में जगह दी। 
एक सफर में गुजरते हुए ........................आशीष तिवारी 

संतोष कभी मरते नहीं...

बस 2012 के फरवरी महीने के शुरुआती दिनों में ही मुलाकात हुई थी संतोष वर्मा से। हालांकि अब मेरी धर्मपत्नी बन चुकी अलका अवस्थी उनको पहले से जानती थीं। अलका ने संतोष वर्मा के साथ पत्रकारिता भी की। ठीक ठीक नहीं याद कि वो कौन सी तारीख थी लेकिन इतना याद है कि फरवरी का महीना था। संतोष वर्मा से बनारस से देहरादून पहुंचने के बाद मैं अपनी पत्नी के साथ पहली बार उनसे मिलने पहुंचा था। संतोष वर्मा और मुझमें उम्र का बड़ा फासला था लेकिन संतोष वर्मा ने जिस गर्मजोशी से मुझे गले से लगाया वह अविस्मरणीय है। मैं चूंकि उनसे पहली बार मिल रहा था लिहाजा संकोच और औपचारिकता के चलते मैं सिर्फ हाथ मिला कर रह जाना चाहता था लेकिन संतोष जी ने हाथ मिलाने के बाद मुझसे कहा - 'नहीं ऐसे नहीं।' इसके बाद संतोष जी ने मुझे गले से लगा लिया। आप जिससे पहली बार मिल रहे हों वो आपको यूं अपनाए ये कम होता है। हम मैंए मेरी पत्नी अलका और संतोष जी सर्द रात में देहरादून की उस सड़क पर थोड़ी देर तक बात करते रहे। चूंकि रात हो रही थी लिहाजा हम जल्द ही घर की और निकल गए। इसके बाद संतोष जी से अक्सर मुलाकात होती रही। संतोष जी भावुक थे और मर्मस्पर्शी मनुष्य। खबरों के लिहाज से उनके पास एक बेहतर सोच भी थी।

उनसे मेरी आखिरी मुलाकात देहरादून में उनके ही घर पर हुई थी। वो दिव्य हिमगिरी पत्रिका के कार्यकारी संपादक के पद से त्यागपत्र दे चुके थे। घर पर ही अध्ययन कर रहे थे। भविष्य की कई योजनाएं भी उन्होंने बेहद संक्षेप में लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ मुझे बता दीं। लगभग 25 सालों तक जिसने पत्रकारिता को जिया हो उसके भीतर जो आत्मविश्वास होना चाहिए वो पूरा था संतोष जी के साथ। एक बात औरए मैंने कभी उनके भीतर अहंकार नहीं देखा। मेरे आलेखों पर अक्सर उनकी टिप्पणियां आती रहती थीं। अभी हाल ही में उन्होंने मेरे एक आलेख पर फेसबुक के जरिए टिप्पणी की थी। उनके और मेरे बीच पत्रकारिता के अनुभव का फासला करीब 15 सालों का था लेकिन वो हमेशा उत्साहवर्धन करते रहते।

मृदुभाषी संतोष जी के कमरे में भी संतोष पसरा होता था। एक तंग गली के पिछले हिस्से में बने एक छोटे से कमरे में रहने वाले संतोष वर्मा को कहीं से भी दिखावा पसंद नहीं था। संतोष वर्मा के देहांत की खबर बेचैन करने वाली थी। इससे भी अधिक इस बात पर दुख हुआ कि उनके परिजनों ने उनकी मृत देह को स्वीकार करने से भी मना कर दिया।

ये सही है कि पत्रकार भी हमारे समाज का ही एक हिस्सा होता है। पेट और परिवार को पालने के लिए उसे भी पैसे कमाने पड़ते हैं। संतोष जी भी इन सामाजिक बाध्यताओं से घिरे थे। उनके परिवारजनों ने उनकी मृत देह हो लेने से भले ही कर दिया हो लेकिन संतोष वर्मा जी के साथ कई साथी और हैं जो उनकी मृत देह का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करेंगे।

जिस संतोष के लिए हम सब परेशान रहते हैं वो संतोष वर्मा में पर्याप्त था। व्यथित और दुखी मन के साथ भी अब तक ये स्वीकार नहीं कर पाया हूं कि संतोष वर्मा अब हमारे बीच नहीं हैं। फिर भी नश्वर शरीर की अनिवार्यता स्वीकार कर ही लूंगा। बस तसल्ली रहेगी कि कुछ उपहारों के साथ संतोष वर्मा अब भी हमारे साथ हैं।

सुनो प्रदीप, अब तुम मार्क्स की सोच नहीं, पूंजीवाद के वाहक हो

ये शीर्षक न सिर्फ एक प्रदीप के लिए है बल्कि उन जैसे और मुझ जैसे तमाम प्रदीपों के लिए हैं जो ये सोचते हैं कि पत्रकार बन कर समाज को एक नई दिशा देंगे। अपनी बात लेकर आगे बढ़ूं इससे पहले आपको बता दूं कि आखिर ये प्रदीप हैं कौन। सामान्य कद, गोरा रंग, गोल चेहरा, गालों पर चिपकी ढाढ़ी, सदरी और जींस। इसके साथ ही आजकल मोटे फ्रेम का चश्मा आंखों पर है। ये हुलिया हम तमाम पत्रकारों को अपना सा लगता है। शायद हम ऐसा ही होना चाहते हैं। मन की बेचैनी आंखों के साथ साथ हाव भाव में भी झलक ही जाती है। दरअसल प्रदीप एक पत्रकार बनने की कोशिश में लगे हैं। प्रदीप को उनके सहयोगी कामरेड कहते हैं।
प्रदीप को इस लेखन का आधार बनाने के पीछे एक नहीं कई वजहें हैं। प्रदीप युवा हैं, बेचैन हैं, जागरुक हैं। जैसे हम कभी हुआ करते थे। आठ साल के सफर में कई विशेषताएं दब सी गईं हैं। प्रदीप फिलहाल एक अखबार के नए संस्करण के साथ आगे बढ़ रहे हैं। जैसे कभी हम बढ़े थे। पत्रकारिता को मिशन मान कर प्रोफेशन के तौर पर अपनाया और फिर देखा कि अब सब कुछ कमीशन बेसिस पर हो गया है। हम जिस अखबार के साथ बढ़े, वो अखबार आगे बढ़ गया है और हम पीछे रह गए।
प्रदीप जिस अखबार के साथ जुड़े हैं उसके औपचारिक उद्घाटन के मौके पर उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी ने भाषण के दौरान कहा कि अब अखबार पूंजीपति निकालते हैं। लोगों ने तालियां बजाईं और कहा कि राज्यपाल ने बहुत बड़ी बात कह दी। लेकिन हम भूल गए कि अब ये बात तालियां बजाने के लिए नहीं बल्कि शर्म से डूब मरने की है। अखबार के पन्ने पर खबर से ज्यादा विज्ञापन होते हैं। कौन सी खबर छपेगी और कौन सी नहीं ये तय संपादक नहीं बल्कि मैनेजर करता है। अखबार खबरों के लिए नहीं बल्कि विज्ञापनों के लिए जाने जाते हैं। किसी पत्रकार की खबर जब इस बात को लेकर गिर जाती है या उसका काॅलम कर दिया जाता है क्योंकि अखबार में उस दिन विज्ञापन अधिक होते हैं तो जाहिर है कि युवा पत्रकार का कलेजा कांपेगा। लेकिन कोई फायदा नहीं प्रदीप आदत डाल लो।
न कोई राज्यपाल, न कोई मुख्यमंत्री, सब सिर्फ सच्चाई बयां करके रह जाएंगे। इस पूंजीवाद के खिलाफ आवाज सिर्फ तुम ही उठाओगे। ओह प्रदीप, लेकिन मैं तो भूल गया कि तुम फिलहाल पूंजीवाद के ध्वज वाहक हो। माफ करना।

हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं.


अरविंद केजरीवाल ने अब लगभग पूरी तरह से राजनीति में कदम रख दिया है। अब ऐसे में सवाल ये हैं कि भारतीय राजनीति के वर्तमान हालात में अरविंद केजरीवाल के सामने आखिर वो कौन सी चुनौतियां होंगी जिनसे वो आने वाले दिनों में दो चार होंगे। 
भारतीय राजनीति में पिछले कुछ दिनों में साझा सरकारों का चलन हो गया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक पार्टी के पास इतना जनाधार नहीं बचा कि वो अकेले दम पर बहुमत हासिल कर सके। दुनिया की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टियों में शामिल कांग्रेस भी अब ऐसी स्थिती में नहीं है कि वो भारत के आम आदमी का विश्वास पूरी तरह से जीत सके। सदस्यों के आधार पर देखें तो कांग्रेस दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है। लेकिन 2004 के आम चुनावों में कांग्रेस को महज 145 सीटें ही मिलीं। 2009 में कांग्रेस 206 सीटें ही जीत पाई। कांग्रेस को सत्ता में आने के लिए छोटे दलों का हाथ थामना पड़ा। 
कुछ ऐसा ही हाल भारतीय जनता पार्टी का भी है। सत्ता का सुख बीजेपी को सहयोगियों के साथ बंटा हुआ ही मिला। यही नहीं बीजेपी को सियासी लहरों का इंतजार भी करना पड़ा ताकि वो केंद्र में आ सके। 1996 में बीजेपी को अटल बिहारी बाजपेयी के नेत्तृव में 13 दिनों का सत्ता सुख मिला। इसके बाद 1998 और 1999 में बीजेपी को सहयोगियों के साथ ही सत्ता में रहने का सुख मिला पाया। अटल बिहारी बाजपेयी जैसा करिश्माई व्यक्तित्व भी कंप्लीट मेजारिटी में पार्टी को नहीं ला पाया। 
अब जबकि अरिवंद केजरीवाल देश को पूर्ण आजादी दिलाने का भरोसा दिला रहे हैं ऐसे में सवाल ये कि आखिर कैसे केजरीवाल ये सबकुल कर पाएंगे। साझा सरकारों के ट्रेंड को तोड़ पाने के लिए आम आदमी की पार्टी को पूर्ण बहुमत की जरूरत होगी। ये काम आसान नहीं। वोटों का ध्रुवीकरण क्या इतनी तेजी से हो पायेगा कि वो आम आदमी की पार्टी को कांग्रेस और बीजेपी सरीखी पार्टियों से आगे ला सके। 
अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि उनकी पार्टी का ढांचा राष्ट्रीय और प्रदेश कार्यकारिणी से होते हुए जिले स्तर तक जाएगा। ऐसे में जाहिर है कि न सिर्फ सदस्यों की संख्या बढ़ेंगी बल्कि डिसिजन मेकर्स के पाॅवर का डिसेंट्रिलाईजेशन भी होगा। यानि अरविंद केजरीवाल की शक्तियों का विकेंद्रीकरण। अब ऐसे में केजरीवाल आखिर ये कैसे तय करेंगे कि वो या उनकी पार्टी जिसके हाथ में शक्तियां दे रही है वो हाथ किसी भी तरीके से भ्रष्टाचार में काले नहीं हैं। इसके साथ ही इस बात की गारंटी कौन लेगा कि आज जिनका चयन एक साफ सुथरे व्यक्ति के तौर पर किया गया वो कल भी साफ सुथरा ही रहेगा। 
इसके साथ ही इस देश के गली चैराहों तक अपनी पहुंच बना चुके उस पाॅलिटिकल सिस्टम से अलग कैसे होंगे केजरीवाल जिसमें चुनाव से एक दिन पहले वोटरों में पैसे और शराब बांटी जाती है। 
अरविंद केजरीवाल सियासत के किंग बनेंगे ये कहना मुश्किल है, किंग मेकर बनना चाहेंगे इस बात से फिलहाल किसी को इत्तफाक नहीं। लेकिन सियासत में न कोई किसी का परमानेंट दोस्त होता है और न परमानेंट दुश्मन।  

खैर, दुष्यंत कुमार ने इस देश के हालातों को देख कर लिखा था कि 

जिस तरह चाहो बजाओ तुम हमें 
हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं.

उम्मीद यही कि इस देश में आम आदमी की तस्वीर अब बदलेगी 


दिशाहीन होती जा रही है इलेक्ट्रानिक मीडिया


क्कीसवीं सदी के भारत में मीडियावी चश्मे से देखने पर अब दो हिस्से साफ नजर आते हैं। एक है भारत जो आज भी गांवों में बसता है और दूसरा है इंडिया जो चकाचैंध भरे शहरों में रहता है। मंथन का केंद्र बिंदु मीडिया की भूमिका हो तो प्रिंट और इलेक्ट्रानिक को अलग अलग कर लेना वैचारिक रूप से सहूलियत भरा हो सकता है। युवाओं के इस देश में जब स्मार्ट फोन और टेबलेट्स की समीक्षा के पाठक हमारी कृषि नीति से अधिक हो तो प्रश्न सहज ही उठता है कि क्या हमने अपने लिए उचित देशकाल का निर्माण किया है? इस संबंध में प्रिंट मीडिया की भूमिका को लेकर चर्चा करना इतना उपयोगी नहीं है जितना न्यूज चैनलों की। चूंकि न्यूज चैनल अभी इस स्थिती में हैं कि वह अपनी दिशाहीनता को त्याग कर लक्ष्य निर्धारण कर सकें। इनका विस्तार अपने प्रारंभिक दौर में तो नहीं लेकिन बदले जा सकने के दौर में तो है ही।

ज भी भारत के एक बड़े हिस्से में केबल नेटवर्किंग सिस्टम नहीं है। हां यह अवश्य है कि सेट टाॅप बाक्स आने के बाद गांवों में डिजिटल न्यूज चैनल पहुंच गए हैं। लेकिन जब पूरे विश्व की मीडिया स्थानीय खबरों को प्रमुखता से दिखाने के जन स्फूर्त नियम को मान रहा है ऐसे में भारत का आम आदमी टीवी के चैखटे का उपयोग सास बहु के प्रोग्राम को देखने के लिए करता है। खबरों के लिए आज भी वह अखबारों पर ही अधिक विश्वास करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि न्यूज चैनलों पर दिखाई जाने वाली सौ खबरों में आमतौर पर एक भी ऐसी नहीं होती जो उसे उसके आस पास के समाचारों से वाकिफ कराए। यही वजह है कि टीवी के चैखटे के साथ भारत में बसने वाले आम आदमी को अपनेपन का एहसास नहीं मिल पाता और न्यूज चैनलों को देखने की जगह किसी मनोरंजन करने वाले चैनल को देखना अधिक पसंद करता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है और इसी का नतीजा है कि देश के कई चैनलों ने समाचारों के प्रस्तुतीकरण का तरीका मनोरंजक बना लिया है। खबरों में कृत्रिम तत्वों का समावेश किया जाता है ताकि इंडिया में बनी खबरों को भारत में भी देखा जाए। 

न्यूज चैनलों पर भारत के लिए खबरों का अकाल पड़ रहा है। प्रश्न उठता है कि किस तरह से यह बात तर्कसंगत है। खबरें तो किसी के लिए भी खबर ही होती है। खबरों के साथ निकटता का सिद्धांत कार्य करता है। कोई समाचार आप के जितने निकट होगा उसमें आपकी उतनी ही रुचि होगी। यही वजह है कि अखबारों के स्थानीय संस्करण छपते हैं। समाचार पत्रों के लिए किसी समाचार को लिखते समय कोई भी अच्छा संपादक अपने रिपोर्टर को यही सलाह देता है कि वह समाचार में स्थानीय परिवेश के अनुसार एंगल की तलाश करे। समाचार के साथ जुड़ा यह दृष्टिकोण किसी भी व्यक्ति को समाचार पढ़ने के लिए आकर्षित कर सकता है। और यदि समाचार पढ़ लिया गया और उसमें समाई सूचना पढ़ने वाले तक उचित तरीके से पहुंच गई तो समझिए कि समाचार लिखने का उदेश्य पूरा हो गया। लेकिन तेजी से बढ़ रहे न्यूज चैनलों के परिवार के साथ अब भी यह नियम पूर्ण रूप से लागू नहीं हो पा रहा है। 

न्यूज चैनलों के लिए यह एक दिशाहीन स्थिती है। यद्यपि न्यूज चैनलों ने नैना साहनी हत्याकांड से लेकर निठारी कांड तक एक अभियान छेड़ा हो लेकिन यह सोची समझी कार्यशैली से अलग हटकर एक घटनात्मक रिपोर्टिंग अधिक है। अन्ना के आंदोलन से यह तय हो गया कि भारत में न्यूज चैनलों अभी इस स्थिती में नहीं पहुंचे हैं कि दिल्ली के रामलीला मैदान को मिस्र का तहरीर चैक बनाया जा सके। जनआंदोलन खड़ा कर पाने में न्यूज चैनल आज भी अक्षम हैं। लगभग पंद्रह साल के अपने जीवनकाल में भारत के न्यूज चैनलों में से किसी भी एक न्यूज चैनल ने आज तक जनता के बीच इस बात की घोषणा नहीं की कि वह देश की जनता के बीच किस उदेश्य से आया है। जनसरोकारों के मुद्दे पर न्यूज चैनलों की कार्यप्रणाली स्पष्ट नहीं है। किसी विषय विशेष को लेकर की जाने वाली न्यूज चैनलों की रिपोर्टिंग का अहम हिस्सा उस समाचार की ठेकेदारी तक जा पहुंचता हैं। खबर का असर दिखाने की होड़ अधिक होती है और समाचारों को आखिरी पड़ाव तक पहुंचाने की ललक कम होती जा रही है। 

दैनिक समाचार पत्र आज के अग्रलेख में बाबू विष्णु राव पराड़कर ने लिखा था कि हम किसी के निजि जीवन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इन पक्तिंयों के पीछे उन्होंने स्वामी विवेकानंद के उस वक्तव्य को आधार बनाया था जिसमें उन्होंने कहा था कि हमें किसी के सिर्फ सामाजिक जीवन से ही सरोकार रखना चाहिए। उसके व्यक्तिगत जीवन का हिसाब किताब तो परमेश्वर और वह व्यक्ति स्वयं कर लेगा। यह उद्बोधन न्यूज चैनलों के लिए कभी प्रेरणा दायक बन पायेगा? 

संपूर्ण भारत के लोगों का टीवी के चैखटे के अपनापन पनप सके इसके लिए अब जरूरी हो गया है कि न्यूज चैनलों में इस बात पर चर्चा हो कि इस बार देश की कृषि नीति क्या है और क्या होनी चाहिए। सरकार ने गेंहूं का सरकारी क्रय मूल्य क्या रखा है और क्या होना चाहिए। प्रोफाइल तलाश करती खबरें समाचारों के वासनाकाल का प्रदर्शन करती हैं लेकिन भारत की बड़ी आबादी से देर होती खबरें न्यूज चैनलों के डरपोक दिल होने और अभिजात्य होने की कोशिश भी बयां करती हैं। आवश्यकता अब इस बात की है कि जब इंडिया में बैठ कर भारत के लिए समाचार तय किए जाएं तो उनके सामाजिक सरोकारों का भी निर्णय देश काल और परिस्थिती के अनुसार किया जाए। ऐसा न हो कि हम दिन भर दिल्ली के आईटीओ में हुए जलभराव को ही दिखाते रहे हैं और दूर किसी गांव में दुर्भिक्ष की खबरों के लिए हमारे पास समय ही न हो। न्यूज चैनलों को अपने प्रतिमान खुद गढ़ने होंगे।