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बाजारू चीथड़ों में मुस्कुराती मीडियावी भोजपुरी


(इस लेख में मीडिया का तात्पर्य इलेक्ट्रानिक मीडिया से है)
लगभग डेढ़ सालों से भोजपुरी में पत्रकारिता करते हुए इस बात का एहसास शायद ही कभी हुआ हो कि गाँव दुआर से चल कर टीवी के चौखटे स्क्रीन तक पहुँचने वाली भोजपुरी का वाकई कोई भला हो रहा है....यकीनन यह एक बड़ा कदम रहा होगा जब किसी संस्थान ने एक ऐसे टी वी चैनल कि अवधारणा को पटल पर लाने का निर्णय किया होगा जिसकी भाषा भोजपुरी हो....उसके बाद भारतीय मीडिया जगत कि क्षेत्रीय समाचार सेवायों में अपनी अलग पहचान रखने वाले एक अन्य ग्रुप ने भी भोजपुरी में भारत का पहला न्यूज़ चैनल खोलने का साहस किया....यही नहीं इस न्यूज़ चैनल पर अंगिका. मैथली जैसी भाषाओँ में भी समाचार प्रसारित किये जा रहें हैं...मुनाफे कि सोच रखने वाले न्यूज़ चैनलों के बीच भोजपुरी भाषा के चैनलों को संघर्ष करते देखना किसी भी पुरबिया व्यक्ति के लिए सुखद अनुभव है...लेकिन इसके साथ ही जैसे जैसे यह टीवी चैनल अपनी उम्र बढ़ाते जा रहें हैं इनसे उम्मीदें बढती जा रही है जो स्वाभाविक भी है...भारतीय मीडिया जगत में भोजपुरी का हिस्सा अभी नाम मात्र का ही है....भले ही पूरी दुनिया में इसे बोलने वालों कि संख्या २५ करोड़ के आसपास हो लेकिन भारतीय मीडिया में इसकी भागीदारी बहुत कम है.....
दरअसल भोजपुरी टी वी चैनलों ने अपनी शुरुआत से
भोजपुरी भाषा को ही केंद्र में रखा है....हालाँकि उन्होंने इस बात का दावा ज़रूर किया कि वोह ना सिर्फ भोजपुरी भाषा बल्कि भोजपुरिया समाज को एक नयी दिशा देने कि कोशिश कर रहें हैं...लेकिन शायद अभी यह हो नहीं पा रहा है....भोजपुरी में प्रसारित होने वाले चैनलों कि अंतर्वस्तु पर जरा एक नज़र डालिए...पूरे कंटेंट को हम दो भागों में बाँट देते हैं- पहला समाचार और दूसरा मनोरंजन...चलिए पहले बात समाचारों कि कर लेते हैं...भोजपुरिया समाचार चैनलों में स्पष्ट विचारधारा का अभाव साफ़ परिलक्षित होता है...ख़ास तौर पर भोजपुरिया समाज से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय पहलुओं के साथ जोड़ पाने में अक्सर बिखराव नज़र आता है....एक विस्तृत राष्ट्रीय सोच का अभाव बुद्धजीवी पुरबिया समाज को सालता है...यहाँ यह तर्क दिया जा सकता है कि भोजपुरी समाचार चैनलों का टार्गेट ग्रुप भोजपुरिया क्षेत्रों में रहने वाले लोग ही हैं पर इससे भी यह बात तो साबित होती ही है कि राष्ट्रीय स्तर पर भोजपुरी को स्थापित करने के लिए इन चैनलों के पास कोई कार्ययोजना नहीं है.....उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखण्ड से आने वाली अपराध, धर्मं, कला और संस्कृति से जुडी ख़बरों को को महज भोजपुरी भाषा का चोला पहना कर प्रस्तुत कर देना ही काफी नहीं है....क्या इस माटी ने मंगल पाण्डेय, जय प्रकाश नारायण औउर लोहिया जैसे क्रांति दूत नहीं दियें हैं? क्या इनकी छवि के सहारे इस माटी से और सपूत नहीं पैदा किये जा सकते...? क्या गंगा- जमुना का सिंचित क्षेत्र महज अपराध, ठगी, पुलिस उत्पीडन, मानवाधिकार हनन, भूख, गरीबी और ऐसी ही फसलों कि उगा रहा है....आज देश में नक्सल वाद एक बड़ी समस्या है...यू पी. बिहार और झारखण्ड इससे बुरी तरह प्रभावित हैं...क्या यहाँ कि लोगों कि आवाज़ होने का दावा करने वाली भोजपुरी मीडिया इस मुद्दे कि तह तक जा पा रही है?.....भोजपुरी मीडिया के अगुवा होने का दम भरने वालो को इस समाज कि जड़ों को तलाशना होगा.....अपने मीडियावी चोले से भोजपुरी मीडिया के अग्रदूतों को इस समाज कि वास्तविक विचारधारा को आगे बढ़ाना होगा....
चलिए अब समाचारों से इतर छोटे परदे पर भोजपुरी के मनोरंजन जगत कि करते हैं...यूं तो भोजपुरी भाषा में मनोरंजन के नाम पर कुछ भी परोस देने वाले कई चैनल हैं लेकिन जिनके ऊपर जिम्मेदारी ज्यादा है वोह भी इस समाज के साथ इन्साफ नहीं कर पा रहें हैं....दरअसल शुरुआत में इन चैनलों ने ग्लैमर के तडके के साथ खूब नाच गाना दिखाया...लगा कि भोजपुरिया लोक संस्कृति को एक नयी पहचान मिल गयी....पर अभी के हालातों में ऐसा कह पाना शायद किसी कि लिए आसान नहीं होगा.....भोजपुरी भाषा के टीवी सीरिअल्स कि ही बात कर ली जाये तो घर घर में झगड़ा ही नज़र आएगा या फिर खेत खलिहान को लेकर साजिशों का दौर....सवाल यह कि क्या भोजपुरिया समाज में यही सब हो रहा है....इसके अलावा क्या कुछ भी ऐसा नहीं है जो सकारात्मक हो और टीवी पर आ सके....
इस बारे में भोजपुरी के कुछ विद्वानों से भी बातचीत हुयी...विश्व भोजपुरी समेलन के अंतर्राष्ट्रीय महासचिव और साहित्यकार अरुणेश नीरन जी इस मुद्दे पर बेहद तल्ख राय रखते हैं......उनका साफ़ कहना है कि भोजपुरी कि मीडिया भी अब बिकाऊ माल परोस रही है... समाज या भाषा कि उन्नति में योगदान देने में भोजपुरी कि मीडिया कुछ नहीं कर पा रही है...नीरन जी के तीखे तेवरों का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि 'यह मीडिया भाषा का नाश कर रही है'..... भोजपुरी के स्वभाव को समझे बिना सामाजिक सरोकारों कि बात बेमानी है....यही नहीं समाचारों के साथ साथ मनोरंजन के नाम पर परोसी जा रही अश्श्लीता से भी नीरन जी खासे नाराज़ दिखे....उनका मानना है की भोजपुरी कि लोक कला के व्यवसाय से अपसंस्कृति आई है....भोजपुरी कि उत्सव धर्मिता इन चैनलों ने समाप्त कर दी है.....
वहीँ समकालीन भोजपुरी साहित्य पत्रिका के उप संपादक प्रवीण तिवारी भी कुछ अलग राय नहीं रखते हैं....मीडियावी भोजपुरी से समाज और भाषा के भले के सवाल पर छुटते ही कहते हैं, 'कुछ भला नहीं होने वाला'.....प्रवीण जी का मानना है कि आज जो भोजपुरी कि मीडिया चला रहें हैं उन्हें तो मूल भोजपुरी कि जानकारी ही नहीं है..वोह तो महज एक रास्ता बना रहें हैं जिसपर चलकर वोह अपना व्यावसायिक हित साध सकें...हिंदी चैनलों कि नक़ल में भोजपुरी कि मूल परंपरा, साहित्य, संस्कृति, लोक गीत सब का बेड़ा गर्क हो रहा है....मीडियावी भोजपुरी ने एक लोक संस्कृति के लोप को आमंत्रण दे दिया है....
इन प्रतिक्रियाओं से साफ़ है कि मीडियावी भोजपुरी से स्वयं उनका समाज ही संतुष्ट नहीं है....यानि अगर यही तरीका रहा तो तो ना तो मुद्दे कि बात हो पायेगी और ना ही पहचान बन पायेगी....हाँ एक बाज़ार ज़रूर तैयार हो जायेगा जहाँ अब तक बिकाऊ ना बन पाई भोजपुरी कि बोली लग सकेगी......और पुरूस्कार बाँट सकेंगे.....लिहाजा अगर इन टीवी चैनलों को भोजपुरी भाषा और समाज के लिए कुछ करना है तो बाज़ारवाद, नक़ल और पुरुस्कारों कि दौड़ से हट कर इस समाज के अंतर्मन से जुड़ना होगा....एक विस्तृत, राष्ट्रीय विचारधारा के साथ आगे बढ़ना होगा और अगर ऐसा नहीं कर सकते तो श्याद उन्हें इस बात का हक नहीं कि वोह भोजपुरी को बाजारू चीथड़ों में मुस्कुराते दिखाए....