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भाषाई आन्दोलन खड़ा करे मीडिया


पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से मीडिया ने अपने पाँव पसारे हैं उससे साथ ही लोगों की मीडिया से उम्मीदें बढ़ी हैं...अब मीडिया को ख़बरों को दिखाने के साथ कुछ और जिम्मेदारियों को भी उठाना होगा... पिछले दिनों एक सवाल सामने आया कि क्या मीडिया भाषाई आन्दोलन खड़ा करने का माध्यम बन सकती है?
हालाँकि इस सवाल का जवाब ढूँढने से पहले हमें इस बात पर ज़रूर विमर्श कर लेना चाहिए कि आखिर भाषा है क्या? क्या भाषा महज अपनी भावनाओ को व्यक्त करने का जरिया मात्र है? प्रख्यात साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने अपने उपन्यास 'अपना मोर्चा' में इस बारे में कुछ लाईने लिखी हैं उनका यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा...'भाषा का अर्थ हिंदी या अंग्रेजी नहीं है...भाषा का अर्थ है जीने कि पद्यती, जीने का ढंग.....भाषा यानि जनतान्त्रिक अधिकारों कि भाषा, आज़ादी और सुखी जिंदगी के हक कि भाषा.....'यह पंक्तियाँ बताती हैं हैं कि किसी समाज के लिए भाषा का क्या महत्व है....भाषा जिह्वा के माध्यम से सबके सामने प्रगट ज़रूर की जाती है लेकिन इसका उदगम ह्रदय और मष्तिस्क के समन्वय से होता है....काशीनाथ सिंह जी कि लाईनों से ये भी साफ़ हो जाता है कि भाषा का भला यानि समाज का भला.....अगर किसी समाज के साथ जुड़ना है तो उसकी भाषा में ही बात करनी होगी...भाषा कि महत्ता स्वराज्य प्राप्ति और राष्ट्र निर्माण में भी होती है....हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस बारे में विस्तृत चर्चा की है.....भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी भाषा की उन्नति को सब प्रकार कि उन्नति का मूल बताया है.....अब यह स्पष्ट हो चुका है कि किसी विकसित समाज कि अवधारणा में भाषा बेहद अहम रोल अदा करती है.....
चलिए अब भाषा और समाज को मीडिया के साथ जोड़ के देखते हैं....लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाने वाला मीडिया अपनी भाषा के अनुरूप ही सामाजिक विस्तार पाता है...इसे से जुड़ी सच्चाई यह है कि देश का नंबर एक चैनल होने का दावा करने वाले न्यूज़ चैनलों को दक्षिण भारत में दर्शक तलाशने पड़ते हैं.....इससे पता चलता है कि भाषा, समाज और मीडिया एक दूसरे से जुड़े हुए हैं....अगर मीडिया को समाज कि भलाई, उसके विकास की बात करनी है तो भाषा भी उचित रखनी होगी.....
मुख्य मुद्दे कि बात करे तो भाषाई आन्दोलन और मीडिया......चूँकि ऊपर कि चर्चा से साफ़ हो रहा है कि भाषा और समाज एक दूसरे के पूरक हैं और समाज मीडिया को अलग नहीं किया जा सकता है....लिहाजा यहीं से मीडिया और भाषा का भी रिश्ता तय होता है....चूँकि मीडिया समाज की बेहतरी के लिए प्रयासरत रहती है इसलिए भाषा की बेहतरी कि उम्मीद भी उससे की जाती है...हालांकि मीडिया चैनलों में जिस तरह कि हिंदी का प्रयोग हो रहा है उससे हिंदी के जानकार कहीं से भी खुश नहीं हैं....उनका मानना है कि मीडिया भाषा के मूल स्वरुप को ही नष्ट कर रही है.....हिंदी मीडिया में हिंदी के जानकारों को हेय दृष्टि से देखा जाता है....अक्सर इस बात को काटने के लिए कहा जाता है कि हिंदी मीडिया के हब बन चुके नॉएडा में हिंदी के जानकार नहीं मिलते....ऐसा हो सकता है कि निचले स्तर पर इस तरह कि कमी हो लेकिन उच्च स्तरों पर हिंदी को जानने वाले कम नहीं हैं.....आप को यहाँ बताता चलूँ कि पत्रकारिता कि नगरी कही जाने वाली काशी नगरी जो उत्तर प्रदेश में है वहां पराड़कर जी ने हिंदी के नए कीर्तिमान गढ़े.....पराड़कर जी मूल रूप से महाराष्ट्र के थे...लेकिन उत्तर प्रदेश और यहाँ के समाज कि बेहतरी के लिए पत्रकारिता करते वक़्त उन्होंने यहाँ कि भाषा का उपयोग किया....
वर्त्तमान मीडिया यकीनन इस बात के लिए तो प्रयास करती है कि समाज का भला हो लेकिन अक्सर भाषा के समन्वय कि कमी उसके इस उद्देश्य को भटकाव के रास्ते पर ले जाती है...हाल ही में अस्तित्व में आई भोजपुरी मीडिया का उदहारण ले लीजिये....जब भोजपुरी चैनल देश में शुरू हुए तो इस समाज से जुए लोगों में उम्मीद बंधी कि अब उनका और उनकी भाषा का भला होगा...लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है.....महज ख़बरों को किसी तरह प्रस्तुत करना ही उनका उद्देश्य रह गया है....भाषाई आन्दोलन के माध्यम से समाज निर्माण उनके एजेंडे में नहीं है...
मड़िया को ना सिर्फ ख़बरों तक पहुँच बनाने कि कोशिश करनी चाहिए बल्कि भाषाई आन्दोलन की ओर भी कदम बढ़ाना चाहिए क्योंकि मीडिया हमेशा इस बात का दावा करती रही है कि वो समाज का भला चाहती है और उसके दर्द को सबके सामने लाना चाहती है ..अगर वाकई में ऐसा है तो भाषाई आन्दोलन मीडिया की ज़िम्मेदारी है....