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हर बात जुबां से कहना ज़रूरी तो नहीं...

मुझे इस बात का पक्का यकीन तो नहीं लेकिन शायद मेरी लेखनी से निकले शब्दों के पास खुद पर खुश होने के सिवा कोई और विकल्प नहीं होता है. लेकिन फिर भी अपने दोस्तों द्वारा पिछले कई दिनों से अपनी आभासी पुस्तिका पर ना लिख पाने की वजहों के बारे में पूछा जाना सुखद रहा. लगने लगा कि रगों में लिपटी एक आग जब कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर शब्द दर शब्द उतरती है है तो कुछ एक यार दोस्त उस आग को धधकते, सुलगते, हाहाकार करते देख खुश होते हैं.  शुक्रिया दोस्तों. 
वैसे जलने का अपना मजा होता है. यकीन जानिए इस बात का पता मुझे भी तब चला जब मैंने जलना सीख लिया. एक ऐसी आग में जो आपको जला कर राख नहीं स्वर्ण बना देती है. बेचेहरा हवाओं में, बेतरतीब बादलों में आपको मकसद नज़र आने लगता है. एक बाँध सा होता है जो उसके स्नेह ज्वार के आने के साथ ही टूट जाता है और आप जी भर के सांस लेते हैं. इसके बाद आपको एक नव जीवन मिलता है. एक गहरी सांस और उसके साथ घुली हुई एक नरगिसी खुशबु. सब कुछ क्षण भर में ही हो जाता है लेकिन हाथों में आया यह मुट्ठी भर आसमान आपको विश्व विजेता होने का एहसास दिला जाता है. अब इसे विरोधाभास कह लीजिये लेकिन अगले ही क्षण एक विश्वविजेता अपना सब कुछ खोकर भी दुनिया की सबसे कीमती चीज़ पा लेता है. एक इबारत ज़िन्दगी और ख़्वाब देखने की आज़ादी. खुले आसमान के नीचे बेतक्क्लुफ़. पैर पसार लेने के बाद आपके लिए कोई मंजिल मायने नहीं रखती. बेलौस आप. 
बेवजह आप मुस्कुरा सकते हैं. देर रात गए कोई खाली सड़क ना मिले ना सही भीड़ भरे बाज़ार में भी आपके पास गुनगुनाने के लिए कुछ नहीं बहुत कुछ  होता है. जीवन राग . किसी योगी तपस्वी सा आप निर्मूल विचार को थामे बहुत दूर तक चले जाते हैं और ना तो पीछे मुड़ कर देखने का मन करता है और ना ही रत्ती भर थकान होती है. बस चलते जाने का मन करता है. और आगे, और आगे. हर मंजिल से परे. 
माफ़ कीजियेगा. यदि यह विचार समीर आपको व्यथित कर गया तो. किसी युवा के पास अपनी सोच के कोलाज पर उकेरने के लिए बहुत कुछ होता है. बस रंगों का चयन सही होना चाहिए. मेरे रंगों वाले बक्से में कोई रंग नहीं था वही लेने गया था. लौटा हूँ तो सिर से लेकर पाँव तक खुद भी रंगा हूँ और रंगों वाले बक्से में सतरंगी रंग भी हैं. अब खूब खेलूंगा इन रंगों के साथ. 
ग़ालिब ने यह मुझसे तो नहीं कहा था लेकिन बुजुर्गों ने बताया है कि ग़ालिब ने ही कहा था.  कमबख्त इश्क निकम्मा  बना देता है. 
कमबख्त ग़ालिब हर बात जुबान से कहना ज़रूरी तो नहीं. 
खुदा हाफिज, आप के ना चाहने पर भी हम जल्द मिलेंगे. 
मिलते रहेंगे.