flipkart

अब यह संकल्प लेना होगा 
इस देश में रहने वाले राजनीतिक रूप से तो आजाद हैं लेकिन मानसिक रूप से आजादी का टुकड़ा भर भी हम आज तक हम नहीं ले पाये हैं. जिन संघर्षों और आंदोलनों के सहारे हमें आजादी मिली आज हम उन्हें ही महत्व नहीं देते हैं. शहीदों की शहादत पर भी वक्त-बेवक्त प्रश्नचिह्न लगाने वाले कम नहीं हैं. इतने के बाद अगर किसी ने टोक दिया तो उसे संविधान की दुहाई दी जाती है. कहा जाता है कि संविधान में हर एक को अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता है. अब जब संविधान की ही दुहाई दे दी तो कोई क्या करेगा? 
आजादी की लड़ाई लडऩे में महात्मा गांधी का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है. महात्मा गांधी और संविधान निर्माता बाबा भीमराव अंबेडकर के विचार कभी एक नहीं रहे. यहां तक की स्वतंत्रता आंदोलन में भी बाबा और बापू का मतभेद नजर आता है. कई गोष्ठियों में बाबा भीमराव ने देश में दलितों और शोषित वर्गों के लिए आंदोलन करने को ज्यादा तरजीह दी बजाए इसके कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी जाए. गांधी जी ने कई बार इसका विरोध किया. यही वजह थी बाबा और बापू आपको बहुत कम स्थानों पर ही एक साथ नजर आयेंगे. 
अंग्रेजों से जंग जीतने के बाद देश को एक संप्रभु और गणराज्य बनाने की कवायद शुरू हुई. इसके लिए आवश्यक था कि हमारे देश का अपना एक संविधान हो. इसके जिम्मेदारी सौंपी गई बाबा भीमराव अंबेडकर को. संविधान सभा ने दुनिया के कुछ पुराने और उस समय के प्रभावशाली देशों के संविधान का अध्ययन कर भारत का संविधान बना दिया. बिना किसी संदेह यह इस देश के लिए एक गौरवशाली बात थी. आजाद मुल्क का हर शख्स अब आजाद था. उसके लब आजाद थे. किसी भी विषय के बारे में बोलने की उसे पूरी स्वतंत्रता थी. शुरुआत में सब कुछ ठीक रहा. बोलने वाला अपनी मर्यादा और दूसरे की इज्जत का पूरा ख्याल रखता था. धीरे-धीरे यह अनुशासन टूटने लगा. बोलने की स्वतंत्रता अब छूट का रूप लेने लगी. वक्त थोड़ा और बीता. छूट हथियार बन गई और संविधान दुहाई. बोलने वाला कुछ भी बोल कर संविधान का पर्दा डाल देता है.  चौंसठ साला आजादी अब एक ऐसी स्थिति में आ चुकी है जहां एक बार फिर से कई बातों पर विचार करने की आवश्कता है. नेता और प्रजा दोनों अब अपना-अपना राज चलाने में लगे हैं. राजनीतिक रूप से अपरिपक्वता हमारे देश को खाये जा रही है ये सही है लेकिन जनता भी कहीं से परिपक्व है ऐसा नहीं लगता है. राजनेताओं के बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं. इस संबंध में नाना जी देशमुख के एक आलेख की कुछ पंक्तियां याद आती हैं कि आज इस देश में किसी राजनीतिक पार्टी में कोई नेता नहीं है बल्कि नेताओं की राजनीतिक पार्टियां हैं. अब ऐसे में नेताओं से फिलहाल कोई उम्मीद बेमानी के सिवा कुछ नहीं है. लिहाजा आइये इस 15 अगस्त हम और आप संकल्प लें कि नागरिक होने का अपना कर्तव्य हम पूरी निष्ठा से निभाएंगे. 

इस बार कलमाड़ी कैसे रहेंगे?


लीजिए आ गया एक बार फिर छुट्टी वाला दिन। वही दिन जिसकी छुट्टी आपके कैलेंडर में कभी इधर से उधर नहीं होती। वही दिन जब लाल किले की प्राचीर पर भारत तिरंगा फहराता है इंडिया छुट्टी मनाता है। पता नहीं क्यों लेकिन लगता है कि अब शायद ऐसे त्यौहारों पर लोगों में उत्साह नहीं होता। हो सकता है बार-बार एक ही जगह एक जैसा ही प्रोग्राम करने से लोगों में दिलचस्पी कम हो गई हो। इस बारे में मेरा एक सुझाव है। इससे 15 अगस्त के जश्न का जोश दुगुना हो सकता है।
हमें इस बार झण्डा फहराने के स्थान में थोड़ा परिवर्तन करना चाहिए। इस बार झण्डा फहराने के लिए हमें उस स्टेडियम का इस्तमाल करना चाहिए जिसका उपयोग कामन वेल्थ खेलों की ज्यादातर स्पर्धाओं के लिए हुआ है। वहां हम सब को एकत्र होना चाहिए और झण्डा फहराना चाहिए। आखिर यही जगह तो है जहां हमारे देश ने अपनी प्रगतिशीलता अन्य देशों के सामने बताई।
अब सवाल ये है कि हर बार देश का प्रधानमंत्री ही लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त को तिरंगा क्यों फहराये। क्या देश में कोई और नहीं है जो प्रधानमंत्री को थोड़ी राहत दे सके। मेरे पास इसका जवाब है। है ना। अपने कलमाड़ी जी। कसम से ऐसा योग्य और सुशील व्यक्ति मिलना मुश्किल है। देश की बागडोर ऐसे ही आदमी के हाथों में होनी चाहिए। कलमाड़ी जी कि योग्यता कितनी है इस बारे में न जाने कैग की कितनी रिपोट्र्स लिखीं जाएंगी। लेकिन इसके बावजूद कलमाड़ी पुराण खत्म नहीं हो पाएगा। महज एक खेल आयोजन कराने में जो कई अरबों का खेल कर सकता है उसकी योग्यता पर शक करने का तो सवाल ही नहीं उठता। सोचिए कितना अच्छा लगेगा जब कलमाड़ी जी अपने हाथों से तिरंगा फहराएंगे। सच कहता हूं एक बार आजमा के देखने में कोई हर्ज नहीं है। 

हर बात जुबां से कहना ज़रूरी तो नहीं...

मुझे इस बात का पक्का यकीन तो नहीं लेकिन शायद मेरी लेखनी से निकले शब्दों के पास खुद पर खुश होने के सिवा कोई और विकल्प नहीं होता है. लेकिन फिर भी अपने दोस्तों द्वारा पिछले कई दिनों से अपनी आभासी पुस्तिका पर ना लिख पाने की वजहों के बारे में पूछा जाना सुखद रहा. लगने लगा कि रगों में लिपटी एक आग जब कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर शब्द दर शब्द उतरती है है तो कुछ एक यार दोस्त उस आग को धधकते, सुलगते, हाहाकार करते देख खुश होते हैं.  शुक्रिया दोस्तों. 
वैसे जलने का अपना मजा होता है. यकीन जानिए इस बात का पता मुझे भी तब चला जब मैंने जलना सीख लिया. एक ऐसी आग में जो आपको जला कर राख नहीं स्वर्ण बना देती है. बेचेहरा हवाओं में, बेतरतीब बादलों में आपको मकसद नज़र आने लगता है. एक बाँध सा होता है जो उसके स्नेह ज्वार के आने के साथ ही टूट जाता है और आप जी भर के सांस लेते हैं. इसके बाद आपको एक नव जीवन मिलता है. एक गहरी सांस और उसके साथ घुली हुई एक नरगिसी खुशबु. सब कुछ क्षण भर में ही हो जाता है लेकिन हाथों में आया यह मुट्ठी भर आसमान आपको विश्व विजेता होने का एहसास दिला जाता है. अब इसे विरोधाभास कह लीजिये लेकिन अगले ही क्षण एक विश्वविजेता अपना सब कुछ खोकर भी दुनिया की सबसे कीमती चीज़ पा लेता है. एक इबारत ज़िन्दगी और ख़्वाब देखने की आज़ादी. खुले आसमान के नीचे बेतक्क्लुफ़. पैर पसार लेने के बाद आपके लिए कोई मंजिल मायने नहीं रखती. बेलौस आप. 
बेवजह आप मुस्कुरा सकते हैं. देर रात गए कोई खाली सड़क ना मिले ना सही भीड़ भरे बाज़ार में भी आपके पास गुनगुनाने के लिए कुछ नहीं बहुत कुछ  होता है. जीवन राग . किसी योगी तपस्वी सा आप निर्मूल विचार को थामे बहुत दूर तक चले जाते हैं और ना तो पीछे मुड़ कर देखने का मन करता है और ना ही रत्ती भर थकान होती है. बस चलते जाने का मन करता है. और आगे, और आगे. हर मंजिल से परे. 
माफ़ कीजियेगा. यदि यह विचार समीर आपको व्यथित कर गया तो. किसी युवा के पास अपनी सोच के कोलाज पर उकेरने के लिए बहुत कुछ होता है. बस रंगों का चयन सही होना चाहिए. मेरे रंगों वाले बक्से में कोई रंग नहीं था वही लेने गया था. लौटा हूँ तो सिर से लेकर पाँव तक खुद भी रंगा हूँ और रंगों वाले बक्से में सतरंगी रंग भी हैं. अब खूब खेलूंगा इन रंगों के साथ. 
ग़ालिब ने यह मुझसे तो नहीं कहा था लेकिन बुजुर्गों ने बताया है कि ग़ालिब ने ही कहा था.  कमबख्त इश्क निकम्मा  बना देता है. 
कमबख्त ग़ालिब हर बात जुबान से कहना ज़रूरी तो नहीं. 
खुदा हाफिज, आप के ना चाहने पर भी हम जल्द मिलेंगे. 
मिलते रहेंगे. 

ख़ामोशी

अक्सर चुप सी बैठ जाती है ख़ामोशी 
और मुझसे कहती है 
बतियाने के लिए 
कहती कि आज तुम बोलो 
मैं सुनना चाहती हूँ
शब्द ही नहीं मिलते हैं मुझको 
उससे बात करने के लिए
चुप सा रह जाता हूँ 
बस फटी आँखों से देखता हूँ 
वो कहती कि 
तुम भी अजीब हो 
मुझे में ही समो जाते हो 
खामोश हो जाते हो 
बस खिलखिलाकर हंस देती है 
ख़ामोशी.
मैं चुप बस देखता रहता हूँ उसे. 

माँ तो यह भी है...

गंगा का पानी स्थिर है. किनारों पर जमी काई बयां कर रही है माँ की दशा. 
आज भी हम सही अर्थों में उसे माँ का दर्जा नहीं दे पायें हैं. हाँ यह कहते नहीं थकते की यह तो हमारी माँ है. भारतीय समाज में आ रहा बदलाव हमें स्पष्ट रूप से वहां भी दिखता है. अर्थ प्रधान होते भारतीय समाज के लिए शब्दों का भावनात्मक स्वरुप बाज़ार भाव से निर्धारित होता है. हम पैसे खर्च कर अपनी माँ को माँ बनाये रखना चाह रहें हैं. 

कलेजा मुंह  को आता हैं जब आप गंगा की स्थिति से रूबरू होते हैं. लगभग ढाई हज़ार किलोमीटर के अपने लम्बे और कठिन सफ़र में गंगा एक नदी की तरह नहीं बल्कि एक माँ की तरह व्यवहार करती आगे बढती है. जिस तरह से माँ के आँचल में हर संतान के लिए कुछ न कुछ होता है वैसा ही गंगा के साथ है. गंगा कभी अपने पास से किसी को खाली हाथ नहीं लौटाती. जो भी आता है कुछ लेकर ही जाता है. इतने के बावजूद अब गंगा हमारे लिए कोई मायने नहीं रखती. हमने उसे मल ढोने  वाली एक धारा बना कर छोड़ा है. 

राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के अनुसार गंगा बेसिन में रोजाना १२,००० मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है. इसमें से महज ४००० मिलियन लीटर सीवेज को ट्रीट करने की क्षमता वाले ट्रीटमेंट प्लांट लग पायें हैं. गंगा किनारे बसे क्लास १ और क्लास २ के शहरों  से निकला ३००० मिलियन लीटर सीवेज सीधे गंगा की मुख्य धारा में बहा दिया जाता है.  कानपुर जैसे शहर में रामगंगा और काली नदी से बहकर आने वाला कारखानों का अपशिष्ट पूरी गंगा पर भारी पड़ता है. हमने जो भी थोड़े बहुत सीवेज को ट्रीट करने की व्यवस्था की है वो भी समुचित नहीं है. दरअसल भारत में लगाये गए ज्यादातर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट सिर्फ घरेलू सीवेज को ट्रीट करने में सक्षम हैं. जबकि हमारे यहाँ कारखानों से निकले  सीवेज और घरेलू सीवेज दोनों का प्रवाह एक ही सीवर लाईन से होता है. ऐसे में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट घरेलू सीवेज को ट्रीट कर देते हैं हैं लेकिन कारखानों से निकला सीवेज लगभग बिना ट्रीट किये ही गंगा में बहा दिया जाता है. ऐसे में कई धातुएं गंगा के पानी में आकर मिल जाती हैं. कहने को हम सीवेज को  ट्रीट कर रहें हैं लेकिन सही मायनों में हमने महज लम्बी लम्बी नालियों से गुजार कर सीवेज को गंगा में बहा दिया. 

गंगा में लगातार मिल रहे इस तरह के सीवेज से गंगा जल के गुणों में परिवर्तन आ गया है. चूँकि गंगोत्री से निकलती है तो लगभग ३००० मीटर की ऊंचाई से नीचे गिरती हैं. इसके बाद तेज वेग से पत्थरों से टकराते हुए  गंगा आगे बढती है. इस तरह के प्रवाह के कारण गंगा के पानी में आक्सीजन की प्रचुर मात्र घुल जाती है. यही आक्सीजन उसे अमृततुल्य बना देती है. लेकिन जिस तेज़ी से गंगा में औद्योगिक कचरा घुल रहा है उससे गंगा के पानी का गुण बदल गया है. मैदानी इलाकों में प्रवेश के बाद अब गंगा का पानी काफी दिनों तक संग्रह कर के नहीं रखा जा सकता. औद्योगिक कचरे का दुष्परिणाम हम अब अपनी पीढीयों में दिख रहा है. मैदानी इलाकों में गंगा बेसिन में होने वाली खेती में फसलें खराब हो रही हैं. इन फसलों में हेवी मेटल मिले हैं. यह हेवी मेटल गंगा से निकली नहरों से होकर खेतों तक पहुँचते हैं. 

कहने को हम गंगा को माँ का दर्जा देते हैं लेकिन माँ के प्रति हमारी धारणा बदल चुकी है. शायद आपको मेरी बात बुरी लगे लेकिन अब माँ हमारे लिए महज एक शब्द रह गया है जिसमे कोई भाव नहीं होता. 

बोल गिलानी 50 - 50

मोहाली में भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच होने वाला है. भारत के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह इस मैच का लुत्फ़ उठाने जायेंगे. उन्होंने पाकिस्तान के प्रधान मंत्री युसूफ राजा गिलानी को भी न्योता भेजा और गिलानी ने मंजूर भी कर लिया. अब दो-दो प्रधानमन्त्री इस मैच का आनंद उठाएंगे. वो भी जानते हैं कि यह मैच महज एक मैच नहीं है. यह जीने मरने का सवाल है. दोनों टीम्स के खिलाड़ी मैच को बैट और बॉल से ही नहीं हाथ और पैर से भी खेलते हैं. आमतौर पर भारत और पाकिस्तान के बीच का मैच बेहद रोमांचक ही होता है. पूरी दुनिया इसे देखती है. साँसे रोक देने वाला मैच होता है. हालांकि यह सब बातें आप सभी को पहले से पता हैं. इसमें कोई नयी बात नहीं है. 

इस बार मेरे दिमाग में एक आईडिया है. फिफ्टी-फिफ्टी का.मौका होली का है और हम होली में दुश्मनों को भी गले लगा लेते हैं. चैती गुलाब की खुशबू माहौल को गमका रही है. हम अमन की बात तो हमेशा से करते आयें हैं लिहाजा मौका भी है और दस्तूर भी. आ गले लग जा. देखो मैच तो हर बार होता है. इस बार अगर कुछ ख़ास हो जाये तो दुनिया देखे. वैसे फिफ्टी-फिफ्टी के कांसेप्ट में नुकसान भारत का ही है लेकिन फायदा इंसानियत का है.  सन ४७ से खून बह रहा है. तुम गोलियां चलाते हो हम बचाव करते हैं. तुम कश्मीर कश्मीर चिल्लाते हो हम शांति की दुहाई देते हैं. तुम ड्रैगन की पूँछ पकड़ कर दिल्ली के ताज पर बैठने का ख्वाब देखते हो. हम विकास की सीढियां चढ़ ड्रैगन से भी ऊँचा होने की कोशिश में लगे हैं. हमारे देश के लोग बर्फ से ढंकी वादियाँ देखने कश्मीर जातें हैं तो तुम अपने दहशतगर्दो को ठण्ड के मौसम में पहाड़ों की बीच छुपने के लिए भेजते हो. हम बस चलाते हैं दो मुल्कों के लोगों के दिलों को जोड़ने के लिए तो तुम कारगिल में मिर्ची बम छोड़ने लगते हो. हम ट्रेन चलाते हैं 'वीर ज़ारा' के लिए तो तुम 'ब्लैक फ्राईडे' दिखाते हो. फिर भी मेरे यार गिलानी कोई बात नहीं. 

जब तुम्हारा मुल्क आज़ाद हुआ तो तुम्हारे पास न तो खाने के लिए अनाज था और न ही सिर छुपाने के लिए मकान. हमने तुम्हे वो सब दिया जो एक मुकम्मल मुल्क को चाहिए. यह बात और है कि तुमने हमारी कई बस्तियों में वाशिंदों को बेघर किया लेकिन हमने हर बार तुम्हे माफ़ किया. मुंबई में तुमने दहशतगर्दी का मेगा एपिसोड खेला. लेकिन हमने तुम्हारे हर प्रायोजक की दूकान बंद करा दी. लीड रोल करने वाला एक कलाकार  हमारा मेहमान है. अब बतावो गिलानी और क्या चाहिए. 

बात क्रिकेट की करो तो वहां भी तुम कुछ ख़ास नहीं कर पाए हो. हाँ यह ज़रूर है कि शारजहाँ के मैदानों में बेईमानी कर के तुमने कई मैच जीत लिए और अपना रिकॉर्ड अच्छा कर लिया. लेकिन वर्ल्ड कप में हमने हर बार तुम्हे पटखनी दी है. इस बार हम तुम्हे हर गिला शिकवा भुला कर यह ऑफर दे रहें हैं. हम और तुम अगर मैच को फिफ्टी फिफ्टी बाँट ले तो? देखना दुनिया में फिर न कोई ड्रैगन रह जायेगा और न ही कोई दरोगा. सोच लो गिलानी. बात तुम्हारे फाएदे की है. 

तो गंगा को राष्ट्रीय नाला घोषित कर दे सरकार



समझ में नहीं आता की केंद्र सरकार अब इस काम में इतनी देर क्यों कर रही है. बिना देर किये केंद्र सरकार को राज्य सरकारों को विश्वास में लेकर सदानीरा को राष्ट्रीय नाला घोषित कर देना चाहिए. गंगा की लगातार बिगड़ती सेहत और केंद्र सरकार के प्रयासों को देखते हुए आम जन को इस बात की पूरी उम्मीद है कि जल्द ही गंगा नदी नहीं रह जाएगी बल्कि मल जल ढ़ोने वाले एक नाले के स्वरुप में आ जाएगी.

यह दोनों तस्वीरें वाराणसी के रविदास घाट की हैं
घाट के करीब ही अस्सी नाला सीधे गंगा में गिरता है 
गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक लगभग २५२५ किलोमीटर का सफ़र तय करने वाली गंगा अपने किनारों पर बसे करोड़ों लोगों को जीवन देती है. देव संस्कृति इसी के किनारे पुष्पित पल्लवित होती है तो दुनिया का सबसे पुराना और जीवंत शहर इसी के किनारे बसा है. माँ का स्थान रखने वाली गंगा भारतीय जनमानस के लिए अत्यन्त आवश्यक है. मोक्ष की अवधारणा में गंगा है. मृत्यु शैया पर पड़े जीव के मूंह में गंगा जल की दो बूंदे चली जाएँ तो उसको मोक्ष मिलना तय माना जाता है लेकिन अब यह अवधारणा बदलने का वक़्त आ गया है. सदानीरा अब अमृतमयी जल से नहीं घरों से निकलने वाले सीवर से प्रवाहमान है. जीवन मूल्यों की बलि चढ़ा कर होने वाले विकास का नतीजा टिहरी बाँध के बन जाने के बाद तो गंगा की धारा बिजली के तारों में चली गयी. अब गंगा का पानी ज़मीन पर नहीं टिहरी में बनने  वाली बिजली में चला गया है. 

गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के नाम पर इस देश के नौकरशाहों और राजनेताओं ने अपने बैंक एकाउंट में पैसे की गंगा बहा ली. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा एक्शन प्लान के पहले चरण में लगभग एक हज़ार करोड़ से भी ज्यादा की धनराशि खर्च की गयी. लगभग २५० से अधिक परियोजनाएं  पूरी हुयीं. गंगा एक्शन प्लान का पहला चरण अपने तय समय से सालों देर तक चला. अभी चल ही रहा था की गंगा एक्शन प्लान के दूसरे चरण की योजना बन गयी. अब गंगा एक्शन प्लान का दूसरा चरण चल रहा है. इसके लिए लगभग बाईस हज़ार करोड़ दिए गयें हैं. लेकिन गंगा पहले से और अधिक गन्दी हुयीं हैं यह एक अँधा भी बता सकता है.

हिन्दुओं  के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं गंगा और बनारस भी. यहीं का उदाहरण ले लीजिये. बनारस में रोजाना लगभग २५ एमएलडी सीवेज निकलता है. गंगा एक्शन प्लान के पहले चरण में १००० करोड़ रूपये फूंकने के बाद भी इस शहर में महज १० एमएलडी सीवेज को ट्रीट करने का इंतज़ाम हो पाया है. यानी १५ एमएलडी सीवेज सरकारी रूप से सीधे गंगा में बहाया जा रहा है. इसके साथ आपको यह भी बता दूं की १० एम एल डी  सीवेज को ट्रीट करने के लिए जो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं उनमें से अधिकतर बिजली न रहने पर नहीं चलते हैं यानी इस दौरान अगर प्लांट की टंकी ओवर  फ्लो हुयी तो सीवेज गंगा में बहा दिया जायेगा. यह आंकड़ा महज एक शहर का है. इससे उन सभी शहरों का अनुमान लगा सकतें हैं जो गंगा के किनारे बसे हैं. लगे हाथ आपको कैग के दिए एक और आंकड़े के बारे में बता देते हैं. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक आज भी लगभग छब्बीस सौ करोड़ लीटर सीवेज गंगा में बहाया जा रहा है.

राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य प्रोफेसर बीडी त्रिपाठी की लैब में हुयी शोध बताती है की गंगा का पानी अब आचमन के लायक भी नहीं बचा है फिर स्नान की तो बात भूल जाइये. यह हाल तब है जब एक हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि और २५० से ज्यादा परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं. गंगा एक्शन प्लान का दूसरा चरण चल रहा है और इसके तहत लगभग ४५० परियोजनाएं चलनी है या चल रहीं हैं. केंद्र सरकार ने गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण बना कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली. गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर खाने कमाने का नया जुगाड़ बना लिया है. गंगा की सेहत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है. पानी का रंग या तो गहरा हरा हो गया है या काला पड़ गया है. प्रवाह नाम मात्र का भी नहीं है. ऐसे में तो केंद्र सरकार के लिए यही अच्छा होगा की वह गंगा को राष्ट्रीय नदी की जगह इसे राष्ट्रीय नाला घोषित कर दे. 


युगान्तरों तक...

प्रात के पहर में
अप्रतिम रूप से फैली
अरुणिमा की सिन्दूरी विमायें
करती हैं सर्जना
प्रीत तूलिका की
प्रति, दिन- बरस - युग

झुरमुटों से झांकती
अलसाई पड़ी सुथराई
बहकर बयार संग
गाती राग फाग का
अटा पड़ा है लालित्य
हर, पुष्प-विटप-निकुंज पर

मुकुलित पड़े हैं सब
कचनार-कुमुदनी औ 'कदम्ब'
भिन्न रंगों में रंग गए
खेत-बाग-वन

इक रंग तो मुझ पर भी है
रहेगा युगों तक
नेह-प्रेम -औचित्य का
गहराता जाता है
हर क्षण - पल -पहर

देता है अपरिसीम पुलकित स्नेह
अंतस से करता आलिंगन
गूंजता है चहुं ओर
चटक जैसे अंशुमाली

रंग...
बन हर्षिल प्रभाएं
करता नव्याभिमाएं
भरता पुष्प नवश्वास के
हर शिरा - रोम -व्योम में


देखो ना 'सांवरे'
फाग के इन
लाल-पीले-हरे-नीले
विविध रंगों से
कितना चटक है
तुम्हारी प्रीत का रंग
रहेगा मुझ पर बरसों-बरस
युगान्तरों तक...


(पंक्तियाँ कुछ इस तरह से शब्दों के साथ बुनी गयीं हैं की अर्थ सहज ही स्पष्ट हो जाता है. पार्श्व भाव भी ऐसा की मोहपाश में बंधना निश्चित है. सम्बोधन पूर्ण तो नहीं है लेकिन मेरे अत्यंत प्रिय मित्र द्वारा लिखी गयी यह कविता मुझे बहुत अच्छी लगी और लगा की अपने ब्लॉग पर इसे प्रकाशित करूंगा (बिना अनुमति के भी) तो मेरा ब्लॉग रसमयी हो जायेगा.)

इस फाल्गुन न चढ़ेगा कोई रंग सांवरी


फिर एक बार फाल्गुन आ गया है. मदमस्त कर देने वाली एक सुगंध नथुनों से होती हुयी अंतस तक उतर गयी है. इस बार का फाल्गुन हर बार से कुछ अलग है. यह तो ज़रूर है की आने वाली जेठ में धूप त्वचा को झुलसा देगी लेकिन इस विचार से दूर मैं आज फाल्गुन की मुलायम ठण्ड वाली हवा में घुली एक खुशबू को महसूस कर रहा हूँ. शायद यह हवा इस लिए भी अच्छी लग रही है क्योंकि इसमें तुम्हारी बदन से आती महक की अनुभूति होती है. किसी मैदान के किनारे लगे पलाश के पेड़ों पर लगे फूल अचानक उद्देश्यपरक लगने लगे हैं. इन्हें छूना बिलकुल तुम्हरे स्पर्श का एहसास कराता है. इन फूलों को उठा कर देर तक अपनी हथेलियों के बीच दबाये रहता हूँ. लगता है मानो कुछ देर तक तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में रहा. इसके बाद जब हथेलियों को खोलता हूँ तो उनपर लाल रंग चढ़ चुका होता है. चटख लाल रंग, खुशबूदार लाल रंग. उत्साह और उर्जा का प्रतीक लाल रंग. कुछ ऐसा ही तो तुम्हारी हथेलियों को अपनी हथेलियों के साथ जोड़ने पर महसूस होता है.
इस फाल्गुन में सब के साथ रंग खेलूंगा. जम कर खेलूंगा. सुबह से भरी दोपहर तक खेलूंगा. लेकिन यकीन मानो मेरे ऊपर अब कोई रंग चढ़ने वाला नहीं है. शायद इसीलिए मैं अब निश्चिन्त हो गया हूँ. सतरंगी रंग में तो मैं रंग ही चुका हूँ. नित नए हो जाते हैं यह रंग. छुड़ाने की कोशिश तो मैं कभी करता नहीं हाँ यह रंग रोजाना कुछ और ही चटख होते जा रहें हैं. दोस्त पूछते हैं मुझसे की कहाँ से लाया मैं यह रंग? मैं हंसकर रह जाता हूँ.
हर तरफ लोग उल्लास और उत्साह से भरे हैं. मैं भी भरा हूँ. बस कारण कुछ अलग है परिणाम तो सामान ही है. हर वक़्त तुम्हारी यादों के साथ रहता हूँ. मदनोत्सव मना रहा हूँ. रितुराग तो सभी गा रहें हैं मैं भी गा रहा हूँ शायद सुर कुछ अलग हैं. अचानक कई भाव आ रहें हैं और चलें भी जातें हैं. कुछ मुकाम ऐसे हैं जो मेरे इन सभी भावों से परिचित हैं. आंसू हो, बेचैनी हो, गुस्सा हो या मन में भरा असीमित स्नेह. अचानक बारिश होने लगती है और मैं उससे बचने का कोई प्रयास नहीं करता. इसमें तुम्हारा नेह होता है न इसीलिए. बहुत दूर तक यूं चला जाता हूँ. यह कटाई मत सोचना की अकेला हूँ. नहीं हरगिज नहीं. हर वक़्त कोई रंगीन परछाई मेरे साथ चलती है. मैं कहीं सहसा रुकता हूँ, ठिठकता हूँ तो वो मेरे पास आकर पूछती है, क्या हुआ? मैं उससे झूठ ही कह दूं की मैं अकेला हूँ तो धीरे से मेरे कानो में कहती है, नहीं. तुम अकेले नहीं हो. मैं हूँ तुम्हारे साथ. आह. इतना सुनाने के बाद न जाने कहाँ से नयी ऊर्जा आ जाती है भीतर. मैं चल पड़ता हूँ फिर एक बार तुम्हारे साथ. अब रुक नहीं सकता क्योंकि बहुत लम्बी दूरी जो तय करनी है.

ई सरवा अपने के बहुत बड़ा साहित्यकार लगावत हव

मोहल्ला अस्सी की शूटिंग के दौरान काशी नाथ सिंह के लिए आई ये अभिव्यक्ति बता रही है की फिल्म में अस्सी की आत्मा मरी नहीं है.

कुछ ऐसे ही वाक्य का प्रयोग किया था उसने उन महानुभाव के लिए। वही जिन्होंने गालियों के प्रति एक ऐसा नजरिया पेश कर दिया कि अब गाली खाना सभी के लिए सम्मान का विषय हो गया। हालांकि उन्होंने कभी ये नहीं सोचा होगा कि कभी इस तरह से कोई उनका सम्मान करेगा। इससे पहले कि आप मुझे गरियाने के मूड में आ जाये मैं आपको बता ही देता हूं कि माजरा क्या है।
दरअसल पूरा वाक्या बनारस के अस्सी घाट का है जहां डाक्टर चंद्र प्रकाष द्विवेदी अपनी फिल्म मोहल्ला अस्सी की शूटिंग कर रहे हैं। फिल्म की कहानी प्रख्यात हो चले साहित्यकार काशीनाथ सिंह की अनुपम रचना काषी का अस्सी पर आधारित है। शूटिंग के दौरान ही एक दिन मैं भी वहां पहुंचा। काशी नाथ सिंह जी भी वहीं मौजूद थे। उनके आस-पास कुछ लोग टहल रहे। कुछ ऐसे भी थे जो उनका ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते थे। दुर्भाग्य से काशी नाथ सिंह ने उनकी ओर ध्यान दिये बिना ही पास खड़ी वैनिटी वैन की ओर कदम बढ़ा दिये। ये बात पास खड़े कुछ लोगों को नागवार गुजरी और उन्होंने बेहद सहज तरीके से इतना ही कहा कि 'ई सरवा अपने के बहुत बड़ा साहित्यकार लगावेला।' अपने बारे में ये सम्मान भरा वाक्य सुनने के लिए न तो काशी नाथ सिंह जी वहां नहीं थे।
गालियों को लेकर काशी नाथ सिंह जी ने प्रयोग किये वो एक खांटी बनारसी ही कर सकता है। गालियों का एक दर्शन है और उसकी समझ एक बनारसी को होती है। किस समय कौन सी गाली दी जाती है ये एक बनारसी को पता होता है। आमतौर पर गाली के लिए सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होता है लेकिन बनारस के जीवन से अगर गाली को निकाल दिया जाये तो कुछ बचता ही नहीं हैं। उन्मुक्त और सहज विचार प्रवाह के लिए गालियों की नितांत आवश्यकताहोती है।
काशी का अस्सी उपन्यास में काशी नाथ जी ने पूरी कोशिश की है कि ग्लोब्लाइज्ड होते सिनेरियो को पूरी तरह लोकलाइज्ड मैनर में पेश कर दिया जाये। अस्सी की अड़ी एक ऐसा ही स्थान है जहां दुनिया जहान की हर बात लोकल मैनर में आती है और ग्लोब्लाइज्ड तरीके से उसका विश्लेषण किया जाता है। एक चाय की दुकान के इर्द-गिर्द पूरी दुनिया घूमती हुई नजर आयेगी आपको। संसार की कई बड़ी हस्तियों की आत्मायें भी अपने बारे में लोगों की राय जानने के लिए यहां आती हैं। ऐसा लोग कहते हैं।
इस मोहल्ले पर फिल्म बन सकती है इसका तो मुझे यकीन था लेकिन फिल्म डाक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी बनायेंगे ये उम्मीद नहीं थी। मोहल्ला अस्सी बनाने से पहले अस्सी इलाके को महसूस करना बहुत जरूरी है। जिसने अस्सी इलाके को महसूस नहीं किया उसके लिए फिल्म बना पाना न तो संभव है और न ही उचित है। इसके बावजूद मेरे मन में ये आशंका थी कि मुम्बईया रंग का आदमी क्या वाकई में कुछ ईमानदार कर पायेगा। इसी आशंका को लेकर बनारस के अस्सी घाट पर शूटिंग देखने पंहुचा था। वहां जब आदरणीय काशी नाथ सिंह के बारे में सुना कि 'ई सरवा अपने के बहुत बड़ा साहित्यकार लगावत हव' तब मेरी आशंका दूर हो गई। अब लगता है कि शीला की जवानी से खेल रही जनता को मुन्नी का स्वाद भी फीका लगेगा जब वो बनारस का रस चख लेगी।