भाग जाओ, नक्सली आ रहें हैं......

१९ मई को राहुल गाँधी की उत्तर प्रदेश के अहरौरा में सभा चल रही थी..उसी समय मेरे एक पत्रकार मित्र ने फ़ोन किया और कहा कि देश का पर्यटन मंत्री आपके करीब पहुंचा है आप वहां है कि नहीं ? मैंने राहुल गाँधी के लिए यह संबोधन पहली बार सुना था...मुझे क्षण भर में ही विश्वास हो गया कि मेरा कमजोर राजनीतिक ज्ञान अब शुन्य हो चला है...मैंने अपने मित्र से पूछा कि भाई यह राहुल गाँधी ने पर्यटन मंत्रालय कब संभाला? सवाल का अंत हुआ ही था कि जवाब शुरू हो गया मानो मित्र महोदय सवाल के लिए पहले ही से तैयार थे....खैर एक अखबार में कार्यकारी संपादक का पद संभाल रहे मित्र ने बताया कि उन्होंने राहुल गाँधी का यह पद स्वयं सृजन किया है...क्योंकि राहुल गाँधी पूरे देश के पर्यटन पर ही रहते हैं....लिहाजा उनके लिए इससे अच्छा मंत्रालय और क्या हो सकता है....मैं मित्र के तर्क से सहमत हो रहा था...अब तो मैं मित्र की बात आगे बढा रहा था..लगे हाथ मैंने राहुल को पर्यटन मंत्री नहीं बल्कि स्वयंभू पर्यटन मंत्री का दर्जा दे दिया....
वैसे मेरी इस बात से हाथ का साथ देने वाले खुश नहीं होंगे लेकिन कमल और हाथी के सवारों को बोलने का मौका मिलेगा....राहुल गाँधी का अहरौरा दौरा वाकई शानदार रहा...मैं वहां गया तो नहीं लेकिन जो लोग गए थे उन्होंने भीड़ के लिहाज से इस दौरे को सफल बताया.....अपने पूरे भाषण में राहुल ने कहीं भी इलाके में नक्सल आतंक के बारे में बातचीत नहीं की ...मतलब साफ़ था ....राहुल उस दाग को अपने सफ़ेद कुरते पैजामे पर लगने देने से बच रहे थे जिसे देश पर लम्बे समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी ने दिया था...सोनभद्र के जंगलों में नक्सल की पौध जिस कमजोर राजनीति ने उगाई राहुल उसी राजनीति की नयी पौध लगते हैं.....आखिर क्या कारण था की राहुल इस ज्वलंत मुद्दे पर ख़ामोशी की चादर ओढ़े रहे.......
मैं यहाँ राहुल के अहरौरा दौरे के सहारे महज कांग्रेस सरकार की नक्सल और माओवाद जैसी समस्याओं पर नीतियों की ओरे इशारा करना चाहता हूँ....जिस तरीके से नक्सलियों ने पश्चिमी मिदनापुर में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को निशाना बनाया उससे तो यही लगता है की इस देश में सरकार का खौफ इन दहशतगर्दो को नहीं है......देश में नक्सल वाद किस कदर अपनी पहुँच बढ़ा चुका है उसकी एक छोटी सी झलक दिखाने के लिए आपको एक ख़बर से रूबरू कराता हूँ.....मिदनापुर में रेल को निशाना बनाया गया और वाराणसी में पिछले दो दशकों से देश के इन दुश्मनों को कारतूस पहुँचाने वाला एक व्यक्ति पुलिस की हिरासत में आया..... इन दोनों ख़बरों से साफ़ है कि देश के हर कोने में नक्सलवाद अपनी जड़े जमा चुका है.....
केंद्र सरकार अभी भी नक्सलवादियों से बातचीत कर रही है....दंतेवाड़ा में जवानों को मौत की नींद सुलाने वाले नक्सलियों ने अब मासूम नागरिकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है.....झारग्राम में ट्रेन को निशाना बना कर नक्सल वादियों ने बता दिया है की अब वो नक्सलबाड़ी की सरहद से बहुत दूर चले आयें हैं....साथ ही अब उनकी वैचारिक लड़ाई अपनी राह से भटक चुकी है..... ऐसे में वंचित समाज की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले नक्सलवादियों से देश को खतरा उत्पन्न हो गया है.....

केंद्र सरकार की इस पूरे मुद्दे पर जो रणनीति है वो आम जनता में विश्वशनीय नहीं है.......झारग्राम में हुए हादसे के बाद जिस तरीके से इसके लिए जिम्मेदार तत्वों को लेकर विरोधाभाषी बयान जारी हुए वो इसका सबूत है....ये ठीक है की सरकार बिना किसी ठोस सबूत के कुछ भी नहीं कहना चाह रही थी...लेकिन कम से कम उसके जिम्मेदार मंत्री ये तो कह सकते थे की यदि इसमें किसी भी तरह से नक्सलवादियों या माओवादियों का हाथ हुआ तो उन्हें छोड़ा नहीं जायेगा...इससे देश की जनता को एक सन्देश जाता और सरकार की आतंरिक सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे को सुलझाने के प्रति इच्छाशक्ति (भले ही दृढ नहीं ) तो जाहिर होती, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया बल्कि पूरी घटना पर एक रहस्य का आवरण डाल दिया.....ऐसे में साफ़ है की अब ये मुद्दा भी राजनीति के चश्मे से देखा जा रहा है...कोई भी बयान या कदम उठाने से पहले राजनीतिक लाभ और हानि की पड़ताल की जा रही है...
अगर यही हाल रहा तो नक्सलवाद ख़त्म हो पायेगा इसमें शक है...
सरकार ने ट्रेनों पर हमले रोकने का जो तरीका ईजाद किया है वो लाजवाब है..अब ट्रेने ही नहीं चलायी जाएँगी...अगर किसी दिन सरकार आप से कहे की आप के शहर में नक्सली हमला करने वाले हैं लिहाजा अपने घर छोड़ कर भाग जाइये तो इसमें कोई हैरानी मत प्रदर्शित कर दिजीयेगा.......आखिर हमारी सरकार इस समस्या से निबट जो रही है उसकी कीमत हमें और आपको तो ख़ुशी ख़ुशी चुकानी ही होगी न.....क्यों 'सरकार' ?

जिंदा कौम का इंतज़ार .....

आखिर किस आधार पर बात हो माओवादियों से? क्या बसों पर हमले और ट्रेन्स पर हमले को लेकर बातचीत होगी ? पिछले दिनों जब प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे उस समय कहीं से भी नहीं लगा था कि केंद्र सरकार आतंरिक सुरक्षा के मामले में कोई बड़ा कदम उठाने जा रही है... पश्चिमी मिदनापुर के जिस इलाके में यह हादसा हुआ है उस ट्रैक को पिछले छह महीने के भीतर माओवादियों ने कई बार निशाना बनाया....कभी देश के इतिहास में पहली बार किसी ट्रेन का अपहरण किया तो कभी चलती ट्रेन पर गोलियां बरसाईं...और अब यह करतूत...क्या सरकार को इस बात को मान चुकी है कि बातचीत होती रहे खून खराबा तो चलता ही रहेगा...आखिर कौन सी बातचीत हो रही है....? क्या किया जा रहा है?....नक्सल और माओवाद जैसी समस्या से निबटने में सरकार का कोई भी कदम क्यों नहीं निर्णायक साबित हो रहा है.....पश्चिमी मिदनापुर में हुआ रेल हादसा साफ़ बता रहा है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार पूरी तरह से देश में खतरे का घंटा बजा रहे इन वैचारिक आतंकवादियों के आगे घुटने टेक चुकी है...और अब तो खुली छूट है नागरिकों का खून बहाने की ...विचारों की लड़ाई में अब बम धमाके होते हैं ....निरीह लोगों की जाने ली जाती हैं.....सरकार को पता था कि माओवादियों ने इस सफ्ताह को 'काला सफ्ताह' घोषित कर रखा है...लेकिन उसके बावजूद सरकार ट्रेन को निशाना बनने से नहीं रोक पायी...क्या कहेंगे आप इसे? क्या यह सरकार की नाकामी नहीं है? बयां दिए जा रहें है मुआवजा घोषित हो रहा है...रेलवे में नौकरी भी मिल जाएगी.....लेकिन जो लोग मारे गए उनके जाने से रिश्तों में आये खालीपन को भीख में मिली नौकरी भर देगी क्या?
रोजाना हमारे सुरक्षा बलों की कुर्बानी ली जाये...देश के नागरिक अपने ही देश में कहीं भी निशाना बनाये जा सकते हैं....लेकिन सरकार को इस बात की कोई परवाह नहीं है.....एक नागरिक की मौत हो या एक सौ नागरिकों की सरकार तो बातचीत में यकीन करती है ना...वोह तो बस बातचीत करती है... शर्म आती है ऐसी सरकार पर जो अपने ही देश में नागरिकों को सुरक्षित नहीं रख सकती.....नपुंसक राजनीती के गर्भ से कभी किसी देश को विकास रुपी संताने नहीं दी जा सकती......हे इस देश के शांति प्रिय नागरिकों अब तो चेतो...मुर्दे की मानिंद खामोश रहने से अब कुछ नहीं होगा...अगर हम जिंदा कौम के नागरिक हैं तो इंतज़ार क्यों?

एक माँ थी !

आज माँ का दिन है...अफ़सोस है की मैं यह बात आपको शाम का अँधेरा होने के बाद बता रहा हूँ लेकिन इस बात का यकीन भी है की आप की जानकारी मेरे बताये जाने का मोहताज नहीं होगी...
आज एक लड़की का दसवां भी है...या शायद एक बेटी का भी ? आज एक औरत को पेरोल भी मिली है या शायद एक माँ को अपनी बेटी के दसवें और तेरहवें में शामिल होने की कानूनी अनुमति भी मिली है?
हालाँकि मेरा कुछ भी लिखना इस नज़रिए से देखा जायेगा की मैं निरुपमा को न्याय दिलाने की बात करने वाला हूँ या फिर दकियानूसी विचार धारा का पोषक हूँ....लेकिन इन दोनों ही तरह की बातों से अलग होकर मैं कुछ लिखने की कोशिश ज़रूर कर रहा हूँ....पैराग्राफ बदलते ही निरुपमा का नाम गया...मुझे जहाँ तक लगता है की आप सभी निरुपमा से वाकिफ होंगे इसीलिए इस नाम को लिखने से पहले कोई भूमिका नहीं लिखी....वैसे मैंने निरुपमा को उसकी दुखद मौत के बाद जाना है...निरुपमा की मौत की खबर सुनते ही मेरे दिमाग में उसके घर वालों का ख्याल सबसे पहले आया था...लेकिन जब पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आई तबसे तो घर वालों का ही ख्याल रहता...आज हमारा देश तरक्की कर चुका है...कानून से ऊपर कुछ नहीं होता...हर मौत सबूतों के आधार पर हत्या, आत्महत्या, घटना कही जाती है....निरुपमा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ...पहले सबूत बता रहे थे की यह एक आत्महत्या है लेकिन फिर सबूतों ने रंग बदला तो यह एक हत्या करार दी गयी...लिहाजा पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए एक महिला को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.....लोग कहते हैं की महिला रिश्ते में निरुपमा की माँ लगती है...बड़ा अजीब लगता है...ऐसे वाक्ये बहुत कम आते हैं जब किसी महिला को रिश्ते में बेटा या बेटी लगने वाले लड़के या लड़की की मौत का 'ज़िम्मेदार' मना जाना जाता है...क्षमा चाहूँगा यहाँ मैं 'आरोपी' शब्द का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा हूँ क्योंकि आप लोगों ने बताया है कि माँ तो जिम्मेदारियां उठाती है तो मुझे लगता है की अपने बच्चों को मौत की नींद सुलाने में भी माँ ज़िम्मेदारी ही निभाती होगी....
बात आगे बढ़े इससे पहले आपको एक पुरानी फिल्म में अदा किये गए संवाद का एक हिस्सा याद दिलाता हूँ....."रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं......" मुझे नहीं लगता की मेरे इस टुच्चे से ब्लॉग पर लिखी गयी इस पोस्ट को पढ़ने वाला कोई ऐसा भी होगा जो इस संवाद को भूल गया होगा ....खैर छोडिये , वैसे यह जानता था की इस फिल्म में संवाद लिखने वाले ने रिश्ते में बाप ही क्यों बनाया? लेकिन जिस तरीके से कोडरमा पुलिस ने काम किया है उससे अब यह संवाद लिखने का रास्ता साफ़ हो गया है कि "रिश्ते में तो मैं तुम्हारी माँ लगती हूँ..." और इसके बाद कलाकार अपने कथित बच्चे के साथ मारपीट कर सकती है......
माँ एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ निकाल पाना मेरे जैसे लोगों के लिए संभव नहीं है...पूरी दुनिया माँ ही तो है.... सभी मदर डे मना रहे हैं और एक माँ अपनी बेटी की मौत का आरोप लपेटे उसका दसवां...शायद यह दुखद है...क्योंकि महज खबरिया निगाह से देखने वाले इसे मजाक में ले सकते हैं लेकिन ह्रदय की गहराई से सोचन वाले वाक्यात पर दुखी होंगे...इस समय यह बात कहना बहुत मुश्किल है कि एक माँ कभी अपनी संतान का गला नहीं घोंट सकती लेकिन कहे बिना रहा भी नहीं जा रहा है.....
लगे हाथ बात उस प्यार कि भी कर ली जाये जिसके चलते निरुपमा की जान गयी...यकीन प्यार एक कोमल एहसास है, यह मनुष्य को उसके अंतस तक एक स्फूर्त अनुभव कराता है....प्यार को प्रेम कहे तो यह और भी बेहतर अनुभूति होती है...पवित्रता का आभास होता है..प्रेम तो अमर होता है...क्या कभी प्रेम किसी मनुष्य को मृत्यु की ओर भी उन्मुख कर सकता है....?यह एक बड़ा सवाल है जिसको समझना हमारे संपूर्ण समाज के लिए ज़रूरी हो गया है क्योंकि इस देश के लोगों को अब 'ऑनर किलिंग' के बारे में पाता चल चुका है.....निरुपमा और प्रियभांशु ने एक दूसरे से 'प्यार' किया या 'प्रेम' यह तो पता नहीं लेकिन माँ और प्रेम इन दोनों ही एहसासों के साथ कहीं भी मौत का जुड़ाव नहीं होता......लिहाजा लगता है कि दोनों ही एहसासों को सबूतों की निगाह से गुमराह किया गया है....
मेरी इस पोस्ट को पढ़ने वाले कई लोग ऐसे होंगे जो यह नहीं समझ पाएंगे कि मैं आखिर कहना क्या चाह रहा हूँ.....? खैर कोई बात नहीं आप कोशिश कीजिये मेरे और मेरी पोस्ट के बारे में कोई राय बनाने की, मैं इस बात पर सोचने की कोशिश करता हूँ कि मदर डे मना रहे इस देश में क्या माँ शब्द के मायने बदल गएँ हैं. ....हालांकि इसमें एक दिक्कत भी है...बार बार मेरे जेहन में एक महिला का चेहरा उभर रहा है जो आज से कुछ दिन पहले तक एक मृत लड़की की माँ थी.....

गंगा के लिए निर्णायक आन्दोलन की ज़रुरत




मैं जब इस पोस्ट को लिख रहा हूँ उसके कुछ ही देर बाद दुनिया की सबसे पुरानी जीवंत नगरी काशी में विश्व की पवित्रम नदियों में से एक 'गंगा' की दुर्दशा पर चिंतन करने के लिए देश के धर्माचार्य, नदी वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और बुद्धजीवी एक साथ बैठेंगे....गंगा के इर्द गिर्द रहने वाली करोड़ों लोगों की आबादी से लेकर सनातन संस्कृति में आस्था रखने वाले भी इस तरह की बैठकों से बड़ी उम्मीदें लगा कर रखते हैं....लेकिन यह उम्मीदें कितनी साकार होती हैं यह तो उन्हें पता ही है....
दरअसल गंगा को लेकर किये जा रहे सरकारी प्रयासों का सच यह है की गंगा का जल अब आचमन योग्य भी नहीं बचा है....यह एक हालिया शोध से स्पष्ट हो चुका है... गंगा के किनारे कई छोटे बड़े शहर बसे हुए हैं जिनके जल मल को माँ का दर्जा रखे वाली गंगा रोज अपने आँचल में रख रही है....
अब तक गंगा को साफ़ करने के लिए केंद्र सरकार एक हज़ार करोड़ से अधिक की धनराशि खर्च कर चुकी है...यह कैग की रिपोर्ट है....गंगा के लिए ही देश की सबसे महंगी कार्ययोजना गंगा एक्शन प्लान(गैप) को हरी झंडी दी गयी थी...गंगा एक्शन प्लान दो चरणों में चला था..... पहला चरण पूरा हो चुका है और दूसरा चरण अभी भी चल रहा है.....गैप के प्रथम चरण में गंगा को साफ़ करने के लिए दो सौ इकसठ स्कीम्स चलायी गयी थी..इनमे से दो सौ उनसठ को पूरा माना गया....वहीँ गैप के दूसरे चरण में कुल चार सौ पंचानबे योजनायें चलायी जा रहीं और इन कार्य योजनायों की लागत बाईस सौ करोड़ रूपये होने की उम्मीद है....सरकारी आंकड़ों की माने तो इनमे से ज्यादातर पूरी हो चुकी है....यानी सरकारी तंत्र अपने हिसाब से गंगा को साफ़ कर चुका है...लेकिन सच्चाई क्या है यह भला कैसे सरकारी फाईल्स में समा सकती थी....गंगा की दशा दिन पर दिन बिगडती ही गयी...जनता का जबरदस्त दबाव बना तो सरकार ने एक बार फिर से उछलकूद शुरू की...प्रधानमन्त्री ने गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दे दिया और और एक नए प्राधिकरण का गठन भी कर दिया जो गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए फिर से नयी योजनायें तैयार करेगा...लेकिन आपको शायद यह नहीं पता होगा की उच्च स्तरीय यह प्राधिकरण गंगा नदी के ऊपर चल रही किसी भी गतिविधि को क्लीरेंस देने के लिए सेपरेट मैकेनिज्म नहीं होगा...यानि कुछ आसान शब्दों में कहें तो गंगा के ऊपर चल रही किसी कार्य योजना को गंगा की सेहत के हिसाब से खराब मानते हुए भी यह प्राधिकरण तत्काल कोई कदम नहीं उठा सकता....तो इस पेंच के बाद आप समझ सकते है कि सरकार गंगा की सफाई को लेकर कितनी चिंतित है.....
लगभग पच्चीस साल पहले स्वर्गीय श्री राजीव गांधी ने गंगा को साफ़ और प्रदूषण मुक्त करने कि जो पहल की थी उसे तो इस देश के नौकरशाह मिलजुल कर खा गए....वर्तमान प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने एक बार फिर सरकारी तंत्र को खाने पीने का इंतज़ाम कर दिया है....राष्ट्रीय नदी गंगा को प्रदुषण मुक्त करने के लिए एक बार फिर से करोड़ों रूपये का बजट बनाया गया है....
इस सब के बाद साथ ही साथ आपको यह भी बता दे कि मैदानी इलाकों में पहुँचने के बाद गंगा का जल कहीं भी स्नान योग्य नहीं बचा है...चूँकि बात शुरू हुयी थी वाराणसी से लिहाजा वाराणसी में ही गंगा की स्तिथी से खत्म भी होनी चाहिए....
वाराणसी में रोजाना लगभग पच्चीस करोड़ लीटर सीवेज वाटर निकलता है ...सरकार वाराणसी में गंगा एक्शन प्लान के दो चरणों और पच्चीस सालों की लम्बी अवधि के बाद महज दस करोड़ लीटर सीवेज वाटर को ट्रीट करने की व्यवस्था कर पायी है ...यानि पंद्रह करोड़ लीटर सीवेज वाटर सीधे गंगा में सरकारी रूप से गिरा दिया जाता है....अब लगे हाथ एक और सचाई भी सुन लीजिये...आपको लग रहा होगा कि चलो कम से कम दस करोड़ लीटर सीवेज तो ट्रीट किया जा रहा है तो आपको बता दें कि वाराणसी में बने ट्रीटमेंट प्लांट्स बिजली ना रहने पर बेकार होते है ...और वाराणसी में विद्युत व्यवस्था का क्या हाल ह यह आपको पता ही होगा ...यानी कुल मिलाकर वाराणसी में बारह से अट्ठारह घंटे ही ट्रीटमेंट प्लांट्स चल सकते हैं...बाकी समय सीवेज सीधे गंगा में बहा दिया जाता है......अब इतनी बातों से आप खुद ही समझ सकते है गंगा को लेकर किये जा रहे सरकारी प्रयास कितने कारगर हैं....ऐसे में बुजुर्गों कि एक बात ज़रूर याद करनी चाहिए कि बहता पानी कभी मृत नहीं होता लेकिन जब किसी नदी को बाँध दिया जाये तो उसका पानी मार जाता है...आज गंगा के अविरल प्रवाह को यदि बरकरार रखा जाये तो शायद हालत इतने ना बिगड़े......वाराणसी में हो रही गंगा चिंतन बैठक में शामिल होने वाले महानुभाव हों या फिर आम जनता यदि इससे कम पर राजी हुए तो गंगा को कुछ वर्षो में भूलने के लिए तैयार हो जाइये.....


भाषाई आन्दोलन खड़ा करे मीडिया


पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से मीडिया ने अपने पाँव पसारे हैं उससे साथ ही लोगों की मीडिया से उम्मीदें बढ़ी हैं...अब मीडिया को ख़बरों को दिखाने के साथ कुछ और जिम्मेदारियों को भी उठाना होगा... पिछले दिनों एक सवाल सामने आया कि क्या मीडिया भाषाई आन्दोलन खड़ा करने का माध्यम बन सकती है?
हालाँकि इस सवाल का जवाब ढूँढने से पहले हमें इस बात पर ज़रूर विमर्श कर लेना चाहिए कि आखिर भाषा है क्या? क्या भाषा महज अपनी भावनाओ को व्यक्त करने का जरिया मात्र है? प्रख्यात साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने अपने उपन्यास 'अपना मोर्चा' में इस बारे में कुछ लाईने लिखी हैं उनका यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा...'भाषा का अर्थ हिंदी या अंग्रेजी नहीं है...भाषा का अर्थ है जीने कि पद्यती, जीने का ढंग.....भाषा यानि जनतान्त्रिक अधिकारों कि भाषा, आज़ादी और सुखी जिंदगी के हक कि भाषा.....'यह पंक्तियाँ बताती हैं हैं कि किसी समाज के लिए भाषा का क्या महत्व है....भाषा जिह्वा के माध्यम से सबके सामने प्रगट ज़रूर की जाती है लेकिन इसका उदगम ह्रदय और मष्तिस्क के समन्वय से होता है....काशीनाथ सिंह जी कि लाईनों से ये भी साफ़ हो जाता है कि भाषा का भला यानि समाज का भला.....अगर किसी समाज के साथ जुड़ना है तो उसकी भाषा में ही बात करनी होगी...भाषा कि महत्ता स्वराज्य प्राप्ति और राष्ट्र निर्माण में भी होती है....हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस बारे में विस्तृत चर्चा की है.....भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी भाषा की उन्नति को सब प्रकार कि उन्नति का मूल बताया है.....अब यह स्पष्ट हो चुका है कि किसी विकसित समाज कि अवधारणा में भाषा बेहद अहम रोल अदा करती है.....
चलिए अब भाषा और समाज को मीडिया के साथ जोड़ के देखते हैं....लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाने वाला मीडिया अपनी भाषा के अनुरूप ही सामाजिक विस्तार पाता है...इसे से जुड़ी सच्चाई यह है कि देश का नंबर एक चैनल होने का दावा करने वाले न्यूज़ चैनलों को दक्षिण भारत में दर्शक तलाशने पड़ते हैं.....इससे पता चलता है कि भाषा, समाज और मीडिया एक दूसरे से जुड़े हुए हैं....अगर मीडिया को समाज कि भलाई, उसके विकास की बात करनी है तो भाषा भी उचित रखनी होगी.....
मुख्य मुद्दे कि बात करे तो भाषाई आन्दोलन और मीडिया......चूँकि ऊपर कि चर्चा से साफ़ हो रहा है कि भाषा और समाज एक दूसरे के पूरक हैं और समाज मीडिया को अलग नहीं किया जा सकता है....लिहाजा यहीं से मीडिया और भाषा का भी रिश्ता तय होता है....चूँकि मीडिया समाज की बेहतरी के लिए प्रयासरत रहती है इसलिए भाषा की बेहतरी कि उम्मीद भी उससे की जाती है...हालांकि मीडिया चैनलों में जिस तरह कि हिंदी का प्रयोग हो रहा है उससे हिंदी के जानकार कहीं से भी खुश नहीं हैं....उनका मानना है कि मीडिया भाषा के मूल स्वरुप को ही नष्ट कर रही है.....हिंदी मीडिया में हिंदी के जानकारों को हेय दृष्टि से देखा जाता है....अक्सर इस बात को काटने के लिए कहा जाता है कि हिंदी मीडिया के हब बन चुके नॉएडा में हिंदी के जानकार नहीं मिलते....ऐसा हो सकता है कि निचले स्तर पर इस तरह कि कमी हो लेकिन उच्च स्तरों पर हिंदी को जानने वाले कम नहीं हैं.....आप को यहाँ बताता चलूँ कि पत्रकारिता कि नगरी कही जाने वाली काशी नगरी जो उत्तर प्रदेश में है वहां पराड़कर जी ने हिंदी के नए कीर्तिमान गढ़े.....पराड़कर जी मूल रूप से महाराष्ट्र के थे...लेकिन उत्तर प्रदेश और यहाँ के समाज कि बेहतरी के लिए पत्रकारिता करते वक़्त उन्होंने यहाँ कि भाषा का उपयोग किया....
वर्त्तमान मीडिया यकीनन इस बात के लिए तो प्रयास करती है कि समाज का भला हो लेकिन अक्सर भाषा के समन्वय कि कमी उसके इस उद्देश्य को भटकाव के रास्ते पर ले जाती है...हाल ही में अस्तित्व में आई भोजपुरी मीडिया का उदहारण ले लीजिये....जब भोजपुरी चैनल देश में शुरू हुए तो इस समाज से जुए लोगों में उम्मीद बंधी कि अब उनका और उनकी भाषा का भला होगा...लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है.....महज ख़बरों को किसी तरह प्रस्तुत करना ही उनका उद्देश्य रह गया है....भाषाई आन्दोलन के माध्यम से समाज निर्माण उनके एजेंडे में नहीं है...
मड़िया को ना सिर्फ ख़बरों तक पहुँच बनाने कि कोशिश करनी चाहिए बल्कि भाषाई आन्दोलन की ओर भी कदम बढ़ाना चाहिए क्योंकि मीडिया हमेशा इस बात का दावा करती रही है कि वो समाज का भला चाहती है और उसके दर्द को सबके सामने लाना चाहती है ..अगर वाकई में ऐसा है तो भाषाई आन्दोलन मीडिया की ज़िम्मेदारी है....