क्यों भाई बुखारी, खाते इसी देश का हो न!


एक पुरानी कहावत है, मियां मुसद्दी कहते थे। जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो। अब आप इस चक्कर में मत पडि़ये कि ये कहावत मुसद्दी ने कही थी या किसी और ने। बात को पकडि़ये। पकड़ ली। अरे अपने बुखारी मियां। साहब इस देश के मुसलमानों को समझा रहे हैं कि देश भक्ति के नारे मत लगाओ। हाथ में तिरंगा मत लो। कोई कहे कि हिन्दुस्तान जिंदाबाद तो उसके सुर में सुर मत मिलाओ। अन्ना का साथ मत दो। जनलोकपाल बिल में मुसलमानों के लिए कुछ खास नहीं है। लिहाजा जनलोकपाल बिल के चक्कर में मत पड़ो। बुखारी अपने भाई लोगों को समझा रहे हैं कि इस्लाम क्या है। बुखारी फरमान दे रहे हैं कि अन्ना का समर्थन मत करो क्योंकि इस्लाम इसकी अनुमति नहीं देता।
इतने उदाहरण काफी हैं थाली में छेद करने के कि कुछ और दूं। इतने में तो थाली छलनी बन जायेगी। मियां बुखारी की यही देशभक्ति है। इस देश में यही होता है।जि स थाली में खाओ उसी में छेद करो। लोकपाल हो या जनलोकपाल हो दोनों में पूरे देश की बात हो रही है। यह बात दीगर है कि कोई अन्ना का समर्थन कर रहा है और कोई नहीं। करप्शन के खिलाफ सभी हैं। लेकिन इसमें मियां बुखारी मुसलमानों के लिए अलग से व्यवस्था चाहते हैं। क्या चाहते हैं यह तो वहीं जाने लेकिन दिल दुखता है और भुजाएं फड़कती हैं यह सुन कर। कभी कभी बेहद अफसोस होता है यह सोचकर कि हमने सहिष्णुता का पाठ क्यों पढ़ा। आजाद और भगत से कहीं अधिक गांधी को क्यों महत्व दिया। यह इसी देश में हो सकता है। कोई खुद तो थाली में छेद करे ही औरों को भी करने की सलाह दे।
इस देश में कसाब को पाल कर रखा जाता है। इस देश में अफजल की खैरियत का पूरा ख्याल रखा जाता है। अजहर मसूद को बाइज्जत उसके साथियों के हवाले कर दिया जाता है। मौका मिलता है तो तिरंगे को जला भी दिया जाता है। 
बुखारी बाबा इसकी इजाजत कौन देता है। यही है आपका अपना बनाया इस्लाम। अब देश के मुसलमान कम से कम इतना इस्लाम तो जानते ही हैं कि मुल्क से बढ़कर कोई नहीं होता। लेकिन आप का क्या करे मियां बुखारी। आप हिंदुस्तान में है न लिहाजा आपको पूरी छूट है।

मैं अनशन पर नहीं बैठा तो देशद्रोही हूं, मुझे फांसी दे दो



देश के प्रति मेरी ईमानदारी पर सवाल खड़ा कर दिया गया है। मुझे बता दिया गया है कि मैं एक देशद्रोही हूं। क्योंकि मैं अन्ना का वैसा साथ नहीं दे रहा हूं जैसा और लोग चाहते हैं। क्योंकि मैं अन्ना के समर्थन में अनशन पर नहीं बैठ रहा हूं। धिक्कार है मुझपर। मुझे फांसी दे दी जायेगी। हम जैसे लोग परिवर्तन नहीं ला सकते। एक बुजुर्ग देश के भ्रष्टतंत्र के खिलाफ आवाज उठा रहा है और मरने के लिए तैयार है। लेकिन मैं एक युवा होकर भी घर में बैठा हूं। ऐसे शख्स को देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे आदमी को देश निकाला दे देना चाहिए। हो सके तो पाकिस्तान भेज देना चाहिए। 
यकीन नहीं होता ये वही देश है जहां गांधी हुआ करते थे। 
मुझे भी लगता है कि मैं बेकार हो गया हूं। अब मैं बदलाव लाने के लिए खुद से प्रयास कर रहा हूं। मैंने तय किया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने स्तर से जंग लड़ूंगा। अब कभी यातायात नियमों का उल्लंघन नहीं करूंगा। अगर कभी गलती हो गई तो तो पूरा फाइन भरूंगा। कभी हरी पत्तियां देकर अपनी गर्दन नहीं बचा लूंगा। किसी सरकारी ऑफिस में किसी कर्मचारी की मुठ्ठी नहीं गर्म नहीं करूंगा। अगर कभी किसी ने शार्टकट का रास्ता बताया और कुछ ले-देकर काम कराने का भरोसा दिलाया तो इसके खिलाफ पुरजोर आवाज बुलंद करूंगा। 
लोग रामलीला मैदान में तिरंगा लेकर खड़े हैं। देशभक्त हैं। कहते हैं कि भ्रष्टाचार की नाली उपर से नीचे बहती है। अगर ऑफिसर्स सुधर जाएं तो जनता को कोई समस्या नहीं होगी। जनता कब चाहती है कि घूस देकर काम करवाये। अफसर मांगते हैं इसलिए देते हैं। लेकिन यह कह कर हम अपने प्रदर्शन की खिल्ली उड़ायेंगे। जनता को सूचना का अधिकार मिला है। कितना प्रयोग होता है इसका? आम जनता आज भी इस अधिकार का उपयोग करने से कतराती है। उसको सिर्फ अपने काम से मतलब है। उसका काम होना चाहिए कीमत चाहें जो हो। अपने अधिकारों का प्रयोग हमारा फर्ज है। जब तक हम उसे अंजाम नहीं देंगे कहना मुश्किल है कि देश में बदलाव आ पायेगा। 
एक और बात जो चलते-चलते दिमाग में आ गई। ये उसी गांधी से जुड़ी है जिसकी तलाश आज पूरे देश में हो रही है। उसी गांधी ने कहा था कि यदि हम सभी लोग अधिकारों की मांग करें और कर्तव्यों की ओर से विमुख हो जाएं तो ऐसी स्थिती में सम्पूर्ण भ्रम और अव्यवस्था पैदा हो जायेगी। यदि अधिकारों की मांग न करके प्रत्येक व्यक्ति अपना कर्तव्य पूरा करे तो तुरन्त ही समाज में सुव्यवस्था स्वयं स्थापित हो जाएगी।
ये मैंने नहीं गांधी ने कहा था। 

Saans Albeli - Aarakshan (2011) Full Song Pt.Channulal Mishra *Exclusive* - YouTube

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पकड़ सौ की पत्ती और बोल अन्ना जिंदाबाद



सुनने में यह अजीब लगता है लेकिन बात है सही। यह मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं। अगर देश में इसी तरह से अन्ना की आंधी चलती रही तो आने वाले समय में अन्ना ईमानदारी के प्रतीक होंगे और बेइमानी को छुपाने का जरिया। रैलियों और सभाओं के ठेकेदार अन्ना के नाम पर नारा लगाने वालों की फौज रखेंगे। उन्हें एक पॉउच और सौ की पत्ती पकड़ा कर नारे लगवायेंगे। ठीक वैसे ही जैसे आज गांधी, सुभाष, आजाद, अंबेडकर के लिए लगाये जाते हैं। न तो नारे लगाने वालों को इससे कोई मतलब होगा कि वो किसके लिए और क्यों नारे लगा रहे हैं और न ही इन नारों को सुनने वालों को कोई फर्क पड़ेगा। एक संवेदनहीनता का जन्म हो जायेगा। आज सरकारी कार्यालयों में महात्मा गांधी की फोटो टंगी होती है और टेबुल के नीचे से लेन-देन होता रहता है। कुछ दिनों बाद गांधी की तस्वीर के बगल में मुस्कुराते अन्ना की भी तस्वीर होगी और हम और आप में से कोई एक टेबुल के नीचे से अपनी फाइल पार करा रहा होगा। 
यह ठीक है कि अन्ना के समर्थन में पूरा देश एक हो गया है। लेकिन यह भी सच है कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मन में गुस्सा अन्ना के लिए प्यार से अधिक है। इसके साथ ही एक अहम मुद्दा यह भी है कि हम कितने बदल रहे हैं। अगर हम भ्रष्टाचार को हटाना चाहते हैं तो बदलाव अपने भीतर भी तो लाना होगा। एक दिन के नारे से कहीं अधिक जरूरी है साल भर की व्यक्तिगत ईमानदारी। बिजली के बिल से लेकर रेलवे के टिकट तक में हम अपना काम सुविधा शुल्क के जरिए करवाने के आदती हो गये हैं। सिविल सोसाइटी का सिविक सेंस जब जागता है तो हम गवर्नमेंट पर ही आरोप मढ़ देते हैं। कह देते हैं कि सरकारी कर्मचारी लेते हैं तो हम देते हैं। क्यों नहीं हम अपना काम कराने से मना कर देते हैं। करप्शन को आश्रय हम नहीं देते हैं ? 
अन्ना का सच्चा समर्थन करना है तो प्रण कीजिए कि न तो भ्रष्टाचार सहेंगे और न ही उसके भागीदार बनेंगे। भले ही आपका बच्चा कम अनुपस्थिती के कारण परीक्षा न दे पाये लेकिन आप घूस न देकर एक इम्तिहान जरूर पास कर लेंगे। अगर ऐसा नहीं कर पा रहे तो चुपचाप घर पर बैठ जाइये और मत दावा करिए कि आप इस देश को एक नयी दिशा देना चाहते हैं।

थूक पार्ट -टू, आज नहीं थूके तो कल आप पर थूकेगा

चौंसठ सालों से हम सब अपनी थूक इसलिए निगलते आ रहे हैं क्योंकि सरकारी कागजों में सार्वजनिक स्थानों पर थूकना अपराध है। लिहाजा घोंट कर ही काम चलाना पड़ता है। लेकिन आज जब मौका मिला है तो देश का आम आदमी पीछे नहीं रहना चाहता है। वो जी भर के थूकना चाहता है उस सिस्टम के मुंह पर जो उसे आम आदमी का नाम तो देता है लेकिन सहूलियत जानवरों से भी बदतर। यही वजह है कि मुझे भी थूक पार्ट टू लिखने की अन्र्तप्रेरणा मिली। कुछ लोगों को जरूर बुरा लगा होगा और लग भी रहा होगा इसके लिए मैं क्षमा चाहता हूं। लेकिन एक बात भी लगे हाथ बता देना चाहता हूं कि अगर आज आपने इस सड़ चुके सिस्टम पर नहीं थूका तो आपका कल आप पर थूकेगा। मर्जी आपकी आखिर मुंह है आपका।
सरकार कहती है कि अन्ना और उनकी टीम पूरे देश का नेतृत्व नहीं कर सकते। सिविल सोसाइटी की नुमांइदगी चार-पांच लोगों को नहीं दी जा सकती। मैं भी इस बात से इतेफाक रखता हूं लेकिन मुझे लगता है कि सरकार की आंखों पर अहम का चश्मा लगा हुआ है। तभी तो उसे दिल्ली से लेकर चेन्नई तक हो रहे आंदोलन नहीं दिख रहे। लाखों लोग सड़कों पर हैं तो फिर किस बात का सबूत चाहती है सरकार? अगर देश का कानून देश के लोगों के हिसाब से बनता है तो जनलोकपाल बिल को पास करने में क्या परेशानी है ? आज की राजनीति में नैतिक मूल्यों को तलाशना हालांकि अपना समय बर्बाद करना है लेकिन फिर भी किसी भी लोकतांत्रिक सरकार से इस बात की उम्मीद नहीं की जा सकती कि जनता सड़क पर हो और आप संसद की गरिमा का हवाला देकर उनकी आवाज अनसुनी करते रहे। लोग थूकते रहे और मुंह पोछ कर बड़ी ही बेहयाई से सरकार अपनी बात पर अड़ी रहे। 
सड़ चुके सिस्टम के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाना जनता का संवैधानिक अधिकार है। सरकार उसे छीन नहीं सकती है। आज देश में वही हो रहा है। हम कागजातों में लोकतंत्र और गणतंत्र में जी रहे हैं लेकिन सच यही है हम भ्रष्टतंत्र में जी रहे हैं। 15 अगस्त उन्नीस सौ सैंतालिस से लेकर अब तक इस देश की जनता ने पल-पल जो मौत कबूली है आज उनमें से कुछ का हिसाब किताब हो रहा है। 
अब भी वक्त है। सफेदपोशों  को समझ लेना होगा कि देश परिवर्तन चाहता है। उन्हें अपना कुर्ता सलामत रखना है तो इस मुगालते में न रहे कि लोगों के मुंह पर ताले लगे हैं। वरना संसद के गलियारों में हवा का रुख बदलते देर नहीं लगती। खुदा न करे अगर यह हवा दिल्ली के रामलीला मैदान की ओर बह निकली तो फिर नौटंकी करने का काम भी आप सब को नहीं मिलेगा। 
बोलिए जनता जनार्दन की जय।।

बहुत दिनों से घोंट रहे थे अब थूक रहे हैं

देश में आजकल अन्ना की चर्चा है। हर ओर अन्ना ही अन्ना नजर आ रहे हैं। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने पूरे देश को अन्नामय कर दिया है। अन्ना के समर्थन में देश का एक बड़ा वर्ग सड़कों पर उतर आया है। कोई अनशन कर रहा है तो कोई गा-बजा कर अन्ना का साथ दे रहा है। कई लोग ऐसे भी हैं जो सड़कों पर प्रदर्शन तो नहीं कर रहे हैं लेकिन मुंह से अन्ना के साथ होने की बात कह रहे हैं। इन सब के बीच एक बात सामान्य है। सभी सालों से जिस थूक को घोंट रहे थे उसे जी भर के वहां थूक रहे हैं जहां थूकना चाह रहे हैं। वैचारिक रूप से अन्ना ने देश की ऐसी रग पर हाथ रखा है जिसकी ओर कोई देख भी ले तो दर्द उभर आता है। अन्ना ने उसी रग को दबा दिया है। जनता की वो भीड़ जो राजनीतिक रूप से लोकतंत्र का हिस्सा है चिल्ला रही है। ये भीड़ व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करने का यह मौका जाने नहीं देना चाहती है। 
राजनीतिक रूप से असंतुष्ट भारत के पास विकल्प बहुत कम हैं। जो हैं भी उनका उपयोग सीमित है और उनका उपयोग कर पाने के लिए लम्बा इंतजार भी करना पड़ता है। लिहाजा अंदर ही अंदर एक घुटन सी होने लगी है। रातों रात सिस्टम को बदला नहीं जा सकता है। यह एक लम्बी प्रक्रिया है और इसमें समय लगता है। बीच-बीच में अवरोध भी बहुत आते हैं। सिस्टम को कोसे बिना इस लम्बे समय को नहीं काटा जा सकता है। आमतौर पर सिस्टम में बदलाव की सोच हमारे दिमाग से निकलकर चाय की दुकान तक जाती है और फिर लौट आती है। ऐसे में यदि आपको अन्ना जैसा नेतृत्व कर्ता मिल जाये और अपनी भड़ास निकालने के लिए दिल्ली का रामलीला मैदान तो इससे बेहतर क्या हो सकता है। मन में कसक सबके है। सताये हुये सब हैं। इस देश का हर चौक तहरीर चौक बनने की उम्मीद लगाये बैठा है। यही वजह है कि जैसे ही उसे मौका मिलता है कम से कम वो जंतर-मंतर का रूप तो ले ही लेता है। कुछ युवाओं की टोली आती है हाथों में तिरंगा लहराते हुये और चीख-चीखकर अपनी आवाज बुलंद करती है और आगे बढ़ जाती है। 
ऐसा नहीं है कि जो सड़कों पर निकल पा रहे हैं वही भड़ास निकाल पाने का संपूर्ण आनंद ले रहे हों। घरों में भी चर्चा होती है और व्यवस्था को कोसा जा रहा है। अन्ना और उनकी टीम का जन लोकपाल बिल इस देश को कुछ नया दे पायेगा या बिलों के बिल में कहीं खो जायेगा ये तो पता नहीं। लेकिन फिलहाल देश के हर उस नागरिक को अन्ना हजारे के नाम पर छूट है कि वो बदबूदार सिस्टम के प्रति नाराजगी जता सके। 

अब यह संकल्प लेना होगा 
इस देश में रहने वाले राजनीतिक रूप से तो आजाद हैं लेकिन मानसिक रूप से आजादी का टुकड़ा भर भी हम आज तक हम नहीं ले पाये हैं. जिन संघर्षों और आंदोलनों के सहारे हमें आजादी मिली आज हम उन्हें ही महत्व नहीं देते हैं. शहीदों की शहादत पर भी वक्त-बेवक्त प्रश्नचिह्न लगाने वाले कम नहीं हैं. इतने के बाद अगर किसी ने टोक दिया तो उसे संविधान की दुहाई दी जाती है. कहा जाता है कि संविधान में हर एक को अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता है. अब जब संविधान की ही दुहाई दे दी तो कोई क्या करेगा? 
आजादी की लड़ाई लडऩे में महात्मा गांधी का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है. महात्मा गांधी और संविधान निर्माता बाबा भीमराव अंबेडकर के विचार कभी एक नहीं रहे. यहां तक की स्वतंत्रता आंदोलन में भी बाबा और बापू का मतभेद नजर आता है. कई गोष्ठियों में बाबा भीमराव ने देश में दलितों और शोषित वर्गों के लिए आंदोलन करने को ज्यादा तरजीह दी बजाए इसके कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी जाए. गांधी जी ने कई बार इसका विरोध किया. यही वजह थी बाबा और बापू आपको बहुत कम स्थानों पर ही एक साथ नजर आयेंगे. 
अंग्रेजों से जंग जीतने के बाद देश को एक संप्रभु और गणराज्य बनाने की कवायद शुरू हुई. इसके लिए आवश्यक था कि हमारे देश का अपना एक संविधान हो. इसके जिम्मेदारी सौंपी गई बाबा भीमराव अंबेडकर को. संविधान सभा ने दुनिया के कुछ पुराने और उस समय के प्रभावशाली देशों के संविधान का अध्ययन कर भारत का संविधान बना दिया. बिना किसी संदेह यह इस देश के लिए एक गौरवशाली बात थी. आजाद मुल्क का हर शख्स अब आजाद था. उसके लब आजाद थे. किसी भी विषय के बारे में बोलने की उसे पूरी स्वतंत्रता थी. शुरुआत में सब कुछ ठीक रहा. बोलने वाला अपनी मर्यादा और दूसरे की इज्जत का पूरा ख्याल रखता था. धीरे-धीरे यह अनुशासन टूटने लगा. बोलने की स्वतंत्रता अब छूट का रूप लेने लगी. वक्त थोड़ा और बीता. छूट हथियार बन गई और संविधान दुहाई. बोलने वाला कुछ भी बोल कर संविधान का पर्दा डाल देता है.  चौंसठ साला आजादी अब एक ऐसी स्थिति में आ चुकी है जहां एक बार फिर से कई बातों पर विचार करने की आवश्कता है. नेता और प्रजा दोनों अब अपना-अपना राज चलाने में लगे हैं. राजनीतिक रूप से अपरिपक्वता हमारे देश को खाये जा रही है ये सही है लेकिन जनता भी कहीं से परिपक्व है ऐसा नहीं लगता है. राजनेताओं के बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं. इस संबंध में नाना जी देशमुख के एक आलेख की कुछ पंक्तियां याद आती हैं कि आज इस देश में किसी राजनीतिक पार्टी में कोई नेता नहीं है बल्कि नेताओं की राजनीतिक पार्टियां हैं. अब ऐसे में नेताओं से फिलहाल कोई उम्मीद बेमानी के सिवा कुछ नहीं है. लिहाजा आइये इस 15 अगस्त हम और आप संकल्प लें कि नागरिक होने का अपना कर्तव्य हम पूरी निष्ठा से निभाएंगे. 

इस बार कलमाड़ी कैसे रहेंगे?


लीजिए आ गया एक बार फिर छुट्टी वाला दिन। वही दिन जिसकी छुट्टी आपके कैलेंडर में कभी इधर से उधर नहीं होती। वही दिन जब लाल किले की प्राचीर पर भारत तिरंगा फहराता है इंडिया छुट्टी मनाता है। पता नहीं क्यों लेकिन लगता है कि अब शायद ऐसे त्यौहारों पर लोगों में उत्साह नहीं होता। हो सकता है बार-बार एक ही जगह एक जैसा ही प्रोग्राम करने से लोगों में दिलचस्पी कम हो गई हो। इस बारे में मेरा एक सुझाव है। इससे 15 अगस्त के जश्न का जोश दुगुना हो सकता है।
हमें इस बार झण्डा फहराने के स्थान में थोड़ा परिवर्तन करना चाहिए। इस बार झण्डा फहराने के लिए हमें उस स्टेडियम का इस्तमाल करना चाहिए जिसका उपयोग कामन वेल्थ खेलों की ज्यादातर स्पर्धाओं के लिए हुआ है। वहां हम सब को एकत्र होना चाहिए और झण्डा फहराना चाहिए। आखिर यही जगह तो है जहां हमारे देश ने अपनी प्रगतिशीलता अन्य देशों के सामने बताई।
अब सवाल ये है कि हर बार देश का प्रधानमंत्री ही लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त को तिरंगा क्यों फहराये। क्या देश में कोई और नहीं है जो प्रधानमंत्री को थोड़ी राहत दे सके। मेरे पास इसका जवाब है। है ना। अपने कलमाड़ी जी। कसम से ऐसा योग्य और सुशील व्यक्ति मिलना मुश्किल है। देश की बागडोर ऐसे ही आदमी के हाथों में होनी चाहिए। कलमाड़ी जी कि योग्यता कितनी है इस बारे में न जाने कैग की कितनी रिपोट्र्स लिखीं जाएंगी। लेकिन इसके बावजूद कलमाड़ी पुराण खत्म नहीं हो पाएगा। महज एक खेल आयोजन कराने में जो कई अरबों का खेल कर सकता है उसकी योग्यता पर शक करने का तो सवाल ही नहीं उठता। सोचिए कितना अच्छा लगेगा जब कलमाड़ी जी अपने हाथों से तिरंगा फहराएंगे। सच कहता हूं एक बार आजमा के देखने में कोई हर्ज नहीं है। 

हर बात जुबां से कहना ज़रूरी तो नहीं...

मुझे इस बात का पक्का यकीन तो नहीं लेकिन शायद मेरी लेखनी से निकले शब्दों के पास खुद पर खुश होने के सिवा कोई और विकल्प नहीं होता है. लेकिन फिर भी अपने दोस्तों द्वारा पिछले कई दिनों से अपनी आभासी पुस्तिका पर ना लिख पाने की वजहों के बारे में पूछा जाना सुखद रहा. लगने लगा कि रगों में लिपटी एक आग जब कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर शब्द दर शब्द उतरती है है तो कुछ एक यार दोस्त उस आग को धधकते, सुलगते, हाहाकार करते देख खुश होते हैं.  शुक्रिया दोस्तों. 
वैसे जलने का अपना मजा होता है. यकीन जानिए इस बात का पता मुझे भी तब चला जब मैंने जलना सीख लिया. एक ऐसी आग में जो आपको जला कर राख नहीं स्वर्ण बना देती है. बेचेहरा हवाओं में, बेतरतीब बादलों में आपको मकसद नज़र आने लगता है. एक बाँध सा होता है जो उसके स्नेह ज्वार के आने के साथ ही टूट जाता है और आप जी भर के सांस लेते हैं. इसके बाद आपको एक नव जीवन मिलता है. एक गहरी सांस और उसके साथ घुली हुई एक नरगिसी खुशबु. सब कुछ क्षण भर में ही हो जाता है लेकिन हाथों में आया यह मुट्ठी भर आसमान आपको विश्व विजेता होने का एहसास दिला जाता है. अब इसे विरोधाभास कह लीजिये लेकिन अगले ही क्षण एक विश्वविजेता अपना सब कुछ खोकर भी दुनिया की सबसे कीमती चीज़ पा लेता है. एक इबारत ज़िन्दगी और ख़्वाब देखने की आज़ादी. खुले आसमान के नीचे बेतक्क्लुफ़. पैर पसार लेने के बाद आपके लिए कोई मंजिल मायने नहीं रखती. बेलौस आप. 
बेवजह आप मुस्कुरा सकते हैं. देर रात गए कोई खाली सड़क ना मिले ना सही भीड़ भरे बाज़ार में भी आपके पास गुनगुनाने के लिए कुछ नहीं बहुत कुछ  होता है. जीवन राग . किसी योगी तपस्वी सा आप निर्मूल विचार को थामे बहुत दूर तक चले जाते हैं और ना तो पीछे मुड़ कर देखने का मन करता है और ना ही रत्ती भर थकान होती है. बस चलते जाने का मन करता है. और आगे, और आगे. हर मंजिल से परे. 
माफ़ कीजियेगा. यदि यह विचार समीर आपको व्यथित कर गया तो. किसी युवा के पास अपनी सोच के कोलाज पर उकेरने के लिए बहुत कुछ होता है. बस रंगों का चयन सही होना चाहिए. मेरे रंगों वाले बक्से में कोई रंग नहीं था वही लेने गया था. लौटा हूँ तो सिर से लेकर पाँव तक खुद भी रंगा हूँ और रंगों वाले बक्से में सतरंगी रंग भी हैं. अब खूब खेलूंगा इन रंगों के साथ. 
ग़ालिब ने यह मुझसे तो नहीं कहा था लेकिन बुजुर्गों ने बताया है कि ग़ालिब ने ही कहा था.  कमबख्त इश्क निकम्मा  बना देता है. 
कमबख्त ग़ालिब हर बात जुबान से कहना ज़रूरी तो नहीं. 
खुदा हाफिज, आप के ना चाहने पर भी हम जल्द मिलेंगे. 
मिलते रहेंगे.