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टच वुड


धीरे धीरे अब मौसम सर्द होने लगा है 
कमरे में आने वाली धूप अब अलसा गयी है 
गहरे रंग के कपड़ों से आलमारी भर गयी है 
ऊनी कपड़ों से आती नेफ्थलीन की महक तैर रही है 
कमरे में 
सुबह देर तक तुम्हारे आलिंगन में 
बिस्तर पर पड़ा हूँ 
ना तुम उठना चाहती हो 
ना मैं 
देखो हम साथ खुश हैं 
तुम हर बार की तरह कहती हो
टच वुड 
मैं भी कहता हूँ 
टच वुड 
तुम्हारे साथ घर तक का सफ़र हमेशा लम्बा लगता है 
हाँ, जब इसी रास्ते से 
स्टेशन जाता हूँ तो राह छोटी हो जाती 
मैं देर तक तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ 
हम हमेशा साथ रहेंगे 
तुम फिर कहती हो 
टच वुड 
मैं भी तुम्हारे साथ कहता हूँ 
टच वुड 
एक रिश्ते का ऐसा उत्सव 
विकल्पहीन है यह सौंदर्य 
तुम्हारी पतली ऊंगलियों के बीच में 
अपनी ऊंगलियों को डाल कर 
कितना कुछ पा जाता हूँ मैं 
तुम्हारे चेहरे पर तैरती हंसी भी 
बहुत अच्छी लगती है 
इस बार मैं पहले कहूँगा 
टच वुड 
बोलो 
अब तुम भी बोलो ना 
टच वुड 

माँ अब व्यस्त है


दो-चार दिनों पहले धूप सर्द सी लगी थी
पड़ोस की एक महिला ने भी बताया था कि सर्दी आ गयी है 
माँ अब व्यस्त है 
बक्से में रखे 
कम्बल, स्वेटर और मफलर निकालने में 
वो इसे धूप में रखेगी 
कई बार उलटेगी पलटेगी 
भागती धूप के साथ 
चटाई भी बिछाएगी 
वो जानती है
बच्चों को नेफ्थलीन की महक पसंद नहीं 
वो पूरी तरह से इत्मीनान कर लेना चाहती है 
बच्चों को खुश रखने का 
कई बार बोल बोल कर आखिरकार वह पहना ही देगी 
बच्चों को स्वेटर 
इस बार अपनी पुरानी शाल में 
अपना पुराना कार्डिगन पहने 
वो सोचती रहेगी 
बच्चों के लिए 
एक नया स्वेटर लेने के लिए. 

हंगामा है क्यों बरपा


प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन मार्कण्डेय काटजू का भारतीय मीडिया के संबंध में दिया गया बयान आजकल चर्चा में है। हैरानी इस बात की है कि जो लोग काटूज के न्यायाधीश के रूप में दिये गये फैसलों पर खुशी जताते थे आज उन्हीं में से कई लोग काटजू को गलत ठहरा रहे हैं। शायद सिर्फ इसलिये कि इस बार मार्कण्डेय काटजू ने उन्हीं लोगों को आईना देखने की नसीहत दे दी है। मुझे नहीं लगता है कि आईना देखने में कोई हर्ज है। आज भी प्रबल धारणा यही है कि आईना सच ही बताता है। ऐसे में भारतीय मीडिया इस अग्निपरीक्षा को स्वयं स्वीकार करे तो अच्छा होगा।  

भारत के लोकतंत्र की नींव में घुन तो बहुत पहले ही लग था लेकिन बात तब और बिगड़ी जब लोकतंत्र के चैथे स्तंभ पर काई लग गई। खबरों का आम जनता के प्रति कोई सरोकार नहीं रहा। खबरों के लिहाज से देश कई वर्गों में बंट गया। खबरों का भी प्रोफाइल होने लगा। किसी ग्रामीण महिला के साथ बलात्कार कोई मायने नहीं रखता बजाए इसके कि किसी नामचीन व्यक्ति ने तेज गति से गाड़ी चलाई हो। मानवीय दृष्टि से महिला के साथ बलात्कार की घटना अधिक महत्वपूर्ण है लेकिन प्रोफाइल के नजरिये से नामचीन व्यक्ति का तेज गति से गाड़ी चलाना लिहाजा ग्रामीण महिला की स्टोरी को कोई नहीं पूछता। मुझे नहीं लगता कि इस उदाहरण से समाज का स्वंयभू पहरुआ बनने वाला कोई भी पत्रकार मुंह छुपा सकता है। सभी जानते हैं कि सच्चाई क्या है।

 पत्रकारिता जबसे मीडिया हुई तो न ही जनता के प्रति उसकी उपादेयता रही और न ही कोई विश्वसनीयता बची। दलाल अब लाइजनर्स हो गये और मीडिया घराने उनके आगे लार टपकाते नजर आने लगे। सब कुछ मैनज होने लगा। कारपोरेट कल्चर ने न सिर्फ कलम की धार कुंद कर दी बल्कि कैमरों के लेंस को भी धुंधला कर दिया। खबरों भी पेड होने लगीं। यह तो वही बात हुई जैसे कोई कह दे कि सीता का अपहरण रावण ने नहीं हनुमान ने किया था। आम आदमी के मन से कभी पूछिये तो पता चलेगा कि उसे तुलसीदास के रामायण पर जितना भरोसा है उतना ही मीडिया पर। पर बेचारी जनता नहीं जानती कि अगर आज की मीडिया को कोई स्पाॅन्सर कर दे तो वो बिना किसी तर्क के तुलसीदास के रामायण पर भी प्रश्न चिह्न लगा देगी। साफ है कि आम जनमानस के विश्वास से लगातार धोखा हो रहा है। भला कोई यह कैसे मान सकता है कि पैसे देकर मनचाही खबरें छपवाईं और दिखाईं जा सकती हैं। लेकिन ऐसा हो रहा है। 

हैरानी होती है कि जब मीडिया पर्यावरण, गरीबी, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर सरकार की खिंचाई करती है। कंटेंट एनालिसिस का सहारा लिया जाये तो नजर आयेगा कि खुद मीडिया पर्यावरण और बेरोजगारी जैसे विषयों से दूर ही रहती है। ऐसे विषयों पर वह तभी आती है जब कोई एजेंसी इस संबंध में कोई रिपोर्ट पेश करती है। वरना मीडिया को कोई जरूरत नहीं कि वो लोगों को इस संबंध में जागरुक करे।  

मीडिया ने अपने लिये इस देश में एक शीशमहल बना लिया है। पूरे देश को मीडिया उसका असली चेहरा दिखाने की कोशिश करती है लेकिन अपना चेहरा देखने की बात पर कन्नी काट लेती है। अब वक्त आ गया है कि एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की जगह स्वयं की सार्थकता सिद्ध करने के लिए खुद ही कदम बढ़ाया जाये। वरना न सिर्फ जनता का भरोसा मीडिया पर से उठ जायेगा बल्कि लोकतंत्र भी खतरे में पड़ जायेगा. 

कश्मीर को ज्यादा ज़रुरत है अन्ना की

पिछले दिनों कश्मीर के मुद्दे पर प्रशांत भूषण के बयान से अन्ना का किनारा कसना इस बात की ताकीद करता है कि अन्ना हजारे कश्मीर के बारे में उसी तरह से सोचते हैं जिस तरह से सरहद पर अपने मुल्क की सलामती के लिए खड़ा एक सिपाही सोचता है। यही वजह रही होगी कि प्रशांत भूषण पर हमले के कुछ देर बाद जब पत्रकारों ने अन्ना से इस संबंध में प्रतिक्रिया लेनी चाही तो वह चुप लगा गये। साफ है कि आदर्श बुद्धिजीविता का वह स्तर जहां कश्मीर को भारत से अलग कर देने की सलाह दी जाती है अन्ना वहां नहीं पहुंचे हैं। अन्ना हजारे अब भी एक सैनिक की तरह सोचते हैं जो कश्मीर को कभी इस देश से अलग रख कर नहीं सोच सकता। अन्ना हजारे का मौन व्रत भी इस बारे में उठने वाले सवालों से बच निकलने का एक जरिया हो सकता है।
अन्ना हजारे देश से भ्रष्टाचार खत्म करने की कोशिश में लगे हुये हैं और उनका एक सहयोगी भ्रष्टाचार से परेशान प्रदेशों को ही खत्म कर देना चाहता है। कश्मीर समस्या से जुड़े कई पहलुओं में एक भ्रष्टाचार का पहलू भी है। केंद्र सरकार ने अपनी प्राथमिकता की सूची में कश्मीर को सबसे उपर रखा है। देश के वार्षिक बजट का एक बड़ा हिस्सा कश्मीर को दिया जाता है। लेकिन दुख की बात यह है कि केंद्र की ओर से कश्मीर को मिलने वाली इस सहायता की बंदरबांट हो जाती है। वर्ष 2009-2010 में कश्मीर को विकास की योजनाओं पर खर्च करने के लिए 13, 252 करोड़ रुपये दिये गये। वहीं पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को कुल मिलाकर 29, 084 करोड़ का बजट आवंटित हुआ। साफ है कि केंद्र सरकार ने खुले हाथ से लुटाया और कश्मीर की अफसरशाही ने बटोरा या फिर खर्च ही नहीं कर पाये। कश्मीर समस्या के लगातार इतने दिनों तक बने रहने के पीछे एक वजह वहां व्याप्त भ्रष्टाचार भी है। बिहार, उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश जैसे प्रदेशों से अधिक बजट कश्मीर को आवंटित होता है। लेकिन विकास के मामले में कश्मीर इन प्रदेशों से पीछे है। इसकी वजह फंड का सही तरीके से खर्च न हो पाना है। विकास के कई कार्य ऐसे हैं जो देश के अन्य राज्यों और कश्मीर में एक साथ चल रहे हैं। ऐसे कार्यों में भी कश्मीर पिछड़ा हुआ है। यहां तक कि सामाजिक क्षेत्रों के लिये भी मिलने वाले कार्यों मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य में भी कश्मीर केंद्र सरकार से मिलने वाले धन को पूरी तरह खर्च नहीं कर पा रहा है। 
विकास कार्यों पर समुचित ध्यान न देना भी कश्मीर की समस्या को बढ़ावा देना है। कुछ दिनों पूर्व हुये एक सर्वे में खुलासा हुआ कि भ्रष्टचार के मामले में जम्मू-कश्मीर अन्य प्रदेशों से बहुत आगे है। स्पष्ट है कि पैसे के खेल में कश्मीर जन्नत से जहन्नुम बनता जा रहा है। टीम अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी अपना आंदोलन अगर कश्मीर में भी चलाये तो समस्या को दूर करने में सहयोग मिल सकता है और विकास की राह पर चलते प्रदेश को देख कर अलगाववादियों के हौसले भी पस्त हो जायेंगे. 

तन का बढ़ना ठीक, मन का बढ़ना नही

दिल्ली में प्रशांत भूषण पर हुआ हमला निंदनीय है इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन हमले के पीछे की वजहों को भी तलाशना बेहद जरूरी है। आखिर क्या वजह रही होगी कि इंदर वर्मा को ऐसा दुःसाहस करना पड़ा। क्या टीम अन्ना को लगने लगा है कि अब वो जो चाहेगी वो करवा सकती है ? क्या टीम आत्ममुग्धता की स्थिती में आ चुकी है ?  
कोर्ट में किसी वकील को उसी के चैंबर में घुस का मारना कोई आसान काम नहीं था। लेकिन इंदर वर्मा और उसके साथियों की नाराजगी इस कदर रही होगी कि उन्हें इस बात का भी डर नहीं रहा कि प्रशांत भूषण पर हमला करने के बाद उनके साथ क्या होगा। साफ है कि टीम अन्ना के व्यवहार से देश का एक वर्ग दुखी है। उसे लगने लगा है कि टीम अन्ना का मन बढ़ गया है। हालांकि टीम अन्ना ने हमेशा से इस बात का हवाला दिया है पूरा देश उनके साथ खड़ा है। अगर ऐसा है तो इंदर कहां रह गया था। इंदर इस देश में नया तो नहीं आया है। इंदर का गुस्सा शब्दों में बयां नहीं हो सकता था। ऐसा इंदर को लगा होगा। तभी तो उसने यह रास्ता चुना।
अन्ना और उनकी टीम देश में व्याप्त प्रशासनिक भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहती है। देश के लोग भी यही चाहते हैं। लेकिन शुरुआत का सिरा नहीं मिल रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश का हर नागरिक अपनी लड़ाई अपने तरीके से लड़ रहा है। आम आदमी ने जब देखा कि अन्ना और उनके साथ कुछ पढ़े लिखे लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में देश की सर्वोच्च सत्ता से लोहा लेने को तैयार हैं तो स्वतः स्फूर्त तरीके से उनके साथ हो चले।
भ्रष्टाचार और लोकपाल के मुद्दे पर बोलते-बोलते जब टीम अन्ना ने और मुद्दों की ओर रुख किया तो बात बिगड़ने लगी। अन्ना हजारे के प्रमुख सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने कह दिया कि देश की संसद से भी उपर अन्ना हैं। इसके बाद प्रशांत भूषण ने वाराणसी में बयान दिया कि कश्मीर को भारत से अलग कर देना चाहिये। इस बयान को देने के पीछे क्या वजह रही होगी यह तो प्रशांत जी ही जाने। लेकिन इतना तो जरूर है कि मीडिया के सामने आप इस तरह की राय रखेंगे तो उसका रियेक्शन तो होगा ही। अगर प्रशांत भूषण प्रेस से मिलिये कार्यक्रम में अन्ना के सहयोगी के तौर पर बोल रहे थे तो उन्हें सिर्फ लोकपाल और भ्रष्टाचार को ही बोलने का विषय बनाना चाहिये। बजाये इसके कि वो कश्मीर और नक्सलवाद पर बोलें। ऐसा बोलने पर लगता है मानों टीम अन्ना अब राजनीतिक होने लगी है।
इंदर को श्रीराम सेना का कार्यकर्ता बताया जा रहा है। लेकिन गौरतलब है कि श्रीराम सेना क्षेत्रीय विवादों से उपजा एक वर्ग है लेकिन रहता भारत में ही है। वह भी भ्रष्टाचार से उतना ही पीडि़त है जितना और लोग हैं। मैं एक बार फिर उस बात को याद दिलाना चाहूंगा जिसका हवाला अन्ना हजारे देते रहे हैं। वह है देश के सभी लोगों के उनकी मुहिम में साथ होने का हवाला। लेकिन लगता है ऐसा नहीं है। प्रशांत भूषण का कहना है कि श्रीराम सेना पर रोक लगनी चाहिये। यहां लगता है कि श्रीराम सेना के प्रति प्रशांत जी की नाराजगी नितांत व्यक्तिगत है। वरना श्रीराम सेना के खिलाफ उन्हें पहले ही आवाज उठानी चाहिये थी। यानी प्रशांत जी का विरोध का यह तरीका सही नहीं माना जा सकता। कुल मिलाकर प्रशांत जी के साथ-साथ पूरी टीम अन्ना को यह मान लेना चाहिये कि इस देश में कई ऐसे लोग हैं जो उनके कामकाज और बयानबाजी से नाराज हैं।

वो आवाज जो हर पल साथ रहती है



कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे आप ताजिंदगी नहीं मिलते हैं लेकिन वो लोग आपकी रोजाना की जिंदगी का हिस्सा होते हैं। जगजीत सिंह भी ऐसे ही थे। किसी नाजुक सी शायरी को जब वो अपने सुरीले गले से गाते थे तो लफ्ज मानों जिंदा हो उठते थे। आपकी जिंदगी में किसी बेजान से शब्द का कोई खास मोल नहीं होता लेकिन जब शब्द जगजीत सिंह के गले से निकल रहे हों तो एक-एक लाइन आपको जिंदगी का सच बताने लगती है। गजलें आमतौर पर इश्क का फलसफां बताती हैं। दिल कच्चा होता है और जब मोहब्बत की मझधार में उतरता है तो जगजीत सिंह की गजलें हर उतार-चढ़ाव में आपके साथ खड़ी नजर आती हैं। प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है, नये परिंदों को उड़ने में वक्त तो लगता है। यह लाइनें किसी ऐसे जोड़े के लिए बेहद मायने रखती हैं जिसने प्यार की दुनिया में पहला कदम रखा हो। जगजीत सिंह की गाई यह गजल आज भी जेहन में इतनी खलिस के साथ कौंधती है मानों कल ही सुनी हो। जगजीत सिंह की गजलों में किसी तेज झरने के करीब खड़े होने पर मिलनी वाली ताजगी का एहसास होता है। कुछ सालों पहले उन्होंने गाया था- इश्क कीजिए फिर समझिये। इन लाइनों को समझने के लिए आपके दिल में इश्क होना चाहिए। जगजीत सिंह को इश्क था गजलों से। उनकी गजलों में रवानगी थी वो भी सुकून भरी। प्रायः ऐसा नहीं मिलता। गजलें आपके साथ चलती हैं और आपको उनका साथ अच्छा लगता है। जगजीत सिंह के लिए निदा .फाजली ने लिखा हो या गुलजार साहब ने। वो सिर्फ जगजीत सिंह के लिए ही लिखा जा सकता था और उसे सिर्फ जगजीत सिंह ही गा सकते थे। डूब कर गाना किसे कहते हैं वो जगजीत सिंह ने बताया। मुझे याद है कि वो एक बार बनारस में एक लाइव प्रोग्राम कर रहे थे। खुले मैदान में हो रहे प्रोग्राम की आवाज खुले में काफी दूर तक जा रही थी। कई ऐसे लोग थे जो उस आवाज को भी सुन रहे थे और महसूस कर रहे थे। ऐसा सिर्फ जगजीत सिंह के साथ ही हो सकता था।

जब आप गमजदा होते हैं और जगजीत सिंह की गजल आपको छू कर निकलती है तो आप आंसुओं को थामने की कोशिश नहीं करते। लगता है मानों वो गजल आपके साथ है। आप खुल कर रो पाते हैं। यह हर गायक की गजल के साथ नहीं होता। जगजीत सिंह ने जिंदगी के गमों को झेला था। उन्होंने अपने इकलौते बेटे की मौत अपनी आंखों से देखी थी। उनका दर्द उनकी गजलों में झलकता था।

बेवफाई हो या तन्हाई, खुशी हो या गम। जगजीत सिंह की गजलें आपको अकेला नहीं छोड़तीं। मेरे जैसे कई युवा हैं जिनको गजल का मतलब जगजीत सिंह ने बताया। सुर के उतरने चढ़ने के साथ ही जगजीत सिंह के गले में होने वाले कंपन में आप फर्क महसूस कर सकते थे। आज मेरे जैसे करोड़ों गजल प्रेमी जगजीत सिंह के न होने का फर्क महसूस कर सकते हैं। जवानी की दहलीज से जिंदगी के प्रति जिस एहसास को जगजीत सिंह ने दिल में बसाया था वो आज भी कायम है और ताउम्र कायम रहेगा।

ऐ समय


कहो तो  ऐ समय
तुम क्यों हुए
इतने अधीर
तुम तो क्षण क्षण देखते हो ना
परकोटे से भविष्य को
मैं भी तो देख रहा हूं
लिए तुम्हारी दृष्टि
संजय तो नहीं
हां
यह कोई महाभारत भी तो नहीं
फिर भी जीवन के कुरुक्षेत्र में
मैं चक्रव्यूह में घिरा हूं
अठ्ठाहस न करो
विकल वेदना का उपहास न करो
गर्भस्थ ज्ञान नहीं तो क्या
अभिमन्यु सा
द्वार तो खुलते और बंद होते रहते हैं
मोह और मोक्ष से परे होते हैं
उर की विह्वलता
मार्ग प्रशस्त करती है
युद्ध की व्याकुलता ही
जीत का हर्ष करती है
जीवन व्योम का तल नहीं है
स्पंदनों का धरातल नहीं है
आलम्ब है
अविलम्ब है
तुम पर आवृत है
तुम से ही निवृत है
वंदन और वरण की चाह में
कब कहां कोई अश्रु छलका
स्पर्श हुआ तो होगा तुमको भी
बोलो अलका
अभिसिंचित मन का संकल्प पढ़ लो
हे समय
अधीरता छोड़ दो
मेरी दृष्टि का भविष्य
तुम गढ़ लो।

हम लाचार साबित हो जाएंगे


एक बार अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ था। इसके बाद पिछले दस सालों में एक बार भी वहां कोई हमला नहीं हुआ जबकि अमेरिका खुले आम आतंकियों के खिलाफ जंग लड़ रहा है। ब्रिटेन में भी एक बार कई साल पहले हमला हुआ था। वहां भी इसके बाद आतंकी हमले की कोई घटना नहीं सुनाई दी। भारत में महज तीन महीनों के भीतर एक ही स्थान पर आतंकी दो बार हमला कर चुके हैं। वह भी देश की राजधानी दिल्ली में। पहले आतंकी हमले का नमूना पेश करते हैं और उसके बाद हमला करते हैं। साफ है कि हमने साबित कर दिया है कि हम आतंकियों के सामने लाचार हैं। संकीर्ण सोच वाली राजनीति हमें एक ऐसे देश का दर्जा दिला रही है जहां आम नागरिक स्वयं को सुरक्षित नहीं महसूस करता है। पूरा विश्व समुदाय अब यह मान चुका है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का दावा पिलपिला है। आतंक पर लगाम लगाने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। 
देश की सरकार के पास ऐसे कई मंत्री हैं जो किसी भी आतंकवादी हमले के बाद राजनीतिक चाशनी में डुबोया हुआ बयान दे सकते हैं। इनका पूरा फायदा भी उठाया जाता है। नेताओं के बयान आते हैं और घटना स्थल पर उनके दौरे होते हैं लेकिन इन सबके बीच आम नागरिकों का जख्म रिसता रहता है। मुआवजों का ऐलान कर सरकार अपनी खानापूर्ति कर लेती है। लेकिन इस सबके बीच हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा पर मंडरा रहे खतरे पर गंभीरता पूर्वक विचार का समय राजनीतिज्ञों को नहीं मिलता है। दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर हुई आतंकवादी घटना ने साबित किया है कि हम न सिर्फ आतंकवाद से लड़ने में असफल रहे हैं बल्कि हमारा सुरक्षा ढांचा पूरी तरह नाकाबिल है। आतंकवाद से लड़ने के लिए हमारे पास कोई स्पष्ट तंत्र नहीं है। कई एजेंसियां मिल कर आतंकवाद से लड़ाई लड़ रही हैं लेकिन किसी भी इकाई में तालमेल नहीं दिखता। केंद्रीय एजेंसियां भी हर बार नाकाफी साबित होती हैं। ऐसे में देश की सुरक्षा का दावा खोखला है। निरंतर अंतराल पर देश में आतंकी हमले होते हैं लेकिन खुफिया तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगती। 
राजनीति की रोटी सेंकने के चक्कर में हमारे देश को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां से हमें विश्व समुदाय को यह बताना बहुत मुश्किल है कि आतंकवाद के खिलाफ हम निर्णायक लड़ाई लड़ना चाह रहे हैं। कम से कम आप भारत की जेलों में कसाब और अफजल गुरु को इतने दिनों तक सुरक्षित रख कर यह भरोसा तो नहीं ही दिला सकते हैं। ऐसे में महज लफ्फाजी से काम नहीं चलेगा। कोई ठोस कदम उठाना होगा। बयानबाजी और जांच के दिलासे से आगे बढ़कर प्रत्युत्तर देना सीखना होगा। कूटनीतिक ही सही लेकिन कदम ऐसे होने चाहिए जो देश के नागरिकों को सुरक्षा की तसल्ली दे सकें। आतंकियों को होने वाली सजा को अधिक देर तक लागू न कर के भी हम विश्व समुदाय को गलत संदेश देते हैं। मानवाधिकार की बातें को थोड़ी देर के लिए यहां भुलाया जा सकता है।  
इसके साथ ही आतंकवाद से लड़ने के लिए एक ऐसा प्रभावी तंत्र बनाना होगा जो किसी भी राजनीतिक स्वार्थ से अलग हो। आतंकियों को यह बताना होगा कि आतंकवाद के खिलाफ देश एकजुट है। अगर हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो हम अपनी नजरों में तो गिरेंगे ही पूरी दुनिया के सामने हमारी लाचारी भी साबित हो जाएगी।

अफ़सोस हम लाचार हैं, हम भारतीय जो हैं


आतंकवाद के खिलाफ भारत की जंग अब दिशाहीन हो चली है। पाकिस्तान को हर बार दोषी ठहरा कर अपनी गरदन बचा लेने का नतीजा है कि देश के अलग अलग हिस्सों में पिछले 10 सालों में तीन दर्जन से अधिक आतंकवादी हमले हुए हैं और इनमें 1000 से अधिक लोगों की मौत हुईं हैं। देश का कोई कोना ऐसा नहीं बचा है जहां आतंकवादियों ने अपनी दहशत न फैलायी हो। दिल्ली से लेकर बंगलुरू तक, आसाम से लेकर अहमदाबाद तक दहशतगर्दों ने आतंक फैला रखा है। इन आतंकियों के आगे देश का नागरिक लाचार है। वह जानता है कि उसकी जान खतरे में है। 
सुरक्षा एजेंसियों की एक बड़ी फौज है देश के पास लेकिन इनका काम त्यौहारों पर एलर्ट जारी करने से अधिक कुछ भी नहीं रह गया है। यह बात सुनने में अच्छी भले ही न लगे लेकिन देश की आतंरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन एजेंसियों पर है वो आम नागरिकों का विश्वास खो चुकी हैं। धमाके दर धमाके होते रहते हैं और सुरक्षा एजेंसियों को भनक तब तक नहीं लगती जब तक किसी न्यूज चैनल पर विस्फोट की खबर न चलने लगे। सवाल पैदा होता है कि क्या भ्रष्टाचार का घुन इन एजेंसियों को भी लग चुका है। क्या इन एजेंसियों के अफसरों ने मान लिया है कि आतंकवाद का खात्मा नहीं हो सकता। या फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। कुछ भी हो भुगतना देश के नागरिकों को पड़ रहा है।
सियासी दांवपेंच का हाल यह है कि मुल्क के गुनहगारों को पालना हमारी मजबूरी हो जाती है। हमें कई साल लग जाते हैं इस बात का निणर्य करने में कि आतंकवादी को फांसी दे या नहीं। भले ही इसके पीछे न्यायप्रक्रिया का सुस्त होना एक अहम कारण हो लेकिन पुलिसिया कार्रवाई भी तेज नहीं कही जा सकती है। इन सब का फायदा भारत के खिलाफ साजिश रचने वालों को मिलता है। पालिटिकल सिस्टम में पैदा हुए लूप होल्स ने देश को खोखला किया है। इस बात में अब कोई दो राय नहीं है। स्वार्थ की राजनीति में देश को गर्त में भेज रहे हैं नेता। देश की आंतरिक सुरक्षा दांव पर लगा दी है। 
 इस सब के बावजूद सवाल यही है कि आखिरकार आतंकवाद के नासूर से मुक्ति मिलेगी कैसे। क्या देश को बयानों के जरिए आतंकवाद से मुक्ति मिल सकती है। क्या यह दिलासा दे देने से कि जल्द ही गुनाहगार पकड़े जाएंगे नागरिकों की जिंदगी सुरक्षित हो जाएगी। मुआवजा कभी भी इस देश के नागरिकों को इस बात की तसल्ली नहीं दिला सकता कि अगली बार आतंकी हमला इस देश पर नहीं होगा। न ही इस बात की कि अब कभी उनका अपना कोई जख्मी नहीं होगा। वक्त अब यह सोचने का नहीं रहा कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। वक्त सबकुछ ठीक करने के लिए कदम बढ़ाने का है। वक्त निर्णायक जंग का है। 

रोजाना बुनता हूँ एक ख़्वाब नया



रोजाना बुनता हूँ एक ख़्वाब नया 

रख देता हूँ उसे 
तुम्हारी आँखों में
तुम सो जाते हो देखता हूँ
तुम्हे 
या शायद अपने ख्वाबों को 
आँखे खोलती हो तुम 
अंगडाई लेते हुए
फिर मुस्कुराती हो 
नज़र भर के देखती हो मुझे
सिर हिला देती हो हौले से 
मानो कुछ पूछ रही हो 
मैं क्या जवाब दूं
बस मुस्कुरा भर देता हूँ
एक ख़्वाब पूरा हो गया.