आजम खां चले लेक्चर देने


कितनी अजीब बात है न कि आजम खां को अमेरिका के बोस्टन में लोगान एअरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के लिए रोक लिया गया। एक भारतीय होने के नाते आप और हम पहली बार में इसकी आलोचना ही करेंगे लेकिन जैसे ही इसके बाद आजम खां के व्यवहार और आरोपों की याद आएगी हम इसका मजा लेने लग रहे हैं। आजम खां काबीना मंत्री हैं ये उनके सरकारी प्रोफाइल में लिखा है लेकिन कुछ चीजें बिना लिखे ही आपको समझ में आ जाएंगी। कभी कभी नहीं बल्कि अक्सर ये लगता है कि आजम खां कैबिनेट मंत्री नहीं बल्कि खुद मुख्यमंत्री हैं। ये व्यवहार यूपी की जनता को कुछ अजीब जरूर लगता है लेकिन उसकी मजबूरी है। हमारे फिलहाल के संविधान में हमारे पास ये अधिकार नहीं है कि हम किसी की चलती साइकिल को रोक सकें। पांच साल तक तो हमें सहना ही होगा। 

वैसे सपा के अधिकतर नेताओं को लग रहा है कि यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार होने का मतलब है कि खुला राज। यहां कानून का राज कहने की कोई जरूरत नहीं है। आजम खां की भी स्थिती ऐसी ही होगी। आप समझ सकते हैं। उन दिनों को याद कीजिए जब लग रहा था कि आजम खां का राजनीतिक करियर लगभग खत्म सा हो गया है। ऐसे में आजम खां को भी नहीं आभास रहा होगा कि कभी सपा की सरकार इतने प्रचंड बहुमत से आएगी और आजम खां को भी इसमें पूरा रसूख मिल सकेगा। लेकिन आजम खां सियासत के माहिर खिलाड़ी हैं। वो उस मुस्लिम वर्ग की नुमांइदगी करते हैं जिसके बल पर सपा अपना बड़ा वोट बैंक खड़ा करती है। एम वाई समीकरण यानी मुस्लिम यादव समीकरण हमेशा से यूपी में निर्णायक भूमिका में रहा है। इस बात को मुलायम भी बखूबी समझते हैं। यही वजह है कि मुलायम ने आजम को खुली छूट दे रखी है। उन्हें आखिर मुस्लिमों को खुश भी रखना है। ऐसे में आजम खां थोड़ा अकड़ भी सकते हैं। लेकिन यूपी की अकड़ अमेरिका में निकालेंगे तो मामला उल्टा पड़ेगा ही। हावर्ड यूनिवर्सिटी ने जब कहा कि आपको क्राउड मैनेजमेंट का पाठ पढ़ाना है तो बड़ी जल्दी में तैयार हो लिए खां साहब। भला हो हावर्ड वालों का भी। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर हुई दुर्घटना का पता उन्हें है ही नहीं। लोग मारे गए। कई घायल हो गए। लेकिन आजम साहब हैं कि क्राउड मैनेज कर के ही मानेंगे। इससे ये भी साबित होता है कि इलाहाबाद में हुई दुर्घटना यूपी सरकार के लिए मामूली की श्रेणी में आती है। खैर, छोडि़ए। आजम खां से सहानुभूति होने भी लगी थी। एकाएक उनका बयान आया कि मुस्लिम होने के नाते उन्हें एअरपोर्ट पर रोका गया। इसके बाद भी खां साहब से थोड़ी बहुत सहानुभूति बची थी। लेकिन तभी खां साहब ने एक और सनसनीखेज बयान दे डाला। सलमान खुर्शीद, जो इस वक्त देश का विदेश मंत्रालय देख रहे हैं, उन्हें खां साहब ने लपेट लिया। आजम खां साहब का आरोप है कि सलमान खुर्शीद की वजह से ही उन्हें एअरपोर्ट पर परेशान किया गया। अब भला ऐसा क्यों होगा? लेकिन खां साहब चाहते हैं कि दुनिया वो मान ले जो वो कह रहे हैं। अब खां साहब चाहते हैं कि हम सब ये मान लें कि कांग्रेस सरकार यूपी की सपा सरकार के मंत्रियों और दिग्गज नेताओं को परेशान कर रही है। चलिए मान लिया। लेकिन इतना मान लेने के बाद एक सवाल पूछने का अधिकार तो मिल ही जाता है। सवाल ये है कि इतना सब कुछ हुआ तो सपा ने कांग्रेस को बेसहारा क्यों नहीं छोड़ा? जवाब नहीं मिलेगा। हुजूर सब सियासत है। एक हाथ देना, दूसरे हाथ से लेना। मौका मिले तो गाल बजाना। समझ गए न।

जब नगरिया हो अंधेरी तो राजा हुआ न चौपट


अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बने काफी वक्त बीत चुका है। इस दौरान अखिलेश यादव दो बार बजट भी पेश कर चुके हैं। अखिलेश यादव जब देश के सबसे बड़े राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने तो उनके समर्थकों के साथ ही उनसे पार्टीगत तौर पर अलग लोगों में भी एक मौन खुशी देखी गई। अखिलेश के सत्ता संभालते ही लगा कि अब जल्द ही यूपी का काया कल्प हो जाएगा। लेकिन हुआ ठीक उलट। मायावती के राज से पीछा छूटने के बाद अखिलेश का राज आया तो कहावत याद आई कि आसमान से गिरे खजूर में अटके। दरअसल अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री जरूर हैं लेकिन शासन किसी और का है। ये बात छुपाने की कोशिश जरूर होती रहें लेकिन अब लोग समझ चुके हैं कि अप्रत्यक्ष तौर पर शासन अखिलेश के पिता और राजनीतिक गुरू मुलायम सिंह यादव ही चला रहे हैं। इसमें आप कुछ और नाम भी जोड़ सकते हैं। आजम खां, शिवपाल यादव, नरेश अग्रवाल वगैरह वगैरह। यहां पर सपा और कांग्रेस का एक भेद भी सामने आता है। हालांकि दोनों ही पार्टियों ने युवा चेहरे को आगे रखकर चुनाव लड़ा लेकिन अगर कांग्रेस जीत जाती और राहुल सीएम बनते तो सोनिया का इतना हस्तक्षेप शायद नहीं होता। खैर, बात अखिलेश यादव की हो रही है। अखिलेश यादव से यूपी की जनता की उम्मीदें धीरे धीरे कर टूटने लगी हैं। सत्ता संभालने के कुछ ही दिनों के भीतर अखिलेश अपने दागी मंत्रियों  को लेकर चर्चा में आ गए। ये एक ऐसी समस्या थी जिससे पार पाना अखिलेश के लिए मुश्किल था। लिहाजा अखिलेश ने कइयों से नाता तोड़ा। लेकिन बचते बचाते भी मिस्टर यंग के दामन पर राजा भैया ने कुछ कीचड़ डलवा ही दिया। सीओ हत्याकांड से चर्चा में आए राजा भैया ने अखिलेश सरकार को खासा परेशान किया। 
वहीं सपा शासन के आते ही सूबे में सांप्रदायिक दंगे भी शुरू हो गए। अब तक लगभग दो दर्जन जगहों से सांप्रदायिक दंगों या तनाव की खबरें आ चुकी हैं। ये यूपी में एमवाई समीकरण का एक अहम पहलु है। एम यानी मुसलमान और वाई मतलब यादव। सपा से इन दोनों की नजदीकियां हैं। अखिलेश सरकार और उसके एमवाई समीकरण को संतुलित रखने के प्रयासों का पूरा सबूत तब मिल गया जब सरकार ने यूपी के फैजाबाद और वाराणसी में हुए धमाकों के आरोपियों पर से केस हटाने का ऐलान किया। राजनीति का ये स्वरूप अगर अखिलेश यादव का है तो भी किसी को भाएगा, लगता नहीं है। 
वहीं सरकार लैपटाप बांट कर 2014 के लिए अपना वोट बैंक तैयार करने मंे लगी है। उत्तर प्रदेश के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री अभिषेक मिश्रा हैं। मिश्रा जी कैंब्रिज से पढ़े हैं और आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफेसर थे। फिलहाल अखिलेश यादव के थिंक टैंक का हिस्सा हैं। माना जाता है कि मिश्रा जी ने लैपटाॅप बांटने की योजना को अमली जामा पहनाने में अहम रोल अदा किया। सपा सरकार बारहवीं पास करने वाले 15 लाख और दसवीं पास करने वाले लगभग 18 लाख छात्रों को लैपटाॅप बांटेगी। ये बड़ा आंकड़ा है। इसके साथ ही बेराजगारी भत्ते के लिए 1200 करोड़ खर्च करेगी। लेकिन इसी के साथ इस बात भी गौर कर लीजिए कि सूबे में बिजली के हालात खराब हैं। गर्मियों के महीने में सूबे में हाहाकार मच जाता है। हालात ये हैं बिजली की कमी से कई औद्योगिक ईकाइयों में उत्पादन गिर जाता है। छोटे व्यापारी तो भुखमरी के कगार पर आ जाते हैं। ऐसे में सूबे की विद्युत व्यवस्था को सुधारे बिना लैपटाप बांटने का औचित्य लोगों को समझ नहीं आ रहा। खबरें ये भी हैं कि अब तो लैपटाप बाजार में बिकने के लिए आ गए हैं। जाहिर है कि जिन चीजों के न होने से भी काम चल जाएगा सरकार उन्हीं चीजों को उपलब्ध कराने में पूरा ध्यान और धन लगा रही है जबकि बिजली जैसी आवश्यक जरूरत पर ध्यान नहीं है। ऐसे में ये कवायद महज वोट बैंक तैयार करने की ही लगती है। 
अखिलेश यादव एक युवा और दूरदर्शी नेता हैं ये बात उनके विरोधी भी मानते हैं लेकिन यूपी की दलगत और जातिवादी राजनीति से आगे अखिलेश भी नहीं निकल पा रहे हैं। ऐसे में अखिलेश यादव के युवा होने का टूटता तिलिस्म न सिर्फ सपा के लिए खतरे की घंटी है बल्कि मुलायम और उनके प्रधानमंत्री बनने के सपने के लिए भी। 

किस आदमी की बात कर रहें हैं अरविंद ?


नई दिल्ली में बिजली बिलों के मुद्दे पर अनशन पर बैठे अरविंद केजरीवाल आखिर किसी आदमी की बात कर रहे हैं ये एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। यकीनन इस देश की राजनीति आजादी के साठ दशक बाद भी बिजली, सड़क और पानी के इर्द गिर्द ही घूम रही है। राजनीतिज्ञों ने इस देश के हर इलाके तक बिजली, सड़क और पानी को न जाने पहुंचाने की मशक्कत की या फिर न पहुंचाने की इसका फर्क भी अब मुश्किल हो गया है। फिलहाल इस बहस से आगे निकल कर राजनीति में आने की जद्दोजहद में लगे अरविंद केजरीवाल की। 

अरविंद केजरीवाल और आवाम से जुड़ने की उनकी कोशिश पर चर्चा करने से पहले हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि अरविंद दुनिया के सबसे बड़े  लोकतंत्र के राजनीतिक परिदृश्य में आना कैसे चाहते हैं। अरविंद केजरीवाल असंतोष और मूक बना दिए जाने का दंश झेल रही जनता के लिए बहुत हद तक एक क्रान्तिकारी के रूप में आए। तब उनके साथ अन्ना हजारे थे। ये वही अरविंद हैं जो पहले राजनीति में आने से इंकार करते रहे और इसके बाद आ भी गए। हालांकि इस दौरान उन्हें अन्ना का साथ छोड़ना पड़ा। यहां एक सवाल पैदा होता है कि क्या अरविंद हर हाल में राजनीति में आना ही चाहते हैं। चाहें इसके लिए उन्हे अन्ना जैसे सहयोगियों का साथ छोड़ना ही पड़े। 
अरविंद केजरीवाल ने नई दिल्ली में बिजली के बिलों को मुद्दा बनाया और अनशन पर बैठ गए। अरविंद के अनशन के दौरान न लोगों की भीड़ जुटी और न ही मीडिया का रेला लगा। सवाल पैदा होना लाजमी है कि आखिर ये दोनों ही क्यों नदारद रहे। अरविंद केजरीवाल ने अनशन स्थल से अपील की और कहा कि लोग बिजली के बिल न जमा करें। इस अपील का कोई खास असर नहीं हुआ। बिजली कंपनियों के ओर से जारी बयान में बताया गया कि बिजली के बिलों का पूरा भुगतान लोगों ने किया है। तो इस बात के ये माएने निकाले जा सकते हैं कि अरविंद जिन मुद्दों और जिस तरीके से जनता के बीच पैठ बनाना चाह रहे हैं वो प्रभावशाली नहीं हैं। 
वहीं दूसरी ओर अन्ना हजारे आज भी अपने पुराने तरीके पर कायम हैं। वो लोगों के बीच जाकर उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं। सिस्टम से लड़ने के लिए वो सिस्टम में प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं कर रहे हैं लेकिन जिन लोगों के लिए सिस्टम बना है उन्हें सिस्टम की खामी समझा रहे हैं। ये ठीक वैसा ही जैसे किसी ग्राहक को उसके खरीदे गए सामान की गुणवत्ता के बारे में बताया जा रहा हो। अन्ना हजारे को लगता है कि जब ग्राहक खुद जागरुक होगा तो सिस्टम में खामियां नहीं डाली जा सकतीं।
आम आदमी पार्टी बनाने के बाद अरविंद का कद बढ़ा है घटा है इसका आकलन तो वो खुद ही करें तो अच्छा लेकिन इतना जरूर है कि वो जिस आम आदमी की बात कर रहे हैं उसके लिए बिजली इतना बड़ा मुद्दा है तो वो क्यांे नहीं अरविंद के साथ जुड़ रहा है। 

एक बार याद उन्हें भी कर लिया होता।


जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में जितनी बार नाम राहुल गांधी का लिया गया अगर उसका एक फीसदी हेमराज और सुधाकर को याद किया होता तो शायद हमें गर्व होता कि हमारे देश पर कांग्रेस ने कई साल तक राज किया है। हैरानी होती है कि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी के नेताओं ने विदेश और रक्षा नीति पर एक भी नोट जारी नहीं किया। जबकि मुल्क का एक बड़ा तबका ये उम्मीद लगाए बैठा था कि कांग्रेस सबसे पहले सुधाकर और हेमराज के मुद्दे पर अपना बयान जारी करेगी। 
आखिर सुधाकर और हेमराज को याद न करने की मजबूरी कांग्रेस के लिए क्या हो सकती है। ये तो कांग्रेस के नेता ही जाने लेकिन इतना तो तय है कि कांग्रेस के इस रवैए से शहीदों के प्रति उसके चरित्र का पता चल गया है। कांग्रेस से उम्मीद थी कि कम से कम राहुल बाबा के ही जरिए कांग्रेस इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करेगी। लेकिन कांग्रेस चुप रही। 
मुझे लगता है कि कांग्रेस के पास कहने के लिए बहुत कुछ था भी नहीं। कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों ही महज इस बात के चिंतन में लगे रहे कि राहुल को कैसे आगे लाया जाए। कांग्रेस इस देश की ही दुनिया की एक बड़ा राजनीतिक पार्टी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस अगर कुछ कहती तो पाकिस्तान उसे अनसुना नहीं कर सकता था। कम से कम इस देश के लोगों को ये संदेश तो जाता ही कि कांग्रेस इस मुल्क के सपूतों के बारे में भी वक्त निकालकर कुछ सोचती है। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अफसोस ये कांग्रेस हमारे देश की पार्टी है। 


बोलिए बाबा राहुल की जय


राजस्थान में कांग्रेस का चिंतन शिविर चल रहा है। कांग्रेस के तमाम दिग्गज नेता इन दिनों एक साथ चिंतन शिविर के ही बहाने सही एक जगह बैठ तो गए ही हैं। लोग बाग न जाने इन नेताओं को क्या क्या कह रहे हैं। चोर, उच्चके, चापलूस, वादाखिलाफ और न जाने क्या क्या। लेकिन मैं इन संबोधनों से जरा सा भी इत्तफाक नहीं रखता। हुजूर आप भी नहीं रखते होंगे। क्योंकि इन नेताओं को तो शायद इससे भी कोई बड़ा संबोधन मिलना चाहिए। खैर छोडि़ए हम इस चिंतन में न पड़े तो ही अच्छा। 
कांग्रेस को अपने इस चिंतन शिविर का नाम शायद कुछ और रखना चाहिए था। शायद 'राहुल शिविर', 'मीट विथ राहुल बाबा', 'हाउ टू मेक राहुल बाबा अ पालिटीशियन' या कुछ ऐसा ही। ताकि इस देश के लोगों को पता तो चल जाता कि कांग्रेस का मतलब अब सिर्फ राहुल गांधी ही रहा गया है। इससे आगे और पीछे कुछ नहीं। चिंतन शिविर में कांग्रेस के नेता कहां तक तो दुनिया की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को और मजबूत बनाने की कोशिश करते तो वो महज गणेश परिक्रमा में ही लगे हुए हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी राजनीतिक पार्टी की क्या जवाबदेही हो सकती है इसके बारे में सोचने की बजाए कांग्रेस ये सोच रही है कि राहुल गांधी को कैसे राजनीतिक जिम्मेदारी सौंपी जाए। 
राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस ने जो चरित्र दिखाया है उससे साफ हो गया है कि कांग्रेस जनता से बेहद दूर महज व्यक्तिगत चिंतन में लगी है। कांग्रेस का यह चरित्र दिखाता है कि वो जनता के बीच किसी नेता को कैसे थोपती है। वही नेता जिसको कई राज्यों में जनता ने सिरे से नकार दिया। न यूपी में चली न गुजरात में चली। इसके बावजूद कांग्रेसी चाहती है कि कांग्रेस को लोग अब राहुल के नाम से जाने। 
आम आदमी महंगाई से मर रहा है। कांग्रेस को इस बात से कोई लेना देना नहीं है। कांग्रेस के चिंतन शिविर में इस बात पर चर्चा नहीं हुई। हां, यह जरूर है कि सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी पीड़ा व्यक्त की है। मुझे समझ नहीं आता कि सोनिया जी की इस पीड़ा पर देश कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करे। कांग्रेस का शुक्रिया अदा क्या ऐसे करें कि भाई पहले आपने हमें एक भ्रष्टतंत्र दिया और अब उसपर आप दुख जता रहे हैं। इसके लिए हम आपके शुक्रगुजार हैं। 
कांग्रेस के चिंतन शिविर में न कोई ताजगी है और न ही आम आदमी के लिए कोई उम्मीद। है तो बस परिवारवाद की पुरानी परिपाटी को कायम रखने की कोशिश और गणेश परिक्रमा का कांग्रेसियों का जज्बा। बढि़या होता कि कांग्रेस अपना नाम बिना किसी चिंता के राहुल कांग्रेस कर लेती। हम भी उम्मीद छोड़ देते। 
और हां, अगर आप बोल सकते हों तो बोलिए..........राहुल बाबा की जय

हिना रब्बानी खार, खैरियत मनाओ कि हिंदुस्तान में गांधी पैदा हुआ था

शक्ल खूबसूरत, सीरत बदसूरत

मैडम हिना रब्बानी खार कह रही हैं कि भारत युद्ध पर आमादा है। बड़ा हैरतअंगेज और हास्यास्पद बयान ये है। मैडम साहिबा को विदेश मामलों का कितना ज्ञान है ये तो नहीं पता लेकिन इतना जरूर है कि मैडम को अपना लुक बनाए रखने का पूरा ध्यान रहता है। 1977 में जब मैडम हिना का जन्म हुआ उसके बाद उन्होंने आज तक उन्होंने कोई वास्तविक जंग देखी भी नहीं। हां, ये जरूर है कि कारगिल की जंग उन्होंने जरूर देखी होगी। हालांकि उस वक्त मैडम हिना महज 22 साल की ही रहीं होंगी। और उन्हें जंग की कितनी समझ रही होगी ये आप और हम समझ सकते हैं। मैडम की कुल जमा उमर अब भी 36 ही है। अब 36 की उमर में वो न तो 47 की समझ सकती हैं, न 65 को समझ सकती हैं, न 71 को। मैडम हिना ने मैसाच्युट्स यूनिवर्सिटी से व्यापार प्रबंधन में एमएससी की डिग्री ली है। मैडम पहले पाकिस्तान में वाणिज्य मंत्रालय संभाला करती थीं। कुछ दिनों से भारत के साथ रिश्ते सुधारने में लगा दी गईं हैं। 
यहां भारतीयों का सौंदर्य प्रशंसक होना भी मैडम के ऐसे बयानों की वजह है। मैडम जब भारत आईं तो भारतीय मीडिया ने उनकी जो ग्लैमरस छवि पेश की, कि बस पूछिए मत। न्यूज पढ़ते पढ़ते एंकर भावुक होने लगे। मैडम हिना ने बयान दिया कि वो भारत को एक अलग लेंस से देख रहीं हैं। ऐसे बयानों ने हिना मैडम को सुर्खियों में ला दिया। हमें भी लगा कि चलो एक नासूर खत्म हो गया। लेकिन याद करिए कि उसी वक्त मैडम चीन भी गईं थीं। लेकिन भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया ने मैडम का जितना सौंदर्यमंडन किया उसका एक फीसदी भी चीन की मीडिया ने नहीं किया। खैर छोडि़ए, हमने मैडम से हाथ मिलाया तो छुरा भी तो हमारी ही पीठ में घोंपा जाएगा। 
हाल फिलहाल मैडम को अब लगता है कि भारत ने सीमा पर तनाव बढ़ा दिया है और यु़द्ध की स्थितियां पैदा कर दी हैं। लेकिन मैडम साहिबा आप शायद भूल रहीं हैं कि ये मुल्क 1947 के बाद से रोजाना एक नई अनजानी जंग का सामना करता है। ये जंग या तो आपकी रहनुमाई में होती है या फिर आप खुद छेड़ती हैं। कभी आप संसद पर हमला करवाती हैं तो कभी लोकल ट्रेनों में अपने भाड़े के ट्टुओं को भेज कर धमाके कराती हैं। आप भूल जाती हैं कि हम अमन का पैगाम लेकर कराची गए तो आप दहशतगर्दों का ठिकाना कारगिल की पहाडि़यों में बनवा रहीं थीं। 
हिना रब्बानी खार, खैरियत मनाओ कि हिंदुस्तान में गांधी पैदा हुआ था। लेकिन ये मत भूलो कि यहीं भगत और आजाद भी जन्मे थे। मैडम साहिबा जंग हमने कभी न चाही और न चाहेंगे लेकिन इतना जरूर है कि सरहदों का निगहबानी में हमें ही अपनी जमीं पर आपकी सेनाओं की बिछाई लैंडमाइंस मिलीं हैं। हम अब भी चुप हैं समझा रहे हैं, समझ जाइए। हाथ मिलाइए, दिल मिलाइए लेकिन पीठ में छुरा मत घोंपिए।

दिन गलती गिनाने के नहीं पीएम साहब सबक सिखाने के हैं


ठीक ठाक से चुप रहने वाले जब पीएम मनमोहन सिंह जी ने पाकिस्तान की तरफ से हो रही बर्बरता पर मुंह खोला तो लगा कि पीएम साहब का बयान पाकिस्तानी राजदूत को सामने बैठाकर टाइप कराया गया है। बयान तैयार कराते वक्त एक एक लाइन के बाद पाकिस्तानी राजदूत से पूछा गया होगा कि ठीक है न भाई साहब कोई गलती तो नहीं है। कहीं कुछ अधिक तो नहीं हो रहा। फिर पाकिस्तान के राजदूत ने कहा होगा कि आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि हमने गलती की। पाकिस्तानी राजदूत ने कहा होगा कि आप लिखिए कि आप अपनी गलती को मानिए। इसके बाद पाकिस्तान कहेगा कि हमने कोई गलती की ही नहीं तो मानने का तो सवाल ही नहीं उठता। बस हो गया काम। न भारत के पीएम को चुप रहने पर ताना सुनना होगा और न ही पाकिस्तान को गलती मानने की जरूरत होगी। शायद पड़ोसी के साथ रिश्ते सुधारने का इससे बेहतर तरीका हो भी नहीं सकता। यूं भी इस मुल्क का मुस्तकबिल कुछ ऐसा ही रहा है। हम कहने को शेर हैं लेकिन गीदड़ों की धमकियों से मांद में छुप जाते हैं। इसके बाद शांती पसंद होने का हवाला देकर अपनी इज्जत बचाने की कोशिश करते हैं। हमारे दो जवान शहीद हुए। एक जवान का सिर दुश्मन मुल्क के सैनिक काट कर अपने साथ लेते गए और हमारा देश अभी हाथ जोड़े ये याचना कर रहा है कि भाई सिर लौटाओ या मत लौटाओ लेकिन प्लीज अपनी गलती तो मान लो। यूं तो पाकिस्तान गलती मानेगा नहीं और मान भी लिया तो उससे क्या होना। क्या ऐसी हरकतें वो दोबार नहीं करेगा ? इसकी गारंटी कौन लेगा? वक्त अब गलती गिनाने का नहीं वक्त अब सबक सिखाने का है। हमारे एक जवान का सिर काट कर ले गए पाकिस्तानी सैनिक। मीडिया ने हल्ला मचाया। इसके बाद फ्लैग मीटिंग हुई। लगा कि हमने हड़का दिया टुच्चे पाकिस्तान को। लेकिन हुआ क्या। पाकिस्तान ने मीटिंग के 72 घंटों के भीतर सीजफायर का पांच बार उल्लंघन किया। गोलीबारी की और हमें बताया कि मीटिंग और जंग में सब जायज है। हम अभी इस मुगालते में हैं कि हमने समझा दिया तो पाकिस्तान सुधर गया। रिश्तों को सुधारने की कोशिश एक अलग बात है और सरहद पर अपने जवानों को सुरक्षित माहौल देना अलग। दोनों में फर्क समझना होगा। कूटनीति वीजा नियमों का भविष्य तय कर सकती है लेकिन जंग के मैदान में तोप का मुंह नहीं मोड़ सकती। इसके लिए तो अपनी सेना उतारनी ही होगी।

माफ करना हेमराज इस देश के लोग तुम्हारे लिए इंडिया गेट पर नहीं आ सकते।


यकीनन ये सोच कर दुख होता है लेकिन ये सोचना तो पड़ेगा ही। एक छोटा सा सवाल है कि क्या इस देश की सरहद को सलामत रखने वालों का सिर हमारे लिए अहमियत नहीं रखता ? क्या हमारे जवान का सिर इस लायक भी नहीं कि उसके लिए इंडिया गेट पर नहीं उतर सकते ? 
हमारे देश में भ्रष्टाचार है इसमें कोई दो राय नहीं है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी इससे प्रभावित होती है इसमें भी कोई दो राय नहीं है। हमारा गणतंत्र, भ्रष्टतंत्र में बदल चुका है लिहाजा हमारी नाराजगी जायज है। इस भ्रष्टाचार की ही देन है कि हमें अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव के दर्शन हुए। इस देश में लाखों लोगों ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए देश के अलग अलग हिस्सों में कभी धरना दिया तो कभी प्रदर्शन किया। हमारा हासिल हमें अभी पता नहीं। फिलहाल हम खुश हैं कि हमने आवाज तो उठाई। 
दिल्ली में चलती बस में गैंगरेप हुआ तो देश उबल पड़ा। युवाओं की बड़ी संख्या देश के अलग अलग हिस्सों से इंडिया गेट पर आई और आवाज उठाई। पत्थरों से घिरे लोकतंत्र पर ऐसी चोट लोक की हुई कि पूरा तंत्र हिल गया। देश में एक नई बहस शुरू हो गई। 
लेकिन इस सबके बाद ये सवाल भी आ गया कि आखिर ऐसे मुद्दों पर सरकार से जवाब की उम्मीद करने वाली भीड़ आखिर हेमराज और सुधाकर सिंह की शहादत को इतने हल्के में क्यों ले रही है। क्या अब इस देश की जनता ने मान लिया है कि देश की सरहद पर हमारे जवान शहीद होते रहे हैं और होते भी रहेंगे। क्या ऐसी घटनाओं से अब हमें कोई फर्क नहीं पड़ता ? मैं कहीं से नहीं कहता कि दिल्ली में गैंगरेप की घटना और मेंढ़र में जवानों की शहादत में कोई समानता है। लेकिन इतना तो आप सब मानेंगे कि इस देश के लोगों के लिए ये दोनों ही घटनाएं बेहद माएने रखती हैं। क्या हम उस दर्द को महसूस नहीं कर पा रहे जो दर्द हेमराज के परिवारजनों से सहा है। कोई जब सेना में भर्ती होता है उसी वक्त इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है कि उसकी कभी अपने फर्ज को निभाते हुए शहादत भी हो सकती है। लेकिन इस बात के लिए कोई तैयार नहीं होता कि शहादत के बाद किसी जवान का सिर कलम करके दुश्मन सेना के सैनिक ले जाएं। क्या गुजरी होगी उस परिवार पर जिसने अपने सपूत का सिरविहीन शव हाथ में लिया होगा। इस दर्द को क्या अभी आपने महसूस किया। मथुरा में हेमराज की पत्नी, मां और परिवार के अन्य लोग अनशन पर बैठ जाते हैं लेकिन इस देश के सिस्टम को बदलने के लिए इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने वाली भीड़ की एक फीसदी भीड़ भी मथुरा नहीं पहुंचती। क्या महज इसलिए कि मथुरा दिल्ली नहीं है। क्या मथुरा जाने वाले सभी रास्ते बंद हो गए हैं ? आखिर क्या वजह है कि देश का एक व्यक्ति भी प्रधानमंत्री से इस बात का जवाब नहीं चाहता कि आखिर पड़ोसी मुल्क के साथ वो कौन से सुधरे रिश्ते बना रहे हैं जो हमारे जवानों की जान पर भारी पड़ रही है। कहां सोए हैं अन्ना हजारे ? बाबा रामदेव को क्या ये खबर नहीं मिली ? वोटों का कोई बड़ा फायदा नहीं होने वाला शायद अरविंद केजरीवाल इसीलिए चुप हैं। 
मेरी सोच और मेरी अभिव्यक्ति, मैं किसी पर थोप नहीं सकता। लेकिन ये भी सच है कि इसे अभिव्यक्त करने से मुझे कोई रोक भी नहीं सकता। हम भीड़तंत्र के सहारे लोकतंत्र को मजबूत बनाने में लगे हुए हैं। खुश हैं कि भीड़ में हम भी शामिल हैं। लेकिन याद रखिएगा कि जो भीड़ से इतर होते हैं पहचान उन्हीं की होती है। दो जवानों की शहादत इस देश के लगभग सवा अरब लोगों के लिए कोइ माएने नहीं रखती। देशभक्ति का जज्बा अब हमारे भीतर महज रस्मी जज्बा है इस बात में भी कोई दो राय नहीं। कोई एक शख्स भी नहीं पहुंचा दिल्ली ये पूछने कि लिए पीएम साहब आप क्यों चुप हैं ? क्या अभी दो-चार और जवानों का सिर पाकिस्तान के सैनिकों को सौंपना चाहता हैं ? क्या हमारे मुल्क की सेनाएं लाचार हैं या फिर आपने उन्हें लाचार बना दिया है ? जवाब तो देना ही होगा पीएम साहब आज नहीं तो कल। जवाब की ये ख्वाहिश अकेली ही सही लेकिन मजबूत जरूर है। 
और हां, भीड़ में शामिल हर उस शख्स के लिए.....................भगत और आजाद कभी इंडिया गेट पर प्रदर्शन नहीं करते। वो असेंबली में धमाके करते हैं। गोरों से आजादी के बाद अब वक्त काले लोगों की गुलामी से मुक्त होने का है। माफ करना हेमराज इस देश के लोग तुम्हारे लिए इंडिया गेट पर नहीं आ सकते। 

चुनौतियों भरा एक साल

संभव है कि कोई ये सोचे कि इस आत्मविवेचना को सफलता भरा एक साल नाम देना कहीं अधिक उचित था। लेकिन मुझे लगता है कि सफलता से कहीं अधिक हमारे लिए चुनौतियां थीं और हैं। एक ऐसा राज्य जो 12 साल का हो चुका है वहां पत्रकारिता के लिहाज से अभी बहुत कुछ बचा हुआ है। विशेष तौर पर टीवी पत्रकारिता के क्षेत्र में। हम एक ऐसी टीम का हिस्सा बने जो उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में बैठकर पूरे देश की खबरों पर नजर रख रही थी। आम तौर पर टीवी पत्रकारिता का केंद्र नोएडा और दिल्ली है। जाहिर सी बात है कि देहरादून से क्षेत्रीय सरोकारों से जुड़े मुद्दों के साथ राष्ट्रीय मुद्दों पर पैनी नजर रखना एक मुश्किल काम था। लेकिन टीम ने वो सब कुछ किया। शुरुआत में ही हमने अपने लिए खुद के लिए प्रतिमान स्थापित कर लिए। तसल्ली रही कि हमने उन प्रतिमानों को बहुत हद तक छू भी लिया। आत्म विवेचना को अगर कुछ बिंदुओं पर केंद्रित करें तो शायद वो बिंदु होंगे चुनौतियां, संभावनाएं, प्रयोग और जनपक्ष।



आमतौर पर जब आप एक नई शुरुआत करते हैं तो आपके सामने कई मुश्किलें होती हैं। इसके साथ ही आपके पास हारने के लिए कुछ होता भी नहीं है। आप खुलकर प्रयोग करते हैं। हां, ये जरूर है कि आप जब मास कनेक्ट की विधा से जुड़े होते हैं तो आपके सामने प्रयोग करने के लिए तर्कों की जरुरत होती है। चुनौतियां कल भी थीं और आगे भी रहेंगी। उत्तराखंड में टीवी पत्रकारिता के लिए कई बड़ी चुनौतियां हैं। आमतौर पर राष्ट्रीय न्यूज चैनलों में उत्तराखंड की खबरें कम ही दिखती हैं। दिखती भी हैं तो बस दिखाने भर के लिए। शायद मामला प्रोफाइल का है। ऐसे में नेटवर्क 10 को राष्ट्रीय न्यूज चैनलों की स्क्रीन से बेहतर स्क्रीन उत्तराखंड की खबरों को देनी थी। जाहिर है कि एक ऐसी टीम को खड़ा करना बड़ा काम था। वो हमने किया भी। चूंकि अब भी उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी इलाकों में आपको दिल्ली जैसे रिपोर्टर नहीं मिलेंगे। ऐसे में छोटी सी लगनी वाली खबरों को न्यूज डेस्क ने न सिर्फ मजबूती के साथ पेश किया बल्कि आमजन मानस को ऐसी खबरों के साथ जोड़ा भी।


बात संभावनाओं की करें तो इनका विस्तार उत्तराखंड के किसी पहाड़ी इलाके से खड़े होकर दूर तक फैले पर्वत शिखरों के विस्तार से कहीं कम नहीं है। एक क्षेत्रीय न्यूज चैनल के एंकर होने के नाते मुझे अक्सर यह एहसास हुआ कि आप जब सड़क, बिजली और पानी की समस्या से जूझ रहे किसी राज्य की सच्ची तस्वीर को पेश करने का जिम्मा उठाते हैं तो आपको संभावनाओं की कमी हो भी नहीं सकती है। फिर उत्तराखंड में तो विकास देहरादून और आसपास के इलाकों में ही केंद्रित हो कर रहा गया है। सियासी पार्टियों को यहां सर्कस करने का खुला मंच भी मिला है। महज 12 सालों में उत्तराखंड की राजनीति यूपी के नक्शे कदम पर चलने लगी है। शायद ये गुण यूपी ने उपहार में उत्तराखंड को विभाजन के दौरान दे दिया। अव्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठा सकने का माद्दा कम ही लोगों में होता है। एक बेहतर मंच भी चाहिए होता है। मुझे खुशी है कि नेटवर्क 10 ने उत्तराखंड को वह मंच दिया। न सिर्फ देहरादून बल्कि पुरोला और मुनस्यारी की खबरों को हमने प्रमुखता से दिखाया। आमतौर पर पहाड़ में लोग शाम को जल्द ही बिस्तरों में दुबक जाते हैं। इसके बावजूद हमने अपने प्राइम टाइम को देखने के लिए लोगों को विवश कर दिया। यह किसी उपहारा से कम नहीं है। फोन इन प्रोग्रामों में लोगों की काल्स इस बात की गवाह बनीं कि हमने बहुत हद तक उन्हें फोन करने के लिए बाध्य किया। आपको इससे अधिक क्या चाहिए। सिस्टम ने भी आपको पहचाना और कई खबरों पर सरकार को संज्ञान लेना पड़ा। यहीं नहीं हमने हिमाचल में भी महज एक महीने के कम वक्त में एक बेहतर पहचान बना ली। आम आदमी से लेकर हिमाचल के बड़े राजनीतिज्ञों तक ने नेटवर्क 10 की माइक आइडी को पहचाना।
आमतौर पर आम लोगों को लगता है कि किसी न्यूज चैनल पर चल रही खबर किसी व्यक्ति विशेष की मेहनत होगी। लेकिन किसी भी न्यूज चैनल को कंटेट के आधार पर मजबूत बनाने के लिए उसकी डेस्क के साथ साथ पूरी टीम का मजबूत होना जरूरी होता है। सौभाग्य से नेटवर्क 10 की शुरुआती टीम में युवा उत्साह के साथ प्रौढ़ अनुभव भी मिल गया। इन सबके साथ देश के वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार अशोक पाण्डेय का एक्जीक्यूटिव एडिटर के रूप में मार्गदर्शन। इसके साथ ही न्यूज हेड के रूप में राकेश खंडूड़ी जैसे जुझारू और जमीन से जुड़े पत्रकारों का सानिध्य। हालांकि राकेश जी अब किसी अन्य मीडिया हाउस के साथ जुड़ चुके हैं लेकिन योगदान सभी को हमेशा याद रहेगा। एक बड़ी टीम और सभी के नाम लिखना संभव नहीं इसलिए महज प्रतीक रूप में इन दोनों नामों से काम चला रहा हूं। मुझे लगता है कि अशोक पाण्डेय और राकेश खंडूड़ी को इस बात से इत्तेफाक होगा कि इस टीम के बिना वो महज एक साल में इतना बड़ी पहचान नहीं बना सकते थे।

किसी भी मीडिया हाउस के लिए उद्देश्य परक पत्रकारिता जरूरी होती है। उद्देश्य विहीन पत्रकारिता महज खबरों के संकलन और प्रकाशन-प्रसारण तक ही रह जाती है। मेरी समझ में इसे पत्रकारिता की संज्ञा देना गलत होगा। आप एक ऐसी विधा के साथ जुड़े हैं जो मिशन से प्रोफेशन और कमीशन तक का सफर तय कर चुकी है। फिर भी आपको मिशन के साथ रहना हो तो मुश्किलें तो आएंगी हीं। तमाम प्रबंधकीय उठापटक और विरोधाभासों के बीच खड़े रहना ही तो संघर्ष हैं और इस संघर्ष का अपना ही मजा है। उम्मीद है 2013 में नेटवर्क 10 कई मामलों में अपने प्रतिद्वंदी चैनलों से बीस हो जाएगा। अब भी कई काम बचे हैं। आखिर में जनता जनार्दन को सलाम जिसने हमें अपनी नजरों में जगह दी। 
एक सफर में गुजरते हुए ........................आशीष तिवारी 

संतोष कभी मरते नहीं...

बस 2012 के फरवरी महीने के शुरुआती दिनों में ही मुलाकात हुई थी संतोष वर्मा से। हालांकि अब मेरी धर्मपत्नी बन चुकी अलका अवस्थी उनको पहले से जानती थीं। अलका ने संतोष वर्मा के साथ पत्रकारिता भी की। ठीक ठीक नहीं याद कि वो कौन सी तारीख थी लेकिन इतना याद है कि फरवरी का महीना था। संतोष वर्मा से बनारस से देहरादून पहुंचने के बाद मैं अपनी पत्नी के साथ पहली बार उनसे मिलने पहुंचा था। संतोष वर्मा और मुझमें उम्र का बड़ा फासला था लेकिन संतोष वर्मा ने जिस गर्मजोशी से मुझे गले से लगाया वह अविस्मरणीय है। मैं चूंकि उनसे पहली बार मिल रहा था लिहाजा संकोच और औपचारिकता के चलते मैं सिर्फ हाथ मिला कर रह जाना चाहता था लेकिन संतोष जी ने हाथ मिलाने के बाद मुझसे कहा - 'नहीं ऐसे नहीं।' इसके बाद संतोष जी ने मुझे गले से लगा लिया। आप जिससे पहली बार मिल रहे हों वो आपको यूं अपनाए ये कम होता है। हम मैंए मेरी पत्नी अलका और संतोष जी सर्द रात में देहरादून की उस सड़क पर थोड़ी देर तक बात करते रहे। चूंकि रात हो रही थी लिहाजा हम जल्द ही घर की और निकल गए। इसके बाद संतोष जी से अक्सर मुलाकात होती रही। संतोष जी भावुक थे और मर्मस्पर्शी मनुष्य। खबरों के लिहाज से उनके पास एक बेहतर सोच भी थी।

उनसे मेरी आखिरी मुलाकात देहरादून में उनके ही घर पर हुई थी। वो दिव्य हिमगिरी पत्रिका के कार्यकारी संपादक के पद से त्यागपत्र दे चुके थे। घर पर ही अध्ययन कर रहे थे। भविष्य की कई योजनाएं भी उन्होंने बेहद संक्षेप में लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ मुझे बता दीं। लगभग 25 सालों तक जिसने पत्रकारिता को जिया हो उसके भीतर जो आत्मविश्वास होना चाहिए वो पूरा था संतोष जी के साथ। एक बात औरए मैंने कभी उनके भीतर अहंकार नहीं देखा। मेरे आलेखों पर अक्सर उनकी टिप्पणियां आती रहती थीं। अभी हाल ही में उन्होंने मेरे एक आलेख पर फेसबुक के जरिए टिप्पणी की थी। उनके और मेरे बीच पत्रकारिता के अनुभव का फासला करीब 15 सालों का था लेकिन वो हमेशा उत्साहवर्धन करते रहते।

मृदुभाषी संतोष जी के कमरे में भी संतोष पसरा होता था। एक तंग गली के पिछले हिस्से में बने एक छोटे से कमरे में रहने वाले संतोष वर्मा को कहीं से भी दिखावा पसंद नहीं था। संतोष वर्मा के देहांत की खबर बेचैन करने वाली थी। इससे भी अधिक इस बात पर दुख हुआ कि उनके परिजनों ने उनकी मृत देह को स्वीकार करने से भी मना कर दिया।

ये सही है कि पत्रकार भी हमारे समाज का ही एक हिस्सा होता है। पेट और परिवार को पालने के लिए उसे भी पैसे कमाने पड़ते हैं। संतोष जी भी इन सामाजिक बाध्यताओं से घिरे थे। उनके परिवारजनों ने उनकी मृत देह हो लेने से भले ही कर दिया हो लेकिन संतोष वर्मा जी के साथ कई साथी और हैं जो उनकी मृत देह का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करेंगे।

जिस संतोष के लिए हम सब परेशान रहते हैं वो संतोष वर्मा में पर्याप्त था। व्यथित और दुखी मन के साथ भी अब तक ये स्वीकार नहीं कर पाया हूं कि संतोष वर्मा अब हमारे बीच नहीं हैं। फिर भी नश्वर शरीर की अनिवार्यता स्वीकार कर ही लूंगा। बस तसल्ली रहेगी कि कुछ उपहारों के साथ संतोष वर्मा अब भी हमारे साथ हैं।